दिसंबर 23, 2011

इतिहास जो अतीत नही

जब-जब पकाऊ कक्षाएं होती रहेंगी तब-तब ऐसी पोस्टें आती रहेंगी..ये वाली ग्यारह नवम्बर की ऐसी ही रचनात्मक कक्षा का प्रतिफलन है. समय यही करीब सूरज ढलने को हो रहा था..क्रमबद्धता और सूत्र कहीं कहीं टूटे जान पड़ें तो आपही जोड़ लेवें..सामने अध्यापक हो तो इतना तो आप भी समझ सकते हैं न..!!

मेरा मन कर रहा है उस मछलीघर में लगे पौधे की तरफ जाकर बैठ जाऊं. अगर यही पढ़ना-पढ़ाना है और उस पर विश्लेषणनुमा यही सब होगा तो बदला क्या.. न तब का पढ़ा कुछ याद है न अबका रहेगा. शायद ये याद न रहना ही वहां से हमने सीखा हो..न कोई कहानी याद आरही है न कोई पाठ. सिर्फ डर याद है और उससे बचने के हमारे तरीके. 'नंदलाल दयाराम' की कुंजियों से नक़ल कर अगली सुबह ले जाना. बिना समझे. बिना जाने. और उन सबो ने उसे नाम दिया था 'होमवर्क'..आज सिर्फ रह गयी हैं उन कक्षाओं की भयाक्रांत छवियाँ..

भाषा समझने के वो सारे औज़ार देती है जिससे खिड़की से बाहर की दुनिया कुछ-कुछ समझ में आने लगती है. पहले वाले भ्रम नहीं होते सब धुलने लगते हैं, एक-एक करके..वह उस पराभाषा को-उसमे ले लिए गए मूल्यों-परिभाषाओं को पढ़ पाने में सक्षम हो जाती है. उसकी धज्जियाँ उड़ाती है. पर बाज़ार में उसकी कोई औकात नहीं.

मुझे ढूंढे से भी कोई चेतन भगत  टाईप लिक्खाड़ नज़र नहीं आता। इसे भी लुगदी साहित्य कहकर मठाधीशों ने उसे लगभग बाहर ही कर दिया है, खुद को पदानुक्रम में ऊपर बनाये रखने की योजना के तहत..पर ये बाज़ार की अपनी शब्दावली है जिसे हमें समझना है..उसके कूटों को विखंडित कर दिखाई देता है कि चेतन बिकाऊ माल हैं और रूपा पब्लिकेशन को कोई परेशानी भी नहीं उन्हें छापने में..

तुम सिर्फ पढ़ रही हो या समझते हुए पढ़ रही हो..कितना समय उसे समझने में लगाती हो या उस भाषा पर तुम्हारी पकड़ है. यह बार बार दोहराना अपने आपको उसी स्थिति में हर बार पाकर उसके अनुरूप हो जाना नहीं है..??

अनुक्रिया-अनुकरण दोनों तरफ से सामान रूप से हो रहा है! यह सारे लोग दूसरी भाषा में जाकर पैसा कमाकर इसी का उधार करने की योजना पर काम कर रहे होते हैं. पहले दूर जाते हैं. कमाते हैं और सिर पर आ चढ़ अपने में दया समानुभूति कृपा करने का भाव लिए हमारे बीच डोलते रहते हैं. उसी में अपने हिस्से को देने की इतनी बड़ी त्याग की भावना प्रवाहित हो रक्त से ह्रदय तक लाती है और तब धारावी-जहाँगीर पुरी में सामजिक कार्य करते पकडे जा सकते हैं.

इनको समाज वैधता भी देता है या यह इनके द्वारा स्वयं हथिया ली जाती है; मधुर भंडारकर की पेज थ्री  इसी आख्यान को हमारे सामने रखती है. पर इसे अलग से भी विखंडित करने की ज़रूरत है, इसे समझना है. जहाँ तक हो यह किन्ही तत्वों पर टिकी है और सबसे बड़ा कारक उनके पास वह होना है जिसका दूसरे पक्ष के पास आभाव है. मतलब 'द्रव्य' 'क्रयशक्ति' माने 'पूंजी'. एक अर्थ में पूंजी वाले अव्यव पर इनका मजबूत होना इनकी तरफ आशाओं-प्रत्याशाओं से देखते हैं. जब आप उनके सामने इस रूप में सक्षम हैं और उनकी कई सारी समस्यों का निवारण उससे ही होगा तब तक उत्पीड़न की यह प्रक्रिया चलती रहेगी. और आपके पास इसके औज़ार के रूप में शिक्षा भी तो है.. इसका भी उधर आभाव है..

मार्क्स कहेंगे जाओ इतिहास में देखो यह कभी अतीत नही होता, वह हमारा वर्तमान है कभी बीतता नही. उसे समझो. सांस्कृतिक वर्चस्व में पूंजी और उसका अधिशेष में होना पहले प्याऊ, कुओं, धर्मशालाओं, सरायों, मंदिरों, और ऐसी ही व्यवस्थाओं के रूप में आता था. 'मदर इण्डिया' का सुक्खी लाला कैसे आकाल को औज़ार बना इस पूंजी को अपनी बहियों में दर्ज करता चलता है. इस महाजनी सभ्यता को जानने के लिए प्रेमचंद औज़ार की तरह हमारे पास हैं..

दिसंबर 20, 2011

अनुभूति अभिव्यक्ति और जिंदा साओ

शनिवार 17/12/2011. सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ एजुकेशन {सीआईई } दिल्ली विश्वविद्यालय.

फाउंडेशन वीक (स्थापना दिवस सप्ताह) में राजीव लोचन आ रहे थे. कानों ने पहली बार सुना. नोटिस बोर्ड पर परिचय था नैशनल गैलरी ऑफ मॉडर्न आर्ट (एनजीएमए) के निदेशक. बीए के ज़माने से जयपुर हॉउस के आगे से M-13 गुज़री..न जाने कितनी बार इण्डिया गेट किसी न किसी से मिलने घूमने पहुंचे, पर उस गली जा न सके..आज खुद कोई वहां से आ रहा था इसलिए रुका रहा और रबीन्द्रनाथ की कलाकृतियों और आधुनिकता पर सुन वहां से आने के बाद पहली अभिव्यक्ति..

अनुभूतियाँ जैसी अनुभव होती हैं उन्हें वैसे ही अभिव्यक्त कर पाना. इसके किये माध्यम क्या हो?  गीत-संगीत..रंग कूची.. भाषा..उसके कलारूप..?? भाषा जैसे-जैसे आगे बढती चलती है अपने पीछे कई जगहों पर खाली स्थान छोड़ते चलती है, जिसे समानुभूति विज्ञ अपने से भरता चलता चले. पर इतना आसान न उस अनुभव को लिख पाना है न पढ़ पाना.

जो जैसा है उसे वैसा ही प्रस्तुत कर देना किसी भी रूप में कला नहीं उसका पुनरुत्पादन कर देना भर है. मतलब जैसा मुझे लगा वैसा ही तुम्हे लगवा सकूं यह कला की प्रक्रिया का क्रियात्मक स्वरुप है. सतेन्द्र के चित्र में चिनार के जंगल एक ऊँचाई पर गुरद्वारे में बदल जाते हैं तो उसके सामानांतर वही चिनार के पेड़ गिरजाघर भी बनते हैं. बीच की जगह दो लोग, स्त्री-पुरुष खड़े हैं. उनके बीच कुछ था जिसे बार-बार रबर से मिटने की कोशिश की गयी थी पर उसकी छाप जा न सकी थी..वहां शायद कोरल जैसा कुछ था..

बच्चा मोना सरदार था. माँ स्वित्ज़रलैंड की थी. चित्र में मिटा हुआ कोरल राजीव पकड़ लेते हैं..उसके परिवार की स्थितियां कला के इस रूप में सामने आती हैं..उसने जो जो अनुभव किया उसे उतरा..वह अपनी माँ के साथ यहाँ से चला भी जाने वाला था, पर अंततः आत्महत्या ही उसे रास्ता लगती है इस जीवन से भाग जाने के लिए..उसके पास उस अपने महसूसे यथार्थ को व्यक्त करने की अपनी भाषा थी.
पर दृश्यों अनुभूतियों को हू-ब-हू उतारने वाले महान चित्रकार या भाषाकार नहीं होते उसे हम महसूस कर अपने हिस्से का सच बना उस यथार्थ को महसूसे, यही उनका कौशल उनकी निपुणता है. उन जीवित स्पंदनों श्वासों रोम छिद्रों से गुज़रती हवा हमें भी छू कर निकल जाये तभी उसका कोई अर्थ है.

अन्यथा फोटो खीचने वाला कैमरा करता क्या है. यदि ऐसा न होता तो हर फोटोग्राफर रघु राय हो जाता. हम अपनी समस्त इन्द्रियों से उसके जगत के आर पार हो पाने में खुद को सक्षम करें. हमारे सपने और वहां आती जाती छवियाँ क्या वैसी ही होती हैं जैसी वे इन आँखों से दिखती हैं? शायद नही. वह आभास देती हैं वह हमारे जमा खाते कि दुनिया है. उस जैसी अनुभूतियाँ और उस जैसा अनुभव हमें वहां होता है उसी तरह कब हम इस सबको महसूस कर पाएंगे.

मैं भी किसी जिन्दा साओ कि तस्वीर बनाना चाहता हूँ जिसके दिल कि धडकनों को उसके सांस लेते फेफड़े नसों में बहता खून देख पाऊं. वह हू-ब-हू नक़ल नही होगी, उसमे मेरे जीवन का कुछ हिस्सा भी होगा. मेरे हाथ सिर्फ रेखाएं नही खींच रहे होंगे, मैं अपने विस्तार की तरफ बढ़ रह होऊंगा..छाया की परछाई न पिली होगी न मेरा ध्यान उनकी दैहिक भंगिमाओं पर होगा. मैं वही सब खींचना चाहता हूँ जो मैंने महसूस किया..

