मार्च 29, 2012

पहला संवाद

आज करीब साल भर पहले लिखी एक कविता हाथ लगी..बस उसी को साझा कर रहा हूँ..!!

03:12PM  05.04.2011

कभी बहुत देर तक चुप, अपने में ढूंढ़ता हूँ
नहीं मिलता मुझे वो
जिससे पुकारूं तुम्हे.
फिर छोड़ देता हूँ सोचना
और बैठा अकेले ही तुम्हे तुम्हारे पास चला आता हूँ
बिना कुछ बोले.

तुम झिकती नही, मेरी तरह
बस बैठी रहती हो
इस इंतज़ार में,
के
मैं कुछ तो कहूँगा.
पर नही,   हमेशा की तरह, आज भी
हम दोनों बैठे एक दूसरे को देखते
कुछ असहज से होते रहते हैं. 

थोड़ी देर बाद तुम अपनी कलाई पर देखोगी
फिर आसमान की तरफ,
और तुम बिन बोले उठोगी
मैं भी, अनमना-सा हो उठुंगा.

आगे क्या हुआ..??
क्या हम साथ साथ कुछ देर अबोले चलते रहे
या
तुमने पीछे मुड़ के देखते हुए हाथ उठाया हिलाया
जिसे कोई नही देख सका
शायद मैं भी नही

और यही था
हमारे बीच पहला संवाद..!!

मार्च 17, 2012

दाढ़ी विमर्श उर्फ़ प्रतिरोध का एक और अध्याय

दाढ़ी. ये दिखने में भले 'दा' और 'ढ़ी' है, पर इसे विखंडित करने पर एक भरा पूरा समाज खड़ा दिखेगा. उसकी संरचना में आप कहाँ से देखे जा रहे हैं इसका पता नाम से पहले आपके चहरे पर मौजूद या न मौजूद दाढ़ी बड़े आराम से दूसरे को पढने के मौके देगी. यह संस्कृति का एक ऐसा कूटपद है जिसे बारे में बस में चढ़ते सड़क पर चलते दुकानदार से मोलभाव करते किसी से बात करते हमें सोचना नहीं पड़ता..

इसकी व्याप्ति कुछ इस तरह की है के अगर दरियागंज से गुज़रते बस ड्राइवर की झड़प किसी मुसाफिर से हो भी जाती है और नौबत गाली गलौच तक सिमट सुलट कर नहीं रह पाती तो भले ड्राइवर कितनी हूल पट्टी दे, उसे डराने की कोशिश करे, पर उसे मालुम है कि उस आदमी के कूचा साद-उल-लाह खान से वापस लौटने से पहले बस मोहल्ला कब्रिस्तान तुर्कमान गेट के पार हो जाये तो ही भला. और यही सोच गाड़ी एक ही गियर में बड़ी मस्जिद छत्तालाल दिल्ली गेट पहुँच जाती है..

मतलब यह भी है कि दाढ़ी और मूंछ दोनों को अलग-अलग पहचानें मान लिया गया. मुहावरे गढ़ लिए गए.
मूंछ का सवाल बहुत बड़ा शुरू से ही था और आज भी इसकी जिम्मेदारी का एक हिस्सा स्त्री के पास सुरक्षित है. दाढ़ी होती भी है तो चोरों के. उनकी दाढ़ी में फंसा तिनका कई-कई बार उन्हें तेनालीराम जैसे विद्वानों से होते हुए जेल तक पहुंचा देता है. मूंछ का बाल कोई छूने भी नहीं देता.  उस पर बल भी पड़े पर परधान जी की लंबी-घनी मूंछों पर ताव देते ही फिजा बदल जाती है. पर ऐसा क्योंकर हुआ की सभी ईश्वर और देवता बिना मूंछ के हुए, सिवाय ब्रह्मा के.

