फ़रवरी 29, 2012

ये जो शहर है लखनऊ

हफ्ता भर पहले तक हमारा लखनऊ चारबाग के इर्दगिर्द सिमटा हुआ एक ऐसा शहर था जिसे कभी मौका लगने पर घूमलेने की तमन्ना न मालूम कब से अन्दर थी.

जितना ये उन बड़ी-बड़ी चौड़ी होती जा रही सड़कों चौकों, उन पर रपटती गाड़ियों के बीच चमचमाती रौशनियों की परछाई में ऊँची होती जा रही इमारतों में अपने नए संस्करण बना रहा था, उतना हमने इसके पुराने रंगों-आब में देखा ही नही था. उमराव फैज़ाबाद से लखनऊ ही आती है, तो प्रेमचंद के शतरंज के खिलाड़ी भी अपनी ठुमरी, रूमी दरवाज़े से गुज़रते चिकन वाले कुरते पहने, पान भरे मुँहों के साथ यहीं के थे. जितना बस की खिड़की से ये हमें दिखता नही था उससे कहीं ज़यादा छिपा रह जाता था हर बार. इसकी गोमती भी सिकुड़ कर दिल्ली की जमना बनने की तरफ जाती जा रही थी.

जब जब बहराइच से हमारी बस इस शहर में चिनहट की तरफ से दाखिल होती पोलिटेक्निक चौराहा सवारियों को उतार यह बता देता था कि अब हम दाखिल हो रहे हैं. और इसकी ताकीद भी कि अब हम इस बनते शहर की तरफ भी बढ़ रहे हैं..

मायावती के आने से ये कितना बदला या उस दरमियानी में उदारीकरण की छाया वहां कुछकुछ इस तरह पड़ी जिसने एक सभ्यता के विमर्श को इस तरह से गढ़ा कि गोमती के किनारे बहुमंज़ली इमारतों की कई-कई जमातें यक-ब-यक उग आयीं. बड़े-बड़े होर्डिंग जेब में रखे बटुए को खाली करने से लेकर अखबारों के हिस्से में जा पड़ीं. कोई ऐसा बड़ा ब्रांड नही था जो वहां नही आना चाहता हो. वहीँ कहीं किसी छत पर दमकते, बाल धुलाते-मकान दिलाते-कपडे पहनाते-गहनों की शुद्धता से लेकर सोना गिरवी रख सपने दिखाते उन देखती चुंधियाती आँखों को इस समय ने सहारागंज भी दिया. और ऑटो टेम्पो वालों के लिए वहां चलता जीना ही देखने लायक एकलौती चीज़ है. उस शाहनज़फ़ के इमामबाड़े की तरह जाता ही कौन है.. 

मॉल अपने आप में सिर्फ दुकानों का जमावड़ा भर नही है. संस्कृति को समरूपी बनने का बहुत पैना औज़ार है. बाहर पढ़ने नौकरी करने गए वापसी में थोड़े-थोड़े उन शहरों को भी साथ लेते आये. और साथ लाये अपने नए बने स्वाद, कूचा रहमान से सिलवाई कमीज नही साथ थी पीटर इंग्लैंड की शर्ट. पैंट मफ्ती की तो थी ही पजामे भी कैपरी में बदल गए. अब कौन इतवार हजरतगंज जाकर पांच सात तरह के पानी वाले बतासे खाए. लालबाग़ नावेल्टी का पर्दा और उसका साउंड सिस्टम आईनोक्स रिवरसाइड मॉल के चौथे माले के सामने कहाँ टिकने वाले हैं..और शुरू हुई वो सारी प्रक्रियाएं जिसने इस शहर को पिछड़ा नही रहने दिया, इसने खुद को बदलना शुरू किया..

भले यह कटरों को अपदस्थ नही कर पाया है पर एक द्वंद्व तो चलता ही रहता है. कैसरबाग़ नजीराबाद वाला इलाका कहीं से भी इसमें पिछड़ता नही दिखता. भले जूतियाँ कानपुर कोल्हापुर से नही आ रही हैं पर उसने अपने को बदला है. गांधी के नाम पर आज के युवा को चप्पल खरीदने में कोई गुरेज़ नही, बस उसका स्टायलिश होना ज़रूरी है. दाम जेब पर भारी पड़े तो नही देखता कि चमड़ा उंट का है या किसी और का..

चिकन के कुरते पायजामों के साथ सिर्फ तीन सौ पिचहत्तर से शुरू नाज़ीराबाद में मिल रहे हैं पर दुकानदार किसी सालाना जलसे का इंतज़ार करते मक्खियाँ मार रहे हैं. अमीनाबाद के गड़बड़झाला बाज़ार में उन्नाव के इत्र की महक नही परफ्यूम की नाक दिमाग पर चढ़ती कोई तेज़ गंध है. औरतें-लडकियां किसी फिल्म में दिख गयी बाली गहने लेने भर-भर के वहाँ पहुँच रही हैं. और सामने की आँखें ब्लाउज के अस्तरों के पीछे से झांकते अन्तः वस्त्रों के देसी विदेसी नाम पढ़ने में मसरूफ हैं.

