दिसंबर 31, 2012

दिन आखिरी

पूरा दिन मानसिक रूप से खुद को तैयार किया के अन्दर से आज महसूस हो कि साल ख़तम हो रहा है। कुछ था जो इस तारीख का इस साल का इस पार ही निपटा लेना चाहता था। नकली चाँदी के वरक की तरह ही सही पर था जो नया सा तो लगे। यही सोच चांदनी चौक डीपीएल लाइब्रेरी पुरानी किताबें लौटा आया। 'अंत में प्रार्थना..' भी। पंकज सुबीर की 'ईस्ट इंडिया कंपनी  'भी। जबकि अभी दोनों को पूरा ख़त्म नहीं किया था। दूधनाथ सिंह की 'धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे ' भी एक कहानी पढ़ जमा करवा आया।

साल भर जो सोचता रहा था के नया पैन लाऊंगा, उसके लिए यही दिन चुना। दो कलम ख़रीदे। उनमे एक चीनी फाउनटेन पैन है दूसरा भारतीय कंपनी का। पैदल ही हौज़ क़ाज़ी पहुँचा। चावड़ी बाज़ार होते होते। आज राजीव चौक से बाहर निकलने दे रहे थे। शनिवार की तरह बंद नहीं था। शिवाजी स्टेडियम जो कॉमनवेल्थ खेलों के लिए बनाया जा रहा था अब तक बन ही रहा है और उसके लिए इस टर्मिनल का जो हुलिया बदला है उसमे आज सिर्फ हापुड़ गाज़ियाबाद जाती खटारा बसें बची हैं और गिरिराज बुक स्टाल। इसी स्टाल पर स्टीकर विज्ञापन की शक्ल में है जोकि इंडिया टुडे का दिया हुआ है। इस पर भी कब से लिखना चाह रहा हूँ पर टालता जा रहा है आज की तरह।

वहां से सात आठ पत्रिकाएं उठा लाया। पर आदत वही, पन्ने पलट कर किनारे। उनको न सिराहने रखना न बाद में चुने के मौके निकलना। एक हद तक खुद को दोहराते-दोहराते तंग भी आ गया हूँ। सोच रहा था इस वाली आदत को वहीँ तारीखों में दफ़न कर दूँ। पर लगता नहीं है के आसानी से होगी। उन तीस वाले इतवारी अखबारों की तह भी खोलकर नहीं देखे अभी तक..

ये सब क्या लेके बैठ गया..यहीं छोड़ते हैं..वहां से एक बजे करीब नौ सौ नब्बे पकड़ थाना मंदिर मार्ग उतरा। पप्पू दूकान से चिप्स लिए। कनेडियन कंपनी के। सैफ 
ली वाले। इन्डियन मसाला। फिर वक़्त तो था ही और शर्टें मम्मी ने भिगो दी थीं। पाँचवी खुद ही डुबो दी। अभी आगे दो तीन सुबहों तक वे सारी वहीँ तारों पर टंगी सूखने की कोशिश में लगी रहेंगी। बहरहाल। खाना खाया। बैठ गया। साढ़े चार पौने पाँच हुए होंगे, अन्दर से कुलबुलाने लगा। आ गया ऊपर यहाँ।

सोचने लगा बीते साल को तरतीबवार करीने से रखता चलूँगा। उन बातों को छुऊँगा जिन्हें या तो स्पेस नहीं मिल पाया या फिर भागमभाग में कभी लिख ही नहीं पाया या उन्हें जगह दूंगा जो दिल के आसपास मौजूद रहते हैं। कुछ तो ऐसा होगा ही न पूरे साल में। फिर जो बैठा तो बस चिपक सा गया। पर मैराथन नहीं। थोड़े थोड़े हिस्सों में। ब्लॉक या फांक बना बना कर एकएक को निपटाते चलने की सोचकर। कुछ देर बाद अपना ही लिखा पढ़ता तो लगता के इसे लिखने बैठा हूँ?? पर जैसे जैसे दिन बीतेंगे तब महसूस होगा मामूली ही सही पर थे तो अपने ही हिस्से।

शाम रात सबकुछ लिखा जो लिख सकता था। पर साल भर में देखी फिल्मों पर कहीं से मौका ही नहीं निकल पाया उद्वेलनों भावों के अतिरेकों में वह पीछे ही छूटता गया। जबकि कलतक इस दिन को लिखने की सोच रहा था तब भी ख़याल था के पहले सिनेमा पर लिखूंगा तब इस पर आया जायेगा। पर खैर। आगे कभी..

{जारी..}

दिसंबर 22, 2012

क' ख' फेसबुक संवाद सन्दर्भ: दिल्ली बलात्कार घटना

यह संवाद जिसे तकनीक की भाषा में चैट कहते है दो दोस्तों के बीच फेसबुक पर हुई बातचीत है। एक दिल्ली में हुई बलात्कार की घटना से उद्वेलित है जबकि दूसरा थोड़ा शांत बुझा बुझा सा लगता। कई सन्दर्भ है बाते हैं व्याख्याएं है पर अभी उन्सबसे बचते हुए सिर्फ यही। बिना किसी लागलपेट। 

चलते चलते यह भी लिख ही दूँ के यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है के यह और दोनों पुरुष हैं। देश की राजधानी में रहते हैं। और आमने सामने जैसे तर्क वितर्क और उभर सकते हैं यहाँ उस माध्यम की सीमा में पढ़ा जा सकता है। कानून समाज राष्ट्र लिंग आदि इत्यादि उपबंधों में दोनों घूम रहे हैं..

बस तारीख बता दूँ इक्कीस दिसंबर और बज रहे थे आठ बजकर आठ मिनट। और अंतिम संवाद के समय घडी के कांटे नौ बजने में सात मिनट कम बता रहे थे।

क. इलाहाबाद कैसा है..??

ख. इलाहाबाद एकदम बढ़िया। गैंग रेप की गूंज वहां की सड़कों पर भी काफी है।  

क. उस लड़की की मृत्यु हो गयी न..

ख. सुनने में तो यही आ रहा है। लेकिन मीडिया में अभी तक ऐसी कोई हलचल नहीं है।

क. इतना विभत्स बर्बर था।

ख. हालत ठीक नहीं है।

क. क्रिटिकल। पांच सौ से ज़यादा तो सर्जरी हो चुकी हैं उसकी..

ख. सच कहूँ तो रेप की ये पहली घटना है जिसने इतना हिला दिया है। पता नहीं क्यों? कुछ करने का मन कर रहा है लेकिन कर नहीं पा रहा। 

क. पहली बार कोई खबर इस तरह से छाई है वर्ना बलात्कार इस समाज में न होते हों ऐसी बात नहीं है। तिल तिल कर मरने वाली त्रासदी है इनका उन स्त्रियों के साथ रोज़ होना।

ख. इससे पहले भी कई खबरें पढ़ी सुनी, कुछ दुःख और अफ़सोस भी हुआ लेकिन इसका आघात कुछ से बहुत ज्यादा लगा।

क. मैं तो घोषणा करने वाला हूँ के पुरुष होने के नाते यह कह रहा हूँ के किसी महिला स्त्री के साथ कभी बलात्कार जैसी किसी घटना में संलिप्त नहीं होऊंगा, न ऐसी कोई कोशिश करूँगा। बस कम से कम अपनी तरफ से यही कर सकता हूँ, फिलहाल अभी तक..

ख. अब भी मृत्युदंड न मिला तो अरब देश भले।

क. मृत्युदंड इसका हल कभी नहीं हो सकता। न किसी समस्या का वह हल है..

ख. ऐसा तो कोई भी मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति नहीं करेगा लेकिन जो कर रहे हैं उनका क्या करें। ऐसे ही तो नहीं छोड़ सकते न उनको। तो हल बताओ?

क. यह समस्या से बचने का चोर रास्ता है, उसकी जटिलता को समझना होगा और कुछ जिम्मेदारियाँ अपने अपने हिस्से लेनी होंगी..एक पुरुष, एक स्त्री, एक माता, एक पिता, एक शिक्षक, एक नेता आदि इत्यादी की जटिल भूमिकाओं से गुज़र कर ही कोई रास्ता मिलेगा..

ख. इन लम्बी प्रक्रियाओं में कई और इस बर्बर मानसिकता की भेंट चढ़ चुकी होंगी।आप आज बलात्कार का दोष सिद्ध होने पर दोषी को तत्काल गोली मरने का क़ानून बनाइये कल रिजल्ट देखिये।

क. पर ऐसी त्वरा उद्वेलनों में धैर्य से सोचने समझने की ज़रूरत है और ऐसा नहीं है के तब तक हाथ पर हाथ धर कर बैठे रहें। कम से कम सत्ता में बैठे लोगों को अपनी जिमेदारियों को लेना ही होगा। यह दंड देना इंस्टेंट फ़ूड की तरह है जो हमें उन्ही बर्बर समाजों की तरफ ले जायेगा और हम कहीं जा नहीं सकेंगे। कानून उसका एक पहलु है, समाज उससे कहीं जीवंत तंतुओं से बनी संरचना है।

ख. ये एकपक्षीय नहीं हो सकता, सिर्फ सत्ता में बैठकर ही इस समस्या को हल नहीं किया जा सकता। रही बर्बर समाज की ओर लौटने की बात तो अभी भी हम सभ्य समाज में नहीं हैं।

क. मैं उसे एकपक्षीय कब कह रहा हूँ। मेरा कहना है जब तक उस लम्बी प्रक्रिया को हम वास्तविक रूप देते हैं उसमे अपनी भूमिकाओं को समझते हैं तब तक के लिए सत्ता को अपनी सक्रिय भूमिका निभानी होगी। लेकिन कोशिश तो ही करनी है उसे वहां से आगे लेजाने की।

ख. जो भी हो मुझे इस जैसी समस्याओं का तत्काल हल मिलने की जल्दी है। 

क. पर वे जितनी सरल लगती हैं उतनी हैं नहीं..

ख. लेकिन समाधान तो खोजना ही होगा एक और काण्ड होने से पहले। या इंतज़ार करें किसी और के विक्टिम बनने का, समस्या की जटिलता का बहाना बनाकर। अब इसके लिए हमारे पास ज्यादा समय नहीं हो सकता।

क. तो जो क़ानूनी रूप से जो हो सकता है उसके साथ नागरिक सक्रियता की भी तरफ जाना होगा।

दिसंबर 11, 2012

किसी टहनी पर बैठा है 'अँधेरा'

अँधेरा। अखिलेश की चार कहानियाँ हैं। सबसे पहले 'वजूद ' पढ़ी। वैधजी-रामबदल की मौत-जयप्रकाश का गू में लिथरी अपने बाप की लाश को हगनी गढ़इया से भैंस पर लाद कर लाना। उसी शाम उसकी माँ जानकी की मृत्यु। दोनों को हत्या कह सकते हैं। और थी भी। कहानी ख़तम होती है तीसरी हत्या पर। जब जयप्रकाश के औषधीय ज्ञान की कीमत लगाने शहर की दवा कम्पनियां आयीं थीं। इन सब कठोर चीजों के अलावा वहां आईना था। खुशबू थी। और इतनी तेज़ चीख़ थी कि आसपास की टहनियों पर बैठे परिंदे उड़ गए। बछड़ा भागता दौड़ लगाता पाया गया।

इतवार दरियागंज जाने से पहले 'अँधेरा ' पढ़ी। फैजाबाद का दंगा तब तक हो चूका था और तारीख थी अट्ठाईस। वहाँ की कोई भी खबर मुख्यधारा मीडिया में जगह नहीं बना पाई। जैसे कहानी के दोनों चरित्र फिर कभी दिखाई नहीं दिए। दंगे के पहले की अफरातफरी- अफवाहें- बदहवासी सब कर्फ्यू की धारा एक सौ चवालीस तक आते आते और भयावह हो जाती है। रेहाना मुसलमान थी और ज्ञानरंजन हिन्दू। कैसे एक मुसलमान लड़की का हिन्दू मिथकीय ज्ञान उस रात उसकी जान बचाता है, यह हमारा धार्मिक उन्माद ही है जब हम अपने जैसों की तलाश पहचान करने के लिए उनका हिंसक प्रयोग करते हैं। नायक साइबर कैफ़े वाले से यह नहीं कह सकता कि इस दंगे की छाया वाले समय में उसकी प्रेमिका बुद्धा गार्डन के गेट पर उसका इंतज़ार कर रही होगी। बहाना बनता है पिता की बिमारी का और पिछले दरवाज़े से उसे कैफ़े मालिक निकाल देता है। बिलकुल यही क्षण मो.आरिफ़ की कहानी 'चोर सिपाही ' की तरफ ले जाता है। दोनों में अभी समानता दोनों का समानधर्मा होना है और दोनों कहानियों के प्रेम कहानी हो जाने की पूरी सम्भावना..