वहीँ दाढ़ी के मुहावरों के साथ ऐसा दंभ न मिलने के पीछे भाषा की निर्माण प्रक्रिया भी दिख पड़ती है, जिसे इतना निर्दोष मान छोड़ा नहीं जा सकता. औरतें दाढ़ीजार ही कहेंगी, मूंछजार नहीं. मौका लगते नोची दाढ़ी ही जाती है. और यह पेट में भी पाई जाती है. फिर सवाल ये भी है कि चोर लड़की नहीं हो सकती क्या और अगर सारे चोर पुरुष ही हैं तो अब तक उन्होंने दाढ़ी रक्खी ही क्यों हैं..मतलब बात कहीं और ही है. इस तरफ झाँकने पर यह दिखता है कि क्यों एक धरम में मूछें हैं और दूसरे में सिर्फ दाढ़ी इतनी महत्वपूर्ण भूमिकाओं में हैं.

आलोक की मूंछें  उसकी माँ के दिल्ली आने से पहले उसके चहरे पर आ जाती हैं. ऐसे ही मुकेश ने फर्स्ट इयर के बाद अपनी मूंछें नाई के हवाले कर दीं. पहले पहल गोरखपुर जाने से पहले थोड़ी बहुत उगा लेता पर इधर वो भी नहीं. इन मूंछों के पुरुसत्तात्मक पाठों में उसका बेटा मूंछ तब तक साफ़ नहीं करवाता जब तक की वह जीवित है. यह मूंछों का नागर संस्करण है. और ये वही पल है जब दोनों ने इस शहर में फिट होने के लिए अपनी मूछों को त्याग दिया. शहर इतने आक्रामक तरीके से समरूपों को तय्यार करता है, जहाँ आप आप नहीं रह पाते वो हो जाते हैं. भले हम रुचियों की निर्मिती में इसकी उपस्थिति नज़रंदाज़ कर दें, पर इसकी उत्पादन प्रणाली में माल तभी बिकेगा जब हमारा सौन्दर्यशास्त्र उन्ही मानकों के अनुरूप ढल हमारी आदत बन जायेगा.यहाँ सौन्दर्य की परिभाषा में बाल कहीं नहीं अटते.

यह ऐसे ही नहीं हुआ है की शीला' बनी कटरीना अपनी देह को स्त्री संपत्ति घोषित करती हैं. पोशाकों के विशेष संस्करण तभी कोई खरीद पहन सकता है जब उसकी देह पर बाल न हों. यहाँ सिर्फ काखों से बाल  ही गायब नहीं हैं वहां पसीना भी नहीं है और बदबू का तो सवाल ही नहीं. मिनी स्कर्ट पहनने से पहले, शर्ट के ऊपर वाले बटन खोलने से पहले वैक्सिंग करवा हफ्ते दो हफ्ते तक निश्चिन्त हुआ जा सकता है..वो खुला है न यूनिसेक्स सलून कमला नगर में..कितना सस्ता भी तो है..

दूसरे छोर पर इसका दमनकारी-हिंसक रूप भी है, जहाँ वे सब नहीं अटेंगे जो इनके जैसे नहीं होजाना चाहते, जो प्रतिरोध कर रहे हैं, जो इनकी नवसाम्राज्यवादी नीतियों के खिलाफ हैं. यह ऐसे ही नही है कि पूरी दुनिया लड़ाई का अघोषित मैदान नज़र आती है. उसके कुछ मैदान गोधरा जितने छोटे हैं तो कुछ इराक अफगानिस्तान जितने बड़े भी. यह वही समय है जब अमेरिकी सेना ऐबटाबाद में अपने गुप्त ऑपरेशन को जेरिनिमो नाम देती है. मकबूल फ़िदा हुसैन बे-वतन होकर सुपुर्दे ख़ाक हुए. तसलीमा की दाढ़ी भले न हो उनके विचारों ने उन्हें ऐसा बना दिया है. शर्मीला इरोम ऐसा ही एक और नाम है. ज़फर पनाही  ईरान जेल में बंद प्रतिबन्ध झेल रहे हैं. आंग सांग सू की अभी पीछे बाहर आई हैं..कोटेश्वर राव किशनजी मारे जा चुके हैं..

