अगस्त 24, 2012

इनमे कही गयी बातें मेरे लिए हैं ही नहीं

{जिस पुर्जे पर अरुण ने यह सब लिखा उस पर कोई तारीख नहीं है. बस अंदाज़े से कह सकते हैं साल रहा होगा दो हज़ार दस, महिना शायद पहला या दूसरा. तब हमारे इंटरनल्स चल रहे थे और पर्चे से एक दिन पहले यह लिखा गया. और नीचे का सैच्चिया माने मैं खुद..और बाकी तो सब है ही..तो नीचे है अरुण की पहली रचना..कोई बड़ी बात निकलना हमेशा ज़रूरी नहीं होता. या..या ये कि एक पढ़े लिखे ने लिखने की कोशिश की., यही सबसे बड़ी बात है..और सालगिरह मुबारक अरुण मियां..}

सैच्चिया ने लिखने को कहा और मेरे पीछे ही पड़ गया कि लिखकर ही कल कागज़ लेकर आना. पर समझ नहीं आ रहा कि क्या लिखूं.

मन कर रहा है कही घूम आऊं पर कल का पेपर एक भूत या यों कहे कि भयावह भूत की तरह सर पर सवार है जिसने मुझे बाँध रखा है तथा पढ़ने पर मजबूर किये जा रहा है.जो भी विचारक पढ़ रहा हूँ बार-बार मन में यह बात आती है कि मैं इन विचारकों की कही बातों को खुद पर लागू क्यों नहीं कर पा रहा हूँ.

क्या सिर्फ मैं केवल एक साधन हूँ जिसके द्वारा किताबों से या विचारक उतरकर खाली पन्नों की कल शोभा बढ़ाएंगे. अब क्या लिखूं सैच्चिया इतना ही काफी है तेरा मुंह बंद करने के लिए. मैं फिर से साधन बनने जा रहा हूँ.

हाँ कलम रोकने से पहले मैं यह कहना चाह रहा हूँ कि किताबें और ये नोट्स पढ़ते हुए ऐसा लगता है कि इनमे कही गयी बातें मेरे लिए हैं ही नहीं ये तो शेष समाज के लिए हैं. बस अब और क्या कहूँ फिलहाल के लिए यही मेरी पीड़ा है.

बस सैच्चिया, अब नहीं लिखूंगा घबरा मत बाय बाय!!

अगस्त 14, 2012

मुझे नंगा करके ज़मीन पर बिठाया जाता है – सोनी सोरी

सुप्रीम कोर्ट की दया का बदला सरकार सोनी सोरी से ले रही है. सोनी सोरी ने २७ जुलाई के अपने जेल से सुप्रीम कोर्ट के नाम भेजे गये पत्र में कहा है कि ‘आज जीवित हूं तो आपके आदेश की वजह से! आपने सही समय पर आदेश देकर मेरा दोबारा इलाज कराया!.. एम्स अस्पताल दिल्ली में इलाज के दौरान बहुत ही खुश थी कि मेरा इलाज इतने अच्छे से हो रहा है! पर जज साहब, आज उसकी कीमत चुकानी पड़ रही है! मुझ पर शर्मनाक अत्याचार प्रताड़ना  ी जा रही है! आपसे निवेदन है, मुझ पर दया कीजियेगा!..
जज साहब इस वख्त मानसिक रूप से अत्यधिक पीड़ित हूं ! (१) मुझे नंगा कर के ज़मीन पर बिठाया जाता है ! (२) भूख से पीड़ित किया जा रहा है (३) मेरे अंगों को छूकर तलाशी किया जाता है.! जज साहब छतीसगढ़ सरकार, पुलिस प्रशासन मेरे कपडे कब तक उतरवाते रहेंगे? मैं भी एक भारतीय आदिवासी महिला हूं ! मुझे में भी शर्म है, मुझे शर्म लगती है! मैं अपनी लज्जा को बचा नहीं पा रही हूं! शर्मनाक शब्द कह कर मेरी लज्जा पर आरोप लगाते हैं! जज साहब मुझ पर अत्याचार, ज़ुल्म में आज भी कमी नहीं है!आखिर मैंने ऐसा क्या गुनाह किया जो ज़ुल्म पर ज़ुल्म कर रहे हैं!..

जज साहब मैंने आप तक अपनी सच्चाई को बयान किया तो क्या गलत किया आज जो इतनी बड़ी बड़ी मानसिक रूप से प्रतारणा दिया जा रहा है? क्या अपने ऊपर हुए ज़ुल्म अत्याचार के खिलाफ लड़ना अपराध है? क्या मुझे जीने का हक़ नहीं है? क्या जिन बच्चों को मैंने जन्म दिया उन्हें प्यार देने का अधिकार नहीं है ?..इस तरह के ज़ुल्म अत्याचार नक्सली समस्या उत्पन्न होने का स्रोत हैं..