दिसंबर 15, 2011

उसी किसी दरवाजे पर..

थकान किसकी है ??

दिन भर भाग दौड़ की, न सोने की, न पढने की, न सोच पाने की, न जल्दी घर आ पाने की या इन सबको थोडा थोडा मिलकर सबकी ?

बीते कई दिनों को जोड़ यही सब चल रहा है. माथे पर उलटे हाथ की हथेली रखकर यह लिखते हुए, ज़यादा चलने के बाद पैर में दर्द जैसा एहसास है.

अपने आप को दोहराना और बार बार उन्ही के बीच फंस जाना. एक पैटर्न देखें तो रह रह कर उन्ही कोनों में अपने को पाता हूँ जहाँ से दिख पड़ने का कोई डर नहीं रहता. सोचने के लिए उत्प्रेरक जैसा कुछ काटने को होता है.

कभी-कभी ऐसा नहीं होता जब हमें अपना दिमाग भूसे से भरा लगने लगता है. लगता है मानो हवा में उड़ना तो चाहता हूँ, पर नीचे कुछ है, जो वापस बुला लेता है. कुछ सोच पाने जैसा आस पास हो ही नहीं जैसे. लगता है किसी ऐसे प्लेटफॉर्म पर जा पंहुचा हूँ जहाँ से दो चार महीने पहले कोई सवारी गाड़ी गुज़री थी. नाक की तरह दिमाग भी बंद हो गया हो जैसे. मुह से सांस ली जा सकती है है पर दिमाग के पास ऐसा कोई विकल्प नहीं दिखता.

बीते दिनों को सिरे से पकड़ कर सुलझाऊं तो कहीं कोई ऐसा दिन नहीं मिलता जब घर पर शाम देखी हो. शाम की घड़ियाँ अपने आप में ऐसे क्षण हैं कि दूर से पकड़े नही आते. उन्हें छूने पास जाना ही होगा. उस वक़्त का रंग और डूबता सूरज आसमान पर गीले रंग हैं जिस पर उंगलियाँ फेरने का मन करता है..

और इन सब दरमियानों में कोई किसी के कानों में चुपके से कुछ बोल जाये और उसे बार बार दोहराने का का मन करे. बार बार उन्ही सबको देख भर लेने की खवाहिश अपने आप में किसी सपनीली सी दुनिया के मुहाने पे ला छोड़ती है..उसी किसी दरवाजे पर दस्तक दी है मैंने..

(फोटो  brushstrokesbykc.blogspot.com से)

नवंबर 12, 2011

एक उदास होती गर्म सी दोपहर

मैंने तुम्हे बोला. तुमने सुना. फिर सबने सुना. फिर मैं न बोला. न तुम बोली. न मैं मिला. न तुम ही मिली. शायद उस 'देख भर लेने का भाव ' दोनों तरफ हो कि..!! पर परसों के बाद यह भी नहीं हो पायेगा. तुम कहाँ, मैं कहाँ?? उन बेज़ार दुपहरी तिपहरी में आगे के सपनों को बुनने की कोशिश में नींद के हवाले सब कुछ कर उन बोझिल से हो गयी घड़ियों को काट देने की फिराक में होंगे..

पेपर तो बस 'बाय द वे '  होते जा रहे हैं उनके लिए वहां कमरे में जा उल्टा टांग देने की पद्धति. अपने उस अस्तित्व को न देख पाना ज़यादा पीड़ादायक है. सपने देखना भले वो दिवास्वपन जैसी अबूझ शब्दावली में हों पर उनका होना ही बहुत है. हरारत से भर देता है. शायद उसके आगे हम सब खुली आँखों से ही देखते हैं और चाहते हैं वैसा ही कोई होता जो हमारे साथ होता कुछ उसका कुछ हमारा चित्र उभरता उसमे कुछ भी व्यक्तिक न होकर हम दोनों का होता.

क्या कुछ ऐसा चाह लिया था जो पूरा नहीं हो सकता था. कर्म के बाद फल की गीतामयी व्याख्या सर्वहारा को चूतियाटाइप्ड कर मूर्ख सी बनती जान पड़ती हैं..समझ नहीं आया न क्या लिखना चाह रहा हूँ. कल मैं भी नहीं समझ पाया था की क्यों उस वाचाल मंडली को छोड़ यकायक आई मेट्रो की तरफ चल पड़ा. बिना आखिरी दिन की अभिवादन परंपरा को निर्वाहित किये.

शायद पता भी है..की थोड़ी देर में..नहीं लिखना चाहता..

उस दिन के बाद अगला दिन कैसा होगा, सोच नहीं पा रहा हूँ. सारी संभवानाएं धूमिल हो चुकी होंगी, बस छद्म पंक्तियाँ लिख अपने आप में घुटता सा कोई और रूप आएगा या इसी लिखने से भी पलायन कर कोई और रास्ता खोज निकालूँगा..अकेले..!

यह अकेले हो जाना इसलिए भी कुछ खटकता सा मालूम पड़ता है..कोई स्पष्टीकरण नहीं..क्या सब कुछ लिखने के लिए बाध्य हूँ??

कल थोडा छदामी सा दार्शनिक सा भाव हावी हुआ जो पलायन के चरम तक नहीं पहुच पाया की जब सबको पता ही है अंततः किस परिणति को यह शारीर प्राप्त होगा तो सामजिक भय लोक लाज झिझक उस जीवन को सुगमता से बाधित गड्डमड्ड  रास्ते की और ले जाते हैं तो उसे छोड़ना ही ठीक होगा..गाहे बगाहे इस कुचक्र में फंस खुद को ऐसे मरते देखना भी जीवन से पलायन है. उस जीते हुए जियो और काबिल बनाये रखो..

उस दिन तुम्हारे पास जाने का कोई कारण खोजे नहीं मिल रहा फिर भी लगता है ऊपर का नुक्ता जोंक की तरह चिपक सा गया है. सूरज का सातवाँ घोड़ा और उसके तन्ना की परिणिति  को कोई प्राप्त न हो यही सोचे जा रहा हूँ..पता नहीं अभी बी उन स्पंदनों में तन्ना की त्रासदी को महसूस कर रहा हूँ..जमुना का जमुना हो जाना..माणिक मुल्ला का सत्ती के पीछे चले जाना, कभी लौट कर ना आने के लिए. सब्कुक संजीव जी की शब्दावली में हमको अटका सा देता है, त्रिशंकु वाली स्थिति ..कुछ फँसे से..उटपटांग से भाव..संवेदित संवेदनाएं.

इस सबके होने का एक मात्र कारण उस कुछ हो जाने' के बाद कुछ ना हो पाना' है. और जिसकी अंतिम कॉलेजी सम्भावना परसों है..कुछ कर पाउँगा..शायद हाँ..पर पता नहीं क्या..देखते हैं..

मैं तो फ़राज़ की तरह ये भी नहीं कह सकता..
रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ 
आ फिर से मुझे छोड़ जाने के लिए आ

कुछ तो मेरे पिन्दार-ए-मोहब्बत का भरम रख
तू भी तो कभी मुझको मनाने के लिए आ

अब तक दिल-ए-ख़ुशफ़हम को तुझ से हैं उम्मीदें
ये आखिरी शमएँ भी बुझाने के लिए आ.          

अक्तूबर 26, 2011

सांस्कृतिक कूटपद और दीपावली का विखंडित विचार

बचपन में जिस दिन का सबसे ज़यादा इंतज़ार रहता था आज दिवाली सिर्फ एक दिन बन कर क्यों रह गयी, समझ नहीं आता. उसके बीतने के साथ उन सारे तंतुओं का अन्दर तक झंकृत न कर पाना अजीब सा एहसास है जिसके लिए अभी कोई शब्द आसपास नहीं मिल पा रहा. आज की रात खिड़की बंद कर धुंए और आवाज़ से बचने की ज़द्दोजहद में बीतने लगी है और अगली सुबह पटाखों के कूड़े के बीच से गुजरते पैरों के साथ.

अगर संस्कृति अपना पुनरुत्पादन करती है समाज के स्थायित्व के लिए वह सबसे ज़रूरी जैविक कारक है तो ऐसा क्या हुआ के मैं इस तरह आज कमरे में बैठा लिख रहा हूँ. क्यों नहीं किसी अमीर से बाज़ार की ऊँची दूकान में अपने हिस्से की खरीदारी कर रहा. इस मौसम में तो पूंजी का प्रवाह अपनी आवारगी की हद तक जाता है. बेचारा सर्वहारा भी इधर पूंजीपत्नी की स्तुति  करने में एड़ी-चोटी का जोर लगा डालता है.

वापस ऊपर लिखे पर चलते हैं कि अगर संस्कृति अपना पुनरुत्पादन करती है और समाज के स्थायित्व के लिए वह सबसे ज़रूरी जैविक कारक है , तो वह उसके लिए संघर्ष भी अपने तरीके से करती है. उसे अपने सारे सांस्कृतिक चिन्ह-प्रतीक-बिम्ब-रूपक कूटपदों में बदलने पड़ते हैं. यह दुतरफे सम्प्रेषण की भांति काम करता है; कोडिंग डीकोडिंग. संस्कार-रीतिरिवाज़-परम्पराएँ-त्यौहार ऐसे ही सबसे सशक्त सांस्कृतिक कूटपद हैं, जिन्हें विखंडित कर आसानी से उस सांस्कृतिक क्षेत्र में घुसपैठ की जा सकती है. पर इन कूटपदों के विखंडन की प्रक्रिया इतनी सरल रेखा में नही चलती.

