दिसंबर 28, 2013

केजरीवाल की दिल्ली 'एक' का छोटा-सा नरेटिव

अब जबकि दिल्ली को कुछ ही देर में ‘मुख्यमंत्री’ मिलने वाला है इन सब बातों का कोई अर्थ नहीं, ऐसा नहीं है। यहाँ नीचे जो कुछ भी आने वाला है, वह कम-से-कम एक ‘नरेटिव’ की तरह काम हो करेगा ही। एक उत्तर पाठ। 

बात हमारे एमए के दिनों की है। हमारी ‘फ़ैकल्टी’ हमारे ही डिपार्टमेंट के एक प्राध्यापक दिल्ली विधानसभा चुनावों में खड़े हो रहे थे। उनकी रणनीतियाँ क्या थीं? कभी उन्होने हमलोगों से साझा नहीं की। पर विचारधारात्मक रूप से उनका आग्रह वामपंथी रुझानों की तरफ़ स्पष्ट था। उनके आगे-पीछे आभामंडल बनाए छात्रों ने कैसा प्रचार किया पता नहीं। वह चुनाव हार गए। शायद ज़मानत भी ज़ब्त हो गयी थी। इन दिनों किन्ही सीमित प्रसार वाली पत्रिकाओं में लिखते-पढ़ते रहे हैं।

दूसरी तरफ़ इसी विश्वविद्यालय के हरीश खन्ना हैं। रजनी अब्बी को हराकर तीमारपुर से विधानसभा में जा रहे हैं। इनके बारे में यह भी नहीं जानता यह किस विषय से हैं। साथ में कमल की एक फोटो देखी है। पता नहीं क्या पढ़ाते होंगे उसे। शायद राजनीति विज्ञान से होंगे। वैचारिक रूप से कहाँ ‘स्थित’ हैं। पता नहीं। क्या हमारे उस हारे मास्टर ने बधाई दी होगी। यह भी पता नहीं। बहरहाल।

सच कहूँ तो चार दिसंबर के पहले वाली रात तक तय नहीं कर पाया था। कल किस बटन पर उँगली रखनी है। पता नहीं मेरे जैसे कितने होंगे जो उस रात या उससे पहले इस स्थिति से गुजरे होंगे। नेहा फ़ेसबुक पर लिखती है, वह भी नहीं सोच पा रही। हम ‘दिल्ली एक’ से थे। हमारे यहाँ शीला दीक्षित के विरुद्ध ख़ुद केजरीवाल खड़े थे। अब पिछली बार की तरह यह बहाना नहीं हो सकता था के विकल्प नहीं है। यह ख़ुद को विकल्प के रूप में स्थापित करना है। दो हज़ार आठ में भी यही स्थिति थी। तब भी वोट दोनों मुख्य प्रतिद्वंदियों को न देकर दिल्ली की पहली महिला ऑटो चालक सुनीता को दिया था। उसे जीतना नहीं था। फ़िर भी उसे ही दिया।

सोच रहा था हमारे यहाँ से अरविंद खड़े हैं। हम किसी ऐसे को तो अपनी जगह से भेज ही सकते हैं, जो उन सरकारी इमारतों में जाकर हमारे हिस्से के सवाल मजबूती से उठा सके। मतलब यह भी के अरविंद यह विश्वास करवाने में कामयाब रहे के उन्हे वोट दिया जा सकता है। वह इस लायक हैं। ‘डिज़र्व’ करते हैं। जबकि कभी इस पार्टी के बनने या उन्हे मैगसेसे पुरस्कार मिलने के बाद बात नहीं की। बस यह जानते थे कि वह ‘परिवर्तन’ का संचालन करते हैं। एक संस्था है ‘कबीर’, उससे जुड़े हैं और ‘सूचना के अधिकार’ के लिए लड़ रहे हैं। मुकेश की सूचना के अधिकार वाली बुकलेट भी कहीं पड़ी होगी। तो बस इसबार का वोट मज़बूत विपक्ष के लिए दिया। जो अब तक बाहर करते रहे थे, उसे अंदर करने के मौके जैसा। यह उस मुखर विरोध को संस्थानिक वैधता देने जैसा भी होगा। विरोध के उलट रचनात्मक कार्य जैसा। जब वह कुछ करने लायक होंगे। फ़िर कुछ जवाब ख़ुद को भी देने पड़ते हैं। यह पहला जवाब था।

