दिसंबर 24, 2010

उदय प्रकाश की कविताई

१. नमस्कार
 
पानी अगर सिर पर से गुज़रा, आलोचको
तो मैं किसी दिन आज़िज़ आकर अपने शरीर को
परात में गूँथ कर मैदे की लोई बना डालूंगा
और पिछले तमाम वर्षों की रचनाओं को मसाले में लपेट कर
 
बनाऊंगा दो दर्ज़न समोसे

और सारे समोसे आपकी थाली में परोस दूंगा
तृप्त हो जाएंगे आप और निश्चिंत
कि आपके अखाड़े से चला गया
एक अवांछित कवि-कथाकार

नमस्कार ! 

.व्यवस्था 

दोस्त चिट्ठी में

लिखता है--
'मैं सकुशल हूँ ।'

मैं लिखता हूँ--
'मैं सकुशल हूँ ।'

दोनों आश्चर्यचकित हैं ।

३ .रेख्‍ते में कविता 

जैसे कोई हुनरमंद आज भी
घोड़े की नाल बनाता दिख जाता है
ऊंट की खाल की मशक में जैसे कोई भिश्‍ती
आज भी पिलाता है जामा मस्जिद और चांदनी चौक में
प्‍यासों को ठंडा पानी

जैसे अमरकंटक में अब भी बेचता है कोई साधू

मोतियाबिंद के लिए गुल बकावली का अर्क

शर्तिया मर्दानगी बेचता है

हिंदी अखबारों और सस्‍ती पत्रिकाओं में
अपनी मूंछ और पग्‍गड़ के
फोटो वाले विज्ञापन में हकीम बीरूमल आर्यप्रेमी

जैसे पहाड़गंज रेलवे स्‍टेशन के सामने

सड़क की पटरी पर
तोते की चोंच में फंसाकर बांचता है ज्‍योतिषी
किसी बदहवास राहगीर का भविष्‍य
और तुर्कमान गेट के पास गौतम बुद्ध मार्ग पर
ढाका या नेपाल के किसी गांव की लड़की
करती है मोलभाव रोगों, गर्द, नींद और भूख से भरी
अपनी देह का

जैसे कोई गड़रिया रेल की पटरियों पर बैठा

ठीक गोधूलि के समय
भेड़ों को उनके हाल पर छोड़ता हुआ
आज भी बजाता है डूबते सूरज की पृष्‍ठभूमि में
धरती का अंतिम अलगोझा

इत्तिला है मीर इस जमाने में

लिक्‍खे जाता है मेरे जैसा अब भी कोई-कोई
उसी रेख्‍ते में कविता


४ . रंगा-बिल्ला 

एक था रंगा

एक था बिल्ला

दोनों भाई-भाई नहीं थे
लेकिन दोनों को फाँसी हो गयी ।

एक थे टाटा

एक है बिरला

दोनों भाई-भाई हैं

लेकिन दोनों को फाँसी नहीं हुई ।

५ .सहानुभूति की मांग

आत्मा इतनी थकान के बाद
एक कप चाय मांगती है
पुण्य मांगता है पसीना और आँसू पोंछने के लिए एक
तौलिया
कर्म मांगता है रोटी और कैसी भी सब्ज़ी

ईश्वर कहता है सिरदर्द की गोली ले आना

आधा गिलास पानी के साथ

और तो और फकीर और कोढ़ी तक बंद कर देते हैं

थक कर भीख मांगना
दुआ और मिन्नतों की जगह
उनके गले से निकलती है
उनके ग़रीब फेफड़ों की हवा

चलिए मैं भी पूछता हूँ

क्या मांगूँ इस ज़माने से मीर
जो देता है भरे पेट को खाना
दौलतमंद को सोना, हत्यारे को हथियार,
बीमार को बीमारी, कमज़ोर को निर्बलता
अन्यायी को सत्ता
और व्याभिचारी को बिस्तर

पैदा करो सहानुभूति

कि मैं अब भी हँसता हुआ दिखता हूँ
अब भी लिखता हूँ कविताएँ।


६ .आँकड़े

अब से तकरीबन पचास साल हो गए होंगे
जब कहा जाता है कि गांधी जी ने अपने अनुयायियों से कहीं कहा था
सोचो अपने समाज के आख़िरी आदमी के बारे में
करो जो उसके लिए तुम कर सकते हो
उसका चेहरा हर तुम्हारे कर्म में टंगा होना चाहिए तुम्हारी
आंख के सामने

अगर भविष्य की कोई सत्ता कभी यातना दे उस आख़िरी आदमी को
तो तुम भी वही करना जो मैंने किया है अंग्रेजों के साथ

आज हम सिऱ्फ अनुमान ही लगा सकते हैं कि
यह बात कहां कही गई होगी
किसी प्रार्थना सभा में या किसी राजनीतिक दल की किसी मीटिंग में
या पदयात्रा के दौरान थक कर किसी जगह पर बैठते हुए या
अपने अख़बार में लिखते हुए
लेकिन आज जब अभिलेखों को संरक्षित रखने की तकनीक इतनी विकसित है
हम आसानी से पा सकते हैं उसका संदर्भ
उसकी तारीख और जगह के साथ

बाद में, उन्नीस सौ अड़तालीस की घटना का ब्यौरा
हम सबको पता है

सबसे पहले मारा गया गांधी को
और फिर शुरू हुआ लगातार मारने का सिलसिला

अभी तक हर रोज़ चल रही हैं सुनियोजित गोलियां
हर पल जारी हैं दुरभिसंधियां

पचास साल तक समाज के आख़िरी आदमी की सारी हत्याओं का आंकड़ा कौन छुपा रहा है ?
कौन है जो कविता में रोक रहा है उसका वृत्तांत ?

समकालीन संस्कृति में कहां छुपा है अपराधियों का वह एजेंट ?
.खेल  

जो लड़का

सिपाही बना था
उससे दूसरे लड़के ने
अकड़कर कहा--

'अबे राजा की पूँछ के बाल

मैं चोर नहीं हूँ'

और खेल

बिगड़ गया । 

८ .एक भाषा हुआ करती है

एक भाषा हुआ करती है
जिसमें जितनी बार मैं लिखना चाहता हूं `आंसू´ से मिलता जुलता कोई शब्द
हर बार बहने लगती है रक्त की धार

एक भाषा है जिसे बोलते वैज्ञानिक और समाजविद और तीसरे दर्जे के जोकर
और हमारे समय की सम्मानित वेश्याएं और क्रांतिकारी सब शर्माते हैं
जिसके व्याकरण और हिज्जों की भयावह भूलें ही
कुलशील, वर्ग और नस्ल की श्रेष्ठता प्रमाणित करती हैं

बहुत अधिक बोली-लिखी, सुनी-पढ़ी जाती,
गाती-बजाती एक बहुत कमाऊ और बिकाऊ बड़ी भाषा
दुनिया के सबसे बदहाल और सबसे असाक्षर, सबसे गरीब और सबसे खूंख़ार,
सबसे काहिल और सबसे थके-लुटे लोगों की भाषा,
अस्सी करोड़ या नब्बे करोड़ या एक अरब भुक्खड़ों, नंगों और ग़रीब-लफंगों की जनसंख्या की भाषा,
वह भाषा जिसे वक़्त ज़रूरत तस्कर, हत्यारे, नेता, दलाल, अफसर, भंड़ुए, रंडियां और कुछ जुनूनी
नौजवान भी बोला करते हैं

वह भाषा जिसमें लिखता हुआ हर ईमानदार कवि पागल हो जाता है
आत्मघात करती हैं प्रतिभाएं
`ईश्वर´ कहते ही आने लगती है जिसमें अक्सर बारूद की गंध

जिसमें पान की पीक है, बीड़ी का धुआं, तम्बाकू का झार,
जिसमें सबसे ज्यादा छपते हैं दो कौड़ी के मंहगे लेकिन सबसे ज्यादा लोकप्रिय अखबार
सिफ़त मगर यह कि इसी में चलता है कैडबरीज, सांडे का तेल, सुजूकी, पिजा, आटा-दाल और स्वामी

जी और हाई साहित्य और सिनेमा और राजनीति का सारा बाज़ार

एक हौलनाक विभाजक रेखा के नीचे जीने वाले सत्तर करोड़ से ज्यादा लोगों के
आंसू और पसीने और खून में लिथड़ी एक भाषा
पिछली सदी का चिथड़ा हो चुका डाकिया अभी भी जिसमें बांटता है
सभ्यता के इतिहास की सबसे असभ्य और सबसे दर्दनाक चिटि्ठयां

वह भाषा जिसमें नौकरी की तलाश में भटकते हैं भूखे दरवेश
और एक किसी दिन चोरी या दंगे के जुर्म में गिरफ़्तार कर लिए जाते हैं
जिसकी लिपियां स्वीकार करने से इंकार करता है इस दुनिया का समूचा सूचना संजाल
आत्मा के सबसे उत्पीड़ित और विकल हिस्से में जहां जन्म लेते हैं शब्द
और किसी मलिन बस्ती के अथाह गूंगे कुएं में डूब जाते हैं चुपचाप
अतीत की किसी कंदरा से एक अज्ञात सूक्ति को अपनी व्याकुल थरथराहट में थामे लौटता है कोई जीनियस

और घोषित हो जाता है सार्वजनिक तौर पर पागल
नष्ट हो जाती है किसी विलक्षण गणितज्ञ की स्मृति
नक्षत्रों को शताब्दियों से निहारता कोई महान खगोलविद भविष्य भर के लिए अंधा हो जाता है
सिर्फ हमारी नींद में सुनाई देती रहती है उसकी अनंत बड़बड़ाहट...मंगल..शुक्र.. बृहस्पति...सप्त-ॠषि..अरुंधति...ध्रुव..
हम स्वप्न में डरे हुए देखते हैं टूटते उल्का-पिंडों की तरह
उस भाषा के अंतरिक्ष से
लुप्त होते चले जाते हैं एक-एक कर सारे नक्षत्र

