अप्रैल 26, 2012

हज़रतगंज के बहाने दस का नोट और नन्हे हाथ

उस दुपहरी विनय खंड से टेंपो कर बीसेक मिनट में हज़रतगंज पहुच गया था. घड़ी डेढ़ पौने दो के बीच थी और मेरे पास उस इतवार वक़्त इफरात में था ही. साहू में घोस्ट राईडर लगी थी पर शुरू होने में काफी देर थी. बैठ गया वहीँ सड़क पार एक बेंच पर और शुरू हो गयी इंतज़ार को काटने की तरकीबें.

जहाँ मैं बैठा था पूरे गंज का सबसे भरा पूरा रहने वाला इलाका था क्योंकि  पास सिनेमा हॉल तो था ही, साथ थी खाने वाली चाट की दूकान. थोडा सा नवाबी अंदाज़े बयां करता नवाब'स . मतलब वहां उपभोक्ताओं की लगातार आमद थी. उनमे बच्चों से लेकर उन बुढ़ाती देहों पर एंटी-एजिंग क्रीम मठारे चहरे. दमकती-चमकती खालों के साथ स्कूटी पर आती-जाती लडकियां..उन्हें देखती आँखें, अजीब- गरीब स्टाइल में चलते-फिरते, बालों को ज़ेल से सेट कर फिरते लड़के. कुछ मिश्रित युगल भी आस-पास बैठे अपने भविष्य योजनाओं पर काम कर रहे थे और उनकी अर्जियां ऊपर तक पहुंचाने के एवज़ में अपना हिस्सा मांगते छोटे-नन्हे, बड़ों के कठोर हाथ..

दुर्खाइम यहाँ आ कर चुकते से लगते हैं जब शहर और उसमे भी प्रत्यक्ष बाज़ार जैसी जटिल औद्योगिक व्यवस्था में श्रम का विभाजन हो रहा था तब ये खुद को उन औजारों से क्यों संपन्न नहीं कर सके. शायद इन्होने यहाँ आने में देर कर दी. या इसे ऐसे भी कहा जा सकता है की उनके पास अपने श्रम को बेचने के बाद इतना आधिक्य नहीं बचता के सामजिक गतिशीलता में अपने को संलगन कर सकें और विकल्पहीनता वश पीढ़ी-दर-पीढ़ी एक ही तरह के कौशलों का हस्तांतरण भर किया और जब उनकी व्यवस्था अपदस्थ हो गयी तब इनके कौशल और श्रम का किसी ने कोई मूल्य नहीं लगाया. 

साफ़ दिखाई दे रहा है कि खेतिहर समाज की आजीविका के स्रोत एक-एक कर उस नयी आई प्रणाली ने निगल लिए जो नव साम्राज्यवादी पाठों की तरफ जाते हैं जहाँ बड़ी-बड़ी कंपनियों के मुनाफे बटोरते यमुना एक्सप्रेस वे  तो बने, उन मुनाफाखोर पेट्रोलियम कंपनियों को मुंहमांगे दाम पर बेचने की लौटरी हाथ में दे दी गयी. पर इनका स्थान सिमटता गया. सोचने लगा यहाँ से पहले जहाँ ये लोग रहते थे वहां अब सब क्या काम करते होंगे. उनके काम का मूल्य क्या होगा..क्या उसका इतना अवमूल्यन हो गया होगा कि उन सबको इसकी कीमत वहां से विस्थापित होकर चुकानी पड़ी होगी..और खेती जो कभी भी लाभ का सौदा नहीं रही उसे भी छोड़ कर पूरा कुनबा शहर चला आता है. यहाँ उन कौशलों का कोई मौद्रिक मूल्य नहीं जो उनके श्रम को रातोंरात पूंजी में बदल सकने की क्षमता आ जाये.

जब समाज का विभेदीकरण किया जा रहा था, तब वहां खेलती सबसे छोटी लड़की सबसे पहले भाग कर अपने जिम्मे का काम ले आई और नवाब'स और रॉयल कैफे का इलाका अपने परिवार के सुपुर्द कर दिया..वहीँ पास के बेंच पर संभ्रांत परिवार की दो लडकियां-जो देखने में बहनें लग रही थीं-बैठी पता नहीं क्या बातें कर रहीं थीं. बस मैं उन्हें देखे जा रहा था बारी-बारी. और थोड़ी देर में इतना अंदाज़ भर तो लगा कि उनकी बात का मजमून वहां छोटे-छोटे बच्चों का उन्ही वर्गीय संरचनाओं में खेलना तो बिलकुल नहीं था. उनकी इतनी छोटी सी ज़िन्दगी में खिलौनों की जो भी परिभाषा हो, वे उसे अपदस्थ कर अपने नए सौंदर्यशास्त्र को विकसित कर रहे थे. वहां लगी जंजीरों से ऊपर नीचे होते रहना और उन्ही के बीच से छोटी की चुटिया खींच कर भाग जाना और उस पकड़म पकड़ाई में उससे भी वैसे ही जंजीरों से निकल कर पकड़ने को कहना.

वहीँ पास रिक्शेवाले भी खड़े थे और बराबर उन गाड़ी से बाहर निकलने वाली देहों को सिर्फ दस रुपयें में सहारागंज, कैसर बाग़ के चौक तक ले जाने की पुकार लगा रहे थे. पता नहीं वे इतने आशावादी कैसे हो गए थे और पौने घंटे जब तक मैं उन्हें देखता रहा कोई कतरा सवारी भी उनकी तरफ नहीं बढ़ी. हाँ उस छोटी लड़की को मेरे पीछे बैठे एक जोड़े ने दस को नोट ज़रूर दिया. वो लेकर वह अपनी माँ को देती उससे पहले भाई ने उसके हाथ से ले लिया और ये भी ये भी बताया की उनने इसे ये नोट दी है. बस इतना पता चलना था के माँ भी अपनी दुआओं को वहां समेटती हुई फाट पड़ी.

इस व्यवस्था में आप दूसरे की जेब से पैसे तभी निकलवा सकते हैं जब आपकी उमर ही मासूम नहीं आप मासूम लिंग की भी हों. मतलब इस परिदृश्य में जहाँ कन्या भ्रूण हत्याएं करवाई जा रही हों वहां एक लड़की अगर अपने अस्तित्व के लिए आपसे कुछ मांग रही है तो दिया जा सकता है. पर उसके लिए आपका समाजीकरण अभी प्रारंभिक स्तर पर होना चाहिए जहाँ देह को भी इस व्यवस्था में पूंजी का माध्यम बना बना दिया है, इसका ज्ञान नही होना चाहिए..

[जारी..]

पीछे की ज़रूरी कड़ियाँ:
ये जो शहर है लखनऊशहर के शहर बने रहने की स्त्री व्याख्याउन सबके नाम जिन्होंने ये शहर बनाया|

अप्रैल 25, 2012

दिल ढूंढ़ता है फिर वही फुर्सत के रात दिन

बात करने के लिए ढूंढे कोई नहीं मिलता. फोन किसे करूँ. राकेश ने कभी दस के बाद फोन नहीं उठाया. आलोक को करने का मन नही हुआ. अरुण अपने में इधर उलझा सा है. उमेश भी वहीँ कहीं अटका सा. आशीष अपनी तय्यारी में है..अभी याद नही आ रहा के नीरज का फोन सुबह आया था तो वह कल की सुबह थी या आज की..मुकेश से बात उसी इतवार फोन काटने के बाद से नही हुई. लवकेश कभी-कभी करता है राजकुमार राय की तरह..पता नही नाम गिनवाकर क्या हो जाने वाला है..

नीचे की अड्डेबाजियाँ गायब होकर इंटरनेट पर सर्फ़ करने से लेकर इन कमरों में दिल ढूंढ़ता है फिर वही फुर्सत के रात दिन सरीखे गानों की ज़द में आ चुकी हैं. अब होली जैसे दिनों में भी एक बार भी हम सब नहीं मिल पाते. पुराने दोस्तों ने नयों के लिए जगह छोड़ दी है. और पुराने किसी इतवार को याद कर लिया करते होंगे पार्क में वॉलीबाल खेलते हम सबों को. वही आखिरी खेल था जिसमे हम कई कई बार साथ हुए.