'यक्षगान ' में छैलबिहारी का मिथकीय अभिनय सरोज के प्रेम को बेल चढ़ाता है। उसके घर से भाग जाना संभावनाओ-अफवाहों को सूत्रबद्ध करना बिलकुल उसी रूप में दिखाई पड़ता है जैसा हमारे समाज के पुरोधा स्त्री के कंधो पर यौनिकता को लाद ठेलते रहते हैं। फिर उन कथित प्रेमियों के कारण ही उनका यौनशोषण होता है और वे सब हमारे समाज में उसी तर्ज में राजनीति-मीडिया-कयासों में कहीं खो जाती हैं, पाठक यानी के मैं उसे खोजने की कोशिश भी किताब की दूसरी तरफ बैठ कर करता हूँ आगे जाकर, उसमे भागीदार बनकर, नहीं। और तत्क्षण एक तर्क मेरी बगल में उगा दीखता है जहाँ खुद को इस समाज में उसी की तरह बेबस शक्तिहीन कुछ भी न कर सकने में अक्षम बन खुद को समझा लिया करते हैं। और हद यह कि अब तो बोल भी नहीं पा रहे सिर्फ लिख पा रहे हैं।

यहीं उनकी उदय प्रकाश की 'आचार्य की कराह ' याद आती है। फिर बिलकुल इसी मुठभेड़ में पंकज सुबीर की 'ये कहानी नहीं है '। शायद कहानियों का नया-नया पाठक हूँ इसलिए बार-बार पीछे गुज़रे पन्ने यूँ ही याद आ जाया करते हैं और एक एक कर लगता हूँ देखने क्या कुछ मिल रहा है उन सबमें। कल इस कहानी संग्रह की जमानत का आखिरी दिन है। किताब लौटानी होगी। सिर्फ एक बची है 'ग्रहण '। सोचा था निपटा लूँगा। पर हर बार सोचा होता कहाँ है। कभी वक़्त नहीं मिलता, तो कभी मन नहीं बन पाता.. पर देखते हैं कब..
02/11/2012

दिसंबर 10, 2012

न समाज एकरेखीय है न बच्चे

पता नहीं ऐसा कैसे होता गया के लिखना शुन्यता जैसा दार्शनिक भाव लेता गया और मैं खुद किसी पुरानी किताब की जिल्द की तरह होता रहा। होते जाना मेरे सामने ही था। बिलकुल यहीं जब जंतर मंतर इतना लोकप्रिय स्थल नहीं हुआ था और न मैं इस लिखने विखने के चक्करों में किसी लड़की के पीछे पड़े दीवाने की तरह हुआ था। पर जो सच था, मुझे पता था। लडकियां खूब नहीं थीं, न उनके पीछे जाने लायक जूते ही कभी खरीद पाया। जो कुछ देखता उससे प्रभावित नहीं होना चाहता था पर करूँ क्या। ये दिल है के मानता नहीं..!!

शायद अनिल कपूर की किसी फिल्म का है, कह नहीं सकता। अस्सी के दशक के गाने थे ही ऐसे। पर इतना ज़रूर याद है के बहुत छोटे थे तब शुक्रवार को शाम साढ़े सात बजे चित्रहार आता था और उस पर गाने बजते थे रंगोली की तरह। गाने तो खूब आये पर याद एक ही रहा, 'तू चीज़ बड़ी है मस्त मस्त..!!'

तब न स्त्री विमर्श के इर्दगिर्द फटकने की कोई गुन्जायिश थी, न कोई दिली तमन्ना। न कोई बाध्यता, न दबाव। लडकियाँ साथ वाले स्कूल में लड़कों के संग पढ़ती थीं और हम बेचारे लड़के उनके इंतज़ार में पागल होने के बजाये शुतुरमुर्ग की तरह किताबों में मुँह गढ़ाए रहते। न तब ट्युशन पढने की ज़रूरत महसूस हुई न कभी किसी धार्मिक लड़की को शाम छह बजे बिरला मंदिर बुलाया। बुलाता कैसे यहाँ न कोई बाज़ार लगता था, न उसे कभी उसकी माँ सब्जी लेने अकेले उद्यान मार्ग भेजती। वो तो भला हो साईं मंदिरों का जो संगतराशन गली जैसे भीड़भाड़ वाले इलाकों में कोना किनारा ढूंढ़ कर अपना छत्र खुद ही डाल लिया लिया करते हैं। और शुकर हो भैयाजी जैसे कोचिंग सेण्टर वालों का जो लड़का लड़कियों को साथ नहीं पढ़ाते। शायद प्रेम की समझ में हमसे बीस ही होंगे तभी ऐसी व्यस्था रखी।

इससे एक तो फायदा यह हुआ कि माता पिता को अपनी बेटी भेजने में कोई खतरा महसूस नहीं होता, वो बात अलग है के ऐसे खतरे कुछ ही परिवार अपने बेटों के संदर्भ में करते रहे होंगे। खैर, दूसरे ये के उन लड़के लड़कियों को इस बहाने घर से निकलने की आज़ादी अबाध रूप से मिलती रहने की गारंटी मिलती रहेगी। यह प्रेम के लोकतंत्र जैसा ही है जहाँ हरी वर्दी के लड़के आराम से पीली बिल्डिंग की लड़कियों से बेरोकटोक बखटके पहाड़गंज के किसी कोने किसी छह टूटी चौक पर आराम से मिल सकते हैं। माँ को भला कैसे पता होगा के जो लड़का उनकी लड़की की कलाई पकडे उस पर मेहँदी लगा रहा है वह इतने सस्ते दाम पर कैसे तैयार हो गया??

जिनकी माएँ अपने लड़के लड़कियों के अधार्मिक हो जाने इस कलियुग के प्रभाव से चिंतित हो उठी थी उन्ही के लिए मनमोहन देसाई  की 'अमर अकबर एंथनी' से सीधे प्रकट होकर शिर्डी वाले साईं बाबा उन्हें पार लगाने आ गए हैं। मतलब जिन्हें ट्युशन में फ़ीस देना फ़िज़ूल खर्ची लगता है और गोलगप्पों टिक्की भल्ले पापड़ी पर खर्च करना बेहतर विकल्प है तो वे सब वीरवार को स्पेशल संध्या में अपने संगी से सात बजे वाली शिफ्ट में मिल सकते हैं। बे खतरा। बे निगरानी। कोई लड़का मिला भी तो छुटकी कहेगी वहीँ कोई होगा। कोई शक भी नहीं करता। कर भी लेंगे तो क्या फ़र्क पड़ना है।

प्रेम तो सहचर्य से ही उत्पन्न होगा न। नर का मादा के प्रति, मादा का नर के प्रति। प्रेम एक दूसरे को आत्मसात करने का नाम है। कब किसी गली के किस मोड़ पर कितने बजे मुलाक़ात होगी यह सिर्फ उस एक पुर्जे पर लिखा मिलता है, जिसके नीचे अनाम मोबाइल नंबर भी लिखा होता है। यह आत्मसातीकरण की प्रक्रिया बिलकुल उसी क्षण नहीं प्रारंभ नहीं होती। इसे सूत्र पीछे जाते जाते हैं। उन विज्ञान के पाठों की तरफ जहाँ मनुष्य के पुनरुत्पादन का सचित्र वर्णन होता है। वर्जनाएं सिर्फ वहीँ कक्षाओं के भीतर नहीं टूट रहीं, उन सबके जेबों-मोजों-बस्तों में रखे मोबाईलों में दस सेकंड की क्लिप में भी उतने धीरे से चुपके से टूट रहीं हैं। उस चारदीवारी में दो पालियों में चलते विद्यालयों में सबसे ज़यादा इसमें सेंध लगायी है। यदि वे दैहिक ही है तो यहीं। बिलकुल इसी पल। जब आखिरी घंटी के बाद लड़की हॉल में लड़के का इंतज़ार करती है।

त्रासदी कहकर दुःख मनाने के बजाये इस पर थोड़ी देर ठहर होगा। सोचना होगा। इसे स्वीकारना होगा। शयद थोड़ी देर बाद कोई इसे प्रेम भी कहना स्वीकार न करे, पर उन पदों से ज़यादा महत्वपूर्ण है इन पर विचार करना।  यह हमारी पीढ़ी की अलीशा चनॉय और मिलिंद सोमन के 'मेड इन इंडिया' से आगे जाकर इमरान हाशमी, मल्लिका शेरावत, सनी लियोन के बॉलीवुड फिल्मों में आ जाने के साथ हनी सिंह का भी है। इन्हें भी बड़े ध्यान से पढ़े जाने की ज़रूरत है। यह मस्तराम की पीली सस्ती किताबें अपने बस्तों में शीला सिनेमा के पास वाले पुल से नहीं लाते बल्कि बीस-बीस तीस-तीस रुपयों के सिम कार्डों और मेमरी कार्डों के साथ स्कूल के दरवाजों से अन्दर दाखिल होते हैं।

इसे सिर्फ सरकारी और निजी विद्यालयों में पढ़ने का मसला नहीं माना जा सकता बल्कि यह उससे आगे जाकर हमारे समाज के इतनी तहों में होना का प्रतीक ज़यादा लगता है। जहाँ वे स्वतंत्रताएं अपने आप ले ली गयी हैं जिन्हें उम्र विशेष आने पर सामाजिक संस्था में प्रवेश करने के बाद मिलता था। समाज अगर इतना ही सरल होता तब न तो बलात्कार की घटनाएँ कभी होती, न किन्ही संबंधों को अवैध बोला जाता और न इसपर क़त्ल करके इतना खून बहाया जाता, न हमारी कुंठाएं अपरागम्य सम्बन्धी अपशब्द बनकर हमारी भाषा का अनिवार्य अंग होते। इन्हें बोलना जितना आसान है उसी समानुपात में अब यही पीढ़ी उसे व्यवहार में लाकर उसके साथ प्रयोग कर रही है।

समझना ज़रूरी इसलिए भी है क्योंकि अगली बार किसी प्रायमरी क्लास के छात्र द्वारा बलात्कार की घटना अखबार में पढ़ कर आश्चर्य का भाव उसे छिपा न ले जाए। और उन लड़कों को भी ध्यान से सुने जाने की ज़रूरत है जब सरकारी पैसे मिलने के बाद जब वे अपनी पिछली बीती रात जीबी रोड बिता कर आने की बात कहें तब हमारा मुँह खुला का खुला न रह जाये।

नवंबर 19, 2012

एक शहर का ऊब बनते जाना

पता नहीं क्या लिखने बैठा हूँ शायद इस दुनिया के क्या से क्या हो जाने पर या कि इधर हो रही घटनाओं पर त्वरित कोई टिपण्णी या इस बेतरतीब दिल्ली की गलियों, उस चांदनी चौक से लौटती रात पर या सबसे पास की चीज़ अपने खुद को करीब से देखने की कोशिश..

मैं कैसा होता जा रहा हूँ, इसमें इस शहर की कितनी हिस्सेदारी है, मैं इसमें खुद को कितना महसूस करता हूँ कर पाता हूँ, सब कुछ इस तरह है के कभी करीने से देखने कोशिश कभी हो ही नहीं पाई। इतने इत्मीनान से बैठे ही नहीं। चलते रहे चलते रहे। इस दिल्ली में अपने कई अड्डे हैं, उनमे से कई डेरे अब पीछे किसी पन्ने पर छूटे फूलों की सूखी गंध की तरह हैं और कई अभी भी सुर्ख है बिलकुल उस डूबते उगते सूरज की तरह। नयी फेहरिस्त भी इधर बनती रही। बसें इसमें सबसे पहले आती हैं जिन्होंने इस दिल्ली से अपनी पहले पहल पहचान करवाई। कॉलेज अगर इतनी दूर न होता और दो तीन बसों की अदलाई बदलाई न होती तो हमारे डीएनए में उसकी घुसपैठ इस तरह न हो पाती।

सुबह नौ बजे की क्लास के लिए पौने आठ सुपर बाज़ार पहुँच कर कालकाजी के लिए बस पकड़ना आज अन्दर से पता नहीं कैसा कर जाता है। उस भीड़ में नेहरु प्लेस का उकताई आँखों से इंतज़ार आज भी उन भीड़ में खड़े अनजान चहरों के लिए एक मौका चाहता है। के लगे हाथ कभी फिर उन्ही पालियों में धक्का मुक्की करती कोहनियों ऊँघती गर्दनों के बीच जूते पहने पैरों की अबोली मुठभेड़ों को फिर से लड़ लिया जाये। ऐसी ही प्रतियोगिता देहभाषा को पढ़ लेने की होती थी, जिसमे अपने प्रतियोगी सहयात्री से पहले उस उतरने को आतुर देह की भाव भंगिमा को डीकोड कर खाली होती सीट के लिए खुद को प्रस्तुत करना होता था। यह तब का वक़्त है जब मूलचंद के आसपास  न ही बीआरटी की कोई धमक ही थी न मेट्रो की कोई हवा।

उस दोपहर जब एडमिशन करवा कर केन्द्रीय विद्यालय एंड्रयूजगंज के सामने बनते फ्लाईओवर को देख रहे थे तब ये भी नहीं पता था के इसी के पीछे कभी एशियाड खेलगाँव बनाये गए थे और वहीँ अंसल प्लाजा भी है। पवन जब भी डेफ़कॉल- तब भी वो हमारे लिए डिफेंस कॉलोनी ही थी, आज भी है- से लौट कर आता इसकी बात ज़रूर करता। पर इतने साल में आज तक उस अंसल प्लाजा तक जाना नहीं हो पाया। या इसे कुछ यूँ कहूँ के मैं दिल्ली और उसके आसपास ऐसे किसी भी नामी या कमतर मॉल में दाखिल नहीं हुआ। इनमे जीआईपी नॉएडा से लेकर पैलेस ऑफ़ ड्रीम्स या अम्बिएंस मॉल गुडगाँव तक सब शामिल हैं।

इसमें विचार पक्ष कितना है इसकी पड़ताल अभी फिलहाल नहीं। इसे थोड़ी देर तक छोड़ दें तो इस फ़रवरी-मार्च से पहले डिस्ट्रिक्ट सेन्टर जनकपुरी तक जाने की भी नहीं सोच पाया था। और यह भी तब कि जब पता चला के यह जगह विकासपुरी से ज़यादा दूर नहीं है। हाँ एक बात और याद आ रही है जब एक दोस्त ने डेट पर चलने को कहा था। एक बार नहीं दो-दो बार। साकेत। वहाँ भी जाने की बात उन्ही दिनों आई गयी हो गयी। इन दोनों जगहों से दो महिला मित्र जुडी हैं उनपर फिर किसी किश्त में..

