अगस्त 23, 2011

वो-अंगद का पाँव- और प्रेम कथा का पंचर टायर

वो-अंगद का पाँव- और प्रेम कथा का पंचर टायर. कहानी सुन कर लगा हमारा पहला आकर्षण 'रूप' के प्रति ही होता है. बिना किसी जान पहचान हमें कोई बस भौतिक उपस्थिति के चलते अच्छा लगता है और बाद की प्रक्रिया में गुण भी द्विगुणित कर दिए जाते हैं. हों ना हों, उसका आभासी आभास हमें ज़रूर होने लगता है. फिर डैने इतने खुल जाते हैं, जिसमे उड़ने के लिए सारा आकाश भी छोटा भद्दा कमतर सा हो जाता है.

'रूप' की परिभाषा में पता नहीं गोरा रंग भी डाल दिया. नाक नुकीली. दांत अनार. आँखें हिरिनी वाली. गाल सेब जैसे. होंठ बांस टाईप लचीले. माथा सूरज की तरह आभायमान.

हम उन संबंधों को कहाँ तक ले जाएँ यह हमारे ऊपर ही होना चाहिए. मतलब यह आदर्श स्थिति है. 'होना', 'न होना' संदर्भित है. और इस कहानी के दैहिक पाठ में 'अंगद' और उसकी रसियागिरी हमारे नायक पर भारी पड़ जाती है. यहाँ कोई चारित्रिक विमर्श नहीं चल रहा, न किसी सही गलत की बात होगी. दो हमउम्रों के बीच प्रौढ़ावस्था का आगंतुक प्रवेश कर आस्तीनों के इंसानों को पहले गढ़ता है फिर डस लेता है. यह बात अलग है दोनों पुरुष नायकों का अनंतिम लक्ष्य दैहिक रसानुभूति ही थी, जिसमे 'वो' के अनुसार 'अंगद' सफलता प्राप्त करता है. क्लायेमेक्स में रोने-धोने-गाने के दरमियान 'सीरित' भी दिख पड़ती है और नायक 'वो' हाथ से नायिका 'देह' को छोड़ता जाता है.

'सीरित' से पवित्रता शुद्तम प्रकार का प्रेम करने का दावा 'वो' कर चुका है. यहाँ तक की इन दोनों के दरमियान देह नहीं आ पाती. 'छू पाने न छू पाने के बीच के द्वंद्व' और राकेश की इस थियरी से इतर वो 'अ-शरीरी' प्रेम की तरफ झुका सा लगता है.

'लगने' का एक कारण यह भी है कि 'वो' अच्छी तरह जानता है कि 'सीरत' किसी और के लिए भी अपनी आँख में आँसू लाती है. और उन दोनों के बीच शरीर आते ही सम्बन्ध विच्छेद हो जाने की सम्भावना से इनकार नहीं किया जा सकता. इसलिए यही भ्रम ठीक है की हम अपनी दैहिक आकांक्षाओं को सतह पर आने से पहले ही सचेत-सतर्क होकर उसका सामना करें.

जबकि 'अंगद' का दर्शन ठीक इसके उलट है और इसमें किसी भी प्रकार के विचलन आने की संभावनाएं न्यून प्रतीत होती हैं. उसके पास विकल्प ही विकल्प हैं. समय तो खैर हर सत्र में दोबारा वहीँ दरवाज़े पर खड़ा होता है.

'वो' के आध्यात्मिक प्रेम संस्करण ने उसे दुखी-दुखी सा बना रख छोड़ा है. साथी पकड़ भी लेते हैं..पर शायद अपनी आ-जा रही इच्छाओं की नैतिक पुलिसिया जांच उसे ऐसा बना रही है या 'सीरत' के इसके प्रति पूर्ण रूपेण समर्पण न होने के चलते उसकी यह स्थिति हो सकती है. जैसा की 'आँसू प्रकरण' से हमें ज्ञात होता है.

दोनों पक्षों का एक दूसरे से इमानदारी के स्तर पर न होना और 'रूप' के कान भरने और जूं रेंगने में जो काम 'अंगद' ने किया; उसे देखें, तो एक समझ की कमी भी लगती है, जहाँ आपको जो कहा जा रहा है उसे आप मानती ही नहीं उसे 'सच का सामना' का कॉलेजी संस्करण समझ गर्दन झुका लेती हैं. 'अंगद' युवा किशोर मनोविज्ञान का सचेत उपयोगकर्ता भी लगता है. नैतिकता- दैहिक- शारीरिक चेष्टाओं को कुलांचें मारता यह बाज़ नहीं आता.

