नवंबर 19, 2010

हम भी बिकेंगे, कोई खरीदार है??

अर्थों अनर्थों की बाल्टियाँ

या तो मेरे भाषिक संस्कार चुक गए हैं या फिर समाज ने इतनी जल्दी अपनी भाषा बदल ली है की मैं उसे न सही से पढ़ पा रहा हूँ न ही समझ पा रहा हूँ.एक ज़माना था भगत जी का. बाज़ार आँख खोल कर जाते थे.अब दोनों ही नहीं रहे.जो बात इतनी आसानी से पल्ले पड़ जानी चाहिए थी समझ क्यों नहीं आ रही थी, मेरी समझ से परे है.जब सूई से लेकर बोफ़ोर्स, त्वचा के रंग से लेकर चाँद पर प्रति चौखंटा ज़मीं बिक रही हो तब हम जैसे भ्रूणावस्था में शिक्षित दीक्षित होते चिल्गोजों की क्या बिसात..

डार्विन की थियरी भले पूंछ के विलोपन को स्थापित करती हो पर यहाँ जिसने इस विलुप्त पर्याय अंग पर अपनी सेंसरी दृष्टि रखी वही दो साल बाद स्वं को बिकने की विलक्षण प्रतिभा गुण संपन्न हो पायेगा। माने इस संसथान में आने वाले स्वमुर्धन्य विद्वानों के प्राणचक्षु बनने में जो जो सफल होंगे वही इस 'भाव'सागर को पार कर सकेंगे।कदापि अनुमान न लगाया जाये न ही ऐसा समझा जाये कि इस निष्कर्ष का प्रस्फुटन इस अनुभवहीन बुद्धि-प्रज्ञा से हुआ है।यह पोलपट्टी हम सबको ईद वाले दिन हुई फ्रेशर पार्टी में पढाई गयी।अब उनके अनुभवशील मति पर संदेह शंका करना मुर्खता ही होगी ।उन्होंने उत्सवी माहौल में चाटुकारिता जी-हजुरी को नेटवर्किंग जैसे भूमंडलीय आभा वाला शब्द कहा।इससे यह भी पुष्ट हुआ कि चलो  यहाँ हमारा लालन-पालन लक्षणा-व्यंजना व्यापी वायु में होगा|

अध्यापकों ने तो अपनी रूचि अपनी विशेषज्ञता के अनुरूप विषयों को चुन लिया पर क्या हमारे पास ये चुनने का विकल्प होगा..जब हम यहाँ से निकलेंगे तब हम अपने नियोक्ताओं को खुद चुनेंगे या वो हमें।सबको पता है इसका जवाब। उस दबड़ा नंबर ३** माफ़ कीजियेगा..उस कमरे में हम लोग जब भी होते है तब आदर्श, प्रतिबध्तायें दुमंजिले पर होती है, न आघाते है न उन अव्यवहारिक बातों से घिन्नाते हैं.बस बघारे जाओ बघारे जाओ, कौन सा किसी को टैक्स देना है.सबको पता है उस कमरे के बहार उनका कोई नामलेवा तो क्या 'कान'लेवा' तक भी नहीं.ऐसे ऐसे समाज सुधारकों का जमावड़ा कि बस पूछों मत अफगानिस्तान से लेकर तालिबान, खाप, भ्रष्टाचार, कश्मीर तक ऐसी कौन से व्याधि है जिसकी संजीवनी बूटी इन झोला छाप 'डागदर' बाबुओं के पास न हो.

पर जब गुलाम बनने की पहली शर्त है विवेक का न होने अचेतन रहना सवाल न करना..तो मियां इसकी भी गिरगिटिया तय्यारीसाथ साथ चलती रहती है बिना किसी उदघोषणा बिना किसी को बताये चुपचाप, जिसे साथी ये पता नहीं चलने देगा कि वो किसकी पूंछ पकड़ चुका है..इन सबके बावजूद भ्रम का निर्माण तो करना ही पड़ता है हर दिन हर क्लास आपको ऐसा बनाती चली जाती है कि लगने लगता है कि कल ही सारी दुनिया बदलने के लिए आपकी कलम की ही बाँट जोह रही है। कुछ अवसरवादी साफ़ साफ़ नज़र आजाते हैं जो समाज सेवा जैसे नुक्ते पर चढ़ कर पहले तक तो मुखर्जी नगर के रट्टेबाज तोते थे पर अब लोगों से जुड़ने का बहाना लिए इधर आते हैं.बेचारे न इधर के हो पाते हैं न उधर के.एक पता नहीं कैसा दंभ हमेशा अपने कंधो पर लिए ढ़ोते रहते है की हमारे सामने सब..पता नहीं क्या हैं..!!

