सितंबर 17, 2012

जल्दी में की गयी एक टीप और ये दूसरी सालगिरह

बीते एक साल में कहाँ पहुँचा ? क्या किया, क्या रह गया ? कई दिनों के बाद अपने अन्दर चल रही उधेड़बुन को लिखने की कोशिश की है और यही आज इस ब्लॉग की दूसरी सालगिरह पर दोपहर एक से दो बजे के बीच की फुर्सत में लिख मारा..अब आपके लिए है..

दो साल पहले जिन मूल्यों के साथ चले थे, वे आज भी हैं बस थोडा उनसे खिसक गया हूँ, लगता है. असंतुष्टि के भाव के साथ खुद को साबित करने की जद्दोजहद थी. के थोडा बहुत लिख पढ़ लेते हैं. दिमाग भी काम करने लायक अभी भी है. इन्ही के इर्द गिर्द कुछ कुछ चल रहा था.

दुनिया पहले तब भी गोल थी पर इतनी कोमल न तब थी न आज..साथ ही इसकी व्यक्तिगत सापेक्षता से कोई इन्कार नहीं कर सकता. वास्तविकता जितनी जैसे हमें दिखती है, उतनी ही लगती है. नज़रों को ऊँचाई से भी देखा जा सकता है और उसके फैलाव के वितान को विस्तार से भी. लिखने के लिए जिन विषयों को चुना उनका अपना ढर्रा बनते-बनते वक़्त लगा..अभी भी बन ही रहा है..पर कभी लगता है कभी-कभी उन्ही से भागने लगता हूँ और फँस जाता हूँ व्यक्ति और समाज में भाव और विचार में. द्वन्द मुहावरे की तरह जुबान पर था. जो भी पढ़ते-लिखते उसतक पहुँचे कैसे, यह उस प्रक्रिया की तरफ ले जाती, जिसमे सीकचें हमें अपनी तरफ बुलाते.बुलाना अब कम होता जा रहा है उसी तरह यहाँ पर आवाजाही भी. महीनों कोई दस्तक नहीं दे पाता. पर हर पल हर वक़्त लगता है कुछ लिखूं. भले यहाँ पर नहीं कागज़ पर, अपने पन्नों पर. बस उसका लिखा जाना ज़रूरी है.

लिखना मिला कैसे? उसकी तरफ का आकर्षण अपने बनते बिगड़ते व्यक्तित्व को भी समान्तर उसी अनुपात में बनता बिगाड़ता. सामजिक होना और उन विचारों के आसपास की टहलन मजेदार है. आप साबित करते हैं कि चिंताओं की परिधि में पड़ोस से लेकर सद्भाव के बैरागी नहीं उसके सबसे बड़े पैरोकार हैं. जितना उसको पीड़ा होगी उतनी ही दुःख की रेखा शिकन बनकर आपके माथे पर पहले से ही मौजूद है. ऐसा मनुष्य बन जाने की कवायद का हिस्सा बन जाना जहाँ की ऐनक इंसान को सबसे पहले इंसान माने फिर उसके होने के कारणों पर झाँकें. सीधे कहा जाये तो कुछ-कुछ ऐसा संवेदित होना कि आपकी नज़र उस आखिरी आदमी से ही शुरू होती है. पर इसके लिए कुछ करना नहीं वे बने बनाये प्रतिमान यहीं आस पास बिखरे पड़ें हैं उन्हें किसी वास्को-डी-गामा गैलीलियो की ज़रूरत नहीं पूरा तंत्र ऐसे सामाजिकृत करेगा के वो ढर्रे औज़ार लगने लगेंगे. इस दुनिया को समझने के लिए बारीक नज़र के साथ. इनके साथ आग्रह होगा देखने समझने का पर पूर्वनिर्धारित मानको से विचलन की कीमत पर नहीं.