वहाँ के दूल्हाघर दिल्ली गाँधी नगर की दुकानों की तरह उन परम्परागत शादियों को निपटाने का बीड़ा उठाये हुए हैं. ये बात अलग है कि मौर को सर की टोपी कितने कहते हैं..मनिहार चूड़ियाँ नही बेच रहे, उनकी कोई जगह ही नही है. चूड़ा खरीद ही कौन रहा है..हाँ सलवारों के लिए लटकन लेने भले दर्जी वहाँ के चक्कर काट जाते होंगे. अवध सिर्फ होटलों चिकनकारी की दुकानों की चार दीवारिओं तक सिमट रह गया है. और बचे है पुरानी ठसक वाले निशांतगंज-चारबाग-चौक-नाका हिंडोला-नाज़ीराबाद-अमीनाबाद-कैसरबाग-कैंट..पर ये जितने पुराने हैं उतने ही नए भी, इनके बनने बिगड़ने की सारी प्रक्रियां गोमती नदी के पार बसी रिहाइश, उनकी बुनावट, हिज्जों, स्मारकों के साथ-साथ चल रही हैं..

अभी पढ़ते हुए इधर इसकी एक और व्याख्या मिली..

इस पूंजीवाद ने जिस तरह मास कल्चर और मास सोसाइटी को जन्म दिया है, वह बुनियादी तौर पर व्यक्ति की स्वतंत्रता, निजता और व्यैक्तिकता का सबसे बड़ा शत्रु है. आज के दौर में, जो कुछ भी पर्सनल है, कम से कम संस्कृति में उसकी जगह नही है. मास मीडिया वही है जो सारे मनुष्यों को दर्शक-श्रोता मान कर उनमे एक जैसी रूचि और आस्वाद की आदत डाल रहा है. क्या आपको नही लगता कि ऐसे समय में अपने नितांत एकांतिक और निपट अकेले अनुभव को व्यक्त करना इस पूंजीवादी समूहवाद का सार्थक प्रतिकार है. (पृष्ठ १७, और अंत में प्रार्थना ; उदय प्रकाश)

और यह समरूपता हजरतगंज लालबाग़ की उन सारी काले रंग पर नाम वाली होर्डिंगों में अपने इसी अर्थ को तो व्यंजित कर रही हैं..

[जारी..]

पीछे के पन्ने: हज़रतगंज के बहाने दस का नोट और नन्हे हाथशहर के शहर बने रहने की स्त्री व्याख्याउन सबके नाम जिन्होंने ये शहर बनाया

फ़रवरी 23, 2012

सैल्यूलायड के परदे से..

दिसंबर इकतीस करीब पौने ग्यारह.

साल की पहली फिल्म किताब की जद्दोजहद में अंसारी रोड की तफरी के बाद डिलाईट पर अरुण-राकेश के साथ नो वन किल्ड जेसिका देखी. फ्लाईट में रानी का डायलौग तो सबको याद रहा पर यह नहीं की एनडीटीवी की बरखा दत्त का नाम कारगिल की बहादुरी के बाद उन टूजी वाले टेपों में आवाज़ समेत आ चुका था. जिससे बौखलाए देश का नमक बनाने वालों को अपनी निजता का हनन होता नज़र आया..खैर, अभी इस सोमवार डान द्वितीय, थ्री डी में देखी पहली फिल्म अचानक ही बन गयी. चश्मे के पच्चीस रूपये. न फिल्म में दम था न वहां ऐसे सीन थे कि कानों पर ऐनक टाँगे रहें..डर्टी पिक्चर का मौका ही नहीं लगा.

बीच की ज़यादा याद नहीं रह गयी हैं..सात खून माफ़ विशाल भारद्वाज की, ये साली ज़िन्दगी अरुणोदय की आयशा, सोनम-शाहिद की मौसम. तिग्मांशु की साहेब बीवी और गैंगस्टर भोपाल, साँची आने के बाद, सुभाष नगर रेल्वे फाटक की टिकट कटवा चुकने पर भी भारत
टॉकिज पर कूद कर देखी. मतलब उस थोड़ी सी दरमियानी में त्वरित सोच कर उतर पड़े. यहाँ महिलाओं के लिए अलग से टिकट खिड़की दिखी. फ़ोर्स अल्पना पर लगी थी पर उधर नहीं गए. आरक्षण अन्ना आन्दोलन के एक दिन पहले पहली आज़ादी के दिन पंद्रह अगस्त को उदगीत के साथ भीगते भागते पहुच कर देखी फिर जेपी पार्क राजघाट पता नहीं क्यों रपटाये चले गए. शायद मंडली इतने दिनों बाद जुटी थी इसलिए..हम जा तो फ़िरोज़शाह कोटला रहे थे किले की उंचाई पर अशोक स्तम्भ के पास बैठते फिल्म की बोरियत कुछ कम करते पर..

धोबी घाट अकेले देखनी पड़ी. कहीं मल्टीप्लेक्स को छोड़ लगी नहीं थी, फिर ध्यान गया प्रगति मैदान शाकुंतलम की तरफ. वहां कहानियाँ सुनाई दीं निशांत-भूमिका-अंकुर  के वक़्त की. स्टाफ में इस फिल्म को लेकर जितनी भी बातें थीं उनका लब्बोलुआब यही था कि फिल्म या तो लोगों को खूब अच्छी लगी है या बहुत ही बेकार. और उनमें से एक महाशय का बेटा जो फ़िल्में कम ही देखता है वह पहली श्रेणी में है. राकेश को पूरी फिल्म में आमिर के माथे पर चढ़ी त्योरियां ठीक नहीं लगी.

