मई 26, 2012

तारें जिनमे आग नहीं लगती

अभी कल शाम जब गोल मार्केट एक चिट्ठी स्पीड पोस्ट करने गया तो देखा वहां बत्ती नहीं थी. बत्ती गाँव की ढबरियों में होती थी, यहाँ उसे बिजली कहते हैं. और शहर की नगरीय गतिकी में बिजली पानी से बने या नाभिकीय उर्जा से यहाँ के उपभोक्ता तंत्र को बिजली चाहिए. उन सारे भौतिकतावादी उपकरणों का आधार और ज़रूरत बना दी गयी प्रणाली की प्राणवायु. वहां वजन करने वाली मशीन भी तभी काम करेगी जब लाइट होगी. जो पर्ची लिफाफे पर लगानी थी उसे भी पहले कंप्यूटर मशीन की ज़रूरत थी. फिर बारकोड भरने पढ़ने के लिए दूसरे की.

पूरी प्रक्रिया इतनी यांत्रिक है जिसमे मनुष्य ने अपनी भूमिकाएँ तकनीक के सुपुर्द कर अपना अवमूल्यन कर लिया है. कईयों को यह प्रगति का सूचक लगता होगा और किन्ही के लिए हमारे लगातार अमानवीय होते चले जाने को एहसास से भर देता होगा. हमारी निर्भरता ऐसे तंत्र पर है जिसकी उत्पादन प्रणाली उन साम्राज्यवादी राष्ट्रों को अपने नव उपनिवेश बनाने में मददगार होगी.

तेल को लेकर उन देशों की बेचैनी ऊपर से लोकतंत्र स्थापित करने का मुलम्मा चढ़ा मुखौटा. किसी से छिपा नहीं है उन सारे विद्रोहों को दिए जाने वाली मौद्रिक सहायता से लेकर हथियार मुहैया करने तक की जो प्रक्रिया है वह अफगानिस्तान में नेतृत्व की ऐवजी व्यवस्थाओं की तरफ जाती हैं. जहाँ 'नाटो' अभी मौजूद है फिर भी इतने बड़े हमले होते हैं वहां उन राष्ट्रों के न रहने पर स्थितियां और बदतर होती जाएँगी. तब किसी रूस को वहां घुसपैठ कर अपना आधार बनाने के मौके मिलेंगे. हम तक ईरान से आज तक गैस पाइप लाइन नहीं पहुँच पाई है जबकि उसके बाद हुए परमाणु समझौते के तहत उन संयंत्रों को स्थापित किया जा रहा है जिनका स्वयं उन राष्ट्रों में परिक्षण नहीं किया गया है या ऐसे संयंत्र वहां बंद किये जा चुके हैं.

इस स्थिति में जब यहाँ दिल्ली की डाकघरनुमा इमारतों में इनवर्टर तक नहीं हैं वहां उन दूरदराज़ के इलाकों में इन सारी व्यवस्थाओं के सिर्फ सपने ही बुने जा सकते हैं. उधर तो बस थूक लगी टिकटें होंगी किसी माधव की हाथ की लिखाई और पोस्टकार्ड तब पहुंचेगा जब बरही को तीन दिन और बीत जायेंगे. सीधी सरल बात यही है की इस समय जब हमारी प्राथमिकतायें देश के आधारभूत ढांचे में सबसे पहले उस आम जन के जीवन को जीने लायक बनाये रखने की होनी चाहिए. जबकि यहाँ सुविधासंपन्न वर्ग बना रही है और लगातार दूसरे की कीमत पर उसे पाला पोसा जा रहा है. फिर जब सरकारी शब्दावली में हथियार उठा हिंसात्मक क्रियाओं में लगातार संलिप्त होता है, तब 'ऑप्रेशन ग्रीन हंट' चलाये जाते हैं, 'सलवा जुडूम' गढ़े जाते हैं.