याद नहीं पड़ता उन शामों को बीते कितना अरसा हो गया जब सब मिलकर बिरला मंदिर के उस जलपान गृह में छोले के साथ समोसे, ब्रेड-पकोड़े खाने निकलते थे. झींगुर भी निकले अदरक भी. और हम सब कबी कभार किश्तों में भी जाते रहे होंगे, पर वैसे शनिवार लौट कर हमारे पास नहीं आये. न वो रातें ही कहीं दिखीं जब कुर्सी तोड़ते कमर सीधी करते क्रिकेट खेल कर थके मांदे दुपहरी के गए दिन ढले एन.पी.बॉयस स्कूल से लौटते. यही स्कूल इधर रॉकस्टार में कोर्ट बना जहाँ रणबीर अपनी विशेष उँगलियों का प्रयोग करते दिखते हैं. इस ट्रेलर में दो मिनट अट्ठाईस सेकण्ड से लेकर अगले सैकेंड तक वो स्कूल मौजूद है.. हम वापस आते एक बार बैठ जाते तो फिर घर से बार बार बुलाये जाने पर तब तक टस से मस नहीं होते थे जब तक की खाने का वक़्त नहीं हो जाता था. खाना खा वापस अपनी मंडली यहीं पंखे के नीचे जुटती. वक़्त भागता रहता हम वहीँ डटे रहते. पता नहीं बातें कहाँ किस कोने से निकल हमारी चमड़े की जुबानों को चलाये रहतीं. बारह वराह बजना तो उन दिनों आम बात थी.

हम लोगों ने मिलकर ऐसा किया कुछ नहीं के हम सब न मिल पायें. पर उसे बनाये रखने की अपनी तरफ से कोशिश भी नहीं की. फिर हुआ कुछ ये की जिसको जब वक़्त मिलता दूसरे को फोन खड़काता और साथ कहीं हो आता. रात खाने के बाद की सैर सारी पलटन साथ करने निकलती थी उसके भी टुकड़े हे ज़माना हो गया. खेल के मैदान ही वह आखिरी जगहें थीं जहाँ गाहे-बगाहे सब इक्कट्ठा हो जाते थे पर उनकी नौकरियों और बाद के समय में अपने परिवारों को वक़्त देने के नुक्ते ने उसे भी नहीं छोड़ा.

पुराने जितने भी थे यहीं घर के आस पास थे. इनके बड़े जो स्कूल के थे उनकी हद पहाड़गंज-देवनगर-रैगरपुरा बीडनपुरा की रही. आसपास में बस दो रहे राजेन्द्र और जितेन्द्र. जितेन्द्र रहता आराम बाग़ जितना पास है पर अपनी शादी की बात एक दिन पहले बताता है. के कल हम लोगों को भी बरात में साथ चलना है..बाकी मिले फेसबुक पर. संदीप से बारहवीं के बाद सात आठ साल बाद यहीं मिला. विकास-हनी-देवकी-ऋषि-शीतल-हिमानी-दिव्या-रोहित-मयूर सब सत्तानवे अट्ठानवे के बाद एक-एक कर वर्चुअल स्पेस में मिले. उस रात हनी बम्बई से वापस आया था. विकास से तभी फोन पर बात हुई थी. इनमे से कई की शादी हो गयी, कई लाइन में होंगे.

जो कॉलेज में साथ पढ़े जिन्होंने इधर वाले दोस्तों के वक़्त में कटौती कर अपना हिस्सा बढ़ाया भी उनमे अब कईयों से सीधा संपर्क नहीं बचा. जो बचे हैं उनमे से कुछ दिल्ली से कूच कर गए, कुछ यहीं हैं. पर मुलाकातें किसी से नहीं. मनोज कहीं किसी न्यूज़ चैनल में है. मुकेश भोपाल भास्कर में, जहाँ अभी पीछे अक्तूबर गए थे. नीरज पूर्णिया है. बस कुल मिलाकर तीन. गुन्जायिश करके चौथे को जोडूं तो दिनेश है. दक्षिण पूरी दिल्ली का. सौम्य से भी मुलाक़ात फेसबुक पर ही होती है..

इधर घर वाले सारे दोस्त आखिरी बार आगरा जाते वक़्त साथ थे और इसे भी बीते दो साल हो रहे हैं. शाकुंतलम में हम सबने मिलकर गजिनी  देखी थी. उस इवनिंग शो से पहले हमारे अडवांस रुपयों से पहले उस दूकान वाले ने पहले दूध ख़रीदा और बाद में कॉफ़ी के नाम पर पता नही क्या दे मारा था..ऐसे ही कोई शाम जब डिलाईट पर हमने बालकनी में दी मम्मी:टॉम्ब ऑफ़ दी ड्रेगन एम्परर  देखी थी. फिल्म तो कुछ ख़ास नही थी पर दरियागंज के ताज के उस रात बने मसाले डोसे का स्वाद आज भी कभी-कभी याद हो आता है..वो शामें-रातें फिर कभी हमारी तरफ से गुज़री ही नही..

अप्रैल 23, 2012

साहिब बीबी और गैंगस्टर' का उत्तर पाठ

हम अभी ठीक ढंग से साँची से भोपाल आ भी नहीं पाए थे के अल्पना पर फ़ोर्स दिख पड़ी पर उतरे भारत टाकिज पर साहिब बीबी गैंगस्टर के लिए. अक्टूबर पांच से लगातार ये पोस्ट टलती जा रही थी. पर आज नहीं. डैशबोर्ड से निकाल फिर लिख रहा हूँ..तो शुरू करें..

लगता है हम लोग अतीत की छविओं को पुनर्परिभाषित करने के काल में जी रहे हैं. बार-बार उन्हीं बिम्बों-प्रतीकों में आवाजाही करते रहते हैं. किन्ही कोनो कतरों में अपने वज़ूद को तलाशनें की जद्दोजेहद. तिग्मांशु की साहिब बीबी और गैंगस्टर इसी तरह की कोशिश है.

फिल्म के सारे चिन्ह सारे औज़ार उसी सामंती सभ्यता की छटपटाहट अपने वर्चस्व को वापस पाने की है. पर करें क्या उसका रास्ता पूंजी से ही होकर जाता है. एक प्रौढ़ राजमाता हैं जिनसे साहेब को बार-बार रुपयों के लिए हाथ फैलाना अच्छा नहीं लगता. और साहेब की औकात ढाई सौ के एक कारतूस से नाम रोशन करने की ही रह गई है. सिर्फ रुतबा बचा रह गया. रुतबा ही उस दमनकारी चक्र का अधिशेष था. रुतबे के साथ घर से बाहर एक स्त्री भी थी, जिसके जिम्मे दैहिक कार्य व्यापार थे. बीवी मीना कुमारी की तरह सिंदूर नहीं मंगाती. यह सिर्फ सिंदूर मंगाने न मंगाने जैसी छोटी दिखने वाली बात नहीं है. इसके पीछे उस संस्था के चुक जाना भी जहाँ इसे ढोते रहना सिर्फ स्त्री के हिस्से ही आया था.

वहां बदतमीज़ी भी तमीज़ से की जाती है. गैंगस्टर गुलाम का नया वर्ज़न है. वह बीवी की पर्देदारी को एक-एक कर छीजता है और साहेब हो जाना चाहता है. छवियाँ बराबर आ जा रहीं थी. मकबूल के इरफ़ान खान से लेकर इश्किया की विद्या बालन और उससे भी पहले मृत्युदंड की नायिका. इस प्रकाश झा वाले संस्करण को थोड़ी देर के लिए किनारे रख दिया जाए तो इन दोनों नायिकाएं भी वही करती हैं. सबसे पहले अपनी देह से मुक्त होती हैं.

ये भी देखने लायक है कि बीबी की सेविका गूंगी है, इसे स्वामिनी भक्ति का रूपक मान लिया जाए तो एक टेक्स्ट यह भी कहता है के यहाँ एक स्त्री दूसरी स्त्री को पुरुष हो जाने के मौका देती है मतलब यही के जो काम कन्हैया साहेब के लिए करता है और उनका राज़दार बन हमेशा साथ रहता है. पर एक दूसरा टेक्स्ट यह भी है कि गुलाम हमेशा इतने दबावों में जीते हैं की उसकी स्थिति कभी बोलने लायक हो ही नहीं पाती. 

