अप्रैल 24, 2011

आने वालों से कहो हम तो गुज़र जायेंगे : फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

यहाँ की शुरुवात भी वहीँ उन्हीं आभारों -साभारों से होती हुई मानें और अगर आप पीछे जाना चाहते हैं तो इन लिंकों को चटकाया जा सकता है..पहली पोस्ट :' होता है शबो-रोज़ तमाशा मेरे आगे ', दूसरी : 'मुझसे पहली-सी मुहब्बत मेरी महबूब न माँग ' इसके नीचे ही है ..चलिए इस श्रंखला की अंतिम किस्त की तरफ रुख करते हैं जो पकिस्तान टाइम्स ने  १४ जनवरी १९९० के संस्करण में प्रकाशित की थी..

 

१९५० में मेरी मुलाक़ात अपने एक पुराने मित्र से हुई। यह जनरल अकबर खान थे जो उस वक्त फ़ौज में चीफ  आफ जनरल स्टाफ नियुक्त हुए थे। जनरल अकबर ने बर्मा और कश्मीर के मोर्चे पर होने वाले युद्घों में बड़ा नाम कमाया था। मैं इस साल मरी में छुटि्‌टयां बिताने गया हुआ था। वहीं उनसे भेंट हुई। बातों के दौरान उन्होंने कहा कि हम लोग फ़ौज में हैं। उन्होंने यह भी बताया कि जिन्होंने कश्मीर में हुई मोर्चेबंदी का सामना किया है वे देश की वर्तमान परिस्थिति से असंतुष्ट हैं और यह मानते हैं कि देश का नेतृत्व कायरों के हाथों में है। हम अभी तक अपना कोई संविधान नहीं बना पाये। चारों ओर अव्यवस्था और वंशवाद का चलन है। चुनाव की कोई संभावना नहीं, हम लोग कुछ करना चाहते हैं। मैंने पूछा कया करना चाहते हो? उनका जवाब था हम सरकार का तखता पलटना चाहते हैं और एक विपक्षी सरकार बनाना चाहते हैं। मैंने कहा यह तो ठीक है लेकिन उन्होंने मेरी राय भी मांगी। मैंने कहा यह तो सब फ़ौजी क़दम है। इसमें मैं कया राय दे सकता हूं। इस पर जनरल अकबर खान ने मुझे अपनी गोष्ठियों में आने और उनकी योजनाओं के बारे में जानकारी लेने की बात कही। मैं अपने दो गैरफ़ौज दोस्तों के साथ उनकी गोष्ठी में गया और उनकी योजनाओं से अवगत हुआ। उनकी योजना यह थी कि राष्ट्रपति भवन, रेडियो स्टेशन बगैरा पर कब्ज़ा कर लिया जाये और फिर राष्ट्रपति से यह घोषणा करवा दी जाये कि सरकार का तखता पलट दिया गया है और एक विपक्षी सरकार सत्ता में आ गयी है। छः महीने के भीतर चुनाव कराये जायेंगे और देश का संविधान निर्मित किया जायेगा। इसके अतिरिक्त अनगिनत सुधार किये जायेंगे। इस पर पांच छः घंटे तक बहस होती रही और अंततः यह तय हुआ कि अभी कुछ न किया जाये क्योंकि अभी देश किसी भी ऐसी स्थिति से नहीं जूझ रहा है कि जिसके आधार पर जनता को आंदोलित किया जाये। दूसरे, इस तरह की योजनाओं के क्रियान्वयन में खतरों का सामना करना पड़ता है।

 

उस समय पाकिस्तान के प्रधानमंत्री लियाकत अली खान थे। किसी तरह इस योजना की खबर सरकार के कानों तक पहुंच गयी। मैं तो इस अवधि में उन सभी घटनाओं को भूल चुका था कि अचानक सुबह चार बजे मेरे घर को फ़ौजियों ने घेर लिया और मुझसे कहा गया कि मैं उनके साथ चलूं। मैंने कारण पूछा तो मुझे जवाब मिला कि मुझे गवर्नर जनरल के आदेश से गिरफ्तार किया जा रहा है। चार महीने तक मुझे कैद रखा गया और फिर मुझे मालूम हुआ कि मुझे क्यों क़ैद किया गया। संविधान सभा ने एक विशेष अधिनियम को पारित किया और उसे रावलपिंडी षड्‌यंत्र अधिनियम का नाम दिया गया। उस अधिनियम के तहत हम पर गुप्त मुकद्दमा चलाया गया। अंग्रेजों के ज़माने से ही षड्‌यंत्र संबंधी क़ानून बड़े खराब थे। आप कुछ कर नहीं सकते थे। अगर यह सिद्घ हो जाये कि दो व्यक्तियों ने मिलकर क़ानून तोडने की योजना बनायी है तो उसे षड्‌यंत्र का नाम दे दिया जाता था और अगर कोई तीसरा व्यक्ति इसकी गवाही दे दे तो फिर अपराध सिद्घ मान लिया जाता था। सरकार ने अधिनियम बनाकर बचाव करने की सभी संभावनाओं को समाप्त कर दिया था। बनाये जाने वाले अधिनियम के तहत तो केवल सज़ा ही मिल सकती थी, भागने का कोई रास्ता भी नहीं था। यह मुकद्दमा डेढ  साल तक चलता रहा और हममें से हर एक के लिए उसके पद के अनुसार भिन्नभिन्न दंड निश्चित किये गये। जनरल को दस साल, ब्रिगेडियर को सात साल, कर्नल को छः साल और हम सब असैनिकों को उससे कम यानी चार साल की क़ैद की सज़ा सुनायी गयी।

 

मेरी हिरासत का यही वह समय था जो रचनात्मक रूप से मेरे लिए बहुत उर्वर सिद्घ हुआ। मेरे पास लिखने पढ़ने के लिए वक्त ही वक्त था, फिर मुझमें शासकों के विरुद्घ बहुत आक्रोश और क्रोध था, क्योंकि मैं निर्दोष था।

 

इसी अवधि में मेरी शायरी के दो संग्रह, काल कोठरी के उस दौर में तैयार हो गये। एक तो हिरासत के दिनों में ही प्रकाशित हो गया था और दूसरा मेरी रिहाई के बाद प्रकाशित हुआ। जब आप को चार साल के क़रीब जेल में रखा गया हो और बंदी होने का दुख भी आपके हिस्से में आया हो, तो निश्चित रूप से बाहर की दुनिया में आपका मूल्य बढ  जाता है। जब मैं जेल से बाहर आया तो मुझे अनुभव हुआ कि मैं पहले की तुलना में अधिक प्रसिद्घ और लोकप्रिय हो गया हूं। मैं दोबारा पाकिस्तान टाइम्स से जुड  गया और मैंने अमन कमेटी तथा ट्रेड यूनियन से अपने संबंध फिर से स्थापित कर लिये। यह तीन चार साल का समय ऐसी ही गहमागहमी में गुज़र गया। पाकिस्तान में वामपंथी आंदोलनों पर पाबंदी लगा दी गयी। यही स्थिति तीन चार साल तक जारी थी कि देश में पहला मार्शल लॉ लागू हो गया और पहली सैनिक सरकार स्थापित हो गयी, जिसका अर्थ था कि किसी भी व्यक्ति को बिना किसी अपराध के गिरफ्तार किया जा सकता है। उस समय के मार्शल लॉ ने एक अत्याचार यह भी किया कि हर उस व्यक्ति को पकड़ना शुरू कर दिया गया जिसका नाम १९२० के बाद की पुलिस रिपोर्टों में दर्ज़ मिला था।

 

इस तरह जेल में हमें नब्बे साल और अस्सी साल के बूढे मिले, कुछ की तपेदिक तथा अन्य बीमारियों के कारण जेल में ही मृत्यु हो गयी। मैंने लाहौर किला में डेढ  महीने गुजारा और फिर चार पांच महीने के बाद मुझे रिहा कर दिया गया। मैंने फिर पाकिस्तान टाइम्स के दफ्तर की ओर रुख  किया और तब मैंने देखा कि उसका दफ्तर पुलिस के घेरे में था। मेरे पूछने पर पता चला कि पाकिस्तान टाइम्स पर फ़ौजी सरकार ने कब्ज़ा कर लिया है और इस तरह मेरी पत्रकारिता का अंत हो गया। मैं ऊहापोह में था कि कया करूं। उन दिनों एक अमीर वर्ग जो मेरी शायरी को पसंद करता था, मेरी चिंता से अवगत था। उन लोगों ने पूछा आप कया करना चाहते हैं? मैंने कहा मुझे नहीं मालूम तो किसी ने सुझाव दिया, क्यों न संस्ह्मति से संबंधित कोई गतिविधि आरंभ की जाये। मैंने कहा यह अच्छा विचार है और इस प्रकार हमने लाहौर में ‘आर्ट कौंसिल* की स्थापना की। कौंसिल एक पुराने और टूटेफूटे घर में थी जो आज के आलीशान भवन जैसा आकर्षक नहीं था। कौंसिल का आरंभ हुआ और उसके भवन में प्रदर्शनियों, नाटकों और आयोजनों का तांता लगा रहता था। तीन चार साल तक यह गतिविधि चलती रही और मैं इसी अवधि में बीमार पड  गया। पहली बार दिल का दौरा पड़ा। और इसी बीच मुझे लेनिन विश्व शांति पुरस्कार दिये जाने की घोषणा हुई। किसी ने मुझे फोन पर खबर सुनायी तो मुझे विश्वास नहीं हुआ, मैंने जवाब में कहा बकवास मत करो, मैं पहले ही बीमार हूं। मेरे साथ ऐसा मजाक न करो। उसने उत्तार में कहा, मैंने टेलीप्रिंटर पर यह खबर खुद देखी है, तुम्हारे साथ पुरस्कार पाने वालों में पिकासो और दूसरे भी हैं।

 

जब मैं स्वस्थ हो गया तो मुझे पुरस्कार ग्रहण करने और मास्को आने के लिए आमंत्रित किया गया। मैं मास्को के बाद लंदन चला गया और लंदन में दो वर्ष तक रहा। मैं लंदन से लाहौर आने के बजाय कराची लौट आया। कराची में मैं मिस्टर महमूद हारून के निवास स्थान पर ठहरा। उनकी बहन जो डाक्टर थीं और मेरी मित्र थीं, उन्होंने मुझे लिखा कि श्रीमाती हारून बीमार हैं और आपको देखना और मिलना चाहती हैं। मेरे आने पर श्रीमती हारून ने मुझे बताया कि उनका जोफ़लाही फाउंडेशन है उसके अधीन स्कूल, अस्पताल और अनाथालय चल रहा है। उनके लड के के पास फाउंडेशन चलाने के लिए समय नहीं है क्योंकि वह व्यापार तथा राजनीतिक गतिविधियों में व्यस्त रहे हैं। अच्छा होगा कि फाउंडेशन की व्यवस्था मैं संभाल लूं। मैंने फाउंडेशन के स्थान पर उसकी गतिविधियों का निरीक्षण किया तो देखा कि वह गंदी बस्ती का इलाक़ा था, जहां मछुआरे, ऊंट वाले, नशीली दवाओं का व्यापार करने वाले और आपराधिक गतिविधियों में लिप्त व्यक्ति रहा करते थे। मुझे यह इलाक़ा अच्छा लगा, और हमने इस क्षेत्र में अपनी गतिविधि तेज कर दी। स्कूल को कॉलेज में परिवर्तित कर दिया, एक तकनीकी संस्थान भी स्थापित किया और अनाथालय की भी व्यवस्था की। इस प्रकार कोई आठ साल तक मैं शैक्षणिक और प्रशासनिक गतिविधियों से जुड़ा रहा। इस बीच ६५ और ७१ के युद्घ भी हुए। इन दोनों युद्घों के दौरान मैं अत्यधिक मानसिक तनाव से प्रभावित रहा। उसका कारण यह था कि मुझसे बारबार देशभक्ति के गीत लिखने की फरमाइश की जा रही थी। मेरे इनकार पर यह जोर दिया जाता कि देशभक्तित और मात्रभूमि की मांग यही है कि मैं युद्घ के या देशभक्तित के गीत लिखूं। लेकिन मेरा तर्क यह था कि युद्घ अनगिनत व्यक्तियों के लिए मृत्यु का कारण बनेगा और दूसरे पाकिस्तान को इस युद्घ से कुछ नहीं मिलने वाला है। इसलिए मैं युद्घ के लिए कोई गीत नहीं लिखूंगा। लेकिन मैंने ६५ और ७१ के युद्घों के विषय में नज़में लिखीं, ६५ के युद्घ से संबंधित मेरी दो नज़में हैं।

 

बांग्लादेश युद्घ के ज़माने में मैंने तीनचार नज़में लिखीं। लेकिन उन नज़मों की रचना में युद्घ गीतों का आग्रह करने वालों को मुझसे और भी निराशा हुई। परिणामस्वरूप मुझे सिंध में भूमिगत हो जाना पड़ा। युद्घ समाप्त हुआ तो पाकिस्तान के दो टुकड़े हो चुके थे।

 

चुनाव के बाद फ़ौजी सरकार समाप्त हो गयी थी और भुट्‌टो के नेतृत्व में पीपुल्स पार्टी की सरकार स्थापित हो चुकी थी। उनसे मेरे अच्छे संबंध थे उस ज़माने में जब वह विदेश मंत्री थे और उस समय भी जब वह विपक्षी पार्टी के नेता थे। उन्होंने मुझे अपने साथ काम करने के लिए आमंत्रित किया। मैंने पूछा मेरा काम कया होगा, तो उन्होंने स्पष्ट किया कि मैं पहले से ही सांस्ह्मतिक गतिविधियों में भागीदार रह चुका हूं। क्यों न उसी क्षेत्र में राष्ट्रीय स्तर पर कुछ काम करूं। मैंने प्रस्ताव स्वीकार कर लिया और नेशनल कौंसिल ऑफ  आर्ट्‌स (राष्ट्रीय कला परिषद्‌) की स्थापना की। इसके अतिरिकित मैंने ‘फोक आर्ट्‌स* जो अब ‘नेशनल इंस्टीट्‌यूट ऑफ  फोक हेरिटेज* है, की स्थापना की। मैं इन परिषदों की देखरेख में चार साल तक व्यस्त रहा कि सरकार फिर से बदल गयी। इस अवधि में मेरा गद्य और पद्य लिखने का क्रम लगातार जारी रहा। इसी अवधि में मेरी शायरी का अंग्रेज़ी, फ़्रांसीसी, रूसी तथा अन्य दूसरी भाषाओं में अनुवाद होता रहा। जिया उल हक के शासन काल में मेरे प्रभाव को नकार दिया गया। वैसे भी इस सरकार में संस्ह्मति का महत्व पहले जैसा नहीं रहा था, मैंने सोचा मुझे कुछ और करना चाहिए।

