जुलाई 20, 2011

मेरी डायरी का एक पन्ना

22.01.2011; 06:48 pm

वहां कुछ ऐसा हुआ कि गले में पट्टा नहीं बांध पाया..और न मालूम कितने रतजगे इसी विश्लेषण में बीत गए. पूरा साल जहाँ अटका रहा, वहां के लिए जवाब ढूंढ़ता रहता हूँ. शायद इस बार वह दरवाज़ा तोड़ पाऊं. इंतज़ार उसी दिन से अपनी दूसरी बारी का कर रहा हूँ, जब उस लिस्ट से नाम नदारद था. पता नहीं कैसे इस सपने में जीने लगा था कि हम भी अपने को साबित करने के लिए इस घुड़दौड़ में शामिल हो गए. मुझसे ज़यादा शायद..ये 'शायद' भी न गड़बड़ है. संभावनाएं-प्रत्याशायें-टोही किस्म की प्रजाति पिंड ही नहीं छोड़ रही..

खैर, एक बात तो समझ में आ गयी कि ऐसी संस्थानिक मठाधीश प्रणाली से युक्त जगहों पर वैसा नहीं चलता, जहाँ आप पहली ही बात से, उलटपुलट के पुतले, दिखने लगें. यहाँ सवाल अर्धविरामों से लेकर उनके अस्तित्व का भी तो है. आपको कैसे स्वीकार किया जा सकता है!?

वहां एक प्रकार की शब्दावली से से ख़ास तरह की एलर्जी होती है. खुजाते खुजाते कोढ़ न बन जाये इसलिए पहले ही बीटेक्स जैसी किसी प्रक्रिया को चालू कर उससे छुटकारा पाने कि कोशिशें होती रहती हैं. उनके मुख पर मुखौटा तो प्रगतिशील रैडिकल चिंतन समझ और उसकी दिमागी पैमाइश का होता है पर मूल चरित्र कुछ इस किस्म का जहाँ आपने असहमति-विरोध की तुरही बजायी नही कि आप 'कटी पतंग'..

आमूलचूल परिवर्तन सिर्फ किताब में छपा हर्फ़ हो तभी अच्छा..कोई नही चाहता की इस भूल चुके सफे को पोंछ माँजकर कोई इसकी सवारी करे. डंका ज़रूर पीटा जाता है.. मौलिक चिंतन से से लेकर पता नही किन-किन लिजलिजे शब्दों से खेला जाता है. और इनकी उपयोगिता खेले जाने तक ही है क्योंकि आगे सीमातिक्रमण करने पर उस खिलाड़ी के स्वयं चुक जाने का खतरा है!

चितकबरा चिंतन से कभी आगे सोचपना होता है तो कभी-कभी अपनी तथाकथित- स्वकथित- रचित योग्यताओं पर संशय के बादल मंडराने लगते हैं. लगता है शायद हमीं से कहीं चूक हो जाती है. पर दूसरे ही पल पिलपिला सा विचार पकड़ अपने को तुष्ट 
करता हूँ कि इन संस्थानों ने अपनी मियाद पूरी हो जाने के बाद भी अपने अस्तित्व को बचाए रखा है तो ज़रूर कहीं न कहीं संकट ज़यादा गहरा है. आगे एक और नुक्ता संभालता है की इन एक्सपायर्ड इमारती ढांचों के उपयोग उपभोग से हम जैसे स्व-चेतस, स्व-अभि-मानी टाइप के जीवों के आत्म-सम्मान-विश्वास को कितनी चोट लगती है और हम मानसिक रूप से बीमार जान पड़ते हैं.

यथास्थितिवाद की 'स्टे '- अवस्था '  में इनके पड़े होने से खुद पर संदेह संशय अविश्वास सा होता चला जाता है. साथ ही ऐसा घटाटोप बनता है की लगता है कोई ठीक नही एक सिरे से सबको दोबारा रचना होगा. इनकी बुनियाद में जो दीमक लग गए हैं वे परपोषी तो हैं ही साथ ही अपनी आँखों से अलग किसी विकास की परिभाषा को स्वीकार नही करते..

इस ऊपर के पैरा को पढ़ कर आज फिर एक बार याद आई कि भाषा अमूर्त हो जाती है जहाँ बिम्ब तो हैं पर समझने के लिए थोडा प्रसंग की डोर को कभी दिल देकर कभी पेंच लड़ा कर समझे बिना कुछ पल्ले नही पड़ने वाला..

पता नही इस जुलाई में क्या होने वाला है. व्यस्था स्वीकार करेगी या मुझ खुद को व्यवहारवादी होकर उन्ही जवाबों को देना होगा जो वे सब सुनना चाहते हैं..?? बघारने में कुछ ज़यादा ही आगे बढ़ जाता हूँ तो बात संभलती नही..क्या ज़रूरत थी उन्हें पट्टे वाले कुत्ते की कहानी सुनाने की..पर लगता है सच इतनी सफाई से कह गया था कि उन्हें भी अपनी सूरत दिख गयी होगी. इसके बाद भी लिस्ट में नाम का इंतज़ार करना शायद मेरी तरफ से की गयी बेवकूफी ही थी. शायद मिटटी बनना पड़ेगा वो भी कच्ची मिटटी जिससे कुम्हार अपने साँचें ढांचें में ढाल सके..

पता नही कभी-कभी इस बात पर इतना उलझ जाता हूँ कि कोई जवाब नही मिलता. त्रिशंकु जैसा पीछे आठ-सात महीनों से वहीँ अटका हूँ.. हारिल की तरह लकड़ी को पकड़ उल्टा लटका सा महसूसता रहता हूँ..सोचता रहता हूँ क्या जवाब दूँ उन सबको, जिन्होंने मुझे ख़ारिज कर दिया? क्या कहूँ उसे जो तंज कस आगे बढ़ गयी थी?? क्या कहूँ अपने आप से..सवाल बहुल सारे हैं..और जवाब कोई नही मेरे पास..


{इस उधेड़बुन का आगा, अगले मोड़ की टक्कर}

आवाज़ें..

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