'वो' की इस पंचर सी लवस्टोरी के इस एपिसोड में यही पठकथा लिखी है कि वो अब 'सीरत' के इर्दगिर्द मंडराता भंवरा बनना तो चाहता है पर कली मुरझाई सी है. दोनों को बातचीत कर कई सारी गर्द और धुंधलके को साफ़ कर लेना चाहिए. दोनों की एक दूसरे से इस वर्तमान में क्या अपेक्षाएं हैं कुछ पता तो चले, कुछ हवा तो लगे. मुश्किल है. पर फेफड़े में हूक को कब तक दबाया जा सकता है. दमित इच्छाएं कब मानसिक गाँठ बन अपने व्याहार को अनियंत्रित कर दे उससे पहले सचेत हो जाना जयादा ठीक है.


कहानी कूटपद में हैं और सीमित प्रसार के लिए है, इसलिए पात्र परिचय नहीं दिया जा रहा है. न आप अपेक्षा ही रखें. ऐसा 'वो' ने मुझसे कहा था, कल..!!                                   

अगस्त 20, 2011

बरस्ते आरक्षण:कुछ सवाल कुछ जवाब

आरक्षण. यह किसी फिल्म का नाम था, या वर्तमान भारत की स्थिति थी,या उस पर की गयी कोई टिपण्णी, या इसके प्रदर्शित होने के बाद इस अवस्था पद  में किसी भी प्रकार की अवशम्भावी रुकावट से पहले आने वाली खेद प्रकटन सूचना ??

पता नहीं हम लोग इतने डरे हुए क्यों रहते हैं. हमें अपना अस्तित्व बार-बार क्यों सुनिश्चित करना पड़ता है, के सामने वाला कहीं न कहीं कुछ तो ऐसा कर रहा है जो ठीक नहीं है. पर यह सच है, डर हमारा स्थायी भाव बन गया है. कभी कभी मैं खुद इससे पीड़ित रहता हूँ. अस्तित्वमूलक समय का यह भी एक पाठ है, पर इन रीडिंग्स पर अभी नही..

इससे एक बार फिर सत्यापित हो गया कि हम बोल के लब आज़ाद हैं तेरे  का बोलराग  ज़रूर अलापते हैं, पर हम सब अपने मूल चरित्र में फ़ासीवादी होते हैं. विद्वत जन इसे सरलीकरण कह खारिज करना चाह रहे होंगे; पर क्या यह किसी से छुपा है जिस स्वतंत्रता के लिए हम चीखते चिल्लाते हैं, वही दूसरों को फूटी आँख देने को राज़ी नही.

फिल्म तो अपने आप में ऐसा माध्यम है जिस पर पहले से ही प्री-सेंसरशिप लगी हुई है. मतलब अभिव्यक्ति का वह संस्करण जो काट-छांट कर बाहर आता है. गुलाबी आईना आज तक किसी प्रमाण पत्र की रह देख रही है. सोनाली बोस की अमु 'ए' सर्टिफिकेट के भंवर में फंस कर रह गयी. आखिर में उसे सीधे डीवीडी पर रिलीज़ किया गया. पांच आज तक थियटरों में पहुँच नही पाई, पर कई वेबसाइटों पर उसके पायरेटेड संस्करण उपलब्ध हैं. अभी पीछे खबर आई थी के इसी सेंसर बोर्ड ने अनुराग कश्यप की फिल्म 'दैट गर्ल इन येल्लो बूट्स' देखने के बाद उन्हें किसी मनोचिकित्सक से संपर्क कर अपना इलाज करवाने की हिदायत तक दे डाली.

आरक्षण उपरोक्त वर्ग की फिल्म तो कतई नहीं है. इतना भर ज़रूर है की इसने एक विवादित विमर्श- आप इसे  अवस्था परिघटना त्रासदी से लेकर अपनी सुविधानुसार कुछ भी कहने को स्वतंत्र हैं- को लेकर अपनी बात कही है. यह न किसी के पक्ष में है न किसी के विपक्ष में. यह निर्देशक की बौद्धिक चालाकी ही कही जाएगी जब उसने कोई पक्ष न लेकर सिर्फ यथार्थ जैसे दिखने वाले सचनुमा कुछ को दर्शकों के सामने परोसा.

अब क्या जो दिख रहा है उसे ही एकमात्र सत्य मान लिया जाये या आगे पीछे के ताने बाने तो उधेड़ चादर को देख लिया जाये. शायद मैं अपने को दूसरे वाले के जयादा करीब पाता हूँ. तो शुरू करते हैं एक-एक करके. कुछ छुट जाये तो आप याद दिला दीजियेगा..

