सितंबर 25, 2011

एक लड़की एक दीवाना

पता नहीं हम दोनों के बीच ऐसा क्या था जो अब नज़र नहीं आता. कहीं गुम-सा हो गया. शायद जिसे वापस खोजने की कोशिश हम दोनों ने नहीं की. सक्रीय रूप से. की होती तो कुछ ऐसा लगता ही नहीं. प्राथमिक स्थिति प्राथमिक स्तर पर आज शायाद हम दोनों थोड़े से खिसके हैं. दिमाग से नही पैराडाईम वाला शिफ्ट हुए हैं. हमारी बातचीत में जिन चीजों से जिरहें शुरू हो कर हमारे अंतर की गिरहें खुलती थीं शायद अब उन सबके जवाब तुमने अकेले पा लिए हैं और मैं पीछे रह गया.

अब तुम्हे देखता हूँ तो 'जब वी मेट' की करीना नहीं दिखती न ही उसका खिलंदडपन. उसकी जगह, दिन-पर-दिन एक बेफिक्र होती जा रही बेडौल देह दिखती है. जो संतुष्टि जैसे किसी शब्द के पास अपने को पा रही है. हमारे-तुम्हारे सन्दर्भों में पति -पत्नी से लेकर, 'अ-संस्कारी टाईप' होती जा रही, इस पीढ़ी में, अपनी संतति के सर्वाइवल तक के सारे पेंच खुलते-कसते जाते थे. एक नक़्शे जैसा. पर तुम्हारी शक्ल पर जाएँ, तो समझदारी कम, उस सौन्दर्य की लोकप्रिय परिभाषा की व्याख्या ज़यादा पढने को मिलती है. पर तुमने कभी माना नही.

हम दोनों मिलकर उस खालीपने को भरने की कोशिश ही तो कर रहे थे जिससे हमारे-तुम्हारे घर भरे रहते थे. तुम्हारी समझ और वो भी आजकल के लड़के-लड़कियों को लेकर, कभी कभी लगता है, अपने आप बनी, या साथ-साथ चलते-चलते इस दोपाये के लिए साथ-साथ बनायीं जा रही थी. अभी तक समझा नही हूँ..[-वाक्य संरचना दुरूह है इसलिए फिर से पढने की कोशिश करें-] ऐसा इसलिए कि शायद इन सबसे वितृष्णा के सारे गुणों के साथ तुम्हे अच्छी तरह से पता था तुम लड़की हो.

इधर लगने भी लगा है तुम मुझसे बात कर कर खुद तैयार हो रही थी. मेरे साथ आने के लिए नही. यह तो पक्का है. उन संभावितों की लिस्ट में मेरी बातों से लेकर बाह्य आभा मंडल भी कुछ कुछ ऐसा नही हो सकता था कि मैं टिकता. कहीं न कहीं एक ऐसे साथी जिसके साथ पता था कहाँ तक बात ले जानी है. तुम वहीँ तक ले गयीं. पर मैंने ऐसी कोई हदबंदी नही की. शायद उस वक़्त यहाँ लिखने के आलावा किसी देह मांस पिंड को बताने की ज़रूरत भी थी.

अब तुम्हे देखने का भी मन नही करता. तुम्हारी आँखों में भी नही. न कभी उन छुअनों को महसूस करना चाहता हूँ. जो असमय आते जाते छूते जाते थे. वह स्पर्श अब सिर्फ मेरा है. किसी को नही दूंगा छूने के लिए.

पीछे से आगे ऊपर से नीचे लिखते हुए को दोबारा पढूं तो यकीन के साथ कह सकता हूँ की मेरी गिनती या तो असफल कहानी कार के रूप में होगी या घुसपैठ की महत्वकांक्षा लिए अरबी-घुइया की सब्जी खाए-पादते लिक्खाड़ की तरह या उन 'परा-उत्तर-आधुनिक' रचनाकारों में जिनकी लिखी भेजे के ऊपर किसी बाउंसर से कम नही.