भाषा जिसमें सिर्फ कूल्हे मटकाने और स्त्रियों को
अपनी छाती हिलाने की छूट है
जिसमें दण्डनीय है विज्ञान और अर्थशास्त्र और शासन-सत्ता से संबधित विमर्श
प्रतिबंधित हैं जिसमें ज्ञान और सूचना की प्रणालियां
वर्जित हैं विचार

वह भाषा जिसमें की गयी प्रार्थना तक
घोषित कर दी जाती है सांप्रदायिक
वही भाषा जिसमें किसी जिद में अब भी करता है तप कभी-कभी कोई शम्बूक
और उसे निशाने की जद में ले आती है हर तरह की सत्ता की ब्राह्मण-बंदूक

भाषा जिसमें उड़ते हैं वायुयानों में चापलूस
शाल ओढ़ते हैं मसखरे, चाकर टांगते हैं तमगे
जिस भाषा के अंधकार में चमकते हैं किसी अफसर या हुक्काम या किसी पंडे के सफेद दांत और
तमाम मठों पर नियुक्त होते जाते हैं बर्बर बुलडॉग

अपनी देह और आत्मा के घावों को और तो और अपने बच्चों और पत्नी तक से छुपाता
राजधानी में कोई कवि जिस भाषा के अंधकार में
दिन भर के अपमान और थोड़े से अचार के साथ
खाता है पिछले रोज की बची हुई रोटियां
और मृत्यु के बाद पारिश्रमिक भेजने वाले किसी राष्ट्रीय अखबार या मुनाफाखोर प्रकाशक के लिए
तैयार करता है एक और नयी पांडुलिपि

यह वही भाषा है जिसको इस मुल्क में हर बार कोई शरणार्थी, कोई तिजारती, कोई फिरंग
अटपटे लहजे में बोलता और जिसके व्याकरण को रौंदता
तालियों की गड़गड़ाहट के साथ दाखिल होता है इतिहास में
और बाहर सुनाई देता रहता है वर्षो तक आर्तनाद

सुनो दायोनीसियस, कान खोल कर सुनो
यह सच है कि तुम विजेता हो फिलहाल, एक अपराजेय हत्यारे
हर छठे मिनट पर तुम काट देते हो इस भाषा को बोलने वाली एक और जीभ
तुम फिलहाल मालिक हो कटी हुई जीभों, गूंगे गुलामों और दोगले एजेंटों के
विराट संग्रहालय के
तुम स्वामी हो अंतरिक्ष में तैरते कृत्रिम उपग्रहों, ध्वनि तरंगों,
संस्कृतियों और सूचनाओं
हथियारों और सरकारों के

यह सच है

लेकिन देखो,
हर पांचवें सेकंड पर इसी पृथ्वी पर जन्म लेता है एक और बच्चा
और इसी भाषा में भरता है किलकारी

और
कहता है - `मां ´ !

.मरना  

आदमी

मरने के बाद
कुछ नहीं सोचता.

आदमी

मरने के बाद
कुछ नहीं बोलता.

कुछ नहीं सोचने

और कुछ नहीं बोलने पर
आदमी
मर जाता है.

दिसंबर 19, 2010

इतवारी दरियागंज और किताब बाज़ार

पता नहीं इन मूई किताबों से हम कैसे जोंक की तरह चिपक उसे चूसने को मजबूर कर दिए गए. और नामुराद कौन सी घड़ियाँ थीं जब एक इतवार सात सौ उन्तीस पकड़ डिलाईट.. हाँ शायद तब हम दसवीं में गए गए थे.तभी से कुछ चस्का हाँ चस्का ही लगा कि स्कूल की जिल्दों से कुछ खुजली सी होने लगी और खुजाते खुजाते हम उनसे दूर अपने को इस तरफ पाने पाए जाने लगे.तब से लेकर आज तक कितनी ही किताबों को रद्दी से भी कम दाम पर वह से बटोर-बटोर कर इस घर को भरते रहे अब तो माँ भी आतंकित सी रहती है की वहां जाये तो कुछ और को न लाद लाये..काहिर अभी इस पर कोई नॉसटेल्जिक संस्मरण नहीं लिख मारने वाला आज सिर्फ इस बदलते हुए बाज़ार की चाँद तस्वीरें भर जिनमे इस समय की कई कई व्याख्याएँ हैं और जिनकी पहली टीकाएँ हम किये देते है आगे की आप खुद करें..इतनी स्वतंत्रता तो आप ले ही सकते हैं..तो हो जाये एक नज़र अपने प्यारे से रविवारी संडे मार्केट की एक सैर..जहाँ इतिहास से लकर भविष्य तक है हफ्ते बिछा मिलता है..तो शुरू करते हैं डिलाइट से..


इसी पर एम.ए. में दाखिला लेने के बाद दिल्ली में पहले पहल मूवी अकेले जाकर देखी चक दे इंडिया..सारी आशाओं-प्रत्याशाओं को धता देकर हमने ज़ाकिर हुसैन में दाखिला किया था और इस हॉल में अकेले जाना सीमित परिधि में एक पहला नकार-सा था उसकी कहानी कभी अपनी आत्मकथा में जब हम मुड़ मुड़ कर देखेंगे..


शिक्षा का अधिकार. बड़े शोर शराबे के बीच सरकार लायी और उसका हश्र उन शिक्षा संस्थानों के बाहर कुछ यूँ ही दिख पड़ता है, अन्दर तो स्थिति इससे भी गयी गुज़री है, जिनमे पब्लिक स्कूलों ने और अंधेरगर्दी मचा रखी है.


किताबों की यही गत है यहाँ. पर कुछ लोग इन्हें बचाने हर हफ्ते आते-जाते रहते हैं..बेचने वाले ने इन्हें कबाड़ के दाम से ख़रीदा और हम आप फिर रद्दी के भाव चुका उन्हें बटोर लेते हैं. इतना डिस्काउंट तो कहीं भी किसी दुकान पर नहीं मिलता..यहाँ तो पूरा का पूरा बाज़ार लगा है..!!


हिंदी की कुछ किताबे यहाँ दिखाई पड़ती हैं वो या तो एनसीइआरटी की कोर्स की होती है या हिंदी की बहुतायत में छपने वाली स्वघोषित अखबारी सूचनाओं वाली खबरिया पत्रिकाएं या ऐसी ही राजा पॉकेट बुक्स की तरह लुगदी किस्म की रद्दी की तरह. रौयल्टी समाप्त और इनकी सेवाएँ शुरू. प्रेमचंद से लेकर प्रसाद तक के जनसुलभ संस्करण सड़क पर पड़े होते हैं. अपवाद स्वरूप हिंदी की कुछ ठीक-ठाक किताबें ओरिएंटल इन्शोरेन्स बिल्डिंग के पास कभी-कभी कुछ मिल जाती हैं, पर आपकी आँखों को नज़र आनी चाहिए..लगे हाथ शिवमंदिर के मुहाने पर कचौड़ियों का आनंद भी लिया जा सकता है..


यह वही सड़क है जिसे कभी फैज़ बाज़ार कहा जाता था और ये इलाका शाहजहानाबाद में आता था, आज उसी विरासत के संरक्षण के लिए एक शाहजहानाबाद पुनर्विकास निगम भी है, जिधर से गाड़ियाँ आ रही हैं उधर दिल्ली दरवाज़ा और जिधर जा रही हैं उधर कश्मीर की तरफ खुलता कश्मीरी दरवाज़ा..और इसी सड़क पर आगे चल कर गोलचा भी पड़ता है जो इस तंगहाली में बंद होते और मल्टीप्लेक्स होते जाते सिनेमाघरों के समय के बीच अपना अस्तित्व बचाए हुए है, और वो लोहे का पुल भी जहाँ तक ये किताब बाज़ार फैला हुआ है..


शोले तीस साल बाद आज भी किसी न किसी रूप में हमसे टकरा ही जाती है.जैसे हमारा कैमरा टकरा गया इस पोस्टर से जिसमे गब्बर है ठाकुर है वीरू की गला घोटू पकड़ है..राजू श्रीवास्तव तो अपनी शोले बना ही चुके हैं और अगले साल 'यमला पगला दीवाना' में एक बार फिर कोई टंकी पे चढ़ गाँव वालों को पुकारने जा रहा है..


यहाँ सब मिलेगा सब मिलेगा दुनिया की कोई ऐसी किताब नहीं जो हमारे पास न हो.रस्ते का माल सस्ते में रस्ते का माल सस्ते में..रचनात्मकता की हद पे एक हवि इनकी भी स्वीकार हो.


राष्ट्रीय संग्रहालय जाकर टिकट कौन खरीदे जब इतिहास हमें ऐसे ही सहजता से हमारी नसों में समां जाये, शैक्षिक भ्रमणों में एक सैर इस पुरानी दिल्ली की भी हो जाये तो क्या उनका बोध खुद विकिसित नहीं हो पायेगा या जो पेंचोखम हैं उनको ऐसे जीवंत विरासतों से कुछ कम नहीं किया जा सकता.


भले 'मोज़र बेअर' राईट क्लीक को नेस्तेनाबूत कर डिजिटल कॉपीराईट का डंका पीट रहा हो और आप उनकी सीडी-डीवीडी लाकर अपने सिस्टम पर कॉपी न कर पा रहे हों और इस समस्या से प्रताड़ित हों की न केबल वाला आपके टेस्ट की मूवीज़ नही दिखा रहा और पालिका बाज़ार में सस्ती फिल्म प्रतियाँ नही मिल पा रहीं हों तो आपका स्वागत है हर रविवार. इस दिन तो लाल किला लाजपत राय मार्केट जाने का झंझट भी नहीं यही इसी बाज़ार में आप कोई भी सीडी खरीद सकते है पायरेसी गयी भाड़ में पुलिस भी कुछ नही कहेगी क्योकि उसी की नाक के नीचे तो ये सब होता है और वैसे भी भूल गए क्या आपके साथ आपके लिए सदैव...???