अपन भी कूद पड़े थे सरोकार प्रतिबद्धता की बायनरी से इस ज़िन्दगी को देखने. झाँककर उसे समझने से लेकर परिवर्तन की झोंक में. अपने को पूर्वाग्रहों से दूर करते बने बनाये पूर्वाग्रहों की तरफ जाते..जहाँ इस दुनिया के लिए फिक्रमंदी थी. थोडा बहुत चलने फिरने के काबिल खुद को मानून भी तो अब थोड़ी सी ऊब सी होती है. हमारे लिए दुनिया के सारे रंग कहाँ गयाब हो गए और उसमे एक दो रंग ही क्यों बचे रहे समझ नहीं आता.या शायद मालुम है पर अनजान बने रहने की आदत बन गयी लगती है..पता नहीं मेरे आसपास जो थे उन्हें कुछ-कुछ अजीब लगने लगा. उनकी नज़र में मेरी अपनी दुनिया बनती गयी जहाँ मैं ही रहता था और पहले की बसावट के कई साथी या तो छिटक गए या फिर मैं अपने जैसों की तलाश पर निकल पड़ा..

इधर मो. आरिफ का उपन्यास 'उपयात्रा' पढ़ रहा हूँ और कभी-कभी लगता है खुद कई प्रकारांतर यात्राओं पर निकल पड़ा हूँ. अपने अन्दर अपने बाहर..जूझता रहता हूँ, फँस जाता हूँ..जैसा मैं होता जा रहा हूँ उसमें अपनी ही मान्यताओं को फिर से देख परख रहा हूँ..आज जहाँ खड़ा हूँ वहाँ सब कुछ किसी मुखौटे की तरह लगता है..मेरा खुद का लिखना भी अपने ठीहे के मजबूत पायेदार होने से पहले भिनभिनाती मक्खियों से डर नहीं रहा हूँ पर..

मुक्तिबोध आज भी अपनी तरफ खींचते हैं, पाश के पास बैठता हूँ पर लगता है कहीं तय्यारी अभी और करनी है..कुमार अम्बुज की तरह प्रतिबद्धता को इतना निर्दोष मानने का मन नहीं होता. विचार आज भी खींचते हैं पर उनका रुमान अब किसी मुलायम ख्याल की तरह स्पर्श नहीं दे पा रहा..शायद इसलिए भी अब खुद को चुपचाप किताब में छपे पेड़ की तरह बेखबर पाने लगा हूँ..पीछे जितना अपने अन्दर हुआ हूँ उसे प्रक्रिया को और ऐसे ही चलने दे रहा हूँ..बस अभी थोड़ा अपने से और जूझना चाहता हूँ..

सालगिरह पहली  | सालगिरह तीसरी 

{आज तारीख नौ नवम्बर, दो हज़ार बारह को यह पोस्ट जनसत्ता में 'चिंता की परिधि ' नाम से आई है। ठिकाना वही अपना समांतर। सीधे वहाँ पढ़ने के लिए इस लिंक को चटकाएं। }

सितंबर 10, 2012

जो हिंदी में नहीं था

खिड़की के बाहर बारिश हो रही है. पर उसपर नहीं लिखने जा रहा हूँ. कुछ याद आया है इसके साथ. पर उसमे भी बारिश की बूंदें नहीं हैं..बस एक अँधेरा कमरा है, उसमें है मोमबत्ती का पीली छाया भरा उजाला. तब हमारे घर में लकड़ी का तख़्त था जो अभी टूट चुका है और बाहर पड़ा भीग रहा है. टूटा कैसे उसकी कहानी फिर कभी..तो हमारा गद्दा बिछा बिस्तरा वही होता था, पैर पोंछने की हिदायत के साथ.

उन दिनों घर की गतिकी में अलमारी की पीठ नहीं कन्धा दिवार को लगता था. बड़ा वाला बक्सा तब ठण्ड आते दिनों के साथ खुलता तो उस पर रखे गद्दे-बिछौने उसी तख्त पर रखे जाते. अब वह वहां नहीं है तो बक्से का खुलना कई सालों से विलंबित सा है. मतलब उसमे ऐसी ज़रूरत का सामान है, जिसकी ज़रूरत इतनी ज़ल्दी नहीं पड़ती.