डैली बैली हरिद्वार भागने वाले
दिन चार जुलाई को अभिषेक में देखी और उसके बाद बकौल अरुण उसका पर्दा-साउंड सिस्टम लाजवाब हो पर उसका सौंदर्य व गंध शास्त्र मोती की तरह ही जान पड़ा. और फिर कभी कोई फिल्म वहां न देखने की कसम टाइप थ्री डी में रा-वन देखने के वक़्त टूटने वाली थी बच गयी. स्टेनली का डब्बा तारे ज़मीं पर से कहीं सहज लगी. बाद में पता चला कि इसको  कैनन ईओएस 7डी पर डेढ़ साल हर शनिवार होने वाली वर्कशॉप के दौरान फिल्माया गया था.अमोल गुप्ते का हिंदी टीचर का रोल किसी बने बनाये चौखटे में फिट किया लगता है, इसके बावजूद. पर मैंने वहीँ कॉन्फ्रेंस हाल में उस आध्यापक को उसके वर्ग और व्यंजनों के चरित्र के साथ जोड़ कर कुछ-कुछ देखने की कोशिश कर रहा था. फिर भी उसे इस तरह जाना नहीं चाहिए था. और अकरम का रोज़ रात बचा खाना फ्रिज में रखना उन दोनों के साझा भविष्य की अनिवार्यता को चोर दरवाज़े से सामने लाता है.

अगर मर्डर-टू इमरान हाश्मी के चंगुल में न फंसी होती और भिन्डी बाज़ार का फत्ते प्रशांत नारायण पूरी फिल्म में व्याप्त रहता तो सौ की तरह यहाँ हमें कोई थ्रिलर देख पाते. इसी फिल्म के इंटरवल में डोबरियाल की नॉट अ
लव स्टोरी का ट्रेलर देख रिलीज़ डेट का इंतज़ार भी किया पर मौका नहीं बन पाया. टल गयी. चिल्लर पार्टी-सिंघम दोनों किश्तों में टीवी पर थोड़ी थोड़ी देखी पर पहली वाली का कुते वाला साथ ज़यादा संवेदनशील मसला था. प्यार का पंचनामा इतनी बड़ी फिल्म हो जाएगी उम्मीद नही की थी. पालिका से सीडी कबकी ला चुका हूँ पर देखी नही है.

अनुराग की पांच सेंसर बोर्ड ने ए सर्टिफिकेट के साथ भी रिलीज़ करने से मना कर दिया पर उसी ढर्रे पर बनी अनुराग घराने की शैतान परदे तक ठीक ठाक पहुच गयी. उसका हवा हवाई और खोया खोया चाँद दोनों गाने नए सफल प्रयोग ठहरे.

रॉकस्टार रणबीर के स्टारडम की पहली फिल्म कुछ-कुछ अपने टाइप की लगी. कविता की तरह फैली ज़िन्दगी के हर रंग से खेलती. कोई सामजिक परिभाषा उसको व्यवस्थित नही कर सकती, वहां वह जैसा चाहेगा, जिएगा. अन्दर तक बेचैनी अपने को पाने की शिद्दत से कोशिश. दिल न टूट जाने की पशोपेश. इम्तियाज़ की नायिका जहाँ लव आज कल में शादी के बाद वो सात दिन का मिथक तोडती है, तो यहाँ दोबारा नायक उस कथा को ध्वस्त करता, राजश्री की 'अंखियों के झरोखे से' आगे की कहानी कहता है. अगर इनके अलावा भी देखें तो मेरा मन इसे चार छेह मर्तबा देखने का और था..

विशाल भारद्वाज की सात खून माफ़ इसी तरह की पहली फिल्म थी जो स्त्रैण प्रेम की गुणात्मक व्याख्या ज़रा श्याम बेनेगल की भूमिका की तरह करने की कोशिश करती खुद से झूझती रहती है. पूरी फिल्म उसी तरह की तकनीक अपना कर अपने काल खंड को कहती है. कभी टीवी पर बाबरी मस्जिद के विध्वंस का सीधा प्रसारण(?) दिखाती है तो कभी चलती ट्रेन में आँखें फोड़ते अखबार पढने की कोशिश..दोनों जगह नैतिकता सामाजिक दबावों से तय नही होती न किसी निर्णय में कोई मूल्यनुमा वजन दिल पर नही पड़ता.

इस पर एक लम्बी चौड़ी पोस्ट साहिब बीबी गैंगस्टर की तरह नही लिख पाया जो कि वही से शुरू थी जहाँ अबरार अल्वी अपनी साहिब बीबी गुलाम ख़तम करते हैं. सामंती मूल्य कभी पूरी तरह चुके ही नही, वे उस पूंजीवादी व्यवस्था में सांस लेते यहाँ-वहां दोबारा दिख पड़ते हैं. रुतबा, उन्हें बन्दुक की गोली खरीदने के लिए कर्जा दिलवा देता है. रौब गांठते राजनीतिक दुरभिसंधियों के काल में शोषक अपने शोषितों को किसी भी तरह ठील देने की फिराक में नही है.