फ़िर जिस दिन दिल्ली में मतदान था लगने लगा अरविंद जीत रहे हैं। हमारा ‘एस्टिमेट’ पाँच-सात हज़ार वोटों के मार्जिन का था। स्कूल में जब छोटे-छोटे बच्चे कहते फ़िर रहे थे, ‘इस बार झाड़ू चलेगी’ तब भी मन नहीं मानता था। तब अपने आप को समझा लेता कि इसबार विधानसभा त्रिशंकु होने जा रही है। उसमें ‘आप’ के हिस्से जादा से जादा पंद्रह-सोलह सीटें आ जाएंगी। पर सरकार नहीं बन पाएगी। पता नहीं उस दिन बड़ी क्लासों के लड़कों का काँग्रेस पार्टी वालों की पदयात्रा में मचाये शोर को अनसुना कर दिया। वहाँ चारदीवारी के पास खड़े बच्चे ज़ोर ज़ोर से चिल्ला रहे थे, ‘झाड़ू झाड़ू झाड़ू..!!’

इस बीच एक कमज़ोर-सा स्टिंग ऑपरेशन भी बरसाती मेंढक की तरह टर्राता फुदक रहा था। पर वे लोग नहीं समझ सके जिन्होने ठान ली है वह अब उन्हे छोड़ेंगे नहीं। शाज़िया तीन सौ छब्बीस वोटों से हारी हैं। आरके पुरम वाले मतदाता पर ही इसका असर पड़ा अभी शोध से इसे साबित करना बाकी है। जिन्होने वोट दिया तो क्यों और जिन्होने नहीं दिया तो क्यों नहीं?

दोनों बड़ी पार्टियाँ जिस हक़ीक़त को जानबूझकर स्वीकार नहीं कर रही थी, वही इनके चुनाव जीतने पर बधाई दे रही थीं। आज केजरीवाल अपने कौशांबी वाले घर से वैशाली मेट्रो स्टेशन आएंगे। वहाँ से मेट्रो पकड़ बाराखम्बा उतरेंगे। कभी कोई सोच भी नहीं सकता था। उनका मुख्यमंत्री उन्ही की तरह सफ़र करते हुए अपने शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होने जा रहा है। यह कोई छोटा-मोटा परिवर्तन नहीं है। बस उसकी शुरुवात है। यह दिल्ली जितनी उम्मीदों से तुम्हारी तरफ़ देख रही है उस पर ऐसे ही खरे उतरते रहना। भले अभी तक उन पचास पन्नों से नहीं गुज़रा जिसे तुमने मेनेफ़ेस्टो कह कर छपवाया है। दिल्ली को समझने के लिए वह एक और दस्तावेज़ है। योगेन्द्र यादव की मेहनत दिखती है। कहने को तो और भी बातें हैं। होती रहेंगी।

अभी बस अब इंतज़ार कर रह हूँ कब सत्ताधारी ‘आप’ पार्टी जंतरमंतर पर दिल्ली में बिजली देने वाली इजारेदार कंपनियों की बढ़ी हुई दरों को कम करने के लिए अनशन शुरू करेगी। पर यह भी कहता चलूँ के भले हम मंदिर मार्ग पर रहते हों पर आज रामलीला मैदान पर मुझे न ढूँढना। न जंतर मंतर पर कभी आने वाला हूँ। मुझे यहीं रहने तो। तब मन किया तो देखेंगे। अभी नहीं। और रवीश मान क्यों नहीं लेते कि हमारे हिस्से की कुछ उम्मीदें तो आप भी कर रहे हैं।

{अभी दुबई से ख़बर आ रही है फ़ारुख़ शेख़ नहीं रहे। बीती रात ह्रदयगति रुक जाने के कारण उनका निधन हो गया। दीप्ति नवल का जोड़ीदार चला गया। चश्मे बद्दूर की दिल्ली। अब कौन तालकटोरा गार्डन में दिखेगा। }

दिसंबर 27, 2013

बीना की कहानी: मैं ज़िंदा हूँ

साल के आखिरी दिन। कितनी ही तरहों से अपनी तरफ़ खींचते हैं। समेटने जैसे भाव से भरे हुए। पैर में मोजें हैं, फिर भी पैर ठंडे हैं। रात रज़ाई लगता है भीगी हुई है। पैर सिकोड़े वहीं नींद का इंतज़ार करते करते लुढ़क जाते हैं। कल सुबह ही निकालना है इसलिए मेज़ पर हूँ। के कुछ-कुछ लिखता चलूँ। वरना ये दिल्ली की ठंड तो किसी लायक नहीं छोड़ेगी। अभी सोलह दिसंबर मिहिर ने ‘फ़ेसबुक’ पर बताया के रात ग्यारह बजे परेश कामदार की फ़िल्म ‘खरगोश’ आने वाली है। प्रियंवद की कहानी पर आधारित। मन में बिठा लिया था इसे बिन देखे तो सोएँगे नहीं। पर शायद जादा थका हुआ था। मोबाइल पर ‘रिमाइन्डर’ भी लगा लिया था। फ़िर भी सो गया। बात दिमाग से उतर गयी लगता।