आप दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र है और परीक्षाओं के दिन आपको इस किंग चैम्पियन की याद नहीं आई बात कुछ समझ नहीं आयी..मतलब आपके खालिसपने में थोड़ी मिलावट है जो आप इन नन्दलाल दयाराम के स्नातक स्तर की कुंजियों से परिचित नहीं हैं..हाँ जी यही सच्चाई है इस विश्वविख्यात विश्वविद्यालय के शिक्षा तंत्र की जहाँ प्रोफ़ेसर से लेके रीडर के स्थान्नापन्न के रूप में नई सड़क इन्हें रिक्रूट करती है इन रंगरूटों से मार डांट फटकार अटेंडेन्स उपस्थिति का झंझट भी नहीं..


अरुण इसे लोहे का नहीं लकड़ी का पुल कहता है शायद मोर सराय, चांदनी चौक इलाके में यही कहते हों और वजीराबाद और शात्रीपार्क जाते पुल को लोहे वाला पुल कहते होंगे खैर कुछ भी हो हम तो यहाँ तक आते ज़रूर है..हाँ इसी पुल पर देव डी का का एक सीन जिसमे अभय देओल पुल पर चल रहा है वह शॉट यहीं शूट किया गया था.


वह जो मंदिर दिख रहा है पहले सिर्फ इंट पत्थर से घेर घर रखा था, वहां मानविकी की बहुत सी किताबें मिल जाया करती हैं और यही कहीं से इतिहास की हिंदी माध्यम क्रियान्वयन की कई सारी किताबें लाया था कभी..यहीं यह बोध भी एक साथी ने कराया की भूगोल की कोई किताब कम से कम इस समय पुराने संस्करण की नहीं लेनी चाहिए और न ही संविधान पे..बात बहुत पुरानी है.


किसी को मोल भाव बारगेनिंग की विद्या में निपुण होना है वाक् चपलता लानी है तो हर हफ्ते यहाँ की परिक्रमा करे. भले कोई किताब ले-न-ले पर इन दुकानदारों से ढेर सारी बातें ज़रूर करनी चाहिए..वह सब अपनी फ्री सेवा देने को तैयार हैं कोई आये तो सही..आप आएंगे न इस हफ्ते..


इस लोहे के पुल के नीचे की विशेषता है देसी विदेसी पत्र पत्रिकाएं..किसी भी प्रजाति किसी भी स्ट्रीम की. कुछ की बानगी National Geographic - Issues, Maps, Books - Life Magazine- Time - Look -Saturday Evening Post - Collier's - New Yorker - Newsweek - People -Atlantic/Harper's - Fortune – Sports Illustrated – Ebony – Vanity Fair – Rolling Stone – Ladies Home Journal – Holiday – Smithsonian – Mad Magazine – TV Guide – Holiday – Vogue – Harper’s Bazaar -Condé Nast Traveller -Antiques Journal -Forbes - Elle -Playboy और पता नहीं कौन-कौन सी आपके हाथ लग जाएँ..


और ये रहा लोहे का पुल और हमारी यात्रा यही समाप्त होती है..पढने से क्या होता है कभी खुद आकर भी देख जाओ.इस जीवित विरासत को संरक्षित हमें ही करना है कोई बाहर से नहीं आएगा..साथ ही इस पोस्ट मोर्डेन संस्करण को इसकी खासियत खामियों की साथ स्वीकारना होगा..कहीं और सड़क किनारे किताब बाज़ार लगते देखा है..इतनी शिष्ट्ताओं विशिष्टताओं के साथ..

दिसंबर 14, 2010

सन दो हज़ार नौ की फरवरी का एक पुर्ज़ा

रेडियो के खटराग उर्फ़ एक और कल्चरल टेक्स्ट, और मेरा दूर होना

बात कुछ ऐसी थी कि इधर रेडियो की प्रजाति में से एफ़ एम के घनघोर श्रोता थे पढ़ते समय आँखों से कम काम लेने की आदत सी हो गयी थी. पर इधर डेढ़ दो साल से उससे ऐसा नाता टूटा कि जुड़ न सका। एक दो रेडिओं के नवीनतम संस्करण लेने की बात भी चली पर नामुराद हम ही कुछ ढीले पड़ गए..

तो हाल ये है कि मोबाइल नें भी साथ छोड़ दिया उसकी लीड जो ख़राब हुई तो ठीक करने का सावंग ही नही लगा। ऊपर से नुक्ता कि दूसरों की बतकहियाँ सुने झेलें अपना म्यूजिक प्लेयर तो है ही न. इसलिए भी उससे दूर होते गए। पर परसों साफ सफाई के मोर्चे पर एक फोटोस्टेट पुर्जा मिला। देख कर जी कुछ भारी-भारी सा होने को हुआ, पर हम संभल गए. पॉपुलर कल्चर को समझने उसे पकड़ने में इसकी सहायता ली जा सकती है और जहाँ तक हमें लगता है आप निराश नहीं होंगे.. आज हम उसी को पूरा का पूरा यहाँ छाप रहे हैं..तो मुला एक नज़र तो फरमाए..
  • तोडू नाइटस  विद डीजे तरुण 93.5 रेड एफ़एम 
  • रॉकी मेरा नाम 93.5 रेड एफ़एम 
  • मियांऊ मैटिनी
  • सिटी की टोपी सिमरन के साथ
  • रेड एफ़एम पर कवी की कल्पना
  • मोर्निंग नम्बर वन नितिन के साथ (बजाते रहो )
  • बजाते रहो अवार्ड्स
  • चचा बतोले कसम लाल किले की
  • मियाऊ जिंदगी
  • तू तू मियाऊ मियाऊ
  • तोडू टॉप ट्वेंटी स्मृति के साथ
  • रेड एफ़एम का रेड मिके ..यहाँ सब बजेगा
  • फ़ोनरिंग तो घंटा सिंह (कॉलेज रेडियो रेडियो वन )
  • जस्ट बेबी चिल सुड और उसके चुटकले
  • आपका बैंड बज रहा है नितिन के साथ
  • दिल्ली का रेडियो सिटी 91.1 वट अ फ़न
  • जस्ट जागो रेडियो मिर्ची पुरानी जीन्स सायमा के साथ
  • डी एल 935
  • बिग एफ़ एम सुनो सुनाओ लाइफ बनाओ
  • रेड एफ़ एम, सन सनी विद पअपा..बजाते रहो
  • स्प्पर रेकेस्ट फीवर 104 पर रात १० बजे से..स्टे टयून टू फीवर
  • मेडिकल मियाऊ विद डॉ गीता प्रकाश
  • अट्ठन्नी चवन्नी सचिन के साथ
  • रेड एफ़एम पर सिर्फ सुपर हिट बजते हैं नहीं पसंद तो अपना  इलाज कराओ
  • रेड एफ़एम चार सुपरहिट गाने चिपक के !!
  • मिर्ची सुनने वाले आल्वेज खुश आल्वेज खुश98.3
  • टोटल फिल्मी विद स्तुति
  • मिर्ची बाइस्कोप विद स्तुति
  • स्टार्स की बजाये मिर्ची (दिल्ली6 को 5 में से 3 मिर्ची )
  • 43581048 इस द नंबर मई हूँ मनीषा और शो है ममा मियौं
  • मियाऊ जिंदगी थोड़ी मीठी थोड़ी कैटी
  • रेडियो रील  एफ़एम गोल्ड पर
  • यूथ आरजे  हंट ऑन रेडियो सिटी ये माइक तुम्हारा है
  • रोकिंग टॉप  थर्टी ज़िया के साथ 92.7 नाइनटी टू पॉइंट सेवन
  • बिग 92.7 पर हैप्पी सिंग के बौंसर्स( मै तो जी सच्ची सच्ची बोलता हूँ ,बकवास तो खुद लग जाती है )
  • शर्मा जी से पूछो शाम पांच से छेह के बीच
  •  बीबीसी एक मुलाकात 94.3 रेडियो वन
  • डायल - अ - कैरिअर सोमवार एफ़ एम रेनबो 102.6 वन ओ टू पॉइंट सिक्स 
  • सुन दिल्ली सुन फीवर वन ओ फोरदिल्ली हर घंटे जीतेगी हजारों 
  •  रेड एफ़एम 'सोच आलय' सोच कभी भी आ सकती है 
  • जिसने तुम्हारी बजायी तुम उसकी बजाओ बिंगो बजाते रहो अवार्ड्स 
  • रेड एफ़एम तोडू गाना   
  • सन सेट समोसा नवेद के साथ पांच से नौ रेडियो मिर्ची 
  • सदाबहार दस गाने खुशबु के साथ एफ़ एम गोल्ड दस बजे 
  • झेलते रहो ,रेडियो के वायरस अनंत और सौरभ को रेडियो मिर्ची नाइनटी एट पॉइंट थ्री इट्स हॉट 
  • गरमागरम बात मिर्ची मार के रेडियो मिर्ची नाइनटी एट पॉइंट थ्री
  • बब्बर शेर र र र s s s रेडियो सिटी 
  • सफिया की अदालत रेडियो मिर्ची 
  • परेशान पतियों के पत्र ब्रोओट टू य़ू बाय  PCRA
  • मिर्ची हंसी के फुहारे सुड के साथ 
  • ट्रेफिक कैप्टन  ऑन बिग92.7
  •  रेड एफ़एम पर हिटआउट या गेटआउट  अभय और स्वाति के साथ 
  • पेप्सी रुपीस ट्वेंटी में प्लेंटी सुनते जाओ बीस मिनिट गाने रेडियो सिटी 
  • वट अ फ़न मोर्निंग ऑन रेडियो सिटी 
  • बिग92.7 पर सनसनी नहीं सन सनी है
  • मिर्ची मुर्गा ऑन रेडियो मिर्ची ,इट्स हॉट
  • गाना मिक्सी रोकी के साथ रॉकी मेरा नाम रॉकी मेरा नाम रॉकी मेरा नाम
  • मियाओ मैटनी जयश्री के साथ 
  • ये लगा सिटी का चौका..चार गाने बैक टू बैक 
  • डायल  एम फ़ॉर मियाऊ संडे 
  • मोर्निंग मियाऊ प्रेम धरा पार्वती राठौर (इतवार)
  • मेरी मियाऊ आठ से दस इट्स अल अबाउट य़ू..दिव्या के साथ 
  • रेडियो मैटनी गोल्ड क्लास्सिक नूपुर के साथ एफ़ एम गोल्ड संडे चार बजे 
  • मै हूँ ऋचा और लेकर आयीं हूँ बीबीसी मिनिट
  • बिग रिचार्ज विद जिया ऑन बिग 92.7
  • फीवर हॉट ट्वेंटी काउंटडाउन फीवर वन ओ फोर
  • सिटी जॉय राइड 
  • लोव गुरु ओनली ऑन रेडियो सिटी 
  • नाइट्रोज़िन विद आदि ओनली ऑन रेडियो मिर्ची फोर द नाइट जेनरेशन 
  • संगीत दूत  कॉम एफ़ एम गोल्ड संगीता के साथ 
  • किस ऑफ़ लव विद मीठी मालिनी बिग 92.7
  • दिल दोस्ती एटक. विद अंकुर रेडियो वन
  • फीवर ड्राइव मंडे टू फ्राइडे पांच से सात 
  • चाभी घुमाओ फीवर लगाओ 
इधर पता चला MEOW  बंद हो गया. यह पहला ऐसा एफ़ एम चैनल था जिसके केंद्र में महिलाओं को रखकर एक संकल्पना को सच्चाई में बदला गया था. ये बात और है कि उसके नारीवादी पाठ क्या कहते है, पर उसका बंद होना थोडा पीड़ादायक है. गोल्ड  के बंद होने की सरकारी करतूत सामने आई कॉमनवेल्थ गेम्स में एक नया रेडियो चैनल लॉन्च किया गया जिसकी जानकारी मोहल्ला लाइव  और विनीत  के जनसत्ता  में लिखे गए लेख से पता चला. तरंगो के साथ टू जी स्पेक्ट्रम का भांडा फोड़ हुआ. इन तरंगों पर हमारा उतना ही अधिकार है जितना और संसाधनों पर. फिलहाल तो कोई लेटेस्ट रेडियो सेट खरीदने के सोच रहा हूँ.. कोई नज़र में है क्या..