फ़िल्म ख़तम होती है माही गिल के स्थापित होने के साथ. और चेहरा है लकवाग्रस्त मुखौटे साहेब, जिम्मी शेरगिल का. मतलब ये भी के भूमिकाओं की अदला-बदली हो जाती है. सरकारराज टाइप छत से नीचे झांकते चेहरे. और नीचे हैं असुरक्षित जन. भले जातीय रूप से वे वहां इक्कठे हुए हों. उस सामंती ढाँचे को जहाँ ढाई सौ के कारतूस के बूते नाम रौशन करने की औकात नहीं थी, वहां उनकी घुसपैठ चुनावी प्रक्रिया से होती है और उस ढहते ढांचे को वैधानिक संबल मिलता है. 

अबरार अल्वी की फिल्म उन सामंती ढांचों के पतन की कहानी है. पर आगे की कहानी इधर के हिस्से में है जहाँ स्वतंत्रता के बाद राजनीति उन सभी राजघरानों, बड़े-बड़े भू-स्वामी जमींदारों को आज तक जिन्दा रखे हुए है जिनको विकास क्रम में उन लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में समां जाना चाहिए था. मतलब यह कि राज्य की व्याप्ति ने उन सामंती संरचनाओं एक ऐसा पर्दा दिया जहाँ उनका हुकुम और वजनी हो गया और उस 'जन' की राज्य तक पहुँच का रास्ता इन महलों से जाने लगा.ये वही तंत्र है जहाँ साहेब से लेकर उसके प्रतिद्वंदी सब नेता जी के दरबार में हाजरी लगा टेंडर खुलवाने से लेकर रास्ते से हटाने तक के षड्यंत्र खेले जाते हैं. कुछ-कुछ सुलतान मिर्ज़ा के ढ़र्रे पर, यहाँ साहेब मरते-मरते बचा सिर्फ चलती फिरती लाश.

लेकिन यहीं एक और बात ध्यान देने वाली है के स्त्री की स्वीकार्यता उसी पुरुषसत्तात्मक ढांचे के अंतर्गत है जो वेलकम टू सज्जनपुर में भाभी सा को वोट पूर्व परधान की ठसक के बूते डरा धमका अपनी तरफ खींचने की कवायद में लग जाते हैं. पर जो एक बात बार-बार खटकने लगती है के इस फिल्म में 'स्त्री' की भूमिका में 'बीबी' का किरदार ऐसे ही होने के पीछे का कारण कहीं न कहीं तिग्मांशु का पुरुष होना भी तो है. वहां उनकी व्याख्या में स्त्री देह का वस्तुकरण कर उसका प्रयोजनवादी अध्याय ही लिखा है. साहेब नाम का सफ़ेद पत्थर गैंगस्टर नाम का काला पत्थर.

वे मधुर भंडारकर फैशन और पेज थ्री की नायिकों की तरह क्यों नहीं हो पायीं जहाँ प्रियंका और कोंकणा अपने नायकों को छोड़ देती हैं जैसे ही उनके समलैंगिक संबंधों के बारे में उन्हें पता चलता है..जोया अख्तर की लक बाय चांस, अयान मुखर्जी की वेकअप सिड की स्त्री क्यों नहीं बन पायीं. इसे सिर्फ और सिर्फ कथ्य के आधार पर जस्टिफाई माना जा सकता है. अर्थात वहीँ नायिकाएं अपनी देह का प्रयोग करती हैं जहाँ उनका अभीष्ट उस सामंती सत्ता को पाना है. चाहे वो मकबूल की निम्मी हो या इश्किया की कृष्णा वर्मा. अंकुर की लक्ष्मी. वे सब उन पुरुषों की संरचनाओं का उपयोग अपने सामजिक लिंग की स्वीकार्यता बढ़ाने के लिए करती हैं.

अगर इसे ऐसे कहें के अंकुर की लक्ष्मी और सूरज का सातवाँ घोड़ा की वह स्त्री जो तांगे-घोड़े की नाल-नदी के इर्द गिर्द कठोर व्रत धारण करती है, इनमें समानता है के दोनों ही उस समाज में किसी के द्वारा बाँझ नहीं कहलाना चाहती और दोनों ही स्त्रियों के परपुरुष संसर्ग को मिथकीय नियोग मान दर्शक नैतिक बोझ से मुक्त हो सकता है. समाज उस जैविक अवधारणा से नियंत्रित होता है, जहाँ पुरुष बीज है तो स्त्री उसके लिए भूमि उपलब्ध कराती है, उसकी पोषक है. पर यहाँ तांगेवाला नहीं है जीप है और न ही 'बीवी' को गर्भधारण करना है. वैसे भी अब महानगरों में वीर्यकोष-आईवीएफ़ क्लीनिक-सरोगेट मदर आसानी से मिल भी जाती हों वहां 'गुलाम' दैहिक संस्करणों में ही आयेंगे और फिर सत्ता का स्त्री-मूलक पाठ शुरू होगा..

बात ख़तम करते-करते जो बात बार-बार रह जा रही थी कि ललित/ ब ब लू उर्फ़ गुलाम अपनी गर्लफ्रेंड के लिए अंग्रेजी सीखता है गिटार जितना भी सीख पाया कोशिश की. गला खंखार गाना भी गाता है. वह उस जगत में प्रवेश कर खुद की स्वीकार्यता बढ़ाना चाहता है जिसमे उसकी प्रियसी रहती है. उस बाधक पहरेदार उसके पुरुष मित्र की भी हत्या कर देता है.

और फिल्म के आखिरी सीन में उसका स्थानापन्न दूसरा 'गुलाम' दिखाई देता है. अब पुरुष की देह पर स्त्री का अधिकार..पर यह जितना एक रेखीय जान पड़ रहा है अभी भी उतना ही समस्याग्रस्त है क्योंकि उन समलैंगिक संबंधों से वे पुरुष भी वही करने की कोशिश में थे जैसा ये स्त्रियाँ इन छवियों में अपनी देह से सिद्ध कर रहीं थीं..

अप्रैल 22, 2012

मुझे तब-तब याद आएगी हम दोनों की

पता नहीं उस दिन की छुअन को अभी भी महसूस कर रहा हूँ, एक बारगी लगा इतने मुलायाम हाथों में हड्डी हो भी कैसे सकती है. और असलियत में थी भी नही. पर ये सपना सिर्फ मैंने देखा तुमने नही. देखा होता तो कोई दिन हम कहीं मिल अपने हिस्से की कई-कई बातें करते. पर नही, ये भी नही हुआ. तुम्हे वक़्त नही मिला, न मैंने दुबारा पूछा..पर ऐसा क्या है जो मुझे तुमसे जोड़े रहता है हमेशा. समझ नही पाता..

तुम्हारा नंबर नही बदला. वही है. बात भी हुई. कहा वक़्त मिलने पर बताउंगी. आवाज़ में न विस्मयबोधक चिन्ह थे न ही कोई प्रश्नवाचक सवाल. तुमने सोचा होगा, फोन आ भी गया तो कौन सा पहाड़ टूट पड़ा और उसमे से मरी चुहिया भाग निकली. पता नही क्यों लगता है तुम्हारी पालियों का वक़्त कभी मेरे हिस्से में नही पड़ने वाला. कबी ये भी लगता है हम दोनों एक दूसरे के हिस्से में इतने ही थे. बीते कल की किसी कहानी की तरह. बिन बोले. चले जाते. चलते जाते. कभी किसी कोने से बात हो जाती, तो लगता, चलो साथ हैं..बस इतना ही, इससे आगे नही..

अब ऊब चुका हूँ उन्ही दो तीन तरीकों से बार-बार उबने से. जहाँ तीन चार साल पहले था, लगता है दो-तीन इंच इधर-उधर होने के अलावा कुछ नही बदला. सपने जस के तस हैं. अपने आज को लताड़ते, सपने देखते. किसी के हाथ में हाथ डाल उस डूबते सूरज के आर-पार जाते खिड़की से दूर कहीं हवा के झोंकों के साथ.