पर नहीं उतरी इन ठंडीयों की शुरुवाती रात जब ऐसे ही अचानक डीडी भारती पर दीप्ति नवल की एक फ़िल्म आ रही थी। ‘दीक्षा’ पर बात करते हुए यहीं तो ख़त्म किया था कि जल्द इसपर बात करेंगे। पर दिन बीतते गए बात रह गयी। फ़िर तब से यह बात भी दिमाग में घूमती रही कि पता नहीं क्यों शबाना आज़मी, स्मिता पाटील की तरह दीप्ति नवल को वैसी सशक्त अभिनेत्री नहीं माना जाता। अभी भी इसका कोई जवाब मेरे पास नहीं है। फ़िलहाल अभी कोई बहाना नहीं। बात सीधे ‘कथ्य’ पर।

फ़िल्म में आलोक नाथ ऐसे युवक की भूमिका में हैं जो अभी शादी करने को तय्यार नहीं है। उम्र के लिहाज से परिवार वाले जिस लड़की को चुनते हैं, वह कैसी है, यह भी कुछ ख़ास नहीं जानते। लड़की को जानने के कितने अवसर मिले यह प्रश्न ही नहीं उठता। लड़के के विरोध के बावजूद शादी करा दी जाती है। दोनों अब पति पत्नी हैं। लड़की की तरफ़ से भी ऐसी कोई असहमति हो दिखाई नहीं देती। दिखाई देना उसके चरित्र पर संदेह की तरह है। इसलिए भी इसके लिए कोई जगह नहीं है। पर उसे लग जाता है जिसके साथ उसका विवाह हुआ है, वह उसे पत्नी के रूप में स्वीकार नहीं कर रहा। वह कहता है कि वह उसे प्रेम नहीं कर सकता। पत्नी नहीं मान सकता। उसके कुछ सपने हैं। जो अभी पूरे नहीं हुए हैं। उन्ही के लिए उसे जीना है। 

स्थितियाँ तब और जटिल हो जाती हैं जब घर को चलाने वाला एकमात्र ‘जीविकोपार्जक’ लड़का एक रात बिन बताए घर से चला जाता है। यह किस श्रेणी का ‘पलायन’ है इसपर कुछ नहीं कहा जा सकता। किन्ही भूमिगत क्रांतिकारी गतिविधियों में उसकी संलिप्तता प्रकट नहीं होती। इसलिए इस तरह उसका जाना शादी के निर्णय की एक प्रतिक्रिया के रूप में ही स्पष्ट होता है। अब उन सदस्यों के सम्मुख घर गृहस्थी चलाने का आर्थिक संकट है। ‘अर्थ’ के बिना कुछ संभव नहीं। इस आपातकाल में बूढ़े सास-ससुर बीना को किसी तरह नौकरी करने के लिए राज़ी कर लेते हैं। इस तरह वह किसी दफ़्तर में मुलाज़िम हो जाती है।

नौकरी का मतलब सिर्फ़ महीने की तयशुदा तनख़्वाह ही नहीं है। यह एक स्त्री को कई सारी स्वतन्त्रताओं के पास लाने, उन्हे उपभोग करने का एक अवसर है। उसे बाहर निकलकर सारे निर्णय ख़ुद लेने हैं। जो निर्णय, जो क्रियाकलाप पुरुषों के संदर्भ में स्वाभाविक व नैसर्गिक प्रतीत होते हैं, वही स्त्री के संदर्भ में, कितना असहज करते हैं; इस फ़िल्म में कई-बार सतह पर दिखाई देता है। पुरुषों के अपने कार्यक्षेत्र में काम करने वाली महिला सहकर्मियों से मित्रता को कोई भी किसी भी तरह से आपत्तिजनक नहीं मानता। लेकिन समानांतर चलने वाली धारा लड़कियों के लिए किसी ऐसे प्रसंग में किसी भी तरह सम्मिलित होना शोभनीय नहीं। ऐसा दीप्ति के साथ भी हो सकता था। अगर उसका पति इस कथानक में उपस्थित होता। क्योंकि वह वहाँ इन क्षणों में माजूद नहीं है इसलिए पैसा कमाकर घर चलाने वाली बहू पर बूढ़े दंपत्ति कोई पाबंदी नहीं लगाते। न कभी कोई सवाल ही पूछते हैं। सवाल पूछना उन नियमित पैसों का निषेध है। उस स्त्री का चारित्रिक हनन है। वह तो अब इसे ही अपना कमाने वाला बेटा मान चुके थे।