दिसंबर 09, 2010

केबीसी के बहाने सपनों की पिच्चीकारी करते हमलोग : कुछ रीडिंग्स

स्लमडॉग मिलीनियर का जमाल, कौन बनेगा करोड़पति में एक के बाद एक पूछे गए सवालों के जवाब  सफलतापूर्वक देता जाता है और अंततः सबसे बड़ी इनामी राशि जीत जाता है. लेकिन यही जीत उसकी मुसीबत बन जाती है, जब प्रस्तोता महोदय को उसके ज्ञान पर शंका होती है. वही ज्ञान जो सदियों से इन पढ़े लिखों की बपौती रहा, जिसके चलते कहीं अंदर टीस होती है कि विजेता उस वर्ग से क्योंकर नहीं आया.

ये अलग बहस का विषय है कि उन पूछे गए प्रश्नों का सम्बन्ध ज्ञान से है या सूचना से? आज उस विमर्श की बात नहीं. बहरहाल, इधर जमाल उनके इस वर्चस्व को चुनोती देता, पुलिस के चुंगुल में फंस जाता है.

वहाँ एक-एक कर उन सारे सवालों की गुत्थी सुलझती जाती है, जो सिर्फ सवाल नहीं, उसके जीवन का हिस्सा थे। जिसे जीने को अभिशप्त बना दिए गए सच से सिल्वर स्क्रीन ताकते दर्शकों का साबका होता है. यही उस जीवन का वह सच था, जिसे इसतरह दिखाने पर हिंदुस्तान वाले आसमान सर पर उठाये हुए थे. उन्हें यह औपनिवेशिक मानसिकता से ग्रस्त उस पश्चिम का अश्लील प्रहसन लग रहा था, जो हमारी गरीबी बेच रहे थे. पर सवाल ये भी है क्या आज भी हम उस ग्रंथि से खुद निकल पाए हैं??

इस बार का कौन बनेगा करोडपति, सीज़न फोर  सिर्फ स्टार प्लस से सोनी पर ही नही आया, उसकी पैकजिंग भी कुछ अलग किस्म की थी. 'कोई सवाल छोटा नहीं होता, वह आपकी जिंदगी बदल सकता है' . उस पांच करोड़ का मालिक बना सकता है, जिसे हर महीने बीस हज़ार कमाने वाला व्यक्ति, अपने जीवन के मात्र 125 साल लगाकर प्राप्त कर सकता है. उससे भी आसन तरीका, ये क्विज़ शो है. बस फ़ास्टेस्ट फ़िंगर फ़र्स्ट के बाद उस हॉट सीट तक पहुँचने की देर है.

करोड़पति बनाना इस देश के आम आदमी का एक ऐसा सपना है, जिसके पूरा होने की वह किसी भी जायज़ तरीके से उम्मीद नहीं कर सकता. या तो उसे नेता बन जाना होगा या दिल्ली की दीवार  में सेंधमारी करनी होगी. मतलब रास्ता अवैध ही है.. हाँ आप शेयर मार्केट में जुआ भी खेल सकते हैं, पर वहां पूंजी लगनी भी पड़ती है. पर इस कार्यक्रम में न श्रम है, न पूंजी। उलटे तीन दिन का मुफ्त में बम्बई दर्शन और सदी के महानायक से रूबरू होना का चान्स.

इसबार जमाल वाले वीडियो पहले ही शूट कर लिए गए थे। माने आप कैसा जीवन अभी तक बिता रहे हैं, आप किन समस्याओं से खुद को घिरा पाते हैं. और इस शो को कुछ इस तरह से आपका साथी बताया गया कि इसका आपके जीवन में अहम हिस्सा है। दर्शकों की संवेदनाओं को उस प्रतिभागी के कष्ट से जोड़कर एक नया उपभोक्ता वर्ग खड़ा किया जा रहा था, जिसमें लखीमपुर खीरी से लेकर उन कॉंस्टेबल दंपत्ति हैं भी हैं, जिनकी बच्ची के दिल में छेद है, और उनके परिवार वाले प्रेमविवाह के बाद से ही उनसे बात भी नहीं करते. कोई इस सपने के साथ आया है कि अपने इलाके में पढ़ने लिखने की सुविधाओं को और अच्छे तरीके से जुटा सके। इतनी इतनी राशि एक झटके से उनके खाते में पहुच जाती है जिस तक आजीवन नहीं पंहुचा जा सकता था.

सपने कौन सी ऑंखें नहीं देखतीं. एक ऐसी जगह का सपना जिसे मुकम्मल रूप में घर कहा जा सके, उस चारदीवारी से निकलने की छटपटाहट, जिसमे अपने जीवन के बेहतरीन साल तंगहाली, पेट काटकाट गुजारने के बाद टीस सी उठती है कि क्या दे रहे हैं अपनी संतानों को..यही चूना पुती सीलन, बदबू मारता पलस्तर, पेड़ की छाल की तरह दीवार से उतरता कमरा..??

सीधे-सीधे जो काम सरकारी तंत्र को स्वस्थ विकास योजनाओं के जरिये अपनी दूरदृष्टि के ज़रिये करना चाहिए था, उसे ये पूंजीपति मीडिया संसथान, अपने कंधे पर रख अपनी दुकान चला रहा है. खैर

हर नए प्रतियोगी के आने पर कैमरा डार्क एरिया से होता हुआ पहले अमिताभ पर फिर उसकी तरफ मुखातिब. एक नज़र उस टचस्क्रीन कंप्यूटर पर भी पड़ती है जिस पर एक कोने पर वीडियोकॉन की चेपी चिपकी है. हर पांचहजारी सवाल सिर्फ पूछा नहीं जाता, उसका शुभारम्भ होता है, जिसे कैडबरी  ने अपने उत्पाद से जोड़ उसके मायने बदल दिए है. एक मानी तो हम भी लगा सकते है कि संकटहरता पुरोहित के समुख आप जजमान स्वरुप बैठे कोई अनुष्ठान संपन्न करवाने जा रहे है, जिसमे शनि की साढ़ेसाती से लेकर मंगल की कुदृष्टि तक का समाधान निहित है.

फ़ोन-अ- फ्रेंड जैसी कलयुगी नारद सेवाएँ भी आपकी सहायता के लिए मौजूद हैं. बेटा आइडिया  का ब्रांड अम्बेसडर है इसलिए भरोसेमंद यही सेवा प्रदाता है, आपकी लाइन कटेगी नहीं..फिर एक लाख वाला सवाल भी तो पूछा जा रहा है, उसके प्रायोजक भी यही कम्पनी है. इसलिए बीच में विज्ञापन देखना अनिवार्य तत्व है. वहीँ घरों पर देखता दर्शक अपने तथाकथित ज्ञान की परीक्षा करता जाता कि उसे भी उस सवाल का जवाब पता है, वह भी जीतने की क्षमता रखता है और यहीं वह स्वयं को उस जाल में फंसने के लिए तैयार करता है जो उसे फ़ोन करने के लिए प्रेरित करती है.