बस हुआ इतना भर है कि स्त्री अब अपनी देह के पुरुष मर्यादित संस्करण से निकल कर उसका उपयोग कर सत्ता पर काबिज़ होने की पहली कोशिश में कामयाब सी लगती है. गुलाम या तो गूंगे हैं या उसकी शारीरिक इच्छाओं की पूर्तिदाता के रूप में मौजूद हैं. यह निर्णय खुद स्त्री के हैं या पुरुष सत्ता ने उसको अमानवीयकरण की प्रक्रिया से गुज़ार कर अपनी दैहिक इच्छाओं का उल्लू सीधा किया है. छवियाँ इश्किया से लेकर मकबूल होते होते अंकुर तक जा पहुँचती है जहाँ शबाना गर्भवती तो अपने मालिक से होती है पर फिल्म का अंत वहां होता है जहाँ वो अपने पति की तरफ भागती चली जा रही है. इस बिम्ब का इस दृश्य का अपना विशिष्ट अर्थ है जिस पर फौरी तौर पर कुछ और नही कहना चाहता..हाँ बस ये के इश्किया से साथ मृत्युदंड भी साथ चली आई थी..

उधर सिब्बल जिन सोशल नेटवर्किंग साइटों पर प्रतिबन्ध लगाने के लिए ऊलजलूल सी बातें कर रहे हैं उन्ही में से एक फेसबुक के सहारे ओनिर ने अपनी फिल्म आई एम के लिए पैसे जुटाए. इस माध्यम को कम आंकना भारी पड़ सकता है. तहरीर चौक से लेकर पूरा अरब इसी जमुनी क्रांति के बीजों की खाद पानी यहीं से लेता रहा है. यू ट्यूब पर अपलोड किसी युवक की हत्या का वीडियो आज सिर्फ हत्या या सिर्फ एक विडियो नै कई कई सैकड़ों बिम्बों का गुंजलक है. जिसे पढना है पढ़ ले..

फ़रवरी 21, 2012

दिल्ली का सूरज पता नही इतनी दूर क्यों है..

दिल्ली और दिल्ली की अंगड़ाई. मौका ही कहाँ मिलता है अंगड़ाने का. इतनी भागमभाग हबड़दबड़ में अपने आस पास को महसूसने कोनो कतरों में झांकता ही कौन है..बस एक अजीब किसम की दौड़ में मरते खपते हम सब..यहाँ से बाहर जो बेफिकरानापन रहता भी है तो वो भी इधर आती पटरियों पर लौटते ही उड़ जाता है..

गाड़ियों की चीख पुकार में गायब होती जाती धड़कने सुनाई भी नहीं देती. भले बाहर भी न देती हों पर एक सच जैसा झूठापना तो रहता ही है कि अपने पास है.!! कुछ देर पेड़ों के पीछे आसमान में रंगों के साथ खेलते सूरज को देखना कितने कितने इत्मिनानों से भर देता है, उसे लिख पाना कम से कम मेरे लिए तो आसान नहीं लगता. उसके रक्तिम आभा में डूबते रंग किसी भी तरह से अपने पास बुलाते हैं..

उन बिजली के तारों पर बैठे गौरय्या के जोड़े को देख अपने कैमरे से खींच लेना उस किसी अतृप्त चेतस को उभार देती है जहाँ उस एकान्तिक क्षणों को फिर से जी लेने की कसक उठ हिलोरे खाने लगती है. उनका झुण्ड के झुण्ड में उड़ना बिना किसी सीमा को माने अपने भी डैनों को खोल लेने को कहते हैं..

घास पर बिछी बूंदों और उनमे झांकती किरणें किसी स्वाति नक्षत्र वाली बूंद का भ्रम देती है पर उसे छू भर लेने पर उसकी क्षणभंगुरता को भी तुरत प्रकट कर देती है. हाथ से छुई न भी जाये तो भी वह सुनहरी हीरे वाली बूंद उसी जगह अपने आखिरी पलों तक रहती है..

मौसम की उन ठंडी हवाओं का अपने चेहरे पर चलना इस कमरे में बंद पंखों की नकली हवा से कहीं ठंडक भरी स्पर्शना से छूती चली जाती है..पता नहीं इन्हें भौतिक अनुभवों की किस श्रेणी में सजाऊं या किसी और तरह की शब्दावली में ओढ़ाकर लिखूं..पर हर सुबह उजाला अपने रंगों को बारी-बारी बदल उन सारे चित्रों में कई-कई दफे रंग भरता है. उजियारे की अपनी श्रृंखला में किस क्षणिक अनुभूति को कैसे दूसरी तरफ लिख पहुचाऊं..पर वहां लेटे-लेटे उन इंटों के बीच कोनो से आती रौशनी में भूरा प्रकाश कैसे मिनट-दर-मिनट बदलना सपनीले सुनहरे रंग की तरफ चला चल आँखों को उसी तरह ढालता जाता है..

यहाँ इन चारों तरफ की इमारतों चारदीवारी में लेटने सोने की मज़बूरी कहें या किसी और चश्मे में फिटियाते देखने की कोशिश करें..पर यहाँ दूर तक देखें भी तो पहले सीढ़ी का जुगाड़ कर भी लिया तो पीछे आँखें रवीन्द्र रंगशाला की छतरियों तक ही जा पाती हैं..आँखें भले वन्दे मातरम रोड न देख पायें कानों को कभी कभार वहां से गुज़रती आवाजें ज़रूर सुनाई देती हैं..सूरज का आम के पेड़ से होते हुए पकडिया-सफेदे की ओट छिप जाना ही हमारे लिए दिल्ली का सूर्यास्त है. माउन्ट आबू का सनसेट पॉइंट यहाँ कहाँ बन पायेगा कह नहीं सकता पर बम्बई में अम्बानी का एंटीलिया ज़रूर ऐसा कुछ बन सकता है..