यही होता है जब बिना तय्यारी के पिल पड़ो तो बात से बात निकलती ही रहती है और अभी ये वाली भी यहीं आस पास घूम रही है तो इसे भी निपटा दूँ। कि यह तब की बात है जब दिल्ली में एफ़एम रेडियो नए-नए बजना शुरू हुए थे और स्कूल में हमारा आखिरी साल था। साल की ठंडियाँ अभी शुरू ही हुई थीं और तब मैं यहीं बिलकुल इसी जगह बैठा रेड एफ़एम 93.5 सुन रहा था। सुनते सुनते वही हुआ जो इन चैनलों के सुनने वालों के साथ होता है, लैंड लाइन फोन उठाया और वहाँ हो रहे कॉन्टेस्ट में कूद पड़ा। करना बस ये था के उन ठण्ड भरी ठंडियों पर कमेन्ट्री करनी थी। पता नहीं कैसे उसमे मेरे नाम साढ़े सौ रुपये का एक वाउचर निकल आया।

स्टेशन का ऑफिस वहीँ स्कूल के पास वीडियोकॉन टावर में था। जहाँ महिना दो महिना पहले तक आज तक का दफ्तर भी था। शायद प्रीबोर्ड चल रहे थे। पेपर ख़त्म कर पैदल ही वहाँ पहुँचा। शायद चौथी मंजिल थी। फोन पर उन्होंने वक़्त पहले ही दे दिया था। मोना सिंह ने उसी विकासपुरी में किसी मल्टीप्लेक्स के नीचे कोई रेस्टोरेंट के नाम का वाउचर दिया था। हम सपरिवार नहीं गए। क्यों नहीं गए इसमें दो चीजें थीं, पहली के इतनी ठण्ड में मम्मी के पैरों में दर्द बढ़ जाता था और दूसरे ये कि जब पापा ने अकले ही जाने को कहा तो बात टाल गया था। इसका कारण आज तक किसी को नहीं बताया पर उस दुनिया को लेकर मेरा सौन्दर्यशास्त्र दुनियावी स्तर पर खुद को उस जगह के लिए न काबिल बताता था। सीधी सरल भाषा में तब हम स्कूल जाते बच्चों के पास उन जगहों के लिए मानक कपड़े होते ही कहाँ थे। आज भी इस स्थापना से नियंत्रित होता हूँ कह नहीं सकता। पर तब राजेन्द्र को वह देते वक़्त ऐसा कुछ भी नहीं कहा था। कोई बहाना बना गया होऊँगा।

इस विषयान्तर जैसे अंधरिया मोड़ से लौट कर दोबारा वहीँ बस में चढ़ लेते हैं। ऐसा कोई दिन न होता के बस नेहरु स्टेडियम वाले फ्लाईओवर पर कूदती फांदती सेवा नगर रेल्वे क्रासिंग पर न रूकती हो। अब तो हमारे जान पहचान वाले दृश्य सिर्फ हमारी स्मृतियों में ही जीवित हैं। जब बस केवी लोधी रोड़ वाली लाल बत्ती पर होती तो एम तेरह की खिड़कियों से आँखें उस मैदान में पहुँच जाना चाहती जहाँ उतनी सुबह भी कोई न कोई स्कूल न जाने की अवसर लागत पर वहाँ क्रिकेट खेलते दिख पड़ते थे।

आज जबकि दस दिन के राष्ट्रमंडल खेलों को आयोजित हुए दो साल से भी अधिक हो गए हैं और उसी के साथ बने ढाँचे ने उन सबसे वह मैदान हड़प लिया है, तब कभी उस सरकारी अधिकृत जमीन के खाली पड़े रहने पर बस टीस ही उठती है। कहीं कोई इतिहास नहीं लिखा गया कि क्या हुआ उन खेलने वालों का। वे कभी वापस लौटे भी होंगे तो उन्हें अपनी जमीन अब मिलने वाली कहाँ है। इससे पहले दिल्ली के बचे खुचे पार्कों में भी ऐसे सरकारी ढांचों ने बच्चों से उनकी खेलने की जगहें छीन लीं और वहाँ भारतीय उसेन बोल्ट की उम्मीद में बुजुर्गों के नाम उल जलूल पथरीले ट्रैक जमा दिये गए हैं। खैर, वहीँ नाले के ऊपर बारहपुला बनाकर नाले को ढक दिया गया है। जिसपर एक तरफ़ा गाड़ियां ही दौड़ती पाई जाती है। इस सड़कों की गतिकी पर इधर कुछ ज़यादा ध्यान दिया जा रहा है उन्ही में जेपी एक्सप्रेस वे भी है। इस पर भी अभी नहीं।

अब वहां से गुज़ारना अजीब सा लगता है। लगता है उसने हमारी यादों को इतनी जल्दी मिटाकर ऐसे वर्तमान में हमें ला फेंका हैं जहाँ की दीवारें बेरंगी हैं। बेनामी हैं। वहां हमारी कोई भी पहचान नहीं है। और जो बचा रह गया है उसमे हम अपने खुद को देख पाने में नाकाबिल बना दिए गए हैं।

और सच में इस बेढब हो गयी दिल्ली में अब रहने का मन नहीं होता। बिलकुल नहीं। जो जगह हमारी यादों को सहेज कर न रख पाए उसमे मेरा हिस्सा हमेशा संकटग्रस्त रहे, जहाँ हर पर बीती याद के बिन बताये मिट जाने के खतरे हों  वहाँ कोई रह भी कैसे सकता है? शायद इसीलिए दिल्ली की उन पुरानी जगहों पर बार-बार जा कर उन्हें सुरक्षित देख भर लेना चाहता हूँ। उनको छूकर अपने अस्तित्व को पा लेना चाहता हूँ। कहीं कोई मेरी भी तो याद रहे। किसी कोने में ही सही। अभी ऐसा बहुत कुछ है जो लिख देना चाहता हूँ पर अभी कपड़ें प्रेस करने है और खुद उस अगली बार का इंतज़ार करूँगा, जब इस दिल्ली को देख अपने हिस्से की दिल्ली को फिर साँसों में महसूस करूँगा..

पीछे के ज़रूरी पन्ने: 
ये जो शहर है लखनऊ | शहर के शहर बने रहने की स्त्री व्याख्या | हज़रतगंज के बहाने दस का नोट और नन्हे हाथ  | उन सबके नाम जिन्होंने ये शहर बनाया | मेरे शहर में मेरा इंतज़ार | यह शहर अकेला करते हैं | अकेलापन कहीं बाहर नहीं था अंदर था | मेरी दिल्ली में ग़ालिब नही | कुछ रीडिंग्स 'मुन्नी मोबाइल' की: उर्फ़ ये जो शहरों के किनारे रहना है | शहर-मौसम-शहतूत-कोयल और हम | सिनेमाघर वाया शहर दिल्ली जिला बहराइच| अलसाता बिखराता मौसम और अंगड़ाई लेती देह

नवंबर 18, 2012

तुम्हारे लिए..

इधर मेरा तुमसे बात करने को खूब मन किया करता है। कभी सोचता हूँ किसी छत के छज्जे किनारे हम तुम बैठे हैं और सामने डूबते ढलते सूरज के साथ आराम से अपने आने वाले कल को एक दूसरे में बाँट रहें हैं। जब हम दोनों संग होंगे तब भी क्या आज की तरह तुम्हारे चहरे को इतनी शिद्दत के साथ महसूस करूँगा, पता नहीं पर। आज जब फोन पर लगे कान से तुम्हारी छवि मेरे अन्दर उतरती जाती है उस वक़्त कुछ सोच नहीं पाता बस थोड़ी देर के लिए उसी आवाज़ दुबारा सुनने के लिए बीच बीच में चुप हो जाता हूँ। सिर्फ सुनता हूँ तुम्हारी आवाज़।

नहीं सोचा था कभी के इतने अन्दर से तुम्हे महसूस करूँगा। हम थोड़े पीछे के दिनों में कितने अजनबी से थे। बस जो थोड़ी बहुत पहचान बोल बतकही थी उसे किसी ऐसी गली में इंतज़ार करने का रोमांच नहीं होता न कोई डर जैसा स्थायी भाव कहीं आसपास फटकता था। नहीं सोच पाता था कि तुम ऐसी होगी। 

यह जो आगे लिखने जा रहा हूँ वह किसी और कहानी की तरह ही सच है के एक दिन सड़क पार करते वक़्त सोचने लगा अब मेरे हिस्से में तुम्हारा भी उतना हिस्सा है और इतनी बेतरतीबी से इन दौड़ते पहियों के नीचे आजाने के लिए नहीं बना हूँ। अब हम दोनों एक दूसरे के लिए उतने ही है जितने अपने खुद के लिए। दिमाग में यही सब घूमता था कि जो कस्बाई किसम की जगह बड़े होने के खतरे होते हैं उनसे तुम खुद को कितना बचा सकी हो..फिर शहराती दिमागों में जैसे ख़याल आते हैं उसमे तुम्हे फिट करने की जद्दोजहद से अपने को परेशान करता रहता..खुद कितना शहराती हूँ इसपर कभी नहीं सोच पाता..

जहाँ तुम हो वह भी तो ठीक ठाक शहर ही है ठीक ठाक क्या पूरा शहर है अपने इतिहास से वर्तमान में आते आते संक्रमण से वह भी उतना ही प्रभावित है शहर के भूगोल को फिर कभी छुएँगे फिलहाल तुम्हारी तरफ लौटते हुए यही पाता के जिसे बचपन से इतनी पास से लगातार देखता आ रहा था उसे इस तरह कभी क्यों नहीं देख पाया। शायद जो पास होते हैं उन सबके साथ यही होता होगा, बिलकुल वैसे ही जैसे किताब आँखों के बिलकुल पास लाने पर छपे शब्द धुँधले दिखते हैं उसी तरह..

प्रेम कभी कभी ऐसे ही दबे पाँव हमारे इर्दगिर्द चहल कदमी करता रहता है बस उसकी आवाज़ हमारे कानों तक देर में पहुँचती है मैंने कई बार इसे पहले भी सुनने की कोशिश करी पर कामयाब न हो सका इस बार कान मशीन नहीं लगायी पर फिर भी 'उस तक' पहुच गया। उस तक को तुम 'तुम तक' भी पढ़ सकती हो। तब इसके मायने पिछली पंक्ति से और आगे चले जायेंगे जहाँ हो सकता है हम दोनों को हमदोनो साथ साथ दिख पड़ें और दिखे किसी बड़े से दरिया किनारे किसी हरी भरी बगिया में पेड़ के नीचे लगे सागौन की लकड़ी से बने बैंच। जिस पर हमदोनो उसी सूरज को निहार रहें हों।

मुझे पता है वो दिन अभी कुछ और दिनों की दूरी पर हैं। शायद तुम्हे भी पता है। वो दिन थोड़ा और हमदोनों का इंतज़ार करें। मुझे पता है वो करलेंगे..

अक्तूबर 27, 2012

दिहाड़ी अध्यापक की डायरी का पन्ना

बड़े दिनों से बहुत कुछ इकठ्ठा हो गया पर बात नहीं हो सकी. कुछ कुछ पैराडाइम शिफ्ट जैसा. एक सरकारी स्कूल में अतिथि अध्यापक गेस्ट टीचर के रूप में पढ़ा रहा हूँ..हिंदी का मास्टर. माने सरकारी बंधुआ मजदूर. साढ़े सात सौ रुपया दिन. और जिस दिन नहीं गए पैसा कट. पता नहीं जो पढ़ाने का यूटोपिया था वो इतनी जल्दी क्यों टूट रहा है. इतने फटीचर बच्चे हैं कि लिखना नहीं जानते और ग्यारहवी-बारहवी में पढ़ रहे हैं..नियमित टीचर भी कुछ कम माशह अल्लाह नहीं. दिमाग से इतने पैदल के बस रोजी रोटी के चक्कर में अपनी भारी भरकम देह का बोझ उठाये रोज़ घर से चल यहाँ फाट पड़ते हैं..