सोनी का यह पत्र हम सब के लिये एक चेतावनी है कि कैसे एक सरकार अपने खिलाफ कोर्ट के किसी फैसले का बदला जेल में बंद किसी पर ज़ुल्म कर के ले सकती है! सरकार साफ़ धमकी दे रही है कि जाओ तुम कोर्ट! ले आओ आदेश हमारे खिलाफ! कितनी बार जाओगे कोर्ट? सोनी पर यह ज़ुल्म सोनी के अपने किसी अपराध के लिये नहीं किये जा रहे! सोनी पर ये ज़ुल्म सामजिक कार्यकर्ताओं से उसके संबंधों के कारण किये जा रहे हैं! सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा छत्तीसगढ़ सरकार के अपराधिक कारनामों को उजागर करने की सजा के रूप में सोनी पर ये अत्याचार किये जा रहे हैं! सोनी सामाजिक कार्यकर्ताओं के किये की सजा भुगत रही है! हम बाहर जितना बोलेंगे जेल में सोनी पर उतने ही ज़ुल्म बढते जायेंगे!

सोनी को थाने में पीटते समय और बिजली के झटके देते समय एसपी अंकित गर्ग सोनी से यही तो जिद कर रहा था कि सोनी एक झूठा कबूलनामा लिख कर दे दे जिसमे वो यह लिखे कि अरुंधती राय, स्वामी अग्निवेश, कविता श्रीवास्तव, नंदिनी सुंदर, हिमांशु कुमार, मनीष कुंजाम और उसका वकील सब नक्सली हैं ! ताकि इन सभी सामाजिक कार्यकर्ताओं को एक झटके में जेल में डाला जा सके !

सरकार मानती है कि ये सामजिक कार्यकर्ता छत्तीसगढ़ में आदिवासियों की ज़मीनों पर कंपनियों का कब्ज़ा नहीं होने दे रहे हैं! इसलिये एक बार अगर इन सामजिक कार्यकर्ताओं को झूठे मामलों में जेल में डाल दिया जाए तो छत्तीसगढ़ में आदिवासियों पर सरकारी फौजों के हमलों पर आवाज़ उठाने वाला कोई नहीं बचेगा! फिर आराम से बस्तर की आदिवासियों की ज़मीने कंपनियों को बेच कर पैसा कमा सकेंगे! कोई तो बचाओ इस लड़की को!

संसद, सुप्रीम कोर्ट, टीवी और अखबारों के दफ्तर हमारे सामने हैं! और हमारे वख्त में ही एक जिंदा इंसान को तिल तिल कर हमें चिढा चिढा कर मारा जा रहा है! और सारा देश लोकतन्त्र का जश्न मनाते हुए ये सब देख रहा है! शरीर के एक हिस्से की तकलीफ अगर दूसरे हिस्से को नहीं हो रही है तो ये शरीर के बीमार होने का लक्षण है! एक सभ्य समाज ऐसे थोड़े ही होते हैं! मैं इसे एक राष्ट्र कैसे मानूं? लगता है हमारा राष्ट्र दूसरा है और सोनी सोरी का दूसरा! नक्सलियों से लड़ कर अपने स्कूल पर फहराए गये काले झंडे को उतार कर तिरंगा फहराने वाली उस आदिवासी लड़की को जेल में नंगा किया जा रहा है और उसे नंगा करने वाले पन्द्रह अगस्त को हमें लोकतन्त्र का उपदेश देंगे!

{हिमांशु कुमार की फेसबुक वॉल से साभार/ और दोनों खतों पर क्लिक कर उन्हें पढ़ने लायक किया जा सकता है}

अगस्त 02, 2012

मई आठ की एक शाम

राकेश दो को दिल्ली आ चुका था पर मुलाकात आज शाम हुई. वहीँ इंतज़ार करता हुआ. मेट्रो स्टेशन गेट नंबर चार चांदनी चौक. अरुण हरदयाल लायब्रेरी के पास उमेश की खोज खबर लेता फोन पर बात करता मिला. मैं नयी सड़क से मिनियम लेकर आ रहा था. टाउन हॉल होते हुए. आशीष भी था. कुल मिलाकर पाँच.

फिर हम लाजपतराय मार्केट से रिमोट कंट्रोल लेकर अरुण के घर पहुंचे. आशीष वहीँ इंतज़ार करता रहा. बैठा रहा. वो अन्दर गया और अपनी दस हज़ारी फोटो एल्बम ले आया. गाँव से आ गयी थी. शादी की फोटोग्राफर की खींची हुई तस्वीरें. उमेश पांच गुना टांगने वाला अपना ही गणित भिड़ा रहा था. फिर सुई गुजरावालां टाउन होते हुए तीस पैंतीस लाख दहेज़ की संभावनाओं से विश्लेषण शुरू हुआ. खाना आज कल कहाँ की पेन्ट्री से आ रहा है, इस पर अरुण ने जवाब दिया और आशीष नें मुस्का कर मुहर लगायी. ऐसी ही प्रमेय वह हमें समझा रहा था.