जारी..

फ़रवरी 09, 2012

तेरा इश्क है मेरी आरजू

इसे एक पुरुष की प्रेम कहानी के नुक्ते तले पढ़ें!!

दिमाग रुक सा गया है. कुछ समझ नहीं पा रहा कैसे कहाँ अपने को स्थित कर इस उलझन में धस गए गड्ढे से बाहर निकल सकूँ..कोई हाथ भी नहीं है जो इस तरफ बढ़े..ऐसा क्योंकर हुआ और मेरी भूमिका क्या रही, इन जैसे भारी भरकम सवालों से जूझना नहीं चाहता..ऐसा भी नहीं है जो कभी महसूस हुआ उसे कभी प्रकट नहीं किया, पर हाँ कभी उन्हें पता भी नहीं चल सका क्योंकि सामने सफ़ेद कागज़ होता था और नीली स्याही..उस जीवित हांड मांस के जीवित पिंड को कानो कान खबर भी नहीं पड़ती..

उन स्पंदनों को अकेले ही सुनता, किसी के साथ बांटा नहीं. कोई साझेदार नहीं. इसे इस समाज के अकेलेपन से लेकर उस एकांत की व्याख्याएं करने से पहले, मैं यह कह दूँ कि मेरे सामने हमेशा संकट उस अकथित सम्बन्ध की अपनी व्याप्ति में यह था कि मेरे कुछ कहने से ये मुलाकातें भी कहीं गायब न हो जाएं. लेकिन इस सबके बाद कभी ऐसा हुआ नहीं. 'हम दोनों' की बातों की कई-कई किश्तें लगातार चलती रहीं. फिल्मों ने कुछ इस तरफ से संस्कारित किया कि उसका नंबर जुटाने के लिए बहाने तो खूब बना लेता था, पर जब उधर से लायब्रेरी में उसने अपने जन्मदिन की बात कही, तो इधर से फोन की इतवारी छुट्टी मान चुपचाप बैठा रहा..अगली सुबह मेट्रो में देख भी लिया, पर पास जाने की हिम्मत नहीं पड़ी..हाँ अपनी फिलोसफी की किताबों पर कुछ-कुछ लिख कर उसे भेट ज़रूर कर गया था.

मुझे पता है आज यहाँ लिखने से कुछ बदलने नहीं जा रहा है. पर आज की ये छोटी छोटी बातें तब इतनी छोटी नहीं लगती थीं..पता नहीं मेरे जैसे प्रकार को क्या कहा जाता है..ऐसा नहीं है मैंने कोशिश नहीं की थी. उस आखिरी साल अपनी सारी ऊर्जाओं को समेट, सबकुछ कहने-बताने की तय्यारी में रातें  घड़ी की सुइयों को चक्कर लगाती देखती सुनती रहती थीं..सोचता भी किसी स्क्रिप्ट राईटर की तरह था के अगर उसे सीधे कहने में संकोच हो तो वो किसी निश्चित दिन किसी विशेष रंग का सलवार पहन कर आ जाये, मैं समझ जाऊंगा..चने के झाड ज़यादा ऊँचे नहीं होते इसलिए इतना भर ही देख पाया था..पर कुछ नहीं बोला..आखिरी दिन भी चला गया..डेढ़ साल बाद अपने को दुबारा जुटाया फोन मिलाया, उसके पिता का नंबर था. कभी दिया था उसने. घंटी तो बजी नहीं उलटे उधर से आवाज़ आई, 'दिस नंबर डज़ नॉट एग्जिस्ट..!!'

आज इस कहानी को डेढ़ साल पार किये तीन चार छेह महीने और बीत हो गए होंगे. नौ फरवरी आज उसकी पुण्यतिथि जैसा कुछ नहीं मना रहा हूँ..न ही कोई ऐसी बात कहने जा रहा हूँ कि एमए में पढने वाला कोई प्रेमी तत्काल अपने प्रेम से इस्तीफा दे दे..मेरे पचपन परसेंट नहीं बने तो क्या हुआ उसके ज़रूर हो जायेंगे, अब तो सेमेस्टर भी आ चुका है उसे कौन सा फिलासफी डिपार्टमेंट के चक्कर काटने हैं..न उन दोनों की अबोली आखिरी मुलाक़ात साहित्य अकादमी की लायब्रेरी से निकल मंडी हॉउस होते हुए तिलक ब्रिज से ईएमयू पकड़ने वाली है..

इतना हो जाने के बाद भी मेरे पास उसे बताने के लिए बहुत कुछ था पर उस रात की आखिरी मेट्रो आ चुकी थी.

फिर शुरू हुई अपनी क्लासें. बोलना यहाँ भी अनुपस्थित था पर कभी नहीं लगा की कुछ बोला जाना चाहिए. मेरी चलती डायरी में अपने बारे में लिखा पढ़ कर उस दुपहरी बस में तुमने पता नहीं मेरे बारे में क्या सोचा होगा..पर मैं तो अपनी सन पचास की कहानियों के नायक की भूमिकाओं को अपने पास देख पा रहा था. जब भी मैं तुम्हारी तरफ देखने की कोशिश करता तो लगता तुम्हारी आँखें पहले से ही मुझमें क्या पढ़ रही हैं. अभी उस सुबह बस स्टैंड पर सौ नंबर का इंतज़ार करते वे महाशय पूछ बैठे, के मैं दक्षिण भारत का तो रहने वाला नहीं..मैंने मना कर दिया..पर शायद तुम्हे नहीं कर पाया..

