जनवरी 15, 2011

बीड़ी सुलगाता विमर्श


बात परसों की है जब हम दोनों मै मेरा भाई क़ुतुब मीनार जा रहे थे. कुछ घूमना था. कुछ बीते पुराने दोस्तों से मिलना था. बंगला साहिब से सात सौ पचीस में बैठे. बस लुटियन की दिल्ली होते हुए एम्स पहुँची..अब तक बस में सवारी नाम मात्र की थीं और कोई'विमर्श'नामक अवयव दिख नहीं पड़ रहा था कि एक सीनियर सिटिज़न टाइप व्यक्ति प्रकट हुए. बस हूँ हूँ करती चल पड़ी और उनके मुंह का इंजन भी सुलगने लगा..मतलब बंद खिड़कियों और सीएनजी गैस से चलने वाली दुनिया की सबसे बड़ी बस सेवा में एक बुज़ुर्ग जिगर से नहीं माचिस की तिल्ली से बीडी सुलगा फूंकने लगे.

अब जब इन्होने बीड़ी जला ही ली थी तो क्यों न मै भी अपने को जागरूक साबित करता इसलिए नाक में धुआं गया नहीं कि दिमाग ने चलना शुरू कर दिया और उनसे बोला.  बाबा अगर ऐसे ही पीते रहे तो वो दिन दूर नहीं जब तुम्हे भी एम्स जाना पड़ेगा. पता नहीं उन्होंने सुना नहीं या क्या था, बोले विशुद्ध भारतीय 'ऐं ..!!' . इस सांकेतिक भाषा को हम बहुत बारीकी से समझते थे इसलिए दोबारा विस्तारपूर्वक आग्रह को टाल न सके. फिर कहा 'बाबा अ ग र बी ड़ी पी ना न हीं छो ड़ा तो तु म्हे भी ए म्स की किसी ला इन में लग अ पने कैंसर पी ड़ित फे फड़ों का इलाज कर वा ना प ड़े गा ..!! '

लाबोलुआब ये कि इस हानिकारक चीज़ को जितना जल्दी हो सकें छोड़ दो नहीं तो जालिम दुनिया ही छोडनी पड़ जाएगी..इसकी ताकीद अड़ोस के एक और मुसाफिर ने भी की. इस पर उन होने कहा तिरसठ साल का मै हूँ और आज तक अस्पताल का मुंह नहीं देखा और थोड़ा मुझ पर झिड़के कि ऐसी बद्ददुआ टाइप भाषा में उनसे काहे बोल रहा हूँ.. आगे कुछ और बात होती उससे पहले ही पास बैठे व्यक्ति ने इसे - बातचीत को - हाईजैक कर लिया और यहीं से उनका प्रवचन शुरू हुआ है. जिसमे उन्होंने अपने अनुभव बाँट हमें भी अनुकंपित किया.

उनकी बतकही से पता चला कि ये भी पहले तम्बाखू सेवन करते थे पर कई बार छोड़ बारबार तंबाखू इन्हें पकड़ लेता पर अंततः इनकी अन्तःप्रेरणा आत्मशक्ति ने इन्हें उससे मुक्ति दिला ही दी और एक छोटे बालक की तरह अपने उस पिता तुल्य बुड्ढ़े को भी इससे दूर रहने क़ी सलाह दी. पर इसी दरमयान उन बुज़ुर्गवार ने कहा दारू तो छोड़ दी पर ये साली आदत नहीं छुटती - ये पारिभाषिक शब्दावली उनकी ही है कोई स्त्री विमर्श चेतस व्यक्ति राशन पानी लेकर मुझ निरीह प्राणी पर ना चढ़ बैठे.

इस पर उन तम्बाकू छोड़ चुके स्वस्थ व्यक्ति ने तुरंत अपनी आपत्ति दर्ज़ कराई और कहा पितृदेव आप ये तो बिलकुल ही गलत कह रहें हैं, इस नशीले पेय से उत्तम कोई औषधि नहीं है नहीं इससे पेट से कब्जियत दूर रहती है, नींद अच्छी आती है, नजला जुखाम भी पास फटकने नहीं पाता..इतनी गुणकारी वस्तु के प्रति ये द्वेष विद्वेष रखना उचित नहीं. सरकार कोई मुर्ख नहीं जो इतना प्रोत्साहन दे रही है और टैक्स भी तो तगड़ा मिल रहा है..आगे की कहानी में जोड़ते हुए बाबा जी उवाचे कि ये साली दारू तो अंग्रेजों की साजिश थी बाँटो और राज करो की नीति हमें आपस में लड़ाने की चाल..हम तो दूध मक्खन खाने वाले देश के लोग थे.

आगे का सूत्र जोड़ते हुए स्वस्थ व्यक्ति ने आईआईटी के किसी भूतपूर्व निदेशक की कहानी कह डाली जिसमे उनका नाम स्वामीनाथन या रंगनाथन था और उनकी एक विशेषता थी की वे घर से ही उबला हुआ पानी लाते थे बाहर किसी दूसरे के हाथों से बना खाना तक नहीं छूते थे न बीड़ी न सिगरट न शराब को हाथ लगाना..अर्थात स्पर्श नामक इन्द्री का वे कम से कम उपयोग करते थे. अधिकांशतः सदुपयोग ही देखा गया पर बदी का खेल देखो क्या लिखा था बेचारे, उनको ब्लड कैंसर हो गया पता नहीं कैसे??..हर महीने दो महीने में खून चढ़ाया जाता पर आखिर में बचे नहीं..