हर रोज़ मर-मर के जाता हूँ और हर रोज़ का हासिल यही के उस स्कूल को जिन्दा करते-करते खुद और मरा-मरा सा..सोचता भी हूँ के अपने वक़्त का हर्जा कर वहां क्यों जाये जा रहा हूँ, पर..आध पौन कहानी लिख भी मारता पर ढाई तीन तक स्कूल में खटने के बाद उस मानसिक थकान से जूझते बीत जाते है..कुछ-कुछ फुटकर चिटुर-पुटुर चल भी रहा है तो उससे राजी नहीं हूँ..

अपने स्तर पर अध्यापन से जूझने की कोशिश कर रहा हूँ..दिक्कत शायद तब ज़यादा हो जाती है जब कक्षा असहयोग आन्दोलन करने पर उतारू हो. पूरे तंत्र में सेंध जैसा भी नहीं कर पाने की हताशा बार-बार घेर लेती है..ये भी पता है के उस इनपुट पर इतनी ज़ल्दी आउटपुट की अर्थशास्त्रीय व्याख्याएं नहीं की जानी चाहिए पर..समस्या बिलकुल इन वाक्य विन्यासों की तरह ही जटिल होती लग रही है. पर मैं सहज होना चाहता हूँ. कुछ कुछ ओढ़ा हुआ लगता है, उसे उगाढ़ देना चाहता हूँ..

पता नहीं जो कहना चाहता हूँ वो कह भी पा रहा हूँ या वही आप तक पहुँच रहा है जो इस वक़्त सोच रहा हूँ..अपने बीते कल पर अटका उन सब बिन्दुओं को दुरुस्त तो नहीं कर सकता पर मुड़ मुड़ कर देखता हूँ..देखना वर्तमान से पलायन भी हो सकता है और उसका रचनात्मक अर्थ भी लगाया जा सकता है. फिर इधर पने पास एक अदद नौकरी की काबिलियत का अब तक न होना भी कचोटने लगता है. मेरे संगी साथी जो कभी साथ थे वो कहते हैं इतना पढ़ लिख कर भी क्या कर लिया..सोचता हूँ उस दिमाग से होगा भी क्या जो घर न चला सके..ऐसा लगने लगा है के घर चलाना जितना मौद्रिक कार्य व्यापार है, उतना मानसिक बाद में..

लिटमस टेस्ट की हताशा चुनौती में कब तब्दील होगी समझ नहीं पा रहा हूँ या शायद सब सामने होने पर भी समझदारी कहीं किन्ही क्षणों के लिए अपदस्थ हो गयी है..उसमे न लिख पाने की जूझन है और लगता है बदलती स्थितियों में रूढी बनता जा रहा हूँ..इतना सब पढ़ कर यह भी लग सकता है के कुछ प्रस्थापनाएं खुदय गढ़ ली गयी हैं और उन्ही के इर्द गिर्द अपने होने न होने को जाँच रहा हूँ..पर क्या करूँ इससे आगे जा नहीं पा रहा. सब कुछ ऐसा करते जा रहा है जिसमे ठहराव भी है टकराव भी, आग्रह दुराग्रह बनते जाते हैं, समस्या इसी में है..

ज़िन्दगी को कभी भी इतना किसी दूसरे के सापेक्ष नहीं देखता था पर उन दबावों को इस तरह महसूस करता हूँ के लगता है अब इतनी उम्र में भी उस लायक नहीं रहे के कोई काम कर सकें..ज्ञान का अपना अहंकार भी संग किसी न किसी रूप में डोलता रहता है..चेतन-अवचेतन किसी भी तह में..और ये सरकार है जो ऍफ़ डी आई के आने के बाद करोड़ों रोजगारों की बात करती है..हम पढ़लिख बस मरे जा रहे हैं..मरना है अन्दर ही अन्दर घुटने जैसा..

यह सब भी रोने जैसी किसी क्रिया जैसा लग रहा है, पर लोग कहते हैं कभी-कभी रो भी लेना चाहिए..कम से कम इसे 'आत्मालोचन' जैसा साहित्यिक कृत्य कह इसकी आड़ में नहीं छुपना चाहता..

(12/08/2012)

अक्तूबर 25, 2012

किस्सागो और उनका आदिग्राम

'आदिग्राम उपाख्यान' का फ्लैप कुणाल को 'जबरदस्त किस्सागो' कहता है. उनकी यह किस्सागोई उस जीप के बरगद के पेड़ से पहले उसके सड़क से खेत पर उतरने वाली घटना के दरमियान ही पैदा होता लगता है. या फिर इज़राइल-इस्माइल भाईयों की पढाई के आसपास. जहाँ इसे राजनितिक उपन्यास हो जाना चाहिए था सारी गड्डमड्ड वहीं उसके नंदीग्राम के क्षेपक हो जाने के साथ हो जाती है. घेराबंदी. संग्राम की पूर्वकथा में जो भी कहा गया उससे प्रस्थान बिंदु इतना मजबूत नहीं बन पाता के उसकी भूमिका में इस कृति को स्वीकार कर लिया जाये.

बावजूद इसके कहानी है. आगे है. पीछे है. ऊपर है. नीचे है. इसे बिना किसी नारे के सिर्फ एक जगह की ठीक ठाक कहानी भी कहा जा सकता है. पर रेणु से अढ़ाई कोस चल यहाँ आने की उतनी जहमत बाकियों को नहीं उठानी चाहिए. 'मैला आँचल' इससे ज़यादा राजनीतिक है और न कहते हुए भी कई कई उपाख्यान उसमे रचे बुने हैं. सीधे टकराव से ज़यादा दायें बाएं किया गया है. या यह हो सकता है की समकालीनता का दबाव उसे कहीं मोड़ने का मौका ही नहीं देता.

वहाँ बाघा से ज़यादा यादगार चरित्र सद्दाम और उसका बाप शमशुल हैं जिनको फ्लैप पर लिखने वाला शायद भूल गया. यह बात दीगर टाईप की है के उसने कमज़ोर चरित्रों के लिए पाठकों का जहाँ और उसका कोना सदा सर्वदा के लिए सुरक्षित करा दिया था. हाँ यह देखना भी मौज़ू है कि उपन्यास नागार्जुन की इन पंक्तियों से शुरू होता है 'आओ रानी, हम ढोएंगे पालकी,/ यही हुई है राय जवाहरलाल की' और ख़तम होता है संसद मार्ग पर. मतलब, धूमिल की कविता पर (सुदामा पाण्डेय का लोकतंत्र)  'लेकिन वह जो न रोटी बेलता है न खाता है, बस रोटी से खेलता है, वह तीसरा आदमी कौन है? इसका उपयोग वे ममता बनर्जी से एक सवाल के रूप में करते हैं पर जवाब में दूसरी तरफ से कोई उत्तर प्राप्त नहीं होता. मिलता सिर्फ मौन है.

दिक्कत यही लगती है के जब उस पाठक के सामने उदय प्रकाश की '..और अंत में प्रार्थना' से लेकर 'वारेन हेस्टिंग का सांड' पहले से मौजूद हैं, तब आप उनसे खुद को कैसे अलगायेंगे..जादुई यथार्थवाद परिमलेंदु दा की कहानियों का हिस्सा ज़यादा लगता है पर जिस रानी रासमणि की मौत बंगाल के आकाल में चावल की खुशबु से हुई थी उसमे अखिलेश की 'वजूद' मौजूद है. यहाँ हेस्टिंग का नक्शा नहीं है शमशुल खुद है..

अगर मुझे राजनीतिक आख्यान ही ढूंढने हैं तो 'हज़ार चौरासी की माँ', मधु कांकरिया की 'लेकिन कॉमरेड' क्या कम हैं ..गोविन्द निहलानी की 'द्रोहकाल' देख सकते हैं..रैक से फिर 'रजिस्टर्ड नंबर 1038' उठाई जा सकती है..

{बारह की रात इसे ख़तम करने के बाद की फौरी टिप्पणी } 

अक्तूबर 20, 2012

असहमति का साहस - विवेक की असहमति

इसे पढ़ने के पहले विनम्र निवेदन है कि इस पर दृष्टिपात करने के बाद मुझे तहलका का खोजी पत्रकार मानने की गलती न करें. 'समयांतर' के पाठक के रूप में चार-पाँच सालों से तो जुड़ा ही हूँ तो इस पूंजीवादी समय में एक क्रयशील उपभोक्ता के रूप में यह सकर्मक विमर्श जैसा ही माना जाये..!!

बकौल विनीत कुमार 'आपसे सवाल करने की हैसियत मेरी बस इतनी है कि कई कई महीने बेनागा दस दस रुपये देकर समयांतर खरीदी है और मैंने जिस पत्रिका के लिए पैसे खर्च किये हैं, उनसे ये जानने का अधिकार तो रखता ही हूँ. हिंदी में में ये बदतमीजी समझी जाएगी लेकिन बाज़ार की भाषा में ये एक उपभोक्ता का अधिकार है.'

(थोड़ा विनीत से : दो जगह फेरबदल की स्वतंत्रता ली है एक तो वहाँ जहाँ आपने 'कई मर्तबा लेख के लिए' लिखा था उसे मैंने 'कई कई महीने बेनागा' कर दिया है और वहाँ अखबार 'जनसत्ता' था यहाँ 'समयांतर' पत्रिका लिख मारा है. सन्दर्भ २७ अगस्त का आपका फेसबुक स्टेटस है. साल था दो हज़ार दस और घडी में बज रहे थे आठ बजकर बारह मिनट..) 

इस बड़ी भूमिका-कम-स्पष्टीकरण-कम-निवेदन के बाद आप आगे बढ़ सकते हैं..थोड़ा परसाई भी पढ़ रखा है यह भी आपको पता चल जायेगा..

'समयांतर' विचार और संस्कृति का मासिक, 'असहमति का साहस और सहमति का विवेक' टैग लाइन वाला पत्र है. हम इसे पत्रिका कहते आये हैं. अक्तूबर का अंक है कीमत बीस रुपये. पृष्ठ उनतीस से 'पुस्तकों पर केन्द्रित छमाही आयोजन' वाला विशेष नुक्ते के साथ 'परिच्छेद' शुरू हो रहा है. इसका विस्तार पृष्ठ बयासी तक है.

इतनी तथ्यात्मक जानकारी इसलिए लिखी क्योंकि इसकी आवाज़ जिसे स्वर कहूँ और इसका मिजाज़ कुछ ऐसा है कि सरकारी विज्ञापन प्रभाग के अलावा दुसरे पूंजीगत स्रोतों से प्राप्त विज्ञापन इसकी प्रतिबद्धता- स्वर- असहमति- प्रतिरोध- विवेक को प्रश्नांकित कर सकते हैं. इसलिए न इसके कागज़ कि गुणवत्ता वैसी ज्ञानोदयी आभा लिए होती है न विज्ञापन रंगीनियत लिए.  पर छपाई से लेकर कागज़ मानव श्रम बौद्धिक व्यायाम आदि इत्यादि मदों के लिए पूंजी तो चाहिए. अब वह आये कहाँ से? तो इसकी सूचना पेज नंबर ७९ पर एक बक्से में है जिसका शीर्षक है 'इस अंक के प्रकाशक'.

अब इसे संयोग कहें या अरेबियन नाइट्स का चमत्कार-फमत्कार कि जिन्होंने इस अंक के प्रकाशन में सहयोग किया है उन्ही प्रकाशन संस्थानों से प्रकाशित पुस्तकों पर समीक्षाएं- लेख वहाँ के पन्नों पर हैं. यह कैसे हुआ होगा इसकी दो संभावनाएँ तत्क्षण दिख पड़ती हैं- पहली यह कि चयन भले समयांतर का रहा हो पर छापने के एवज़ में उन्होनों उन प्रकाशकों से सहयोग नामक मद में आर्थिक पूंजी कि मांग की हो. अच्छा ये वाला थोड़ा ओछा किस्म का भी लग रहा है और इसमें श्रम भी करना पड़ रहा है तो दूसरी संभावना पर गौर किया जा सकता है.  

वह यह कि चूँकि घोषित रूप से पुस्तकों पर केन्द्रित अंक वर्ष में दो बार प्रकाशित होता है, जून और अक्तूबर में, तो स्वयं ही पूंजीगत सहयोग के साथ वह प्रकाशन संस्थाएं स्वयं मुद्रित की हुई सामग्री इस पत्रिका को मुहैया करवाते आ रहे हों..!! 