 

मैं एशियाई और अफ्रीकी साहित्यकार संगठन के लिए कुछ न कुछ करता ही रहता था। उनकी गोष्ठियों में भी भागीदारी होती रहती थी। उस संगठन का दफ्तर काहिरा में था जहां से उस संगठन की पत्रिका लोटस का प्रकाशन होता था।

 

कैंप डेविड समझौते के बाद अरब के लोगों का यह अनुरोध था कि उसका दफ्तर काहिरा से कहीं और स्थानांतरित कर दिया जाये। लोटस का मुख्य संपादक जो संगठन का सचिव भी था, उसकी साइप्रस में गोली मार कर हत्या कर दी गयी थी। अब लोटस का संपादन करने वाला कोई नहीं था। इस समय एफ्रोएशियाई साहित्यकार संगठन का दफ्तर कहीं नहीं था। इस पत्रिका के संपादन के लिए मुझे आमंत्रित किया गया और यह भी फैसला हुआ कि संगठन का दफ्तर बैरूत में स्थानांतरित कर दिया जाये। मैं अफ्रीकी एशियाई साहित्यकारों के संगठन और उसकी पत्रिका लोटस से चार साल तक जुड़ा रहा और फिर हमें इससे फुर्सत मिल गयी।

 

बैरूत पर आक्रमण के एक महीने बाद मैं किसी न किसी तरह वहां से निकलने में सफल हो गया और पाकिस्तान पहुंच गया। यहां आते ही मैं एक बार फिर बीमार हो गया।

 

अब जो यह एलिस के बारे में आप लोग पूछ रहे हैं तो मैं बताऊं। जब मैं कॉलेज में पढाने लगा था तो जैसा मैंने बताया, मेरे कुछ साथी ऑक्सफोर्ड से वापस लौटे तो वे मार्क्सवादी विचारधारा के समर्थक थे। उसी में एक साथी जो मार्क्सिस्ट था उसकी पत्नी जो अंग्रेज थी, वह भी मार्क्सिस्ट थी। एक दिन उसने मुझसे पूछा, तुम उदास और निराश क्यों रहते हो, फिर स्वयं ही बोली, तुम्हें इश्क  हो गया है कया? तुम बीमार लगते हो। उसने कुछ किताबें मुझे दीं और कहा कि उन्हें पढ़ूं उसने स्पष्ट किया, तुम्हारा दुख बहुत कुछ व्यक्तिगत ढंग का है। जरा पूरे हिंदुस्तान पर नज़र डालो, अनगिनत लोग भूख और बीमारी के शिकार हैं। तुम्हारा दुख तो उनकी तुलना में कुछ भी नहीं है। और तब प्रेम के विषय से मेरा धयान हट गया और मैंने व्यापक संदर्भों में सोचना आरंभ कर दिया। मेरी नज़म 'मुझसे पहली सी मुहब्बत मेरी महबूब न मांग ' इसी बदलते हुए सोच का परिणाम थी। मेरे मित्र जिनकी पत्नी का उल्लेख मैंने किया वह एक अच्छे साहित्यकार थे और एक कॉलेज के प्रिंसिपल भी थे। उनके साथ शिक्षण के कार्य में व्यस्त हो गया। कोई तीन चार साल बाद मेरे मित्र की अंग्रेज. पत्नी की एक बहन उन लोगों से मिलने अमृतसर आयी, जहां मैं पढा रहा था। मेरी उस महिला से जब मुलाक़ात हुई तो हम मित्र बन गये लेकिन उन्हीं दिनों युद्घ छिड  गया और वह महिला अपने देश वापस न लौट सकी। मैं भी कैंब्रिज जाने वाला था मगर न जा सका और इस तरह हमारी मित्रता गहरी होती गयी और एक दिन हमने शादी कर ली। वह महिला एलिस थी।

 

जहां तक बैरूत में मेरे प्रवास का संबंध है तो मैं यह स्पष्ट कर दूं कि मैं फिलिस्तीनियों का समर्थक था जिन्हें एक षड्‌यंत्र द्वारा अपने देश से निकाल दिया गया था। यह अजीब बात थी कि इज़राइली जिन्हें नाजियों के हाथों कठोर यातना झेलनी पडी थी, वे भी अब फिलिस्तीनियों को इसी प्रकार कष्ट देने के लिए उतारू थे, जबकि फिलिस्तीनियों ने इजराइलियों का कुछ नहीं बिगाडा था। लेकिन शायद इज़राइलियों के अत्याचारी व्यवहार के पीछे हिंसक मनोग्रंथि काम कर रही थी। शक्तिशाली का साथ तो सब देते ही हैं क्योंकि उसमें कोई हानि नहीं होती। कमज़ोर का साथ देने वाले कम होते हैं और उसमें केवल हानि ही हिस्से में आती है। मैंने बैरूत प्रवास के दिनों में कमज़ोर का साथ देने को अपना रचनात्मक धर्म स्वीकार किया था।

 

उर्दू से अनुवाद : मो. जफर इक़बाल 

 

[समाप्त]

अप्रैल 23, 2011

मुझसे पहली-सी मुहब्बत मेरी महबूब न माँग : फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

फैज़ अहमद फैज़  ने ७ मार्च १९८४ ई. को अपनी मृत्यु से आठ महीने पहले एशियन स्टडी ग्रुप  के निमंत्रण पर इस्लामाबाद के एक सम्मेलन में बेबाक अंदाज में अपनी ज़िन्दगी के लंबे सफ़र को जिस तरह बयान किया था, उसे पाठकों के सामने प्रस्तुत किया जा रहा है; ज़िन्दगी के इस सफ़र को 'पाकिस्तान टाइम्स ' ने दो किस्तों में फैज़ की सालगिरह के अवसर पर १३-१४ जनवरी १९९० के संस्करण में पहली बार प्रकाशित किया था। फैज़ की इस आपबीती को साभार पुनः प्रस्तुत किया जा रहा है। 

 

{यह आभार प्रकट करती पंक्तियाँ 'नया पथ 'में संपादक द्वारा पहले दी जा चुकी हैं , यहाँ मेरी तरफ से भी इन्हीं की पुनरावृति की जा रही है और आपसे अनुरोध है कि इसे फ़ैज़ पर पिछली पोस्ट होता है शबो-रोज़ तमाशा मेरे आगे   के साथ नत्थी कर लें .और हाँ पकिस्तान टाइम्स ने इसे दो किस्तों में पहली बार छापा था और यहाँ भी सुविधा की दृष्टि से ऐसा ही किया जा रहा है पर ये दोनों पोस्टें लगातार होंगी जिससे वह क्रम बना रहे ..} 

 

मेरा जन्म उन्नीसवीं सदी के एक ऐसे फक्कड़  व्यक्ति के घर में हुआ था जिसकी ज़िन्दगी मुझसे कहीं ज्यादा रंगीन अंदाज  में गुज़री। मेरे पिता सियालकोट के एक छोटे से गांव में एक भूमिहीन किसान के घर पैदा हुए, यह बात मेरे पिता ने बतायी थी और इसकी तस्दीक गांव के दूसरे लोगों द्वारा भी हुई थी।मेरे दादा के पास चूंकि कोई ज़मीन नहीं थी इसलिए मेरे पिता गांव के उन किसानों के पशुओं को चराने का काम करते थे जिनकी अपनी ज़मीन थी। मेरे पिता कहा करते थे कि पशुओं को चराने गांव के बाहर ले जाते थे जहां एक स्कूल था। वह पशुओं को चरने के लिए छोड़  देते और स्कूल में जाकर शिक्षा प्राप्त करते, इस तरह उन्होंने प्राथमिक स्तर की शिक्षा पूरी की। चूंकि गांव में इससे आगे की शिक्षा की कोई व्यवस्था नहीं थी, वह गांव से भाग कर लाहौर पहुंच गये। उन्होंने लाहौर की एक मस्जिद में शरण ली।मेरे पिता कहते थे कि वह शाम को रेलवे स्टेशन चले जाया करते थे और वहां कुली के रूप में काम करते थे।

 

उस ज़माने में ग़रीब और अक्षम छात्र मस्जिदों में रहते थे और मस्जिद के इमाम से या आसपास के मदरसों में निःशुल्क शिक्षा प्राप्त करते थे। इलाक़े लोग उन छात्रों को भोजन उपलब्ध कराते थे।जब मेरे पिता मस्जिद में रहा करते थे तो उस ज़माने में एक अफगानी नागरिक जो पंजाब सरकार का मेयर था, मस्जिद में नमाज. पढ़ने आया करता था। उसने मेरे पिता से पूछा कि कया वह अफ़गानिस्तान में अंग्रेज़ी अनुवादक के तौर पर काम करना पसंद करेंगे, तो मेरे पिता ने अपनी इच्छा व्यक्त करते हुए अफ़गानिस्तान जाने का इरादा कर लिया।

 

यह वह समय था जब अफ़गानिस्तान के राजमहल में आये दिन परिवर्तन होता रहता था। अफ़गानिस्तान और इंग्लैंड के बीच डूरंड संधि की आवश्यकता का अनुभवभी उसी समय में हुआ और इसीलिए अफ़गानिस्तान के राजा ने मेरे पिता को अंग्रेजों के साथ बातचीत करने में सहायता करने के उद्देश्य से दरबार से अनुबंधित कर लिया। इसके बाद वह मुख्य सचिव और फिर मंत्री भी नियुक्त हुए। उनके ज़माने में विभिन्न क बीलों का दमन किया गया जिसके परिणामस्वरूप हारने वाले क बाइल (क बीला का बहुवचन) की खास औरतों को राजमहल के कारिंदों में वितरित कर दिया जाता था। ये औरतें मेरे पिता के हिस्से में भी आयीं, नहीं मालूम उनकी संख्या तीन थी या चार।बहरहाल अफ़गानिस्तान के राजमहल में पंद्रह साल सेवा देने के बाद वह तंग आ गये और उनका ऊब जाना स्वाभाविक  भी था क्योंकि राजा के अफ़गानी मूल के कर्मचारियों को एक विदेशी का दरबार में प्रभावी होना खटकता था।

 

मेरे पिता को प्रायः ब्रितानी एजेंट घोषित किया जाता और जब उस अपराध के फलस्वरूप उन्हें मृत्युदंड दिये जाने की घोषणा होती तो नियत समय पर यह सिद्घ हो जाता के वह निर्दोष हैं और उन्हें आगे पदोन्नति दे दी जाती। लेकिन एक दिन उन्होंने फ़कीर का भेस बदला औरअफ़गानिस्तान के राजमहल से फ़रार हो गये और लाहौर वापस आ गये लेकिन यहां वापस आते ही उन्हें अफ़गानी जासूस होने के आरोप में पकड लिया गया।

 

मेरे पिता की तरह फक्कड़ाना स्वभाव रखने वाली एक अंग्रेज  महिला भी उस ज़माने में डाक्टर के रूप में दरबार से जुडी थी। उसका नाम हैमिल्टन था। उससे मेरे पिता की मित्रता हो गयी थी। अफ़गानिस्तान के राजा से उसे जो भी पुरस्कार मिला था उसे उसने लंदन में सुरक्षित कर रखा था। इसप्रकार जब मेरे पिता अफ़गानिस्तान से निकल भागे तो उसने तो उसने उन्हें लिखा ‘तुम लंदन आ जाओ*। इस आमंत्रण पर मेरे पिता लंदन पहुंच गये और जब ब्रिटेन की सरकार को उनके लंदन आगमन की सूचना मिली तो मेरे पिता को यह संदेश मिला कि चूंकि अब तुम लंदन में हो तो मेरे दूत क्यों नहीं बन जाते? मेरे पिता ने यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। और साथ ही उन्होंने कैंब्रिज में अपनी आगे की शिक्षा का क्रम भी जारी रखा। वहीं उन्होंने कानून की डिग्री भी प्राप्त की। मेरे पिता का नाम सुल्तान था इसलिए मैं फारसी का यह मुहावरा तो अपने लिए दुहरा ही सकता हूं कि 'पिदरम सुल्तान बूद' (मेरे पिता राजा थे)।

 

क़ानून की डिग्री प्राप्त करने के बाद मेरे पिता सियालकोट लौट आये। मेरी आरंभिक शिक्षा मुहल्ले की एक मस्जिद में हुई। शहर में दो स्कूल थे एक स्कॉच मिशन की और दूसरा अमरीकी मिशन की निगरानी में चलता था। मैंने स्कॉच मिशन के स्कूल में प्रवेश ले लिया। यह हमारे घर से नजदीक था।यह ज़माना जबरदस्त राजनीतिक उथलपुथल का था। प्रथम विश्वयुद्घ समाप्त हो चुका था और भारत में कई राष्ट्रीय आंदोलन आकर्षण का केंद्र बन रहे थे। कांग्रेस के आंदोलन में हिंदू और मुसलमान दोनों ही क़ौमें हिस्सा ले रही थीं लेकिन इस आंदोलन में हिंदुओं की बहुलता थी। दूसरी ओर मुसलमानों की तरफ  से चलाया जाने वाला खिलाफत आंदोलन था।

 

प्रथम विश्वयुद्घ की समाप्ति पर परिदृश्य यह था कि तुर्क क़ौम ब्रितानी और यूनानी आक्रांताओं के विरुद्घ पंङ्कितबद्घ थी परंतु उस्मान वंशीय खिलाफ़त को बचाया नहीं जा सका और तुर्की अंततः कमाल अतातुर्क के क्रांतिकारी विचारों के प्रभाव में आ गया जिन्हें आधुनिक तुर्की का निर्माता कहा जाता है। एक तीसरा आंदोलन सिक्खों का अकाली आंदोलन था जो सिक्खों के सभी गुरुद्वारों को अपने अधीन लेने के लिए आंदोलनरत था। इस प्रकार लगभग छः सात साल तक हिंदू, मुस्लिम और सिक्ख तीनों ही अंग्रेज  के विरुद्घ एक साझे एजेंडे के तहत आंदोलन चलाते रहे।

 

हमारे छोटे से शहर सियालकोट में जब भी महात्मा गांधी, मोतीलाल नेहरू और सिक्खों के नेता आते थे तो पूरा शहर सजाया जाता, बड़े बड़े स्वागत द्वार फूलों से बनाये जाते थे और पूरा शहर उन नेताओं के स्वागत में उमड  पड़ता था। राजनीतिक गहमागहमी का यह दौर हमारे मन पर अपने प्रभाव छोड़ने का कारण बना। इसी दौरान रूस में अङ्कटूबर क्रांति घटित हो चुकी थी और उसका समाचार सियालकोट तक भी पहुंच रहा था। मैंने लोगों को कहते हुए सुना कि रूस में लेनिन नाम के एक व्यक्ति ने वहां के बादशाह का तख्ता उलट दिया है और सारी संपत्ति श्रमजीवियों में बांट दी है।