इस पूरे उपक्रम में कैंसर को इन सभी पदार्थों से तदर्थ दूरी पर रखा गया और उन्हें गुणित नहीं किया गया..मतलब उनकी भूमिका को पूर्णतः अपदस्थ कर दिया गया कैंसर से जो प्रतिवर्ष मर रहे हैं, दूरदर्शन पर विवेक का पूरा कैम्पेन धराशाही और इतिहास का स्थानीय संस्करण अफवाहों के कैसे रूप ले लेता है कैसे नियतिवादी होना ही आपकी नियति है इसको स्थापित कर दिया गया है.यहाँ एक बात और रेखांकित करने वाली है जिसे सांस्कृतिक अभिजिती कहा जाता है.

कैसे अपवादों के ज़रिये बात को अपनी तरफ करने का एक खेल खेला जाता है. समाजशास्त्री तो अपनी खोपड़ी के बाल तक न छोड़ें.. इतिहास बोध की तो पूछो मत उन्हें शायद सूरा से लेकर जहाँगीर के ब्रांडी के प्रति मोह का पता ही नहीं, चाणक्य अपने अर्थशास्त्र में मधु के सेवन का निषेध करते हैं और यहाँ का कोलाहल कैसे अपभ्रंश होता होता पश्चिम का अल्कोहल बन गया इसके लिए मॉर्फोलॉजी से लेकर भोलानाथ तिवारी की भाषाविज्ञान पढ़ानी पड़ेगी. इसके सिर्फ शैक्षिक सन्दर्भ ही नहीं हैं यहाँ सांस्कृतिक भाषिक ऐतिहासिक सन्दर्भों को बारीकी से टटोल कर समझने की ज़रूरत है. 'क्यों' का जवाब मैं नहीं देना चाहता..

जनवरी 14, 2011

लापतागंज पर छोटी सी टीप

लापतागंज में कुछ गुम गुम

इससे पहले कई बार मैं एक्शन रिप्ले के उस गाने पर अटका जिसमे किसी की शादी पर जाने के बाद उसे ही शादी न करने की नसीहत देने का नृत्यात्मक आग्रह था. शादी वहां फांसी के फंदे से लेकर मुसीबतों का मजनूं टीला जान पड़ता है. पर मुझे उसमे इस विवाह संस्था के उदगम प्रस्थान के किंचित ही अवशेष दिखाई पड़ते हैं, जिनमे एक बार फिर गुंजाईश है कि कोई शोधकर्ता एंगेल्स  से आगे बढ़ कर निजी संपत्ति परिवार श्रम विभाजन की गुत्थी के देसी वर्ज़न को सामने ला पाता..आश्चर्य है अभी तक किसी की नज़र नहीं पड़ी..

खैर ये जब होगा तब होगा अभी इधर किसी इतवार हिन्दुस्तान  में अलोक पुराणिक की टिपण्णी पढ़ी जिसमे शरद जोशी  के नाम का फर्जी उपयोग करने पर सब टीवी को फटकार तो थी ही साथ ही साथ एक एक पात्र गिना कर ये डंके की चोट पर कहने की अच्छी भली कोशिश थी, जिसका की जैसा असर पड़ना चाहिए था वैसा ही पड़ा मतलब ये छोटा सा लेख छपा और लिफाफा बनने के बाद पंसारी की दुकान पर पहुँच  भी गया.

इधर जबसे यह धारावाहिक शुरू हुआ है - २६ अक्तूबर २००९ से - तब कभी कभी हाज़री लगा लेते थे पर कभी लगातार फॉलो नहीं किया..कभी जब खाना खाने में देर हुई और घड़ी के कांटें ने दस बजाये तो देख लिया नहीं तो हम रुकते नहीं है.  परसों रात कल रात भी थोड़ी देर हो गयी ज़रा एक तरफ बीसीसीआई की टीम रनों के लिए जूझ रही थी तभी हम चैनलों की उछल कूद में इस चैनल पर आते. कहानी में गुड्डू की शादी की बात चल रही थी और मुकुन्दी की इंदुमती और लापतागंज की मिसरी मौसी, बीजी के जिगरी लंगोटिया को हल्दी उपटन लगा रस्मो रिवाजों को गाने के साथ बजा गा रहीं थीं. पुरुष अपने स्वभावोचित, स्त्रियों को ऐसा करते देख, और फब्तियां टाइप कुछ ढिला, कुछ कस रहे थे.

ऐन इसी वक़्त पीले होते गुड्डू के ससुर आ पहुचते हैं. वे पहले कुछ लाल पीले होते हैं फिर बेटी के ब्याह के बाद बिदाई न करने की बात कहते हैं और गुड्डू के सामने घरजमाई बनने का प्रस्ताव रहते हैं. पहले तो एक स्वर  में यह प्रस्ताव अल्पमत के चलते गिर जाता है पर एक-एक कर जब इस घरजमाई के बनने की स्थिति और उपरांत लाभों पर गौर किया जाता है तब सभी राजी हो जाते हैं.  एक पुरुष चरित्र की अपने मयके लापतागंज से बिदाई और ससुराल जाकर रहना किन्ही नए नए बने बरसाती मेंढकों की बिरादरी के नारीवादी चिंतकों को यहाँ मूक क्रांति होती नज़र आ रही होगी. पर यहाँ नुक्ता है..नुक्ता नंबर एक इसका चितकबरा फैमिनिज्म छौंक बघार..