और असहमति होते हुए भी क्योंकि साहसी पुरोधा हैं वह सहमति का विवेक इस्तेमाल करते हों. हर बार. स्पेस की कीमत ही तो लगा रहे हैं. भले अगले अंक में उस प्रकाशक की बखिया उधेड़ दें. सेंध तो हर बार लगा ही जाता है. क्या कुछ मुखौटे ऐसे ही अपना काम करते हैं..

{नीचे की गयी टिप्पणी में सम्पादक 'समयांतर ' पंकज बिष्ट का इस पोस्ट के प्रतिउत्तर में दिया गया जवाब है। सन्दर्भ समयांतर, दिसंबर 2012, पृष्ठ छह.}

अक्तूबर 15, 2012

मृत्युलेख

दो दिन से क्या देख रहा हूँ, पता है..?? खेल. वक़्त हमारे साथ खेलता है. हमें लगता है की वक़्त हमारा है पर उसमे हमारी भागीदारी उम्र के आसपास निर्मित होती संरचनाओं की होती हैं जो देह के बूढ़े होने के साथ साथ या तो कमज़ोर होती जाती हैं या हमारे नियंत्रण से बाहर खिसक खुद को स्थापित कर लेती हैं.

पापा के सबसे बड़े मामा के सबसे बड़े लड़के. पापा के ममेरे भाई. डॉक्टर हैं. अपनी उम्र के प्रारम्भिक चरण में जैसे प्रभाव युक्त आभा के साथ थे, उनका तेज इधर स्वास्थ्य के साथ धीरे धीरे कम होता जा रहा है. स्मृति इतना साथ नहीं देती. उम्र अपनी रचना को कह रही समेट लिया जाये. यह स्थिति व्यक्ति के सामने ही घटित होती है. उसका लगातार क्षीण होता जाना. जिस मृदुता सद्भाव प्रेम को तब हम नहीं पहचानते न तवज्जो देते हैं उसे ही अब हमारा साथी होना पड़ता है.

इस सारी अभिधा की लक्षणा से जो व्यंजना हो रही है और जो नहीं हो रही है उसमे सुनी सुनाई सामने घटित घटनाओं को लिखने नहीं जा रहा हूँ. बस याद कर उस घटित जीवन यात्रा को अपने पास सहेज कर रख ले रहा हूँ जहाँ अचानक ह्रदय के किसी कोमलतम अंग में छोटे भाई के साथ बितायी कोई याद किसी टहनी पर टंगी रह जाती है और इतने बरस बीत जाने पर उसे सामने देख फिर उन पन्नों पर जाने को हो उठता है.

पता नहीं उनसे जुड़ाव न के बराबर है पर पापा को बोली पंक्तियों में जो नैराश्य जैसी प्रसन्नता थी उसका निरर्थक बिंदु पर पहुँचना अन्दर से अजीब सा कर रहा है. हम कुछ देर ठहर पनियाई आँखों से अपने बीते कल में जाना चाहते हैं उन दिनों को फिर से जीने की तमन्ना होती है पर सामने हमारी देह को निहारती ऑंखें बस लगातार हमें देखती रहती हैं. हमें चला जाना है उन सबको यहीं छोड़े.

लगातार उस कम होते वक़्त में हम ज़यादा से ज़यादा जी लेना चाहते हैं. पर सामर्थ्य सिर्फ स्वपनलोक तक ले जाता है. जहाँ फरेंद का बिरवा उसकी कमज़ोर डाड़ से गिरकर घुटने कोहनी की चोट दर्द नहीं देती बस रोक देती है. थोड़ी देर के लिए उमर वहीँ इंतज़ार करती है और अचानक हम छूटते चले जाते हैं. कटहल के बिये भी याद आयें तो खा नहीं सकते. फूफा कटरा से ले भी आयें, तब भी नहीं. पाला जवानी की तरह नहीं गिरेगा. बरसात तब रूमानी नहीं रह जाती.

फिर लगातार वहीँ करवट बदलते जिसपर नज़र पड़ेगी बने की हवा के साथ उसकी याद किसी डोलची पोटली से फुदक बाहर आ जाना चाहेगी. उन यादों को हम समेटते रह जायेंगे और वक़्त सिर्फ कान में इतना फुसफुसाएगा कि भईया बहिनी तोहर वक़्त आई गवा..!! और सब वहीँ रह जायेंगे. यहाँ तक की मैं भी. क्योंकि उस दिन के बाद मैं रहूँगा भी कहाँ? मेरी याद उस दिन के बाद कोई याद नहीं बनने देगी. वहीँ कोने के साथ चटाई समेटते सबको कुछ याद भी आएगा तो मैं नहीं वो बीछी आएगी जो मुझे काट गयी थी.

यह हमारी स्मृति के पन्नों का एक-एक कर बिखरने जैसा जान पड़ रहा है. जिनको बचपन से देखते आ रहे हैं उनमे से एक एक की मृत्युरेखा तक पहुँचती ज़िंदगियाँ थोड़ा तो हमें भी खाली करती जाती हैं. पता चले. न चले.

{17 दिसंबर, 2012 यह पोस्ट जनसत्ता में 'स्मृतियों के पन्ने ' नाम से आई है, वहां पढ़ने के लिए इधर चटकाएं}

सितंबर 17, 2012

जल्दी में की गयी एक टीप और ये दूसरी सालगिरह

बीते एक साल में कहाँ पहुँचा ? क्या किया, क्या रह गया ? कई दिनों के बाद अपने अन्दर चल रही उधेड़बुन को लिखने की कोशिश की है और यही आज इस ब्लॉग की दूसरी सालगिरह पर दोपहर एक से दो बजे के बीच की फुर्सत में लिख मारा..अब आपके लिए है..

दो साल पहले जिन मूल्यों के साथ चले थे, वे आज भी हैं बस थोडा उनसे खिसक गया हूँ, लगता है. असंतुष्टि के भाव के साथ खुद को साबित करने की जद्दोजहद थी. के थोडा बहुत लिख पढ़ लेते हैं. दिमाग भी काम करने लायक अभी भी है. इन्ही के इर्द गिर्द कुछ कुछ चल रहा था.

दुनिया पहले तब भी गोल थी पर इतनी कोमल न तब थी न आज..साथ ही इसकी व्यक्तिगत सापेक्षता से कोई इन्कार नहीं कर सकता. वास्तविकता जितनी जैसे हमें दिखती है, उतनी ही लगती है. नज़रों को ऊँचाई से भी देखा जा सकता है और उसके फैलाव के वितान को विस्तार से भी. लिखने के लिए जिन विषयों को चुना उनका अपना ढर्रा बनते-बनते वक़्त लगा..अभी भी बन ही रहा है..पर कभी लगता है कभी-कभी उन्ही से भागने लगता हूँ और फँस जाता हूँ व्यक्ति और समाज में भाव और विचार में. द्वन्द मुहावरे की तरह जुबान पर था. जो भी पढ़ते-लिखते उसतक पहुँचे कैसे, यह उस प्रक्रिया की तरफ ले जाती, जिसमे सीकचें हमें अपनी तरफ बुलाते.बुलाना अब कम होता जा रहा है उसी तरह यहाँ पर आवाजाही भी. महीनों कोई दस्तक नहीं दे पाता. पर हर पल हर वक़्त लगता है कुछ लिखूं. भले यहाँ पर नहीं कागज़ पर, अपने पन्नों पर. बस उसका लिखा जाना ज़रूरी है.

लिखना मिला कैसे? उसकी तरफ का आकर्षण अपने बनते बिगड़ते व्यक्तित्व को भी समान्तर उसी अनुपात में बनता बिगाड़ता. सामजिक होना और उन विचारों के आसपास की टहलन मजेदार है. आप साबित करते हैं कि चिंताओं की परिधि में पड़ोस से लेकर सद्भाव के बैरागी नहीं उसके सबसे बड़े पैरोकार हैं. जितना उसको पीड़ा होगी उतनी ही दुःख की रेखा शिकन बनकर आपके माथे पर पहले से ही मौजूद है. ऐसा मनुष्य बन जाने की कवायद का हिस्सा बन जाना जहाँ की ऐनक इंसान को सबसे पहले इंसान माने फिर उसके होने के कारणों पर झाँकें. सीधे कहा जाये तो कुछ-कुछ ऐसा संवेदित होना कि आपकी नज़र उस आखिरी आदमी से ही शुरू होती है. पर इसके लिए कुछ करना नहीं वे बने बनाये प्रतिमान यहीं आस पास बिखरे पड़ें हैं उन्हें किसी वास्को-डी-गामा गैलीलियो की ज़रूरत नहीं पूरा तंत्र ऐसे सामाजिकृत करेगा के वो ढर्रे औज़ार लगने लगेंगे. इस दुनिया को समझने के लिए बारीक नज़र के साथ. इनके साथ आग्रह होगा देखने समझने का पर पूर्वनिर्धारित मानको से विचलन की कीमत पर नहीं.

अपन भी कूद पड़े थे सरोकार प्रतिबद्धता की बायनरी से इस ज़िन्दगी को देखने. झाँककर उसे समझने से लेकर परिवर्तन की झोंक में. अपने को पूर्वाग्रहों से दूर करते बने बनाये पूर्वाग्रहों की तरफ जाते..जहाँ इस दुनिया के लिए फिक्रमंदी थी. थोडा बहुत चलने फिरने के काबिल खुद को मानून भी तो अब थोड़ी सी ऊब सी होती है. हमारे लिए दुनिया के सारे रंग कहाँ गयाब हो गए और उसमे एक दो रंग ही क्यों बचे रहे समझ नहीं आता.या शायद मालुम है पर अनजान बने रहने की आदत बन गयी लगती है..पता नहीं मेरे आसपास जो थे उन्हें कुछ-कुछ अजीब लगने लगा. उनकी नज़र में मेरी अपनी दुनिया बनती गयी जहाँ मैं ही रहता था और पहले की बसावट के कई साथी या तो छिटक गए या फिर मैं अपने जैसों की तलाश पर निकल पड़ा..

इधर मो. आरिफ का उपन्यास 'उपयात्रा' पढ़ रहा हूँ और कभी-कभी लगता है खुद कई प्रकारांतर यात्राओं पर निकल पड़ा हूँ. अपने अन्दर अपने बाहर..जूझता रहता हूँ, फँस जाता हूँ..जैसा मैं होता जा रहा हूँ उसमें अपनी ही मान्यताओं को फिर से देख परख रहा हूँ..आज जहाँ खड़ा हूँ वहाँ सब कुछ किसी मुखौटे की तरह लगता है..मेरा खुद का लिखना भी अपने ठीहे के मजबूत पायेदार होने से पहले भिनभिनाती मक्खियों से डर नहीं रहा हूँ पर..

मुक्तिबोध आज भी अपनी तरफ खींचते हैं, पाश के पास बैठता हूँ पर लगता है कहीं तय्यारी अभी और करनी है..कुमार अम्बुज की तरह प्रतिबद्धता को इतना निर्दोष मानने का मन नहीं होता. विचार आज भी खींचते हैं पर उनका रुमान अब किसी मुलायम ख्याल की तरह स्पर्श नहीं दे पा रहा..शायद इसलिए भी अब खुद को चुपचाप किताब में छपे पेड़ की तरह बेखबर पाने लगा हूँ..पीछे जितना अपने अन्दर हुआ हूँ उसे प्रक्रिया को और ऐसे ही चलने दे रहा हूँ..बस अभी थोड़ा अपने से और जूझना चाहता हूँ..

सालगिरह पहली  | सालगिरह तीसरी 

{आज तारीख नौ नवम्बर, दो हज़ार बारह को यह पोस्ट जनसत्ता में 'चिंता की परिधि ' नाम से आई है। ठिकाना वही अपना समांतर। सीधे वहाँ पढ़ने के लिए इस लिंक को चटकाएं। }

सितंबर 10, 2012

जो हिंदी में नहीं था

खिड़की के बाहर बारिश हो रही है. पर उसपर नहीं लिखने जा रहा हूँ. कुछ याद आया है इसके साथ. पर उसमे भी बारिश की बूंदें नहीं हैं..बस एक अँधेरा कमरा है, उसमें है मोमबत्ती का पीली छाया भरा उजाला. तब हमारे घर में लकड़ी का तख़्त था जो अभी टूट चुका है और बाहर पड़ा भीग रहा है. टूटा कैसे उसकी कहानी फिर कभी..तो हमारा गद्दा बिछा बिस्तरा वही होता था, पैर पोंछने की हिदायत के साथ.

उन दिनों घर की गतिकी में अलमारी की पीठ नहीं कन्धा दिवार को लगता था. बड़ा वाला बक्सा तब ठण्ड आते दिनों के साथ खुलता तो उस पर रखे गद्दे-बिछौने उसी तख्त पर रखे जाते. अब वह वहां नहीं है तो बक्से का खुलना कई सालों से विलंबित सा है. मतलब उसमे ऐसी ज़रूरत का सामान है, जिसकी ज़रूरत इतनी ज़ल्दी नहीं पड़ती.