ध्यान देने लायक शब्द है ‘बेटा’। बेटा मतलब नौकरी करके पैसा कमाने वाला। और पैसा मतलब निर्णय लेने की स्वतन्त्रता। अब चूँकि बीना इस भूमिका में हैं इसलिए कथानक उन्हे थोड़ी आज़ादी भी देता है। वह उसी दफ़्तर में काम करने वाले एक पुरुष की तरफ़ आकर्षित होती जाती हैं। उससे प्रेम करने लगती हैं। यह अपने अधूरेपन को भर लेने का निर्णय भी है। 

कहानी अब जटिल और असहज होना शुरू होती है। इसके दो क्लाइमैक्स हैं। उनमे से पहला यह कि उसके सास ससुर के कथनानुसार ही वह पंकज कपूर की तरफ़ जाती हैं। और वही शादी करने के लिए दबाव भी बनाते हैं। सिर्फ़ इतना ही नहीं वह यह भी कहते हैं के शादी के बाद दोनों उन्ही के घर में रहें। उनकी बहू के इस नए पति के रूप में उन्हे अपना लौट आया बेटा ही लगता है। और इसी तरह बहू के साथ उसके पति की आमदनी भी पुराने दिनों की तरह बे-नागा बनी रहेगी। उनके लिए अपनी बहू की शादी करवाने का निर्णय आर्थिक निर्णय है। वह किसी भी कीमत पर नहीं चाहते थे कि शादी के बाद उनके घर की इज्ज़त किसी दूसरे घर चली जाये। उसे उन्ही के घर पर बने रहना होगा। सब कितना क्रांतिकारी फ़ील दे रहा है न! हम उस यथा-स्थितिवादी ढाँचे कितनी तरहों से तोड़ रहे हैं। किस तरह से यह उत्तर आधुनिक हो जाने की हद तक अपने को मोड़ते रहे हैं। कि अचानक दूसरा क्लाइमैक्स घटित होता है।

जिस रात के बाद आने वाली सुबह दोनों की शादी होने वाली है, अचानक उसी रात बीना का ‘विधिसम्मत’ पति वापस लौट आता है। यह लौटना, उन्ही बने बनाए साँचों में वापस जाना है। बीना के लिए यह कैसी स्थिति है? इसे ‘त्रिशंकु’ कहना उस औरत की मनः स्थिति को कम करके आँकना है। जिन तरहों से वह अपने नए कल के सपनों को बुन रही थी, अचानक वहाँ, उसका बीता कल उपस्थित होकर, उन संभावनाओं को तत्काल स्थगित कर देने के आग्रह के साथ सामने आता है। जिस पति ने उसे अपनी पत्नी नहीं माना, उसके लिए उसे अपने निर्णय से पीछे हटने के लिए कहा जाने लगता है। सास-ससुर के उनके बेटे के वापस आ जाने के बाद का व्यवहार उन्ही खोहों में लौटा ले जाता है। जहाँ अब उनकी बहू उनके बेटे के लिए ही है। उसकी कोई इच्छा अब स्वीकार्य नहीं। वह अपने उस रात ख़ुद को कमरे में बंद इस सारे सवालों के जवाब माँगती है। बंद दरवाजे के पीछे से आते जवाब उसे इस चारदीवारी में कैद रखना चाहते हैं। पर ऐसा करके वह अपने पति को अपनी देह छूने के नैसर्गिक अधिकार को न देकर उसके अहं को चोट पहुँचाती है। यह मर्मांतक प्रहार पुरुष सहन नहीं कर पाता। पति तो बिलकुल नहीं। यह उसे रौंदने से मना कर देना है।