मतलब ये कि गुड्डू के स्वसुराल में सिर्फ उसके स्वसुर हैं और उनकी ब्याहता पत्नी, माने सिर्फ दो परानी.कोई साली कोई साला कोई सरहज कोई साढू, गुड्डू के नहीं हो सकते माने इस एकलौती बालिका संतान के कोई और संतति नहीं. माने पुत्रेष्णा से ग्रसित भारतीय मनोवृति का एक और प्रतिनिधि जिसको पने जाने के बाद स्वयं अर्जित संपत्ति का वारिस चाहिए, कोई उत्तराधिकारी तो हो..यह उसी मानसिकता प्रतिरुपण है कोई अलग नारीवादी व्याख्या नहीं, बस लेबलिंग बदल दी गयी है..

और इसकी भी कम ही सम्भावना है की गुड्डू का भी विशुद्ध भारतीय बहुओं की तरह दैहिक मानसिक शोषण आर्थिक होगा..क्यूंकि लापतागंज वालों को इसी स्थिति में गुड्डे के नकारेपन और बिजी पाण्डेय के फुलटाइमर एसिस्टेंट की इन्टर्न से मुक्ति भी मिल जायगे और जब बिना पढ़े स्वसुर दुकान कराए दे रहे हैं तब आगे की कैसी चिंता..तो गुरु को छोड़ ये महाशय अपने ससुराल जाने की तय्यारी करें और अपने मयके समय समय पर आते जाते रहें..

इसी चैनल पर मिसिज़ तेंदुलकर  नाम से जनवरी के आखिर में एक और धारावाहिक शुरू होने जा रहा है जिसमें स्त्रैण माने जाने वाले सारे काम पत्नी के पतिदेव करते दिखाई देते हैं..शाहरुख़ के दिलवाले दुल्हनिया ले जायेंगे  के बाद से जो ट्रेंड बदला है उसकी अलग व्याख्याएँ हैं जिस पर किसी अलग पोस्ट में. अभी तो इसके प्रोमो देख कर तो इसका इंतज़ार रहेगा जिसमे कौन से तर्क होंगे जिसके तहत एक स्त्री पुरुष को घर बैठने के लिए तैयार करेगी, हालाँकि स्थिति मज़ाकिया ही होगी पर ध्यान देने वाली बात ये है कि इधर एक ट्रेंड बन रहा है जिसमें पुरुष नामक प्रतिमा के कुछ दरकने कुछ और टूटने की संकेत तो है ही आवाजें भी सुनाई दे रहीं हैं.. भले स्वर कुछ मद्धम है पर इसे नाकारा नहीं जा सकता..

फिल्म ब्रेक के बाद  का वह सीन याद है जिसमें में पुरुष मित्र का अपनी स्त्री मित्र के अन्तः वस्त्रों को उठा कर रखता है..इन कपड़ों का स्त्रैण यौनिकता  को लेकर अपना पृथक इतिहास है, जिसने स्त्री पुरुष दोनों को समान रूप से प्रभावित किया, इस पर भी आज नहीं..थोड़ा और पढ़ना समझना होगा..

जनवरी 12, 2011

क्या आप भी ऐसे दर्शक हैं ..???

फिल्म नो वन किल्ड जेसिका एक हद तक एनडीटीवी ही नहीं पूरे मीडिया का डैमेज कंट्रोल ही है, पहला हाफ अच्छी भली कहानी कहता है तो इंटरमिशन के बाद कहानी 'रण' बन जाती है और पूरी फिल्म पब्लिक की जेब काटती जेबकतरी..'रेड अलर्ट' के बाद ये दूसरी-तीसरी फिल्म है जो कई और कहानियों को छुपा बित्ता भर दिखा कर उसे सच कहतीं हैं .
शुरुआत हुई यहाँ से,फेसबुक अकाउंट पर अपने दिमाग की ताज़ातरीन खुराफात लिखने से, सोमवार रात करीब दस बजे..वैसे मेरा स्टेटस टीपों से उसी तरह कुपोषित रहता है जैसे इस ब्लॉग को अब तक न कोई पूर्णकालिक टिप्पणीकार मिल पाया है न ही कोई सहृदय पाठक ही, खैर उस दिन पहला कमेन्ट आया राजकुमार राय की तरफ से, इसके बाद गौरव ने संदेसे भेजने शुरू कर दिए. जिनको उसी क्रम में फिर लिख रहा हूँ..मेरे मित्र वाले संदेसे इटैलिक  में हैं. मुलाहिजा फार्मइये :
         राजकुमार राय : कितनी अच्छी मूवी है बेवकूफ़. मेरी तो कई बार आँखे भर गई .
गौरव : जेसिका एक सोते हुए दर्शक को जागने वाली मूवी है .
शचीन्द्र :  सोता हुआ दर्शक इस सत्य से वाकिफ नहीं है कि एनडीटीवी और उस पूरे मीडिया की राडिया कांड में भूमिका संदिग्ध है तिस पर तुर्रा ये की राडिया कांड में सारी पत्रकार बिरादरी की छवि ध्वस्त कर दी है, उसपे पैबंद लगाती ये कुछ फिल्म नहीं कर सकती..तुम क्या इतना भी नहीं जानते, इतने अनभिज्ञ तो न बनो..
गौरव : आप फिल्म को फिल्म रहने दो दोस्त, एक अच्छा कांसेप्ट है और अच्छा डायरेकशन .
शचीन्द्र : फिल्म सिर्फ फिल्म नहीं होती जनाब..यही तो हमें आपको समझना है उस एजेंडा प्रोपगंडा पर भी नज़र रखना हमारी ही ज़िम्मेदारी है..क्यों..??
गौरव : आप की आप जानें, पर नंबर वन..इयर की अच्छी शुरुआत है .
शचीन्द्र :तुम्हारी भी तुम जानो..पर लगता है फिल्म अपना कम कर गयी, तभी तुम्हे सच नहीं दिख रहा..!!
गौरव : सच ही तो दिखा रही है फिल्म.शायद आप इस फिल्म को निगेटिव में देखते हो और मैं पसिटिव.
अब कौन प्लस है कौन मायनस इस प्रमेय में नहीं फँसना चाहता..एक की आंखे भर आई तो दूसरा बिना दिमाग खर्च किये फ़िल्म को सिर्फ फ़िल्म मानकर देखने को कह रहा था, दिल्ली विश्व विद्यालय से उसका पड़ना इसी से साबित होता है कि वह बचत के सिद्धांत पर केन्द्रित हो कर एक ही तरफ देख रहे हैं,बिना कुछ सोचे समझे..क्या आप भी इसी विश्वविद्यालय की पैदाइश है या यहीं आपको विवेकानंद की मूर्ति की छावं में पले बढ़ें हैं ..गौरव तुमसे तो आगे भी और बात करनी है कि मीडिया आप्शन लेने के बाद भी समझ क्यों नहीं बन पाई, विश्लेषण संश्लेषण  कहाँ कूंच कर गए, जब तुम पर फ़िल्म ने ये प्रभाव डाला है तो उस की क्या कहूँ जो सत्या, रोज़ा, बॉम्बे, सरफ़रोश, रेड अलर्ट, रक्त चरित्र  जैसी सभी फिल्मों को बस देखता है और सब धान ढाई पसेरी तौल वापस चल आता है कुछ छवियाँ कुछ दृश्य और बहुत सारा ऐसा माल जिसने उसके चेतन अवचेतन को ढक लिया है..क्या आप भी ऐसे दर्शक हैं ..???