वहां बैठा व्यक्ति सिर्फ प्रस्तोता ही नहीं बॉलीवुड का महानायक भी है. हिंदी के कवि का पुत्र भी है. इसलिए बीच-बीच में बच्चन की कविताई भी चलती रहे तो समां और बांध जाता है. आवाज़ का जादू ऑल इंडिया रेडियो वालों ने नहीं पहचाना तो अच्छा ही किया. रवि बजाज द्वारा डिज़ाइन किये वस्त्रों में शुशोभित देवदूत तारण हरता देव ही है। वही इस भाव सागर से आपको पार कराएगा..कम से कम एक सीमा तक भ्रम तो यही देता है.. बार-बार उस जीती जा चुकी रकम का महत्त्व बताते हुए कविपुत्र उसकी टीका करते चलते हैं, जो एक हद तक टीवी पर देखते उस दर्शक के लिए हीनताबोध से कुछ पल के लिए ग्रस्त तो करते हैं; पर अगले दिन ऑफिस की बतकहियों में इन सवालों के जवाब बता अपनी बेहतर स्थिति दर्शा अगले विजेता के रूप में खुद को स्थापित कतरे हैं.

इस गरीब देश को अमीर बनाने का खेल कुछ इस तरह से खेला जाता है जिसमे ज्ञान के बदले सूचना के महत्त्व को तरजीह दी जाती है। सवाल कुछ इस तरह से गढ़े जाते हैं कि उसमें सीआईडी के सालुंखे से लेकर आईपीएल, बॉलीवुड तक की घुसपैठ होती है. सामान्य ज्ञान के नाम पर सतही उछला प्रश्नोतर. एक भी पैसा न जितने वाले और लाखों गड्डियाँ ले जाने वाले का जवाब देने वाले दोनों प्रतियोगियों में बुनियादी फर्क क्या है?? मालूम नहीं..शायद कोई भी न हो..

यहाँ पूछे जाने वाले सवालों की प्रकृति सूचनापरक ही है. इस तरह के सवाल विवेक पर नहीं बल्कि उस याददाश्त पर निर्भर करते हैं. सीखने की अवैज्ञानिक प्रक्रिया है रटना, यह एक तरह से उसकी बड़े पैमाने पर परीक्षा है. मुमकिन है कि इसमें सबसे ज़यादा राशि जीतने वाले और खाली हाथ लौटने वाले में बौद्धिक स्तर पर कुछ भी अंतर न हो. इस जैसे कार्यक्रम ज्ञान को सूचनाओं से स्थानापन्न कर रहे हैं. हद तो तब हो गयी जब गौर से दखने पर ये छड़ी हाथ लगी की अमिताभ इसी वर्ष गुजरात के ब्रांड अम्बेसडर बने हैं और यहाँ भी बहुतायत में सवाल उसी वाइब्रेंट गुजरात से सम्बंधित थे.

यहाँ ये सवाल बेमानी हो जाता है की कौन इस इजारेदार पूंजीवादी व्यवस्था में करोड़पति अरबपति बन रहा है. विकासशील देशों में नव-साम्राज्यवादी मानसिकता  से ग्रसित उत्पादन संस्थाएं घुसपैठ कर, बाज़ारों में खड़े व्यक्ति को उपभोक्ता बना उसकी जेब काट रहीं हैं. यहाँ तक कि खाली समय नामक मद इस परिवार नामक संस्था से गायब हो चुकी है और नयी संकल्पनाएँ तरह तरह के रास्ते खोज रही है, तभी तो इधर टीवी पर पता नहीं चलता हम फिल्म देख रहे थे या विज्ञापनों की अवली.. आज हमारी हैसियत सिर्फ अदने से उपभोक्ता की है और कुछ नहीं..

और ऐसे उपकारी संस्करण बरसते बाज़ार हो कर ही गुजरते हैं..बिल गेट्स  से लेकर वारेन बफेट  तक के उपकार इसी श्रेणी में आते है..

यह सीज़न ज्ञान से लेकर जीवन, मूल्य, पूंजी, श्रम, टीवी, बाज़ार, दर्शक, प्रस्तोता सबको अलग मानी दे गया, उनकी घुसपैठ के नए अर्थ नए पाठ दे गया है, जिन्हें सावधानी से पढने की ज़रूरत है..

दिसंबर 07, 2010

लो यह रहा तुम्हारा चेहरा यह जुलूस के पीछे गिर पड़ा था

मीडिया की बेचारगी :पार्ट वन 
  
मधुर भंडारकर  कीपेज थ्री  कुछ यहाँ थी जब माधवी शर्मा बाल उत्पीड़न की ऐसी स्टोरी एक्सपोस करती है जिसमे उसके अखबार को प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से आर्थिक तरलता प्रदान करने वाले रसूखदार प्राणी के लिप्त होने की बात सामने आती है पर अब यह खबर कल जाये न जाये इस पर आकर अटक जाती है.

बात उस अखबार के मालिक के कान में संज्ञान में लायी जाती है. अब इस स्थिति में जो करना चाहिए था वही किया जाता है. मालिक जी इस संवेदलशील मौद्रिक मुद्दे पर अपने एडिटर को उस लड़की के नौकरी से निकाले जाने के की आज्ञा देता है और उस मजबूर से बेचारगी टपकाते चेहरे के साथ अगले दिन उसे निकलना ही पड़ता है ताकि उसकी कुर्सी सलामत रहे उसके मालिक के के ऊपर भी जो दबाव है वह कुछ तो काम हो.इस तरह खबर आई गयी हो जाती है और एक जुझारू किस्म की लड़की जो पेज थ्री कवर न कर क्राइम रिपोर्टिंग करना चाहती  है उसकी भ्रूणहत्या कर दी जाती है.

बेचारगी के कुछ पाठ 

अब इस प्रकरण से हम कुछ बातें तो निकाल ही सकते हैं कि जबसे सम्पादकीय, प्रबंध विभाग के अंतर्गत आया है तबसे बिना रीढ़ वाले केंचुआ छाप  संपादक बहुतायत में पाए जाने लगे हैं, मुनाफाखोरी पर टिके समाज में पत्रकारिता कोरी समाज सेवा तो कतई नहीं हो सकती,अब पूंजी  सबसे बड़ा मूल्य हो चुकी है और मीडिया से इसके सम्बन्ध अब इतने गड्ड-मड्ड हो चुके हैं जहाँ उनकी एक मात्र प्रतिबद्ता उस पूंजीपति के लिए रह गयी है जो उनको विज्ञापन दे रहा है और एवज़ में उसकी सोफ्ट स्टोरीज़ on air करना; मतलब जो काम कभी पीआर कंपनी करती थी अब ये संस्था करती हैं.कि अब मीडिया वाले कोई रिस्क फैक्टर ले कर नहीं चलते चूँकि उसके पास अब लिंक्स हैं तो उसकी पूरी कीमत वसूलना भी तो उसकी ज़िम्मेदारी हुई न..
  
पार्ट टू उर्फ़ बेचारगी के आधार
 
कि अब खबर भी एक उपभोग्य उत्पाद  बन चूका है.सूचना के 'पण्य' बन जाने कि प्रक्रिया में सूचना और सत्य का वही रिश्ता गड़बड़ा जाता है, जिसे खोजने के हम सब आदि हैं. सूचना जब 'पण्य' बनेगी तो वह कब किस सत्य का विज्ञापन करेगी कब किस असत्य को सत्य बनाएगी ,यह सूचना निर्माता के लाभ से तय होगा.यह बात कनवेंशनल और न्यू मीडिया दोनों सन्दर्भों में उतनी ही सही है जितना कि इस मीडिया का राडिया टेप  मामले में ब्लैक आउट.

अभी ये सवाल नहीं कि मीडिया को तथाकथित चौथा खम्बा कहा जाये या नहीं.उसमे दीमक लग गयी है या चूना पोता जा रहा है..अभी बात ये कि क्या कभी इसने उन सारी चुनौतियों का सामना करने की सोची भी थी कभी इस लायक यह बना भी था???

कान ज़रा दूसरे तरीके से पकड़ेंगे

पहले तो राडिया टेप मामले को न अख़बारों में न कॉलम मिले न ही टीवी पर कोई स्टोरी या स्लाट. पर जब  इन्हें प्रमुखता से आउटलुक ,ओपन  आदि ने अपने यहाँ छापा तो कई इन्हें नोटिस न लेते हुए मात्र किसी कॉर्पोरेट वार का महज टूल कह दरकिनार करने की फ़िराक में थे. बरखा  कहती जा रही हैं कि रॉ टेप को बिना किसी पुष्टि के छाप देना, प्रसारित कर देना नैतिकता के किस दायरे में आता है? उन्होंने आउटलुट और ओपन मैगजीन दोनों की नीयत पर सवाल उठाते हुए पूछा कि अगर किसी के खिलाफ कोई स्टोरी करनी है, तो क्या यह फर्ज नहीं बनता कि उससे उसका पक्ष जानने की कोशिश हो? लेकिन ओपन और आउटलुक दोनों ने बिना पक्ष जाने हर तरह के आरोप मढ़ दिये। ये किस किस्म की पत्रकारिता है?

ऊपर से अबराजदीप  का तर्क यह कि जिस समय इस बात का जश्न मनाया जाना चाहिए कि मीडिया के अभियान की वजह से ए राजा को पद छोड़ना पड़ा, उस समय हम मीडिया के लोग अपनी ही पिटाई कर रहे हैं . हमारे गले नहीं उतरता.

ये वही तर्क हैं जिनकी आड़ में थोड़े दूसरे लहजे में राष्ट्रीय सहारा के संपादक उपेन्द्र राय  अंधेरगर्दी कहते हुए 21 नवम्बर रविवार को पहले पन्ने पर ही प्रकट हो जाते हैं और इस तरह की ख़बरों को पूरी तरह भ्रामक बता ख़ारिज ही नहीं करते बल्कि यह भी कहते हैं और कहीं न कहीं मीडिया इसके तह तक न पहुच जाये इसलिए मीडिया कर्मियों  को ही सोची समझी चाल के तहत बहुत खूबसूरती से इसमें लपेट दिया गया है. इसके पीछे किसका हाथ है यह भी उन्हें पता है आगे और सूंघते सूंघते वे घिसते हैं की इस तरह के खुलासों के जरिये यह कोशिश हो रही है की 2G स्पेक्ट्रम घोटाले में जो असली मुद्दा है उस पर पर्दा पड़ जाये.