प्राथमिक समाजीकरण हमारे अन्दर परिवार नामक एजेंसी के माध्यम से इन कूटपदों को भरता है, उसके अर्थों के साथ. और इन्ही प्रतीकों को जब पूंजीवादी माध्यम इज़ारेदार कंपनियों के लिए हमारी तरफ संप्रेषित करता है, तो हमें उनसे जुड़ जाना स्वाभाविक क्रिया लगती है जबकि वह योजनाबद्ध तरीके से आपको अपनी झोली में लपक लेते हैं. भरी हुई जेब के साथ. मतलब, 'जब आप, कोई 'शुभ ' 'काम ' करने 'जा 'रहे हों, तो 'दही' का स्थानापन्न, किसी विदेशी कंपनी की 'चॉकलेट 'को हो जानी चाहिए '. यहाँ एक एक शब्द पर ज़रा थोड़ी देर रुक कर गौर करिए और उन्हें सुनने की कोशिश करिए कौन से सांस्कृतिक पद कान में पड़ें..

अब थोडा ऐंगल बदलते हैं और खुद उस संस्कृति के भीतर चलते हैं. यहाँ मिठाई ऐसा ही एक और डीएनए है. दिवाली के समय में ही सबसे ज़यादा मिलावटखोरी की ख़बरें छाई रहती हैं. इसे सवाल की तरह भी पूछा जा सकता है, कि जो माध्यम इसकी मार्केटिंग नहीं करते वे इस जातीय स्वाद की मार्केट वैल्यू पर पलीता किसी छिपे एजेंडे के तेहत तो नहीं करते. जबकि सोपनीय क्रम यहाँ भी है कलेवा-हल्दीराम-नत्थू राम की मिठाइयाँ अपनी शुद्धतम अवस्था में पूरे साल बनी रही हैं.

पर जो बात छूटी जा रही है वो यह है, के, मिलावट को सिर्फ मांग पूर्ति की अर्थशास्त्रीय दृष्टि से देखना एकांगी होगा जबकि वहां संस्कृति अपने अस्तित्व की लड़ाई भी लड़ रही होती है. उसे हमेशा नुक्कड़ की दूकान पर बने रहना होगा. वह अपने को दोहराती रहना चाहती है. वर्ना जैसे चाय के साथ पार्लेजी बिस्कुट अपनी अनिवार्य उपस्थिति के साथ मौजद रहता है पोहा भी ज़लेबी की जगह किसी को ढूंढ़ लायेगा ..इसे दूसरी तरह देखें तो पश्चिम बंगाल में आज तक रसोगुल्ला, सन्देश, पीठा, फिरनी वहां की मिठाई की दुकानों पर पाए जाते हैं.

सिर्फ इतना ही नहीं हर साल जितने भी बच्चे पटाखे बनाते हुए विस्फोटों में मारे जाते हैं वे भी अपना योगदान इसी पुनुरुत्पादन में देते हैं. यह वाला चित्र थोडा हिंसक किस्म का लग सकता है, पर उसके संशोधित संस्करण जहाँ दीपावली का मतलब आतिशबाजी करना है वहां इस भूमिका से बचा नहीं जा सकता है. और आप भी उनमे हैं तो ख़रीदे हुए पटाखों में दो-चार बच्चों की ज़िन्दगी भी जोड़ लीजिये. पता नही हम इस कीमत पर खुद तो रोशनी कि तरफ जा रहे है पर उस उजाले की चकाचौंध में कुछ भी देख पाने में असमर्थ हैं.

यहाँ सवाल मेरे खुद के लिए है कि बचपने की उन यादों के गहरे धंसे होने के बाद भी आज मेरे सामने इस दिन को ऐसे बिताने के सिवा कोई और विकल्प सामने नहीं दिख रहा. यह भी नहीं समझ पाता की ये दिन और दिनों से किन सन्दर्भों में अलग है. उन मिथकीय उपाख्यानों की परिधि में इसे न कल देखते थे न आज. महर्षि दयानंद के निर्वाण दिवस पर रामलीला मैदान जाना कब का पीछे छूट गया. एक वार्षिक सफाई अभियान शुरू होता था वो इधर कई सालों से सफेदी न होने के कारण नेपथ्य में चला गया है..आज सिर्फ किताबों के शेल्फ को व्यवस्थित कर काम तमाम. ले देकर चीनी बल्बों की लड़ियों के साथ, दिए जला, रात छत पर दूसरों की आतिशबाजी देखना बचा है..

{यह पोस्ट 'जनसत्ता' में 'सांस्कृतिक कूटपद' शीर्षक के साथ दो नवम्बर को प्रकाशित हुई जिसे आप इस लिंक पर भी पढ़ सकते हैं} 

अक्तूबर 22, 2011

पट्टे की रूपक कथा का एक पाठ

इतने दिनों कागज़ पर कुछ न लिख पाने की छटपटाहट पता नहीं किन सवालों के चक्कर काटती रही. खुद इसका इतनी नीचे दब जाना और न उठाना, सब अजीब सा किये देता है. क्यों नहीं लिखा गया उसका कारण समय न मिल पाने के साथ उन जटिल होती जा रही औपचारिकताओं में भी छिपे हैं जहाँ खुद को लोग हमारा ग़ुलाम नहीं मान भाग जाते हैं. जबकि गुलामी की रकम लाखों में जाती है. सुबह से शाम की नौकरी बजाने जैसा अनुभव रात को सोते समय उसके बाद सपने में भी नहीं आता-नहीं आ पाता. कुछ सोचे समझे जाने लायक न रख पाना उसमे समरूपता के ढर्रे को ही पुख्ता करते हैं, जिस फैक्ट्री में 'फिट' बनाये जाते हैं 'मिसफिट' नहीं.

पट्टे के पहन लिए जाने के बाद के बदलावों में कटखनापन कम होकर पालतूपने में बदल जाने की रूपक कथा में कई-कई बिम्ब आगे पीछे दुम हिलाते रहते हैं. कुछ काटना भी चाहते हैं पर हम बिना दुम हिलाए अपनी औकात में ही सोचने समझने की काबिलियत को बचाए रखने के द्वंद्व से जूझते रह सकने की कोशिश में हैं.

साफ़ साफ़ न लिख पाना किसी भय के कारण छिपाया नहीं जा रहा बल्कि उसकी अमूर्तता में अंतर्क्रिया को समझने की कोशिश है जहाँ पैरों की थकान पीठ के रस्ते दिमाग तक पहुँच सुला देती है, सुबह उठकर फिर वही दिमागदार तीमारदारों की छाया में.

पूरी प्रक्रिया कबीलाई लड़ाई से बच पाने की जद्दोजहद है जहाँ छोटी छोटी अस्मिताओं के चंगुल से-में फंस जाना कहीं भी लक्ष्य नहीं रहा. कुछ देर का हो हल्ला उन्ही किन्हीं लाल दीवारों में कुछ वक़्त बाद दबा दी जाये, उससे अच्छा होगा, उन्हें उन्हीं के औजारों की भाषा में समझाया जाये. अपने पास उन नुकीले दाँतों हथियारों को मांजा पोंछा जाता रहे. अपने को सबल बना कर संस्था के संस्थानीकरण को धवस्त किया जाये. पहले काटने की योजना पर रेबीज़ के टीके के साथ समाप्त हो गयी थी. इसका प्रभाव कुछ ज़यादा रहने की उम्मीद है. कोशिश यही रहेगी की हमारे पास ताला चाभी दोनों हों.

भले समय लगे पर पैनापन ही इस तरह की किसी वैचारिक संघर्ष में निर्णायक होगा. सत्ता के साथ मद का प्रमाद उतारने के लिए विकल्पों के रूप में खुद को स्थापित कर पाना इतना आसान नहीं. कोई कुछ भी कहे सुना जायेगा पर किसी त्वरित टिपण्णी टीका से विचलित न होकर मानसिक प्रकलपों पर उन्हें ऐसा रचा जाये, बुनावट जितनी जटिल होगी उससे उतना ज़यादा उलझाया जा सकेगा. इसकी पहली रीडिंग पहला पाठ किसी वैचारिक युद्ध के घोषणा पत्र की आत्मशलाघा सा न किया जाये. यह जितना बाहरी है उतना ही आंतरिक भी.

{बस ऐसे ही किसी दिन का पीछे का पुराना पन्ना}

अक्तूबर 16, 2011

और कहानी ख़तम..

शाम पन्ने पलटते वक़्त दस अप्रैल दो हज़ार का लिखा मिला. चार दिन पहले की दोपहर नागतीहल्ली चंद्रशेखर की कन्नड़ कहानी का हिंदी रूपांतरण दूरदर्शन पर दिखाया गया था. उसी कहानी को पूरा लिख मारा था. आज उसी का संशोधित संस्करण.

कहानी थी भारतीय स्वाभाविक बेरोजगार की. बेरोजगार है, तो मतलब पढ़ा लिखा होगा, इस पर संशय बना रहता है. एक दिन ऐसे ही भटकता भटकता एक सब्जी वाले के यहाँ नौकरी मांगने पंहुचा. उस सब्जी वाले ने नौकरी तो नही, पर अपने ही घर पर, एक किराये का कमरा दे दिया कि यहाँ रह नौकरी ढूंढ़ सकता है. कमरा किराये का था. मतलब आय होने पर किराये का भुगतान.

अब उस घर के सदस्यों की संख्या कुल मिलकर तीन हो जाती है. थोड़ी-थोड़ी अनिल कपूर की 'वो सात दिन' की याद ज़रूर आती है पर यहाँ का नायक सब्जी वाले की बेटी से छिप-छिप'बिना बल्ब वाले कमरे ' में मिलता रहता है. कभी कबार दोनों,  नायिका के पैसे से फिल्म भी देख आते. नायिका न तो जेआरएफ़ होल्डर थी, कि दिल्ली विश्वविद्यालय से उसकी एम.फिल. चल रही होगी और न वो मैसूर विश्वविद्यालय से कुछ कर रही थी, जिसके चलते 'उसके पास पैसे हरदम रहते ही होंगे ', मान लिया जाये; फिर भी वह उसके सारे खर्च को वहन करना चाहती थी; और काफी हद तक करती भी थी.