वो सुबह मुझे आज भी याद है जब हम दोनों रिक्शे पर बैठे थे, और अचानक मैंने कहा, मैं तुमसे वही कहना चाहता हूँ जो एक लड़का एक लड़की को कहना चाहता है. इस बोलने से पहले डर भी था एक दोस्त को खो देने का. मेरी समझ में इतनी कम एकान्तिक मुलाकातों के बावजूद मैं खुद उन अर्थों को नहीं ढोना चाहता था जिसका बोझ मुझे उठाना पड़ा. पता नहीं कैसा भावातिरेक था जिसने तुम्हे अपने लिखे को न फाड़ने को कहा था शायद कभी आगे जब हम दोनों साथ होते तब अपने को उनमे खोजता. उन्ही दिनों सोचा करता था जब मेट्रो फरीदाबाद तक हो जाएगी तुम्हारे साथ वहां तक जाया करूँगा. अभी तक नहीं पहुच पायी है.

एक रात खतरनाक किस्म का सपना देखा जिसे इससे पहले कभी नहीं लिखा था, पर सोचता था की ये सच हो जाये..उसमे वह सड़क किनारे रेड लाइट पर रूकती गाड़ियों के आगे-पीछे भागती रही थी. एक दिन मुझे दिखी और अधकचरे कपड़ों के साथ लेकर घर ले आया. माता पिता को सिर्फ इतना पता चल पाया के कॉलेज में साथ पढ़ते थे..उसके जीबी रोड से भाग लेने वाली बात दबा गया..

{यह पोस्ट जनसत्ता में चौदह फरवरी को आई..'कैसे कहें ', इसे यहाँ पढ़ें. }

फ़रवरी 07, 2012

जहाँ के हम मेहमान होंगे..

इतने दिनों की भागदौड़ रतजगों के बाद अबकी बारी है फिर से किसी नए रोजाना को तलाशने की. बिना उसके बेतरतीब आगे बढ़ा नहीं जा रहा. देह इतनी थकी-थकी बुझी-बुझी सी है कि उसकी प्रतिक्रिया अब अपने सोने के समय दखल दे रही है.

भूख सुबह की पाली में लगातार चावल को देख वैसी नहीं रहा गयी जैसा उसे रहना चाहिए था. दोपहर यहाँ इस कमरे से बाहर निकल कर नेगी जी की कैंटीन में इमली मिला सांबर और दो छोटी-छोटी इडली हो या बड़ा खाकर पेट के किसी कोने में भूख दबी अगले घंटों में किसी नयी चीज़ का इंतज़ार कर रही होती हैं. पर लेदे कर वही ढाक के तीन पात. चांदनी चौक दरीबे की कचौड़ी खाए जमाना हो गया. यहाँ वापस या तो दाल चावल होगा या खिचड़ी का कोई वर्ज़न. अगर यह भी नही हो पाया तो वापसी होते होते फोन घरघराने लगता है और दूसरी तरफ से लौटते हुए गोल मार्केट वैष्णो ढ़ाबे से दाल मखनी पीली दाल या कढ़ी और बैगन भरता लेकर साथ आने की सूचनात्मक आवाज़.

इस एक जैसी भोजनवली में हर इतवार सुबह सायकिल पर निकल आया पहाड़गंज ओम डेरी. आधा पनीर आधा दही बोलते एक सौ बीस रूपये देता वापसी छेह रुपये मिलते. पर पता नही उसका स्वाद भी उसी रोजाने की तरह बे स्वाद होता जा रहा है..घर की अपनी संरचना में रसोई में सबसे ज़यादा वक़्त बिताता है पर उस तरफ से कहीं न कहीं उसमें वरीयता सिर्फ पेट भर लेने की रह गयी है..

ऐसा नहीं है कि सिर्फ मैं ये सब सोच रह हूँ कभी न कभी हम सबके दिमाग के किसी कोने में ये ख्याल अपना दखल दे ही देता है और हम भूख का कुछ हिस्सा उस खाने से गायब स्वाद के लिए बचा कर पेट के किसी कोने में दबा कर रख लिया करते हैं..इस स्वाद पर एक पूरी अर्थवयवस्था टिकी है जो हर जगह एक सा खाना देने के लिए अपनी प्रतिबधता के एवज़ में हमारी जेब हल्की करती रहती है..कभी हम सब जन्मदिन का बहाना लेकर सरवन निकल पड़ते हैं, भाई कलेवा से कुछ साथ लेते आता है..माँ सब्जीमंडी वाले हलवाई से बड़े-बड़े समोसे लाने के लिए फोन कर पिता को याद भी दिलाती हैं की भूले नहीं..

भूख और उसमे भी स्वाद का अपना समाजशास्त्र है बाबा खड़क सिंह मार्ग हनुमान मंदिर के सामने पंगत में इंतज़ार करते लोग 'प्रसाद' के इंतज़ार में पतराते जाते हैं तो उधर सरवन या होटल अल्का में पूरा कुनबा अपने वांछित आर्डर का वेट कर रहा होता हो..हमारे घर की गतिकी में हम दूसरे वाले छोर पे पाए जाते हैं जहाँ चुनने में हमारा अधिकार चलता है पर वहीँ तक जहाँ हम डीलक्स थाली बंगला फूड्स में खाएं या पैक करा कर घर ले आयें. रोटी मैदे वाली नहीं आटे वाली, मिक्स वेज के बजाये शाही पनीर..