इस बिंदू पर आकर हमें यह सोचना होगा की हमारी प्राथमिकतायें क्या हों? उन परमाणु संयंत्रों के विरोध में खड़े लोगों के आन्दोलन के पीछे विदेशी पूंजी की कॉर्पोरेट व्याख्या या विदेशी पर्यटकों के नृतत्वशास्त्रीय पर्यटन यात्राओं को उन लोगों के जीवन में हस्तक्षेप को प्रत्यक्ष विदेशी निवेश मान वहां से उगे पैसे का इस्तेमाल टेट्रा ट्रकों की दलाली में करना.

विद्युत ऊर्जा सिर्फ सामने प्रत्यक्ष उत्पाद नहीं. वह उस लम्बी नव साम्राज्यवादी विस्तारण योजना में एक ऐसा औज़ार है जिसमें उनके द्वारा बनाया गया हर उपकरण हमारे घरों में बिजली के बोर्ड ही ढूंढेगा. और उनमे लगी तार हवेल्स की ही हो क्योंकि विज्ञापन कहता है, 'वायर्स दैट डोंट कैच फायर'. और सरकारों को बिजली अधिकारों का निजीकरण करने का अवसर सुलभता से मिलजाया करेगा जहाँ फिर शुरू होगा पूंजी का खेल. मुनाफे की बन्दरबाँट!!

{ये पोस्ट 'जनसत्ता ' में कल 'रोशनी का अँधेरा ' नाम से आई है..वहाँ पढने के लिए इस लिंक को चटकाएँ..}

मई 13, 2012

मछलियाँ छटपटाहट ज़िन्दगी और आंसू

गाड़ी चले जा रही है. सड़क पर. आगे दो लोग बैठे हैं. एक चला रहा है. सामने देख रहा है. दूसरा कभी बाएं खिड़की के बाहर देखता कभी पीछे रक्खे गमलों की खटर-पटर सुन रहा है. छत पर लड़कों की पलटन है और उनका अपना ही शोर उस गाड़ी के साथ दौड़ रहा था. तभी अचानक ब्रेक लगता है और पहिये रुक जाते हैं. गाड़ी पंचर नहीं हुई है, पर आगे की सड़क ऐसी नहीं है के उसपर चला जा सके. कम से कम उसको तो कभी नहीं रपटाया जा सकता जिस पर गमले लदें हों और उनके टूट जाने का डर भी हो.

यहीं से देखना शुरू किया था और थोड़ी देर में लगा जैसे उस आदमी से पहले मिल चुका हूँ. जो गाड़ी नहीं चला रहा था. थोड़ा रुका ध्यान से उसके चहरे को देखा तो याद आया, अरे..यही तो है वो, जो अपनी मोटर सायकिल पर लोगों को छोड़ता था..!! फिल्म भी वही थी. बस थोड़ी आगे जान पड़ रही थी.

तो पीछे उस गाड़ी में पटरों पर गमले रखे थे. तिमंजिला इमारत की तरह. बिलकुल वैसे ही जैसे कभी अपने यहाँ गैस सिलेंडरों को ढ़ोते टेम्पो नज़र आ जाते हैं. गाडी रुकते ही बिजली के करंट की तरह बच्चों का खून दौड़ने लगा. काम आपस में बँट गया था. एक उन तख्तों के बीच छूटी रह गयी जगह में घुस कर अन्दर के जाकर गमले निकाल रहा था. दो-तीन ऊपर से नीचे उतार रहे थे और बाकी लड़के भाग-भाग कर छोटे-छोटे गमलों को पंहुचा कर वापस आ रहे थे. गमले पास ही किसी नर्सरी के ही थे. उनके काम में एक अजीब किसम की तेज़ी थी. जल्दी से ज़ल्दी उस गाड़ी को खाली कर देने की बेचैनी जैसे. अभी इसे ही समझ पाता कि किसी लड़के के कान में पानी बहने की आवाज़ सुनाई दी. उन्होंने देखा जिस ड्रम के पानी में मछलियां थी, उसमे एक छोटा सा छेद हो गया है.