 

स्कूल की पढाई का यही वह ज़माना था जब शायरी में मेरी रुचि उत्पन्न हुई। इसके पीछे दो कारण थे। हमारे घर के पास एक नौजवान किताबें किराये पर पढ़ने के लिए दिया करता था। मैंने उससे किराये पर किताबें लेनी शुरू कर दीं और धीरेधीरे मैंने उसकी ऐसी सभी किताबें पढ़  डालीं जो कलासिक साहित्य से संबंधित थीं। मेरा सारा जेब खर्च भी किताबें किराये पर लेने में खर्च हो जाता था। उस ज़माने में सियालकोट का एक प्रसिद्घ साहित्यिक व्यक्तित्व अल्लामा इकबाल का था जिनकी नज्मों को बड़े शौकसे सभाओं में गाया और पढा जाता था। वहां एक प्राथमिक विद्यालय भी था जिसमें मैं पढ़ता था। वहां मुशायरे भी होते थे, यह मेरे स्कूल की शिक्षा के अंतिम दिन थे। हमारे हेडमास्टर ने हमसे एक दिन कहा कि मैं तुम्हें एक मिसरा देता हूं, तुम इस पर आधारित पांच छः शेर लिखो, हम तुम्हारे कलाम (ग़ज़ल) को शायर इक़बाल के उस्ताद के पास भेजेंगे और वह जिस कलाम को पुरस्कार का अधिकारी घोषित करेंगे उसे ही पुरस्कार मिलेगा। इस तरह मैंने शायरी के उस पहले मुक़ाबले में पुरस्कार के रूप में एक रुपया प्राप्त किया था, जो उस ज़माने में बहुत समझा जाता था। सियालकोट में दो साल गुज़ारने के बाद मैंने लाहौर के गवर्नमेंट कॉलेज में प्रवेश ले लिया।

 

सियालकोट से लाहौर आना रोमांच से भरपूर था। यूं लगा जैसे कोई गांव छोड़  के किसी अजनबी शहर में आ गया हो। उसकी वजह यह भी थी कि उस ज़माने में सियालकोट में न बिजली थी और न पानी के नल थे। भिश्ती पानी भरते थे या फिर कुंओं से पानी भरा जाता था। कुछ बड़े घरों में पीने के पानी के कुंए उपलब्ध थे। हम सब ही उस ज़माने में मिट्‌टी के तेल से जलने वाली लालटेनों की रौशनी में पढ़ते थे। यह लालटेन बड़ी खुबसूरत हुआ करती थी। सियालकोट में मोटर कभी नहीं देखी। वहां के सभी अधिकारी बग्घियों में आते जाते थे। मेरे पिता के पास दो घोड़ों वाली बग्घी थी। जब मैं लाहौर आया तो हैरान रह गया। यहां मोटरें थीं, औरतें बिना बुर्के के नज़र आ रही थीं। और लोग अजनबी पहनावे अपने बदन पर पहने हुए थे। हमारे कॉलेज में आधे से अधिक शिक्षक अंग्रेज  थे। हमारे अंग्रेज़ी के शिक्षक लैंघम थे, जो बहुत कड़े स्वभाव के थे, लेकिन शिक्षक बहुत अच्छे थे। मैंने अंग्रेज़ी के पर्चे में १५० में से ६३ नंबर लिये तो सब दंग रह गये। कॉलेज में मेरा क़द बढ गया। और मुझे यह सलाह दी जाने लगी कि मैं इंडियन सिविल सर्विस की परीक्षा की तैयारी करूं। मैंने निश्चय कर लिया कि मैं परीक्षा में बैठूंगा लेकिन मैं इंडियन सिविल सर्विस की परीक्षा की तैयारी करने के बजाय धीरेधीरे शायरी करने लगा। इस परिस्थति के लिए कई कारण ज़िम्मेदार थे।

 

एक यह कि डिग्री प्राप्त करने से पहले ही मेरे पिता का निधन हो गया और हमें यह पता चला कि वह जो कुछ संपत्ति छोड़  गये हैं उससे कहीं अधिक कर्ज़ चुकाने के लिए छोड़  गये थे और इस तरह शहर का एक खातापीता खानदान हालात के झटके में ग़रीब और असहाय हो गया। दूसरा जो मेरे और मेरे खानदान की परेशानियों का कारण बना वह व्यापक आर्थिक संकट और मंदी था जिसके प्रभाव से उस ज़माने में कोई भी व्यक्ति सुरक्षित न रह सका। मुसलमानों पर इसका प्रभाव अधिक पड़ा, चूंकि उनमें बहुतायत खेतिहर लोगों की थी। मंदी का प्रभाव ह्मषि पर अधिक पड़ा था। नतीजा यह हुआ कि गांव से शहर की ओर पलायन आरंभ हो गया क्योंकि छोटी जगहों में रोज गार उपलब्ध कराने वाले संसाधन नहीं थे और ऐसे संसाधन पर प्रायः हिंदुओं का कब्ज़ा था। सरकारी नौकरी भी एक रास्ता था लेकिन चूंकि मुसलमान शिक्षा के क्षेत्र में काफ़ी पिछडे  हुए थे इसलिए यहां भी उनके लिए अधिक अवसर नहीं थे। मेरे और मेरे खानदान के लिए यह ज़माना राजनीतिक और वैयक्तिक कारणों से परीक्षाऔर परेशानियों का था। इस तनाव और सोचविचार को अभिव्यक्ति के माध्यम की आवश्यकता थी सो यह शायरी ने पूरी कर दी।

 

मेरी उम्र १७,१८ साल के आसपास थी और जैसा कि होता है मैं बचपन से ही साथ खेलने वाली एक अफ़गान लड़की की मुहब्बत में गिरफ्तार हो गया। वह बचपन में तो सियालकोट में थी लेकिन बाद में उसका खानदान आज के फैसलाबाद के समीप एक गांव में आबाद हो गया था। मेरी एक बहन की उसी गांव में शादी हुई थी। जब मैं अपनी बहन के पास गया तो उसके घर भी गया, वह लड़की तब पर्दा करने लगी थी। एक सुबह मैंने उसे तोते को कुछ खिलाते हुए देखा। वह बहुत खूबसूरत लग रही थी। हम दोनों ने एक दूसरे को देखा और एक दूसरे की मुहब्बत में गिरफ्तार हो गये। हम छुपछुप के मिलते रहे और एक दिन जैसा कि होता है उसकी कहीं शादी हो गयी और जुदाई का यह अनुभव छःसात बरस तक मुझे उदास करता रहा। इस अवधि में मेरी शिक्षा भी जारी रही और शायरी भी। स्थानीय मुशायरे में तीसरी बार जब मुझे भाग लेने का अवसर मिला तो मेरी शायरी को काफ़ी सराहा गया और इस तरह लाहौर जैसे शहर की बड़ी साहित्यिक हस्तियां मेरी शायरी से परिचित हुईं और सबने मुझे अपना आशीर्वाद देना चाहा। मैं अब अच्छा खासा शायर बन चुका था।

 

यही वह दौर था जब उपमहाद्वीप में उग्रपंथ के पहले आंदोलन का आरंभ हुआ। उस आंदोलन के प्रभाव हमारे कॉलेज के अंदर भी पहुंच रहे थे और मेरा एक अभिन्न मित्र जिसे बाद में एक प्रसिद्घ संगीतकार ख्वाजा खुर्शीद अनवर के रूप में जाना गया, उस आंदोलन का सक्रिय कार्यकर्त्ता था। वह बम बनाने के लिए कॉलेज की प्रयोगशाला से तेजाब चुराने के अपराध में गिरफ्तार कर लिया गया। उसे तीन साल की सजा भी सुनायी गयी। वह कुछ समय तक जरूर जेल में रहा था लेकिन बाद में वह अपने प्रभावशाली पिता के रसूख के कारण छूट गया। मेरी बहुत सी जानकारियों का माध्यम वही था। वह अक्सर अपने आंदोलन का साहित्य मेरे कमरे में छोड़  जाता और जब कभी मैं उसे पढ़ता तो मेरे ऊपर जुनून सा छा जाता था, क्योंकि मेरे पिता अंग्रेजों के वफादार और उपाधि प्राप्त थे लेकिन इतना जरूर हुआ कि मैं उग्रपंथियों के आंदोलन और उसके बहुत से राजनीतिक समूहों से परिचित हो गया। मेरे ऊपर उसका कोई गहरा प्रभाव नहीं पड़ा लेकिन वह सब कुछ मेर लिए महत्वहीन नहीं था।

 

तीन चार साल बाद मैंने पहले अंग्रेज़ी में और फिर अरबी में एम.ए. कर लिया और फिर मैंने शिक्षण का कार्य अपना लिया। उससे मुझे काफ़ी सहारा मिला और खानदान को आर्थिक संकटों से उबारने में सहायता भी। इस अवधि में मेरे कॉलेज के ज़माने के दो साथी आक्सफोर्ड से मार्क्सिस्ट होकर लौटे थे।उनके अलावा उच्च घरानों के कुछ और लड के भी इंग्लैंड की यूनवर्सिर्टियों से कम्युनिस्ट विचार लेकर लौटे थे। उनमें से कुछ तो राजनीतिक दृष्टिकोण से व्यस्त हो गये, कुछ ने नौकरी के चक्कर में इस तरह के विचार को छोड़  दिया। लेकिन इसी टोली के नेतृत्व में साहित्य के प्रगतिशील आंदोलन का आंरभ हुआ। यह साहित्यिक आंदोलन, कम्युनिस्ट या मार्क्सिस्ट आंदोलन नहीं था। वैसे उसमें सक्रिय भाग लेने वालों में कुछ कम्युनिस्ट भी थे और मार्क्सिस्ट भी। असल में प्रगतिशील आंदोलन साहित्य में सामाजिक यथार्थ को बढावा देने से संबंध रखता था और रूढि बद्घ होकर कविता करने को बुरा समझता था। भाषा की कलाबाज़ी भी इस आंदोलन के लिए व्यर्थ थी। इस आंदोलन के प्रभावस्वरूप यथार्थवादी और राजनीतिक गीतों के चलन को बढ़ावा मिला। इस प्रकार का साहित्यिक चलन यूरोप और अमेरिका में भी फासीवाद विरोधी साहित्यिक प्रवृत्ति के रूप में उभरा, जिसके परिणामस्वरूप राजनीतिक सरोकार वाले साहित्य का जन्म हुआ।

 

१९३२-३५ के मध्य का यही वह समय था जब उस साहित्यिक, राजनीतिक आंदोलन से मेरा जुडाव शुरू हुआ। मज़दूरों, श्रमजीवियों और किसानों के आंदोलनधर्मी गीत और राजनीतिक अभिव्यक्ति और नयीपुरानी काव्य पद्घति के मिश्रण को लोगों ने सराहा और उन्हें पसंद भी किया। जब १९४१ में मेरा पहला संग्रह प्रकाशित हुआ तो वह तेज़ी से बिक गया। फिर द्वितीय विश्व युद्घ की लहर आयी लेकिन हम लोगों ने उसका ज्यादा नोटिस नहीं लिया। हमारे विचार में उस युद्घ से ब्रिटेन और जर्मनी का सरोकार था मगर १९४१ में जापान भी उस युद्घ में शामिल हो गया तो हमें कुछ आभास हुआ। क्योंकि उस समय अगर एक ओर जापानी भारत की सीमा तक आ गये थे तो दूसरी ओर नाजियों और फासिस्टों के क़दम मास्को और लेनिनग्राद तक पहुंच गये थे और तभी हमने महसूस किया कि युद्घ से हमारा संबद्घ होना आवश्यक है। इसलिए हम फ़ौज में शामिल हो गये। मुझे याद है पहले दिन जनसंपर्क विभाग के निरीक्षक एक ब्रिगेडियर के सामने मेरी पेशी हुई। वह आपैचारिक रूप से फ़ौजी नहीं था, वह बहुत जिंदादिल आइरिश था और लंदन टाइम्स से संबंध रखने वाला एक पत्रकार था। मुझे देखकर उसने कहा तुम्हारे बारे में पुलिस की खुफिया रिपोर्ट कहती है कि तुम एक पक्के कम्युनिस्ट हो, बताओ हो या नहीं। मैंने कहा मुझे नहीं पता कि पङ्कका कम्युनिस्ट कौन होता है। मेरा यह उत्तार सुनकर उसने कहा मुझे इससे कोई मतलब नहीं, चाहे तुम फासीवादी विचार ही क्यों न रखते हो, जब तक तुम हमें कोई धोखा नहीं देते; मैं समझता हूं तुम धोखा नहीं दोगे। मैंने समर्थन में सिर हिला दिया।

 

यही वह ज़माना था जब ब्रिटेन और मित्र देशों के बीच संबंध बहुत अच्छे नहीं थे। उधर महात्मा गांधी ने भारत छोड़ो आंदोलन आरंभ कर दिया था, जो पूरे देश में आग की तरह फैल गया था। ब्रिटेन के सामने दो संकट थे। एक तो फ़ौज  में लोगों की भर्ती और दूसरे सरकार के विरुद्घ जोर पकडता हुआ जन आंदोलन। ब्रिटेन की फ़ौज के ब्रिगेडियर ने मुझसे इस आंदोलन के विषय में विचारविमर्श करते हुए पूछा तो मैंने कहा कि ब्रिटेन अपने अस्तित्व के लिए भाग ले रहा है, जापान ब्रिटेन के लिए एकबड़ा खतरा है और अगर जापान तथा जर्मनी विजयी होते हैं तो ब्रिटेन को सौ दो सौ साल तक गुलाम रहने का दंश झेलना होगा और इसका मतलब यह है कि हमें अपने देश को इस कष्ट से सुरक्षित रखने के लिए ब्रिटेन की फ़ौज का हिस्सा बनकर लड़ना चाहिए। अंग्रेज  अपने लिए नहीं लड रहा है वह भारत के लिए लड  रहा है। मेरे इस तर्क को सुनकर उसने कहा तुम जो कुछ कह रहे हो ये तो सब राजनीति है मगर इस तर्क को फ़ौज के लिए स्वीकार्य कैसे बनाया जाये? मैंने कहा कि इस विचार को फ़ौज के लिए स्वीकार्य बनाने का तरीक़ा वही होना चाहिए जो कम्युनिस्टों का है। उसने चौंककर पूछा कया मतलब? मेरा जवाब था, हम कम्युनिस्ट एक छोटी टोली बनाते हैं। फ़ौज के हर यूनिट में इस तरह की एक विशेष टोली बनाने के बाद हम अफसरों को यह बताते हैं कि फासिज्म कया है और उन्हें यह भी समझाते हैं कि जापान और इटली वालों के इरादे कया हैं। इसके बाद उन अफसरों से कहा जाता है कि वे उक्त टोली में बतायी जाने वाली बातों को अपने यूनिटों के सिपाहियों को जाकर समझायें और बतायें।