पर सीधी सी बात ये भी है के कोई यूँ ही सारी ज़िन्दगी साथ चलने-बिताने का फैसला सिर्फ एक बार कहने भर से ले ले..हामी भर दे..कोई फिलम तो चल नही रही.. कहाँ है हम दोनों का साझा अतीत..जहाँ सिर्फ हम दोनों होते..मुझे लगता है जब-जब भी हम एक-दूसरे के करीब आये वहां हम दोनों होते हुए भी हम दोनों नही कई-कई जोड़ी आँखें साथ थीं..हमारी बातों की औपचारिकता कभी निजी एकांत की तरफ बढ़ ही नहीं पायी..या शायद मौके बनाये ही नही गए..भीड़ के बीच..

इधर पता नही क्यों इसमें उलझता जा रहा हूँ..हर इतवार अंग्रेजी अख़बारों में अपना राशिफल पढ़ता हूँ और सोचता हूँ चलो कुछ गुंजाइश बनती है..पर सोमवार होते-होते वह पढ़ा सब साफ़ और वही पुराना ढर्रा..इतवार का इंतज़ार. के कभी वो भी तो अपने हिस्से का पढ़े, कुछ करे..ऐसा नही है कि इधर नियतिवादी होता जा रहा हूँ जो थोडा बहुत दिमाग चलता है वहां पहुँच लगता है, हम ऐसे ही कम बात-कम मुलाक़ात वाले दोस्त ही बने रहेंगे. जब तक कि हम दोनों की संस्थागत भूमिकाएं नही बदल जातीं. तब स्वतः ही दूसरे की अपेक्षित भूमिका, निर्णायक दूरी बन उन अ-स्पष्ट संबंधों की उष्मता को कम करती चली जायेगी..

मतलब हम उन भारतीय परिवारों में रह रहे हैं जहाँ लगती नौकरी के साथ लड़के वांछनीय हो रिश्तेदारियों में पूछे जाने लगते हैं और बढ़ती उम्र के हवालों के साथ लड़कियों को जल्दी से जल्दी बिदा कर दिए जाने की योजनाओं पर मंथन शुरू हो जाता है.. और तब वहां ऐसे क्षण भी आयेंगे जब उन हाथों की छुअन का अहसास कभी किसी बरसात की शाम याद आकर थोडा सा रूमानी कर चला जायेगा..

इन सारी दिमागदारियों के बावजूद भी पता  नहीं यह सब कब-तक चलेगा..शायद उस दिन तक..पता नही क्या..शायद ऊपर लिख ही चुका हूँ..शायद तब-तक जब-तक तुम सीधे मना नही कर देती..पर पता नही उस दिन क्या होगा जब तुम भी मेरी तरह सोचने लग जाओगी..जिसकी संभावनाओं पर अभी कुछ नही कहना चाहता. अपनी तरफ से कोई कोशिश तो होने से रही..पर क्या पता, हो भी जाए..

तभी तो आज शाम जब सुशील ने अपना एफ़बी स्टेटस लिखा..जिंदगी के सारे सपनों का मोम /सारे रिश्ते की जमावट /तो कब की पिघल चुकी थी /बस रह गया था तुम्हारे साथ का इक धागा /जो जलाए रखा था जीवन की लौ /लो /आज वो भी बुझ गया /कुछ अवशेष सा जम गया मेज पर /जिसे वक्त खुरच-खुरच के साफ़ कर डालेगा..

तब मैंने वहां जाकर ये लिख मारा..पर गाहे बगाहे /जब हवा /उस मेज़ के चादर को उघाड़ देगी /मुझे तब-तब /याद आएगी हम दोनों की..

अप्रैल 21, 2012

दिन पहला:मेरी त्वरित टिपण्णी

दिन एक. जैसा की होता है पहले दिन हिदायतों की मुगली घुट्टी के कई पाठ पिलाए जाते हैं. स्वयं का श्रेष्ठता बोध सहज तो कभी होता नही है. पर जब लाबदे की तरह ओढ़ लिया जाए तो कुछ वैसा ही होता है और किया जाता है. स्वयं को स्वतंत्रता-विचार-परावर्तन-चिंतन-संश्लेषण-विश्लेषण की प्रतिमूर्ति मानना और हमसे भी वही अपेक्षा करना. पर हर सन्दर्भ में पूर्वाग्रह भी दिखते हैं.

संस्थानिक रूप से हम लोगों को 'स्कॉलर' जैसा भारी-भरकम शब्द आज ही लादने को दे दिया गया. कंधे उचकाने का मौका भी नही मिला. भाषिक रूप से खेलना उन खिलाड़ियों का पुराना अंदाज़ है. इतनी ज़ल्दी बदला नही जा सकता. कोशिश करना भी अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारना है.

जब मुझसे पूछा तो मेरा जवाब कुछ ये था कि मातृभाषा जो हमें बोलना सिखाती है, अपने परिवेश-समाज-संस्कृति को पहले पहल देखने समझने का अवसर देती है, वही भाषा उम्र के साथ-साथ कहीं पीछे कैसे छूट जाती है? मैं खुद कितना समझता हूँ, उससे ज़यादा जरुरी था फौरी तौर पर उनकी समझ में कुछ न आने देना.

वहां अन्य सहभागियों की आँखों आँतों के बीच पसलियों से घिरे दिल और ऊपर के माले की खोपड़ी में कई=कई सपने अरमान कुलबुला रहें हैं. उन्हें खुद पता है वह कितनी सफाई से आज झूठ बोल गए हैं. आदर्श के चरम से अपने को प्रतिष्ठित होता देखना, किसे अच्छा नही लगता. इन सबमें चेहरे पर पुते दर्प ने यही कुछ बताया. दो तो सिर्फ अध्यापक के अलावा कुछ और बनना ही नहीं चाहती थीं. एक अपने पिता से आगे बढ़ कुनबे में सबसे ज्यादा पढ़ना चाहती है. और भी बहुत कुछ कहा जिस पर कभी किसी और रोज़..

और मैं खुद एक सवाल से जूझ रहा हूँ कि उस दिन लिखे जवाबों को इन लोगों ने प्रमाणिकता नही दी? माने क्या ये सब मेरे विचारों से सहमत हैं, जो उस शनिवार वहां लिखे गए या उसमें इन्हें कुछ भी आपत्तिजनक नहीं लगा जिसे मैं खुद असामंजस्य पूर्ण मानता रहा !!

मनोवैज्ञानिक इन तीन पंक्तियों का जो मर्ज़ी करें मेरे उलझने का सिर्फ यही मतलब है कि पेपर जांचने वाले और यहाँ पढ़ाने वाले अध्यापकों में यदि कोई रिक्त स्थान या गैप होता है तब मैं क्या करूँगा? एक तरफ मेरा दाखिला मेरे विचारों से सहमति भी प्रकट करता है वहीँ पर यहाँ का रवैया उन सबको संभाल पाने की स्थिति में किसी तरह भी तैयार नही लग रहा..

10:52P.M. 21/07/2011 

अप्रैल 17, 2012

श्रावस्ती की सैर

यह यात्रा संस्मरण देशबंधु कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय की वार्षिक पत्रिका 'देश 'में 2007 के अंक में प्रकाशित हुआ था..इतने साल बाद नज़र पड़ी तो यहाँ साझा कर रहा हूँ..चलिए चलें श्रावस्ती की तरफ..
 
सर ने कहा लिखो दोस्तों ने कहा लिखो मन ने कहा लिखो हाथ ने कहा लिखो लेकिन कलम ने कहा क्या लिखूं! इसी लिखने लिखाने के चक्कर में मेरा मन न जाने कहाँ कहाँ नहीं भटका और आखिर में हांफता हांफता रुका इतिहास के दरवाज़े पर. एक बारगी तो वह हैरान हुआ और मुझे सर से पैर तक घूरा फिर उसने कहा, यहाँ क्या करने आये हो! तुम भुलक्कड़ लोग चाहे मुझे याद करो या न करो; मैं कल भी था आज भी हूँ , कल भी रहूँगा. तुम्हारी बिसात ही क्या है!! वह कह तो ठीक ही रहा था लेकिन मेरा हक मन उन दमदार बातों से ज़यादा न घूम सका और मेरी लेखनी चल पड़ी श्रावस्ती की सैर पर..शायद घुमने से ही आराम मिले.