उसी कमरे में बैठे-बैठे कभी वैकल्पिक मीडिया की गूंज भी सुनाई देती है. मतलब नोम चोमस्की को याद करने वाले भी हैं, छौंक लगाने वाले भी. उन विद्वानों की वाणी में 'द हिन्दू ', 'जनसत्ता ' में छपने वाले संपादक के नाम पत्र भी इसी मद के अंतर्गत आते हैं।संचार के नए नए माडल समझाए जा रहे हैं. अगर अपनी आँखों से देखूं तो 'सबलोक' अप्रैल से ही क्नाट प्लेस की सेंट्रल न्यूज़ एजेँसी से लेकर गिरिराज बुक स्टाल तक नज़र नहीं आ रही कोई अता पता नहीं है 'बया ' को तो लगता है दिलशाद गार्डन जाकर उसके पते से ही उठाना पड़ेगा, 'समयांतर' मिल जाती है यही खैर है..'आवाहन ' का तो नाम शायद आप पहली बार पढ़ रहे होंगे..अब जबकि उपलब्धता के नाम पर इनकी यह स्थिति है तब हम क्या करें..?? पहले चाटुकार बन, जी हजूरी कर अपने स्तर को आर्थिक रूप से मजबूत करें या फिर क्रांति का झंडा बुलंद कर घर फूंक तमाशा देखें और भूंखे पेट समाज के बदलने तक रूमानी खवाब देखते देखते रात को आसमान में तारें गिनें..लोग कहेंगे अपनी असमर्थता दिखाना ऐसे तर्क देना सब पूंजीवादी चोंचालें हैं,पर..इस पर के आगे पता नहीं क्या है..

अब तो तहलका का भी अपना मीडिया संसथान इन कुकुरमुत्तों के साथ उग आया है.मतलब तुम गीली मिटटी कच्चे धातु बने रहो ताकि ये कुम्हारों ठठेरों की जमात अपने मनमुताबिक अपने खांचो-ढांचो में सहेजता से ढाल पायें..आपका मूल क्या है किसी को क्या लेना देना, जब संस्था अपनी पूंजी लगा कर आप जैसे अनगढ़ गिरमिटिया को उपयोगी संसाधन बना, परिवर्तित कर लेगी तब आपकी अपनी उपयोगिता सिर्फ उनके लिए है, आपका अपना कोई अस्तित्व नहीं..आप सिर्फ टास्क प्रफ़ोर्मर भर रह जाते है, माने उन बड़े दबड़ों में बांग भी दूसरे के कान ऐंठने पर देने को बाध्य.  पर अब मैं क्या करूँ? मैं अपने को कहाँ पता हूँ ?? क्या स्वयं को उनके जैसे हो जाने दूँ?? नहीं! नहीं!! नहीं!!

मैं इतने अनर्थों का उतराधिकारी नहीं होना चाहता. मुकेश मै तुम नहीं हो सकता,मनोज तुम्हारे जैसा भी नहीं.यही मेरा नकार है..ऐसा नहीं है ये सवाल यहीं उठें हैं. हर वह व्यवस्था जो आपको आपके मूलरूप में स्वीकार न कर संसाधन जैसा कुछ माने वहां ये ज़रूर उठेंगे उठते रहेंगे..एक प्रतिपक्ष आपको बनना ही पड़ेगा इस द्वन्द में ही आपको बिकसना है,सार्थकता इसी में है..यह जैसा भी जो कुछ भी था,अभी यहीं तक..छवियाँ जिसके रेटिना पर जो भी आयीं हो वो स्वीकार्य बस बात आपकी ग्राहियता की है कि आप कितने कितने अर्थों अनर्थों कीबाल्टियाँ इन कुओं से निकल पाते हैं।!!

{बंदपरवर इस सत्र से दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी पत्रकारिता डिप्लोमा में पाए जाते हैं }

आवाज़ें..

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