 

इस तरह हम इस रणनीति के तहत पहले फ़ौजी अफसरों को मानसिक रूप से सुदृढ  करते थे और फिर उनके माध्यम से आशिक्षित सिपाहियों को भी एक दिशा देते थे। इस पद्घति का विरोध भी बहुत हुआ। बात वायसराय, कमांडरइनचीफ. और फिर इंडिया आफि स तक पहुंची। मुझसे कहा गया कि मैं अपनी योजना को लिखित रूप में प्रस्तुत करूं। अंततः इस योजना को मंजूरी मिल गयी और हमने फिर ‘जोश ग्रुप* बनाये जो बहुत सफल रहा और इसके परिणामस्वरूप मैं ब्रिटेन द्वारा सम्मानित किया गया और तीन सालों में कर्नल बना दिया गया। उस ज़माने में ब्रितानी फ़ौज में एक भारतीय के लिए इससे ऊंचा फ़ौजी पद कोई और नहीं था। उस ज़माने में मुझे फ़ौज की कार्य पद्घति और ब्रितानी सरकार को जानने का अवसर मिला। मुझे पत्रकारिता का अनुभव भी उसी ज़माने में हुआ, क्योंकि सभी मोर्चे पर भारतीय फ़ौज के प्रचार का काम मेरे ही जिम्मे था और मैं बहुत हद तक भारतीय फ़ौज के लिए राजनीतिक अधिकारी (पॉलीटिकल कमिश्नर) का काम करने लगा। युद्घ की समाप्ति पर मैं फ़ौज से अलग हो गया। उस समय मेरे सामने दो रास्ते थे या तो विदेश सेवा से संबंद्घ हो जाता या फिर सिविल सेवा से। लेकिन मैंने ऐसा नहीं किया।

 

यह वह ज़माना था जब पाकिस्तान के लिए आंदोलन और भारतीय कांग्रेस का स्वाधीनता आंदोलन अपने चरम पर था। मेरे एक पुराने मित्र जो एक बड़े ज़मींदार भी थे और जो पंजाब कांग्रेस पार्टी के अधयक्ष रहने के बाद मुस्लिम लीग में आ गये थे मुझसे कहने लगे कि मैं सिविल सेवा में जाने की इच्छा समाप्त कर दूं क्योंकि वह लाहौर से एक अंग्रेज़ी दैनिक निकालने की योजना बना रहे थे। उन्होंने उस अखबार का संपादन करने का प्रस्ताव दिया जो मैंने स्वीकार कर लिया और मैंने जनवरी १९४७ में लाहौर आकर पाकिस्तान टाइम्स का संपादन संभाल लिया। मैं चार साल पाकिस्तान टाइम्स का संपादक रहा। इसी अवधि में पाकिस्तान ट्रेड यूनियन का उपाधयक्ष भी मुझे बना दिया गया। १९४८ में नागासाकी और हिरोशिमा पर होने वाली बमबारी के बाद कोरियाई युद्घ भी छिड. गया। इस बीच स्काटहोम से यह अपील आयी कि हम शांतिस्थापना के लिए आंदोलन चलायें। उस अपील के समर्थन में अमन कमेटी की स्थापना हुई और मुझे उसका संचालक बना दिया गया। अब मैं ट्रेड यूनियन, अमन कमेटी और पाकिस्तान टाइम्स तीनों मोर्चे पर सक्रिय था और सक्रियता तथा कार्यशैली के लिहाज से यह बहुत व्यस्त समय था। उसी ज़माने में आई.एल.ओ की एक मीटिंग में भाग लेने के लिए पहली बार देश से बाहर जाने का अवसर मिला। मैंने सानफ़्रांसिस्को के अतिरिक्त जेनेवा में भी दो अधिवेशनों में भाग लिया और इस तरह अमेरिका और यूरोप से मैं पहली बार परिचित हुआ।

 

उर्दू से अनुवाद : मो. जफर इक़बाल 

 

[जारी..]

अप्रैल 20, 2011

इस एवज़ी से समय में कुछ ज़रूरी सी बातें

दुर्भाग्य से इस देश में एक ख़ास तरह का काईयांपन प्रबुद्धता के नाम पर प्रतिष्ठित हो गया है और मैत्रेयी उससे अछूती नहीं रह सकी है. यह काइयांपन शायद ह्रासोन्मुख हिन्दू मानस की देन है. इसके चलते गरीबी और उपभोग की संस्कृति का वह दारुण समन्वय किया गया है जिसका नाम आधुनिक भ्रष्ट भारत है. इस भारत के लिए प्रतीकात्मकता ही सब कुछ है. तकली थाम लेने से गांधीवाद हो जाता है. बंदूक पकड़ लेने से माओवाद. सेमीनार कर लेने से संस्कृति. चुनाव करा देने से लोकतंत्र. सड़क बना देने से प्रगति. संस्था खोल देने से संस्था के उदेश्यों की पूर्ति.

यह देवीदत्त उर्फ़ डी. डी. और मैत्रेयी उर्फ़ बेबी की उस बातचीत का छोटा सा टुकड़ा है जो आज भी म.श.जो. के कसप के पेज नंबर तीन सौ चौबीस पर पाया जाता है. हाँ ये ज़रूर है कि इसे मैंने ही दुकड़े में काट कर यहाँ रखा है. और आज-कल जब-जब इन पंक्तियों को पढ़ रहा हूँ तो कहीं लगता है क्या जिस सुप्रीम कोर्ट के जज ने बिनायक सेन के पक्ष या यूँ कहें लोकतंत्र के - जिसकी बात देवीदत्त यहाँ ऊपर कर रहा है - पक्ष में ये ऐतिहासिक फैसला सुनाया है उसने भी पिछली रात कसप  तो ख़तम नहीं किया..सवाल जब कहीं मुलाकात होगी तब दागा जायेगा पर अभी आपको उस फैसले में इसकी ध्वनि नहीं सुनाई दे रही..किसी के पास गाँधीवादी साहित्य मिलने से वह गाँधीवादी नहीं हो जाता है, ठीक उसी तरह किसी के पास प्रतिबंधित सामग्री मिलने को ही देशद्रोह का एक मात्र कारण नहीं माना जा सकता.

हम सब एक एवजी समय में रह रहे हैं जहाँ बात प्रतीकों से नीचे होती ही नहीं. कोई अन्ना हजारे आते हैं अनशन करते हैं और सब दूसरे तीसरे गाँधी को खोज लेने पर फूले नहीं सुहाते. किसी ने झंडा उठाया और हो गए देशभक्ति के होल-सोल विक्रेता. हमें झंडा कहाँ फेहराना है, लाल चौक पर. नवीन जिंदल राजनेता तो हईये  हैं, बड़े झंडा भक्त भी हैं. पर थोड़ी प्राब्लम है, वे एक तरफ प्राउड टू वेव फ्लैग भी कहेंगे और खाप पंचायतों को पुरस्कृत भी करेंगे..सरकार खादी से सब्सिडी भी हटाती है और उसके चैनल खादी का महिमामंडन कर उसे अपनी संस्कृति भी कहती है. बड़े-बड़े रिपोर्टर सारी जिंदगी 'रिपोर्ट' बनायेंगे क़स्बे शहरों गलियों की खाक भी छानेंगे पर अपने चैनल की कारगुजारियों को छिपाते फिरेंगे. सिर्फ दीक्षांत समारोह में चोगा न पहनने से हो गए ठेठ, बन गए भारतीय..सारी पढाई तो उसी औपनिवेशिक मानसिकता से आज तक ग्रसित है; उसी हैयरार्की को बनाये रखने के औज़ार के रूप में. सिर्फ शिक्षा का अधिकार लाने से हो गए सब शिक्षित.

बेचारा संयुक्त राष्ट्रसंघ इतने सालों से हमारे सामने है और हम समझ ही नहीं सके. एनजीओ सार्थक दिखती पहलों के नाम पर सेफ्टी वाल्व का काम करते आ रहे हैं और भ्रष्टाचार के अड्डे बन चुके हैं, पर हम देखने के काबिल ही नहीं. अमरीका से बेहतर और कौन है जो इन प्रतीकों का दुरूपयोग हमें समझा सकता है. ये ऐसा देश है जो हमेशा 9/11 से लेकर दुनिया में शांति स्थापित करलोकतान्त्रिक मूल्यों को स्थापित करने का ठेका  लिए लिए फिरता है. अभिव्यक्ति, मानवाधिकार, शांति को स्थापित करने के लिए किसी भी तानाशाह से टक्कर लेने को निःशुल्क उपस्थित. पर किसको नहीं पता उसके स्वार्थ, नवसाम्राज्यवाद से लेकर बरस्ते आर्थिक शोषण सांस्कृतिक-प्राकृतिक संसाधनों की लूट, अधिपत्य और वर्चस्व तक की रेंज तक जाते हैं. ऐसे ही किसी ज्ञात-अज्ञात भय को दिखा कर उसकी हथियार बनाने वाली कंपनियों की दूकान भी तो चलानी है.

इस समय में हम पूरी तरह से निष्क्रिय से बना दिए गए हैं, जहाँ दो जून की रोटी नहीं हो तो गुरद्वारे का विकल्प सुझाते हैं. हम सब इस काबिल छोड़े ही नहीं गए..बस हर बार कोई कुक्कट आता है और कूड़े के ढेर पे बांग मारता है और हम जाग से जाते हैं. हमें यही ध्यान रखना है कि इस ऐवजी वक़्त में कोई हमारी एवज़ में सोचने वाला नहीं आने वाला..इस काईयांपन इस प्रबुद्धता से खुद को बचाना ही अपने अस्तित्व की लडाई है. इन प्रतीकों से आगे जाकर ही अभिव्यक्ति को ढूँढना है..वो सृजनात्मक भी हो सकती है और विध्वंसक भी. पर उसके बाद कुछ नया बनेगा..शायद इलियट  कहता है, "कल्पना कुछ रचने से पहले कच्चे माल के साथ बहुत तोड़फोड़ करती है, उसे गलाती पिघलाती है, उसका मूलरूप मिट जाता है और तब जाकर कुछ सामने आता है"..अगर उन्होंने नहीं कहा है तो मैं कह रहा हूँ..


{ यह  पोस्ट 'जनसत्ता 'में , 'इस एवज़ी समय में ' शीर्षक के साथ प्रकाशित हुई | तारीख छब्बीस अप्रैल | मूल रूप की छाया पढने के लिए यहाँ चटकाएं }

अप्रैल 19, 2011

दास्तानों के किसी दिलचस्प से एक मोड़ पर

जब वो वक़्त खुद मेरे सामने से गुज़र रहा था तब कभी सोचा नहीं था जिसे आज सिर्फ मैं..इसे यहीं छोड़ते हैं, पता नहीं क्या कौंधा था..

तब कभी नहीं सोचा था की तुम्हे अपने पास इतना महसूस करूँगा. यह शायद आज का सच है वो शायद तब का रहा होगा.

तब हमारे पास एक-दूसरे को देख भर लेने के कई सारे - तुम न भी मानो तो कम से कम मेरे लिए तो थे ही - और आज इसकी कोई संभावना भी नहीं दिखती. फिर भी एक रूमानी से गलियारे में तुम्हारे न होने पर चले जाना और उस खालीपने को भर लेने की ज़िद जहाँ अटक-भटक सा रहा हूँ..

 बातचीत..ये होती क्या है..हमारे सन्दर्भ में बार-बार उस बार से दोहराना अपने आप में कम पीड़ादायक नहीं है पर हर बार बार-बार किसी ऐसे सच के पास पहुँच चीजों को साफ़ कर लेना चाहता हूँ जिससे मैं खुद को तय्यार कर सकूँ..

कि हाँ यही वो वजह है जिसके कारन हम दोनों आज साथ नहीं हैं. और रह-रह वो सारी दलीलें-तकरीरें चुक जाती हैं जिन पर पिछली बार मान चुका था. और यहीं कहीं मैं तुम्हारे पास चला आता हूँ.

पता नहीं तुम्हारा साथ मेरे न होना मेरे ऐसे होने का कारण है या नहीं पर अपने ऐसे होने के इर्द-गिर्द सब भटकता सा रहता है. उस दिन बोल सकना ही मेरे लिए मेरी होने के एकदम उलट सा कुछ था फिर आँखों के सामने तुम्हारी एक जोड़ी आँखें ही अपने साथ ला सका हूँ..

उस दिन वहां से..उस कोने से मुझे ही देख रही थीं पर मैं न जा सका.. वहां तक जहाँ तुम खड़ी थीं..खुद को तो वहीँ किसी कोने में रख आया कि बाद में ले आऊंगा..पर ऐसा कुछ हुआ नहीं. और तुम्हारे बारे में क्या कहूँ न हम मुड़े न कहीं रास्ता मुड़ा अपना..

लोग मेलों में भी गुम हो कर मिलें हैं बाराहा. दास्तानों के किसी दिलचस्प से एक मोड़ पर, यूँ हमेशा के लिए भी क्या बिछड़ता है कोई..हम दुबारा मिलेंगे पुरानी किसी पहचान की ख़ातिर..

{और मेरे साथी मित्र इसे इस नामुराद मौसम का एक और 'साइड इफैक्ट 'मान सकते हैं बाकि उनकी मर्ज़ी..वैसे कल-पसरो दोपहर अपनी दिल्ली का मौसम कुछ-कुछ इस फोटो की तरह नहीं था क्या..}

अप्रैल 16, 2011

उन सबके नाम जिन्होंने ये शहर बनाया

कभी कभी बहरूपिये शहर से भाग जाने का मन करता है पर हर बार घुट-घुट कर यहीं किसी गली में कोने में रह जाता हूँ. पता नहीं क्यों इतने दिनों से बोरिया - बोरडम का देसी वर्ज़न - रह हूँ. कुछ करने का मन नहीं हो रहा. बस बैठे हैं खाली निपट अकेले. एक अदद खिड़की है भी पर पहली मंजिल से कूदना भारी पड़ सकता है. सोनसी तुम तबतक इंतज़ार करो जबतक मैं ग्राउंड फ्लोर पर आता हूँ ..पर जब तक सीढ़ियों से नीचे आता हूँ तब तक इस थोड़े शहर को देख लूँ.. अटक - भटक गया हूँ..