हर प्रेम की परिणति विवाह में होना नियतिवादी विमर्श है और राकेश ने उसे खारिज करते हुए आगे कहा के तुम्हे अगर लगता है कि सच्चा प्यार है तो कभी उससे शादी नही करना. करोगे तो तलाक देने वाली स्थिति में पहुँच पाना मुश्किल नहीं होगा. क्योंकि ज़िम्मेदारी तुम्हारी थी. किसी ने थोपा नहीं था.

उसकी बहन कॉमर्स से ग्यारहवी कर रही थी. कोई पब्लिक स्कूल था पीतमपुरा का. चार विषयों में रह गयी है. भाई साथ रखने से मना कर रहा है. कहता है पैसा लेना है ले लीजिये पर साथ नहीं रखेंगे. जबसे वह दिल्ली से गया उसके कौन दोस्त हैं? क्या रुचियाँ हैं? ऐसे सवाल भी साथ रीवा चले गए. ओपन से बारहवीं तो हो जाएगी पर उसका होना ढाई पसेरी भी नहीं. वह खुद इधर इन छुट्टियों में दिल्ली के स्कूलों में नौकरी ढूंढने करने की तलाश में है. सिगरेट महिना भर हो गया पीछे तबियत खराब होने पर छोड़ दी.

आज न फव्वारे पर जग्गू की फ्रूट आइसक्रीम खायी न बाद में अरुण-उमेश की लायी कोक पी. पता नहीं आज की बातचीत पर उसके सिरदर्द का असर था या उन सारी बनती बिगड़ती स्थितियों के बीच अपनी नौकरी को लेकर उठती खीज, के वो बात लगी ही नही. कभी-कभी राकेश-आशीष दोनों की स्थितियां लगभग समान सी लगती हैं. दोनों सामान्य सवर्ण. उस सरकारी नुक्ते की दौड़ती बाधादौड़ में सरका कर पीछे भेज दिए जाते हैं. शादी घर-परिवार-अपेक्षाओं की ज्यामिति में अपनी भूमिकाओं को लेकर जटिलता का अनुभव. बराबर बढ़ती उमर का दबाव. खुद के उत्पीड़न के लिए तय्यार करते मानस.

अरुण अच्छा श्रोता तब नही रहता जब उसके दिल में दबी कुछ बातें सतह पर आना चाहती हैं. बात सीधे अब राकेश के भविष्य पर जा टिकी. कभी-कभी कुछ जवाबों को हमें नही माँगना चाहिए..पर..खैर, फिर वहाँ अपने वर्तमान से असंतुष्ट होने के बावजूद हाँ में हाँ मिलाता पकड़ा गया. के जहाँ हम होते हैं वहां अपने को 'मिसफिट' भी पाते हैं पर वहीँ किसी 'यूटोपिया' के लिए संघर्ष कर रहे अपने आज को कोसते रहते हैं.

आशीष इस मामले में उमेश की तरह तो नहीं पर हाँ, दोनों दूसरों की सुनते हैं, तब कहीं अपनी रखते हैं. उमेश की सचाल-वाचाल ध्वनियाँ अनुपात में ज़यादा होती हैं क्योंकि कई बातों का प्रस्थान बिंदु वही होता है. आशीष भी नौकरी की अपने पिताजी की बातों से थोड़ा परेशान रहता है. पर शायद यह हमारे मध्यवर्गीय परिवारों में बेटों की नियति जैसा कुछ है. बिन नौकरी शादी की तरह.

आज शाम की इन सब बातों में अजीब किस्म की विश्रृंखलता लग रही है वैसी ही वहाँ उस हवा में थी. बेतरतीब सी. भौतिक रूप से सब वहाँ मौजूद थे पर मानसिक रूप से न मालूम कहाँ थे. वहाँ कसरत करता दिमाग किन्ही उलझनों से उलझ रहा था. उन सब में ठहराव हो ही नही पाया..ऊपर से अरुण बार-बार उस कमरे की कथित घुटन से बहार निकल अपने हिस्से की बातें करना चाह रहा था जो कुल मिलाकर बाहर भी कम ही किश्तों में आ सकीं. बाहर सबने पहले गोलगप्पे खाए फिर हल्दीराम के ढोकले देखते हुए छोटे लाल की रेहड़ी वाली फ्रूट आइसक्रीम पहुंचे. जिसके देखते ही अरुण को दौरा पड़ता है और अपने आस-पास खड़े दोस्तों में से किसी एक को चुन सौ वाला डिब्बा पैक करवा लेने को कहने लगता है.

मेट्रो में जाते हुए राकेश ने कहा, अब यहाँ नही मिलेंगे..शायद सिरदर्द कम नही हुआ था..

{इधर डेढ़ साल बाद घटी ऐसी ही एक और शाम हमारे हिस्से..}

आवाज़ें..

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