अक्तूबर 27, 2012

दिहाड़ी अध्यापक की डायरी का पन्ना

बड़े दिनों से बहुत कुछ इकठ्ठा हो गया पर बात नहीं हो सकी. कुछ कुछ पैराडाइम शिफ्ट जैसा. एक सरकारी स्कूल में अतिथि अध्यापक गेस्ट टीचर के रूप में पढ़ा रहा हूँ..हिंदी का मास्टर. माने सरकारी बंधुआ मजदूर. साढ़े सात सौ रुपया दिन. और जिस दिन नहीं गए पैसा कट. पता नहीं जो पढ़ाने का यूटोपिया था वो इतनी जल्दी क्यों टूट रहा है. इतने फटीचर बच्चे हैं कि लिखना नहीं जानते और ग्यारहवी-बारहवी में पढ़ रहे हैं..नियमित टीचर भी कुछ कम माशह अल्लाह नहीं. दिमाग से इतने पैदल के बस रोजी रोटी के चक्कर में अपनी भारी भरकम देह का बोझ उठाये रोज़ घर से चल यहाँ फाट पड़ते हैं..

हर रोज़ मर-मर के जाता हूँ और हर रोज़ का हासिल यही के उस स्कूल को जिन्दा करते-करते खुद और मरा-मरा सा..सोचता भी हूँ के अपने वक़्त का हर्जा कर वहां क्यों जाये जा रहा हूँ, पर..आध पौन कहानी लिख भी मारता पर ढाई तीन तक स्कूल में खटने के बाद उस मानसिक थकान से जूझते बीत जाते है..कुछ-कुछ फुटकर चिटुर-पुटुर चल भी रहा है तो उससे राजी नहीं हूँ..

अपने स्तर पर अध्यापन से जूझने की कोशिश कर रहा हूँ..दिक्कत शायद तब ज़यादा हो जाती है जब कक्षा असहयोग आन्दोलन करने पर उतारू हो. पूरे तंत्र में सेंध जैसा भी नहीं कर पाने की हताशा बार-बार घेर लेती है..ये भी पता है के उस इनपुट पर इतनी ज़ल्दी आउटपुट की अर्थशास्त्रीय व्याख्याएं नहीं की जानी चाहिए पर..समस्या बिलकुल इन वाक्य विन्यासों की तरह ही जटिल होती लग रही है. पर मैं सहज होना चाहता हूँ. कुछ कुछ ओढ़ा हुआ लगता है, उसे उगाढ़ देना चाहता हूँ..

पता नहीं जो कहना चाहता हूँ वो कह भी पा रहा हूँ या वही आप तक पहुँच रहा है जो इस वक़्त सोच रहा हूँ..अपने बीते कल पर अटका उन सब बिन्दुओं को दुरुस्त तो नहीं कर सकता पर मुड़ मुड़ कर देखता हूँ..देखना वर्तमान से पलायन भी हो सकता है और उसका रचनात्मक अर्थ भी लगाया जा सकता है. फिर इधर पने पास एक अदद नौकरी की काबिलियत का अब तक न होना भी कचोटने लगता है. मेरे संगी साथी जो कभी साथ थे वो कहते हैं इतना पढ़ लिख कर भी क्या कर लिया..सोचता हूँ उस दिमाग से होगा भी क्या जो घर न चला सके..ऐसा लगने लगा है के घर चलाना जितना मौद्रिक कार्य व्यापार है, उतना मानसिक बाद में..

लिटमस टेस्ट की हताशा चुनौती में कब तब्दील होगी समझ नहीं पा रहा हूँ या शायद सब सामने होने पर भी समझदारी कहीं किन्ही क्षणों के लिए अपदस्थ हो गयी है..उसमे न लिख पाने की जूझन है और लगता है बदलती स्थितियों में रूढी बनता जा रहा हूँ..इतना सब पढ़ कर यह भी लग सकता है के कुछ प्रस्थापनाएं खुदय गढ़ ली गयी हैं और उन्ही के इर्द गिर्द अपने होने न होने को जाँच रहा हूँ..पर क्या करूँ इससे आगे जा नहीं पा रहा. सब कुछ ऐसा करते जा रहा है जिसमे ठहराव भी है टकराव भी, आग्रह दुराग्रह बनते जाते हैं, समस्या इसी में है..

ज़िन्दगी को कभी भी इतना किसी दूसरे के सापेक्ष नहीं देखता था पर उन दबावों को इस तरह महसूस करता हूँ के लगता है अब इतनी उम्र में भी उस लायक नहीं रहे के कोई काम कर सकें..ज्ञान का अपना अहंकार भी संग किसी न किसी रूप में डोलता रहता है..चेतन-अवचेतन किसी भी तह में..और ये सरकार है जो ऍफ़ डी आई के आने के बाद करोड़ों रोजगारों की बात करती है..हम पढ़लिख बस मरे जा रहे हैं..मरना है अन्दर ही अन्दर घुटने जैसा..