आप नहीं जानते श्रावस्ती को! अरे वही अंगुलिमाल वाली, शाक्य मुनि की! अब आप यह मत पूछियेगा की ये अंगुलिमाल डाकू है कौन..अरे वही अहिंसा के पथ वाला. जिसने लोगों की अंगुली काट-काट माला बनाकर अपने गले में पहनने का व्रत लिया था. अभी भी याद नहीं आया, शायद इतिहास सच ही बोल रहा था..तो चलिए चलते हैं उसी गुफा में..आप की भेंट करवा दूँ ..डरिए मत वह आपकी उंगली नहीं काटेगा. यह बात तो बौद्ध काल (5-6 सदी ईसा पूर्व) की है, अब तो केवल उसकी गुफा व अन्य महत्वपूर्ण साक्ष्य खड़े उसी संस्कृति का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं.

यह भारतीय पुरातात्विक नक़्शे पर सन 1863 में आया जब कनिंघम आदि पुरातत्त्वविदों को यहाँ पुरातव सम्बन्धी विपुल सामग्री मिली. अन्वेषण से यह तथ्य भी प्राप्त हुए की ई.पू.यहाँ मिटटी  के किलों की शुरुआत हो चुकी थी. यह सोलह महाजनपदों में से एक कौसल की राजधानी थी , जिसकी पहचान वर्त्तमान में उत्तर प्रदेश के बलरामपुर और बहराइच जिलों की सीमा पर सहेट-महेट नामक स्थान से की जाती है.


हमें भी फाहियान (चीनी यात्री, गुप्त काल में) और ह्वेनसांग (सातवीं सदी) की तरह इस श्रावस्ती जाने का मौका दो साल पहले मिला. जब हम हर साल की तरह उस साल भी गाँव पहुंचें तो यहाँ का प्लान बना. चूँकि वर्तमान श्रावस्ती कटरा बाज़ार में हमारी भाभी का मायका भी था इसलिए रात रुकने की कोई चिंता नही थी. एक शाम  हम पूरे लाव लश्कर के साथ पहुँच गए. पर बीच में रात पड़ गयी. नींद का कहीं अता पता न था, बस मन न जाने किन कल्पनाओं में खो गया था, बार बार लगता घडी रुक तो नही गयी. सुबह हुई हम जल्दी जल्दी नहा धो. नाश्ता कर बस तुरत निकल पड़े. 

सुबह शांत थी. कोई ध्वनि थी तो केवल पक्षियों की उनके कलरव की. बिकुल सीधी सड़क पर चलते चलते हम बाज़ार से बहुत दूर पहुँच गए थे  और दायें हाथ पर एक दरवाज़े से हम एक उद्यान में पहुचें, वहां एक घंटा टंगा हुआ था, कोई छोटा मोटा नहीं, पूरे पांच कुंटल का जापानी घंटा. जिसे बजाने के लिए तने को काट गोल मोटी लकड़ी की तरह वहां टांग दिया गया था. घंटे की एक एक चोट हमें उसी समय में वापस ले जाने को तैयार थी. पर हमें वहां से चलना था. हम चल पड़े अंगुलिमाल की गुफा की तरफ..

होता है न कभी-कभी जल्दी के काम बनते कम उलझ जाते हैं, वैसा ही हमारे साथ हुआ. फंस गए शॉर्टकट के चक्कर में. एक बार इस शॉर्टकट पर चलना शुरू किया तो बस चलते गए चलते गए पर ये शॉर्टकट कटने को तैयार नही, ऊपर से सूरज महाशय कुछ ज़यादा ही मेहरबान दिख पड़ रहे थे..चलते चलते गाय भैंस धूल मिट्टी गोबर बछिया बछड़े सब से मुलाक़ात करते चल रहे थे, पर आँखें उस गुफा ओ देख भर लेना चाहती थीं..की तभी साथ चल रहे राहगीर ने कहा यही गुफा है.

काँटों की झाड़ियों के पार बिना पेड़ों के पार गुफा थी..हम सभी एक दूसरे के चहरे पढ़ने की कोशिश में लग गए.वह कोई फ़िल्मी, आदिमानव की गुफा जैसी नही थी बल्कि लगभग दो मंजिला ऊँची चौकोर इमारत थी. जो हमें बुला रही थी. उसके दो प्रवेश द्वार थे जो अब इतने सदियों के बाद मिट्टी के कारण कुछ अन्दर धंस गए थे. अन्दर आकर लगा हम ऐसे डब्बे में बंद हैं जिसके आमने सामने दरवाजें न हो तो बस गए..ऊपर सारा आकाश हमारी तरफ अन्दर झाँक रहा था..कहीं ये आज ही ढह न जाये इसी दर से जल्दी उस डब्बे से बाहर निकल आये. हमने कहाँ अलीबाबा चालीस चोर वाली गुफा की कल्पना की थी, यहाँ ये तो एक डब्बा निकली. लेकिन ऐसा वैसा डिब्बा नही, वह आज भी उसी समय को अपने में समेटे हुए दृढ़ता से समय की मार सह रही थी. वहां नाम के लिए भारतीय पुरातत्त्व विभाग लखनऊ मंडल का बोर्ड चमक तो रहा था लेकिन गुफा के अन्दर, कुछ दीवारों के बीच पेड़ पौधों ने अपने लिए भी जगह बना ली थी और दरवाज़े इतने संकरे की अन्दर जाते दिल बैठ जाये.

बाहर निकल हम गुफा के ऊपर चढ़ गए. वहां से दूर चिरावती (राप्ती) नदी अपना आभास दे रही थी, नदी के कारण हवा में थोड़ी ठंडक थी और कुछ ज़यादा ही तेज़. यहाँ से जापानी घंटे के निकट वाले श्वेताबर जैन मंदिर की चोंच कुछ कुछ दिखाई पड़ रही थी. नीचे उतर पक्की कुटी गए और फिर मेहट छोड़ सहेट की तरफ चल पड़े! 

जैसे-जैसे घडी की सुईयां बढती जा रही थी धूप भी अपने चरम पर पहुँच रही थी. रस्ते में सरकारी हैंडपंप देख मैंने बैग से बिस्कुट निकाले और हम सबने खाकर पानी पिया. ऐसा लगा कि पानी की ही ज़रूरत थी गले से तुरंत नीचे. पर संदीप पर इसका उल्टा असर हुआ. देह गरम लग रही थी. उसने सिर पर तौलिया रख लिया पर हम तीनो अभी वापस नही लौटना चाहते थे इसलिए अपनी स्पीड थोड़ी धीरे कर ली. धीरे धीरे सहेट पहुंचे जहाँ कभी गौतम बुद्ध अपने चौमासे व्यतीत किया करते थे.

किवदंती है कि इसी श्रावस्ती में गौतम बुद्ध ने यहाँ के धन कुबेर अनाथपिण्डक को दीक्षा दी थी और उसने बुद्ध के लिए राजकुमार जेत से अट्ठारह कोटि स्वर्ण  मुद्राओं से उसके उद्यान की भूमि को ढक कर उसके उद्यान की भूमि को ढ़क कर जेतवन ख़रीदा था. पर हम इस जेतवन में घुसे बिना टिकट ख़रीदे. एक टूटी ग्रिल से अन्दर दाखिल हुए. जहाँ महेट में केवल ध्वंस स्मारक थे, वहीँ इसकी हालत कुछ ठीक थी. तेज़ धूप में जितना भी पढ़ा उससे पता चला कि यहीं वह मूल गंध कुटी थी जिसमे महात्मा बुद्ध चौमासे व्यतीत करते समय रहते थे और यहीं से चल कर वे अंगुलिमाल की गुफा तक गए थे. चलते चलते अब थकान लगने लगी थी, हम छावं ढूंढ़ रहे थे की हम तीनों की नज़र उस पीपल की तरफ पड़ी जिसे लोहे के खम्बों से रोक कर सीधा करने की कोशिश की गयी थी. यह जैतवन में स्थापित वह पवित्र बौद्ध वृक्ष है जिसे श्रीलंका-सिंघल द्वीप- से लाकर यहाँ स्थापित किया गया था. हर साल लाखों बौद्ध जगत के श्रद्धालु  इसके दर्शन और परिक्रमा को आते हैं.

सोचा था थोड़ा और रुक इत्मीनान से देखते पर संदीप का बुखार लू-धूप के कारण ये हो न सका. हम तेज़ क़दमों के साथ सुबह साढ़े सात के चले पौने चार के करीब वापस घर पहुंचे. रास्ते  में न जाने कितने  बौद्ध विहार-जैन मंदिर पड़े पर किसी पर नही रुके. उन्ही दिनों वहां एक मंदिर का निर्माण हो रहा था, नाम था महा मंकोल चाई. थाईलैंड वाले हैं. हम तो इसे नही देख पाए पर आप वहां जाएँ तो इसे देखना न भूलें. 