तो आज भी अच्छी तरह से याद है उस मोमबत्ती की रौशनी में एक छोटा सातवीं क्लास का लड़का अंग्रेजी में छपी किताब से सवाल-ज़वाब याद करने की ज़द्दोजहद में था. इम्तिहान सालाना था और नामुराद साइंस की जुबान थी मुश्किल.

उन्ही दिनों पहली-पहली बार यह बात कान में पड़ी होगी कि लिख-लिख कर याद करने से एक तो ज़ल्दी याद हो जाता है और ज़यादा दिन तक भेजे में भी रहता है. तो इन सबको मिलाकर हुआ यूँ के अंग्रेजी उस वक़्त माशहअल्लाह अंदाज़ में पढ़ते थे. जितना ज़वाब लिखा छपा होता उसे पेंसिल बॉक्स से यूँ छुपाते, जैसे उससे छुपन छुपायी खेल रहे होते..फिर एक मिनट बीतता, दूसरा मिनट आता और तीसरे तक आते-आते जब याद किया हुआ न आता तब धीरे धीरे एक-एक इंच नाप-नाप कर हटाते और हू-ब-हू रफ कॉपी में नक़ल कर लेते. और बेचारा दिल भी समझ लेता बिलकुल वैसा ही तो याद कर लिख दिया है, अब वहां भी पूछेंगे तो लिख मारेंगे..

पर अगर दो चार मिनट बाद ही उस सवाल पर घूम कर वापस आते तो याद किया साथ वापस नहीं होता. और यह उस इम्तिहान के पर्चे से लड़ने के लिए जुटाए जा रहे कॉन्फिडेंस के लिए घातक होता इसलिए पन्ना पलट लेते और फिर भूल कर भी उस पन्ने नहीं लौटते. कहीं दो चार हर्फ़ भी इधर उधर हो गए तो..

फ़िजिक्स को तब उस दिमाग से हिंदी में सोच भी नहीं सकते थे. जो हिंदी में होती तो कभी उसे पढ़ के जाते भी. बस घूमते टहलते पहँचते. कुछ-कुछ याद कर लिख मारते. ऐसा नहीं था कि हम फ़ीस नहीं दे रहे थे, फिर भी पता नहीं क्या हुआ के मास्टरनी जी ने कभी भी ये जानने की कोशिश नहीं की के हमने समझ आ भी रहा है या नहीं..या हम ऐसे ही मुंडी हिलाए जा रहे हैं.

पेपर तो मौत के साथ करते दिन होते इसलिए जितनी जल्दी खतरा टले उतनी ही सेहत की तंदुरुस्ती बने. पर तंदुरुस्ती उस इम्तिहान में पिछड़ गयी. खींच खांच के साठ प्रतिशत बन रहे थे पर दो विषयों में रह गया. वो थे अजब गजब गणित और ससुरी साइंस. जब मैं भाषा से जूझ रहा था तब साथ-साथ इनसे भी लड़ना पड़ रहा था और वहाँ किसी टीचर को समझ नहीं आया के फर्स्ट डिवीज़न के बावजूद उसी जमात में अगर रह गया हूँ तो क्यों..मैं फेल किसमें हुआ था विषय में या माध्यम में..

तब मेरे पास ये सवाल नहीं थे बस इतना जानता था के हिंदी में मौका मिलता तो बात दूसरी ही होती. पर नहीं ये नहीं समझा पाया उन्हें..दुबारा सातवी करनी पड़ी. स्कूल छूट गया. दोस्तों की पलटन वहीँ रह गयी. उस मन को कैसे दाखिला न होते दिनों में मैंने संभाल के रखा था..फेल का बिल्ला लगा था न, कोई स्कूल लेता क्यों..??

{आज (14 सितम्बर 2012) यह पोस्ट 'जनसत्ता 'में 'विफलता का माध्यम' शीर्षक के साथ आई है..वहाँ पढ़ने के लिए इधर चटकाएँ.. }

इस पोस्ट 'विफलता का माध्यम' पर 
चौपाल में एक पत्र....तारीख बाईस सितंबर.