यह सब भी रोने जैसी किसी क्रिया जैसा लग रहा है, पर लोग कहते हैं कभी-कभी रो भी लेना चाहिए..कम से कम इसे 'आत्मालोचन' जैसा साहित्यिक कृत्य कह इसकी आड़ में नहीं छुपना चाहता..

(12/08/2012)

अक्तूबर 25, 2012

किस्सागो और उनका आदिग्राम

'आदिग्राम उपाख्यान' का फ्लैप कुणाल को 'जबरदस्त किस्सागो' कहता है. उनकी यह किस्सागोई उस जीप के बरगद के पेड़ से पहले उसके सड़क से खेत पर उतरने वाली घटना के दरमियान ही पैदा होता लगता है. या फिर इज़राइल-इस्माइल भाईयों की पढाई के आसपास. जहाँ इसे राजनितिक उपन्यास हो जाना चाहिए था सारी गड्डमड्ड वहीं उसके नंदीग्राम के क्षेपक हो जाने के साथ हो जाती है. घेराबंदी. संग्राम की पूर्वकथा में जो भी कहा गया उससे प्रस्थान बिंदु इतना मजबूत नहीं बन पाता के उसकी भूमिका में इस कृति को स्वीकार कर लिया जाये.

बावजूद इसके कहानी है. आगे है. पीछे है. ऊपर है. नीचे है. इसे बिना किसी नारे के सिर्फ एक जगह की ठीक ठाक कहानी भी कहा जा सकता है. पर रेणु से अढ़ाई कोस चल यहाँ आने की उतनी जहमत बाकियों को नहीं उठानी चाहिए. 'मैला आँचल' इससे ज़यादा राजनीतिक है और न कहते हुए भी कई कई उपाख्यान उसमे रचे बुने हैं. सीधे टकराव से ज़यादा दायें बाएं किया गया है. या यह हो सकता है की समकालीनता का दबाव उसे कहीं मोड़ने का मौका ही नहीं देता.

वहाँ बाघा से ज़यादा यादगार चरित्र सद्दाम और उसका बाप शमशुल हैं जिनको फ्लैप पर लिखने वाला शायद भूल गया. यह बात दीगर टाईप की है के उसने कमज़ोर चरित्रों के लिए पाठकों का जहाँ और उसका कोना सदा सर्वदा के लिए सुरक्षित करा दिया था. हाँ यह देखना भी मौज़ू है कि उपन्यास नागार्जुन की इन पंक्तियों से शुरू होता है 'आओ रानी, हम ढोएंगे पालकी,/ यही हुई है राय जवाहरलाल की' और ख़तम होता है संसद मार्ग पर. मतलब, धूमिल की कविता पर (सुदामा पाण्डेय का लोकतंत्र)  'लेकिन वह जो न रोटी बेलता है न खाता है, बस रोटी से खेलता है, वह तीसरा आदमी कौन है? इसका उपयोग वे ममता बनर्जी से एक सवाल के रूप में करते हैं पर जवाब में दूसरी तरफ से कोई उत्तर प्राप्त नहीं होता. मिलता सिर्फ मौन है.

दिक्कत यही लगती है के जब उस पाठक के सामने उदय प्रकाश की '..और अंत में प्रार्थना' से लेकर 'वारेन हेस्टिंग का सांड' पहले से मौजूद हैं, तब आप उनसे खुद को कैसे अलगायेंगे..जादुई यथार्थवाद परिमलेंदु दा की कहानियों का हिस्सा ज़यादा लगता है पर जिस रानी रासमणि की मौत बंगाल के आकाल में चावल की खुशबु से हुई थी उसमे अखिलेश की 'वजूद' मौजूद है. यहाँ हेस्टिंग का नक्शा नहीं है शमशुल खुद है..

अगर मुझे राजनीतिक आख्यान ही ढूंढने हैं तो 'हज़ार चौरासी की माँ', मधु कांकरिया की 'लेकिन कॉमरेड' क्या कम हैं ..गोविन्द निहलानी की 'द्रोहकाल' देख सकते हैं..रैक से फिर 'रजिस्टर्ड नंबर 1038' उठाई जा सकती है..

{बारह की रात इसे ख़तम करने के बाद की फौरी टिप्पणी } 

अक्तूबर 20, 2012

असहमति का साहस - विवेक की असहमति

इसे पढ़ने के पहले विनम्र निवेदन है कि इस पर दृष्टिपात करने के बाद मुझे तहलका का खोजी पत्रकार मानने की गलती न करें. 'समयांतर' के पाठक के रूप में चार-पाँच सालों से तो जुड़ा ही हूँ तो इस पूंजीवादी समय में एक क्रयशील उपभोक्ता के रूप में यह सकर्मक विमर्श जैसा ही माना जाये..!!