कहानी क्या इतनी सपाट होती है कि बस चलती रहे. नहीं ऐसा होता नहीं है. एक शाम नायक को उसके कभी बनाये गए गुरूजी मिल जाते हैं और शादी के चक्कर में ज़िन्दगी बर्बाद न करने की हिदायात देकर चलते बनते हैं. बिन रीढ़ का नायक उसी रात गुरु आज्ञा पालन करते हुए सब्जी वाले के यहाँ से उसकी लड़की को छोड़ भाग खड़ा होता है. ये बात अलग है कि उसके वही परमज्ञानी गुरूजी जिंदगी के किसी मोड़ पर अपने भरे पूरे परिवार के साथ इस नायक से सपत्निक टकरा जाते हैं. उसे संस्कारित आत्मग्लानि जैसा कुछ होता है और उम्र के इस पड़ाव अपनी उसी नायिका को यादकर फिर किसी ताक़ में लग जाना चाहता है.

लगता है कथाकार उसे दूसरा मौका देना ही चाहते हैं. अचानक इतने बरसों के बाद उसके पास नायिका का ख़त पहुँचता है. मजमून इतना कि वह उसे जल्दी वापस आने को कहती है और लिखती है उसी 'बिना बल्ब वाले' कमरे में मिलेंगे. हमारे नायकों को और क्या चाहिए स्वयं को तुष्ट करने के अवसर. वह तत्काल पहुँचता है. वहाँ नायिका अपने हिस्से की कहानी एल्बम के ज़रिये बतलाती चलती है कि कैसे उसके जाने के कुछ महीने के बाद ही उसकी शादी एक संपन्न परिवार में करा दी जाती है. पर काल का पहिया कुछ ऐसा घूमा कि कोर्ट कचहरी के चक्करों में परिवार वाले ऐसा फंसे कि कंगाल होकर रह गए.

अब इस तीसरे बच्चे के जन्मने में केवल चार-छह दिन शेष रह गए थे कि उसके ससुराल वालो नें खर्च करने में असमर्थता जाता कर यहाँ मायके भेज दिया है. 'और तुम तो पिता जी के जाने के बाद घर की हालत तो देख ही रहे हो'. इन सब ब्योरों के बीच नायिका वह डायरी भी ले आती है, जिसमे नायक के कहने पर ही उसने सारे व्यय सारे खर्च सारे लेनदेन को लिख रखा था. उस समय तक चार हज़ार छह सौ रूपये का हिसाब बनता था. नायिका कहती है तुम ऊपर का छोड़ दो तो बाकी चार हज़ार तो दे ही दो..और कहानी ख़तम हो जाती है.!!

अक्तूबर 13, 2011

छद्म बहुभाषिकता और नव साम्राज्यवादी पाठ

बहुभाषिकता. इसे भाषिक विविधता भी कह सकते हैं. विविधता समता लाती है या विषमता? कैसे एक भाषा वर्चस्वशाली होकर दूसरी भाषाओँ को पदानुक्रम सोपान में नीचे धकेलती है. एक देश विशेष में भाषा विशेष कैसे इस स्थिति में पहुँचती है, यह देखना दिलचस्प होगा. और दिलचस्प होगा स्थानान्तरण, उपनिवेशवाद, संचार की वैश्विक क्रांति, भूमंडलीकरण, स्थानीयकरण और सीमांत आक्रमण की भूमिकाओं को पढ़ना.

और यह पढ़ना किसी एक दृष्टि-कोण-चश्मे से संभव नहीं है. न ही भाषा कनॉट प्लेस के सरवन भवन जाकर मैसूर मसाला डोसा या रवा केसरी खाने जितनी सरल है. राजधानी( गुजराती डायनिंग) पीवीआर रिवोली के सामने से उठ कर सिंधिया हाउस के.एफ़.सी. के पड़ोस में जा सकता है; पर भाषा वहां बैठकर गुजराती थाली का आर्डर देना भर नहीं है. न ही शिवाजी स्टेडियम की तरफ मैक डी की छोटी-सी खिड़की से फ्रेंच फ्राइज़ और बर्गर के लिए थोड़ी देर सॉफ्टी खाते इंतज़ार करना है.

भाषा भी एक प्रकार से जीभ का स्वाद है पर यह इतनी सरल रेखा में नहीं चलती. न ही 'मोमोस' की तरह हम यक-ब-यक उसे अपना सकते हैं. पर हाँ जलेबी, कचौड़ी, सोमोसे के अपदस्थ होने को हम भाषा के सन्दर्भ में जोड़ सकते हैं.

अनेक अध्ययनों से पता चलता है की बहुभाषिकता का संज्ञानात्मक विकास, सामाजिक सहनशीलता, विकेन्द्रित चिंतन एवं शैक्षिक उपलब्धि से सकारात्मक सम्बन्ध होता है. पर हमारी बहुभाषिकता का आलम यह है कि संविधान की आठवी अनुसूची, बीस बाईस भाषों को आधिकारिक स्वीकृत देती है. हज़ार पांच सौ के नोटों पर कई कई भाषाएँ अंकित हैं. भूगोल और सिद्धांत कुछ भी कहें; परन्तु हमारे देश की 1652 भाषाओँ में से केवल 47 भाषाएँ ही स्कूल में बच्चों की समझ का माध्यम बन सकी हैं. मतलब भाषाई अल्पसंख्यकों का उनकी अपनी ही भाषा में प्राथमिक शिक्षा का अधिकार धरातल पर औंधे मुंह पड़ा है. हमारी बहुत-सी खामोश भाषाएँ, एक ऐसी पहल के इंतज़ार में हैं, जबकि उनके दोनों होंठ मिलें और भाषिक जनतंत्र का स्थान बन सके.

उन्नीस सौ नब्बे की नवउदारवादी मुक्त अर्थव्यवस्था के प्रत्यय के मूर्त रूप में आने के बाद से स्कूलों में अंग्रेजी की मांग का विस्फोट हुआ क्योंकि यह समझा जाने लगा की अंग्रेजी जैसी वैश्विक भाषा से अच्छे अवसर मिल सकते हैं और यह हुआ इस भाषा के साम्राज्यवादी- उपनिवेशवादी स्रोत को भुला उसे अप्रासंगिक घोषित करके.

जबकि हम भूल नहीं सकते जब विभिन्न राष्ट्र स्वतंत्रता और समानता की शर्तों पर न मिल कर उत्पीड़क और उत्पीड़ित के रूप में मिलते हैं, तब उत्पीड़क राष्ट्र अपनी भाषा का इस्तेमाल उत्पीड़ित राष्ट्र में अपनी घेरेबंदी को और मजबूत करने के लिए करता है. अर्थात सैद्धांतिक रूप से बहुभाषिकता में उस राष्ट्र की अपनी आदिम नृजातीय समूहों की भाषाएँ हाशिये पर चली जाती हैं. उनका अस्तित्व सिर्फ उस राष्ट्र को मुद्रित रूप में तो बहुभाषिक देश तो घोषित करता है परन्तु व्यवहारिक पटल पर हम उन्हें यूनेस्को की खतरे की स्थिति वाली भाषों की मानचित्रावली में मरणासन्न अवस्था में देख पाने को विवश होते हैं.

यहाँ एक बात जो महत्वपूर्ण लग रही है उसे छोड़ा नहीं जा सकता के, भाषा सम्बन्धी द्वैधता उपनिवेशवादी के लिए ऐसा सांस्कृतिक संकट उत्पन्न कर देती है जिससे उसे कभी मुक्ति नहीं मिलती : दो भाषाओँ पर अधिकार का केवल यह अर्थ नहीं की उसके पास दो उपकरण हैं, बल्कि यह भी की व्यक्ति दो मानसिक और सांस्कृतिक परिवेशों में भागीदारी रखता है. यहाँ दो विश्व, जिनके प्रतीक और वाहन दो भाषाएँ हैं, सघर्ष में संलग्न होते हैं; ये दो विश्व क्रमशः साम्राज्यवादी और उपनिवेशवादी के हैं.

शिक्षा ही सांस्कृतिक साम्राज्वाद का दूसरा रूप है जिसने बहुसंख्यक लोगों को अपने जीवन में होने वाले बदलावों और प्रगति के स्वरुप को समझने और उन पर नियंत्रण करने में सहायता करने के बजाय चंद लोगों के हाथों में बहुसंख्यक लोगों के जीवन का नियंत्रण सौंपने का काम किया है.

इस बहुभाषिकता के पाठ में इधर एक विज्ञापन ज़रा हट कर इसे बतला रहा है जिसमे द इक्नॉमिस्ट अपने हवाले से चीन की एक खबर दिखता है, जिसमे वहां के वर्ग विशेष के बच्चों को हिंदी वर्णमाला सिखाई जा रही है. और अखबार हमारे लिए इसकी व्याख्या करते हुए कहता है कि अब चीन अपने ही देश से श्रम शक्ति को आयत कर भारत में स्थापित उद्योगों में लगायेगा.

इसकी आप अपनी व्याख्या करने को स्वतंत्र हैं, पर मैंने भी एक अर्थ यह निकला है की अब चाह कर भी एक भाषी राष्ट्र नहीं रह सकता. चूँकि खुले व्यपार ने कई-कई रास्तों को खोल उसमे अपने उद्योगों के लिए जोकी उनके अपने देश के भूगोल में नहीं हैं पर अपनी पूंजी अपने ही देश में रखना चाहता है. मतलब आपको चोर रास्ते से इस पूंजीवादी समय में दूसरी तीसरी भाषा को अपने अधिकार क्षेत्र में लाना ही होगा. और आप इसे नव साम्राज्यवाद का एक और अध्याय भी कह सकते हैं.

अक्तूबर 08, 2011

रोहतांग-केलोंग-बारलाचा ला से वापस

दो-तीन बैठकों में यह तय हो गया था कि किसे क्या काम करना है. टॉर्च, मेडिकल बॉक्स की हिदायतें. सबको ट्रिप के रोल कॉल नंबर दिए गए. कई कमेटियां बनीं. कोई ऐसा नहीं बचा जिसे कोई काम न मिला हो. एक तो ऐसे ही हफ्ते भर की लम्बाई चार दिन की कर दी थी पर जाना था तो गए. मेरे जिम्मे आया पूरे ट्रिप का लेखा-जोखा. मतलब 'रोहतांग-केलोंग-बारलाचा ला' से वापस आकर एक रिपोर्ट तैयार करना..