संतन को सीकरी सो काम 

तीस नवम्बर रात दस बजे बरखा दत्त  कठघरे में थीं और सामने सवालों की फेहरिस्त थी. क्या बरखा ने नीरा राडिया के इशारे पर 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाले के केंद्र में मौजूद डीएमके नेता और पूर्व टेलीकॉम मंत्री ए राजा के लिए लॉबिंग की है? अगर बातचीत लॉबिंग का हिस्सा नहीं थी तो फिर ऐसी कौन सी मजबूरी थी, जिसके तहत एनडीटीवी की ग्रुप एडिटर बरखा दत्त ने एक पीआर एजेंट को मंत्रिमंडल गठन की सूचनाएं दीं और उसके कहने पर कांग्रेस के नेताओं से बातचीत की? ऐसे ढेरों सवाल थे, जिनका जवाब सभी जानना चाहते थे।ऐसे में आप उसे एक एरर ऑफ जजमेंट (फैसला लेने में हुई चूक) कह सकते हैं। बरखा ने कहा कि वो इस गलती को मानने को तैयार हैं। लेकिन किसी को यह हक नहीं कि उसे भ्रष्टाचार से जोड़ दे.उनके पास सबका एक ही जवाब 'एरर ऑफ जजमेंट ' ही था. बरखा गलती को मानने को तैयार हैं पर इसे भ्रष्टाचार से जोड़ने का हक वे किसी को नहीं देती हैं. 

वीर संघवी  अपने हिंदुस्तान टाइम्स  में छपने वाले कॉलम काउंटरपॉइंट  में इसे संकट का समय बता अपने ऊपर लगे आरोपों को उपरोक्त मीडियापर्सन की तरह मिथ्या बताते हुए अपने को रिन से धुला लिखते हैं और कुछ समय तक इसे स्थगित कर आराम करने को चले जाते हैं.अगली सुबह सोमवार सुबह इसे लेख का हिंदी में अनुवाद हिंदुस्तान हिंदी हमारी आँखों के सामने पढने के लिए परोसा हुआ मिलता है.

दोनों अपने अपने बयानों में लौबिस्ट शब्द पर ऐतराज़ जाहिर करते हुए यही दावा किया है की राडिया के साथ उनकी बातचीत पत्रकार के रोज़मर्रा के कामकाज का हिस्सा भर है. 

हैं और भी दुनिया में सुखनवर  

टेप किये गए कॉल्स में प्रभु चावला, एमके वेणु , जी गणपति सुब्रह्मण्यम  भी राडिया से टेलीकोम लाईसेंस से लेकर गैस मूल्य परअम्बानी बंधुओं  के बीच जारी विवाद और तमाम मसलों पर सलाह और कारोबारी सूचनाएं साझा करते हुए सुनाई देते हैं. इन टेपों से देश में सक्रीय एक व्यवस्थित साजिशी तानेबाने का पता तो चलता ही है वहीँ यूपीए सरकार के पास अरसे से उपलब्ध इन टेपों पर चुप्पी हैरान करती है.

देश का नमक और कई सारे पुर्ज़े 

यहाँ ये बात ध्यान रहे ये वही पीआर एजेंट नीरा राडिया  हैं, जो देश की दो सबसे बड़ी कंपनियों (टाटा ग्रुप और रिलायंस ) का काम देखती हैं.जिनके क्लाइंटों में आईटीसी, महिंद्रा, लवासा, एल्ड हेल्थकेयर, स्टार टीवी,यूनिटेक, इमामी  तक के नाम हैं और जिनके बारे में कहा जाता है की इनकी सेवा तेलगुदेशम पार्टी के चन्द्रबाबू नायडू  से लेकर नरेन्द्र मोदी  तक लेते आयें हैं और इन्ही राडिया की भूमिका के चलते नैनो प्रोजेक्ट बंगाल से गुजरात आ पाया.

और जब टाटा समूह अपने ही टाटा फायनांस के दिलीप पेंडसे  खिलाफ अपराधिक कार्यवाही करना कहते थे तो दिल्ली की क्राइम ब्रांच ने इन्ही राडिया के कहने पर उन्हें ग्रिफ्तार किया था.एजंसियों के पास जो बातचीत है उसके कुछ हिस्से राडिया का सम्बन्ध लन्दन स्थित वेदान्त  समूह से भी जोड़ता है.वेदान्त समूह ने राडिया को भारत में अपनी नकारात्मक छवि बदलने की जिम्मेदारी सौपी थी और जिसके नतीजन अख़बारों पत्रिकाओं में उसे अच्छा बताए हुए कई महंगे विज्ञापन देखने को मिले.इतना सब कुछ जानने बूझने वाली तहलका  अपने हिंदी संस्करणों में इसे अभी तक क्यों नहीं ला पाई है.यही वह चुप्पी है जो खटक रही है.क्या हिंदी वालों को इसे जानने की कोई जरुरत नहीं..

वहीँ अब तो देश का नमक  बनाए वाले, इस देश के मध्यमवर्ग को नैनो  कार देने वाले रतन टाटा इन टेपों के सार्वजानिक हो जाने को अपने निजता के अधिकार का हनन पाते है और अब तक न्यायालय भी जा चुके हैं. आउटलुक  कहता है कि उन वार्तालापों में रतन टाटा इच्छा जाहिर करते हैं कि किसी भी हालत में दयानिधि मरण को संचार मंत्री बनने से रोकें.उन्हें राडिया की ताकत का पता भी था क्योकि मधु कोड़ा  के मुख्यमंत्री रहते हुए टाटा के खनन पत्ते की अवधि का विस्तार राज्यपाल से करने वाली महिला भी यही राडिया तो थीं.उनका यह कदम बताता है की कितना कुछ और उन बातचीतों में छिपा पड़ा है जिसको कोई नहीं चाहता की सामने आयें.

दो नजरियें और आपका चुनाव

इनमे एक तरफ पी साईंनाथ  हैं जो,स्टेनोग्राफी और अपने स्वतंत्र निष्पक्ष व्यक्तित्व  में से आपको चुनने को कहते हैं और दोनों में विभाजन रेखा तो हमें ही खींचनी होगी न. वे पत्रकारिता के चारित्रिक परिवर्तनों को तो रेखांकित करते ही हैं और उसके खुद कॉर्पोरेट बनने की तरफ इशारा करते हैं साथ ही सरकार की बदलती प्राथमिकताओं की तरफ भी इशारा  करते हुए कहते हैं की यही सरकार द्वारा मरते जान देते किसनों पर कोई संसद सत्र नहीं होता वहीँ अम्बानी बंधुओं के नाम पर पूरा दिन व्यतीत कर दिया जाता है.जबकि कृषि पिछले दस वर्षों में सबसे प्रभीवित होने वाला क्षेत्र है.वहां कई सारी बातें और हैं जिनपे अभी नहीं.

दूसरी तरफ IIPM के अरिंदम चौधरी  'द सन्डे इंडियन ' के 12 दिसम्बर के अंक में खड़े हैं लोब्बिंग की पूरी पश्चिमी सुदृढ़ परंपरा का इतिहास लेकर. अमेरिका के ओबामा से लेकर वहां के - पश्चिम के - पत्रकारिता मूल्यों को खंगालते हैं सिर्फ उस लॉबिंग को स्वीकार्य बनाने के लिए उसे एक स्वतंत्र पेशे के रूप में देखने और उसके पुरे अर्थशास्त्रीय आंकड़ों का नजरिया लिए हुए वे आयें हैं नीरा राडिया पर फिर बरखा और वीर पर.उनकी नज़र में आप लोबिस्ट होकर तो अपने मूल्यों को उसी अनुरूप निर्धारित करेंगे और पत्रकारिता के अपने ढंग से.मतलब अगर ये दोनों लोबिस्ट होते तो भी इन्हें कोई गुरेज़ नहीं.

चूँकि न इन दोनों का ट्रैक रिकॉर्ड ऐसा है और न ही टेपों में ऐसा कुछ मिला है इसलिए उनके अतीत की साख जो इन दोनों ने वे थे पोपले और काउंटरपॉइंट  लिख कर अर्जित की है उसके अनुसार वे अरिंदम चौधरी की अदलत में बाइज्ज़त बरी किये जाते हैं पर उन्हें ये नहीं पता इस पुरे खेल में उन्होंने अपनी कलम से नीरा राडिया के पेशे को न केवल एक व्यवसायिक कुशलता के रूप में स्थापित किया है बल्कि एक सोफ्ट कॉर्नर रख अपने पाठकों को भी ठगा है.
  
उत्तरपीठिका  :
 
कईयों को इस पूरे प्रकरण में प्रभाष जोशी  भी याद हो आये हो तो कोई नई बात नहीं. उनको तो आज भी
सावधान,आगे पुलिया संकरी है  टाइप इतवारी कागद कारे  चाहिए. पर इतना सब लिखने के बाद मैं वहीँ खड़ा हूँ जहाँ से शुरू हुआ था:

"इस तरह सवाल और जवाब की मंजिलें -
तय करके
थका-हरा सच -
एक दिन अपने खोये हुए चेहरे में
वापस आता है ,
और अचानक ,एक नदारद -सा आदमी
समूचे शहर की ज़ुबान बन जाता है  "


मुझे इसका जवाब रण  के अमिताभ बच्चन टाइप नहीं चाहिए न ही बागबान  की कोई लम्बी चौड़ी पोलपट्टी से इस बार मै मानने वाला हूँ. मुझे तो उस दिन का इंतजार रहेगा जब रवीश  अपने कस्बे पर इस सन्दर्भ पर कुछ लिखेंगे,विनोद दुआ  अपने लाइव में कोई स्टैंड लेंगे..और भी कई हैं जिनकी जुबान को लकवा मार चुका है. इस बार ये षण्यंत्रकारी चुप्पी टूटनी चाहिए नहीं तो हमें भी पता है हमाम में सब नंगे खड़े रोज़ यही बतियाते हैं कि..कुछ नहीं होने का इस बार भी..!!