ये शहर हर समय एक से नहीं रहते हमारी तरह इनका मिजाज़ भी बदलता रहता है. सुबह जिन चेहरों को छोड़ के जाता हूँ दोपहर में वो नज़र ही नहीं आते. शाम होते होते कई और चेहरे उसमे शामिल हो जाते हैं. सब इतना गड्ड-मड्ड होता जाता है कि कनपट्टी के पास से पसीने की एक बूंद ज़मीन पे गिरने से पहले मुझे सुनाई दे जाती है और पैडल मार के अपनी खोह में कुछ चेहरों को लिए वापास आ जाता हूँ.

कुछ स्टोव के इर्दगिर्द पकती-उबलती चाय के साथ अपने पूरे दिन के नक़्शे को नहीं अपने उस कल को बनाते पकड़े जा सकते हैं. जहाँ चाय की चुस्कियों के साथ हँसता बोलता पूरा परिवार उसके दिल्ली वाले किस्सों का इंतज़ार करता होगा. अपने मुलक जाने वहां की हवा की बात ही कुछ और है..पर पता नहीं दिल की किसी कोने में उसे ये डर भी सताता है कि कहीं पहाड़गंज - बल्लीमारान- गोविन्द पुरी - लाल कुआँ - सदर- आज़ाद मारकेट- खरी बाउली से देर रात लौटते हुए कोई अंधी आलिशान गाड़ी उसे टक्कर न मार जाये और उसके सपने इसी शिवाजी स्टेडियम के इसी फुटपाथ पर अगली सुबह उसके बच गए साथी आपस में बाँट कर अपने अपने सपनों में न खो जाएँ. डर उस अकेले का नहीं उन सबकी सामूहिक संपत्ति है.

वापसी कभी नहीं हो पायेगी और न ही उनके चले जाने के बाद कोई उन्हें याद रखेगा. फिर अगली सुबह होगी. रस- ब्रेड के साथ नाश्ते में अखबार के पन्ने पलट उनमे कुछ अपना ढूंढ़ लेने की कसरत भी होगी. जैसे उनकी कोई कीमत नहीं वैसे ही उनके गाँव में कौन घरे गाय बियाई..?? कौन परधानी में धांधली कर जीत गया..?? ब्लाक परमुख एक्सीडेंट में हड्डी तुराये बइठे.. भिठिया के घसीटे पारय साल गुज़र गए. कोई खबर नहीं छापता. पर रोज़ जागरण से लेकर भास्कर के पन्ने सब पलटते हैं. इसी उम्मीद में की कभी तो कोई खोज खबर लेगा.

उधर मोबाईल कम्पनी भी इन्ही की जेब काटे रहती हैं. दस रूपये का टाक टाइम. उसमे कित्ती बात होगी जब तक असल पे आएंगे तबतक पैसा ख़तम. अगली बारी पच्चीस वाला डलवाए के बतियाबे...कभी गुगाद कर उधर से फोन आय अभी तो नंबर बदल चुका होता है.किसी कंपनी ने अपने प्रतिद्वंदी के ग्राहकों में सेंध लगा कर इनको और अस्थायी बना दिया. सोनसी तुम भी तो बोर नहीं हो रही हो न..ठीक है..

इन्होनें अपने खून पसीने से शहर को सींचा है. पर नाम इनका किसी दीवार - किसी गेट पर खुदा हुआ नहीं मिलेगा. नाम लिया भी जायेगा तो किसी लुटियन का. बच्चे यहाँ नहीं तो क्या इसे ही पाला पोसा है. मैंने आज तक मार्क्स को नहीं पढ़ा पर इतना तो मैं भी जनता हूँ कि आर्थिक अभिजिती में ये पराजित से योद्धा हैं. नहीं तो इनके नाम से भी कोई सड़क, कोई धर्मार्थ अस्पताल, कोई ट्रस्ट कहीं न कहीं स्कूल तो चला ही रहा होता..पर नहीं उनकी हैसियत नहीं है न..क्योंकि उनकी कोई सक्रीय आर्थिक हैसियत- भूमिका- औकात [आप इनमे से कोई भी चुनने के लिए स्वतंत्र हैं ] नहीं इसलिये हम उनके सामाजिक अस्तित्व को भी नकार देते हैं. बिलकुल वैसे ही जैसे किसी गरीब से रिश्तेदार को किसी भी घरेलू फैसले में भागिदार नहीं बनाया जाता. न ही उसकी राय को सुनने लायक माना जाता है. वही व्यवहार इनके साथ तब से आज तक और न जाने कब तक होता रहेगा..

शहर को जब तक बने रहना है तब तक इनके साथ यही होता रहेगा..वही रोज़ की चाय के बाद थका देने वाली उबती ज़िन्दगी मुंह पे हाथ रख आंखों पे छ्प्पे मार नींद को कुछ देर और रोक लेने की जिद ताकि कल परसों की तरह फिर मरोड़ होते पेट के साथ सारी रात न जागने पड़े..रोटी भले दुखते दांतों से चबाई न जाती हो, पनियाली दाल में नमक कुछ ज़यादा हो..

पर ये शहर ऐसे ही जिंदाबाद रहे, सौ दो सौ पांच सौ साल पूरे करे इसके लिए इनका होना और ऐसा ही बने रहने बहुत ज़रूरी है..और ये होगा भी क्योंकि न हम इनका अस्तित्व मानते हैं न ये उसके लिए लड़ते हैं..ठीक ही कहा है किसी ने सबसे बड़ी लडाई पेट से ही होती है और ये सब अभी तक इसी से जूझ रहे हैं..और तभी तक...

सोनसी नीचे तो आ गया हूँ पर मन कुछ ठीक नहीं लग रहा और वैसे भी खिड़की के बाहर धुआं है और मेरी आँख में चुभ भी रहा है..फिर कभी मिलेंगे अभी खिड़की बंद कर रहा हूँ..मुझे पता है तुम मुझे समझती हो इसलिए तुम्हे फ़ोन भी नहीं कर रहा हूँ. वैसे भी तुम्हारा नंबर है कहाँ मेरे पास. तुम तो वही मिलती हो खिड़की के पास. आज खिड़की बंद देख तुम खुद समझ जाना कुछ उलझ गया हूँ..बस उन्ही चेहरों में एक चेहरा चायपाओ का तो कभी तुम्हारा दिख रहा है इसलिए आँख मूंद कुछ देर लेटने जा रहा हूँ..

और मेरे पाठक इस भ्रम में बिलकुल न पड़ें कि उब से किसी दर्शन फ़रशन का जनम होता है..

शहर की ज्यामिति:
ये जो शहर है लखनऊ| शहर के शहर बने रहने की स्त्री व्याख्या| हज़रतगंज के बहाने दस का नोट और नन्हे हाथ|

आज सनीचर है

शनिवार
सुबह सुबह मैं रास्ते में रुककर फुटपाथ पर झुककर
ख़रीद रहा था हिन्दी के उस प्रतापी अख़बार को
किसी धातु के काले पत्तर की
तेल से चुपड़ी एक आकृति दिखाकर
एक बदतमीज़ बालक मेरे कान के पास चिल्लाया-
सनी महाराज !
दिमाग सुन्न ऐनक फिसली जेब में रखे सिक्के खनके
मैनें देना चाहा उसको एक मोटी गाली
इतनी मोटी कि सबको दिखायी दे गई
लड़का भी जानता था कि
पहली ज़्यादती उसी की थी
और यह कि ख़तरा अब टल गया
कहां के हो? मैंने दिखावटी रुखाई से पूछा
और वह कमबख़्त मेरा हमवतन निकला
ये शनि महाराज कौन हैं ?
उसने कहा- का पतौ...
इसके बाद मैंने छोड़ दी व्यापक राष्ट्रीय हित की चिंता
और हिन्दी भाषा का मोह
भेंट किए तीनों सिक्के उस बदमाश लड़के को.

: असद ज़ैदी

अप्रैल 03, 2011

नोट वाले गाँधी बराबर आचार संहिता बराबर मेरे हिस्से वाला यूटोपिया

{यह एक असाइंमेंट के जवाब में लिखी गयी टिप्पणी है जिसमें शायद किसी अचार संहिता जैसी चीज़ पर सवाल था और अब इसे आपके लिए पोस्ट कर रहा हूँ }

आज इस मार्च की इन आखिरी सुबहों को दुपहरी बनते हुए देखते हुए आचार संहिता जैसे स्थापित आदर्शों की तरफ जाने का जी तो नहीं चाहता पर सवाल में पूछी गयी इस पहेली की स्थिति आज नोट पर छपे गाँधी  की तरह हो चुकी है. इसलिए बात करने का और मन नही हो रहा. माने उन मूल्यों की जगह दूसरे तीसरे मूल्य स्थान ले चुके हैं. सारे वातावरण में एक आजीब तरह का संत्रास सा घूम रहा है. बात अगर इतनी घुमाफिरा कर न भी करी जाये तो इस चितकबरे से हो चुके मीडिया तंत्र में बस खेल फर्रुखाबादी चल रहा है. कुछ भी छापो कुछ भी दिखाओ. ये सारे कान में तेल डालकर सिर्फ सुनेंगे, करेंगे कुछ नहीं. कान पर जूं नामक जीव का रेंगना अब बीते दिनों की बात हो चुकी.

तो अब सवाल के जवाब से घमासान करते हुए छपे हुए माध्यम  से दुबारा शुरू करते हैं. पर पहले इसका एक गुण. इसे सिर्फ साक्षर ही पढ़ते खरीदते हैं. समझते कितना हैं ये अन्यत्र जिज्ञासा का विषय है. अखबार माना जाता था - शायाद अभी भी कुछ मानते हों कि वह निष्पक्ष-तटस्थ रहता था - है. इसलिए उसने आज सुविधा, माने, सत्ता के पक्ष को चुन लिया है. उसकी यह गलबहियां कभी भी पकड़ी जा सकती हैं.

पहली बानगी तारीख 26 मार्च, शनिवार, नई दुनिया , पेज आठ, पेज का नाम 'विचार '. यह इस अखबार का सम्पादकीय पृष्ठ  है. सम्पादकीय इस अखबार में पता नहीं कौन लिखता / लिखते हैं. पर इस दिन दूसरी सम्पादकीय टीप पूरे विशवास से कही जा सकती है किसी कांग्रेसी कार्यकर्त्ता द्वारा लिखी या सम्पादकीय डेस्क को श्रुतलेखित करवाई गयी है. इस संदेह की पुष्टि का कारण यह कि पूरी टिपण्णी लगता है प्रतिक्रिया स्वरुप भाजपा के अरुण जेटली को अर्पित समर्पित है. उन्हें खिसयानी बिल्ली कहते हुए सन दो हज़ार चार  के बलिदान को रेखांकित कर फिर दो हज़ार नौ  की मिसाल दे यह सत्यापित किया कि गाँधी नेहरु परिवार में कोई भी प्रधान मंत्री पद के लिए लालायित नही है. साथ ही  नुक्ता ये कि वे चाहें तो कौन सी ताकत उन्हें ऐसा करने से रोक सकती है. और ये भी कि यह अवरोधक शक्ति कम से कम भाजपा नामक पार्टी में तो है ही नही. आगे ये लिखा है, यह बात अलग है की रोज़ कोई न कोई घोटाला प्रकाश में आ रहा है पर इसके लिए उस उक्त महान गाँधी नेहरु परिवार की तरफ इंगित करना ठीक न होगा. सरकार पर बट्टा लग सकता है लेकिन उस परिवार की साख पर नही.

जैसे जेटली की टिपण्णी के केंद्र में प्रधानमंत्री बरास्ते नेहरु गाँधी परिवार को लपेट लिया गया था, वैसे ही यहाँ जेटली कि टिप्पणी चुटकी को बेदम साबित कर उनके पट्ट गुरु आडवाणी से हिसाब चुकता करना रहा. पर दुर्भाग्य जैसे दैवीय शब्द का सहारा लेते हुए इन पंक्तियों के लेखक- इंपले - को कहना पड़ रहा है यह किसी कांग्रेसी मुखपत्र की नही सात सात जगह से प्रकाशित होने वाले अखबार के राष्ट्रिय राजधानी संस्करण के हवाले से कही जा रही है. यह पहली बार नही है जब इस अखबार ने ऐसा कारनामा कर दिखाया हो. आगे आप खुद समझदार हैं. बस रिकार्ड के लिए जेटली वाली टीप को आपके भेजे की मदद के लिए लिखा जा रहा है - जेटली का कहना है कि बेशक विकिलीक्स के खुलासे और वोट के बदले नोट प्रकरण पर प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह के लोकसभा में जवाबी हमले में भाजपा के शिखर पुरुष लाल कृष्ण आडवाणी पर केन्द्रित थे, मगर उनका मंतव्य किसी दूसरी तरफ था.

बानगी नंबर दो. अखबार नवभारत टाइम्स , शनिवार, उन्नीस मार्च दो हज़ार ग्यारह, पेज 12, पेज का नाम 'देश '. अब यह अखबार के चयन का मामला मन जाये या ख़बरों के अवमूल्यन का. या अपने पाठकों को दिग्भ्रमित करने कि कोई पूर्व निर्धारित कार्य पद्धति. चलिए सबसे पहले खबर को ही देखते हैं. जो कुछ यूँ है, ' शाहरुख़ ने दिखाए ऐब्स , बांटा ज्ञान '. इसके साथ नत्थी है शाहरुख़ की शर्ट. जिसमे बटन अपनी पूर्वनिर्धारित जगह पर नही हैं; न ही शर्ट. माने उनकी बलिष्ठ कसरती देह दिख सी रही है. इसे झांकना नही दिखाना कहते हैं; जिससे पाठक को उनके ऐब्स गिनने में आसानी हो.