मनोहर श्याम जोशी तो अपन होने से रहे, अपना कोई दूसरा ही वर्ज़न है. न ही उदय प्रकाश वाली एक अदद पीली छतरी वाली ही अपने लिए खोज पाए. अच्छा है प्रेमचंद जैसा 'गंगा-यमुनी छलांग अंत ' नही हुआ..और इससे पहले कोई मुझे जैनेन्द्र, निर्मल वर्मा, अज्ञेय, मोहन राकेश कहे, मैं खुद ही इन उद्गारों को यहाँ बंद करता हूँ..आगे की फिर कभी..

सितंबर 18, 2011

विचार-द्वन्द का मिसफिट रेफरेंस और पहली सालगिरह

क्या लिखूं. कुछ समझ नहीं पा रहा हूँ. पता नहीं क्यों अजीब सा लग रहा है. तीन सौ पैंसठ दिन पहले इसे यह नाम दिया था. आज 'करनी चापरकरन' की पहली सालगिरह जैसा ही कुछ है..सुबह से ही सोच रहा था कुछ तो लिखना है, पर वो क्या होगा?? नीचे क्या लिखने जा रहा हूँ मुझे खुद नहीं पता. एक मोटा-मोटा सा खांचा ज़रूर दिमाग में घूम रहा है. चलो एक-एक कर याद करना शुरू करता हूँ..

'चापरकरन' अवधी भाषा में एक विशेषण है और माँ -पढ़े मम्मी- के कारण मेरे कुछ ज़यादा ही पास भी. 'चापर कय दिहओ..!!' हर साल गाँव जाने पर दो-चार बार कान में यह ध्वनि पड़ ही जाती थी. जहाँ संसाधन अपनी अल्पतम अवस्था में हों वहां ऐसा कुछ होना, पूरी प्रक्रिया को दोबारा करने की जद्दोजेहेद से कम नहीं..मतलब उस स्थूल से दिखने वाले द्रव्य के लिए किन्ही विशेष महाजनी सभ्यता के पोषकों के पास जाना और घेर घारकर या तो चिरौरी करना या अपना कुछ कभी दुबारा न देख पाने के निश्चय के बाद रेहन पर रख देना. सीधे स्पष्ट सरल शब्दों में जब किसी बने बनाये काम को या उसकी धारा को उसकी विपरीत दिशा में मोड़ दे या बिगाड़ दे, उसके लिए हमारी तरफ 'चापरकरन' ऐसी ही कई विशिष्टताओं -विकृतिओं का गुंजलक जैसा रहा है..

पता नहीं माँ -इसे भी पढ़ें मम्मी- ने पहली बार कब किन सन्दर्भों में मुझे इससे सुशोभित किया. शायद उसका मतलब इतने सूक्ष्म में न जाकर सतह पर तैरता इस पहले वाले के पास होगा. काम में मन न लगाने वाला, टालते रहना, अपने किस्म का आलसी टाईप..पर जब मैंने इस पद को लिया तो इसमें अपने अर्थ-अपने सन्दर्भ डाले. इलियट की 'कल्पना'. कुछ रचने से पहले कच्चे माल के साथ बहुत तोड़फोड़ करती है, उसे गलाती पिघलाती है, उसका मूल रूप मिट जाता है और तब जाकर कुछ सामने आता है. और भी पता नहीं क्या-क्या..

इस माध्यम में अपनी बात कहने की बात जब मैंने अपने सर से कही तो वे बोले, पहली देखने वाली बात यह है के यह माध्यम किस व्यवस्था की उपज है..यह किन व्यक्तियों को लाभान्वित करता है, कौन इसके उपयोगकर्ता हैं. फिर यह भी के अखबार इस मुकाबले में कम-से-कम पहुँच के मामले में इन्टरनेट से कहीं आगे है और सस्ता होना इसको अलग कतार में खड़ा भी करता है.