पर सुबह की पाली में पिता की रसोई में आवाजाही हो या माँ ने कुछ बनाया हो, उस खाद्य पदार्थ में जीभ दाँतों का और दांत जीभ का साथ कब देना रोक देते हैं इधर समझ नहीं पा रहा हूँ..मां के पैरों का दर्द न खड़े हो जाने की वजह से वहां औपचारिकता सी हो चुकी है कि कुछ तो खिला दिया जाये. साथ टिफिन में ऐसा कुछ हो जो प्रयोगों के स्तर पर नया दिखता हो. पर हमारी वाली जीभ पता नही क्यों साथ नही देती..पिता भी चुना मंडी सीताराम के छोले भठूरे लाने खाने के बाद चाय के लिए बोलते हैं तो साथ यह भी की तेलहा चीजें जयादा नही खानी चाहिए. छोटा भाई मन मारे पैडल मारता ले तो आता है पर अन्दर ही अन्दर कसमसाता रहता है.

अभी परसों दिल्ली से बाहर जा रहे हैं. देखते हैं इस स्थिति में कहाँ तक बदलाव आता है. वो सब माने या न माने, पर हम तो अपने को मेहमान मान कर चल चल रहे हैं. अब कोई दिल्ली से आये और सुबह नाश्ते से लेकर रात के खाने तक कुछ नया न हो तो बात बनेगी नही..कुछ तो ऐसा हो जो यहाँ की उत्तर आधुनिक रसोई की परिधि से बाहर हो.. 

(यह पोस्ट लिखी गयी है उस क्लास में जहाँ साढ़े नौ बजे के बजाये दस बजे पहुंचे ..याद है आलोक..!!) 

फ़रवरी 05, 2012

मेरे हिस्से का सच

इस कहानी के सभी पात्र एवं घटनाएँ काल्पनिक हैं. उनका किसी घटना, नाम,स्थान या जीवित-मृत व्यक्ति से मिलना मात्र एक संयोग भर होगा.

कभी कभी लगता है लिखना उन सारे हारे हुए मोर्चों से बच निकलने की एक जद्दोजेहद है, जहाँ हर बार उन सारी घटनाओं में कुछ न कर पाने की बेबसी है. किसी कोने में दुबका हुआ अपना चेहरा साफ़ नहीं दिख पड़ता.

कल. शनिवार. फरवरी चार. करीब तीन बजे के बाद हमारी फिल्म शुरू हुई. ख़तम हुई होगी आध घंटे बाद. इसके बाद क्या लिखूं..तालियाँ खूब बजीं, हमारे सहपाठी कुछ ज़यादा नहीं बोल पाए. प्रोजेक्टर से सामने पर्दे पर पड़ती छवियों ने इतना वक़्त ही नहीं दिया कि वे पिछला गुजरता कुछ भी याद रख पायें. दृश्य इतनी तेज़ी से चल रहे थे की खुद भी यही लग रहा था वहां सोचने के लिए ठहराव जैसा कुछ था ही नहीं.

तुमने कहा हम हिप्पोक्रेट नहीं हैं जो सवाल पूछते हैं उन सबको हमने अपने यहाँ जगह दी. उन मैम को भी पिछली फिल्मों के मुकाबले यह जयादा पसंद आई. वे उनकी तरह नहीं जो आँखों में देख कुछ कूट में समझाते-बुझाते हैं..पता नहीं ये लिखा गर्वोक्ति है या कुछ और..

पर इतना ज़रूर मालुम है, के उस दुपहरी अगर तुम नहीं आती तो हमारी फिल्म वहां ख़तम नहीं होती, जहाँ हुई. फ़ौजा सिंह के साथ स्लमडॉग मिलेनियर का थीमैटिक बैकग्राउंड स्कोर. फिर हम सबके उस पूरी प्रक्रिया में मौजूद विडियो वाला आईडिया मूर्त रूप में आता  है. और पता नहीं क्यों बार-बार उस दिन की तरफ मुड़ जाता हूँ जब उसे दोषी ठहरा कर हमने वहां से जाने को मजबूर कर दिया था..ऐसा कम ही बार देखा जब इन जैसे पितृसत्तात्मक झगड़ों में कोई स्त्री/लड़की अपनी बात मजबूती से रखे. वो दुपहर कुछ-कुछ ऐसी ही थी..

और महाशय तुम जो कह रहे हो के उस दिन तकनीकी दक्षता नहीं बल्कि उसको धारण करने की क्षमता समूह में आपकी हैसियत तय कर रही थी, सही नहीं है और न ही ऐसा कुछ था कि हम कद्र सोच की नहीं बल्कि पूँजी की कर रहे थे; सो बेचारे सोचक के लिए वहाँ कोई स्थान ही नहीं रह गया था. ये ठीक है कि यह स्थिति लगातार कुछ दिनों से बनी थी जहाँ तुम किल्लाठोक बार-बार अपने को अनुपयोगी साबित करने में व्यस्त लग रहे थे. ऐसा बिलकुल नहीं था कि उसमें किसी पूंजी ने श्रम विभाजन किया था. उस विभेदन में हम सब अपनी भूमिकाओं को ढूंढने की कोशिश कर रहे थे. उस दिन जीत पूंजी की नहीं हमारी हार हुई थी..पता नहीं क्यों ये सारा स्पष्टीकरण एकालाप की तरह लग रहा है..