{यह पोस्ट आज सोमवार दो अप्रैल को जनसत्ता में आई है. पढ़ने के लिए यहाँ चटकाएं .
और ऊपर पोस्ट में यदा-कदा कई लिंक इधर और जोड़ दिए गए हैं. उन्हें मन करे तो देख सकते हैं, उनका रंग अलग है }

मार्च 03, 2012

शहर के शहर बने रहने की स्त्री व्याख्या

आठ मार्च ये सुबह चूल्हों के आगे आँख फोडती, धुंए में खांसती औरतों के लिए भी उस जाती हुई ठण्ड में जल्दी जाग मैदान निपटने की जद्दोजेहद से शुरू होगी. भले कच्ची-पक्की दीवारों पर लिखा हो, 'मेरी शादी हो उस घर में शौचालय हो जिस घर में .' पर उससे फ़रक क्या पड़ने वाला है..लिखा है लिखा रहने दो..जहाँ लड़की वालों के लिए लड़के वालों के परिवार से जुड़ना ही इतना महत्त्वपूर्ण हो कि शादी दोनों भाईओं में से किसी के भी साथ हो उन्हें कोई समस्या नहीं, वहां आप क्या ये उम्मीद करेंगे के, लड़की दीवारे पढ़-पढ़ अपने ससुराल को चुन सकती है..वो कहेगी भी तो कोई नहीं सुनेगा..

पर ऐसा भी नहीं है कि समाज रुका रहेगा..उसमे गतिशीलता तब आएगी जब शादी के बाद उस लड़की को अपने नए नवेले दुल्हे के साथ अहमदाबाद पंजाब दिल्ली आना होगा. यह आना भले पुरुष के प्रयोजनवादी तर्क से उपजा हो और उसे बतौर घर की पहरेदारी और चूल्हा चौका संभालने के लिए वहाँ साथ चलने को कहा गया है पर स्त्री पक्ष भी जल्दी से जल्दी इन प्रवासी कमाऊ पहुना[1] के साथ अपनी बेटी बिदा कर देना चाहता है..कि कहीं पुरुष के पैर न बिचला[2] जाएँ..इसकी 'घर के खाने' से लेकर 'घर की बीवी' तक आर्थिक-सामजिक-यौनिक व्याख्याएं हैं.

शुरू-शुरू में पुरानी दिल्ली से खाचाखच भरी 729-425-347 में उसका जी मचलेगा और सिर खिड़की के बाहर निकल उलटी करने लगेगा..खानपुर के उस एक कमरे की चहारदिवारी में दम घुटने को ही होगा कि मकान मालकिन नयी बहु को अपने फहलारे[3] घर में बुला लेगी. बैठेगी बतियेगी. कुछ घर की कुछ सहर की कुछ उसके गुस्सैल पति की कुछ अपने बच्चों की. उसे वो सारे आश्वासन देगी जो कभी उसके ऐसे ही दिल्ली आने पर उसकी सास ने उसे दिए होंगे..खुली खिड़की खुली छत खुला मैदान उसे यहाँ नहीं मिलेगा.

पूरा दिन घर की उदास दुपहरियां लेते लेते मायके की याद में कब तक काटे. महीने दो महीने बाद आसपास किसी दिद्दा किसी भाभी किसी अम्मा के साथ अपने हिस्से के सुख दुःख हाथ की महंदी, पैर के महावर के बाद सब्जी के दाम से शुरू होकर पानी की किचकिच में अपनी कोट्हिन माता वाले कुँए की याद बदस्तूर आने लगेगी. मरद ऐसा नहीं है की नहीं समझता है. कभी-कभी ऐसे दिन भी आते हैं जब किसी अपने जैसे सिलेमाहाल दोनों फिलिम देखने जाते है जहाँ इंटरवल में पचीस रूपये का मक्का खरीदने को वह बेवकूफी करार देती है. लालकिला- क़ुतुब मीनार उन पहली जगहों में से होती है जहाँ पड़ोस की भाभी जाने को तो कहती हैं पर अंतिम समय पर कोई बहाना बना मना कर देती हैं.