जनवरी 10, 2011

कल करीब रात की उलझन

कल रात कुछ कलम से लिखने की कोशिश कई महीनों बाद हुई थी तो सोचा उसे साझा कर लूँ ..थोड़ा सावधानी से पढ़ने की कोशिश करनी पड़ेगी, इसलिए ज़रा खेद है..

आज बहुत दिनों बाद कागज़ पर वापस आया हूँ पता नहीं क्यूँ चाहकर भी पीछे लिखना अपनी पुरानी बिमारियों के चलते नहीं हो पाया. हाँ, एक झंडू सा ब्लॉग बना अपने को इन्टरनेट पर छपास छपासी संपन्न लेखक करार दे चुका हूँ. मतलब डिजिटल सायबर स्पेस में एक और लिक्खाड़. जिन्हें कोई प्रिंट में नहीं जनता वे उगलने निगलने जा पहुंचे.

सारी गड़बड़ अपने को साबित कर लेने की है. उस अस्तित्व को दूसरे के सामने लाने की है. कि कैसे आप भी उन करोड़ों लाखों से अलग अपने को खड़ा कर पाने की है. वजूद सिर्फ सांस लेने और फेसबुक की वॉल पर अपनी भड़ास निकालने से आगे का है. क्या हममे वे क्षमताएं- योग्यताएं- गट्स नहीं है कि हम भी एक 'कल्ट' बन सकें??

पूरी प्रक्रिया कुछ ऐसी गड्ड-मड्ड है जिसे समझना आसन नहीं!! कौन सी कसौटियों पर हम खरे नहीं उतरे हमें पता होना चाहिए..

पिछला पूरा साल बस एक सपना लिए डोलते रहे..पर वहां से निकल उस दुपहरी में कदम दरियागंज गोलचा तो पहुंचे पर कभी-कभी लगता है ऐसा नहीं बोलना चाहिए था..ऐसा बोल अपने को बहुत पीछे ले आया..दोनों जगह बोला और कुछ ऐसा बोला कि दोनों तैयार नहीं थे..वहीँ कुछ ऐसा था कि गले में पट्टा नहीं बंध पाया.

इसी विश्लेषण पर न मालूम कितनी रातें रतजगे में ही चलीं गईं. आज भी उसकी कही ये बात कान के इर्दगिर्द घूमती रहती है कि उसने मेरी सीट ले ली. नुक्ता ये भी फेंका गया कि जो डिज़र्व करेगा उसी का तो एडमिशन होगा न..कहने का मतलब तो ये भी था कि हेकड़ी निकल गयी न सारी!! सब समझ कर भी नासमझ बना रहा, क्या बोलता, अभी तक चुप हूं जवाब ढूंढ रहा हूं..

बातें तो बहुत सारी लिखना चाहता हूं पर इधर एक कहानी पे काम कर रहा हूं जिसमे कथा नायक ऐसी जगह फंसा है जहाँ दूसरी तरफ से आये एक एसएमएस से उसकी औकात जैसा कुछ बताने की कोशिश की जा रही है. मतलब नायिका ने अपना मोबाइल नंबर तो नहीं बदला पर इतने महीने बाद नायक की तरफ से गए जन्मदिन मुबारक के जवाब में उसने पूछा, 'हू इज दिस '..!!

