मई 26, 2011

छोटा सा रुक्का

उस दिन मेरा तुमसे बोलना क्या हमारे तुम्हारे संबंधों की आखिरी किस्त थी??
शायद हाँ..

क्योंकि उसमे कुछ ऐसा था जिसकी तुमने मुझसे उम्मीद ही नही की थी,
या शायद वह ऐसा कुछ था जिसे तुम इतनी जल्दी सुनना नही चाहती थी,
या जैसा तुमने समझा उसके लिए हम एक दूसरे को जानते ही कितना थे...

पर उस कहने सुनने कुछ न बोलने के चलते आज तक तुम्हारे बारे में न मालूम कितने विश्लेषण चरित-चितरन सुन चूका हूँ.. और हर बार मुझे तुम्हारी तरफ होना पड़ता है. नहीं भी कुछ बोलता तो भी वे सब तुम्हारी तरफ ही मानते हैं..

पता नहीं यह अगियाबैताल किस्से तुम्हारे तक भी पहुचती होंगी भी या नही..अगर कान तक जाते हैं तो क्या तुम भी वही करती हो जो मैं करता हूँ..

मई 09, 2011

गर्मी-मौसम-विखंडन और मेरी विचार प्रक्रिया का वाष्पीकरण

बड़ी देर से कुछ लिखने के लिए जूझ रहा हूँ पर यह कम्बखत गर्मी में लगता है मेरे दिमाग में भी वाष्पीकरण की प्रक्रिया कुछ ज़यादा ही तेज़ हो गयी है. एक अदद सीन भी नहीं लिख पा रहा जिसका लब्बोलुआब ये है कि काँख-काँख का वर्ग चरित्र इसी इसी गर्म होते पारे में ही बार-बार विखंडित होता है..समझ नहीं आया क्या..

सीन कुछ यूँ था.. अभी अभी वातानाकूलित मेट्रो ट्रेन से निकलीं दो देहें -जिन्हें आप अपनी सुविधानुसार स्त्री-स्त्री, स्त्री-पुरुष में बाँट सकते हैं - किसी रिक्शा वाले का इंतज़ार कर रहीं हैं. तुरत ही सेवा में एक नंग धडंग बदन पर चीकट हो चुकी बनियान पहने मैली कुचैली तहमद लपेटे उम्र से पहले खिसियाता खिचड़ी दांतों वाली एक तीसरी देह उपस्थित होती है. जिसे जीता जगता इंसान माना भी जाये उसके लिए दोनों पक्ष रवीश की
किसी रिपोर्ट का इंतज़ार कर रहे हैं..सवारी बुदबुदाती है कमला नगर. और ऐसी ही लचकाती बलखाती आवाज़ उस ढ़ोने वाले के कान तक जाती हैं.

तो समझ का स्तर ये है कि ढोयी जा रही सवारी के पास दो नाक भी है, जिनसे वह रिक्शे वाला मूक संवाद करता पूछता है कि क्या आपकी बुर्जुआ नाक को बदबू आती है मुझसे..??
उसने तो यहाँ तक कह डाला कि जैसे अभी मेरी काँख सूंघकर तुममे कुछ ताज़गी आई है, वैसे ही वहां की गंध सूंघकर तुम अपने तमाम बुर्जुआ बासीपन से छुटकारा पा जाओगे..!!  पर ये दूसरी वाली बात आर्ट्स फैकल्टी के पास किसी अमीर गाड़ी की चिल्लपों में कहीं खो गयी. ऐसा मैं सोच रहा था. पर इधर लगता है बाज़ार ने सुन ली थी.
 
एक मायने में यह विशुद्ध बुर्ज़ुआ मौसम है जो रह रह अपने को विखंडित भी करता है और अपने खरीदार की पैरवी भी करता है. अगर ऐसा न होता तो जो माध्यम बड़े आराम से हैवेल्स के पंखे बेच रहे हैं उनके बही खातों से कूलर की मद क्यों नदारद है..बड़ी बड़ी कंपनियों की पानी की बोतलों का उदय और धर्मार्थ प्याऊ नामक संस्था का पतन एक साथ होना कोई फ़िल्मी संयोग नहीं है.