दिसंबर 03, 2010

सबसे छोटी कहानी

शनिवार ,सितम्बर 18, 2010, 12:32:52 PM
इस कहानी के शुरू होने से पहले पात्रों का परिचय:

पात्र १ : सबसे बाएं बैठा सफ़ेद दाढ़ी वाला
पात्र २ :बीच में सोता व्यक्ति
पात्र ३ :बिना कपड़ों के एक रोगी सा..
पात्र ४ :बस स्टैंड का होर्डिंग


कहानी मेरे बस स्टैंड पर पहुँचने ठहरने और बस के आने पर भाग कर चढ़ने के दरमयान घटित हुई.उस एक मिनिट में सब हो गया.

उस दिन राजघाट से उनतालीस पकड़ कर कॉलेज उतरा ही था कि उस आदमी को देखा जिसे सब दख रहे थे.क्यों देख रहे थे यह पता चलने में ज्यादा देर नहीं लगी.उसके तन पर कपडा नामक कोई सामाजिक आवरण  नहीं था उसका एक हाथ भी अपनी जगह पर सलामत न था माने कि कटा हुआ था और वहां पट्टीनुमा कुछ बंधा था.उसके गले से बंधी पट्टी ने उसके जननेन्द्रिय/लिंगसे जोड़ दी गयी नली को सहारा दिया हुआ था.मेरे पास वह भाषा भी नहीं जिसमे मैं बता सकूँ. मुझे उसके चेहरे पर बेचारगी दिखी पर शायद उसकी तरफ से वह मुझ तक उछाला गया सवाल हो जिसका अभी भी मेरे पास कोई जवाब नहीं है. ये सवाल भी बेमानी ही है कि उसका इस दुनिया में कोई नहीं है क्या कोई नहीं..??

इस आरोप से अपने को बरी नहीं कर रहा हूँ बल्कि आज का अभियुक्त शायद मै ही हूँ पर आत्मग्लानि टाइप फीलिंग कोई न हो रही है न ही कभी होती ही है.बड़े ही पेशेवराना ढंग से मैंने जेब में कुलबुलाता कैमरा निकला और डैनी बोयल  की परंपरा में एक और नाम अपना भी जोड़ लिया.आप भी उस फोटो को चटका कर बड़ा कर देख सकते हैं,पर यहाँ न कोई एक्सक्लुसिव का नुक्ता इस फोटो के साथ नहीं चस्पा रहा हूँ न ही अंधेरिया मोड़ टाइप कोई चेतावनी ही देने के मूड में हूँ ;आपके विवेक पर है..

उस बस स्टैंड जिसकी कीमत लाखों में है और वह उसी दिल्ली में है जहाँ ओबामा दम्पति ताजमहल न देख पाने की भरपाई हुमायूँ का मकबरा  देख पूरा करते हैं .जहाँ १९वे राष्ट्रमंडल खेल  बड़ी अश्लीलता के साथ उन भारतीयों की कीमत पर आयोजित किया गया जिनके पेट में अनाज नहीं सदियों से भूख रहती आई है.जो देश कुलाचे मरने कि फ़िराक में रहता हो वह ऐसी छोटी मोती बातें होना तो रोज़मर्रा की आम बातें हैं जिसे अखबार में तब तक सुर्खिया नहीं मिल सकती जब तक कोई माँ सुपर बाज़ार में बच्चे को जन्म देते हुए मर न जाय.मतलब मरना उसकी पहली शर्त है..वो भी बाज़ार में मरना..

..तो उस बस स्टैंड पर इसलिए कोई नहीं बैठा था.न बैठने के लिए यही बहाना काफी था.ऊपर से नुक्ता एक आदमी सो रहा है, दूसरा अपना गला खखारता बलगम नुमा अपना भविष्य वहाँ थूक रहा है और उस नंगधड़ंग को भागने के पुरजोर कोशिश में लगा हुआ है.उस वर्गीय तालिका में चूँकि कपड़े उसकी देह पर थे इसलिए..पता नहीं कौन सी पोस्टमार्टम रिपोर्ट बघार रहा हूँ..

इधर गुज़ारिश  में संजय लीला भंसाली इलीटइच्छा मृत्यु  की बात करते हैं और जब कोई किसानों पर काम करना शुरू करता है तो वो पीपली लाइव  बन जाती है..

आगे लिखने का मन नहीं कर रहा..

बस सूरज का सातवाँ घोड़ा  का एक सीन याद आ रहा है जिसमे रघुबीर यादव  अपना पिछली रात का देखा सपना माणिक (रजत कपूर) को सुनते हैं और वे अपनी बात बड़ी चतुराई से उसे कब्जियत और दांते की डीवाइन कॉमेडी  की तरफ मोड़ उस सपने की विभत्स छवियों से दूर कर उस बनती संवेदना को ध्वस्त कर देते हैं....पता नहीं ये लिखा ही क्यों और लिखा तो लिख किन सवालों को टाल दिया..

वह होर्डिंग अभी भी मेरी आँख में खटक रहा है..

दिसंबर 01, 2010

पहली दिसम्बर निखिल के नाम

'सिनेमा  इस समय का सशक्त माध्यम है और इसे सिर्फ मनोरंजन मानना न पर्याप्त है और न ही उचित.निश्चय ही यह जनता के काफी बड़े हिस्से के लिए मनोरंजन का सबसे बड़ा जरिया है लेकिन फिल्म देखते हुए वे अपना मन ही नहीं बहलाते ,वे  अपने साथ अपने समय और समाज के बारे में नए अनुभव और समझ भी लेकर जाते हैं. ये अनुभव और यह समझ जीवन और समाज सम्बन्धी उनकी पहले  की समझ को किसी न किसी रूप में प्रभावित ज़रूर करते हैं.या तो जाने अनजाने उनका नजरिया बदलता है या पहले से बनी समझ और मजबूत होती है. {सिनेमा का शैक्षिक सन्दर्भ : विनोद अनुपम, भारतीय आधुनिक शिक्षा, अप्रैल २०१०}

पर जब मैं इसे आज की तारीख से जोड़ता हूँ तो निराशा ही हाथ लगती है. जिस समाज में एचआईवी संक्रमित रोगियों की संख्या लगातार बढती जा रही हो वहां विलोमनुपात में उतनी ही कम बातचीत हैरत में डालती है.यह चुप्पी एक दिन की अर्जित नहीं इसकी सांस्कृतिक सामाजिक व्याखाएं हैं. जिस समाज में ऐसे विषयों पर बात नहीं होगी उसकी अभिव्यक्ति भी उनके कला रूपों में कम ही होगी. उनका कम होना उस मानसिकता को ही दर्शाता है जो समाज को जकड़े हुए है. पर अभी बात जहाँ से शुरू करी थी मतलब सिनेमा की..

खोज खाज कर नज़र पड़ी 2005 में प्रदर्शित ओनिर की 'माय ब्रदर..निखिल' पर.

आज भले ही सरकारी तंत्र नाको (NACO) के तीसरे चरण में महिला यौनकर्मियों, नशे के आदि, समलैंगिकों, यौनान्तरण-लिंगी (transgender) समूहों को अपना कोर ग्रुप  बताये और अगले पाँच सालों में इन समुहों के साथ काम करने की योजना बना रहे हों, पर ओनिर को इस फिल्म के प्रारंभ मे यह चिट लगानी पड़ जाती है कि "इस फिल्म के पात्र, घटनाएँ और कथा काल्पनिक हैं, तथा किसी भी जात ,जीवित या मृत व्यक्ति से सम्बंधित नहीं हैं और यदि हैं तो वो काल्पनिक हैं ". जात 'communities' का अनुवाद है. यह घोषणा इस फिल्म के परदे पर पहुँचने की सरकार द्वारा लगायी गयी शर्त थी. भले आज विशाल अपनी फिल्म कमीने  में भवरा आया रे ..सरीखे गाने डाल सकते हैं पर तब ये संभव न था. यहाँ भी नुक्ता है जिसका नीचे ज़िक्र करेंगे..

ये फिल्म है निखिल कपूर (संजय सूरी ) की, जो राज्य स्तरीय तैराकी चैम्पियन है. इसलिए नहीं कि वह चाहता था, वह इसलिए तैराकी प्रवीण है क्योंकी जैसा कि भारतीय पिताओं के सपनों के साथ होता है वे उनकी उम्र में तो पूरे नहीं हो पाते हैं इसलिए बच्चों के पलने के साथ सपने भी पलते रहते हैं और ये उम्मीद की जाती है के एक दिन आएगा..उसके पिता को जो जीता वही सिकंदर का कुलभूषण खरबंदा भी कहा जा सकता है और तारे ज़मीं पर का क्रूर पिता भी..पर ये क्रूरता सपने के साकार हो जाने के बाद सामने आती है जिसका उनके सपने से कोई लेना देना नहीं है.

जैसे कि फिल्म है और उसके पास सीमित समय है, उसकी उसके एचआईवी संक्रमित होने की रिपोर्ट आती है, और ज़िन्दगी पर सवालिया निशान लग जाता है. उसे टीम और घर दोनों जगहों से निकल दिया जाता है. यह ऐतिहासिक तथ्य है कि एचआईवी/एड्स की पहले पहल पहचान अमेरिका में अस्सी के प्रारंभिक दशक में हुई और भारत में सन छियासी चेन्नई में डॉ. सुनीति सोलमन द्वारा महिला यौनकर्मियों में पहले एचआईवी संक्रमण की पहचान की जाती है. साथ ही यह फिल्म जिस कालखंड (1987) की यह बात यह करती है उस समय तक केवल 135 और केस प्रकाश में आ पाए थे. ज़ाहिर सी बात है की इस विषय में सबका ज्ञान सीमित ही रहा होगा. और इस रोग पर बात करना तो दूर की कौड़ी है..