यह इस अखबार के पाठक को को भली भांति पता है कि इन्हीं का फ़िल्मी ख़बरों, मनोरंजन के लिए सोमवार को छोड़ हर दिन हैलो दिल्ली  नाम से सप्लीमेंट आता है. यह ज्ञान जिसमें शाहरुख़ का लाजवाब सेन्स ऑफ़ ह्यूमर तो था ही साथ में सीरियस बातें भी थीं. जैसे मुंबई शब्द के राजनीतिकरण और धर्म और राजनीति के खतरनाक मेल पर उनके आप्त वचन. पर बेचारा पाठक आदि से अंत तक इस गंभीरता को सिर्फ एक लाइन में निपटा लिपटा पाता है. अब यह उस फ़िल्मी संस्करण का हिस्सा क्यों नही है इसका जवाब उसे डेटलाइन की जगह पीटीआई-आईएएनएस  लिखा हुआ दे रहे थे. फिर भी इस सेमिनार की तिथि नदारद थी. शायद कालातीत होना अन्यत्र देश नामक पृष्ठ पर आने की और एक योग्यता हो. या एक करक इस सेमिनार का प्रधानमंती मनमोहन सिंह द्वारा उदघाटन था. पर इंपले  को फिर भी खोजखबर नही लगी की ये सेमिनार था किस विषय पर !! हाँ, अगरदिमाग के घोड़े  थके न हों तो एक अंदाज़ा भर इसी के सामानांतर छपे प्रधानमन्त्री वाले बयान से लगाया जा सकता है. जहाँ वे रियल एस्टेट सेक्टर में ब्लैक मनी का प्रवाह रोकने के लिए स्टैम्प डियूटी घटाए जाने की जरुरत पर अपने उदगार दे रहे थे. पर ये सहज बुद्धि इतनी सहजता से सर्वसुलभ नहीं, इसी का रोना है.

नंबर तीन.राष्ट्रीय सहारा, शनिवार छब्बीस मार्च पेज 18, मुट्ठी में दुनिया. कुछ समय पहले पत्रिकाओं और अखबारों ने ख़बरों और विज्ञापन, और खासकर उन विज्ञापनों के लिए, जो ख़बरों की तरह आते थे उनके लिए एक शब्द-पद एडवरटोरियल  का प्रयोग करना शुरू किया था. ताकि उनका पाठक दोनों में स्पष्ट अंतर देख व रेखांकित कर सके. जब अख़बारों पर पेड़ न्यूज़ के गंभीर आरोपों की जांच चल रही हो. तब भी इनका ऐसा रवैया समझ से परे है. जिसमे वे विज्ञापन को खबर की तरह पेश करता है और उसके वर्गीकरण की जिम्मेदारी पाठकों के जिम्मे है.

सुर्खी है 'कैमरा जो चमकाए चेहरा ' दुनिया मुट्ठी में इसी पेज पर आती है इसलिए खबर लन्दन से आ रही है. तारीख नहीं है न किसी एजेंसी का ज़िक्र ही है. अब फोटो खिंचवाने के लिए मेकप की ज़रूरत नहीं क्योंकि जापानी वैज्ञानिकों ने ऐसा उच्च प्रौद्दोगिकी का कैमरा विकिसित करने का दावा किया है जिसकी मदद से आपके चेहरे को चमकाया जा सकता है. दांतों को मोतियों सा झक सफ़ेद बनाया जा सकता है. यह तो हुई उस वैज्ञानिक शोध की बात पर. अगली ही पंक्ति में इस इस दावे को पुष्ट करता इतनी तीव्र गति से विकास होता है कि इस प्रौद्दोगिकी का इस्तेमाल एक कैमरे में हो चुका है. और यह बात किसी 'डेलीमेल' के हवाले से कही जाती है. पर इस बात का स्पष्टीकरण नहीं मिलता कि वे उस वैज्ञानिक शोध टीम के सदस्य हैं या पैनासोनिक कंपनी के जनसंपर्क अधिकारी जो इस कैमरे का मौडल नंबर से लेकर इस 'सौन्दर्य सुधार मोड़' के बारे में जानकारी दे रहे हैं.

इस खबर को यहाँ चस्पा करने वालों को शायद यह भी नहीं मालूम की अपने मूल चरित्र में यह खबर कम विज्ञापन नस्लभेदी-रंगभेदी रूप  धारण कर लेता है. अभी हाल ही में ऐश्वर्या प्रकरण  को इतनी जल्दी भुला देना इनकी स्वाभाविक मानसिक प्रक्रिया है या वे इसे याद ही नहीं करना चाहते. शिल्पा शेट्टी-जेड गूडी विवाद  भी इतना पुराना नहीं हुआ. क्या नेल्सन मंडेला  का बरसों जेल में बंद जीवन भी बिसरा दिया. अमरीका जैसे देश में अश्वेतों को मताधिकार  के कितने संघर्ष करने पड़े. चलो यह सब भेजे से भी उड़ गया हो फिर भी गाँधी  तो अपने ही थे.

चलो यह सब बोझिल सा वैचारिक प्रमाद भी मान लिया जाये पर क्या इन्हें यह भी नहीं दिखता कि रंगों  के प्रति हम कितने विकृत हैं. गोरे रंग की चमड़ी को सौन्दर्य का पर्याय माना जाना सिरे से उन सारी सांवली- काली लड़कियों को सीधे अपने प्रति हीनभावना से भर देना नहीं है..यह उनका हमारे द्वारा सीधे सीधे क्रीम  पाउडर बनाने वाली कंपनियों के यहाँ रेहन पर रख देने जैसा ही तो है. लड़का होने वाली दुल्हन में वही प्रचारित प्रसारित सौन्दर्यशास्त्र  के तहत सुन्दरता के मानक खुद के लिए गढ़ता और दूसरे पक्ष को उसी कसौटी पर कसता है. यह सिर्फ आचार संहिता ही नहीं मानव को मानव रूप में स्वीकार न करने का मामला है. उसके अस्तित्व को उत्पादों के हाथों बेच देने का गंभीर चिंतनीय प्रस्थान बिंदु  है जो इससे भी कहीं आगे जाता है जहाँ हमारा समाज पता नहीं कैसा होगा..??

आखिरी उदहारण के लिए अब प्रिंट से दृश्य-श्रव्य माध्यम  की तरफ चलते हैं जिसके लिए शिक्षित साक्षर होने ही कोई ज़रूरत नहीं इसलिए यह सब माध्यमों में सबसे खतरनाक और संवेदेनशील की श्रेणी में आता है. इसका प्रभाव भी सामान रूप से नहीं पड़ता पर उसकी चर्चा आज नहीं. बात वापस आचार संहिता की. जिसकी कोई उपादेयता औचित्य इधर दिख नहीं पड़ रही. हमेशा से ऐसा ही होता आया है.

अगर बात हमारे पड़ोसी मुल्कपकिस्तान  की हो रही हो तब तो कोई सीमा कोई अवरोधक बीच में आना ही नहीं चाहिए. और ये हो भी रहा है. भारत और पाकिस्तान के बीच इस क्रिकेट विश्व कप  का सेमीफ़ाइनल होना तो तीस मार्च को है पर हमारे खबरिया टी.वी.चैनल अभी से शुरू हैं. कोई इसे महासंग्राम कह रहा है तो किसी के लिए ये महायुद्ध - दुनिया की सबसे बड़ी लडाई से कम महत्त्व इस मैच का नहीं है. ज़यादा ही होगा. किन्ही अपवादों के लिए यह अपनी सरहद पार पुरानी यादों- दोस्तों को दुबारा पाने जैसा अनुभव भी दे जाता है. पर कुल मिलाके ऐसा उन्माद बनाने की कोशिश हरबार बार-बार होती रही है. इस पाकिस्तान ग्रंथि का खूब दोहन हुआ है. इस बार भी यही परम आदर्श है.

एक-एक कर उसके साथ लड़े गए सारे सैनिक युद्धों की क्लिपिंग्स हमारे रेटीना को दिखाए जाते हैं. राष्ट्रीयता देशभक्ति -स्वाभिमान -राष्ट्रगौरव  जैसे किन्ही भावों को फिर उद्वेलित कर पाकिस्तान की तरफ मोड़ दिया जाता है. ऐसा कुछ रचा जाता है मानो उसके प्रति हमारे ऐसे व्यवहार के बिना हमारा अस्तित्व, अस्तित्व ही न हो. बिना यह सोचे समझे कि पाकिस्तान भी एक राष्ट्र के रूप में स्वयं को स्थापित करने की हमसे गंभीर जंग लड़ रहा है. अपने सारे आदर्श चुकने के बाद भी वहां की जनता अपने अस्तित्व को हमारे तरह ही जूझ कर पा लेना चाहते है. शाहरुख़ वहां के बाढ़ पीड़ितों के लिए शो में जाना चाहते हैं पर हम उसे मजहबी चश्मे से देखते लग जाते हैं. खुद यहाँ कई पार्टियों का अस्तित्व ऐसी ही किन्ही अवधारणाओं पर टिका है. हमें यह स्वीकारना होगा, हम अपना पड़ोसी न चुन सकते हैं न ही उसे बदल सकते हैं. उसके साथ सहअस्तित्व की भावना  दोनों तरफ वाले जितनी ज़ल्दी समझ जाएँ उतना ही अच्छा होगा. वहां भी हांड मांस के लोग  बसते हैं. हमारी ही तरह.

और मेरी समझ से इसकी जिम्मेदारी का कुछ प्रतिशत इन मीडिया वालों के हिस्से में भी पड़ता है. जिसमें आज तो यह बिलकुल फ़ेल हैं..शायद कल तस्वीर कुछ और हो..या आचार संहिता की तरह यह मेरे हिस्से में पड़ने वाला यूटोपिया  है..पता नहीं..

शचीन्द्र आर्य
28 मार्च 2011, 11:17

अप्रैल 02, 2011

किरकेटवा चालू अहे..!!

क्रिकेट जैसे खेल के साथ सबकुछ नत्थी कर इस निकम्मे से देश को और निकम्मा बना दिया. सारी राष्ट्रीयता सारा गर्व गौरव सम्मान सब इसी के इर्दगिर्द गुम्फित से हैं. कल रात से सब अपना 'फ़ेक-फेस-'बुक' स्टेटस लिख लिख खुद को विशुद्ध भारतीय नागरिक घोषित करने में लगे हुए हैं.अब तुम देखना इस स्टेटस पर दो चार तलवार भांजते अवतरित होंगे जिनकी सारी बौद्धिकता सारे औज़ार इसकी सेवा में समर्पित कर खुद को चुका हुआ साबित करेगी.

{फोटो का ही शब्द रूप }


यह मेरा पच्चीस मार्च करीब सवा दस बजे का फेसबुक स्टेटस है. भारत की क्रिकेट टीम ऑस्ट्रेलिया को पिछली रात हरा चुकी थी और उसका बिस्तर बंध चुका था. उधर पाकिस्तान वाले एक दिन पहले ही वेस्ट इंडीज़ का सूपड़ा साफ़ कर चुके थे. मतलब अब ये दोनों टीमें सेमी फ़ाइनल में भिड़ने वाली थीं. और इस पृष्ठभूमि में इसे व्यक्त किया गया. इसके बाद आये कमेंट्स को उस लोकप्रिय संस्कृति  के एक पाठ्य के रूप में पढ़ सकते हैं. माने मेरी परिभाषा इस कल्चरल टेक्स्ट  भी बनती है. बस पाओलो फ्रेरे  की ये पंक्तियाँ पता नहीं इस आखिरी वक़्त में दिमाग की बत्ती जला कर चली गयीं हैं इसलिए उन्हें भीं साझा कर रहा हूँ जिनसे उनका 'उम्मीदों का शिक्षाशास्त्र  ' शुरू भी होता है. 'चारों तरफ से हमें एक व्यवहारवादी विमर्श ने घेर रखा है, वास्तविकता को बदलना नहीं उसके अनुरूप ढलना ही जिसका मूलमंत्र है.'..

क्योंकि मेरे यहाँ तटस्थता जैसा शब्द नहीं हो सकता इसलिए पहले ही अपनी स्थिति साफ़ किये दे रहा हूँ..आगे आपकी मर्ज़ी..

विपुल: यू फूल...हाहाहा...मैन दिस सक्स.

गौरव: एक आम आदमी को क्या चाहिये रोटी और धोनी की जीत, रोटी न हो तो चलेगा क्यों कि क्रिकेट से वो अपना पेट भरेगा.

शचीन्द्र: देखा दो तलवारबाज़ आया ही गए...

विपुल: भाई तलवारबाज ही चाहिए तुम जैसे पेसिमिस्ट और स्केपटिस्म की ढाल लेकर जीने वालो के लिए..

अलोक:‎ साला ये देश हद है भाई..क्रिकेट के पीछे ये देश निकम्मा है और कोई बोल दे तो सब चिढ़ जाते हैं..फिर कहने वाले की बुराई ही करने लगते हैं..

शचीन्द्र: विपुल ये सिर्फ तुम्हारा दृष्टि दोष नहीं है यह काल ही ऐसा है कोई आलोचना इसे पचती नहीं बस सब इस व्यवहारवादी विमर्श के साथ कदमताल करते चलते हैं..कुछ सोचना नहीं बस वही बना बनाया ढर्रा..और गौरव तुम्हारे इस कथन को व्यंग्य की श्रेणी में रखा जाये या बौद्धिक दिवालियेपन जैसी किसी श्रेणी में, तुम ही बताओ..

गौरव: आज के दौर की सचाई है की डेल्ही जैसी फॉर कंट्री में आया प्रवासी भारतीय, अपनी सैलरी का अंश दान घर कम और मनोरंजन को खरीदने में ज्यादा दिलचस्पी दिखाता है .व्यंग्य तो आपका का हथियार है जो इंडियन क्रिकेट टीम पर चल रहा है.

विपुल: सैची द फैक्ट इज़ यू नीड टू रिलैक्स यॉर सेल्फ एन लुक इनसाइड यू ... ऑल पेसीमिस्म एन अन नेसेसरी अर्ग टू ब्रिंग आउट यॉर टैलेंट ऑफ़ राइटिंग..डू इट नैचरली नॉट फोर्सबली बॉय.

शचीन्द्र: सबसे पहले विपुल तुम्हे बता दूँ कि मैंने कभी भी ख़ुद को आदर्श बनने लायक नहीं पाया है न ही ऐसा कोई इरादा ही है. आदर्श वादर्श सब खोखली बातें हैं कम से कम इस समय..और जहाँ तक इस देश की बात है उस सन्दर्भ में शायद मेरी अपेक्षाएं कुछ ज़यादा ही हैं इसलिए शायद जब भी मुझे लगता है कुछ गड़बड़ चल रहा है उस पर कुछ अपने स्टेटस पर लिख मरता हूँ..कोफ़्त होती है इस देश के संसाधनों की बर्बादी पर..तुम जो भी समझो एक बार फिर कहूँगा यह व्यस्था चाहती है कि सवाल न उठायें जाएँ..'मै चुप रहूंगी' टाइप मौन से भी मुझे परेशानी है..