पर इसे निकाले कैसे. वो तो सबसे नीचे, उन कतारों के पीछे रखा हुआ है. पहले सारे गमले निकलेंगे फिर ये ड्रम. पानी ख़तम होने से पहले उसका निकाला जाना ज़रूरी था. पर वहां तक पहुँचने के रस्ते में गमले पड़े हैं और वो तिमंजिला इमारत. बस अब तो उन मछलियों को निकाल कर ही रहेंगे. वही पौधों के गमले जिन्हें तरतीब से उतार रख रहे थे अब उनकी नज़र में वह सब रुकावट थे. वही लकड़ी का पुल जिसके पार जिंदगी दौड़ कर पहुच गयी थी और इन्हें भी वही पहुँचने की ज़ल्दी थी. दन्न से लड़के ऊपर चढ़े और दमादम गमले नीचे फेंकने लगे.

इसी में उसकी बैसाखी भी थी जो अभी भी गाड़ी में बैठा इंतज़ार कर रहा था. एक अर्थ में यहाँ सामान उतार उन्हें आगे भी जाना है इसका संकेत. पर अचानक आ गए इस ज़लजले में उसे गाड़ी का दरवाजा खोल बाहर आने का मौका भी नहीं मिला. वो चिल्लाता भी है निकलने की कोशिश भी करता है. सब बेकार. ड्रम इतना भारी है कि छह लडको की पकड़ उसे नीचे उतारती है. नीचे आते ही छेहों भागते है. पर पता नहीं कैसे उनके हाथों से फिसल जाता है और अब ड्रम कि सारी मछलियां पानी के साथ ज़मीन पर हैं. छटपटा रही हैं. दृश्य धीमा हो जाता है. गति रुक जाती है. उन क्षणों में जीवन के लिए उनका संघर्ष निरर्थक लगता है. वहां साँसों के धडकती आवाजें थी आँखें उस सपने को छटपटाता देख रही हैं. उछलती फुदकती बस जी लेना चाहती हैं. ऐसे ही धीरे धीरे जिंदगी ख़तम होती रहती हमारे सामने.

सीन तब तक स्लो मोशन में रहता है जब, उन मरती मछलियों में से एक, उस पास बहती नहर की नाली में, अपनी जिंदगी को ढूंढ़ उसमे शब्दशः छलांग लगा देती है. उसे पता है ज़िन्दगी कहाँ उसका इंतज़ार कर रही है. उस घुटन, कम होती साँसों का डर, जीने की ललक फिर पानी की तरफ ले जाती है. एक बार फिर हरकत होती है. पर हरारत महसूस की उन बच्चों ने. तेज़ी से सब भागते हैं और उस बह गयी मछली को पकड़ लेना चाहते हैं. ये आते-जाते भाव उस छोटी सी दरम्यानी में कई बार ऊपर नीचे होते हैरान परेशान हैं. कुछ समझ नहीं आता ये क्या है.

किसी के चहरे पर कोई जवाब नहीं है बस आँखे अन्दर तक धंस सवाल पूछ रही हैं. उन सबने मिलकर फैसला ज़िन्दगी की तरफ किया. भारी दिलों में छटपटाती धडकनों के बीच जो आवाज थी उसे सबने सुना. आँखों में आंसू थे और हाथ सारी मछलियों को ज़मीन पर सरका उस नहर में डाल रहे थे. बस अब उनमे से एक के  हाथ में एक थैली है और उसमे एक बचा ली गयी मछली भी है. गाड़ी अब भी भागी जा रही है पर सब शांत हैं. उन सब पर सोच रही हैं जो अभी बिता और उन सबमें वह आदमी भी है जिसकी टांग टूटी हुई है.. 

[ पीछे का थोडा हिस्सा यहाँ है..]

मई 09, 2012

उसका नाम भी था. ललमुनिया.

