दिसंबर 23, 2011

इतिहास जो अतीत नही

जब-जब पकाऊ कक्षाएं होती रहेंगी तब-तब ऐसी पोस्टें आती रहेंगी..ये वाली ग्यारह नवम्बर की ऐसी ही रचनात्मक कक्षा का प्रतिफलन है. समय यही करीब सूरज ढलने को हो रहा था..क्रमबद्धता और सूत्र कहीं कहीं टूटे जान पड़ें तो आपही जोड़ लेवें..सामने अध्यापक हो तो इतना तो आप भी समझ सकते हैं न..!!

मेरा मन कर रहा है उस मछलीघर में लगे पौधे की तरफ जाकर बैठ जाऊं. अगर यही पढ़ना-पढ़ाना है और उस पर विश्लेषणनुमा यही सब होगा तो बदला क्या.. न तब का पढ़ा कुछ याद है न अबका रहेगा. शायद ये याद न रहना ही वहां से हमने सीखा हो..न कोई कहानी याद आरही है न कोई पाठ. सिर्फ डर याद है और उससे बचने के हमारे तरीके. 'नंदलाल दयाराम' की कुंजियों से नक़ल कर अगली सुबह ले जाना. बिना समझे. बिना जाने. और उन सबो ने उसे नाम दिया था 'होमवर्क'..आज सिर्फ रह गयी हैं उन कक्षाओं की भयाक्रांत छवियाँ..

भाषा समझने के वो सारे औज़ार देती है जिससे खिड़की से बाहर की दुनिया कुछ-कुछ समझ में आने लगती है. पहले वाले भ्रम नहीं होते सब धुलने लगते हैं, एक-एक करके..वह उस पराभाषा को-उसमे ले लिए गए मूल्यों-परिभाषाओं को पढ़ पाने में सक्षम हो जाती है. उसकी धज्जियाँ उड़ाती है. पर बाज़ार में उसकी कोई औकात नहीं.

मुझे ढूंढे से भी कोई चेतन भगत  टाईप लिक्खाड़ नज़र नहीं आता। इसे भी लुगदी साहित्य कहकर मठाधीशों ने उसे लगभग बाहर ही कर दिया है, खुद को पदानुक्रम में ऊपर बनाये रखने की योजना के तहत..पर ये बाज़ार की अपनी शब्दावली है जिसे हमें समझना है..उसके कूटों को विखंडित कर दिखाई देता है कि चेतन बिकाऊ माल हैं और रूपा पब्लिकेशन को कोई परेशानी भी नहीं उन्हें छापने में..

तुम सिर्फ पढ़ रही हो या समझते हुए पढ़ रही हो..कितना समय उसे समझने में लगाती हो या उस भाषा पर तुम्हारी पकड़ है. यह बार बार दोहराना अपने आपको उसी स्थिति में हर बार पाकर उसके अनुरूप हो जाना नहीं है..??

अनुक्रिया-अनुकरण दोनों तरफ से सामान रूप से हो रहा है! यह सारे लोग दूसरी भाषा में जाकर पैसा कमाकर इसी का उधार करने की योजना पर काम कर रहे होते हैं. पहले दूर जाते हैं. कमाते हैं और सिर पर आ चढ़ अपने में दया समानुभूति कृपा करने का भाव लिए हमारे बीच डोलते रहते हैं. उसी में अपने हिस्से को देने की इतनी बड़ी त्याग की भावना प्रवाहित हो रक्त से ह्रदय तक लाती है और तब धारावी-जहाँगीर पुरी में सामजिक कार्य करते पकडे जा सकते हैं.

इनको समाज वैधता भी देता है या यह इनके द्वारा स्वयं हथिया ली जाती है; मधुर भंडारकर की पेज थ्री  इसी आख्यान को हमारे सामने रखती है. पर इसे अलग से भी विखंडित करने की ज़रूरत है, इसे समझना है. जहाँ तक हो यह किन्ही तत्वों पर टिकी है और सबसे बड़ा कारक उनके पास वह होना है जिसका दूसरे पक्ष के पास आभाव है. मतलब 'द्रव्य' 'क्रयशक्ति' माने 'पूंजी'. एक अर्थ में पूंजी वाले अव्यव पर इनका मजबूत होना इनकी तरफ आशाओं-प्रत्याशाओं से देखते हैं. जब आप उनके सामने इस रूप में सक्षम हैं और उनकी कई सारी समस्यों का निवारण उससे ही होगा तब तक उत्पीड़न की यह प्रक्रिया चलती रहेगी. और आपके पास इसके औज़ार के रूप में शिक्षा भी तो है.. इसका भी उधर आभाव है..

