जून 10, 2012

सिनेमाघर वाया शहर दिल्ली जिला बहराइच

जल्दबाजी में डेढ़ दो हफ्ते पहले लिखी थी, डैशबोर्ड से सीधे पोस्ट कर रहा हूँ, बस तस्वीर लगा दी है..

पता नहीं बात कब की है पर दूरदर्शन पर शुक्रवार-शनिवार रात आती अमिताभ की सारी फिल्में हफ्ते-दर- हफ्ते एक सिरे से देख डाली। अकेले मैं ही टेलीविजन के सामने बैठा रहता था। आवाज कम करके। बाकी सब सो रहे होते थे न। इन्हीं दिनों हमारी स्कूल बस सड़क पार आती। हमें जाना तो मंदिर मार्ग से सिर्फ झण्डेवालान था, पर बस का चक्कर अभी शुरू ही होता था। फिर होता ये था कि हमें उसमें सीट कभी नहीं मिली। पूरे रस्ते खड़े रहते। शंकर रोड़ के रिज और गिद्ध सबसे पहले वहीं देखे थे। पटेल नगर में कहीं ‘विवेक’ पड़ता था और राजेन्द्र प्लेस जहां आज मैट्रो स्टेशन बन गया हैा वहां ‘रचना’ था।  इन सिनेमाघरों के बंद होने का तो नहीं पर स्कूल के पास ‘नाज’ के बंद होने का कारण कई सालों तक इसे ही मानते रहे कि जरूर हमारे स्कूल के बच्चें वहां फिल्म देखते हुए पकड़े गए होंगे। तब नहीं पता था कि इसे दिल्ली के एक कोने में पहला मल्टीप्लेक्स ‘पीवीआर अनुपम’ खुल चुका है।

उन्हीं दिनों की बात है जब ‘जुरासिक पार्क’ फिल्म आने के बाद पैंसिल बॉक्स, जूते,  बैग से लेकर सब जगह डायनासौर छाए हुए थे। शायद 'फिक्की म्यूजियम' या 'अप्पूघर' में इनके चलती फिरती नकलें भी लगाई थी, हम जा नहीं पाए थे। पर फिल्म हम सबने ‘शीला’ पर जरूर देखी थी। इतने बड़े परदे पर हमारी छोटी-छोटी आंखें। 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे' शायद ‘संगम’ में देखी थी, आर के पुरम जाकर। और ‘बोम्बे’ या क्रांतीवीर ‘प्लाजा’ में, तब उसके नाम के आगे पीवीआर नहीं जुड़ा था।‘बोम्बे’ हिन्दी में डब थी और फिल्म बंद करने की जिद कौन, क्यों कर रहे थे इससे भी हमारा कोई परिचय नहीं था। मतलब हम सपरिवार इन सिनेमाघरों के बहाने दिल्ली की सैर पर निकलते थे ।

हमने सी डी प्लेयर से पहली फिल्म गांव में देखी थी। बत्ती हफ्ते-हफ्ते की पाली में दिन रात करके आती। आज भी आती है एक-एक करके। जब भी रात का हफ्ता होता हम दस बजने का इंतजार करते और डेढ़-दो बजे तक लगातार बारी-बारी फिल्में लगाते जाते देखते जाते। दिन वाले हफ्ते में पिक्चर भगा-भगा कर देखते। पर गाने पूरे सुनते थे। यह बहराइच का 'डायमण्ड' ही था जहां हमने शाहरूख को पहली बार बड़े परदे पर देखा। फिल्म थी 'मैं हूँ न'।ऋतिक रोशन की ‘कहो न प्यार है’ भी दो बार वहीँ देखी। 'ओंकार टौकिज़' से नई फिल्म की सीडी तो मिलती पर 'परदा प्रिंट' होती। मतलब किसी सिनेमाहॉल में कैमरे से रेकोर्ड किया गया अवैध फिल्मांकन। आज 'डायमंड' और 'ओंकार' दोनों बंद हो चुके हैं. 'सिद्धनाथ' दिल्ली का पुराना 'रिवोली' बन गया है और भोजपुरी से लेकर नेपाली फिल्में भी कभी-कभी लगा देता है।