इन सब बातों के बाद मैंने सिर्फ इतना कहा था माध्यम भले इन दोनों में से कोई हो, उसकी पहुँच में वही है जो साक्षर है. और आप जिस अखबार में लिख रहे हैं उसके भी पाठक निश्चित से ही होंगे. तब तक हम कॉलेज के गेट पर आ गए थे और शायद ऑटो को हाथ दे कर रोकने-मनाने का प्रयास करने लगे थे. आज तक मैं इससे जूझता रहता हूँ. गाहे-बगाहे किसी कोने से उठ कर सामने आ जाता है और सवाल-जवाब करने लगता है. कई-कई दिन फिर इधर आता भी नहीं..

मैं किसके लिए लिख रहा हूँ मेरा पाठक कौन है. उसे चिन्हित कैसे करूँ. जिन विषयों पर लिख रहा हूँ उसे नियंत्रित कौन कर रहा है या ऐसी किसी भी व्याधि का मतलब है प्रयोजनवादी सरहद में घुसपैठ कर गया हूँ..या यह विचार की प्रासंगिकता जैसा कोई मामला ही नहीं है. जिसे राघवेन्द्र सर कहते हैं, 'उसका होना ही अपने आप में पर्याप्त है, उसे अपने को साबित करने की कोई ज़रूरत नहीं..!!'

पर फिर खुराफात आती है कि अन्तोनियो ग्राम्सी की जेल नोटबुक या भगत सिंह का कुछ भी उन दीवारों के इस पार न आ पाता या ऐना फ्रैंक की डायरी नाज़ियों के हाथ में लग जाती और दशकों पहले राख के ढेर में बदल जाती; तब क्या उस विचार का 'मूल्य' जैसा मूल्यपरक मूल्य क्या होता. अगर ऐसा कुछ नहीं था तो क्यों सुकरात ने प्लेटो को संकलित किया..

सवाल यह भी है कि अमूर्त मानसिक प्रकल्पों से मूर्त रूप में आने के बाद ही विचार का अस्तित्व माना जाये तब. क्या उसका कहीं लिपिबद्ध होना ही प्रयाप्त है..मैं इस ब्लॉग के अस्तित्व में आने से पहले यही कोई तीन-चार सौ के करीब पन्ने रंग चुका था जिसे मेरे भाई के अलावा शायद मुकेश ने राकेश ने और अभी पीछे आलोक अरुण उमेश ने देखा..मेरा कहना है कि 'स्वान्तः सुखाय' जैसी किसी शास्त्रीय शब्दावली के अलावा भी कोई और श्रेणी है जिसमे वह सब अटता है भी या नहीं..

इन सूक्ष्मताओं-जटिलताओं को फिलहाल थोड़ी देर के लिए ऊपर के माले में बैठने का घुलने मिलने का वक़्त देते हुए अगर इस माध्यम पर वापस आयें तो सबसे पहली समस्या इन्टरनेट कनेक्शन की थी जिससे पार पाने के लिए चोर रस्ते से घुसपैठ की. मतलब आज तक की गयी सारी पोस्टें नोकिया 6300 से डेटा केबल जोड़ कर पहले पी.सी.सुइट के जरिये साल भर पहले आज के दिन ब्लॉग बनाया. हिंदी कैसे लिखें, यह आलोक से पता चला था. उसके फेसबुक स्टेटस को हिंदी में देख कर एक दिन कॉलेज में पूछ लिया था.

अपनी भाषा में लिखने का अपना ही मुहावरा है. शुरुवात इतनी आसान नहीं थी जितनी लग रही है. पहली तीन पोस्ट करने के बाद एक जटिल से अनुवाद के चलते डिलीट हो गयीं जिसमे से दो को ही वापस अपने रजिस्टर से ला पाया था पर उसी रूप में नहीं..इतनी स्लो स्पीड. ट्रांसलिटरेशन में अंग्रेजी लिख कर इंतज़ार करना पोस्ट करने से पहले एक बार पूर्वालोकन के लिए बुत बन कर टी.ऍफ़.टी. के सामने मुंह बाए बैठे रहना..