सुबह का सहज पाठ. कोई नहीं सोचता कि मच्छर को भी गर्मी लगती है तभी मौसम गरम होने के साथ ही उसकी क्रियाएं आत्मघाती हो हमें काटने लगती हैं. वरना ठण्ड में तो बेचारा अपनी चोंच चुभाते भी नही हैं. किसी कोने में पड़े रहते हैं. दुबके. पर इन बड़ी बड़ी कंपनियों ने उसकी तरह तरह से हत्या करने के उपाय सुझाए हैं. ऑल आउट लगा लो कछुए का धुंआ फेफड़ों के लिए अच्छा नहीं. ओडोमॉस से तो आसपास फटकने भी नहीं पाते. मच्छर भी इंसान भी.

चांदनी चौक भागीरथ प्लेस बिजली मार्केट में लॉन टेनिस के रैकेट की तर्ज़ पर बिजली से रिचार्ज ही जाने वाला यंत्र मिलता है. हमने यहाँ से नहीं ख़रीदा. उस दिन सैक्टर सत्रह चंडीगढ़ भूमिगत पैदल पार पथ माने कि सबवे में छोटी सी दूकान से लेते आये थे. बटन दबाओ और उसकी ज़द में आया कोई भी नहीं बचेगा.

इसे उन बड़ी कंपनियों ने हाथ भी नहीं लगाया है अब तक. वर्गीय उपभोक्ता ढूंढ़ रहे होंगे. या शायद हथेली के बीचों बीच धराशायी होते मच्छरों को मारने में ऐसा हत्याबोध अन्दर तक नहीं भरता जैसा कि आँखों के सामने इसकी चपेट में आया वो बेचारा हवा में ही चटचटा कर मुर्गा छाप पटाखे की तरह धुंआ बन जाता है. भले उन चमचमाते शीशे लगे दरवाज़े वाले होटल रेस्तेरां नीली बत्ती मशीन किसी कोने में रखी रहती है और मक्खियाँ सम्मोहित हो उसके पास जाते ही वीरगति को प्राप्त होती हैंपर उस मृत्यु में हमारा अवलोकन स्थल इतना पास कभी नहीं होता. कभी तहलका में इसी मक्खीय भाव पर कोई कहानी पढ़ी थी. उसका नाम भी था. ललमुनिया.

मच्छरदानियों के अहिंसात्मक मार्ग से निकल हम इस तरफ भी चल पड़े. आज का सच यही है के उन औद्योगिक नगरों के बगल से बहते नालों गंधाती-उबलती नालियों ने हमें मक्खी मच्छर ही दिये हैं. रोटी तो मिली नहीं. जो भी दिहाड़ी पगार मिली, उसका बंधा बंधाया नुक्कड़ वाले झोला छाप डॉक्टर को जाता रहा और जिनकी जेब में जेब से बड़े नोटों की गड्डियाँ थीं उन्होंने या तो खिड़कियाँ अँधेरा होते बंद कर लीं, ऑल आउट रेपेल्लेंट का पवार स्लाइडर लगाया और चैन से सो गए या फिर उस खेलगाँव में बोली लगा सबसे ऊपर की मंजिल ले लेना चाहते हैं जहाँ से यमुना की बदबू उनकी नाकों तक न पहुँच सके, जिसमे उनकी फैक्ट्री का नाला खुलता है..एक अर्थ में उन अमानवीय परिस्थितियों में रहने की विवशता से लेकर दवाइयों की बड़ी दुकानों का खेल इन गाद वाली नालियों के इर्दगिर्द ही खेला जाता है, जहाँ पूंजी अपना चक्र पूरा कर वापस उन इज़ारेदार लोगों तक पहुँच जाती है.