आठ अक्टूबर. शाम करीब साढ़े चार पौने पांच बजे के करीब. सत्ताईस सिटर डीलक्स बस एम.वी.सी.ओ.ई.[MVCOE] के गेट पर खड़ी हमारे व्यवस्थित होने का इंतज़ार कर रही थी. बैगों को लाल रिब्बन से बाँध दिया था और लगेज कमेटी के दो सदस्य एक-एक कर सामान को गिनते हुए डिग्गी में रखवाते जा रहे थे. हम लोग चार दिन की एक लम्बी सैर पर निकल रहे थे. हिमाचल प्रदेश..कितने दिनों से इस दिन का इंतज़ार कर रहे थे..वो दिन आज ही था..

हम कुल इकतीस थे. संजीव सर, ज्योति मैम, एक हमारी सीनियर. उनका नाम शायद अनु था. हमारी रसोई भी साथ थी और एक इनोवा कार भी, जिसमे तीन-तीन करके रोटेशन होने की बात थी. अंकुश अरुण के जिम्मे दो मयूर जग थे. मतलब पूरे सफ़र में पानी की व्यवस्था. भरे जग पीछे रखे जा चुके थे. सब अपनी-अपनी सीटों से चिपके बैठे थे. पीछे की सीटों का मोह इस बीच क्यों बढ़ा यह समझ पाता, इससे पहले ही किसी ने बजरंग बलि की जय का जयकारा लगाया और हमारी बस रेंगती हुई चल पड़ी.

एक बार जो बस चली है 'ऐनर्शिया की थियरी' आस-पास भी फटकने नहीं पाई. मजनू के टीले के बाद अन्ताक्षरी शुरू हुई पीछे की दो आगे की दो. एक बार डोर मिलने की देर थी की न मालूम अन्ताक्षरी ने जो उड़ान भरी वो नाचते-गाते दमशरा तक पहुँच कर कितनी बार दोहराई गयी. बस की खिडकियों के बाहर सड़क नापते-नापते रुके 'झिलमिल ढाबे' पर. खाना खाकर हम वापस बस में. रात जैसे-जैसे आगे बढ़ रही थी, नींद सबकी आँखों से उतनी ही दूर थी. इंतज़ार था तो सिर्फ ज़ल्दी से ज़ल्दी मनाली पहुँचने का.

पर ऐसे थोड़े ही पहुँचने वाले थे? गोपाल जी को पीछे छुटना भी तो था! हुआ कुछ यूँ था कि हम सुबह का नाश्ता पंडोह डैम पर करने वाले थे पर पानी की अनुमति न मिलने के कारण बस डेढ़ दो किलोमीटर आगे के लिए चल पड़ी. गोपाल इन सबसे बेखबर टहलने में मसरूफ. पर पता नहीं किसकी छठी इन्द्री ने संकेत किया और बस रुकी. आगे कुछ नहीं हुआ ये कोई सोच भी कैसे सकता है?! आगे जहाँ रसोईये ब्रेड पकौड़े बना रहे थे, वहीं पहाड़ी पर कहीं किसी कीड़े ने दिव्या को काट लिया. दिव्या ने तो एंटीबायोटिक लगा निजाद पा ली पर संजीव जी के पर्यवेक्षण में प्रशस्ति के पूरे हाथ को ही सुरक्षा कवच से ढक दिया. इसके बाद जो बस चली, तो डेढ़ बजे मनाली पहुँच कर ही उसने दम लिया. पूरे रास्ते नदी सड़क के साथ चलती रही सिवाय पहले पड़ने वाली सुरंग के.

शाम पांच बजे-नौ अक्टूबर -खाना खाकर 'होटल शिवालिक' से हिडिम्बा मंदिर की ओर चल पड़े. चार-चार लोगों पर एक ऑटो. साढ़े चार सौ साल से भी पहले से लकड़ी का बना ढांचा आज भी चीड़ों से बात करता मालूम पड़ रहा था. और आदतन हम सबने ऑर्कुट फेसबुक के लिए 'पिक्स' भी बहुत उतारीं. वहाँ से पैदल लौटते हुए मॉलरोड को नापा और मन मुताबिक़ सामान खरीदने खाने में अपनी प्रखर मेधा का प्रयोग किया. लौटते-लौटते आठ बज गए. फिर रात का खाना और हमारा पहला गैट- टुगेदर कमरा नंबर चार एक एक में. रात करीब एक बजे अगली सुबह रोहतांग जाने के लिए सो गए.

एक रात बस में दूसरी होटल में तीसरी सुबह तारीख दस अक्टूबर . नाश्ते में आलू के पराठे और चाय. सवा नौ हम मनाली से चले तो ग्यारह बजे मढ़ी में थे. दोनों जगहों की खास बात शिलाजित केसर के फुटकर विक्रेताओं का अपने अपने कन्धों पर अपनी दूकान उठाये फिरना. अब यहाँ से जो सड़कों ने खुद को पुनर्परिभाषित करना शुरू किया तो पूरे रास्ते हमारा पीछा नहीं छोड़ा.

रोहतांग. रोहतांग की ठंडी हवाएं. ठंडी बर्फीली ठंडी हवाएं. इन झोंकों से प्रताड़ित हो हम कोकसर में इनोवा का इंतज़ार कर रहे हैं तो कहीं दूर-दूर तक उसका नामोनिशां नहीं. ऊपर बर्फ़बारी नीचे हवाएं. हम एक ढाबेनुमा जगह पर बैठे मैगी खाते-खाते हंसी के डोज़ भी ले रहे थे. चाय दूध के पाउडर की ही पूरे रस्ते मिलेगी ये भी पता चला. बजते-बजते पांच का घंटा बजा और विलक्षण बुद्धि-मति-प्रज्ञा का तीसरा नमूना हमारे खानसामों ने बस  की डिग्गी में पूड़ियाँ तलनी शुरू की.

यहाँ से चले तो गोंदला में होटल त्रिवेणी की गुत्थी सुलझाते-सुलझाते खुद ही उलझ गए. बड़ी कोशिशों पूजा प्रार्थना इबादत के बाद कहीं से कोई टावर टकराया और इनोवा से बातचीत के बाद हम पहले तांडी फिर केलांग(3348 मी.) के लिए चल पड़े. यहाँ होटल 'ताशी-द-लेक' के रूम में पहुँचते बिलकुल वही रिप्ले किया जैसे शिवालिक में किया था. माने कि कमरे में पहुँचते ही मोबाइलों के लिए सॉकेट ढूँढना फिर गीज़र का स्विच ऑन करना. तब जाकर पीठ सीधी करने के लिए थोडा आराम और लेते लेते ही पूरे दिन कि फोटुओं का विश्लेषण..

ग्यारह की सुबह इत्मीनान से उठे. बारालाचा ला, केलांग से तिहत्तर किलोमीटर दूर. हम साढ़े नौ बजे बस में बैठे और आधे घंटे बाद 'जिस्पा होटल आई बैक्स' के पीछे फैले विशाल पर्वत को निहारते मंत्रमुग्ध से उतर व्यास नदी के किनारे चल पड़े. फिर कब आना हो यही सोच सबके फ्लैश बटन क्लिक हो रहे थे. कारगिल ट्रांसिट कैम्प होते हुए बारलाचा ला पहुंचे. यहाँ तक आते-आते कईयों का दम फुल गया, तबियत जवाब देने लगी.

यहाँ फिर कुछ हुआ जो पहले हो चुका था, बस पात्र बदल गए थे. इस बार राकेश-राजेश वहीँ के होकर रह जाते अगर खिड़की के बाहर झांकती पर्वतमाला देखती आँखें दोनों को बस की तरफ भागते हुए न देख लेतीं..शुक्र है दोनों वापस आगये. यहाँ से जो चले तो साढ़े चार बजे दोपहर के खाने के लिए तम्बुनुमा ढाबे की शरण में पहुंचें. हवा के तो कहने ही क्या..??सबके चहरे लटके मुरझाये सड़कों से जूझते प्रताड़ित से कभी ऊपर कभी नीचे खातर पटर से नाराज़ से लग रहे थे. यहीं कहीं चावल खा पीकर केलांग साढ़े सात बजे पहुंचे.

चलिए अब शुरू करते हैं 'रैपिड फायर राउंड' आपको भी तो पता चले कैसे हमने तूफानी सफ़र पूरा किया!!..अगली सुबह, बारह/ दस/ दो हज़ार नौ/ सवा नौ बजे 'ताशी-द-लेक' से चेक आउट. सवा दस 'सिस्सू', झरने के पास. चार घंटे वहीँ. शाम सवा छेह पलछन, कोठी हवेली- दोपहर का खाना.

सवा सात मनाली, संजीव जी की भुतहा कहानियों का दौर और सात मिनट तक सुई पटक सन्नाटे का आग्रह. अगर हम मान लेते तो बस में हमारे अलावा और भी कई खोपड़ियां गिनती में आतीं. फिर शुरू हुआ हस्तरेखा विज्ञान. स्पेशल केस स्टडी मंजीत. रात आठ चालीस- 'रायसन नेचर नेस्ट ऐडवेंचर पार्क' के बाहर रुकी बस. विचार विमर्श की 'स्वर्गघाट' पर रात रुकें की नहीं. साढ़े बारह ढाबा 'साझा चूल्हा' हिमाचल परिवहन की बस में मोबाइल की सिरफुट्टवल कहानी का गोपाल द्वारा शान्तिपूर्ण अंत. रात ढाई बजे बिजली की तारों के चुम्बकीय क्षेत्र के कारण आती आवाजों का रहस्य को जान रात्री भोज.