अब इस जगह पहुँचकर उसे क्या करना चाहिए, से जादा महत्वपूर्ण पुरुष की भूमिका है, जो उसके पति के रूप में यह जान लेना चाहता है, के उसके अपने पुरुष सहकर्मी के साथ किस सीमा तक सम्बन्ध थे? वह सीधे-सीधे यह जानना चाहता है कि दोनों के बीच दैहिक सम्बन्ध तो नहीं हैं। यह उस योनि की शास्त्रीय घेराबंदी का एक और अध्याय था। जहाँ उसके पति के आते ही घर से बाहर आने के सारे मौके ‘पदस्खलित स्त्री’ के लिए बंद कर दिये जाते हैं। उन बंद कमरों से आती चीख़ों में उसके पति के बलात शारीरिक सम्बन्ध बनाने की पीड़ा चित्कार कर रही थी। एक स्त्री अपनी इच्छा के विरुद्ध अपनी देह के लिए लड़ रही है। यह उसकी इच्छाओं का निषेध है। यह किस भी स्वतंत्र कल्पना की मनाही है। उसे अब सोचना भी बंद कर देना होगा। समाज उससे यही चाहता है।

{जो पिछली कड़ी तक नहीं पहुँच पाये, उनके लिए, दीक्षा : दैहिक शुचिता का स्त्री पाठ }

दिसंबर 26, 2013

बीती रात बकाया बातों की किश्त

रात। ऊपर आया। लेटने के साथ नींद को नहीं आना था। नहीं आई। पता नहीं बेतरह क्या-क्या सोचता रहा। सोचता रहा क्या-क्या बाकी रह गया। जिन्हे लिख लेना था। पर नहीं लिखा। पीछे एक और रात इसी इंतेज़ार में जागता रहा। फ़िर ख़्याल आया। लिख ही क्यों रहे हैं? लिखना इतना ज़रूरी काम कैसे है? इसके बिना क्या हो जाएगा? इस बात को कभी नहीं लिखा के हर सालगिरह पर इस बात पर पहुँचता के पाँच साल बाद लिखना बंद कर देंगे। सबसे जादा इसबार महसूस किया। तब भी लिखा नहीं। पाँच साल ही क्यों? पता नहीं। पर गिनती यहाँ आकर रोक देने का मन है। तीन साल हो चुके हैं। ऐसा नहीं है फ़िर मन किया तो इसे बदल नहीं सकेंगे। पर अभी इसी के पास हैं।

वहीं देखते हैं तो ‘ब्लॉगिंग’ के शुरुवाती दिन याद आते हैं। कैसे इन सालों में लगातार यहाँ रहने की ज़िद इधर रोके रही है। वरना लगता है कुछ ख़ास कहने को है नहीं। कुछ बेचैनी है। जो अभी बेचैन करे रहती है। कुछ उधेड़बुन लगातार चलती रहती है। दिमाग में। रवीश लिखते है ‘कहने का मन होता है’। जब तक मन है तब तक कहते रहेंगे। अभी ज़िद से काम चल रहा है। जैसा कहीं नहीं पढ़ते, वैसा लिखने का मन है। मौसम से बेख़बर रहने का मन नहीं है अभी। कुछ असहमतियाँ हैं, जिन्हे बहीखाते में दर्ज़ करते चल रहे हैं। जब असहमत नहीं रहेंगे, नहीं लिखेंगे। नहीं कहेंगे। एकसाथ कितनी ही बातें चल रही हैं। अस्पष्ट, व्याघातक, अंतर्विरोधी। अतार्किक वक्तव्य की तरह। पर क्या करें। यही सब तो हैं जिनसे बने हैं। इन्हे कैसे न मानें। कैसे न कहें।

जब कभी नहीं लिखता तो पोस्टों के साथ अपनी लगाई तस्वीरों को देखने का मन करता है। कितने ही फ़िल्टर लगाए हैं। अपने ऊपर। कितनी ही तहों में जाकर उन्हे ढूँढा हो जैसे। सच कहूँ, अगर तब अपन अनुराग के ‘सबद’ पर न पहुँचते, तो शायद अपने उन दिनों में उस तरह अमूर्त, अस्पष्ट, अनेकार्थी छवियों को लगाने के आग्रह से नहीं भर जाता। इसने उन बेतरह बेतरतीब फ़ोटो में से किसी एक को ढूँढने का धैर्य दिया। उस तरह भी ख़ुद को खोजता। ख़ुद को भरता। अपनी पंक्तियों की तरह एक-एक शब्द को कह लेने वाले रंगों में उन अर्थों को भर देने की कोशिश करने लगा। कोशिश होती कि जो नहीं कह सका वह छवियाँ कह दें। बिन बताए। बिन छुपाए। 