मनीष: हम अपना काम भी करेंगे व शाम को आकर क्रिकेट मैच भी देखेंगे। जीतने पर खुशी मनाएँगे और हारने पर शायद बिना खाकर अफ़सोस मनाते हुए अगले दिन फिर काम पर चले जाएँगे। आप जिस हिस्टीरिया की बात कर रहे हैं उसका विरोध तो समझ आता है। पर यह सामान्यीकरण कि एक आम क्रिकेट प्रेमी निकम्मा है और इस देश को निकम्मा बना रहा है आपके वैचारिक खोखलेपन की ओर ही इंगित करता है।

विपुल: वेल सैड मनीष...आई थिंक यंगिस्तान इज़ टेकिंग सच एंटरटेंमेंट ऐज़ रिक्रेएशन नॉट स्पोइलिंग स्पॉइलिंग हैबिट..यू नीड अ डीपर इनसाईट सैची ब्रो..नोबडी इज कउईट, बट राइट प्लेस इज इम्पोर्टेंट फॉर राइट वर्ड्स..

शचीन्द्र: यहाँ जिस निकम्मेपन की बात है उसमे मानसिक भी शामिल है और आप जिस सामान्यीकरण की कह रहें हैं तो उसमें आप जैसे दिमागदार अपवाद स्वरुप ही घुसपैठ कर सकें हैं. अपने से हट कर बाकि परिदृश्य पर भी नज़र दौड़ाईए फिर शायद नज़र आये क्रिकेट ही इतना सर्वसुलभता से अखबार से लेकर टीवी पर पाया जाने वाला खेल कैसे बन गया. अगर बात सिर्फ खेल ही की होती तो कल के अर्जेंटीना- कोस्टारिका, पराग्वे-अमेरिका के फुटबाल मैच की कोई खोज खबर कहीं क्यों नहीं है, आप जिस क्रिकेट प्रेमी की पैरवी कर रहें हैं उसके सन्दर्भ में ध्यान देने वाली बात यह है कि उसने क्रिकेट को खुद चुना है या उसके पास कोई और विकल्प छोड़ा ही नहीं गया था.

और विपुल तुम्हारा यंगिस्तान भी तुम्हारा गढ़ा हुआ नहीं है यह उस बहुराष्ट्रीय कंपनी का है जिसके आर्थिक स्वार्थ इस खेल के साथ जुड़े हुए हैं..अब भी अगर ये मेरा वैचारिक खोखलेपन ही इंगित करता है तो भी मुझे यह स्वीकार है..

माया: मित्र इंडिया इज़ द कंट्री औफ़ 545+250+11(क्रिकेट प्लेयर )..दोज़ नैशनैलटी लाइस इन क्रिकेट ?  

विपुल: ओह मैन..रिलैक्स, इट्स जस्ट क्रिकेट...एक तरफ सैची बोलता है सीरियसली मत लो इसे एन ऊपर से इतना सीरियस कमेन्ट लिख दिया एफबी पे... भैया क्रिकेट पे जितना सोच रहे हो कुछ और सोच लो शायद कुछ काम आ जाये..
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इन कॉमेंट्स का काल खंड है शुक्रवार पच्चीस मार्च दो हज़ार ग्यारह, सवा दस बजे से लेकर बुधवार तीस मार्च बारह बजे तक. कुछ को यह सब यहाँ पोस्ट करना अतिरंजना जैसा संस्कृतनिष्ठ कुछ भी लग सकता है पर हमारे समय का एक सत्य यह भी है जो इन सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर चलता रहता है इसे नज़रंदाज़ कर आज कोई नहीं चल सकता. हाँ मैं ये मान सकता हूँ यहाँ इजिप्ट ईरान जैसा कुछ नहीं होने वाला है पर फिर भी इससे इस पोस्ट का अवमूल्यन तो नहीं हो सकता न..!! जिसे ऐसा नहीं लगता वह ये मान सकता है की ये सब उसके लिए था है ही नहीं..कुछ सवालों के ज़वाब मैंने भी नहीं दिए हैं शायद तुम्हे आसपास मिल ही जायेंगे बस आँख कान खोल फिर से जीना शुरू करो..और ऐसा भी नहीं है की आज का फ़ाइनल नहीं देखने जा रहा हूँ. टॉस हो चुका है और श्रीलंका पहले बैटिंग करने जा रहा है..

अप्रैल 01, 2011

होता है शबो-रोज़ तमाशा मेरे आगे : फ़ैज़ अहमद फ़ैज़


 {यह आत्मकथात्मक अंश नया पथ के फ़ैज़ जन्मशती विशेषांक से साभार लिया जा रहा है .ऐसे रचनाकार को जानने समझने के लिए इससे बढ़िया माध्यम और क्या हो सकता है. इसलिए यह एक अवसर है जब हम उन्हें उनकी आँखों से और बारीकी से देख-जान सकते हैं..} 

हमारे शायरों को हमेशा यह शिकायत रही है कि ज़माने ने उनकी क़द्र नहीं की।…हमें इससे उलट शिकायत यह है कि हम पे लुत्फ़ो- इनायात की इस क़दर बारिश रही है; अपने दोस्तों की तरफ़ से, अपने मिलनेवालों की तरफ़ से और उनकी जानिब से भी ज़िनको हम जानते भी नहीं कि अक्सर दिल में हिचक़ महसूस होती है कि इतनी तारीफ़ और वाहवाही पाने का हक़दार होने के लिए जो थोडा बहुत काम हमने किया है, उससे बहुत ज़ियादा हमें करना चाहिए था। 

यह कोई आज़ की बात नहीं है। बचपन ही से इस किस्म का असर औरों पर रहा है। जब हम बहुत छोटे थे, स्कूल में पढ़ते थे, तो स्कूल के लड़कों के साथ भी कुछ इसी किस्म के तअल्लुक़ात क़ायम हो गये थे। खाहमखाह उन्होंने हमें अपना लीडर मान लिया था, हालांकि लीडरी के गुन हमें नहीं थे।या तो आदमी बहुत लधबाज़ हो कि दूसरे उनका रौब मानें, या वह सबसे बड़ा विद्वान हो। हम पढ़ने लिखने में ठीक़ थे, खेल भी लेते थे, लेकिन पढ़ाई में हमने कोई ऐसा कमाल पैदा नहीं किया था कि लोग हमारी तरफ़ ज़रूर धयान दें। 

बचपन का मैं सोचता हूं तो एक यह बात खास तौर से याद आती है कि हमारे घर में औरतों का एक हुजूम था। हम जो तीन भाई थे उनमें हमारे छोटे भाई (इनायत) और बड़े भाई (तुफ़ैल) घर की औरतों से बागी होकर खेल कूद में जुट रहते थे। हम अकेले उन खावातीन के हाथ आ गये। इसका कुछ नुक़सान भी हुआ और कुछ फ़ायदा भी। फ़ायदा तो यह हुआ कि उन महिलाओं ने हमको इंतिहाई शरीफ़ाना ज़िन्दगी बसर करने पर मजबूर किया; ज़िसकी वजह से कोई असभ्य या उजड्‌ड़ किस्म की बात उस ज़माने में हमारे मुंह से नहीं निकलती थी। अब भी नहीं निकलती। नुक़सान यह हुआ, ज़िसका मुझे अक्सर अफ़सोस होता है, कि बचपन के खिलंदड़ेपन या एकतरह की मौजी ज़िन्दगी गुज़ारने से हम कटे रहे।मसलन यह कि गली में कोई पतंग उडा रहा है, कोई गोलियां खेल रहा है, कोई लट्‌टू चला रहा है; हम सब खेलकूद देखते रहे थे, अकेले बैठकर। 'होता है शबो रोज़ तमाशा मेरे आगे' वाला मामला। हम उन तमाशों के सिफ़र् तमाशाई बने रहते, और उनमें शरीक़ होने की हिम्मत इसलिए नहीं होती थी कि उसे शरीफ़ाना शगूल या शरीफ़ाना काम नहीं समझते थे। 

उस्ताद भी हम पर मेहरबान रहे। आजकल की मैं नहीं जानता, हमारे ज़माने में तो स्कूल में सख्त पिटाई होती थी। हमारे वक़तों के उस्ताद तो निहायत ही जल्लाद किस्म के लोग थे। सिफ़र् यही नहीं कि उनमें से किसी ने हमको हाथ नहीं लगाया बल्कि हर क़लास में मॉनिटर बनाते थे : बल्कि (साथी लड़कों को) सज़ा देने का मंसब भी हमारे हवाले करते थे, यानी फ़लां को चांटा लगाओ, फ़लां को थप्पड़ मारो।इस काम से हमें बहुत कोफ्त होती थी, और हम कोशिश करते थे कि जिस क़दर भी मुमकिन हो यों सज़ा दें कि हमारे शिकार को वह सज़ा महसूस न हो। तमाचे की बजाय गाल थपथपा दिया, या कान आहिस्ता से खींचा, वगैरह। कभी हम पकड़े जाते तो उस्ताद कहते 'यह कया कर रहे हो! ज़ोर से चांटा मारो!' 

इसके दो प्रभाव बहुत गहरे पड़े। एक तो यह कि बच्चों की जो दिलचस्पियां होती हैं उनसे वंचित रहे। दूसरे यह कि अपने दोस्तों, कलासवालों और उस्तादों से हमें बेहद स्नेह आशीष, खुलापन और अपनाव मिला; जो बाद के ज़माने के दोस्तों और समकालीनों से मिला, और आज़ भी मिल रहा है। 

सुबह हम अपने अब्बा के साथ फ़ज्र की नमाज़ पढ़ने मस्जिद जाया करते थे। मामूल (नियम) यह था कि अज़ान के साथ हम उठ बैठे, अब्बा के साथ मस्जिद गये, नमाज़ अदा की; और घंटाडेढ़ घंटा मौलवी इब्राहीम मीर सियालकोटी से, जो अपने वक्त के बड़े फ़ाज़िल (विद्वान) थे, क़ुरानशरीफ़ का पाठ पढ़ा समझा; अब्बा के साथ डेढ दो घंटों की सैर के लिये गये; फिर स्कूल। रात को अब्बा बुला लिया करते, खत लिखने के लिए। उस ज़माने में उन्हें खत लिखने में कुछ दिक्कत होती थी। हम उनके सेक्रेटरी का काम अंजाम देते थे। उन्हें अखबार भी पढ़ कर सुनाते थे। इन कई कामों में लगे रहने की वजह से हमें बचपन में बहुत फ़ायदा हुआ। उर्दू अंग्रेज़ी अखाबारात पढ़ने और खत लिखने की वजह से हमारी जानकारी काफ़ी बड़ी। 

एक और याद ताज़ा हुई। हमारे घर से मिली हुई एक दुकान थी, जहां किताबें किराये पर मिलती थीं। एक किताब का किराया दो पैसे होता। वहां एक साहब हुआ करते थे ज़िन्हें सब ‘भाई साहब* कहते थे। भाई साहब की दुकान में उर्दू साहित्य का बहुत बड़ा भंडार था। हमारी छठी सातवीं जमात के विद्यार्थी युग में ज़िन किताबों का रिवाज़ था, वह आजकल क़रीब क़रीब नापैद हो चुकी हैं, जैसे तिलिस्मेहोशरुबा, फ़सानएआज़ाद, अद्बुल हलीम शरर के नॉवेल, वगैरह। ये सब किताबें पढ़ डालीं इसके बाद शायरों का कलाम पढ़ना शुरू किया। दाग  का कलाम पढ़ा। मीर का कलाम पढ़ा। गालिब तो उस वक्त बहुत ज़ियादा हमारी समझ में नहीं आया। दूसरों का कलाम भी आधा समझ में आता था, और आधा नहीं आता था। लेकिन उनका दिल पर असर कुछ अजब किस्म का होता था। यों, शेर से लगाव पैदा हुआ, और साहित्य में दिलचस्पी होने लगी। 

हमारे अब्बा के मुंशी घर के एकतरह के मैनेजर भी थे। हमारा उनसे किसी बात पर मतभेद हो गया तो उन्होंने कहा ‘अच्छा, आज़ हम तुम्हारी शिकायत करेंगे कि तुम नॉवेल पढ़ते हो; स्कूल की किताबें पढ़ने की बजाय छुपकर अंटशंट किताबें पढ़ते हो।* हमें इस बात से बहुत डर लगा, और हमने उनकी बहुत मिन्नत की कि शिकायत न करें; मगर वह न माने और अब्बा से शिकायत कर ही दी।अब्बा ने हमें बुलाया और कहा ‘मैंने सुना है, तुम नॉवेल पढ़ते हो।* मैंने कहा ‘जी हां। 'कहने लगे ‘नॉवेल ही पढ़ना है तो अंग्रेज़ी नॉवेल पढ़ो, उर्दू के नॉवेल अच्छे नहीं होते। शहर के किले में जो लायब्रेरी है, वहां से नॉवेल लाकर पढ़ा करो।' 

हमने अंग्रेज़ी नॉवेल पढ़ना शुरू किये। डिकेंस, हार्डी, और न जाने कया कया पढ़ डाला। वह भी आधा समझ में आता था और आधा पल्ले न पढ़ता था। मगर इस पढ़ने की वजह से हमारी अंग्रेज़ी बेहतर हो गयी। दसवीं जमात में पहुंचने तक़ महसूस हुआ कि बाज़ उस्ताद पढ़ाने में गलतियां कर जाते हैं। हम उनकी अंग्रेज़ी दुरुस्त करने लगे। इस पर हमारी पिटाई तो न हुई; अलबत्ता वो उस्ताद कभी खफ़ा हो जाते और कहते ‘अगर तुम्हें हमसे अच्छी अंग्रेज़ी आती है तो फिर तुम ही पढ़ाया करो, हमसे क्यों पढ़ते हो!'