नांगल सुबह छह उन्तीस. मतलब दिन बदला. तेरह की सुबह. पिंजौर, आठ पचपन. यहाँ से चंडीगढ़ बाईस किलोमीटर. साढ़े बारह, शिव डीलक्स ढाबा, 'पिपली' कुरुक्षेत्र. दिल्ली से एक सौ छियालीस किलोमीटर दूर..और इस तरह हमारी बस शाम साढ़े चार के करीब अपने कॉलेज के गेट पर थी. हम वापस आ गए थे, थके ज़रूर लग रहे थे पर आँखें मान ही नहीं रही थीं. हम वापस आये थे सैकड़ों पिक्स के साथ, कभी न भुलाई जा सकने वाली यादों के साथ..इनके साथ हमें  हमेशा रहना था..चलिए अभी बस इतना ही..यात्रा समाप्त..!!

दो साल बाद की तीन किश्तें: मनाली की पहली रातदिन अगला रोहतांग दर्रारात आख़िरी

अक्तूबर 03, 2011

एक स्टेटस के बाद की सर फुटौवल्ल


  • opning ceremony wid breaks..ek to boring upar se ads..daad me khujli type presentation..is pakau se aacha hota 26 jan. ki parade ka 'deffred live' hi kar dete..
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    • Alok Jha शचीन्द्र यह उचित समीक्षा नहीं है। यह एक ही पक्ष दिखाता है । वस्तुतः हमें वस्तुनिष्ठ होने की जरूरत है जहाँ अच्छे को अच्छा कहने एवं बुरे को बुरा कह सकें। यह नहीं कि सब बुरा ही बुरा है !
    • Shachinder Arya shyad maine ek aankh se dekha tumne dono se dekha hai to zara batao kya thik tha???
    • Alok Jha Sachi main vyangy nhi kar raha hu... Main bs dono or se dekhne ki bat kar raha hu...
    • Priya Arya शचीन्द्र आपने जो लिखा है, आपको नहीं लगता कि ये आलोचना अपने आप में अधूरी है.आप ने किसे पकाऊ कहा है.हमारे देश की संस्कृति को या फिर उन कलाकारों को जिन्होंने अपनी कला का प्रदर्शन किया.मुझे समझ नहीं आया.अगर विज्ञापन की वजह से आपको बोरियत हुई तो भी आप कार्यक्रम को बुरा नहीं बता सकते.अगर आपने ये कहा होता कि कार्यक्रम आपकी अपेक्षाओ पर खरा नहीं उतरा तो भी बात समझ में आती.आप ये भी तो बताएये कि आप किस तरह के कार्यक्रम इस समारोह में देखना चाहते थे.पूरे समारोह में आपको बुरा क्या लगा.
    • Alok Jha प्रिया मैडम शचीन्द्र की आलोचना जैसी दिखती है वैसी नहीं है इसके पीछे हमारे देश के की सरकार के निठल्लेपन का एक पूरा आधार काम कर रहा है ।
      यदि इतनी बदइंतजामी नहीं होती शायद इस प्रकार की आलोचना नहीं होती बल्कि एक पूरा विश्लेषण होता ।
    • Mukesh Kumar 'Gajendra' good debate.keep it up priya madam
    • Anand Mishra Mujhe lagta he ki aapki mansikta vikrit ho chuki he. Aapke dekhne aur samajhne ka najariya bhi aadharhin tathyon pe tika he. Aap bahut sochte hain par chintan nahi karte. Chintan apne aap mein swatantra prakriya he jabki aapke soch ek ideology se prabhavit hota he aur itna ki aap achha-bura, sach-jhooth, vastavik-chhalava mein fark nahi kar paate. Agar mere bat se aap santust nahi hue to aap mujhse milkar bahas kijiye, ok.
    • Shachinder Arya सबसे पहले बात आनंद से.. तुम तथ्यों की बात कर रहे हो न तो तुमहारे लिए
      १. सरकार मेजबानी के लिए 71 देशो को घूस देती है ..
      २. ये झूठ बोलती है की cwg गेम्स के बाद 'खेल गाँव' दिल्ली विश्वविद्यालय को दे दिया जायगा ..
      ३.'अनुसूचित जाति अनुसूचित जनजाति कोष' के 
      774 करोड़ रुपये यू ही उड़ा लिए गए ..
      ४. ऊपर से 'दिल्ली विश्व विद्यालय' को पुस्तकों की खरीद के 20 प्रतिशत रकम पहले ही उनके खाते पहुचाई जा चुकी है 
      ५.छियालीस में से बाईस 'रैन बसेरे' या तो बंद कर दिए गए या उन्हें मिटटी में मिला दिया गया..
      ६.दिल्ली नगर निगम ने 171 करोड़ राष्ट्रमंडल खाते में डाले हैं जो 'पेनशन' में दिए जाने थे..
      फेहरिस्त और लम्बी हो सकती थी पर अभी नहीं..
      अब तुम 'प्रायोजित सत्य' {कल का उद्घाटन} देख कर चुंधिया गए हो तो क्या किया जा सकता है..और जहाँ तक विकृत मानसिकता का सवाल है शायद जवाब तुम्हे मिल चुका होगा..कि कौन विकृत है..
    • Shachinder Arya प्रिया,..तुम जिस संस्कृति की बात कर रही हो वो सरकार को ऐसे ही वक़्त पर क्यों दिखाई देती है जब उसे अपने को चमकाना होता है..यही सरकार है जिसने झारखण्ड छत्तीसगढ़ को अपना उपनिवेश बना रखा है..जमीन बेचते हुए जंगल काटते हुए क्या उसे alzimar हो जाता है या गजिनी वाली बीमारी से वो ग्रस्त है..यही सरकार है जिसने 'खादी' पर से अपनी सब्सिडी हटा ली है..उन लोक कलाकारों का कल के बाद क्या होगा उन्हें भी नहीं पता..मेरी पूरी आलोचना उसके 
      चरित्र को लेकर है..जिसमे PRAXIS है ही नही..
    • Shachinder Arya और आलोक शायद तुम ठीक कह रहे हो..इसपे सोचूंगा..
    • Alok Jha आनंद तुम जब चाहो बहस करने आ जाओ ।
      तुम शचीन्द्र की चिंतन की बात करते हो एवं जिस आधारहीनता की बात करते हो वह दरअसल तुममें है और तुम्हारी टिप्पणी बिल्कुल वाहियात ! सारे तथ्य उसने सामने रख दिए हैं अब बात कर । आनंद ये तुम्हारी नहीं तुम जैसोँ की समस्या है जो स्वयं को महान और सामने वाले को कुछ नहीं समझते ।
    • Alok Jha आनंद सावन के अंधे और सुविधाभोगियोँ को सबकुछ हरा ही दिखता है
    • Anand Mishra To Alokji, main aapki mahanta ko swikarta hu. Aap jis vidwat samaj se vaqif rakhte hain us se bhali bhanti avgat hun main. Meri vahas aapse nahi ho rahi he filhal.
    • Anand Mishra To my dear friend Sachin:- Mujhe pata tha ki aap kuchh na kuchh data jaroor paroshenge aur ulti kar hi di. I have doubt on the authenticity of source & credibility of ur data. U r fully overwhelmed by some particular ideology and related notion which r detrimental in synthesesing the pure concept. U r most welcome to my room to discuss the topic as it is not feasible to discuss via face book. Issue is not simple as it looks. Pls come along with Alok Jha. Plz bura mat manna meri baton ka.
    • Abhishek Kumar Mere pyaare bhai shachi.. Tumse puchna chahunga ki kya hum apne desh k culture ko critisise kar rahe hain ya fir neta logo ko. Bhai tumne jo likha wo sahi likha bt tumhe nai lagta ki tumhari timing thodi kharab hai. Critisize hum baad mein bhi kar sakte the par games k dauran aalochna nai karni chahiye aur jo event humare desh k liye acha hai usme tumhe bhi badh chad k bhag lena chahiye.
      Dost tumhe batana chahunga ki waha par jo log perform kar rahe the wo insaan the machine nahi. Unhe bhi pyaas lagti hogi shaayad isiliye break dete hain. Pichle olympic aur common wealth game mein bhi hue the. Is baar bhi agar sponsorship mili hai to isme koi hairani nahi honi chahiye. Aur haan agar tumhe humare culture mein achai nahi dikhti to ye bohot dukh ki baat hai. Par atleast ise bore keh kar desh ko gali mat do.
      Jahan tak baat corruption ka hai to main bata doon ki fifa world cup mein bhi ye hota hai aur olympics mein bhi koi doodh ka dhula nahi hai duniyd mein. Haan agar opposite parties ko bhi ghus khila di jati to shayad itna bawal nahi hota.. Shayad yehi baat unko bhi hajam nahi hui.
      Ye jo tumhe aakde (statistics) dikhaye hain ye to abhi tak news, akhbaar, national journal mein bhi nahi aayi hain tumhe kaha se ikattha ki hai. Tum ye aakde kisi news channel ko dedo agar wakai ye sach hai to tum pehle aise journalist banoge jo sarkar k ander kya ho raha hai uska bhanda phod doge. Ye 1 acheivement hoga kynki aisi inside story to abhi BBC ne bhi nahi di hai. 
      Mere bhai jiska jo hona hai uska faisla court karegi. Bt for nw enjoy d games n yes hopefully u must enjoy our culture also as it is nt dat bad rather its shows our strength n d concept of unity in diversity wat it showed last night.. Think positive. 
    • Shachinder Arya to bhaiya hum bhi 24*7 uplabdh hain..aap kuch bolne-likhne se pehle sochte bhi hain..don't take personal..m just asking..
    • Alok Jha हा हा हा हा हा अबे शचीन्द्र ये तो हद हो गयी यार जब समझ न आए तो लोग तथ्यों पर सवाल उठा देते हैं। और दुख तब होता है जब सवाल उठाने वाले स्वयं प्रामाणिक नहीं हैं । इन तथ्यों को यदि लोग उल्टी कहते हैं तो मुकाबले में तर्क दें बच्चों वाली भावनात्मक बातें नहीं करें।
    • Anand Mishra Hitherto "Mega Ceremony" doesnt limits its meaning to self pride of ones own country only but a arena to proclaim its rising as a major power. U doesnt know about the dynamics of International Political Game and its implications on domestic aspect ie political, economical, social, cultural.... Corruption, poverty etc which u r highlighting so rigourously r our internal problem. For which we r struggling hard since our independece. Both r completely different issue.
    • Alok Jha यदि भ्रष्टाचार फीफा में होता है तो वह दुनिया के लिए सही हो गयी ऐसा नहीं है । कोई दारू पी के टुन रहे तो सब नहीं पीने लगेंगे ।