मार्क्स कहेंगे जाओ इतिहास में देखो यह कभी अतीत नही होता, वह हमारा वर्तमान है कभी बीतता नही. उसे समझो. सांस्कृतिक वर्चस्व में पूंजी और उसका अधिशेष में होना पहले प्याऊ, कुओं, धर्मशालाओं, सरायों, मंदिरों, और ऐसी ही व्यवस्थाओं के रूप में आता था. 'मदर इण्डिया' का सुक्खी लाला कैसे आकाल को औज़ार बना इस पूंजी को अपनी बहियों में दर्ज करता चलता है. इस महाजनी सभ्यता को जानने के लिए प्रेमचंद औज़ार की तरह हमारे पास हैं..

दिसंबर 20, 2011

अनुभूति अभिव्यक्ति और जिंदा साओ

शनिवार 17/12/2011. सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ एजुकेशन {सीआईई } दिल्ली विश्वविद्यालय.

फाउंडेशन वीक (स्थापना दिवस सप्ताह) में राजीव लोचन आ रहे थे. कानों ने पहली बार सुना. नोटिस बोर्ड पर परिचय था नैशनल गैलरी ऑफ मॉडर्न आर्ट (एनजीएमए) के निदेशक. बीए के ज़माने से जयपुर हॉउस के आगे से M-13 गुज़री..न जाने कितनी बार इण्डिया गेट किसी न किसी से मिलने घूमने पहुंचे, पर उस गली जा न सके..आज खुद कोई वहां से आ रहा था इसलिए रुका रहा और रबीन्द्रनाथ की कलाकृतियों और आधुनिकता पर सुन वहां से आने के बाद पहली अभिव्यक्ति..

अनुभूतियाँ जैसी अनुभव होती हैं उन्हें वैसे ही अभिव्यक्त कर पाना. इसके किये माध्यम क्या हो?  गीत-संगीत..रंग कूची.. भाषा..उसके कलारूप..?? भाषा जैसे-जैसे आगे बढती चलती है अपने पीछे कई जगहों पर खाली स्थान छोड़ते चलती है, जिसे समानुभूति विज्ञ अपने से भरता चलता चले. पर इतना आसान न उस अनुभव को लिख पाना है न पढ़ पाना.

जो जैसा है उसे वैसा ही प्रस्तुत कर देना किसी भी रूप में कला नहीं उसका पुनरुत्पादन कर देना भर है. मतलब जैसा मुझे लगा वैसा ही तुम्हे लगवा सकूं यह कला की प्रक्रिया का क्रियात्मक स्वरुप है. सतेन्द्र के चित्र में चिनार के जंगल एक ऊँचाई पर गुरद्वारे में बदल जाते हैं तो उसके सामानांतर वही चिनार के पेड़ गिरजाघर भी बनते हैं. बीच की जगह दो लोग, स्त्री-पुरुष खड़े हैं. उनके बीच कुछ था जिसे बार-बार रबर से मिटने की कोशिश की गयी थी पर उसकी छाप जा न सकी थी..वहां शायद कोरल जैसा कुछ था..

बच्चा मोना सरदार था. माँ स्वित्ज़रलैंड की थी. चित्र में मिटा हुआ कोरल राजीव पकड़ लेते हैं..उसके परिवार की स्थितियां कला के इस रूप में सामने आती हैं..उसने जो जो अनुभव किया उसे उतरा..वह अपनी माँ के साथ यहाँ से चला भी जाने वाला था, पर अंततः आत्महत्या ही उसे रास्ता लगती है इस जीवन से भाग जाने के लिए..उसके पास उस अपने महसूसे यथार्थ को व्यक्त करने की अपनी भाषा थी.
पर दृश्यों अनुभूतियों को हू-ब-हू उतारने वाले महान चित्रकार या भाषाकार नहीं होते उसे हम महसूस कर अपने हिस्से का सच बना उस यथार्थ को महसूसे, यही उनका कौशल उनकी निपुणता है. उन जीवित स्पंदनों श्वासों रोम छिद्रों से गुज़रती हवा हमें भी छू कर निकल जाये तभी उसका कोई अर्थ है.