पता है मन किस तरफ़ ढकेल रहा है? एक नाम भर आजाने से सैकड़ों नाम मन नें तैर गए। प्रवीण पाण्डे ने एक पोस्ट लिखी है। कल पच्चीस दिसम्बर को ‘नौ दो ग्यारह’ को बने दस साल हो गए। मन वही दोहराने लगा है। मन कर रहा है उसी पर बात करने लगूँ। अभी नवम्बर में लिखी पोस्ट की तरफ़ जाकर ‘ब्लॉगिंग’ पर लिखने के लिए नीचे से ‘लैपटॉप’ नहीं उठा लाया। ख़ाका बन रहा है। कई सारी चीज़ें है। पर अभी नहीं। अभी मन नहीं है। थोड़ा रुक कर। सबको थोड़ा और तरतीब से लगाना बाकी है अभी। इसलिए। 

रात मन में कई बार पापा की बात घूमती रही। पापा पूछते हैं, अब जनसत्ता में क्यों नहीं आते? उन्हे कुछ नहीं कह पाता। कोई जवाब नहीं है। वहाँ क्यों आता था? यह भी समझ नहीं पाता। अभी आख़िरी बार जून में तो आया था। पर आज से तीन साल पहले इस अख़बार में छप जाना किसी भी तरह से कम बात नहीं थी। हमें जानता कौन था? पर हम भी वहाँ हो सकते हैं। यही उस जगह की ताक़त थी, जिसने हमें बनाए रखा। एक अर्थ में सबसे बड़ी बात थी, बिन लाग-लपेट उन पन्नों पर होना। यह उस मिथक को भी तोड़ने जैसा था कि अख़बारों में छपने के लिए ‘किन्ही’ ‘और तरहों’ के ‘कौशलों’ की ज़रूरत होती है।

इसी महीने की छह और बारह दिसम्बर ‘हिंदुस्तान’ में था। वहाँ के ‘साइबर संसार’ में। ऐसे ही अगर ‘मोहन राकेश की डायरी’ वाली पोस्ट पर बी.एस.पाबला न बताते, तो कभी पता ही नहीं चलता के राजस्थान जयपुर से कोई ‘लोकदशा’ नाम का कोई अख़बार भी निकलता है। कैसा अख़बार है। पता नहीं। पर अगस्त में दोबार वहाँ के पन्नों पर दो पोस्ट। न जाने कैसे ‘शाजहानाबाद’ वहाँ ‘जहानाबाद’ छापकर आया। ऐसे में अगर कोई जहानाबाद में ‘कमला मार्किट’ ढूँढता रहे और वह न मिले तब? फ़िर यह पता न चल पाना थोड़ा खलता है। इन चारों बार सीधे पता नहीं चला। इसलिए भी दायीं तरफ़ लिख भी दिया है कि लेटर बॉक्स में ख़त तो डाल ही सकते हैं के पता चलता रहे, कि कहाँ-कहाँ हम पहुँच रहे हैं। दिल्ली में रहते हैं तो क्या? ‘कॉपी-लेफ़्ट’ नहीं है।

{पिछली रात का पन्ना, जो कहने को होता हूँ..}

दिसंबर 25, 2013

जो कहने को होता हूँ..

ऐसा नहीं है के इन बिन लिखे दिनों में मन नहीं किया। साल ख़त्म होते-होते कई सारी बातें हैं जिन्हे कहने का मन है। मन है उन अधूरी पोस्टों पर काम करने का। पीछे किए वादों पर लौट जाने का। कतरनों को जोड़ पूरे दिन बनाने का। इत्मीनान से रुककर सबकुछ कह लेना चाहता हूँ। जो पास हैं जो दूर हैं उन सबके कानों तक पहुँचने का कोशिश करना चाहता हूँ। कहने को हूँ..पर..

पर इन रुके दिनों में फ़िर वहीं पहुँच गया। लगा अंदर-ही-अंदर लगता कुछ छूट रहा है। उसके पास हूँ। पर पकड़ में नहीं आ रहा। ख़ुद से कहीं दूर। इधर जब भी लिखना शुरू करता, लगता अक्षर भाग रहे हैं। साथ नहीं हैं। वह थिर नहीं हैं। उन्हे पकड़ता नहीं। बस देखता रहता। कैसी-कैसी आकृतियों में बदलते जा रहे हैं। कैसे बिम्ब उभरकर रह जाते हैं। कहने को होता, पर कह नहीं पाता। लगता लिख ही नहीं पाऊँगा।