'कुमार पिक्चर पैलेस' हस्पताल रोड के पास कानूनगो पुरा में जब खुला तो जबरदस्त तामझाम के साथ। हर शुक्रवार नयी फिल्म लगती। रिक्शे पर दरगाह, छावनी चौराहा, डिगिहा चौराहा, गोलवा घाट, रोडवेज़ तक औरमपार फ़िल्म के बारे में भौपू पर मुनादी होती। अब भी होती है। दरगाह के पास, दाल मिल पर उस लम्बी चौड़ी दिवार पर इसी सिनेमाघर पर लगी फिल्म का सबसे बड़ा पोस्टर होता। पांच साल टेक्स फ्री का फायदा इसे हुआ वहीँ उस प्रतियोगिता में सब पिछड़ते चले गए।

'डायमंड' अब सभागार में बदल दिया गया है और शादी विवाह या किसी कार्यक्रम पर उसे किराए पर लिया जा सकता है। 'ओंकार' ताला बंद है. वो तो अब 'चित्रशाला' ने खुद को खड़ा कर लिया है और दुबारा खुलने पर सबसे पहली फिल्म 'मेरे बाप पहले आप' से दूसरी पार में है। अब यहाँ भी 'कुमार' की तरह कोई पान बीड़ी गुटखा लेकर अन्दर नहीं जा सकता। पॉपकॉर्न भी मिलने लगे हैं। यहाँ आज भी इंटरवल पर बोतलों पर ओपनर से निकलती आवाज़ सुनाई पड़ जाती है। यही कांच की ध्वनियाँ बड़े सालों बाद हजरतगंज के साहू में मिलीं. पता नहीं स्नेहा खानवलकर एम टीवी साउंड ट्रीपिन में यहाँ तक पहुंची हैं कि नही..

पर यह अजीब है कि पढ़ाई के तीन साल लगातार ‘पारस’ के इतना पास होने के बावजूद कोई फिल्म वहां देखने नहीं गए, वर्ना शुक्रवार की क्लासें वहीं लगती थीं। आज पारस भी बंद हो चुका है। 'सावित्री' दुबारा खुलता उससे पहले ही सड़कों पर गाड़ियों के दबाव ने उसे बंद ही रहने दिया। 'उपकार' में बोर्डर देखते हुए आग लग गयी. 'चाणक्य' को  एन. डी. एम. सी. तोड़ कर फिर खड़ा करेगी। प्रगति मैदान का 'शाकुंतलम' भी बंद हो गया।

मतलब दिल्ली में लगातार सिंगल स्क्रीन थियेटर बंद होने का जो सिलसिला 'जुबली' फव्वारा, 'रिट्ज़' कश्मीरी गेट, 'खन्ना' पहाड़गंज के दर्शकों के वर्ग चरित्र से शुरू हुआ था, वही प्रक्रिया, 'रिवोली' की तरह अपने नाम के आगे 'पीवीआर' और 'ओडियन' की तरह 'बिग सिनेमा' का बिल्ला जोड़ पाने की क्षमताओं से संपन्न नही हो पाए। 'रॉकस्टार' में चांदनी चौक का 'मोती' आता भी है तो उसे अपना नाम बदल कर 'अमर टौकिज़' करना पड़ता है। 'अभिषेक' मैक' डी के ऊपर है इसलिए वहां का दर्शक थोडा खुद को संभ्रांत समझने का भ्रम तो कर ही सकता है।

'शीला' इसलिए भी चल रहा है क्योंकि एक तो रेल्वे स्टेशन के पास होने से एक बंधा बंधाया दर्शक आता है और अपनी लेट हो चुकी ट्रेन का इंतज़ार वहीँ होता है। ऊपर से पहाड़गंज चूनामंडी का 'इम्पीरियल' किसी भी तरह से नयी आई फिल्म को लगाने की हालत में अब नही रहा। कई सिनेमा घर ऐसी भी हैं जो हमारी नज़रों से बचे हुए है। एक बार हम फतेहपुरी से बाएं होकर हौज़ क़ाज़ी की तरफ निकाल रहे थे कि गली चाबुक सवार के पास एक सिनेमा हॉल देखा था नाम था एक्स्सेलसिअर थियेटर..लाल कुँए के पास..

{जारी..}

आवाज़ें..

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