यह तो कहानी की एक स्थिति भर है जिसकी शुरुवात वहां से होती है जहाँ इन दोनों पक्षों में बात नगण्य स्तर पर है बस नायिका उसको देखती निहारती भर है. उसकी भावभंगिमा चेष्ठएं निकट आने का उपक्रम यह सब नायक के चेतन अवचेतन पर चलता है. इन सारी संभावनाओ की पुष्टि उससे बात करके ही हो सकती है जिसकी दोनों तरफ से कोई कोशिश नहीं है.

वहीँ नायक के अंतर्मुख में एक पिछला पन्ना भी है जिसमे ग्रेजुएशन में की गयी कोर्ट मैरिज उसकी पत्नी लिखते हुए अजीब लग रहा है. पर हाँ उसकी पत्नी का होली फैमली में दो महीने के गर्भ का अबोर्शन और उसी रात घर जाते समय उसका अपहरण-बलात्कार के बाद उसकी हत्या. यह सब आज तक किसी को नहीं पता, न ही बता दोबारा उस प्रताड़ना को जीना चाहता है. इस से निकलने की कोशिश में वह किसी हांडमांस के साथी की प्रतीक्षा कर रहा है, और जिसके फलस्वरूप वह इसी नायिका की तरफ झुकाव महसूस करता है.

ये तो हुए ये दोनों. पर मुझे तो पता है कि नायिका का आकर्षण उसके नाम के पीछे छिपी छवि के तहत उसके बंगाली पृष्ठभूमि के प्रति है, चूँकि उसकी माँ भी वहीँ से हैं इसलिए उसके ह्रदय मस्तिष्क में वहां के प्रति राग स्वाभाविक ही है. और चूँकि नायक अपने में अंतर्मुखी है, एक केंद्र वहां भी काम कर रहा है. सब कुछ ढका ढका सा है उसे देखने की एक अदद कोशिश भी है..यही सब है जिसे शब्दों में बांधने की कोशिश कर रह हूं इधर..

कभी कभी यह नायक भी मेरी तरह सोचता है "काश, जो कुछ हमने जिया है वह सिर्फ ज़िन्दगी का रफ ड्राफ्ट होता और इसे फेयर करने का एक अवसर हमें और मिलता!" {'मुड़ मुड़ के देखता हूँ..'के फ़्लेप से चोरी } आज पता नहीं क्यों पुराने दिन सर पे चढ़ गए हैं. ज़िन्दगी पेपर क्लिप की तरह उसी साल में जैसे अटक गयी है जहाँ हम दोनों न जाने कितनी देर बात करने का इंतज़ार करते थे..कह क्यों नहीं पाया. आज तक उसी दिन को याद करता हूँ जब उस न्यू ब्लाक में हम दोनों सीढ़ियों पर बैठे क्लास का इंतज़ार कर रहे थे. कोई नहीं था, सिवाय हम दोनों के.. बस उस दिन के बाद मै दिल्ली और तुम पता नहीं कहाँ..पर हमें मालूम है ज़िन्दगी रफ हो या फेयर, ज़िन्दगी वही होती है, जो है..

कहानी अच्छी है न..??..मुझे पता था अच्छी ही होगी..पर लिखने के बाद मुझे लगता है क्या ये सिर्फ कहानी भर है..!! 

जनवरी 04, 2011

सिनेमा का शैक्षिक सन्दर्भ

१९२६ में महात्मा गाँधी ने 'यंग इंडिया' में सिनेमा की आलोचना करते हुए लिखा था- " इसका बुरा प्रभाव प्रतिदिन मेरे ऊपर पड़ता है. " १९३५ में प्रेमचंद 'हंस'में लिखते हैं -" सिनेमा अगर हमारे जीवन को स्वस्थ आनंद नहीं दे पाता है, हममें निर्ल्ज्जत्ता और धूर्तता और कुरुचि को बढ़ाता है, और पशुता की और ले जाता है ,तो जितनी जल्दी उसका निशान मिट जाये, उतना अच्छा." वृन्दावन लाल वर्मा ने भी कभी लिखा था ,सिनेमा को काली मैया उठा ले जाएँ. वास्तव में यदि कोसने से ही बुराइयों का अंत होना होता तो अब तक हम लोग रामराज्य में रह रहे होते.किसी भी बुरे की उपेक्षा कर उसे समाप्त नहीं किया जा सकता समाप्त करने के लिए कोशिश करनी पड़ती है. १९६५ में वृन्दावन लाल वर्मा ने भी इसे महसूस करते हुए लिखा था,'फिल्म का प्रभाव दर्शक - श्रोता पर बहुत शीघ्र और गहरा पड़ता है. गन्दी फिल्मों की बहुतायत है, जो समाज को पतन की और ले जा रही है. अपनी संस्तुति की रक्षा और देश के ऊँचे आदर्शों को बचाने, ऊपर लाने की बड़ी आवश्कता है. लेकिन चिंता की बात है की क्या इतने प्रभाव को सकारातम बनाए के लिए कोई सक्रिय प्रयास किये गए ???  सिनेमा संस्तुति के लिए यह किसी विडम्बना से कम नहीं कि लगभग ४० वर्षों बाद भी वर्मा जी के सवाल प्रासंगिक हैं.

१८९६ में यूरोप में लुमियर बंधुओं द्वारा किये गए सिनेमा के प्रथम प्रदर्शन के कुछेक महीनों बाद ही सिनेमा भारत में भी देखा जा सका था. १८९७ में यहाँ प्रायोगिक स्टार पर फिल्म बनाए कि शुरुवात भी हो गयी थी.१९१३ में दादा साहेब फाल्के ने यहाँ अपनी फीचर फिल्म 'राजा हरीशचन्द्र' पूरी की और आज लगगभ ८०० फ़िल्में प्रति वर्ष निर्मित कर हम दुनियाभर में शीर्ष पर हैं.तमाम नाराजगियों उपेक्षाओं अवहेलनाओं के बावजूद भारत में सिनेमा का इस स्थिति में पहुँच पाना निश्चित ही इस माध्यम की ताकत का एहसास करने के लिए काफी है.