वैसे इस श्रावस्ती के पास  एक घंटे की दूरी- बयालीस किलोमीटर- पर बहराइच जिला पड़ता है. यहीं 1900 में महाराज सिंह इंटर कॉलेज में प्रेमचंद ने दो माह का प्रवास किया था, यहाँ से उनका तबादला प्रतापगढ़ को हुआ और वहीँ से 1901 में उनका लेखकीय जीवन प्रारंभ हुआ था.साइमन कमीशन के विरोध में फरवरी उन्नीस सौ बीस में बहराइच-जरवल-नानपारा में हड़ताल की गयी थी. सरोजनी नायडू सन छब्बीस में यहाँ आयीं थी और खादी के इस्तेमाल के लिए आवाहन भी किया था. 1929 में गाँधी जी बहराइच आये थे और एक आम सभा का आयोजन उसी पुराने सरकारी हाई स्कूल (जिसे अब महाराज सिंह इंटर कॉलेज के नाम से जाना जाता है) में हुआ था. इसके साथ यहाँ का मुख्य आकर्षण होता है महमूद गजनवी के भांजे ग़ाज़ी सैय्यद सलार मसूद [सलार सैफुद्दीन अलिअस सुर्खरू सलार ] की दरगाह पर हर साल लगने वाला जेठ मेला. इस मज़ार पर इब्नेबतूता भी चौदहवी शताब्दी में आया था.

आज इस यात्रा को दो साल हो गए पर यादों के पन्नों पर आज भी ये ताज़ा है और उन घंटों की ध्वनियाँ आज भी बुला रहीं हैं..अगर आप भी इस यात्रा को जिवंत करना चाहते हैं तो अभी से तय्यारी शुरू कर दीजिये, क्या पता इतिहास आपकी भी क्लास न लेने लगे..


{बस आखिर में यही कि इस पोस्ट में जहाँ-तहां जो फोटुओं के लिंक हैं वो इतनी पुराने नहीं हैं..उनमें से कुछ जून 2010, तो कुछ अभी हाल फरवरी की हैं..}

अप्रैल 14, 2012

दिलचस्प शिलालेख

आज भीमराव अंबेडकर जयंती है, बस आगे ये छोटी सी कविती सी ..कहाँ मिली..?? मिली समाजशास्त्र की बारहवी कक्षा की पाठ्यपुस्तक 'भारतीय समाज 'के पेज नंबर सौ पर..बॉक्स 5.4

शहर

एक दिन किसी ने बीसवीं सदी के एक शहर को खोदा और अवलोकन किया
एक दिलचस्प शिलालेख विवरण इस प्रकार था:
"यह पानी का नलका सभी जातियों और धर्मों के लिए खुला है".
इसका क्या मतलब रहा होगा:
यही न कि यह समाज बँटा हुआ था?
उनमें से कुछ की स्थिति ऊँची थी और बाकी की नीची?
ठीक है, फिर तो यह शहर दफ़न होने लायक ही था-
तो फिर लोग इसे मशीन युग क्यों कहते हैं?
यह तो बीसवीं सदी का 'पाषण युग' प्रतीत होता है.

: दया पवार

अप्रैल 09, 2012

उसका नाम टीटू तो बिलकुल नहीं था

हम सबके लिए उसका नाम टीटू ही था.
बचपन से हम उसे ऐसे ही देखते आ रहे थे.
देखने का मतलब
ये नहीं कि वह दर्शनीय स्थल जैसा था,
हमने देखा है उसे बोलने की चाहना लिए हुए.
छटपटाते-बिलखते
आँखें बाहर निकलने को हो आती थीं,
पर नहीं निकल पाता था
जबान से कोई भी स्पष्ट शब्द.

हर बार और जितनी भी बार, उसने बोलना चाहा,
थूक बने राल के साथ
लिपटी हुई कुछ अस्पष्ट ध्वनियाँ निकलीं.
जिसे हमारी भाषा का व्याकरण नहीं समझा,
न कोई हमारी मदद कर सका.
वह हमारी तरह ही कहना चाहता था
अपने दिल में आई कोई प्यारी-सी
नन्ही-सी कोई बात,
कहीं किसी कोने में दबी रही होगी
कोई याद.

जब भी वह बोलता
उसके शब्दों के साथ लिपटे-लिथरते जाते ध्वनि-कण
थूक से लिजलिजे हमारे कानों से पहले
आँखों तक पहुँचते और हम
जल्दी ही भाग लेना चाहते.
नहीं देखना चाहते थे उसकी भीगी-गंधाती कमीज
जो बताती जाती कितना कुछ है, उसके पास
जो वह किसी के साथ बांटना चाहता था.

उसके घरवाले बताते हैं
गुसलखाने में फिसल कर उसकी मृत्यु हुई,
पर मुझे पता है यह झूठ है.

वह तब फिसल-गिरा होगा
जब कुछ बोलने के लिए
सालों जूझने तड़पने के बाद,
सहसा उसकी कनपट्टी के पास उभर आई होंगी नसें
लड़बड़ाती जीभ पर काबू पाने के लिए
सारा बचपन आँखों के सामने दौड़ गया होगा,
सारी उर्जाओं को समेट, अपना ही नाम बोलना चाह रहा होगा
और जिसने भी उस वक़्त सुना होगा
वह बताएगा उसका नाम टीटू तो बिलकुल नहीं था.

और इनसबके बीच
मैंने आज से पहले
कभी उसके बारे में नहीं सोचा
कभी उसके लिए समय नहीं निकाला.

पर आज अपनी इन पंक्तियों को पढ़ कर लगता है
इन सबमें छुपी होगी
मेरे अन्दर की दया-सहानुभूति-उपेक्षा
के बाद उपजी भावना
या मेरे अन्दर का ऐसा ही कोई भाव
जिसने मुझे
एक अदद धडकते दिल के साथ
अभी तक जिन्दा रखा..

अप्रैल 06, 2012

इधर ये दो दिन..

दिन एक

09:55 pm 05/04/2012

पंखा बंद है. मिट्टी ज़मीन पर धूल की तरह पसरी फैली है. हवा अशोक के पीले हो चुके पत्तों के साथ खेल पतझड़ जैसा मौसम बनाने के कोशिश में है. पीपल पर अब कोमलता अब कुछ कम हुई है पर उस हरे में अभी भी नयापन है. पकड़िया पूरा भरा पेड़ लग रहा है. आम बौर के साथ पतंग भी टाँगे हुए है.

आज सुबह से ही सुबह सुबह जैसी नहीं लग रही. थकी उदास खाली उब जैसा कुछ लिए..सर अभी भी भारी लग रहा है, फिर भी 'प्यार का पंचनामा' देख मारी. इतवार 'स्वदेस' में परदे पर फिलिम देखते वक़्त उसके पीछे भी लोग देखने की कोशिश में उलटी तरफ बैठे थे. पर रह गयी. टायटैनिक थ्री-डी में रिलीज़ हो चुकी है. रवीश प्राइम टाईम में जनवरी सोलह को सेना की टुकड़ियों के अभ्यास, दिल्ली कूच तख्तापलट के 'सू' को लेकर उदय भास्कर- रैडिफ की शीला भट्ट- तहलका के आशीष- आनंद प्रधान को लेकर शेखर गुप्ता की कॉपी के ऐतिहासिक महत्त्व पर बतिया रहे है.

उधर वाणी से इस अप्रैल में दो किताबें आ रही हैं. और दिमाग अवसर बराबर प्रतिभा वाले गणित से दुबारा खेलने को हो रहा है. तकिया दिवाल के सहारे लुढ़क गया है. पानी की बोतल टेप कैंची के साथ है. मोबाइल का म्यूजिक प्लेयर प्यार की पुंगी बजाकर जगजीत सिंह सरफरोशी- होश-बेखुदी- इश्क-बेहोशी की समझाईश पर निकल पड़े हैं. नीचे पिट्ठू के रात्रि संस्करण घरवालों की आवाजों के बाद भी चिल्लाते चल रहे हैं.