तो आज भी अच्छी तरह से याद है उस मोमबत्ती की रौशनी में एक छोटा सातवीं क्लास का लड़का अंग्रेजी में छपी किताब से सवाल-ज़वाब याद करने की ज़द्दोजहद में था. इम्तिहान सालाना था और नामुराद साइंस की जुबान थी मुश्किल.

उन्ही दिनों पहली-पहली बार यह बात कान में पड़ी होगी कि लिख-लिख कर याद करने से एक तो ज़ल्दी याद हो जाता है और ज़यादा दिन तक भेजे में भी रहता है. तो इन सबको मिलाकर हुआ यूँ के अंग्रेजी उस वक़्त माशहअल्लाह अंदाज़ में पढ़ते थे. जितना ज़वाब लिखा छपा होता उसे पेंसिल बॉक्स से यूँ छुपाते, जैसे उससे छुपन छुपायी खेल रहे होते..फिर एक मिनट बीतता, दूसरा मिनट आता और तीसरे तक आते-आते जब याद किया हुआ न आता तब धीरे धीरे एक-एक इंच नाप-नाप कर हटाते और हू-ब-हू रफ कॉपी में नक़ल कर लेते. और बेचारा दिल भी समझ लेता बिलकुल वैसा ही तो याद कर लिख दिया है, अब वहां भी पूछेंगे तो लिख मारेंगे..

पर अगर दो चार मिनट बाद ही उस सवाल पर घूम कर वापस आते तो याद किया साथ वापस नहीं होता. और यह उस इम्तिहान के पर्चे से लड़ने के लिए जुटाए जा रहे कॉन्फिडेंस के लिए घातक होता इसलिए पन्ना पलट लेते और फिर भूल कर भी उस पन्ने नहीं लौटते. कहीं दो चार हर्फ़ भी इधर उधर हो गए तो..

फ़िजिक्स को तब उस दिमाग से हिंदी में सोच भी नहीं सकते थे. जो हिंदी में होती तो कभी उसे पढ़ के जाते भी. बस घूमते टहलते पहँचते. कुछ-कुछ याद कर लिख मारते. ऐसा नहीं था कि हम फ़ीस नहीं दे रहे थे, फिर भी पता नहीं क्या हुआ के मास्टरनी जी ने कभी भी ये जानने की कोशिश नहीं की के हमने समझ आ भी रहा है या नहीं..या हम ऐसे ही मुंडी हिलाए जा रहे हैं.

पेपर तो मौत के साथ करते दिन होते इसलिए जितनी जल्दी खतरा टले उतनी ही सेहत की तंदुरुस्ती बने. पर तंदुरुस्ती उस इम्तिहान में पिछड़ गयी. खींच खांच के साठ प्रतिशत बन रहे थे पर दो विषयों में रह गया. वो थे अजब गजब गणित और ससुरी साइंस. जब मैं भाषा से जूझ रहा था तब साथ-साथ इनसे भी लड़ना पड़ रहा था और वहाँ किसी टीचर को समझ नहीं आया के फर्स्ट डिवीज़न के बावजूद उसी जमात में अगर रह गया हूँ तो क्यों..मैं फेल किसमें हुआ था विषय में या माध्यम में..

तब मेरे पास ये सवाल नहीं थे बस इतना जानता था के हिंदी में मौका मिलता तो बात दूसरी ही होती. पर नहीं ये नहीं समझा पाया उन्हें..दुबारा सातवी करनी पड़ी. स्कूल छूट गया. दोस्तों की पलटन वहीँ रह गयी. उस मन को कैसे दाखिला न होते दिनों में मैंने संभाल के रखा था..फेल का बिल्ला लगा था न, कोई स्कूल लेता क्यों..??

{आज (14 सितम्बर 2012) यह पोस्ट 'जनसत्ता 'में 'विफलता का माध्यम' शीर्षक के साथ आई है..वहाँ पढ़ने के लिए इधर चटकाएँ.. }

इस पोस्ट 'विफलता का माध्यम' पर 
चौपाल में एक पत्र....तारीख बाईस सितंबर.

सितंबर 09, 2012

इतवार फिर कभी नहीं आये

इधर पीछे पता नहीं क्या हुआ के पुरानी स्मृतियाँ छवियाँ बन कर सामने से गुज़र रही हैं. अनछुई सी कोमलतम यादें. बचपन इतना इत्मीनान से उन्हें सहेज रहा था जिसमे आपाधापी इतना आंडी टेढ़ी नहीं कर जाती थी कि सोमवार पिछली रात के अलसाई आँखों को खुलने नहीं देता था..

एक इतवार था. सड़कें बेतरतीब भरी नहीं थीं. खाली थीं. गाड़ियां गाड़ी वालों के पास थीं. हम बस में थे. शायद उन दीवारों को तभी से वैसे ही पोता जा रहा है, जैसा वो आज की रॉकस्टार में मूतते लोगों के पीछे छिपी हुई हैं. बस कौड़िया पुल के पास से गुज़र रही है. लाल किले के बाद. बस भी हमने यहीं बिरला मंदिर से ही ली होगी दो सौ पंद्रह या दो सौ सोलह.

शास्त्री पार्क तब गुप्ता जी रहते थे. अब वह कहीं नहीं हैं. आखिरी मुलाक़ात हुई इस बार गाँव में. सीधे मिले नहीं, अमर उजाला से इनकी दुर्घटना में मृत्यु की खबर मिली. तब हम उनके घर जा रहे थे जहाँ किराये के कमरे में वे रहते थे. उनकी पत्नी भी आई हुई थीं. तब हम दोनों भाई शायद तीसरी चौथी में रहे होंगे..बस दनादन भागती जा रही थी. वापसी में रात अँधेरा हो चुका था. सड़क किनारे ऊँची सी दिवार थी. और उस ऊँचाई पर बड़ी सी सड़क. जिसपर जाती सीढ़ियाँ लगी थीं. हम चढ़ कर ऊपर आगये. बस पकड़ी या नहीं. याद नहीं. शायद पकड़ ही ली होगी तभी तो आज घर पे हूँ..

सितंबर 08, 2012

एक अनगढ़ कविता

कभी-कभी मन करता है तो बैठ जाता हूँ..रात करीब नौ बज रहे थे. बाहर बारिश नहीं हो रही थी. आकाश में तारे थे..और मेरे साथ थीं कुछ देर बाद ये पंक्तियाँ..उन सभी बेरोजगारों को जो कभी न कभी अपने पिता की  तरफ भी मुड़ जाते होंगे..

आखिर में बस इतना ही के मैंने अभी तक ज्ञानरंजन जी की कहानी 'पिता' नहीं पढ़ी है..  

डर

इसे कविता में ही कहूँगा कि पिता का चेहरा, 
अब ज़यादा दिखता है अपनी आँखों के पास

उस पर उम्र की साल-दर-साल चादर
शरीर को थका रही है,
कह रही है थोडा आराम भी ज़रूरी है

इन एब्सर्ड सी पंक्तियों में
छिपा रहा हूँ अपना डर
कि डरा हुआ हूँ..

इतना डरा हुआ के लिख भी नहीं पाता..
किसी से कह भी नहीं पाता
शायद यहाँ भी न कह पाऊं..

बस्स देखता हूँ
उनकी आँखों से नीले रंग का हरा हो जाना
पर भी नहीं कहता उनके गलत होने पर भी
कि सामने हरा नहीं नीला ही है..

रोज़ किसी नतीजे के आने का समाचार लेना
और मेरा झुका सिर उन्हें कुछ और कहने नहीं देता.

उनके हाथ में रहता है
सपनों के घर का नक्शा
जिसमे हम सब रहेंगे आराम से!

एक सत्ताईस साल के बेरोजगार होने के बाद
यह डर ही मेरा रोज़गार है..  

१६.७ २०१२ 

अगस्त 24, 2012

इनमे कही गयी बातें मेरे लिए हैं ही नहीं

{जिस पुर्जे पर अरुण ने यह सब लिखा उस पर कोई तारीख नहीं है. बस अंदाज़े से कह सकते हैं साल रहा होगा दो हज़ार दस, महिना शायद पहला या दूसरा. तब हमारे इंटरनल्स चल रहे थे और पर्चे से एक दिन पहले यह लिखा गया. और नीचे का सैच्चिया माने मैं खुद..और बाकी तो सब है ही..तो नीचे है अरुण की पहली रचना..कोई बड़ी बात निकलना हमेशा ज़रूरी नहीं होता. या..या ये कि एक पढ़े लिखे ने लिखने की कोशिश की., यही सबसे बड़ी बात है..और सालगिरह मुबारक अरुण मियां..}

सैच्चिया ने लिखने को कहा और मेरे पीछे ही पड़ गया कि लिखकर ही कल कागज़ लेकर आना. पर समझ नहीं आ रहा कि क्या लिखूं.

मन कर रहा है कही घूम आऊं पर कल का पेपर एक भूत या यों कहे कि भयावह भूत की तरह सर पर सवार है जिसने मुझे बाँध रखा है तथा पढ़ने पर मजबूर किये जा रहा है.जो भी विचारक पढ़ रहा हूँ बार-बार मन में यह बात आती है कि मैं इन विचारकों की कही बातों को खुद पर लागू क्यों नहीं कर पा रहा हूँ.

क्या सिर्फ मैं केवल एक साधन हूँ जिसके द्वारा किताबों से या विचारक उतरकर खाली पन्नों की कल शोभा बढ़ाएंगे. अब क्या लिखूं सैच्चिया इतना ही काफी है तेरा मुंह बंद करने के लिए. मैं फिर से साधन बनने जा रहा हूँ.

हाँ कलम रोकने से पहले मैं यह कहना चाह रहा हूँ कि किताबें और ये नोट्स पढ़ते हुए ऐसा लगता है कि इनमे कही गयी बातें मेरे लिए हैं ही नहीं ये तो शेष समाज के लिए हैं. बस अब और क्या कहूँ फिलहाल के लिए यही मेरी पीड़ा है.

बस सैच्चिया, अब नहीं लिखूंगा घबरा मत बाय बाय!!

अगस्त 14, 2012

मुझे नंगा करके ज़मीन पर बिठाया जाता है – सोनी सोरी

सुप्रीम कोर्ट की दया का बदला सरकार सोनी सोरी से ले रही है. सोनी सोरी ने २७ जुलाई के अपने जेल से सुप्रीम कोर्ट के नाम भेजे गये पत्र में कहा है कि ‘आज जीवित हूं तो आपके आदेश की वजह से! आपने सही समय पर आदेश देकर मेरा दोबारा इलाज कराया!.. एम्स अस्पताल दिल्ली में इलाज के दौरान बहुत ही खुश थी कि मेरा इलाज इतने अच्छे से हो रहा है! पर जज साहब, आज उसकी कीमत चुकानी पड़ रही है! मुझ पर शर्मनाक अत्याचार प्रताड़ना  ी जा रही है! आपसे निवेदन है, मुझ पर दया कीजियेगा!..
जज साहब इस वख्त मानसिक रूप से अत्यधिक पीड़ित हूं ! (१) मुझे नंगा कर के ज़मीन पर बिठाया जाता है ! (२) भूख से पीड़ित किया जा रहा है (३) मेरे अंगों को छूकर तलाशी किया जाता है.! जज साहब छतीसगढ़ सरकार, पुलिस प्रशासन मेरे कपडे कब तक उतरवाते रहेंगे? मैं भी एक भारतीय आदिवासी महिला हूं ! मुझे में भी शर्म है, मुझे शर्म लगती है! मैं अपनी लज्जा को बचा नहीं पा रही हूं! शर्मनाक शब्द कह कर मेरी लज्जा पर आरोप लगाते हैं! जज साहब मुझ पर अत्याचार, ज़ुल्म में आज भी कमी नहीं है!आखिर मैंने ऐसा क्या गुनाह किया जो ज़ुल्म पर ज़ुल्म कर रहे हैं!..

जज साहब मैंने आप तक अपनी सच्चाई को बयान किया तो क्या गलत किया आज जो इतनी बड़ी बड़ी मानसिक रूप से प्रतारणा दिया जा रहा है? क्या अपने ऊपर हुए ज़ुल्म अत्याचार के खिलाफ लड़ना अपराध है? क्या मुझे जीने का हक़ नहीं है? क्या जिन बच्चों को मैंने जन्म दिया उन्हें प्यार देने का अधिकार नहीं है ?..इस तरह के ज़ुल्म अत्याचार नक्सली समस्या उत्पन्न होने का स्रोत हैं..

सोनी का यह पत्र हम सब के लिये एक चेतावनी है कि कैसे एक सरकार अपने खिलाफ कोर्ट के किसी फैसले का बदला जेल में बंद किसी पर ज़ुल्म कर के ले सकती है! सरकार साफ़ धमकी दे रही है कि जाओ तुम कोर्ट! ले आओ आदेश हमारे खिलाफ! कितनी बार जाओगे कोर्ट? सोनी पर यह ज़ुल्म सोनी के अपने किसी अपराध के लिये नहीं किये जा रहे! सोनी पर ये ज़ुल्म सामजिक कार्यकर्ताओं से उसके संबंधों के कारण किये जा रहे हैं! सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा छत्तीसगढ़ सरकार के अपराधिक कारनामों को उजागर करने की सजा के रूप में सोनी पर ये अत्याचार किये जा रहे हैं! सोनी सामाजिक कार्यकर्ताओं के किये की सजा भुगत रही है! हम बाहर जितना बोलेंगे जेल में सोनी पर उतने ही ज़ुल्म बढते जायेंगे!