आरक्षण मूलतः ऐसे समय की फिल्म है जब हम कथ्य तो यथार्थ से लेते हैं पर शिल्प के स्तर पर उसका साथ छोड़ देते हैं. ऐसी ही कोई बात जनसत्ता के रविवारी में कभी पढ़ी थी. शायद यह उनकी अर्जित संपत्ति हो. रचनाशीलता के नाम पर एक नुक्ता यह भी. ये साली ज़िन्दगी से लेकर 'दैली बैली' तक सभी इसी फ्रेम को चुनते हैं. 'कमीने' भी कहीं न कहीं इसी रोग से ग्रसित थी. लगता है उनकी संरचना में कुछ रह गया. ट्रीटमेंट को कुछ अलग एंगेल से होना चाहिए. सब बाउंसर जा रहा है क्या..

मेरे कहने का मतलब यह है कि ऐसा क्यों होता है कि 'कमीने' का कोई और अंत नहीं हो सका. पूरी फिल्म ग्रे शेड्स में चलती हैं. पर ख़तम कहाँ होती है, थोड़े अच्छे की थोड़े बुरे पर जीत टाईप. अभिषेक चौबे क्यों एक बार फिर 'मृत्युदंड' के ढर्रे पे जा कर 'इशिकिया' को परा-स्त्रैण परिणिति की तरफ ले जाते हैं. गालियों बंदूकों के सहारे किसी फिल्म के संवादों को बोल्ड भी माना जाये और नयी मेढ़ कुरेदती नयी जमीं तलाशती भी. क्योंकर सुधीर मिश्र की 'साली ज़िन्दगी' में किरदार अपने खौफपने से दूर अति-मानवीय लगते हैं. इस हाईपर रियल्टी के चक्कर में फंस क्या प्रमाणित करना चाह रहे हैं. एक बारगी 'मुंबई एक्सप्रेस' के विजय राज और कमल हसन को पचाया जा सकता है. आप सिर्फ कुछ टुकड़े अपनी सलाहियत के लिए लेते हैं और कुछ को छोड़ देते हैं. 

यह कैसा फलसफा है, महंगी ट्यूशन के तुर्रे पर मुफ़्त ट्यूशन. मतलब आप जिस शिक्षा व्यवस्था की पैदाइश हैं, वहां चाहे सवर्ण हो या दलित आपको इन मास्टरों के चंगुल से कोई नहीं बचा सकता. अगर आप में से कोई यह कहना चाह रहा है की तबेले में पढ़ने वालों को सवर्णों के समकक्ष लाने के लिए मुफ्त ट्यूशन दी जा रही है; तो उन साहेबान से मेरा सवाल या यही होगा कि फिर सवर्ण काहे इनकी शरण में जाते हैं. क्या उन्हें इस प्रतिस्पर्धा में पिछड़ जाने का भय अभी से सता रहा है जबकि दौड़ में वे इन शैक्षिक कुपोषित वर्गों से कहीं आगे हैं.

फिल्म कहीं भी भाषा का सवाल नहीं उठाती. मेरी समझ से भाषा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि जिन विषयों की पढ़ाई करके किसी को अगर आईआईटी या उसके जैसे किसी संस्थान में दाखिला पाना है तो उसके विषय का माध्यम अंग्रेजी होना अनिवार्य है. तो क्या हम यह समझे कि विज्ञान और गणित की भाषा अंग्रेजी होने से उनकी पकड़, विषय के रूप में अंग्रेजी भाषा में भी सामान रूप से वे पारंगत होते जा रहे थे.

शिक्षाशास्त्रियों और भाषाशास्त्रियों की दृष्टि में इन दोनों में पर्याप्त अंतर है. हम अपनी मातृभाषा में ही मौलिक रूप से सोच पाने में सक्षम होते हैं और हमारी विचार प्रक्रिया सहज रूप से इसे में संचालित होती है. माने, जो प्रिंसिपल, भारतीय अध्यापक सेवा जैसे विकल्प सुझाता है और इस शिक्षा व्यवस्था को दुरुस्त करने के सपने देख रहा है उसका यह कैसा दृष्टिदोष है कि माध्यम का सवाल उससे छूट गया. 

यह जहाँ ख़तम होती है वहां से और साफ़-साफ़ दिखाई देने लगता है, के भले सत्ता आपके पास है पर वहां भी पदानुक्रम की महत्वपूर्ण  भूमिका है याद करें शकुंतला ताई की भूमिका और यह भी कि यह समय वह समय है जब शिक्षण संस्थाएं राजनेताओं के सीधे हस्तक्षेप और अधिकार क्षेत्र का हिस्सा है. जिसका एक मतलब यह भी है की आपकी पूंजी उनके काले धन के लिए सेफ्टी वोल्व के साथ उस काले धन का स्रोत भी बन चुक है..