खैर, आजकल मौसम थोड़ा ठीक है. मच्छर अपने घरों में परिवार के साथ कुशल मंगल से होंगे. चैन की नींद ली होगी. अपनी चोंच पैनी कर रहे होंगे. शायद इनके यहाँ भी हमारी तरह कोई डायलॉग प्रसिद्ध होगा, 'दो आँख के मैं तेरा खून पी जाऊंगा..!!' ऐसा इसलिए भी कहा जा सकता है क्योंकि कान के पास सुई चुभोते अपनी ज़िन्दगी पंखों पर लिए डोलते वक़्त भी ये सब कई-कई राग भिनभिनाते रहते है. इनके यहाँ भी इधर 'मच्छर आइडल' के विज्ञापन दिखाए जा रहे होंगे. बस अगली बार इत्ता ध्यान रक्खें के उसे दोनों हथेलियों के बीच चपटा करने से पहले पूछ लें के कहीं अपने परिवार में खून चूसने वाला वो अकेला तो नहीं..!!

{कहानी 'ललमुनिया' को गूगल पर सर्च करने पर अभी टकरा गयी ..कहानी है उमाशंकर चौधरी की ललमुनिया मक्खी की छोटी सी कहानी. लिंक तहलका का है.}

मई 05, 2012

प्रेमकथा में असहजता का आलोचनात्मक अध्ययन

अभी लगा एक कमज़ोर दिन चुना. उसकी एक मुकम्मल हाँ-न सुनने के लिए मौके भी नही दिए. पता नही क्यों लग रहा है बस चीजों को बनाने के बजाये उनके अस्तिपंजर को तोड़ मरोड़ जटिल बना लेना खटक रहा है, जहाँ से निकल भी नहीं पाता. एक लड़की है जिसके मन में कुछ होगा भी तो उसे प्रकट करने के सारे रास्ते इतने संकरे कर दिए कि उस डूबते सूरज पर पुलिया पर आ ही न सके-न पाए. आज भी उस आखिरी शाम वहां कैंटीन की तरफ खड़े होकर बराबर गेट की तरफ देखना समझ नहीं पाया हूँ. न यह समझ पाया के उस रात तुमसे न बात कर उससे क्यों की. फिर जब उस मई अचानक हो गयी बरसात में गोल मार्केट के बस स्टैंड पर रुक गया था तो फोन क्यों किया. बात हुई पर वो नहीं जो चाह रहा था.. तुम बाहर थी कहीं किसी कार्यक्रम में.

शायद जितनी तेज़ी से उस तरफ बढ़ना था उतनी ही धीमी रफ्तार में खुद को घसिटना चुना. अब अगर वह अपने को विशुद्ध भारतीय सिनेमा वाली प्रियसी मानती है, जिसे मनाने के लिए तरह-तरह से कोशिश करूँगा, घुटने के बल मुंह-दांत के बीच गुलाब जैसे किसी फूल के साथ उसकी हाँ सुनने के लिए बेताब हो उठूँगा, तो ऐसा सपने में भले हो जाए असलियत में प़ता नहीं होता भी है कि नहीं..पता नहीं..अपने को उस प्र-स्थिति में स्थित ही नहीं कर पाता. या यह मेरी ज़िद, के अब कुछ नही. उसने अपनी तरफ से क्योंकर कुछ नही किया. तो मुझे समझना होगा यहाँ की लडकियां अपने दिल में कुछ भी रखें, सामने लाती नही हैं. उनकी तहों में इंतज़ार की मोटी परत भी होती है. अब इससे जयादा वो क्या पूछे के इन परीक्षाओं के बाद आगे क्या करोगे??

फिर एक ऐसे बिंदु पर भी आता हूँ जहाँ सारा लिखा बेकार बे-बुनियाद लगने लगता है. क्योंकि. सिर्फ मुझे लगता है, इसलिए, उसे मान लिया जाए? यह कहानी ठीक-ठीक लड़के-लड़की की भी हो सकती थी. इस तरह लड़खड़ाती नही. जिसमे लगातार कोशिशें होती रहनी चाहिए थीं. उन ऊलजलूल समाजशास्त्रीय मनोविश्लेषणात्मक जटिलताओं के लिए अवकाश के बजाये अपने को संजीदा बना सामने रखना था. सिर्फ एक बार बोल देने और उधर से जवाबनुमा कुछ आने की दरमियानी में उन दिल की धडकनों के बीच नरम कोनों में अपनी जगह बनानी थी. उसमे इतने नुक्ते-लेकिन-किन्तु-परन्तु जैसी क्लिष्टताओं को शुरू से गायब कर आगे बढ़ना था. पर यहाँ तो पहला कदम रक्खा नही गया, वह आलोचनात्मक प्रेमकथा में अपनी भूमिका का स्पष्टीकरण जैसा कारण बताओ नोटिस बन गया. आज भी है.