सोनी को थाने में पीटते समय और बिजली के झटके देते समय एसपी अंकित गर्ग सोनी से यही तो जिद कर रहा था कि सोनी एक झूठा कबूलनामा लिख कर दे दे जिसमे वो यह लिखे कि अरुंधती राय, स्वामी अग्निवेश, कविता श्रीवास्तव, नंदिनी सुंदर, हिमांशु कुमार, मनीष कुंजाम और उसका वकील सब नक्सली हैं ! ताकि इन सभी सामाजिक कार्यकर्ताओं को एक झटके में जेल में डाला जा सके !

सरकार मानती है कि ये सामजिक कार्यकर्ता छत्तीसगढ़ में आदिवासियों की ज़मीनों पर कंपनियों का कब्ज़ा नहीं होने दे रहे हैं! इसलिये एक बार अगर इन सामजिक कार्यकर्ताओं को झूठे मामलों में जेल में डाल दिया जाए तो छत्तीसगढ़ में आदिवासियों पर सरकारी फौजों के हमलों पर आवाज़ उठाने वाला कोई नहीं बचेगा! फिर आराम से बस्तर की आदिवासियों की ज़मीने कंपनियों को बेच कर पैसा कमा सकेंगे! कोई तो बचाओ इस लड़की को!

संसद, सुप्रीम कोर्ट, टीवी और अखबारों के दफ्तर हमारे सामने हैं! और हमारे वख्त में ही एक जिंदा इंसान को तिल तिल कर हमें चिढा चिढा कर मारा जा रहा है! और सारा देश लोकतन्त्र का जश्न मनाते हुए ये सब देख रहा है! शरीर के एक हिस्से की तकलीफ अगर दूसरे हिस्से को नहीं हो रही है तो ये शरीर के बीमार होने का लक्षण है! एक सभ्य समाज ऐसे थोड़े ही होते हैं! मैं इसे एक राष्ट्र कैसे मानूं? लगता है हमारा राष्ट्र दूसरा है और सोनी सोरी का दूसरा! नक्सलियों से लड़ कर अपने स्कूल पर फहराए गये काले झंडे को उतार कर तिरंगा फहराने वाली उस आदिवासी लड़की को जेल में नंगा किया जा रहा है और उसे नंगा करने वाले पन्द्रह अगस्त को हमें लोकतन्त्र का उपदेश देंगे!

{हिमांशु कुमार की फेसबुक वॉल से साभार/ और दोनों खतों पर क्लिक कर उन्हें पढ़ने लायक किया जा सकता है}

अगस्त 02, 2012

मई आठ की एक शाम

राकेश दो को दिल्ली आ चुका था पर मुलाकात आज शाम हुई. वहीँ इंतज़ार करता हुआ. मेट्रो स्टेशन गेट नंबर चार चांदनी चौक. अरुण हरदयाल लायब्रेरी के पास उमेश की खोज खबर लेता फोन पर बात करता मिला. मैं नयी सड़क से मिनियम लेकर आ रहा था. टाउन हॉल होते हुए. आशीष भी था. कुल मिलाकर पाँच.

फिर हम लाजपतराय मार्केट से रिमोट कंट्रोल लेकर अरुण के घर पहुंचे. आशीष वहीँ इंतज़ार करता रहा. बैठा रहा. वो अन्दर गया और अपनी दस हज़ारी फोटो एल्बम ले आया. गाँव से आ गयी थी. शादी की फोटोग्राफर की खींची हुई तस्वीरें. उमेश पांच गुना टांगने वाला अपना ही गणित भिड़ा रहा था. फिर सुई गुजरावालां टाउन होते हुए तीस पैंतीस लाख दहेज़ की संभावनाओं से विश्लेषण शुरू हुआ. खाना आज कल कहाँ की पेन्ट्री से आ रहा है, इस पर अरुण ने जवाब दिया और आशीष नें मुस्का कर मुहर लगायी. ऐसी ही प्रमेय वह हमें समझा रहा था.

हर प्रेम की परिणति विवाह में होना नियतिवादी विमर्श है और राकेश ने उसे खारिज करते हुए आगे कहा के तुम्हे अगर लगता है कि सच्चा प्यार है तो कभी उससे शादी नही करना. करोगे तो तलाक देने वाली स्थिति में पहुँच पाना मुश्किल नहीं होगा. क्योंकि ज़िम्मेदारी तुम्हारी थी. किसी ने थोपा नहीं था.

उसकी बहन कॉमर्स से ग्यारहवी कर रही थी. कोई पब्लिक स्कूल था पीतमपुरा का. चार विषयों में रह गयी है. भाई साथ रखने से मना कर रहा है. कहता है पैसा लेना है ले लीजिये पर साथ नहीं रखेंगे. जबसे वह दिल्ली से गया उसके कौन दोस्त हैं? क्या रुचियाँ हैं? ऐसे सवाल भी साथ रीवा चले गए. ओपन से बारहवीं तो हो जाएगी पर उसका होना ढाई पसेरी भी नहीं. वह खुद इधर इन छुट्टियों में दिल्ली के स्कूलों में नौकरी ढूंढने करने की तलाश में है. सिगरेट महिना भर हो गया पीछे तबियत खराब होने पर छोड़ दी.

आज न फव्वारे पर जग्गू की फ्रूट आइसक्रीम खायी न बाद में अरुण-उमेश की लायी कोक पी. पता नहीं आज की बातचीत पर उसके सिरदर्द का असर था या उन सारी बनती बिगड़ती स्थितियों के बीच अपनी नौकरी को लेकर उठती खीज, के वो बात लगी ही नही. कभी-कभी राकेश-आशीष दोनों की स्थितियां लगभग समान सी लगती हैं. दोनों सामान्य सवर्ण. उस सरकारी नुक्ते की दौड़ती बाधादौड़ में सरका कर पीछे भेज दिए जाते हैं. शादी घर-परिवार-अपेक्षाओं की ज्यामिति में अपनी भूमिकाओं को लेकर जटिलता का अनुभव. बराबर बढ़ती उमर का दबाव. खुद के उत्पीड़न के लिए तय्यार करते मानस.

अरुण अच्छा श्रोता तब नही रहता जब उसके दिल में दबी कुछ बातें सतह पर आना चाहती हैं. बात सीधे अब राकेश के भविष्य पर जा टिकी. कभी-कभी कुछ जवाबों को हमें नही माँगना चाहिए..पर..खैर, फिर वहाँ अपने वर्तमान से असंतुष्ट होने के बावजूद हाँ में हाँ मिलाता पकड़ा गया. के जहाँ हम होते हैं वहां अपने को 'मिसफिट' भी पाते हैं पर वहीँ किसी 'यूटोपिया' के लिए संघर्ष कर रहे अपने आज को कोसते रहते हैं.

आशीष इस मामले में उमेश की तरह तो नहीं पर हाँ, दोनों दूसरों की सुनते हैं, तब कहीं अपनी रखते हैं. उमेश की सचाल-वाचाल ध्वनियाँ अनुपात में ज़यादा होती हैं क्योंकि कई बातों का प्रस्थान बिंदु वही होता है. आशीष भी नौकरी की अपने पिताजी की बातों से थोड़ा परेशान रहता है. पर शायद यह हमारे मध्यवर्गीय परिवारों में बेटों की नियति जैसा कुछ है. बिन नौकरी शादी की तरह.

आज शाम की इन सब बातों में अजीब किस्म की विश्रृंखलता लग रही है वैसी ही वहाँ उस हवा में थी. बेतरतीब सी. भौतिक रूप से सब वहाँ मौजूद थे पर मानसिक रूप से न मालूम कहाँ थे. वहाँ कसरत करता दिमाग किन्ही उलझनों से उलझ रहा था. उन सब में ठहराव हो ही नही पाया..ऊपर से अरुण बार-बार उस कमरे की कथित घुटन से बहार निकल अपने हिस्से की बातें करना चाह रहा था जो कुल मिलाकर बाहर भी कम ही किश्तों में आ सकीं. बाहर सबने पहले गोलगप्पे खाए फिर हल्दीराम के ढोकले देखते हुए छोटे लाल की रेहड़ी वाली फ्रूट आइसक्रीम पहुंचे. जिसके देखते ही अरुण को दौरा पड़ता है और अपने आस-पास खड़े दोस्तों में से किसी एक को चुन सौ वाला डिब्बा पैक करवा लेने को कहने लगता है.

मेट्रो में जाते हुए राकेश ने कहा, अब यहाँ नही मिलेंगे..शायद सिरदर्द कम नही हुआ था..

{इधर डेढ़ साल बाद घटी ऐसी ही एक और शाम हमारे हिस्से..}

जुलाई 30, 2012

उस रात की अजीब सी उलझन

कहाँ से शुरू करूँ?? क्या क्या लिखूं क्या सब छोड़ रहने दूँ??

दिल्ली आने के बाद उन्ही दबावों से घिरने का मन नही कर रहा. पिछले दस दिनों की बेफिक्री उस रात की तरह न हो जाये जब चाची के सवाल ने पूरी रात न मालुम किन उथले में ले जाकर पटक दिया था!! था छोटा सा सवाल, के, लड़की पास हय तोहका के नाय..!!


लगा कि अचानक हम इतने बड़े हो गए के हमसे जुड़ी बातों में हमें शामिल किया जाने लगा..शायद यहाँ शहर में रहने के कारण हुआ या कुछ और पता नही..फिर एक पल बाद महसूस हुआ कि क्या यह ज़िन्दगी का ऐसा मुकाम है जहाँ से एक हमसफ़र टाईप का व्यक्ति हमारे साथ नत्थी कर दिया जाता है..


आमना सामना बार बार दो-एक साल में होना, किसी मजबूत परिचय का आधार नही हो सकता. जितना दिखाया जा रहा है उसके पीछे बहुत सारे ऐसे चोर दरवाज़े भी होते हैं जहाँ आवाजाही इतनी सहज सरल नही होती. 
उन लड़की वालों के लिए उनकी लड़की, माने उनके परिवार का हमारे परिवार के साथ संबंध इस रूप में ऐसा है जहाँ दोनों लड़कों में से किसी के भी साथ जाया जा सकता है.

शादी ब्याह क्या हमेशा से ऐसे ही पारिवारिक संस्करणों में हमारे सामजिक दस्तावेज़ हैं. जहाँ उस लड़के का पिता और उसके पीछे उन सारे कार्य व्यपारों का इतिहास काम कर रहा होता है, जो उसे एक भरा पूरा कुनबानुमा आकार देता है. जहाँ उसका सामजिक मूल्य औरों के पूर्वजों-वंशजों के मुकाबले कहीं अधिक मान लिया जाता है. इसका संचय कोई एक दो दिन की जमा नहीं, बपौती है. जिसे जिम्मेदारी से एक पीढ़ी दूसरी पीढ़ी को इस उम्मीद से हस्तांतरित करती है जहाँ उसका मूल्य काम न हो उत्तरोत्तर बढ़ता जावे. और ऐसे ही सामान रूप से उस वधु के परिवार की तरफ भी समानुपातिक रूप से संचालित होता है ताकि जिस उम्मीद के साथ कहीं भी लड़की का रिश्ता लेकर जावें, स्वीकार लिया जाए.


उस रात और उससे पहले जनसत्ता में छपी मेरी ब्लॉग पोस्ट ने पापा के मन में किसी अज्ञात-ज्ञात विचार को जन्म दिया कि अगर यह चौदह फरवरी वाली प्रेमदिवसीय आलेखनुमा कहानी में कुछ तनिक भी सच है तो उस लड़की की खोजबीन होनी चाहिए. सुबह से दो तीन मर्तबा दायें-बाएं कर किसी चक्कर-वक्कर को टटोल चुके हैं. और बातचीत में कहीं यह भी प्रकट भी होता है कि हम इतने साल इस जैसे महानगरीय विश्वविद्यालय में पढ़ने के बावजूद किसी लड़की तक को नहीं खोज पाए.


अजीब सी अकुलाहट गले में आकर फंस सी गयी थी. उगलना चाह रहा था पर..खैर, एक तरीके से यह वो क्षण था जहाँ आकर मुझे अपनी खोजबीन को रोक देना था. कोई खोजी दस्ता था भी कहाँ..जिसके साथ ज़िन्दगी बितानी थी, एक तरीके से वहां पहुँच गया था. अपनी हैरान परेशान सूरत से कहीं किसी कि आँखों कोनों कतरों में झाँकने से अब तौबा होने जा रही थी. सोना इतना ज़रूरी लग भी नहीं रहा था. बस एक एक कर उन सारी छवियों को ध्वस्त करके चलना था. उन सारी स्त्रैण छायाओं से कैदी के भाग जाने का वक़्त जैसा कुछ था..