यह समझ नहीं आता कि अक्सर ऐसा क्यों होता है जब डायरी पर नहीं लिख रहा होता बिलकुल उन्ही दिनों के आसपास यहाँ से भी गायब रहने लगता हूँ। इन दस ग्यारह दिनों में उन पन्नों पर देर तक नहीं रुका। यहाँ मन भी किया। दो चार ‘ड्राफ़्ट’ अभी भी ‘डेस्कटॉप’ पर पड़े हैं। पर अधूरे हैं। कब, किन क्षणों, मानोभावों में उन्हे ख़त्म किए बगैर रहने दिया, पता नहीं। बस लगता रहता जिन पलों में लिख सकता था, बिलकुल अभी गुज़र गया। मन उचट जाता। खाली-खाली सा। अनमना नहीं। फ़िर भी नहीं लौटता।

इसके पीछे लगता है भावातिरेकों को हू-ब-हू उतार लेने की ज़िद काम करती रही। उस वक़्त जैसा लग रहा है, उसे वैसे न कह पाने की वजह से नहीं लिखता। ‘लिपि’ के शब्द थोड़े कमज़ोर लगते। लगा आवाज़ अपनी गतिकी में अलग तरह से इन्हे कह सकती है। शब्द उन भावों से कुछ दूरी पर हैं। लगता आवाज़ थोड़ा पास होगी। वहाँ होते उतार चढ़ाव उन्हे पकड़ लेंगे। कुछ दिन उन रातों को हाथ में मोबाइल लिए उसके ‘वॉइस रिकॉर्डर’ पर अपनी आवाज़ सहेजता रहा। जो जैसा महसूस हो रहा है, उसे उसी तरह कहते रहने में लिखने में लगने वाले वक़्त से जादा गति है। शब्द वैसा चित्र नहीं खींच सकते, जैसे आवाज़ ध्वनि बिम्बों को रचती है। अँधेरे से होकर गुज़रने वाली आवाज़ का जादू खींच रहा था। तब लगता ऐसा ही तो लिखना था। 

ऐसा पहली बार नहीं कि अपनी ‘भाषिक योग्यता’ को लेकर इस तरह सोच रहा हूँ। इस माध्यम में आने से पहले भी कई-कई बार लगता अपने यहाँ शब्द, वाक्य, अक्षर, उनका रूप, उनका विन्यास, अपने आप को कह नहीं पा रहा। वह जैसे आना चाहते हैं, उन्हे कोई रोक रहा है। उन्हे जैसा कहना चाहता हूँ, जिस सघनता से कहने का मन होता है, जिस तरह से चीज़ें अंदर ही अंदर उमड़ती घुमड़ती रहती हैं; उन्हे वैसे ही कह पाने में असमर्थ हूँ। यह मेरी ही कमज़ोरी है कि उनमे यह महसूस कर रहा हूँ।

फ़िर यह भी लगता है इतने दिन रुककर लय में वापस आने में थोड़ा वक़्त लगता है। भले अभी पटरी पर नहीं हैं। एक दिन आ जाएँगे। थोड़े जादा पहर लेकर बैठूँगा सब ठीक हो जाएगा। यह ठहराव ठहरेगा नहीं। ऐसा भी नहीं है के इसे ‘जॉर्ज ऑरवेल’ की तरह ‘रायटरस् ब्लॉक’ कहकर उपन्यास लिखने का मन हो रहा हो। यह इस बीतते साल में कम पढ़ने का नतीजा है। ऐसा नहीं है के दूसरों का लिखा पढ़ने के बाद उनकी तरह लिखने बैठ जाऊँगा। या येकि उनके शब्दों को उठा उठाकर अपनी जेबें भर लूँगा। यह पढ़ना उन शब्दों शैलियों विन्यासों संरचनाओं से गुज़रने की तरह है। अंदाज़ लगाना है के कोई कैसे लिखता होगा। किन किन तरहों से अपनी बात कह सकता है। उन क्षणों में वह कैसा नहीं होते जाना है। कैसे भाषा बरतकर चलने के बाद वह अभीष्ट आकार में बदलती जाएगी। पढ़ना इस तरह से भी होता है। एक लिखने वाला दूसरे लिखने वाले से ऐसे भी मिलता है। उन सारे ब्योरों से उसके साथ उसकी उंगली पकड़कर चलता है। इससे पहचान मज़बूत होती है। और मज़बूत होती है भाषा।

ऐसा सोचते-सोचते उस बंद अलमारी से कई बिन पढ़ी किताबें अभी भी बाहर आजाने का इंतज़ार कर रही हैं। देखते हैं इन ठंडी दुपहरों शामों में रज़ाई में उनके साथ बैठने का मौका कब लगता है। और यह भी के इस आख़िरी हफ़्ते में कितनी बकाया बातें कह पाता हूँ..