सिनेमा की ताकत का सबसे बड़ा कारन सरफ यही नहीं है की हम चीजों को घटनाओं को वैसे ही देखते हैं,जैसा वह है या हुआ है. बल्कि मानसिक रूप से हम भी घटनाओं के अन्दर होते हैं.वास्तव में किसी भी दृश्य के केंद्र में दर्शकों के आँख और कान के साथ दिमाग की भी सहभागिता ज़रूरी होती है.सिमेना की यह विशेषता है की यह जितनी सामने  दिखती है उतनी ही हमारे दिमाग में भी बनती है.किसी कलाकार को पहाड़ पर चढ़ाई पार करते हुए देखते हैं.पहाड़ पर चढ़ते आँखों से देखते हैं, कानों से उसके पैरों की आवाज़,कीलें गाड़ने की आवाज़,आसपास के वातावरण जंगल झरने वगैरह की धवनी भी सुनते हैं. सारा कुछ वास्तविक, लेकिन वास्तविक समय का सिर्फ हमें अहसास कराया जाता है. सात दिन के वास्तविक समय में पूरी होने वाली चढ़ाई को सिर्फ सात शौटों में सात मिनट से भी कम समय में दिखा दिया जाता है. बाकि की कमी हमारा दिमाग पूरी करता है. वास्तव में कलाकार को पहाड़ी चढ़ते सिर्फ हम देखते ही नहीं ,उसके साथ होते हैं ,मानसिक तौर पर. अस्च्रय नहीं की लुए बुनेवेल ने माना था सिनेमा हमारे दिमाग पर अफीम - सा असर करता है.

जे. पी. दत्ता  की ' एलओसी-कारगिल ' वैचारिक स्तर पर बहुत परिपक्व नहीं रहते हुए भी तकनिकी कुशलता के लिए देखी जानी चाहिए. फिल्म में हमेशा ही दर्शक सबसे उचित जघह पर होता है , जहाँ से पुरे दृश्य में उसकी भागीदारी हो सके, अधिक से अधिक वह देख सके अधिक से अधिक वह सुन सके. एक और कारगिल की विकत परिस्थितियों को दिखने के लिए एरियल शोट का  इस्तेमाल किया जाताहै तो दूसरी और सैनिकों के पीछे कैमरा हाथ में लेकर दौड़ा भी जाता है ताकि अनगढ़ पहाड़ियों का 'जर्क' दर्शक भी महसूस कर सकें. कैमरे की कुशलता इसी से आंकी जाती है कि किस हद ताक वह दर्शक की आंख बन सका है.

मानसिक रूप से अपने आप को दृश्यों के अन्दर महसूस करवा लेने की क्षमता ही है जो सिनेमा को इस कदर संप्रेष्य बनाती है की करोड़ों लोग बिना किसी फिलिमी भाषा और तकनीक की समझ के टिकट खरीदते हैं, फिल्म देखते हैं और अपनी ज़रुरत के अनुसार उसे समझते - स्वीकार करते है. साहित्य या कला को यह सुविधा उपलब्ध नहीं है, साहित्य या कला का रसास्वादन हम तब तक नहीं कर सकते जब तक कि उसके व्याकरण की मोती समझ भी न हो. सिनेमा ने अपने लिए ऐसी स्वाभाविक भाषा का चुनाव किया है जो सामान्य मनुष्य की मात्र आभासी क्षमता के सिद्धांत पर आधारित होती है.

वास्तव में भारतीय संस्कृति ने जब सिनेमा को नाजुक मन बच्चों और किशोरों के लिए त्याज्य माना था तो उसकी वजह सिर्फ यह नहीं की उस समय तथाकथित 'गन्दी फिल्मों' की बहुतायत थी ,उसकी सही वजह तत्कालीन भारतीय समाज की यह प्रोढ़ और वाजिब समझ थी कि सिनेमा कहीं न कहीं हमारे सोचने समझने और कल्पना करने की क्षमता को क्षीण करती है. उन्हें आभास था कि 'कृष' की उड़ान बचों के मस्तिष्क को इस कदर कुंद बना सकता है की वे अन्धानुकरण में चाट से छलांग लगा सकते हैं जबकि उनका 'स्वतंत्र' मस्तिष्क 'कृष' से भी ऊँची उड़ान भर सकता है .वास्तव में हमारे मन में कोई कल्पना आकर लेती तो हम उस कलोअना को साकार करने की कोशिश करने की कोशिश के पूर्व उसे तर्क पर कसते हैं, जबकि सामने साकार दिखते 'सत्य' को देख हमें तर्क करने की ज़रोरत ही महसूस नहीं होती.