उस तरफ से कोई बात आये इसके लिए किया ही कुछ नही, तो अब कोई परिस्तान से जादू तिलिस्म तो बन नही जाने वाला है. जहाँ दमाग में खयाल आया और अगले ही पल उसके साथ कई पहर अकेले मिल जाएं. जहाँ सिर्फ हम दोनों हों. अगर तुम सोचते हो जिसके साथ ज़िन्दगी की कई बरसातें भीगते हुए गुजारनी हैं उससे सीधे बोल भी नहीं सकते. फिर वह चाह कर भी कैसे अपना दिल खोल कर रख दे. के अपने मुताबिक़ जो सबसे मुफीद जवाब हो उसे उठा जेब में रुमाल के साथ रख चलते बनो. के कल फिर मिलेंगे.

इधर इस तरह मर्सिया पढ़ने की कोशिशें और भी तेज़ हो सकती हैं जैसे-जैसे मैं अपने दिल के दरवाजों पर उन सबको पाऊं. जिनमे तुम सबसे पास खड़ी हो. बैठ भी गयी हो तो नज़र नहीं आई अभी तक. बस यही मलाल जैसी कोई मासूम तस्वीर और उस हाथ की छुअन के छोटे स्पंदन रहेंगे जो बार-बार पास लायेंगे. और हर बार भाग लेना चाहूँगा. क्योंकि उस सपाटबयानी का कभी मौका बनाया ही नहीं जहाँ पूछ सकूँ और इत्मीनान की घड़ियाँ रुक सी जाएँ. यह किसी कमज़ोर से देवदास की रूपक कथा नहीं है. अगर इतने एकान्तिक क्षण बातें मुलाकातें होती तो उसकी तरह मरने से अच्छा होता उस चंद्रमुखी-पारो टाईप किसी के साथ ज़िन्दगी का बुढ़ापा बिताना.

पर समझ नहीं आ रहा अपने को कहाँ रखूं. कोई कोशिश नहीं हो पायी. बस एक काम किया. पन्ने रंगे. जितनी देर ये सब किया उतनी दरमियानी उसके साथ बना पाता तो कहानी शायद कुछ और होती. इस फ़रवरी से पहले तक उसे किसी बंद गली के कमरे में कुण्डी लगा बिठा चुका था. पता नहीं कैसे किवाड़ खुल गया और अब तुम द्वारे ठाड़ हो. सबसे बड़ी दिक्कत यही हुई के तुम्हारे हिस्से का दिल दिमाग खुद लगा और उन सारे संभावित जवाबों को खोज लाया जो तब मुझे चाहिए थे. सीधी बात न करो तो कम से कम ऐसी उल ज़लूल खुराफातें भी नहीं करनी चाहियें. पर नहीं हमीं ने तो ठेका ले रखा है इन सारे कामों का.

अभी भी तुमसे बात नहीं की है. बस रह-रह उन स्थितियों को टाल रहा हूँ जिनके सामने आने से पहले ही भाग लेना चाहता हूँ. उतनी टेढ़ी-मेढ़ी मेढ़ पर कोई रास्ता खडंजा इतना सपाट नहीं होगा जिस पर चल सकूँ. उस जगह जहाँ तुम पायी जाती हो वहां बस यही हवा में है की देव पारो के इंतज़ार में है. ये वाली बात नहीं के दूर देस में लड़की वालों की तरफ से कथित अ-कथित दबाव भी लगातार आ जा रहे हैं. शायद जब पता चले तो जिस अनकहे धागे से हम अभी तक जुड़ें हैं वह भी टूट जाये. या प्रकारांतर से दूसरी तरह की घटाटोपिक परि-घटनाओं का गुंजलक सामने आये जो इधर की जटिल भाषिक संरचना जैसी ही हों. पर इसकी संभावना रिक्टर स्केल पर सबसे कम प्रभाव वाले भूकंप की तरह ही चाहता हूँ.