फिर बीच में कूदकर खटरपटर करता अर्थशास्त्रीय गणित फाट पड़ता है, कहता है, जितना श्रम तुम यहाँ कर रहे हो जितनी पूंजी-जितना समय तुम व्यतीत कर रहे हो उसका प्रतिफल क्या मिल रहा है. दूसरा कोना कहता युटीलिटेरियन हो गया है बे..हर जगह कुछ न कुछ हासिल कर लेना चाहता है..!! पर सवाल तो सवाल है. इन बावन-पचास पाठकों के आलावा मेरे लिखे को कौन पढ़ रहा है, मुझे अंदेशा तक नहीं होता. इनमे भी यह पढ़ रहे हैं कि नहीं पता नहीं..गूगल के उस आधिकारिक आंकडें पर भी कैसे विशवास करूँ जो डैशबोर्ड पर कह रहा है कि इसे चौदह देशों में पढ़ा जा रहा है.

यदि सम्प्रेषण की परिभाषा की घुसपैठ करवा दूँ तो दूतरफ़ा प्रक्रिया में मैं कोड सन्देश कूटपदों के ज़रिये अपने अज्ञात तक भेज रहा हूँ पर वहां से उसकी प्रतिपुष्टि में एक अदद 'डी-कोडेड' टिपण्णी तक नहीं आती. इसे क्या समझा जाये, मेरी सारी बातों-विचारों से पूर्णतः सहमति. कोई ऐसा बिंदु नहीं जहाँ असहमति का साहस सहमति का विवेक प्रतिलक्षित हो पाता..यह ऊपर कही बातों से विरोधाभासी लग सकता है, पर जब बात मैं संवाद स्थापित करने की कहता हूँ तब यह एकालाप जैसी किसी स्थिति में अपने को पाता हूँ..

जैसा यहाँ लिखा पाया जाता है जैसा लिखता हूँ, उससे मेरे बारे में कई छवियाँ बन रही हैं-होंगी. तो कई टूटफूट कर पुनर्निर्मित भी हो रही हैं-होंगी. जनसत्ता में ब्लॉग पोस्ट आने के बाद साथियों ने विशेषकर उन सबने जो भाषा या साहित्य से बहुत पक्के धागे से नहीं जुड़े हैं उनका कहना है कि मेरी भाषा विशिष्ठ शब्दावली लिए होती हैं जो सहज मानसिक बोध संपन्न व्यक्ति की समझ से परे जाती हैं. दो-चार विद्वतजन सिरे से पत्रकारिय शैली कह ख़ारिज करने पर तुल जाते हैं. कुछ का ये भी कहना है, मैं ऐसी किसी दौड़ में शामिल हो गया हूँ जहाँ से किसी ऐसी जगह जल्दी से जल्दी पहुचना चाहता हूँ. आशीष इसे बुद्धिजीवी जैसा कुछ कहता है. यह जगह है -दौड़ है या कुछ और..पता नही..

अगर मैं यहाँ हूँ तो इसका मतलब है कई सारी चीजों को स्थगित कर यहाँ आने का मौका निकाल पाता हूँ..और फ़िर चाह कर भी उसे पकड़ नहीं पाता. सोचा था जिस छोटी सी कुर्सी-मेज पर बैठ कर लिखता हूँ उसकी तस्वीर भी लगाऊंगा, खैर फिर कभी. अभी जा रहा हूँ छत पर कुछ देर इस सब पर ठहरूं..यह स्पेस मेरा ही विस्तार है. साल भर पुराने इस अभिव्यक्ति के ग्रे एरिया में मेरी आप सबकी आवाजाही बनी रहे यही कामना है..दिल्ली के आसमान में बादल है, शायद रात में बारिश हो..पौने छह घंटे की मैराथन बैठक के बाद उठ रहा हूँ..बीच में चार-छह बार तो उठा ही था; पानी भरने-कूड़ा फेंकने के लिए..

{सफ़र दूसरे साल तक आते आते } {इन बीतते तीन सालों बाद }

आवाज़ें..

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