अगस्त 17, 2011

भाषा का मिसफिट रेफरेंस

नीचे जो आप '' और '' दो पात्रों के माध्यम से संवादों में विकसित, भाषा के सवाल पढ़ने जा रहे हैं, ये नाम मैंने इन्हें दिए हैं. उस पुर्जे पर कोई ऐसा संकेत नहीं था .वहां ऊपर वाली सवालनुमा बातें नीली कलम से और नीचे जवाबनुमा काली से लिखी हुई थीं. यह मुड़ा- तुड़ा कागज़ ,बरसात में भीग चुकने के बाद भी, हिंदी में लिखे होने के कारण मेरी आँखों को खटका. उठा कर देखा-पढ़ा तो लगा किसी अ-हिंदी भाषी बैठक में किन्ही दो मित्रों के बीच भाषा जैसे जटिल विषय पर कोई अनौपचारिक बात इस टुकड़े पर बिना बोले लिख कर हो रही होगी. पता नहीं इसे वहां ऐसे क्यों फेंक दिया शायद पहचाने जाने के संकट से बचने के लिए ऐसा किया होगा..चाहे जो हो अब ये यहाँ पोस्ट कर रहा हूँ . बात शुरू होती है सौंदर्यशास्त्र से..

 
.इनका सौंदर्यशास्त्र थोड़ा अधिनायकवादी है.
.और सारे सौंदर्यवादी अधिनायकवादी हैं, हमारे आस-पास.

.क्या यह इनमे भाषा के माध्यम से आया है?
.न!! बाद में इस पर बात करेंगे, लम्बा विषय है.

.या समाज, परिवेश, संस्कृति का योगदान अहम है?! क्या भाषा इनमे कहीं छिपी सी नहीं है? मेरा मतलब गौण किस्म से..
.मेरे पास इसके उदहारण हैं.


.मेरे पास भाषा तो है, पर उसका अस्तित्व संदिग्ध सा माना जा रहा है!
.किस बेटे ने कहा? मेरे रहते!!

.इस संस्थान के इस कमरे में सारे विद्वत जनों की भाषा मैं समझ रहा हूँ, पर यह मेरी क्यों नहीं है ??
.तुमने मेरी ऊपर की बात को ठीक से नहीं समझा, एक बार गाली देकर देखो सब समझ जायेंगे.

.अस्तित्व की संदिग्धता और वह भी भाषा की, इसलिए है क्योंकि यह संस्थान खुद को तो नंबर एक कहता है, पर दूसरा बैल हिंदी वाला कब होगा? मेरे कहने का मतलब जिसमे मैं सोचता समझता बोलता ढांचे बनता हूँ, मुझे वह स्वंत्रता टकरा कर ही क्यों मिलती है? गड्ड-मड्ड सा है पर समझ लो.
.वह तो गुलामी का प्रभाव है भाई इसीलिए तो अपन लड़ रहे हैं.

.मुझे लगता है सिर्फ गुलामी नहीं उसके पीछे हैजेमनी  वर्चस्व की भावना भी काम कर रहे हैं, आप उस भाषा को माध्यम बना कर अपने को स्थापित करना चाह रहे हैं जो कम लोग समझ पते हैं बोल पाते हैं, यही आपका विशिष्टता बोध है.
.वर्चस्व तो है ही इस वर्चस्व के कारण भी तो गुलामी ही है.

.मेरा या कहूँ हमारा ऐसा पक्ष-विचार रखना, कहीं न कहीं हमें इस पैटर्न में मिसफिट तो बनता ही है, हम अपने प्रति हेयता बोध से ग्रसित होकर, दूसरी भाषा में कूदना चाहते हैं. हमारा भाषिक दुराग्रह हमें कहाँ का रख छोड़ेगा??
.सही कह रहे हो. पर यह हमारी हीनता से ज़यादा हमारी मजबूती है.

.यह मजबूती कमजोरी जैसी क्यों लग रही है, हम स्वयं को कहाँ पायें..??
.गुलामी इसी रूप में हमें भी प्रभावित कर ही रही होती है. यह स्वाभाविक सी लगती प्रक्रिया नहीं, थोपी गयी है.

 ***
यहीं ये संवाद रुक जाता है. मैं उन दोनों से मिला नहीं हूँ पर इतना ज़रूर कहूँगा,उनके पास अपनी भाषा को लेकर जो समझ है उसके प्रति जो बातें हैं कहीं न कहीं हमारे सन्दर्भों में फिट होती हैं मतलब हम मिसफिटों के रेफरेंस में..

आवाज़ें..

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