सितंबर 09, 2012

इतवार फिर कभी नहीं आये

इधर पीछे पता नहीं क्या हुआ के पुरानी स्मृतियाँ छवियाँ बन कर सामने से गुज़र रही हैं. अनछुई सी कोमलतम यादें. बचपन इतना इत्मीनान से उन्हें सहेज रहा था जिसमे आपाधापी इतना आंडी टेढ़ी नहीं कर जाती थी कि सोमवार पिछली रात के अलसाई आँखों को खुलने नहीं देता था..

एक इतवार था. सड़कें बेतरतीब भरी नहीं थीं. खाली थीं. गाड़ियां गाड़ी वालों के पास थीं. हम बस में थे. शायद उन दीवारों को तभी से वैसे ही पोता जा रहा है, जैसा वो आज की रॉकस्टार में मूतते लोगों के पीछे छिपी हुई हैं. बस कौड़िया पुल के पास से गुज़र रही है. लाल किले के बाद. बस भी हमने यहीं बिरला मंदिर से ही ली होगी दो सौ पंद्रह या दो सौ सोलह.

शास्त्री पार्क तब गुप्ता जी रहते थे. अब वह कहीं नहीं हैं. आखिरी मुलाक़ात हुई इस बार गाँव में. सीधे मिले नहीं, अमर उजाला से इनकी दुर्घटना में मृत्यु की खबर मिली. तब हम उनके घर जा रहे थे जहाँ किराये के कमरे में वे रहते थे. उनकी पत्नी भी आई हुई थीं. तब हम दोनों भाई शायद तीसरी चौथी में रहे होंगे..बस दनादन भागती जा रही थी. वापसी में रात अँधेरा हो चुका था. सड़क किनारे ऊँची सी दिवार थी. और उस ऊँचाई पर बड़ी सी सड़क. जिसपर जाती सीढ़ियाँ लगी थीं. हम चढ़ कर ऊपर आगये. बस पकड़ी या नहीं. याद नहीं. शायद पकड़ ही ली होगी तभी तो आज घर पे हूँ..

सितंबर 08, 2012

एक अनगढ़ कविता

कभी-कभी मन करता है तो बैठ जाता हूँ..रात करीब नौ बज रहे थे. बाहर बारिश नहीं हो रही थी. आकाश में तारे थे..और मेरे साथ थीं कुछ देर बाद ये पंक्तियाँ..उन सभी बेरोजगारों को जो कभी न कभी अपने पिता की  तरफ भी मुड़ जाते होंगे..

आखिर में बस इतना ही के मैंने अभी तक ज्ञानरंजन जी की कहानी 'पिता' नहीं पढ़ी है..  

डर

इसे कविता में ही कहूँगा कि पिता का चेहरा, 
अब ज़यादा दिखता है अपनी आँखों के पास

उस पर उम्र की साल-दर-साल चादर
शरीर को थका रही है,
कह रही है थोडा आराम भी ज़रूरी है

इन एब्सर्ड सी पंक्तियों में
छिपा रहा हूँ अपना डर
कि डरा हुआ हूँ..

इतना डरा हुआ के लिख भी नहीं पाता..
किसी से कह भी नहीं पाता
शायद यहाँ भी न कह पाऊं..

बस्स देखता हूँ
उनकी आँखों से नीले रंग का हरा हो जाना
पर भी नहीं कहता उनके गलत होने पर भी
कि सामने हरा नहीं नीला ही है..

रोज़ किसी नतीजे के आने का समाचार लेना
और मेरा झुका सिर उन्हें कुछ और कहने नहीं देता.

उनके हाथ में रहता है
सपनों के घर का नक्शा
जिसमे हम सब रहेंगे आराम से!

एक सत्ताईस साल के बेरोजगार होने के बाद
यह डर ही मेरा रोज़गार है..  

१६.७ २०१२ 

आवाज़ें..

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