      शचीन्द्र ऐसा है लोगों को तथ्य दिखाने के लिए किसी लाइब्रेरी में ले जा वहाँ पिछले चार महीने का कोई भी अखबार दिखा सारे तथ्य वहाँ बिखरे पड़े हैं । कोई एफ एम सुनने के चक्कर में न्यूज देखना भूल गया है ।
    • Anand Mishra Theory or Concept r not based on individual collection of facts whether it would be me or u both.
    • Anand Mishra Dear, I m inviting u both: Sachin & Sriman Alok Jha for anytime debate on the topic. I m waiting so disrepately in anticipation for u my dear friend as it is ou feasible for me to discuss via facebook. Debate is all encompassing taking in account of other issues as well. Hope u must be prepared before coming. Good luck.
    • Abhishek Kumar Mere bhai alok.. Apke intellect k to hum kayal hain par mujhe mujhe ye samajh nahi aaya ki shachendra ne jo tathya prastoot kiye hain wo abhi allegation hain aur jab tak wo prove nahi ho jata tab tak wo allegation hi rahenge. Aap ko yah baat samjhni chahiye ki allegations court mein diye jayenge fir uspar faisala aayega uske baad kisi ko saja hogi. Lekin aap jaise gunwan aur vidwan vyakti ne to ise fact maan liya.. acha hota agar aap is desh k nyaypalika k upar is vishay ko chod dete. aapne to court ki tarah in sabhi allegations par mohar laga di. Koi baat nahi ab har koi desh ki achai kare ye jaruri to nahi. Log kyn jarurat k waqt desh k khilaf ho jate hain. Kisi mahan vyakti ne kaha hai "ye mat socho ki desh ne tumhare liye kya kiya, magar ye socho ki tumne desh k liye kya kiya". Kam se kam apne desh ko jarurat k waqt to gali mat do. Anti social to koi bhi ho sakta hai bt real art is being pro social..
    • Shachinder Arya अच्छा आनंद बताओ तो ज़रा जब सेब पेड़ से गिरा तो तुमने netwon को बताया,
      डार्विन के साथ भी शायद तुम ही थे..भैया शुरूवात एक से ही होती है..वैसे भी ये अवांतर प्रसंग है इसलिए वापस आते हैं..तुम जो विदेश नीति का ज्ञान बघार रहे हो और जिन्हें आन्तरिक... समस्या क
      ह कर टाल रहे हो उस पर तो यही कहा जा सकता है 'घर में भूजी भंग नहीं और बगियम भंडारा'..इस पैबंद लगे उत्सव से पहले तुम ये जान लो कि कितनो के पेट में रोटी दवा की तरह जाती है और हम खेल गाँव में हजारो हज़ार व्यंजन परोस रहे हैं..ये वही समय है जब देश के सात करोड़ लोगो के पास पीने का पानी तक नहीं है और हम स्विमिंग पूल को 'शुद्तम' की superlative डिग्री के 'पानी' से भर रहे हैं..और साठ करोड़ के पास हगने- नहाने की जगह नहीं है..जब भारत UNDP के 'मानव विकास सूचकांक' में 115 वे स्थान पर झूल रहा है..ऐसे में 'आर्थिक शक्ति' का 'फूल कर कुप्पा हुआ गुब्बारा' फुस्स हो
      जाता है..
    • Shachinder Arya अभिषेक शायद तुम ठीक से पढते नहीं हो मैंने अभी तक उसे criticize किया ही नहीं है..जहा तक गलत timing की बात है और तुमहारी बात खोखली लगती है नहीं तो 'कबीर' से लेकर 'पाश','भगतसिंह','मुक्तिबोध','परसाई','महाश्वेता देवी' सब होते ही नहीं..सार्थकता सही वक़्त पर सही सवाल उठाने में है न की कोई मुहूर्त देख कर गृह चाल बदलने की बाट जोहने में..जाओ पहले अपने basics ठीक करो तब आना..
    • Muneendra Arya debate अच्छी है.. परन्तु तथाकथित बुद्धिजीवियों की समझदारी भरी चर्चा से कुछ नहीं होने का.. टिप्पणियां व्यक्तिगत न लेकर, विमर्श को यदि कार्यरूप देने का प्रयास कर सकते हैं तो देश हित में अच्छा होगा.अन्यथा ''आपसी सर-फुटौवल'' तो देश में आज़ादी से पहले की कहानी रही ही है,, और आगे भी रहेगी ही... '' ...
    • Anand Mishra 1)We r in a disrepate need me a leader to be guided. This has been the fate of Indian masses. Ham bas doosron se ummid rakhte hain aur khud waisa nahi karte.2) Aap jo bhi opportunities dekhte hain use aap apne khas logon tak hi simit rakhna chahte hain taki competition na badhe. Aaj agar ye hua hota to Reservation Policy ke extend hone ki naubat nahi aati. This is Nepotism in real sense.3) Har koi apna swarth ko pehke dekhta he and this is natural human tendency. Ye alag bat he kisi ne mauka talasha aur fayda uthaya aur aap chuk gae. This is the bitter truth of human orientation to Corruption. Page continued....
    • Anand Mishra Aaj ke neta, bureaucrats, enterpreniur koi alag sa identity nahi he. Ye wahi hain jinhone situation ko opportunities mein tabdil kia aur apna bhagya khud likha banki ham dekh hi rahe hain bas samajh nahi pate. Motion of corruption, nepotism, favour for belongings etc though varying in degrees are nothing uncommon to common man. This is the reason why we have been not successful in implementing all the programmes and policies of government in equal and in unbiased manner. Eradication me corruption, nepotism, injustice and related poverty is not an easy task to perform. It needs a complete overhauling of mindset, attitude & behaviour.
    • Anand Mishra What u have shown is not the grievance of yours own but of those who were not successful in creating opportunities for themselves to take part in corruption process in such a mega event. If they were bribed, the scene wouldn't be the same as it looks. They want the support of ignorant masses including emotional touch to get the chance(corruption, bribe) for next term. Aapka aakrosh jayaj tha but not depicting the true story. Pls think over it. Personally I have not vested interest in it or creating intellectual hegemony on you as sujested by friend Alok Jha. Aap ek achhe aur sachche insaan aur mere mitra hain isliye I m helping you out of preconcieved notion which gives you a partial view of dynamics which are being played by some very shrewd personality. Before concluding anything you must scrutinise the authenticity and validity of the source of data collection and motive r equally important in it to come close to the abstract.
    • Shachinder Arya इतना लिखकर पहुचे भी तो mediocre conclusion पर..u hav pathiec double standards..r u live in a paranoia..??
      तुम रोड पर ही अपनी आँख खोलकर चलना शुरू कर दो तो सच्चाई तुम्हारे सामने होगी..पर जब कोई देखना ही न चाहे तब किया ही क्या जा सकता है..??
    • Abhishek Kumar Yarr.. Agar tumne critisize nahi kiya hai to abhi tak kya kar rahe the. Chalo tumne mana to ki tum allegations par itni badi baat keh gaye.
    • Anand Mishra Jindgi road se shuru hokar road pe hi khatma nahi hoti. Road se hatkar bhi duniya he jahan jindgi basti hain. Apne aankh par se ghore ka chashma hatakar dekho to side view dikhega. Itna sankuchit vichar palna achhi bat nahi hoti as u r going to be a responsible teacher. Banki tum samajhdar hohi jaisa uchit samjho waisa karo.
    • Shachinder Arya अभि..जिसे तुम बारबार आरोप प्रत्यारोप कह कर उसकी प्रमाणिकता विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर रहे हो तो लगता है तुम मीडिया से किसी भी स्तर पर संपर्क में नहीं हो टीवी से लेकर अखबार रेडियो तक पर जब ये सब आ रहा था तब तुम कहाँ थे..ज्यादा ही cross check करना चाहते हो तो अगर RTI का अगर नाम सुना हो तो Govt. of India से लेकर Sports Ministry तक अर्जी डाल कर सत्यता जाँच लो..और अब तक मै तुम्हारे सवालो का जवाब दे रहा था..अगर इसकी भी विश्वनीयता जांचना चाहते हो तो ऊपर से नीचे तक मेरी पोस्ट ज़रा ध्यान से पढना..जो अक्सर तुम नहीं करते हो..
    • Shachinder Arya भैया ये वही सड़क है जिससे हम हर जगह टकराते है, मैंने बात सिर्फ बात बसाहट रिहाईश की नहीं की थी, तुम अगर उसे ध्यान से 'पढने' की कोशिश करो तो अर्थशास्त्र से लेकर समाजशास्त्र वही बिखरा पड़ा मिलेगा..ऐसा क्या है जो वह नहीं है और वैसे भी तुमने NCF 2005 पढ़ा ही होगा, उस सीलन भरी कोठरी से बहार निकलो जिसे classroom कहते हैं..ज़रा दिमाग को व्यावहारिक अनुभवपरक ज्ञान का चस्का भी तो लगने दो..और हम विचार पालते नहीं उसके साथ जीते हैं..
    • Anand Mishra Sorry yar maine dhang se padha aur samjha nahi. U were not struggling with Ringworm(dad) instead u were really enjoying itching(khujli) and in turn u doesnt want any medicine or treatment to get rid of it. Aapne jahan tak Vichar me jine ki baat karte hain us se yah sabit hota he ki koi Ideology apke sari indriyon pe kabja kar rakha he. Aapke bhaunkne se hathi nahi darega. Aap chetna hi jagrit karna chahte hain to asthaniye logon mein bhariye. Apne karmon mein vishvas karna sikhaiye. Unhein applied siksha dijiye, unki aatma sakti jagrit kijiye, rojgar ke jariye bataiye, sarkar ke naye-naye pravdhan bataiye, aur bhi kai tarah se kar sakte hain. Bas jarusat he ichhasakti ke vikas karne ka naki sarkar mein dosh nikalne ka. Sarkar bhi koi doosra prani nahi he wah bhi hamare hi samaj ka hissa hua karta tha. Ye alag bat he ki aaj unka samaj alag ho gaya he. Aaj aapke hath me kal ka bhavishya he, unhein behtar banane ka prayas kijiye, kal ko wo bhi sarkar ho sakte hain. Jo ham kar sakte hain wo hamein karna chahiye na ki hamesha sarkar pe dosharopan prakshepan karte rahein. Is negative soch se logon mein sarkar ke prati aakrosh hi failega na ki unka uthhan hoga. Pls cultivate progressive attitude, it is the only way u can better deliver for the cause of humans emancipation.