और यह आखिरी बात बता दूँ कि अभी भी इन सब में तुम्हारे वाले हिस्से या तो गायब हैं या कपोल कल्पना से बना गढ़ लिए गए हैं. अपने पास कच्ची  मिटटी का गड्ढा है, अपन उसी में बैठे रहते हैं. तो मतलब यह वैधानिक चेतावनी की तरह लिख मारूं कि यह कथा उस एकल चरित्र की मानसिक बुनावट का प्रतिफलन है जहाँ दूसरा पक्ष कभी अपनी भौतिक उपस्थिति में नहीं रहा और इसके साथ बनती बिगड़ती सारी अवस्थाओं घटनाओं का किसी मृत व्यक्ति से कोई सम्बन्ध नही है. और चेतावनी जैसा हिस्सा उसमे यह है कि भइये अगर कोई लड़की पसंद हो तो सीधे उमेश की दूकान से गुलाब का फूल खरीदो और फ़रवरी चौदह के इंतज़ार में पतराने से अच्छा है किसी रूमानी सुबह शाम चुन उसे इत्मिनान से सब कह डालो. कुछ भी दिल की किसी कोठरी में बंद नही. काबिल बनो अपनी कहने के, उसकी सुनने के. नही तो बकौल बाबा आलोक उम्र में छेह-सात साल छोटी बीवी के चार-छह बच्चे ललमुनिया मक्खी की तरह इर्दगिर्द भिनभिनायेंगे.

मई 02, 2012

आमिर खान की सुबह और हमारी नींद

जैसे टाटा की कड़क चाय जगाती थी अब आमिर खान हर इतवार नींद से उठाने आ रहे हैं. आँख भले खुल जाये पर दिमाग के दरीचों में जो दीमक लगें हैं उसके प्रति कुछ जिम्मेदारी भरा काम अब इनके कन्धों पर है. है क्या इन्होने खुद ही ले लिया. धोबी घाट वाली माथे की शिकन दुबारा उनकी भौहों के ऊपर मौजूद है. प्रसारित होते विज्ञापन कुछ ऐसा माहौल बना रहे है जैसे के अब कुछ ऐसा हो जाने वाला है जो अब तक नहीं हुआ था. गांधी ने तब भारत को जानना चाह था, ये अलग तरीके से कैमरे-पटकथा-संवादों की मौजूदगी में सदी के खोये-सोये भारत की खोज करने जा रहे हैं.

याद न हो तो लोकपाल बिल के अन्ना से पहले सरदार सरोवर बाँध की मेधा पाटकर के साथ इनको पीछे देखा जा सकता है. सरोकार से कोई आज का नाता नहीं है. फ़ना के ज़माने से है. वे देशवासियों से विदेशी मुद्रा साथ लाते पर्यटक अतिथियों को देवतुल्य मानने का आग्रह भी करते रहे हैं. असल में आमिर खुद को अभिनेता ही नहीं समझते अपनी छवि की सार्वजानिक उपस्थिति में वे उतना ही आम हो जाना चाहते हैं जितनी भारतीय सड़कों पर मौजूद मारुती की गाड़ियाँ और पहियों के नीचे उड़ती धूल.