अन्यथा फोटो खीचने वाला कैमरा करता क्या है. यदि ऐसा न होता तो हर फोटोग्राफर रघु राय हो जाता. हम अपनी समस्त इन्द्रियों से उसके जगत के आर पार हो पाने में खुद को सक्षम करें. हमारे सपने और वहां आती जाती छवियाँ क्या वैसी ही होती हैं जैसी वे इन आँखों से दिखती हैं? शायद नही. वह आभास देती हैं वह हमारे जमा खाते कि दुनिया है. उस जैसी अनुभूतियाँ और उस जैसा अनुभव हमें वहां होता है उसी तरह कब हम इस सबको महसूस कर पाएंगे.

मैं भी किसी जिन्दा साओ कि तस्वीर बनाना चाहता हूँ जिसके दिल कि धडकनों को उसके सांस लेते फेफड़े नसों में बहता खून देख पाऊं. वह हू-ब-हू नक़ल नही होगी, उसमे मेरे जीवन का कुछ हिस्सा भी होगा. मेरे हाथ सिर्फ रेखाएं नही खींच रहे होंगे, मैं अपने विस्तार की तरफ बढ़ रह होऊंगा..छाया की परछाई न पिली होगी न मेरा ध्यान उनकी दैहिक भंगिमाओं पर होगा. मैं वही सब खींचना चाहता हूँ जो मैंने महसूस किया..

दिसंबर 15, 2011

उसी किसी दरवाजे पर..

थकान किसकी है ??

दिन भर भाग दौड़ की, न सोने की, न पढने की, न सोच पाने की, न जल्दी घर आ पाने की या इन सबको थोडा थोडा मिलकर सबकी ?

बीते कई दिनों को जोड़ यही सब चल रहा है. माथे पर उलटे हाथ की हथेली रखकर यह लिखते हुए, ज़यादा चलने के बाद पैर में दर्द जैसा एहसास है.

अपने आप को दोहराना और बार बार उन्ही के बीच फंस जाना. एक पैटर्न देखें तो रह रह कर उन्ही कोनों में अपने को पाता हूँ जहाँ से दिख पड़ने का कोई डर नहीं रहता. सोचने के लिए उत्प्रेरक जैसा कुछ काटने को होता है.

कभी-कभी ऐसा नहीं होता जब हमें अपना दिमाग भूसे से भरा लगने लगता है. लगता है मानो हवा में उड़ना तो चाहता हूँ, पर नीचे कुछ है, जो वापस बुला लेता है. कुछ सोच पाने जैसा आस पास हो ही नहीं जैसे. लगता है किसी ऐसे प्लेटफॉर्म पर जा पंहुचा हूँ जहाँ से दो चार महीने पहले कोई सवारी गाड़ी गुज़री थी. नाक की तरह दिमाग भी बंद हो गया हो जैसे. मुह से सांस ली जा सकती है है पर दिमाग के पास ऐसा कोई विकल्प नहीं दिखता.

बीते दिनों को सिरे से पकड़ कर सुलझाऊं तो कहीं कोई ऐसा दिन नहीं मिलता जब घर पर शाम देखी हो. शाम की घड़ियाँ अपने आप में ऐसे क्षण हैं कि दूर से पकड़े नही आते. उन्हें छूने पास जाना ही होगा. उस वक़्त का रंग और डूबता सूरज आसमान पर गीले रंग हैं जिस पर उंगलियाँ फेरने का मन करता है..

और इन सब दरमियानों में कोई किसी के कानों में चुपके से कुछ बोल जाये और उसे बार बार दोहराने का का मन करे. बार बार उन्ही सबको देख भर लेने की खवाहिश अपने आप में किसी सपनीली सी दुनिया के मुहाने पे ला छोड़ती है..उसी किसी दरवाजे पर दस्तक दी है मैंने..

(फोटो  brushstrokesbykc.blogspot.com से)

आवाज़ें..

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