    • Roma Swami ha! me too would like to ask sachi what was so bad in that program... after all the conversation i read , ii feel one should stop beating around the bush and come to straight terms. so hopein u will reply as to wat was bad in that program.....???
    • Shachinder Arya roma..सब पढ़ कर भी आप पूछ रहे हैं कि क्या गड़बड़ है..मुझे तो लगता है ऐसे आयोजन का ही कोई औचित्य नहीं है..देश कि हालत देखी है..और हम उन्हें cwg में सब सुविधाए देने के लिए मरे जा रहे हैं..जहाँ दो जून कि रोटी जुटाने में ज़िन्दगी खत्म हो जाती है वहां खेल गाँव में 6000/- की एक प्लेट..खैर पहले ही मै बहुत कुछ इस बारे में कह लिख चूका हूँ इसलिए और नहीं बाकि हमें आपकी समझदारी पे विश्वास है..जहाँ तक उस कार्यक्रम की बात है तो ३५० करोड़ खर्च कर दुनिया को मुर्ख बनाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए थी..
    • Roma Swami so mahashey app ko programm se nahi keval cwg se hi aapthti hai.
      vaise bhi cwg hote ya na hote hamare desh ki haalat waise hi rah ti . kaun sa paisa jo cwg mai laga hai desh ke vikas mai laga diya jata...
      paar kafi kuch dilli mai baadal gaya hai...we do need to invest in other sports kab tak cricket hi cricket rahe ga ....zaar batooo
    • Shachinder Arya ..आपत्ति उस समाहरोह से भी है कि जब सरकार को अपनी छवि चमकानी होती है तभी क्यों उसे अपनी so called संस्कृति याद आती है, वर्ना क्या करती है वह..और जहाँ तक बात दिल्ली के बदलने की है उस सन्दर्भ में जहाँ cwg हो रहे हैं सिर्फ वही दिल्ली नहीं है..
    • Abhishek Kumar Yaar tum har chij se pareshan ho.. In simple terms tum har cheez ko critisize hi karna chahte ho. Agar is desh mein tumhe kuch acha nahi lagta to pata nahi tum is desh mein kya kar rahe ho. 1 baat batao tumne is desh k liye kuch productive kiya hai yaa fir tumhara janm is desh ko critisize karne k liye hi hua hai. Lagta hai bhagwan ne tumhe galat jagah paida kiya hai.. Tumhe to afganistan mein paida hona chaiye tha. Bhai m serious you need a help may b of a gud psychiatrist or neurologist bcoz tum shayad chote level par hi sochte ho aur macro level tak tumhari soch nahi jati. Tumhari galti nahi hai shayad tum us koopmanduk (kuen ka medhak) ki tarah ho jo ki aane wale opportunities se vanchit hai. Jara bade level par bhi soch kar dekho humesha local hi nahi sochna chahiye. Shayad tum international relation jaise shabd se anjan ho. Aaj agar humari value hai to ye sab isi ki wajah se aaj hum har field mein chaye hue hai par shayad tumhe isse bhi pareshani ho. Tum jaise logo ne nuclear deal ka bhi virodh kiya tha shayad tum sabko calculation nahi karna aata jo ki hone wale fayde ko dekh sake. Shayad tum zindagi bhar dab k rehna chahte ho jo kabhi risk lena nahi chahta. Agar risk nahi loge to bada fayda nahi hoga. Is desh mein tum paida hue ho to kuch karo y r u expecting things frm govt. Only. Individual level par tumne kya kiya hai sirf desh ki burai karne se kuch nahi hota. Tumne shayad mere msgs ko thik se nahi padha shayad dhang se padhte to kuch samajh aa jata. Basics to main sudhar lunga par tumko K.G class se fir se padhai shuru karni chahiye so dat u can inculcate smthing gud abt our country also.
    • Anand Mishra Hamara desh jo kar raha he uski maulikta na tumhein samajh me aa rahi he aur na hi samajhne ki jarurat samajhte ho. Ek hathhi baalak ki tarah apne jid pe ere ho. Tum khud ko pragati ke raah me khare karo aur dusron ko bhi iski prerna do. Tum samaj me resentment faila ke unke bhavishya ko gumrah mat karo. Ek jimmedar insaan hone ke nate aap unke uthhan ke liye naye naye upay karne ki koshish jaroor kar sakte hain, apitu sarkar mein nusq nikalne se kuchh laabh nahi hoga. Jo aapke haq me he aur jo aap kar sakte hain wo jarur karein vyarth vichar Facebook par na likhein. Dont underestimate ur friend in the facebook list, all are not ignorant about the happenings instead r updated and mature enough to take subject on their own.
    • Shachinder Arya आनंद तुम अपना काम अभी से अच्छी तरह कर रहे हो..व्यस्था तो चाहती है उस पर सवाल न उठाये जाएँ..और तुम जिन योजनायो की बात कर रहे हो उनकी दुर्दशा खुद देख लो..'मनरेगा' से लेकर कोई भी योजना उठा लो उनमे क्या हो रहा है पता चल जायेगा..यहीं तुम जैसे लोग 'पीपली लाइव' तो देखते है पर समझने की कोशिश नहीं करते.. भैया दुनिया 'कुरुक्षेत्र','योजना' से भी कहीं आगे और भी हैं..जो हम कर सकते है वही कर रहे हैं ..और अगर ये सब तुम्हे भौकने जैसा लगता है तो तुम्हारी मनोदशा को समझा जा सकता है...confront the India u don’t want to see, and provokes to think in today’s world..not in lutyen's mindset..
    • Shachinder Arya अभिषेक..आलोचना हो रही है तो तुम सरकारी प्रवक्ताओ की तरह काहे बतिया रहे हो..सोचने समझने की शक्ति तो पहले ही न थी अब भाषा के स्तर से भी तुम गिरते जा रहे हो..हर field मे कितना छाए हुए हो सब दिख रहा है..'बड़ा फायदा' 'अवसर' 'गणना' की बात तुम कर रहे हो, तो मित्र मेरा गणित वैसे भी थोडा कमजोर है,जो अपने संसाधन गिरवी रख कर दूसरों की जेबें भरे..और ऐसा जोखिम जो अपने ही नागरिकों की जान पर बना दे वो भी नहीं..मै ऐसी कूपमंडूकता भी स्वीकार करता हूँ जो लोकल की बात करता है, ऐसा ग्लोबल क्या होना जिसे अपना देश ही ना दिखे..
    • Anand Mishra Pata nahi tumhein ander ki khabar kaise malum hote rehti he. kya tumne har jagah apna mukhbir fit kar rakha he ya kisi aur ka mukhbir tumhein samay-samay par Information Updation karate rahta he? Kya har dept. ke har programmes & policies ke ander ki jankari tum RTI act,2005 dayar karke hasil karte ho? Kya tumhein pata he ki tum kitni BAKVAS aur BETUKI batein karte ho. Sach bataun to ab tumpe aur tumhare ghatia soch pe taras aane laga he. I feel you r bored with ur life and you doesnt have any alternative except to put forth allegation after allegation on every aspect. This type of symptom usually happens to sr. citizens. Agar esa he to ham tumhare liye DUA ke alava kuchh nahi kar sakte hain. This time you need complete rest instead of CREATING UNREST.
    • Roma Swami come on lets all be tolerant.... towards one another......................... be gentlemen
    • Abhishek Kumar Tum choti baatein karte ho chalo tumhein kuch achi baat batate hain.. 
      1) indian forex 294.16 arab dollar hai.
      2) growth rate 9.7 % acc to IMF.
      3)chattisgarh mein 660 mw ka new ntpc khula hai.
      4) CWG 5 arab dollar ka fayda in agriculture n 25 lakh will
       get employment.
      5)DD channel ne 150% rate badha diya hai.
      6)India is growing world's fastest growth above china.

      Bhai agar tumhara yehi haal raha to tumhari biwi bohot maregi tumhein. Acha 1 baat batao ki tum isi k agent ho kya. Sarkar sabko satisfy nahi kar sakti uska jita jagta sabut tum khud ho.. par sarkar majority ko satisfy karti hai ye tumhe bata dun. Aur sirf mujhe ye bata ki tumko is desh se itna hi problem hai to ye desh chod do aur kisi dusre desh chale jao. Agar tumhein major festival se itni problem hai to tum sare 33 crore devi-devtao ko apne jivan ka 1-1 din de do bus. To main maan jaunga ki tum sare festival mana sakte ho. Agar 1-1 din nahi de sakte to sirf mujhe sabke naam likh kar dedo mai puja khud kar lunga. Aur agar itna nahi kar sakte to bakwas band karo. Mujhe lagta hai ki tumhare dimag mein dimak lag gaya hai.
    • Abhishek Kumar Tum sanyas le lo.. Tabhi tumhein santushti milegi. Kyn ki tumhe kuch pasand nahi.. Aghori mat bano insaan bano..

    आवाज़ें..

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