जुलाई 28, 2012

बीवी नौकरी विचारधारा और हलफनामा

इस पोस्ट का आगा पीछा..

मतलब अब उसकी खोज अपने चरम की तरफ जाने पर अमादा है. और किसी रोग की तरह या किसी शगल की माफिक उसमे घटा बढ़ा होती रहती है. सोचने समझने की चुकताई पर नही सोच रहा, तो इसके पीछे कारण है प्रतिबद्धता के छद्मावरण के फायदे. जिसमे विचारधारा विशेष आपको ऐनक देकर देखना ही सीमित नही करती आपको किनारे पहुंचा भी देती है. उसका काम आपमें रोजगारपरक संभावनाओं को देखना तलाशना और उस मुताबिक़ काम सुपुर्द करना भी है.

बस आपको अपने स्वांग का अभ्यास कुछ ज़यादा अच्छी तरह करना पड़ता है. बिना किसी रीटेक. 'साधारणीकरण' घटित हो जाने के बाद, 'विरेचन' स्वरुप पुरूस्कार देने का भी प्रावाधान है. उन्हें बस लगना चाहिए के आप संभावनाशील हैं जबकि अन्दर ही अन्दर पदानुक्रम में कई पायदानों की छलांग आप पहले ही मार चुके होंगे..


पर दिक्कत यही है कि दमड़ी न होने पर छद्म स्वांग ज़यादा देर उसे दिखा पाना संभव नही है. इसलिए हो सके तो चीख चिल्ला अपवाद बनो और उसके आँख की किरकिरी बन जाओ. विरोधाभासों का संतुलन वितंडावाद न बने उसकी सीमा के अतिक्रमण पर ठहरकर इंतज़ार करो. के अन्दर उठते उफनते ज्वर को शांत करता कोई 'रिलीफ पैकेज' आया ही समझो.


फिर विचारधारा एक अदद देह का जुगाड़ भी आसानी से कर देगी पर अन्दर का पुरुषसत्तात्मक चरित्र इतनी जल्दी बदल सक पायेगा इस पर थोड़ा संशय लगता है. उसके साथ हो जाने पर खतरा यह भी है कि सबसे निकट बिना दूरी के वही होगी. कपड़े-बिना कपड़े आपकी वास्तविकता की सबसे निकटतम साक्षी. इसलिए बाहर तो बघारा जा सकता है पर घर की चारदीवारी जंगे मैदान का शौक चर्राए तो इधर जाया जा सकता है. शौक से.


कभी इस पूरी प्रक्रिया में ब्रांड फैब इण्डिया मार्का बीवी ढूंढने की सोची थी पर खतरा जान परियोजना पर फिर कभी गौर नही किया. वर्ना सारे सिद्धांत- प्रमेयों की प्रयोगशालाओं में बिन दम का चूहा मेरी बगल में बैठा अपनी बारी का इंतज़ार कर रहा होता. रैडिकल जितना देखने में सुर्ख लगता है उतना अपनी ज़िन्दगी को लाल करने का पागलपन खुद में कभी नही था. शुक्र है दिमाग अभी भी काम कर लेता है. ठीक ठाक बहस कर कामचलाऊ बातें अभी भी उगल रहा है और किसी को क्या चाहिए??


इस सारे हलफनामे में जहाँ तक हो सका है किसी प्रपंच रचने से खुद को बचाए रखने की कोशिश की है. पर लिखने वाले हाथ और लिखवाने वाला दिमाग तो मेरा ही है न. इस नुक्ते पर यह भी ध्यान रक्खें की ऐसा लिख अपने को बचाने वाले इधर खूब सक्रीय हो गए हैं. हमारी दूकान का ठीहा कुछ ज़यादा ही नया लगे तो अपनी मठाधीशी आँखें और भेजा किसी नेत्रदान शिविर में दान कर यहाँ वापस आया जाये. फिर ऐसा तो है नही कि अपनी फांखों खांचों को बेतरतीब रख मैंने कुछ गुनाह जैसा कुफ्र किया किया है. मन कर रहा था..इसलिए लिख दिया..!!

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