इस कार्यक्रम के प्रायोजन अधिकार सोलह से बीस करोड़ के बीच में बिकें हैं. वहीँ स्टार ने अपने विज्ञापन दाताओं को आश्वस्त भी किया है के उनके प्रतिस्पर्धी ब्रांड को कोई स्लॉट नहीं दिया जायेगा. आमिर ने स्वयं कई कंपनियों के विपणन व्यवस्थापकों से आग्रह किया है कि वे इस कार्यक्रम के बीच समय न खरीदें ताकि इसका प्रभाव कम न हो जाए. इस प्रभाव के लिए निर्माताओं ने सवा छह करोड़ में कुल सत्ताईस घंटों के दो हज़ार स्लॉट्स बुक किये हैं. यह अब तक किसी टेलीविजन कार्यक्रम के लिए किया गया सर्वाधिक व्यय वाला प्रमोशनल कैम्पेन है, जिसमें भारत भर के तीन सौ सिनेमा घरों में राष्ट्रगान के बाद इसके प्रसारित प्रोमो भी शामिल हैं.

इस सारी हेरफेर का लब्बोलुआब यही है के छह मई से प्रसारित वाला सत्मेव जयते इस अभिनेता की सार्वजनिक चरित्र में उस अधिनायकवादी बाज़ार के लिए ब्रांडिंग का हिस्सा भर होगी जहाँ उसकी इस छोटे परदे की सर्वप्रियता को बहुराष्ट्रीय कम्पनियां विज्ञापन में इस किरदार को लेकर मुनाफा काटेंगी. मतलब सरोकार- जन के साथ- संवेदनशीलता सिर्फ परदे पर लगान के क्रिकेट मैच में छक्के लगाने तक ही है. उस उत्पीड़न के कुचक्र में संसाधनों पर कब्जों-विस्थापन- अघोषित युद्ध जैसी स्थितियों से इन्हें क्या लेना देना. वर्ना कुओं से ठंडा मतलब कोकाकोला निकालते विज्ञापन के ज़माने से नहीं पता था कि जहाँ-जहाँ इन बहुराष्ट्रीय कंपनियों के उपक्रम स्थापित हैं वहाँ-वहाँ भूमिगत जल का स्तर इतना भी नहीं रहा के कुएं जीवित रह सकें. जब सुनीता नारायण इन पेय पदार्थों में कीटनाशक होने और सुरक्षा मानकों को लेकर जब अपनी बात कह रहीं थी तब इनके कान में क्या समस्या थीं. बस चुपके से उन विज्ञापनों में अपने भांजे को स्थापित कर दिया.

इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि राष्ट्र नामक अस्मिता संकुल से एकत्र सांस्कृतिक-सामजिक पूंजी का प्रयोग उन उन्मादी राष्ट्रवादी सत्ताओं के पक्ष में नहीं होगा, जो उस लोकप्रियता का रूपांतरण कर इस पात्र को अपने हित के लिए प्रयुक्त करेंगी. सीधे सरल शब्दों में यह कोई पुरानी बात नहीं है कि उसी ग्यारह बजे इतवारी सुबहों को दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाले धार्मिक मिथकीय कार्यक्रमों के दैवीय चरित्रों को पार्टी विशेष ने अपनी टिकट पर संसद पहुँचाया. इधर सचिन रेखा के साथ कॉंग्रेस के मनोनीत सदस्य बन राज्य सभा की तय्यारी में हैं, जिनके सौ अंतर्राष्ट्रीय शतकों पर एंटीलिया के अम्बानी ने एक शानदार सामंती किस्म का आयोजन किया था जिसमे लता जी सचिन से बाल ठाकरे के यहाँ हुई अपनी पहली मुलाक़ात का ज़िक्र करती हैं और आग्रह पर गीत भी गाती हैं. मतलब यह मराठी माणूस से लेकर पूंजीपति के राजनीतिक हितो की टकराहट का समय नहीं उनके समायोजन का दुरभिसंधि काल है, जिसमे मिस्टर परफेक्शनिस्ट की पारी की शुरुआत होने जा रही है.

{यह पोस्ट आज 'जनसत्ता ' में 'अगली पारी '  शीर्षक के साथ आई है वहां पढने के लिए यहाँ चटकाएं.}

आवाज़ें..

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