उसका मरद चार छेह साल यहाँ रहकर ढल चुका है. उसकी आदत में मच्छरदानी लगाकर सोना ही नहीं कभी शनिवार इतवार चढ़ा लेने की आदत भी जुड़ गयी है. जिनसे उसने कर्जे ले रखे हैं जिन्हें दे रखे हैं या कमेटियां डाल रक्खी हैं वही उसके साथ पीने वालों में हैं..कभी पड़ोस से कोई कटोरी चल कर आएगी और अपने नखरैल बच्चे के लिए अरहर की दाल लिए वापस लौटेगी. पर कुछ दिन पति के समझाने के बाद महंगाई के चलते ये सिलसिला बंद..पर शराब शायद अर्थशास्त्र से संचालित नहीं होती, इसलिए जामों के टकराने दौर वैसे ही चलते रहेंगे..

होने वाला बच्चा दिल्ली के किसी सरकारी हस्पताल में इसलिए होता है क्योकि छुट्टी नहीं मिली और यहाँ अपना हर्जा कर कौन उन्हें घर छोड़ने जाये इसी उलझन में बात टलती रही और उस रात मकान मालकिन के बेटे की गाडी न होती तो कितनी समस्या हो जाती..बच्चे बड़े होते हैं नीचे गली के बच्चों के साथ. कभी कंचे कभी किरकेट. वो इस्कूल की दिवार में लगे कम्पूटर भी थोड़ा बहुत सीख गए हैं. सात साल के होते-होते वो गली से पहली क्लास में पहुँचते हैं. बिलकुल नयी दुनिया है. और उस गतिशीलता में एक और पीढ़ी उन्ही वर्गीकरणों में अपनी भूमिकाएँ तलाशने के लिए तय्यार होने लगती है.

मतलब एक स्त्री के अपने मयके से निकल शहर आने की परिघटना उन सारी क्रियाओं प्रक्रियाओं को अपने में समेटे हुए है जो शहर को शहर बनाये रखती है. उन ढांचों में उसका आना परिवर्तन तो है पर कालान्तर में वह उसी को मजबूत करती है. इस स्त्री का कोई एक नाम नहीं है न ही कोई एक चहरा. बस यह है. हमारे आस पास. यह किसी अखबार में नहीं है, कोई चैनल वाला अपनी फुटेज इन पर बर्बाद नहीं करेगा. उनके पास तो ग्लॉसी पेपर पर क्रीम पौडर से लिपी पुती देहें हैं. लक्ष्मी बाई से लेकर सरोजनी नायडू, कल्पना चावला, प्रियंका वाड्रा नहीं गाँधी..यह समाज चल इन्ही के शोषण पर रहा है उन मेट्रोपोलिटिन भाषी जुबानों से नहीं, जो बच्चे भी गोद लेती हैं..

***
[1] पहुना : हमारी तरफ अवध के ससुरालों में उत्तर भारत के दामाद जमाई के लिए इस्तेमाल होने वाला पद. शायद कभी ब्रज की सूरदास की गोपियाँ भी इस्तेमाल करती हैं. माँ के मुख से कई-कई बार ये भी सुना है, 'आज बदरी काल बदरी, आवा पहुनवा मार मुंगरी'. छेड़छाड़ के प्रकरणों का एक अध्याय ये भी है. [2] बिचलाना : बारिश के बाद मिट्टी वाली ज़मीन इतनी चिकनी हो जाती है जिसपर कोई भी फिसल सकता है. इसी सन्दर्भ में. [3]फहलारे : मतलब खुली जगह. इसके विपरीत 'सकित' का इस्तेमाल होता है उन जगहों के लिए जहाँ वैसी ही घुटन है जैसी ऊपर महसूस हो रही है.

शहरनामे में:
ये जो शहर है लखनऊ | हज़रतगंज के बहाने दस का नोट और नन्हे हाथ | उन सबके नाम जिन्होंने ये शहर बनाया | लगभग तीन साल बाद: शहर के शहर बने रहने की पुरुष व्याख्या |

आवाज़ें..

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