बकौल विनीत कुमार 'आपसे सवाल करने की हैसियत मेरी बस इतनी है कि कई कई महीने बेनागा दस दस रुपये देकर समयांतर खरीदी है और मैंने जिस पत्रिका के लिए पैसे खर्च किये हैं, उनसे ये जानने का अधिकार तो रखता ही हूँ. हिंदी में में ये बदतमीजी समझी जाएगी लेकिन बाज़ार की भाषा में ये एक उपभोक्ता का अधिकार है.'

(थोड़ा विनीत से : दो जगह फेरबदल की स्वतंत्रता ली है एक तो वहाँ जहाँ आपने 'कई मर्तबा लेख के लिए' लिखा था उसे मैंने 'कई कई महीने बेनागा' कर दिया है और वहाँ अखबार 'जनसत्ता' था यहाँ 'समयांतर' पत्रिका लिख मारा है. सन्दर्भ २७ अगस्त का आपका फेसबुक स्टेटस है. साल था दो हज़ार दस और घडी में बज रहे थे आठ बजकर बारह मिनट..) 

इस बड़ी भूमिका-कम-स्पष्टीकरण-कम-निवेदन के बाद आप आगे बढ़ सकते हैं..थोड़ा परसाई भी पढ़ रखा है यह भी आपको पता चल जायेगा..

'समयांतर' विचार और संस्कृति का मासिक, 'असहमति का साहस और सहमति का विवेक' टैग लाइन वाला पत्र है. हम इसे पत्रिका कहते आये हैं. अक्तूबर का अंक है कीमत बीस रुपये. पृष्ठ उनतीस से 'पुस्तकों पर केन्द्रित छमाही आयोजन' वाला विशेष नुक्ते के साथ 'परिच्छेद' शुरू हो रहा है. इसका विस्तार पृष्ठ बयासी तक है.

इतनी तथ्यात्मक जानकारी इसलिए लिखी क्योंकि इसकी आवाज़ जिसे स्वर कहूँ और इसका मिजाज़ कुछ ऐसा है कि सरकारी विज्ञापन प्रभाग के अलावा दुसरे पूंजीगत स्रोतों से प्राप्त विज्ञापन इसकी प्रतिबद्धता- स्वर- असहमति- प्रतिरोध- विवेक को प्रश्नांकित कर सकते हैं. इसलिए न इसके कागज़ कि गुणवत्ता वैसी ज्ञानोदयी आभा लिए होती है न विज्ञापन रंगीनियत लिए.  पर छपाई से लेकर कागज़ मानव श्रम बौद्धिक व्यायाम आदि इत्यादि मदों के लिए पूंजी तो चाहिए. अब वह आये कहाँ से? तो इसकी सूचना पेज नंबर ७९ पर एक बक्से में है जिसका शीर्षक है 'इस अंक के प्रकाशक'.

अब इसे संयोग कहें या अरेबियन नाइट्स का चमत्कार-फमत्कार कि जिन्होंने इस अंक के प्रकाशन में सहयोग किया है उन्ही प्रकाशन संस्थानों से प्रकाशित पुस्तकों पर समीक्षाएं- लेख वहाँ के पन्नों पर हैं. यह कैसे हुआ होगा इसकी दो संभावनाएँ तत्क्षण दिख पड़ती हैं- पहली यह कि चयन भले समयांतर का रहा हो पर छापने के एवज़ में उन्होनों उन प्रकाशकों से सहयोग नामक मद में आर्थिक पूंजी कि मांग की हो. अच्छा ये वाला थोड़ा ओछा किस्म का भी लग रहा है और इसमें श्रम भी करना पड़ रहा है तो दूसरी संभावना पर गौर किया जा सकता है.  

वह यह कि चूँकि घोषित रूप से पुस्तकों पर केन्द्रित अंक वर्ष में दो बार प्रकाशित होता है, जून और अक्तूबर में, तो स्वयं ही पूंजीगत सहयोग के साथ वह प्रकाशन संस्थाएं स्वयं मुद्रित की हुई सामग्री इस पत्रिका को मुहैया करवाते आ रहे हों..!! 

और असहमति होते हुए भी क्योंकि साहसी पुरोधा हैं वह सहमति का विवेक इस्तेमाल करते हों. हर बार. स्पेस की कीमत ही तो लगा रहे हैं. भले अगले अंक में उस प्रकाशक की बखिया उधेड़ दें. सेंध तो हर बार लगा ही जाता है. क्या कुछ मुखौटे ऐसे ही अपना काम करते हैं..