एक लड़की एक लड़का दोनों एक दूसरे को उतना ही जानते बूझते हैं जितना रोज़ बस स्टैंड पर गुज़रती आंखें एक दूसरे को देख भर लें और यही उनकी अबोली-बेमिली छोटी सी पहचान हो..

जुलाई 28, 2012

बीवी नौकरी विचारधारा और हलफनामा

इस पोस्ट का आगा पीछा..

मतलब अब उसकी खोज अपने चरम की तरफ जाने पर अमादा है. और किसी रोग की तरह या किसी शगल की माफिक उसमे घटा बढ़ा होती रहती है. सोचने समझने की चुकताई पर नही सोच रहा, तो इसके पीछे कारण है प्रतिबद्धता के छद्मावरण के फायदे. जिसमे विचारधारा विशेष आपको ऐनक देकर देखना ही सीमित नही करती आपको किनारे पहुंचा भी देती है. उसका काम आपमें रोजगारपरक संभावनाओं को देखना तलाशना और उस मुताबिक़ काम सुपुर्द करना भी है.

बस आपको अपने स्वांग का अभ्यास कुछ ज़यादा अच्छी तरह करना पड़ता है. बिना किसी रीटेक. 'साधारणीकरण' घटित हो जाने के बाद, 'विरेचन' स्वरुप पुरूस्कार देने का भी प्रावाधान है. उन्हें बस लगना चाहिए के आप संभावनाशील हैं जबकि अन्दर ही अन्दर पदानुक्रम में कई पायदानों की छलांग आप पहले ही मार चुके होंगे..


पर दिक्कत यही है कि दमड़ी न होने पर छद्म स्वांग ज़यादा देर उसे दिखा पाना संभव नही है. इसलिए हो सके तो चीख चिल्ला अपवाद बनो और उसके आँख की किरकिरी बन जाओ. विरोधाभासों का संतुलन वितंडावाद न बने उसकी सीमा के अतिक्रमण पर ठहरकर इंतज़ार करो. के अन्दर उठते उफनते ज्वर को शांत करता कोई 'रिलीफ पैकेज' आया ही समझो.


फिर विचारधारा एक अदद देह का जुगाड़ भी आसानी से कर देगी पर अन्दर का पुरुषसत्तात्मक चरित्र इतनी जल्दी बदल सक पायेगा इस पर थोड़ा संशय लगता है. उसके साथ हो जाने पर खतरा यह भी है कि सबसे निकट बिना दूरी के वही होगी. कपड़े-बिना कपड़े आपकी वास्तविकता की सबसे निकटतम साक्षी. इसलिए बाहर तो बघारा जा सकता है पर घर की चारदीवारी जंगे मैदान का शौक चर्राए तो इधर जाया जा सकता है. शौक से.


कभी इस पूरी प्रक्रिया में ब्रांड फैब इण्डिया मार्का बीवी ढूंढने की सोची थी पर खतरा जान परियोजना पर फिर कभी गौर नही किया. वर्ना सारे सिद्धांत- प्रमेयों की प्रयोगशालाओं में बिन दम का चूहा मेरी बगल में बैठा अपनी बारी का इंतज़ार कर रहा होता. रैडिकल जितना देखने में सुर्ख लगता है उतना अपनी ज़िन्दगी को लाल करने का पागलपन खुद में कभी नही था. शुक्र है दिमाग अभी भी काम कर लेता है. ठीक ठाक बहस कर कामचलाऊ बातें अभी भी उगल रहा है और किसी को क्या चाहिए??


इस सारे हलफनामे में जहाँ तक हो सका है किसी प्रपंच रचने से खुद को बचाए रखने की कोशिश की है. पर लिखने वाले हाथ और लिखवाने वाला दिमाग तो मेरा ही है न. इस नुक्ते पर यह भी ध्यान रक्खें की ऐसा लिख अपने को बचाने वाले इधर खूब सक्रीय हो गए हैं. हमारी दूकान का ठीहा कुछ ज़यादा ही नया लगे तो अपनी मठाधीशी आँखें और भेजा किसी नेत्रदान शिविर में दान कर यहाँ वापस आया जाये. फिर ऐसा तो है नही कि अपनी फांखों खांचों को बेतरतीब रख मैंने कुछ गुनाह जैसा कुफ्र किया किया है. मन कर रहा था..इसलिए लिख दिया..!!

जुलाई 25, 2012

बरसात की छोटी सी मुलाक़ात

स्मृतियाँ शायद ऐसे ही काम करती हैं. तुम्हारा मेरे साथ बगल में खड़े होकर फोटो खिंचवाना अभी भी याद है. और इन सबके बीच द्वन्द नहीं पर खींचातान चालू रहती है. मेरे चेतन में घुसपैठ कर मेरे सपनों में आवाजाही भी होती जाती है. जिसपर मैं कुछ नहीं कर सकता. पहरेदार भी मेरे साथ सो जाता है.

सपने कहीं पलायन जैसी स्थिति की तरफ नहीं ले जायेंगे. कोई दबा छिपा अव्यक्त सा यहाँ हमेशा से मौजूद रहता है इसलिए आश्वस्त हूँ ऐसा होगा नही. हम अपने सपनों उसकी यादों में याद रह जाने लायक को बचा रखने की जद्दोजहद में लगे रहते हैं. उनकी बारंबारता, उनका स्मृति में ठहर जाना कहीं रुकावटों को पैदा करता है तो कहीं कभी उन्ही को हटाने में मददगार भी होता है.


कल सुबह बारिश 
के बीच मेट्रो स्टेशन पर एक भूले बिसरे प्राणी से मुलाकात हुई. भौतिक उपस्थिति के स्तर पर वैसी ही परेशानी का भाव. आँखें कहीं गहरी गहराई में उतरती सी. बालों को बाँधने का ढंग तब से बदला हुआ सा. दांतों को उनकी सही जगह बताती तारें उसके होंठों को सूजन जैसा भाव देकर अपना ध्यान हटा रहीं थीं. आगे के दाँतों के प्रति ऐसी सामजिक चेतस वृति कई खांचों को और खोल देती है.

मेरे लिए तुम भी तुम हो इसलिए तुम्हे तुम ही कहा.एक बार बाहर जाती लाइन में लगकर बाहर आ गया. कार्ड पंच नही किया. ए.ऍफ़.सी. गेट से परली तरफ न निकल इतने दिनों बाद दिख पड़ने पर बात कर ही लेनी चाहिए, यही सोच स्टेशन से बहार नही निकला. मैं खुद किसी जद्दोजेहद में था. पर पास गया. बुलकारा.


तुमने भी शायद मुझे देख लिया था. और मिलने की चाहना उस स्तर पर नही दिखी जैसी सहज ही हममे होती है. तुम मोबाइल में व्यस्त इधर उधर देख रही थी और मेरे जैसे दाढ़ी वाले, जिसके साथ कितने ही प्रस्थान बिन्दुओं को जोड़ देने वाले एक साल कई संगी साथियों के साथ पढ़े थे, से कन्नी काटने की पूरी कोशिश की जा रही थी. दो-तीन-चार बार हमने एक-दूसरे को देख कर भी नही देखा. पर लगा पहले का कोई सूत्र था जो कह रहा था मिल लेना चाहिए. इसलिए मिला.


बातचीत कई स्तरों पर हुई. एमए लेक्चर से लेकर कॉलेज मैगज़ीन, एमएड तक. औपचारिकता धीरे-धीरे टूट बन रही थी. दर्शन से लेखन फिर ब्रेख्त के बाद छाते रिक्शे से होते हुए बाहर होती हुई बरसात पर फिर अटक गयी.


आखिर में घड़ी नौ बीस के इर्द गिर्द मंडराने लगी और मेरी क्लास का वक़्त पास आ गया. इससे पहले रिक्शा लेकर दोनों चलते बौछारों के साथ बारिश तेज हो गयी. और चूँकि उसका पहला लेक्चर तो करीब करीब ख़तम ही होने वाला था, वो वहीँ रुक गयी. कि बरसात रुक जाये तब फैकल्टी की तरफ जाये. मैं उसके आने वाले नतीजे के लिए 'ऑल द बेस्ट' कह भीगता भागता अपनी शुरू होने वाली क्लास में पहुंचा.


लाइन में लगते आगे बढ़ते बाहर निकलते मैं पीछे मुड़ उसी को देख रहा था. पर उसकी गर्दन गाय की तरह रंभाती दाएँ-बाएँ देख रही थी.


{बरसात की तारीख है सोलह अगस्त, बीते साल.}

जुलाई 22, 2012

पार्टनर तुम्हारी पॉलिटिक्स

बड़े दिनों बाद वापसी..

क्या मेरे पास बने बनाये खाँचें हैं, उनमे धीरे-धीरे सबको डालता हूँ. समरूपता के इस कोण में मेरा खुद का क्या क्या निश्चय है. क्या यह विचारधारा की तरह रूढ़ नहीं है. घेरकर लपेटकर फिर उसी तरह कान पकड़ना जैसे पीछे पन्नों पर सष्टांग करायी थी. उन सारे विश्लेषण के औजारों का बासीपन गंधाने लगता है. बिलकुल वैसे ही जैसे घर में फ्रिज न हो और ढोकला एक रात रोक लिया जाये तो अगली सुबह स्वाद थोडा खट्टापन लिए रहता है. उसे खाने को जीभ मना कर देती है. या यह उन तर्कों अवधारणाओं को बार-बार उपयोग में लाकर उनकी प्रमाणिकता को बनाये रखने की ज़िद जैसा कुछ है. मूलगामी रूप से जितनी पुरानी यह सारी विधियां लगती हैं, उनमे हमारे यहाँ का लगता मौन उसकी मजबूती को साथ-साथ परखता चलता है.

उस दिन जब लिखा कि 'कम्युनिस्ट' जैसे किसी पद के साथ नत्थी नहीं हो जाना चाहता तब शायद यही आग्रह था के तांगा खींचते घोड़े की तरह बस एक ही दिशा में नहीं समझना चाहता. कभी लगता है के पूंजीवादी पाठ में उतना ही व्यक्तिवादी अध्याय हूँ जितना नितांत निपट अकेले क्षणों में कोई हो सकता है. हम विचार के साथ हैं. किसी के सुझाये नहीं चलते. उनकी जांच परख हमेशा होती रहनी चाहिए. और जहाँ तक मुझे अपनी पहचान है, वहां सवाल इतने हैं की पूर्वनिर्धारित उत्तरों से उनका गुज़रना नहीं होने वाला. भले उन सन्दर्भों को यहाँ वहां लिखमारूं पर किसी के साथ जोड़ना बैठा देना उतना ही खतरनाक होगा.

हम सबको पता है हम सभी उस प्रक्रिया में हैं 'जहाँ ज़िन्दगी सिर्फ जीने लायक बने रहे' से आगे, अधिशेष में क्षणों को व्यतीत व्यतीत करना चाहते हैं. सक्षम हो इसकी कोशिश की जा सकती है के किसी का काम पूंजी के संकट के चलते न रुके. इसे छद्दम आवरण भी नहीं कह सकते क्योंकि हम तो विनम्रता से उस वास्तविकता को स्वीकार कर रहे हैं जिनके पास पहुँचते-पहुँचते न मालूम कितने ही मारे जाते हैं. जबकि उनके आदर्शों में उनके साथी 'पूंजीपति' होते हैं.

बस कोशिश यही रहेगी के खुद से पर्देदारी न हो. हम विचारधारा की तरह यथास्थितिवादी नहीं हो सकते. न ही उनके पोषक होना चाहते हैं. विचार के संस्थागत होते ही उसकी मृत्यु निश्चित है. क्योंकि उसे विचलन से पीड़ा होती है . वहां संशोधन नहीं हो सकते. सवालों की जगह नहीं होती. पैबंद सिर्फ उन्ही के खेमों के विचारों के चिपके होते हैं. इसलिए भी उससे बचने की कोशिश रहती है. भले ही किसी विचार को मौन स्वीकृति दें पर विचारों की क्रमबद्ध श्रृंखला में हू-ब-हू अतार्किक स्वीकार्यता स्वीकार नही.

यह आज तारीख दिमाग में चल रही खुराफात का दस्तावेजीकरण है. भले झुकाव इनके विकल्पों की तरफ अधिकांशतः होता है पर किसी बने बनाये जुलूसी बिल्ले में तब्दील नही होना चाहता. वैसे भी उनकी अपेक्षाएं कुछ ज़यादा होती हैं जबकि मेरे जैसा व्यक्ति किसी अपेक्षित अपेक्षा के दायरे में रहकर सांस नही ले पाता. ऐसा मुझे लगता है. और 'मुझे' मेरे स्वर की प्रतिध्वनि सुनाई देनी चाहिए. जिसका वहां निषेध है. व्यक्ति वर्जित प्रदेश. वहाँ समूह की भेड़िया-भेड़-बकरी धसान में आपका स्वागत है.

{ इसका पीछा आगा..}

आवाज़ें..

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