पता नहीं फिल्म देखते वक़्त गर्दन कैसी हो गयी थी की अब उसमे दर्द हो रहा है..

कल सी.आई.ई. का आखिरी दिन था. आज से नए रोजाना की तलाश शुरू..और पूरे दिन का हासिल कुछ-कुछ  यूँ था के फेसबुक पर हाजिरी कम से कम हो इसकी कसमे दिमाग में घुमने लगीं और किताबों में मुंह मारने की पूरी तय्यारी बन रही थी. बस ये दुपहरें अपने बने बनाये ढर्रों में नींद को अपने साथ न लाये. आज खाना फिर अपने स्वाद के साथ गले से उतर ही नहीं रहा था. आँखें रूह-आफ़ज़ा को ढूंढ़ते वापस टीवी पर अनस्टोपेबल देखने लगीं. अभी नौ बजे से लीजन आरही है स्टार मूवीस पर या पिक्स पर!!

उसने कल कहा यह उसका दिल्ली में आखिरी साल हो सकता है. जबकि अभी राकेश से बात हुई तो वहां लगा के जितनी जल्दी हो सके वह दिल्ली आना चाहता है. दोनों की कहानियों के कई-कई प्रसंग हैं इसलिए अभी इतना ही..

उस दिन अरविन्द अपनी माँ के हाथ आखिरी बने पापड़-कचरी दे रहा था. कैसे ले जाऊंगा हाथ में?? बोलकर नहीं लाया, कहा फिर कभी ले जाऊंगा. और लवकेश के यहाँ चल पड़ा पैदल. ढक्का गाँव.

वह पिछले वीरवार घर से निकल लिया था अकेले एजेंट विनोद देखी. घर पर लड़की वाले आ रहे थे, उसे देखने. दिल्ली बाहर से. मोटा दहेज़ दे रहे हैं. होंडा सिविक. पांच-आठ लाख नकद. घर-गृहस्थी का पूरा सामान. और लड़की भी. मतलब जब तक शादी के लिए मन मान न जाये तब तक रूमानी आसमान में रहे. पर प्रयोजन वादी तर्क बीच में नैतिकता वाले नुक्ते को ले आता है, के ये ठीक नहीं, के उन सबको वस्तु माने जो उसके साथ अभी हैं..दो-एक जितनी भी..

दिन दो 

01:40 pm 06/04/2012

कबूतरों की उम्र कितनी होती है?? इस खिड़की के शीशे पर आकर अन्दर झांकना. छज्जे पर तिनके इकट्ठे करना, रहना. शायद पहले उनके अंडे यहीं रह भी गए थे, जब हम अदिति जितने थे. दुपहरियों में छत की तरफ वाली खिड़की को खोल कर अन्दर बैठने की जगह ढूंढ़ते. तब से लगातार दोनों को देख रहा हूँ. हर सुबह चलते पंखे के दरमियानी में भगाते डर भी लगता है कहीं उसमे फंस न जाएँ. पर नज़र पड़ते ही टिकने नहीं देता हूँ. अभी भी उसकी चमकती आँखों में देख रहा था. शायद मुझे पहचानने की कोशिश में थे. पर मुझे तो हर कबूतर पहले का जुड़वाँ लगता है, मैं कौनसा सलीम अली के खानदान से ताल्लुक रखता हूँ..

दो दिन सत्यानाश. रात की नींदे सुबह नहा लेने के बाद की पालियों में पूरी हो रही हैं. अभी पसीना नहीं है, हवा चलती रहती है, खिड़कियाँ भी खुल जाती हैं, पर रात के बारह एक दो तो ऐसे बज जाते हैं. फिर तीन चार ऐसी आँख लगती है की सोते रहो-सोते रहोss.. पर छेह के बाद का उजाला आँख में चुभने लगता है..और तब तक इतनी पास उन दोनों के गलों की आवाजें गुटुरगू वाले अंदाज़ में कानों तक पहुचने लगती हैं..

पर बचपन वाली गौरय्या यहाँ नहीं है, कौवों ने अपने को मिश्रा टी स्टाल तक सीमित कर लिया है..हाँ उस दिन सी.आई.ई.में भी दिख पड़े थे..

अप्रैल 03, 2012

शहर-मौसम-शहतूत-कोयल और हम

इस बार हमारी सड़क पर पतझड़ उस तरह नहीं आया जैसे पहले आता था. एक दम तरतीब में लगे सारे पीपल अपने पत्तों की साल भर की यादों के बाद बिदाई कर देते. एक साथ. फिर दम से हफ्ते बीते नए चिकने चमकीले पत्तों की राह देखते. उनका ढलते सूरज के वक़्त बहती हवा के साथ देखना उस नए आने वाले समय की ठंडक से भर देता. पर ऐसा किश्तों में होता. छत पर टहलते नीचे झांकती आँखें उन झर गए पत्तों की व्यर्थता को देख पता नहीं कैसा हो आता. सड़क पर हर सुबह फुटपाथ के सहारे उनपर चलने की आवाजें आज भी कानों में है. और होती उस वक़्त झाडू से उडती धूल. किसी गाडी की रफ़्तार में भागते पहिए से उड़ गए पत्तों की सरसराहट. उन्हें महसूसना अपने रोमांच से डूबना होता.

उनका इतवार की छुट्टी में इकठ्ठा हो जाना फिर हम सबका धम्म से से उन पर कूदना, बेफिकरापन, गेंद ढूंढते बस इतना ध्यान होता था कि कहीं से कोई पीले खून वाला कीड़ा न चढ़ जाये. और वो वाला तो कभी हाथ ही न लगे जिसके छू जाने भर से अनाम सी गंध छूटती और हाथों पर ही रह जाती. लाल पीठ पर काले घेरों वाला ये कीड़ा जब जब इसे छूने की कोशिश करते तब तब भूला याद आता के ये तो उड़ भी सकता है..पर आज भी अशोक के पत्तों को इकठ्ठा कर एक दूसरे पर फेंकने में वाले दिन बीच-बीच में आ जाते थे, वही हमारी गर्मियों की बरफ थी..

पकडिया के पत्ते बड़े होने पर इतने धुलिया जाते हैं की कोई मान भी नहीं सकता जब उस पर नयी कपोलें आती हैं तो हमारी कोयल बगल के आम को छोड़ इसकी डाल से कूकती है. हर साल. कभी मन करता तो इसे छेड़ भी देते फिर शुरू होती असली नकली की दौड़. पर थोड़ी देर में समझ जाती, और झेंप कर चुप बैठ जाती. इधर उस आम की बौर का हर एक साल छोड़ कर आना लगातार जारी है..पर उन ठंडी सुबहों में बहती उसकी खुशुबू अब नाक तक नहीं पूछती..शायद इसका कारण इधर उन जल्दबाजियों का न होना है जब हम सवेरे एक तरह की भागमभाग में होते थे या रात ज़यादा देर से सोने के चलते उस रक्तिम आभा वाले सूरज से गुफ्तगू अब पौने सात-सात के आस पास ही हो पाती है..

अभी कल दोपहर आलोक-मैं महुए की गंध पाकर उस पेड़ तक गए पर वहां सिर्फ गंध थी महुए नहीं..शहतूत का पेड़ गेट पर लगा है. पर बेचारा शहतूत लायक बचा नहीं. उसकी लगातार इतनी छटाई से अब सिर्फ उसके हिस्से में ठूंठ जैसा ताना बचा है और उसकी क़ुतुब मीनार की तरह की टहनियां. ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि जब इन अप्रैलों में वह नीचे फर्श पर गिरता है तो दाग पड़ जाते हैं और उसे साफ़ करना पड़ता है. हम सुविधा भोगी हैं इसलिए पैर के नीचे इनको नहीं चाहते.

उस दिन पंचकुइयां रोड बनवारीलाल वाले स्टैंड पर खड़ा थोड़ा पीछे लौट गया. जब जब पीछे लगे पेड़ से हम शहतूत उन बड़े लाल पीले फूल के पत्तों में लाते थे-जिन्हें आलोक के यहाँ थलकमल कहते हैं- तबतब शुरू होती थैलियों की खोज. फिर उनमें धोते. मिट्टी पानी में रह जाती और पत्ते में भरभर दुपहरियों में छाया वाली जगह ढूंढ़ लाल गुलाबी शहतूत खाते. इधर न वो छुट्टियाँ मार्च अप्रैल में पड़ पाती हैं न अब कोई जाता है. सब अपने को बड़ा मान बैठ गए हैं. वहां स्टैंड पर जिन बुजुर्ग होते प्रौढ़ महापुरुष ने उन लड़कों को वहां से भगाया शायद उनके हिस्से वे स्मृतियाँ नहीं होंगी और न ही किसी के पास ऐसी किसी चीज़ को जमा होने देना चाहते होंगे..