{नीचे की गयी टिप्पणी में सम्पादक 'समयांतर ' पंकज बिष्ट का इस पोस्ट के प्रतिउत्तर में दिया गया जवाब है। सन्दर्भ समयांतर, दिसंबर 2012, पृष्ठ छह.}

अक्तूबर 15, 2012

मृत्युलेख

दो दिन से क्या देख रहा हूँ, पता है..?? खेल. वक़्त हमारे साथ खेलता है. हमें लगता है की वक़्त हमारा है पर उसमे हमारी भागीदारी उम्र के आसपास निर्मित होती संरचनाओं की होती हैं जो देह के बूढ़े होने के साथ साथ या तो कमज़ोर होती जाती हैं या हमारे नियंत्रण से बाहर खिसक खुद को स्थापित कर लेती हैं.

पापा के सबसे बड़े मामा के सबसे बड़े लड़के. पापा के ममेरे भाई. डॉक्टर हैं. अपनी उम्र के प्रारम्भिक चरण में जैसे प्रभाव युक्त आभा के साथ थे, उनका तेज इधर स्वास्थ्य के साथ धीरे धीरे कम होता जा रहा है. स्मृति इतना साथ नहीं देती. उम्र अपनी रचना को कह रही समेट लिया जाये. यह स्थिति व्यक्ति के सामने ही घटित होती है. उसका लगातार क्षीण होता जाना. जिस मृदुता सद्भाव प्रेम को तब हम नहीं पहचानते न तवज्जो देते हैं उसे ही अब हमारा साथी होना पड़ता है.

इस सारी अभिधा की लक्षणा से जो व्यंजना हो रही है और जो नहीं हो रही है उसमे सुनी सुनाई सामने घटित घटनाओं को लिखने नहीं जा रहा हूँ. बस याद कर उस घटित जीवन यात्रा को अपने पास सहेज कर रख ले रहा हूँ जहाँ अचानक ह्रदय के किसी कोमलतम अंग में छोटे भाई के साथ बितायी कोई याद किसी टहनी पर टंगी रह जाती है और इतने बरस बीत जाने पर उसे सामने देख फिर उन पन्नों पर जाने को हो उठता है.

पता नहीं उनसे जुड़ाव न के बराबर है पर पापा को बोली पंक्तियों में जो नैराश्य जैसी प्रसन्नता थी उसका निरर्थक बिंदु पर पहुँचना अन्दर से अजीब सा कर रहा है. हम कुछ देर ठहर पनियाई आँखों से अपने बीते कल में जाना चाहते हैं उन दिनों को फिर से जीने की तमन्ना होती है पर सामने हमारी देह को निहारती ऑंखें बस लगातार हमें देखती रहती हैं. हमें चला जाना है उन सबको यहीं छोड़े.

लगातार उस कम होते वक़्त में हम ज़यादा से ज़यादा जी लेना चाहते हैं. पर सामर्थ्य सिर्फ स्वपनलोक तक ले जाता है. जहाँ फरेंद का बिरवा उसकी कमज़ोर डाड़ से गिरकर घुटने कोहनी की चोट दर्द नहीं देती बस रोक देती है. थोड़ी देर के लिए उमर वहीँ इंतज़ार करती है और अचानक हम छूटते चले जाते हैं. कटहल के बिये भी याद आयें तो खा नहीं सकते. फूफा कटरा से ले भी आयें, तब भी नहीं. पाला जवानी की तरह नहीं गिरेगा. बरसात तब रूमानी नहीं रह जाती.

फिर लगातार वहीँ करवट बदलते जिसपर नज़र पड़ेगी बने की हवा के साथ उसकी याद किसी डोलची पोटली से फुदक बाहर आ जाना चाहेगी. उन यादों को हम समेटते रह जायेंगे और वक़्त सिर्फ कान में इतना फुसफुसाएगा कि भईया बहिनी तोहर वक़्त आई गवा..!! और सब वहीँ रह जायेंगे. यहाँ तक की मैं भी. क्योंकि उस दिन के बाद मैं रहूँगा भी कहाँ? मेरी याद उस दिन के बाद कोई याद नहीं बनने देगी. वहीँ कोने के साथ चटाई समेटते सबको कुछ याद भी आएगा तो मैं नहीं वो बीछी आएगी जो मुझे काट गयी थी.

यह हमारी स्मृति के पन्नों का एक-एक कर बिखरने जैसा जान पड़ रहा है. जिनको बचपन से देखते आ रहे हैं उनमे से एक एक की मृत्युरेखा तक पहुँचती ज़िंदगियाँ थोड़ा तो हमें भी खाली करती जाती हैं. पता चले. न चले.

{17 दिसंबर, 2012 यह पोस्ट जनसत्ता में 'स्मृतियों के पन्ने ' नाम से आई है, वहां पढ़ने के लिए इधर चटकाएं}

आवाज़ें..

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