हममें से कितने लोग होंगे, जिन्होंने सिनेमा देखने के लिए कभी न कभी डांट न सुनी हो, तमाम विरोधों के के बावजूद यह स्वीकार करने में कटाई ऐतराज़ नहीं हो सकता कि सिनेमा आम जन के मनोरंजन का सबसे सशक्त और प्रभावशाली माध्यम है.भारत में ही नहीं, दुनियाभर में - पकिस्तान, ईरान, श्रीलंका से लेकर इंग्लैंड, अमरीका, जापान तक. मोरक्वेज़  को अपनी क्रांतिकारी विचार धरा के के प्रसार के लिए भी सिनेमा विधा आकर्षित करती है, तो डेविड धवन को अपनी मूर्खताओं से दर्शकों को खुश कर पैसे ऐंठने के लिए भी सिनेमा ही चाहिए.स्थिति आज यहाँ तक पहुँच चुकी है की सिनेमा हमारे घर के अन्दर प्रवेश कर चुका है. हम इसे देखें या नहीं, यह भी अब हमारी इच्छा पर निर्भर नहीं करता है. न्यूज़ चैनल पर भी सिनेमा के लिए अलग स्लोट है, मनोरंजन चैनल पर भी और खास तौर से सिनेमा के लिए भी तो दर्ज़नों चैनल हैं ही.क्या बालो में सर गाढ़कर तूफ़ान को रोका जा सकता है ??

आज टेलिविज़न के विस्तार ने पुरे भारत को आच्छादित कर रखा है. मुंबई के बंदर से लेकर बस्तर की बस्तियों तक दुनिया को उँगलियों के इशारे पर नचाने वाली डिश एंटीना की छतरी देखी जा सकती है.तेलिवाज़ों के साथ भी सिनेमा की संस्कृति हम तक पहुँच रही है.सिनेमा की संस्कृति अब सिर्फ कपडे के फैशों और बालों के सत्यल को प्रभावित नहीं कर रही है बल्कि अब इसने सामाजिक मूलियों को भी प्रभावित करने की ताकत हासिल कर ली है. सामाजिक समस्याओं को सिनेमा ने अपने लगातार प्रभाव से इतना तरल बना दिया है की हिंसा, अपराध, व्यभिचार, बलात्कार अब सब कुछ भी हमें बेचैन नहीं कर पाता.

सिनेमा के इस प्रभाव को समझते हुए पश्चिमी देशों में ५० के दशक से ही फिल्म अध्ययन पर गंभीरता से विचार करना शुरू कर दिया था. शिक्षाशास्त्रियों और मनोवैज्ञानिकों के लिए वहाँ पर चिंता का विषय था कि बच्चे जितना समय स्कूल में व्यतीत करते हैं उससे कहीं अधिक टेलीविज़न के सामने. अपने अध्ययन में उन्होंने पाया कि दो वर्ष की उम्र से ही जब बच्चे मातृभाषा सिखने की शुरुआत करते हैं उसी समय टेलिविज़न और फिल्म जैसे दृश्य श्रव्य मद्यमों से भी सन्देश ग्रहण करना शुरू कर देते हैं.दो तीन साल के बच्चे का कार्टून नेटवर्क के आगे शांत पड़े रहना कोई संयोग नहीं, बल्कि हमें यह स्वीकार करना चाहिए की बाकायदा उसे देख रहा होता है, महसूस कर रहा होता है.

सिनेमा आज हमारी जीवन शैली में शामिल हो चुका है.खाना खाना, ऑफिस जाना, स्कूल जाने की तरह सिनेमा को भी हमने अपनी अनिवार्यता में शामिल कर लिया है.हमें याद है कॉलेज जाने के बाद भी फिल्म पत्रिकाएं हमने अभिभावकों से छिपकर पढ़ीं थीं. फिल्म देखने की बाकायदा अभिभावकों से इज़ाज़त ली जाती थी, वह भी दो - चार महीने में एक बार. यह इजाजत भी ' जय हनुमान ' या ' हिन्दुस्तान की कसम ' देखने के लिए ही मिलती थी. आज आश्चर्य है की फिल्म देखना कोई विषय ही नहीं रहा भारतीय समाज के लिए. यहाँ तक कि व्यस्क प्रमाण पात्र वाली भी फ़िल्में देखने के लिए बच्चों को ले जाते हुए हमें छोटी सी हिचक भी नहीं होती. फिल्म देखते हुए बच्चे ' कमीने ' का मतलब पुंचते हैं और हम मुस्कराते हैं.

तथाकथित आधुनिक होते भारतीय समाज की यह विडम्बना ही है कि यह निरंतर सिमटता जा रहा है. वास्तविक परिवार और समाज से होती दूरी को ' वर्चुअल ' समाज से पाटने की उसके पास मजबूरी होती है. क्योंकि समाज तो चाहिए ही. इस चाहिए के लिए विकल्प उसे सिनेमा से मिला. इस ' वर्चुअल ' समाज की खासियत थी, यह उसकी मांग पर उपलब्ध था. जब भी अकेलापन महसूस हो, चलो सिनेमा.एक सुखद भरे - पूरे वातावरण से संतुष्ट लौटकर फिर लग गए अकेले अपने रोज के जद्दोजेहद  में. शायद इसी लिए सिनेमा देखना जो पहले साल - छः महीने का उत्सव होता था, अब हफ्ते का शगल बन गया.यह भी गौरतलब है कि गाँव, क़स्बा, शहर, नगर, महानगर में जैसे-जैसे पारिवारिक इकाईयां छोटी होती गयीं इस शगल की सघनता भी बढती गयी.यह भी उल्लेखनीय है की इस शगल ने सबसे ज़यादा बच्चों को प्रभावित किया, कियोंकि एकल परिवारों में सबसे अकेले वही थे. आश्चर्य नहीं कि एकल परिवारों के सिनेम अदेखने का निर्णय धीरे धीरे बच्चों के हाथों में सिमटता चला गया. उन्हें मतलब सिनेमा से नहीं , बस सिनेमा घर के मेले और सिनेमा के परदे पर सुलभ 'वर्चुअल' दुनिया से था. और अभिभावकों के लिए उन्हें सिनेमा ले जन वास्तव में कहीं न कहीं स्वयं अपने भरे-पूरे समाज से काटने की एक क्षतिपूर्ति थी.लेकिन 'क्षतिपूर्ति' वास्तव में किस तरह उनकी समझ को अपनी दुनिया के प्रति जड़ बना रही थी, इस पर गौर करने की ज़रूरत नहीं समझी.