अब उस छत वाले कमरे की दुपहरी सुपहरी गरम होना शुरू होंगी तब जो खिड़कियाँ अभी तक खुली हैं उनको बंद करने के सिलसिले शुरू होंगे. वहां परदे लगा चुपचाप सोने की योजनाओं पर काम किया जायेगा. शामें धूलभरी आकाश में छिपे सूर्य देवता से बढ़ गयी उमस और फिर बहते पसीने में उन दिनों को कोसने पर मजबूर करेंगी. पानी पानी पानी सिर्फ पानी बिकेगा. रूह-आफ्ज़ा से लेकर खारी बावली में नाम अनाम ठंडाई, टीवी पर रसना लिम्का के नए विज्ञापन..फिर भी एक बात समझ नहीं आती के जब हम पानी की इतनी किल्लत से जूझ रहे हैं तब ये सारे विज्ञापन और साल भर मुग़ल गार्डन में घास के गलीचों को बचाए रखने के लिए इतने गैलन पानी और पसीना क्यों खर्च किया जा रहा है..

अप्रैल 01, 2012

प्यार का पहला ड्राफ्ट

पता नहीं कैसा होता जा रहा हूँ. उन सारी बातों मुलाकातों के चुक जाने के बाद भी आज तक वहीँ कहीं अटका सा. निपट अकेला. वहीँ किसी कोने में. कोई नहीं है जिसके पास के कान में कुछ कह सकूँ. उन स्पर्शों की याद भी नहीं है कि हाथ की कोमलतम रेखा में मैं कहाँ गुम हो जाता था. कभी साथ लायब्रेरी के किसी शेल्फ की धूल से उलझते. फिर..पता नहीं क्या..उस दिन ऑटो में मैं-तुम साथ थे..और वहां भी हम अकेले ही थे जब सीढ़ियों पर तुमने पूछा था, अब क्या करोगे..सिर्फ इतना बोल पाया था एमए. बोलना तो कुछ और भी था पर छिपा लिया..

कैसे कहता तुम्हारे साथ हो जाना चाहता हूँ..उतना ही तुम्हारे पास चले आना चाहता हूँ जितने पास हमारे रोल नंबर थे. मेरा एक-तुम्हारा दो. पर नही ऐसा कुछ भी नहीं हुआ. उस आखिरी दिन भी नही जिस दिन अपनी सारी उर्जाओं को समेट बस बोल देना था. नही बोला कुछ भी. बस लाल साड़ी में तुम्हे देखता रहा..

पता नही कैसे तुम्हारे पास  मेरे घर का नंबर रह गया..उस इतवार दूरदर्शन पर आलोक नाथ वाला तलाश आरहा था और नीम का पेड़ अगला था..घड़ी शायद सवा तीन बजा रही थी. उधर से न सही मेरी तरह से औपचारिकता थोड़ी-थोड़ी बनी रही ही, तभी नयी सड़क साथ चलने को किसी तरह टाल गया था. एक दिन फिर तुमने फोन किया के मैं भी एमए फिलोसफी में आ जाऊं..पर इस बार भी नही..हमें तो हिंदी में झंडे गाढ़ने थे..तुम फिलोसोफी में चली गयी, मैं यहीं रह गया..

आज पता नही ये सब क्यों लिख रहा हूँ..मुझमे इतनी हिम्मत नही थी कि तुम्हे सब कह जाऊं..अपने तर्क खुद गढ़े थे कि जब अपने पैरों पर नही खड़े हो जाते तब तक कुछ नही..कितना झूठ था ये सब..आज भले इसमें पुरुषसत्तात्मक व्याख्या निकलती हों, पर तब का सच यही था. कमज़ोर नायकों में एक और..इस एक कमरे की संरचना में कहाँ अटती तुम..आज तो हमारे लिए खुद यहाँ जगह कम होती जा रही है..उसके इर्द-गिर्द टापूनुमा अखबारों-किताबों के पहाड़ों के साथ सास-ससुर-देवर-नन्द की खटर-पटर..

तुमसे न कहना न बोल पाना अन्दर ही अन्दर घुटते रहना..चहरे पर उन दिनों बथुए की तरह उग आई दाढ़ी आज मुकम्मल लहलहाती फसल में बदल गयी है.. चिड़चिड़ाहट तो गुस्से के साथ मानो मुफ्त गले पड़ गयी थी..सामजिक होना क्या होता है भूलता जा रहा था. अपने विस्तार को बाहर नही अन्दर की दिशा में केन्द्रित कर अपने बिलकुल उलट मैं खुद को बनाता गया..नही लिखना चाहता कि अभी भी परसों जब फरीदाबाद तक मेट्रो के हो जानें की घोषणा करता सरकारी विज्ञापन देखा तो तुम्हारी याद आये बिना नही रही..वो तो मैंने उन मुलाकातों को भी सोच लिया था जिनमे हम दोनों चांदनी चौक घूम रहे हैं और वापसी में ओखला स्टेशन के उस बेंच पर बैठे ट्रेन का इंतज़ार कर रहे होते..पर ऐसा कुछ हुआ नहीं..

उस दिन संजीव सर से कॉलेज मिलने गया था तो मैम मिलीं और तुम्हारी बात होने लगी..तुमने एमए छोड़ने से पहले उन्हें नहीं बताया, उन्हें अच्छा नहीं लगा और एक हद तक मुझे भी के जब उन्होंने तुम्हे मास्टर्स के बाद कॉलेज में एडहोक लगवाने की बात कही थी तो..कुछ नहीं..अब फरक भी क्या पड़ता है..कभी लगता है ठीक  ही हुआ तुम्हे कुछ नहीं बोला..पता नहीं ऐसा क्यों..उस आखिरी मुलाक़ात में तुम्हारी आँखें और उसके नीचे पड़े काले धब्बे तुम्हारी देह को देख रंग दे बसंती की किरण खेर याद हो आती है जो वहां सोहा के लिए कहती है, कुछ खा भी लिया कर, कोख में बच्चा कैसे पालेगी..पता नहीं उस दिन से पहले तुम इतनी कमज़ोर ही नहीं लगी थी..क्या तुम अब भी ऐसी हो..

आज लगता है उन सालों की चुप्पी कैसी अजीब सी थी..अपने से दूर चलते जाने की..भले उन दिनों खूब लिखा, पर उस आत्म केन्द्रित पाठों में मेरा प्रतिक्रियावादी अध्याय बोहेमियन जैसे लगते थे, पर बड़े कायदे के साथ..आज भी मैं यह सब तभी लिख पा रहा हूँ जब मुझे पता है तुम तक मेरी आवाज नहीं पहुंचेगी..तुम तो मेरी फेसबुक फ्रेंड लिस्ट में भी नहीं हो, ऑरकुट पर ज़माने पहले भेजी फ्रेंड रिक्वेस्ट तुमने कभी एक्सेप्ट ही नहीं की..वैसी भी कौन सा तुम मेरी तरह उसी अतीत में ऐसी मौके बे-मौके अटक जाती होगी..और न ही यह पहली बार है, उस सेल्फ प्रोफाइल में वहां ज्योति मैम ने भी तुम्हारे बारे में पढ़ा था..इन्ही पूर्वपीठीकाओं के साथ थोड़ा अपने पास पहुँचने की जद्दोजहद में बी.एड.में जूझता रहा..ख़तम होते-होते थोड़ा बहुत अपने को दुबारा पाने की तरफ चल पड़ा..

यही वो शुरुवात है जहाँ तुमने कहा था, हम एक दूसरे को जानते ही कितना हैं..

[जारी..के कभी कुछ लिखा तो..
आज साल भर से भी ज़्यादह अरसे बाद एक पोस्ट और जोड़े दे रहा हूँ। वहाँ जाने के लिए इसे चटकाएँ ]

आवाज़ें..

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