उस ज़माने में कभी कभी मुझ पर एक खास किस्म का भाव छा जाता था। जैसे, यकायक़ आस्मान का रंग बदल गया है बाज़ चीज़ें  कहीं दूर चली गयी हैं…धूप का रंग अचानक़ मेंहदी कासा हो गया है…पहले जो देखने में आता था, उसकी सूरत बिल्कुल बदल गयी है। दुनिया एक तरह की पर्दए तस्वीर के किस्म की चीज़ महसूस होने लगती थी। इस कैफ़ीयत (भावना) का बाद में भी कभी कभी एहसास हुआ है, मगर अब नहीं होता। 

मुशायरे भी हुआ करते थे। हमारे घर से मिली हुई एक हवेली थी जहां सर्दियों के ज़माने में मुशायरे किये जाते थे। सियालकोट में पंडित राजनारायन ‘अरमान* हुआ करते थे, जो इन मुशायरों के इंतिज़ामात किया करते थे। एक बजुर्ग मुंशी सिराजदीन मरहूम थे अल्लामा इक़बाल के दोस्त, श्रीनगर में महाराजा कश्मीर के मीर मुंशी, वह सदारत किया करते थे। जब दसवीं जमात में पहुंचे तो हमने भी तुकबंदी शुरू कर दी, और एक दो मुशायरों में शेर पढ़ दिये। मुंशी सिराजदीन ने हम से कहा ‘मियां, ठीक़ है, तुम बहुत तलाश से (परिश्रम से) शेर कहते हो, मगर यह काम छोड़ दो। अभी तो तुम पढ़ो लिखो, और जब तुम्हारे दिलोदिमाग में पुख्तगी आ जाये तब यह काम करना। इस वक्त यह महज़ वक्त की बर्बादी है।' हमने शेर कहना बंद कर दिया। 

अब हम मरे कालेज़ सियालकोट में दाखिल हुए, और वहां प्रोफ़ेसर यूसुफ़ सलीम चिश्ती उर्दू पढ़ाने आये, जो इक़बाल के मुफ़स्सिर (भाष्यकार) भी हैं। तो उन्होंने मुशायरे की तरह डाली। और कहा ‘तरह पर(दिये हुए सांचे पर) शेर कहो! हमने कुछ शेर कहे, और हमें बहुत दाद मिली। चिश्ती साहब ने मुंशी सिराजदीन से बिल्कुल उलटा मशविरा दिया और कहा फ़ौरन इस तरफ़ तवज्जुह करो, शायद तुम किसी दिन शायर हो जाओ! 

गवर्नमेंट कॉलेज़ लाहौर चले गये। जहां बहुत ही फ़ाज़िल और मुश्फिक़ (विद्वान और स्नेही) उस्तादों से नियाज़मंदी हुई। पतरस बुखारी थे; इस्लामिया कालेज़ में डाक्टर तासीर थे; बाद में सूफ़ी तबस्सुम साहब आ गये। इनके अलावा शहर के जो बड़े साहित्यकार थे इम्तियाज़ अली ताज़ थे; चिराग हसन हसरत,हफ़ीज़ जालंधरी साहब थे; अख्तर शीरानी थे उन सबसे निजी राहरस्म हो गयी। उन दिनों पढ़ाने वालों और लिखनेवालों का रिश्ता अदब (साहित्य) के साथ साथ कुछ दोस्ती कासा भी होता था। कॉलेज़ की कलासों में तो शायद हमने कुछ ज़ियादा नहीं पढ़ा; लेकिन उन बज़ुर्गों की सुह्‌बत और मुहब्बत से बहुत कुछ सीखा। उनकी महफिलों में हम पर शफ़क़त  होती थी, और हम वहां से बहुत कुछ हासिल करके उठते थे। 

हमने अपने दोस्तों से भी बहुत सीखा। जब शेर कहते तो सबसे पहले खास दोस्तों ही को सुनाते थे। उनसे दाद मिलती तो मुशायरों में पढ़ते। अगर कोई शेर खुद पसंद न आया, या दोस्तों ने कहा, निकाल दो, तो उसे काट देते। एम.ए. में पहुंचने तक़ बाक़ायदा लिखना शुरू कर दिया था। 

हमारे एक दोस्त हैं ख्वाजा खुर्शीद अनवर। उनकी वजह से हमें संगीत में दिलचस्पी पैदा हुई। खुर्शीद अनवर पहले तो दहशतपसंद (क्रांतिकारी) थे, भगतसिंह ग्रुप  में शामिल। उन्हें सज़ा भी हुई, जो बाद में माफ़ कर दी गयी। दहशतपसंदी तर्क करके वह संगीत की तरफ़ आ गये। हम दिन में कॉलेज़ जाते और शाम को खुर्शीद अनवर के वालिद ख्वाजा फ़ीरोजुद्दीन मरहूम की बैठक़ में बड़े बड़े उस्तादों का गाना सुनते। यहां उस ज़माने के सब ही उस्ताद आया करते थे; उस्ताद तवक़कुल हुसैन खां, उस्ताद अद्बुलवहीद खां, उस्ताद आशिक़ अली खां, और छोटे गुलाम अली खां, वगैरह। इन उस्तादों के साथ के और हमारे दोस्त रफ़ीक़ गज़नवी मरहूम से भी सुह्‌बत होती थी। रफ़ीक़ ला कॉलेज़ में पढ़ते थे। पढ़ते तो खाक थे, बस रस्मी तौर पर कॉलेज़ में दाखिला ले रख्खा था। कभी खुर्शीद अनवर के कमरे में और कभी रफ़ीक़ के कमरे में बैठक़ हो जाती थी। गरज़ इस तरह हमें इस ललित कला से आनंद का काफ़ी मौक़ा मिला। 

जब हमारे वालिद गुज़र गये तो पता चला किघर में खाने तक़को कुछ नहीं है। कई साल तक दरबदर फिरे और फ़ाक़ामस्ती की। इसमें भी लुत्फ  आया, इसलिए कि इसकी वजह से ‘तमाशाएअहलेकरम(पैसे वालों की ह्मपा का नाटक, गालिब का शेर है : बनाकर फ़क़ीरों का हम भेस गालिब/तमाशाएअहलेकरम देखते हैं) देखने का बहुत मौक़ा मिला, खास तौर से अपने दोस्तों से। कॉलेज़ में एक छोटा सा हल्का (मंडली) बन गया था। कोयटा के हमारे दोस्त थे, एहतिशामुद्दीन और शेखा अहमद हुसैन, डॉ. हमीदुद्दीन भी इस हल्के में शामिल थे। इनके साथ शाम को महफिल रहा करती। जवानी के दिनों में जो दूसरे वाकिआत होते हैं वह भी हुए, और हर किसी के साथ होते हैं। 

गर्मियों में कॉलेज़ बंद होते, तो हम कभी खुर्शीद अनवर और भाई तुफ़ैल के साथ श्रीनगर चले जाया करते, और कभी अपनी बहन के पास लायलपुर पहुंच जाते। लायलपुर में बारी अलीग और उनके गिरोह के दूसरे लोगों से मुलाक़ात रहती। कभी अपनी सबसे बड़ी बहन के यहां धरमशाला चले जाते, जहां पहाड़ की सीनरी देखने का मौक़ा मिलता, और दिल पर एक खास किस्म का नक्श (गहरा प्रभाव) होता। हमें इनसानों से जितना लगाव रहा, उतना कुदरत के मनाज़िर (सीन सीनरी) और नेचर के हुस्न को देखने परखने का नहीं रहा। फिर भी उन दिनों मैंने महसूस किया कि शहर के जो गली मुहल्ले हैं, उनमें भी अपना एक हुस्न है जो दरिया और सहरा, कोहसार या सर्वओसमन से कम नहीं। अलबत्ता उसको देखने के लिए बिल्कुल दूसरी तरह की नज़र चाहिए

मुझे याद है, हम मस्ती दरवाज़े के अंदर रहते थे। हमारा घर ऊंची सतह पर था। नीचे नाला बहता था। छोटा सा एक चमन भी था। चारों तरफ़ बागात थे। एक रात चांद निकला हुआ था। चांदनी नाले और इर्द गिर्द के कूड़े करकट के ढेर पर पड़ रही थी। चांदनी और साये, ये सब मिलकर कुछ अजब भेदभरा सा मंज़र बन गये थे। चांद की इनायत से उस सीन पर भद्‌दा पहलू छुप गया था और कुछ अजीब ही किस्म का हुस्न पैदा हो गया था; ज़िसे मैंने लिखने की कोशिश भी की है। एकाध नज़म में यह मंज़र खेंचा है जब शहर की गलियों, मुहल्लों और कटरों में कभी दोपहर के वक्त कुछ इसी किस्म का रूप आ जाता है जैसे मालूम हो कोई परिस्तान है। 'नीमशब ','चांद', 'खुदफ़रामोशी', ‘बाम्‌ओदर खामुशी के बोझ से चूर', वगैरह उसी ज़माने से संबंध रखती हैं। 

एम.ए. में पहुंचे तो कभी कलास में जाने की ज़रूरत महसूस हुई, कभी बिल्कुल जी न चाहा। दूसरी किताबें जो कोर्स में नहीं थीं, पढ़ते रहे। इसलिए इम्तिहान में कोई खास पोज़ीशन हासिल नहीं की। लेकिन मुझे मालूम था कि जो लोग अव्वल दोअम आते हैं, हम उनसे ज़ियादा जानते हैं, चाहे हमारे नंबर उनसे कम ही क्यों न हों। यह बात हमारे उस्ताद लोग भी जानते थे। जब किसी उस्ताद का, जैसे प्रोफ़ेसरडिकिन्सन या प्रोफ्रेसर कटपालिया थे, लेकचर देने को जी न चाहता तो हमसे कहते हमारी बजाय तुम लेकचर दो; एक ही बात है! अलबत्ता प्रोफ़ेसर बुखारी बड़े क़ायदे के प्रोफ़ेसर थे। वह ऐसा नहीं करते थे। प्रोफ़ेसर डिकिन्सन के ज़िम्मे उन्नीसवीं सदी का नस्‌री अदब था; मगर उन्हें उससे दरअस्ल कोई दिलचस्पी नहीं थी। इस लिए हमसे कहा दो तीन लेकचर तैयार कर लो! दूसरे जो दो तीन लायक़ लड़के हमारे साथ थे, उनसे भी कहा दो दो तीन तीन लेकचर तुम लोग भी तैयार कर दो! किताबों वगैरह के बारे में कुछ पूछना हो तो आ के हमसे पूछ लेना। चुनांचे, नीमउस्ताद हम उसी ज़माने में हो गये थे। 

शुरू शुरू में शायरी के दौरान में, या कॉलेज़ के ज़माने में हमें कोई खायाल ही न गुज़रा कि हम शायर बनेंगे। सियासत वगैरह तो उस वक्त ज़ेहन में बिल्कुल ही न थी। अगरचे उस वक्त की तहरीकों (आंदोलनों) मसल्‌न कांग्रेस तहरीक, खिलाफ़त तहरीक, या भगत सिंह की दहशतपसंद तहरीक़ के असर तो ज़ेहन में थे, मगर हम खुद इन में से किसी किस्से में शरीक़ नहीं थे। 

शुरू में ख्याल हुआ कि हम कोई बड़े क्रिकेटर बन जायें, क्योंकि लड़कपन से क्रिकेट का शौक़ था और बहुत खेल चुके थे। फिर जी चाहा, उस्ताद बनना चाहिए; रिसर्च करने का शौक़ था। इनमें से कोई बात भी न बनी। हम क्रिकेटर बने न आलोचक; और न रिसर्च किया, अलबत्ता उस्ताद (प्राधयापक) होकर अमृतसर चले गये। 

हमारी जिंदगी का शायद सबसे खुशगवार ज़माना अमृतसर ही का था; और कई एतिबार से। एक तो कई इस वजह से, कि जब हमें पहली दफ़ा पढ़ाने का मौक़ा मिला तो बहुत लुत्फ आया। अपने विद्यार्थियों से दोस्ती का लुत्फ ; उनसे मिलने और रोज़मर्रा की रस्मोराह का लुत्फ ; उनसे कुछ सीखने, और उन्हें पढ़ाने का लुत्फ । उन लोगों से दोस्ती अब तक क़ायम है। दूसरे यह कि, उस ज़माने में कुछ संजीदगी से शेर लिखना शुरू किया। तीसरे यह कि, अमृतसर ही में पहली बार सियासत में थोड़ी बहुत सूझबूझ अपने कुछ साथियों की वजह से पैदा हुई; ज़िनमें महमूदुजज़फ़र थे, डाकटर रशीद जहां थीं, बादमें डाकटर तासीर आ गये थे। यह एक नयी दुनिया साबित हुई। मज़दूरों में काम शुरू किया। सिविल लिबर्टीज़ की एक अंजुमन (संस्था) बनी, तो उसमें काम किया, तरक्कीपसंद तहरीक़ शुरू हुई तो उसके संगठन में काम किया। इन सबसे जेहनी तस्कीन (मानसिक बौद्घिक़ संतोष) का एक बिल्कुल नया मैदान हाथ आया। 

तरक्कीपसंद अदब के बारे में बहसें शुरू हुई, और उनमें हिस्सा लिया। ‘अदबेलतीफ़* के संपादन की पेशकश हुई तो दो तीन बरस उसका काम किया। उस ज़माने में लिखने वालों के दो बड़े गिरोह थे;एक अदब बराय अदब ('साहित्य साहित्य के लिए') वाले, दूसरे तरक्कीपसंद थे। कई बरस तक़ इन दोनों के दरमियान बहसें चलती रहीं; ज़िसकी वजह से काफ़ी मसरूफियत रही जो, अपनी जगह खुद एक बहुत ही दिलचस्प और तस्कीनदेह तजुर्बा था। पहली बार उपमहाद्वीप में रेडियो शुरू हुआ। रेडियो में हमारे दोस्त थे। एक सैयद रशीद अहमद थे, जो रेडियो पाकिस्तान के डायरेकटर जनरल (महाधीक्षक) हुए। दूसरे, सोमनाथ चिब थे, जो आजकल हिंदुस्तान में पर्यटन विभाग के अधयक्ष हैं। दोनों बारीबारी से लाहौर के स्टेशन डायरेकटर मुक़र्रर हुए। हम और हमारे साथ शहर के दो चार और अदीब (साहित्यकार) डाकटर तासीर, हसरत, सूफ़ी साहब और हरिचंद 'अख्तर' वगैरह रेडियो आने जाने लगे। उस ज़माने में रेडियो का प्रोग्राम डायरेकटर ऑफ़ प्रोग्राम्ज  नहीं बनाता था, हम लोग मिलकर बनाया करते थे। नयी नयी बातें सोचते थे और उनसे प्रोग्राम का खाका तैयार करते थे। उन दिनों हमने ड्रामे लिखे, फ़ीचर लिखे, दो चार कहानियां लिखीं। यह सब एक बंधा हुआ काम था। रशीद जब दिल्ली चले गये, तो हम देहली जाने लगे। वहां नये नये लोगों से मुलाक़ात हुईं। देहली और लखनऊ के लिखने वाले गिरोहों से जान पहचान हुई। मजाज़, सरदार जाफ़री, जॉनिसार अख्तर, जज्बी और मखदूम मरहूम से रेडियो के वास्ते से राबिता (संपर्क) पैदा हुआ; ज़िससे दोस्ती के अलावा समझ और सूझबूझ में तरह तरह के इज़ाफ़े हुए। वह सारा ज़माना मसरूफियत का भी था, और एकतरह से बेफिक्री का भी।

उर्दू से अनुवाद : शमशेर बहादुर सिंह
(पुनः साभार नया पथ; अक्तूबर- दिसंबर :2010)

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