आज इस स्थिति में जब सिब सिनेमा के प्रभाव को रोका नहीं जा सकता, क्या बेहतर यह नहीं की लोगों को सिनेमा देखने के से रोकने के बजे उसे सिनेमा देखना सिखाएं. सिखाने का अर्थ है बाकायदा फिल्म अध्ययन. आखिरकार अध्ययन का उद्देश्य क्या है ! कोई भी विषय साहित्य हो विज्ञानं हो कला हो य तकनीक हो हम क्यों पढ़तें हैं! वास्तव में विधिवत अध्ययन का उद्देश्य दिमाग को ऐसे साधनों से लैस किया जाना है की वे ज्ञान की गूढ़ दुनिया को समझ सकें. क्योंकि किसी भी विषय को एक व्यक्ति अपनी समझ से एक सीम तकही समझ सकता है. सिनेमा तो कला की सबसे 'काम्प्लेक्स' विधा है, इसमे साहित्य भी है, कला भी, विज्ञान भी, तकनीक भी. सिनेमा पर हरेक दृष्टिकोण से विचार करने की, अध्ययन की ज़रुरत है. एक कल अमध्यम के रूप में, सम्प्रेषण के एक सशक्त दृश्य श्रव्य माध्यम के रूप में, एक लोकप्रिय जन मनोरंजन के रूप में, सूचनाएं और सामाजिक मूल्य बोध को संचारित करने वाले साधन के रूप में, सांस्कृतिक वातावरण का निर्माण करने वाके एक अभिकरण के रूप में हरेक परिप्रेक्ष्य सिनेमा पर विस्तार से विचार करने की अपेक्षा रखता है. और यह अपेक्षा एक विधिवत नियमित अध्ययन से ही पूरी हो सकती है. फिल्म अध्ययन सिर्फ फिल्म की ही नहीं पूरे सांस्कृतिक वातावरण को समझने में शहयक हो सकता है.

१९८० में नेशनल फिल्म पॉलिसी कमिटी द्वारा फिल्म अध्ययन को राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली में और कॉलेज-विश्वविद्यालय स्तर पर औपचारिक शिक्षा में शामिल करने की अनुशंसा की गयी थी. भारत सरकार ने अनुशंसा स्वीकार करते हुए यू.जी.सी और एन .सी.ई.आर.टी. को फिल्म अध्ययन की दिशा में आवश्यक कदम उठाने के निर्देश भी उस समय जारी किये गए थे. लेकिन आज भी दूरदर्शन के कार्यक्रमों में  'अंडरस्टेंडिंग सिनेमा' की एक सेरिज प्रसारित करने और यादवपुर जैसे कुछेक विश्वविद्यालाओं में शोध और स्नातकोतर स्तर पर एक विषय के रूप में स्वीकार कर लेने के बावजूद फिल्म अध्ययान पहले की तरह अस्पृश्य बना हुआ है.

आज एक और अणि ही संस्कृति को हाशिये पर दाल रखने की ही नहीं, घृणा करने की राजनीति का दबाव, दूसरी और संस्कृति को 'यूनिफ़ॉर्म' बनाने का दबाव और तीसरी तरफ वैश्विक संस्कृति को बढ़ावा देने की कोशिश. कुल मिला कर समय सचेत होने का है. यदि अभी भी सिनेमा पर हमने अपना नियंत्रण नहीं कायम किया तो फिर आगे कितना भी विलाप करें निष्कर्ष हाथ नहीं आ सकता. इसके लिए सबसे पहले एक बार फिर से नेशनल फिल्म पॉलिसी १९८० को याद करने की ज़रुरत है ताकि सिनेमा के प्रति बचपन से ही एक सही समझ विक्सित हो सके. यह एक दिन की कोशिशों से नहीं हो सकता, लगातार विधिवत अध्ययन से ही बच्चों में सही और गलत सिनेमा की समझ को विकसित किया जा सकता है. बच्चों को महँ फिल्मकारों की क्लास्सिक फ़िल्में दिखने की गंभीर कोशिश शुरू की जानी चाहिए, ताकि वे डेविड धवन और विमल रॉय का फर्क महसूस कर सकें.

साहित्य के साथ हमने कोशिश की, आज छोटे से बच्चे को भी प्रेमचंद और प्रेम वाजपई का फर्क मालूम है. आज की सच्चाई  है की लोगों को सिनेमा देखने से रूक नहीं सकते हैं, कोशिश कर सकते हैं की वे सिनेमा को सिनेमा की तरह ग्रहण करें, एक स्वस्थ आलोचकीय समझ के साथ.

साभार : भारतीय आधुनिक शिक्षा , अप्रैल २०१०

लेखक से संपर्क : विनोद अनुपम
                         बी -५३, सचिवालय कालोनी,
                         कंकड़ बाग, पटना - २०, बिहार

आवाज़ें..

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...