फिर ऐसा क्या था की पहले टीम और फिर निखिल का परिवार उसे घर से ही निकल देता है??

इसका कथानक गोवा से सम्बंधित है जिसके बारे में आमफ़हम भारतीयों की राय उन्मुक्त स्वछंद संस्कृति की छवि ही है पर निखिल का सन सत्तासी का परिवार ऐसा नहीं है न ही इस इक्कीसवीं सदी के परिवार. चूँकि एड्स संक्रमण असुरक्षित यौनसंबंधों से 'भी' जुड़ा है और पूरा भारतीय मानस कुछ इस तरह संस्कृत होता जिसमें वह एक साथ नगरवधुएं भी रखेगा और अपनी यौनिकताओं को नियंत्रित करने के लिए ब्रह्मचर्य से लेकर सति जैसी व्यवस्थायें लाएगा, राम जैसे मर्यादापुरुष भी गढ़ेगा और सीता की अग्निपरीक्षा का आयोजन भी करेगा. कुफ्र से लेकर पाप तक की रेंज में सोचने वाला ये समाज इतनी आसानी से अपने को क्यों बिखरने देगा. यह तो वह डरपोक प्राणी है जो दूसरे को अपने जैसा बनाये बिना नहीं छोड़ता.उसका अपना वज़ूद खतरे में पड़ जाता है..!!

हर साल की तरह इस साल भी रेड रिब्बन एक्सप्रेस सफदरजंग रेलवे स्टेशन पर आई होगी और आये होंगे सरकारी बुलावे पर सरकारी स्कूलों के खालिस धमाचौकड़ी मचाते बच्चे. ये उन्ही माता-पिताओं के बच्चे हैं जो उनको किसी भी तरह यौनशिक्षा  देने के पक्ष में नहीं हैं. इसीलिए यही वो सेंसर बोर्ड है जो उनके दूरदर्शन पर जासूस विजय  तक देखने पर भी पाबन्दी लगता है. मतलब सरकार घोटालों में से बचा कर जो पैसा इन जागरूकता कार्यक्रमों पर लगाती है उस पर परिवार नामक संस्था पतीला लगाने में कोई कोर कसर नहीं छोडती क्योकि वे तो 'वैश्यावृति के वैध संस्करणों' में ही सांस लेते आयें हैं.

उनकी प्राणप्रिय पुस्तिका है आसाराम बापू के आश्रम से छपने वाली 'यौवन सुरक्षा'. कबीर संतोस धन की बात करते है और ये इस धन की. यह लिखी सिर्फ बालकों के लिए है क्योकि शायद इस विश्वास के पीछे यह धारणा काम कर रही हो की यदि विद्यालयी जीवन में सभी शिक्षार्थी इसका लाभ उठाते है तो उनकी बुद्धि सन्मार्ग पर आकर स्वयं वीर्यवान होगी और बालिकाओं पर स्वतः ही इसका सकारात्मक प्रभाव देखने को मिलेगा..पर वास्तविकता क्या है हम सब जानते हैं..खैर..

इस 'पर' पे ही आकर वे सब अटक गए थे अब निखिल सिर्फ नवीन (विक्टर बेनर्जी )और अनीता (लिल्लेट दुबे )की संतान तो है ही नहीं अब वह ऐसा प्राणी हो गया था जिसने इन सबके जीने के आधार में ही सेंध लगा दी थी. जिसके साथ उनका रिश्ता जोंक से कम का न हो वहां वे समाज के पहरुए कैसे बर्दाश्त कर लें कि समलैंगिक संबंधों के बाद भी वह उसे उनके बीच में रहने देंगे..वैसे भी एक मछली ही तो अभी तक तालाब को गन्दा करती आई थी..

चूँकि कानून व्यवस्था भी इन्ही बहुसंख्यकों के देखरेख में काम करती आई थी तो यहाँ भी कैसे चुप रह सकती थी. एक दिन उसे पुलिस 'गोवा पब्लिक हेल्थ एक्ट' के तहत गरिफ्तार कर लेती है. जिसके अंतर्गत किसी भी एचआईवी संक्रमित व्यक्ति को पकड़ कर कालकोठरी में अकले बंद रखने का प्रावधान था.और यहीं कहीं से सरकार द्वारा ये शर्त भी उभरती है कि आप अपनी इस फिल्म को काल्पनिक कहो, कथ्य से लेकर पात्र-स्थान तक, सब..जो कि यह कतई नहीं थी, पर प्रदर्शित करने-सेंसर बोर्ड से अनुमति लेने के लिए ऐसा करना पड़ा, जो उसके अमानवीय असंवेदनशील चेहरे को उजागर करती थी...शायद एचआईवी/एड्स जागरूकता के नाम पर मिलने वाले करोड़ों अरबों रूपियों का सवाल जो था..

बहरहाल, वापस आते हैं..

समाज में इसका संक्रमण न फैले इस तर्क पर उसे बंदीगृह ले जाया गया. इसके साथ ही निखिल के सभी मित्रों ने भी उससे सारे संपर्क तोड़ दिए, सिवाय उसकी बड़ी बहन अनामिका (जूही चावला ) जो कि शिक्षिका थी और उसका समलैंगिक पुरुषमित्र नायजिल(पूरब कोहली) के. वे एक पल-पल मरते जीवन के साथ खड़े थे और उनका ये फैसला अंत तक बना रहता है. कोई तीसरा उनके साथ था तो वह वकील (श्वेता कवात्रा ) जिसकी जिरहों से समाज द्वारा बहिष्कृत संवदेना को दोबारा वापस लाने की कोशिश की जा रही थी. समाज इन्ही ऐसे ही खोखले तर्कों से जीवन को अपदस्थ कने की साजिशे करता रहता है..पर हमें हार नहीं माननी है.

तब उनकी संख्या भले ही कम थी पर आज ये आपको भी अपने में मिलाना चाहते हैं..आप मिलायेंगे हाथ..'हाथ से हाथ मिला' याद है कभी दूरदर्शन पर आता था ??..

एकएक सीन एक एक एंगेल निखिल पास उसके आसपास मंडराती मौत को कहीं जाने नहीं देते पर ये निखिल ही था जो शिद्दत से जीता रहा जीता रहा. उसने हार नहीं मानी थी.आखिर केस का फैसला उनके पक्ष में होता है और उसे रिहा कर दिया जाता है. उसके जीवन को भी वैधता मिलती है. उसे भी मानव के रूप में स्वीकार किया जाता है .ये एक स्वस्थ प्रगतिशील समाज का ही लक्षण है कि वह मनुष्य को बीमारी के संवाहक नहीं उसके अस्तित्व को स्वीकार करता है. उसे भी औरों की तरह खुले असमान के नीचे उड़ती पंछियों को देखने नटखट गिलहरी के संग बतियाने कटी घास को सूंघने का उतना ही अधिकार है जितना हम सबका.और ये उतना ही सच है जितना की ये कि यह रोग हमें भी हो सकता है. सिर्फ जानकारी ही बचाव नहीं है उसका पालन भी उसी स्तर पर होना चाहिए.

आगे की कहानी में निखिल का मुख्यधारा में मिलना, उसका संगीत अध्यापक बनाना उसका जीवन को धुनों  की तरह सुरमय बनाये रहने की कोशिश ही तो है.यह उन सभी को जीवन को बोझ न समझ उसे जीने में बिताना ही है. इधर अनामिका और नायजिल एचआईवी/एड्स के प्रति जागरूकता और संक्रमित व्यक्तियों को सहायता देने के उदेश्य से पॉजिटिव पीपल नाम से एक संस्था की शुरुवात करते हैं ताकि कोई और निखिल की तरह अवमानना वंचना से त्रस्त अमानवीय जीवन जीने को अभिशप्त न हो. अपनी संतान को मरता देख माता -पिता भी अपने बेटे के निकट आ जाते हैं और उसकी मृत्यु के बाद नायजिल को अपना ही बेटा मान लेते हैं.

यहाँ सवाल ये उठता है की क्या हम तभी ऐसा कोई कदम उठाएंगे जब हमारा कोई सगा सम्बन्धी इस तरह जीने को मरने को अभिशप्त होगा??क्या पहले हममे इतनी संवेदना मानवता का संचार होने की संभावना नगण्य है ??? ये सवाल हमे अपने से अभी पूछना होगा..और ये भी आश्चर्य से कम नहीं कि यहाँ स्वतः ही बाज़ार के अनुरूप बहाने और तर्क गढ़े लिए जाते हैं और कॉलेजों में कंडोम वेंडिंग मशीन  लगा दे जाती है पर हैरत की बात ये है कि इस चमड़े की ज़बान से कंडोम बोला तक नहीं जाता.इस चुप्पी की संस्कृति से हमे ही आगे निकलना है..

बस उम्मीद यही है की इस विषय को लेकर और सार्थक प्रयास होते रहेंगे और ऐसे ही फ़िल्मकार आते रहेंगे चाहे कोई भी बाधा हो, जैसे अभी इसी साल ओनीर की 'I Am' ,फेसबुक पर विश्व के विभिन्न कोनों से चार सौ लोगों द्वारा दिए गए आर्थिक योगदान के बाद हम सबके सामने है..इसकी कहानी फिर कभी और आज आपसे इसी वादे के साथ समाप्ति कि आप न स्वं एचआईवी संक्रमित होंगे न ही अपने आसपास किसी को निखिल बनने देंगे ..उस सबके पास भी एक अदद दिल है धड़कता हुआ..आँखों में सपने हैं..हाथों में छुअन है..

और अगर आप नाको द्वारा कम्पोज़ कंडोम कंडोम रिंगटोन प्राप्त करना कहते हैं तो नीचे लिखा का लिंक चटकाएं या विशुद्ध क्लिक करें..
http://www.condomcondom.org/condom-capella-ringtone.php

आवाज़ें..

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...