तबसे अपने आपको देखने की कोशिश कर रहा हूँ. उसी दिन यह तर्क भी जुटा लिया था कि दोनों तरफ अपने विस्तार को बनाये रखने की मज़बूरी जैसी किसी मनोदशा में मुझे तुम्हे यह बोलना पड़ा के थोड़ी बाधा तो हो रही है जबकि कुछ देर पहले तक मैम के साइन करवाने के लिए उस कागज़ को हाथ में लिए तुम्हारा दिमाग खा रहा था. हम सबकी बराबर की हिस्सेदारी थी फिर एक तुमने ही उस स्थिति को क्यों भुगता..बहुमत शायद इसी रूप में विधवंसक होता है..!! इस सबके पीछे अपनी कमजोरी को खड़ा पाता हूँ जिसने बोलने से पहले कुछ सोच पाने से मना कर दिया था और कमज़ोर पक्ष लिया..शायद पूरे समूह को एक साथ लेकर चलने चलाने की कोशिश में कहीं पिछड़ गया..उनके इतना हायपर हो जाना समझ से परे था..पर अब सब यहाँ लाकर..पता नहीं क्या..

जबकि उस समूह में सहभागिता के स्तर पर वो गुणात्मक अनुपात में कहीं पीछे था. पर फिर भी उसको कुछ नहीं बोला गया. कभी जीपीओ की समय तालिका मिलाते, कभी दूसरी पाली में आने की बात कहते. वाद्ययंत्र से निकलती ध्वनियाँ कुछ ज़यादा ही सुनाई देती हैं..हम अपनी तकनीकी दक्षता छिपाते रहे और इन पुरोधा ने घालमेल की दुहाई दे मारी..

वापस कल पर और तुम पर आऊं तो वहां सबके सामने उसके बारे में मेरा कहा कुछ ठीक नहीं लगा. थोडा एहसास उस वक़्त अगली फिल्म देखता अपने ही अन्दर उमड़ता घुमड़ता रहा..पता नहीं मेरे अपने मूल्य मेरे अन्दर टकरा रहे हैं, चक्कर काट रहे हैं. कुछ भी सीधा सपाट दिख भी नहीं पा रहा..

एक बात और भी समझ नहीं आई की उनके लिए 'हम' से ज़यादा ज़रूरी उनका 'मैं' है. 'मैंने' किया बोलते वक़्त लगता था कि मानो हमारी भूमिकाएं नगण्य थीं. पूरा समूह एक तरफ वे दूसरी तरफ. वो तो तुमने मेरे इतने विडियो देखने वाली बात उठा दी वर्ना वह भी दायें बाएं हो जाती..पर वापस कुर्सी पर धस कर लगा कुछ रह गया जो बोला जाना था. उस लास्ट मोमेंट एडिटिंग में तुम्हारी भूमिका..शायद यही वाली बात थी जो तुम्हे लगी होगी..तुमने नहीं भी कहा पर तुम्हारी सकुचाती आवाज़ और देहभाषा ने तो मुझ तक ऐसा कुछ पहुँचाया..

इन सारे सवालों जिरहों के बीच मैं खुद को कहीं एक जगह स्थित नहीं कर पा रहा. मुझसे सुलझे हुए तो तुम हो जो उस दिन के बाद भी हम सबसे उसी तरह मिल रहे हो..क्या तुम्हे अन्दर से नहीं लगा होगा जब मैंने तुम्हारे मज़ाक को कटघरे में खड़े होकर दूसरी तरफ से गवाही दी..तुम अगले दिन कुछ कह भी रही थी थी. तुमने रोक दिया था कि मुझे उस मामले में कुछ न कहे..

इन सब न ख़त्म होने वाले सवालों की फेहरिस्त को यही छोड़ते हैं..मेरे भी समझ में कुछ ज़यादा नहीं आया..

पर जब कोई अपनी माँ से कहे कि अच्छा हुआ के वह लड़का नहीं है वरना रोज़ पिट-पिटा कर लड़ झगड़ कर आती..!! तब इस वाली बात को समझने में किसी की क्लास कोई मदद नहीं करतीं. पीटर बर्जर-थामस लक्मैन का प्राथमिक समाजीकरण भी पानी मांगने लगता है. इससे जूझना अपने अन्दर की गहराई में जाने से ज़यादा उस स्थिति को समझने की कोशिश होनी चाहिए जब कोई अपनी माँ से ऐसी बात कह उस पुरुषसत्तात्मक समाज के सारे रक्त रंजित इतिहास को पल में निरर्थक साबित कर बौना बना दे. उसका यह कहना किसी बिना हथियारों उन पर जीवित देशों से अलग किसी ऐसे क्षण ऐसी दुनिया की तरफ प्रस्थान है जहाँ इस हिंसात्मक समाज से पलायन कर जाना पड़े तो तुरत इस सामजिक गतिकी से भाग लूँगा..

ये मेरे हिस्से का यूटोपिया है, इसे मेरे पास रहने दो..!!

(इस कथ्य के सारे 'तुम' मेरे इर्दगिर्द इतने निकट हैं कि उन्हें सबके सामने लाना मेरे लिए ज़रा मुश्किल है..इसलिए जिन्हें इसका उदगम नहीं पता,  वे कृपया अपने मस्तिष्क को आराम करने दें.)

आवाज़ें..

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