उसके यहाँ पसीने को लेकर हेय भाव इतनी आक्रामकता के साथ उपस्थित है जहाँ उस पूरी जमात के प्रति पता नहीं कैसी जुगुप्सा उत्पन्न होती होगी जिसे पसीना आता होगा. इनके यहाँ पसीना मानव देह संरचना का स्वाभाविक कर्म न होकर किसी रैली के चलते ट्रैफिक जाम वाली परेशानी है, जो उनकी मल्टीप्लेक्स की खरीदी टिकट पर चपत लगा सकती है.
 
तभी तो वह व्यवस्था ऐसे ऐसे उत्पाद रचती है जिससे पसीना नामक क्रिया इस शरीर नामक संज्ञा से उत्सर्जित ही न हो. इसका एक मतलब यह भी है की एक ऐसा वर्ग है जो उत्पीड़ित है जिसका रंग सांवला है और जिसे पसीना भी आता है दूसरा वह वर्ग है जो शोषणकर्ता है जिसके साथ बाज़ार और वह उसके लिए जीना विलासितापूर्ण तो करता ही है उन सुविधाओं के लिए उत्पीड़न और दमन चक्र को तीव्र से तीव्रतर कने को उकसाता भी है..

यह सिर्फ उत्पाद-प्रोडक्ट- की बात करते हैं उस प्रक्रिया- प्रोसेस- की नहीं जिनकी कीमत पर उनका अस्तित्व खड़ा है. इसका सीधा मानी यह है की हम चूड़ियों की चमक तो देखते हैं पर उन गरम भट्टियों की तपिश महसूस नहीं कर पाते जो बचपन को निगलती रहती हैं.

विज्ञापन कभी नहीं बताते जहाँ डर के आगे जीत  दिलाने वाले पेय पदार्थ का निर्माण हुआ है वहां भू-जल स्तर कितना नीचे चला गया है. उस संयंत्र को स्थापित करने के लिए क्या-क्या हथकंडे अपनाये गए..कार्य स्थलों पर कितना शोषण किया जाता है.. इसके लिए शायद ही कोई उपभोक्ता फीडबैक मांगे. न ही उस चौबीस गुणा सात टोलफ्री नंबर पर बैठी किसी मशीननुमा आवाज़ को परेशान करने की सोचते हैं
 
यहाँ सिर्फ पहाड़ पर चढ़ता नायक है जो न धूप से परेशान है न ही उसकी उजली टी-शर्ट पसीने से भीगती है. उलटे वहां गर्वोक्ति है कि चौबीस अड़तालीस घंटे वह इस प्रकृति निर्मित समस्या से दूर रह सकता है. उधर उसकी सहचरी भी है जो अपने अंडरआर्म्स को इसी गुण से संपन्न कर चुकी हैं. और इन अंडरआर्म्स को अगर विज्ञापन कांखें  कहे तो हो सकता है उसके लक्ष्य उपभोक्ता को 'कै' आ जाये और वह उस उत्पाद की तरफ आकर्षित ही न हो..क्योंकि सिर्फ शब्द ही नहीं बदल उसका वर्ग चरित्र भी बदल गया ..

यह स्वेद निषेध क्षेत्र है. यहाँ गंध मात्र से अति प्रभावित होते दैहिक पींगें बढ़ाते स्त्री पुरुष हैं. इन दैहिक पाठों के बीच यह पूंजीवादी समय में बाज़ार द्वारा रचित सौन्दर्यशास्त्र है, जिसके कर्ता हम नहीं. यहाँ सवालों का लोप ही नहीं उनके अवमूल्यन पर भी खास ध्यान दिया जाता है. हम सिर्फ आनंद  के बाबूमोशय की तरह पहले कठकथा सुनते हैं और फिर खुद को काठ का बना भी लेते हैं..

[दो साल बाद इसी नाम से एक और पोस्ट लिखी है। 
दिन महिना भी लगभग यही है, गर्मी-मौसम-विखंडन और मेरी विचार प्रक्रिया का वाष्पीकरण ]

आवाज़ें..

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