{थोड़ी बहुत जो कह सका..}

दिसंबर 14, 2013

अच्छा तो तुम्हारे बारे में कह रहा हूँ

जैसे अभी लिखने वाला हूँ कि मुझे नहीं पता के ‘रक़ीब’ का मतलब क्या है। पहली बार सुना। इतनी पास से। सोच रहा था इसके बाद रुक क्यों गया। लाया तो था के बहुत कुछ है, जो कह दूंगा। पर ठहर क्यों गया? कभी-कभी कुछ देर पहले तक मन होता है। फ़िर अचानक वहाँ से हट कहीं और चल जाता है। जैसे अभी। मन बिलकुल भी नहीं है के यहाँ फ़ालतू में बैठे वक़्त बर्बाद करता रहूँ। कितने और भी काम हैं, जो किए जा सकते हैं। जैसे अभी अपनी ही पोस्ट पढ़ने की कोशिश कर रहा था। लगा किसी भी तरह के विराम-चिन्हों को न लगाने के कारण कितनी दिक्कत होती है। पढ़ना कितना मुश्किल हो जाता है। कहाँ कितना कहना है। कहाँ बोलते बोलते रुक जाना है। पता ही नहीं चलता। वह अगले साल के लिए ड्राफ़्ट की है। लगता है कुछ और मरम्मत की ज़रुरत है।

तुमने कह तो दिया। पर इसके पीछे क्या सोच रहे होगे। नहीं पूछा। पूछने का मन नहीं था। एक तो बार-बार उन्ही नामों के हवाले अब कहीं से भी अंदर तक महसूस नहीं होते। उतनी तरहों से उन सबसे गुज़रने का एहसास अब छू भी नहीं पाता। यह कोई ‘स्थितिप्रज्ञ’ होते जाने की तरह नहीं है। पर सच, यह अब कहीं नहीं है। यह वहाँ ठहरने से इंकार कर देना है। इंकार इस अर्थ में कि वहाँ रुके रहने के लिए अब सोचने का वक़्त नहीं है। जब था, तब भी नहीं रुक सके। वह वहाँ से भाग लेने की तरह सामने आया।

यह जितना अमूर्त लग रहा है, उतना ‘एबसर्ड’ है नहीं। क्योंकि उसे तब जीते रहने को अभिशप्त हमारे पास सिर्फ़ अकेले हम थे। इन विस्तारों में जाने को अब दिल नहीं करता। और जब कोई कुरेदने की हद तक वहाँ घुसने लगता है तब टीस नहीं उठती। लगता है वह इतनी पास नहीं रहा। वह समझ नहीं रहा। बस कहे जा रहा है। बिन यह जाने कि उसके बोले जाने से कई साल पहले, वह व्यक्ति, उन जगहों से अपने ठीहे उठा चुका था। वह वहाँ अब नहीं पाया जाता। अगर वह उसे आज भी वहीं दिख पड़ता है, तब यह, उनके बीच, किसी टूटे तार की तरह है। उसकी मरम्मत करना बाकी है। आपस की समझदारी में वह पीछे छूटता गया है।

यहाँ किसी के नाम देने की ज़रूरत नहीं है। जिससे बात कर रहा हूँ, उसे पता है। इस अर्ध-विराम की तरह वह भी जानता है कि वह रुक तो गया, पर उस अंतराल के बाद, वहाँ से चला नहीं। चलने की तय्यारी में वह कभी नहीं चलना चाहता। रुके रहना चाहता है। वह तब तक रुके रहना चाहता है जबतक कि वह चाहे। वह अपने पूर्वाग्रहों में इतना जटिल होता गया है के किसी तरफ़ वह नहीं खिसकता। खिसकना विचलन है। उनके संवाद की सम्भावना में लगते पैबंद की तरह। उसे पैबंद पसंद नहीं। 

क्या लिखे जा रहा हूँ, नहीं समझना चाहता। बस लिखे दे रहा हूँ। कि इन हिज्जों को कभी मौका लगे देख लेंगे। अभी बस कह लेते हैं। कह लेना ज़रूरी है। ऐसे दिमाग को खाली कर पलटुंगा, तो सब करिने से लगा होगा। कहीं कोई अव्यवस्था नहीं होगी। वह जान चुका होगा के वह कहाँ छूटा रह गया। उसे अभी कितनी दूर और चलकर आना है। यह उसकी ज़िद है। नहीं चलने की। नहीं जानने की। जबकि कहता रहा हूँ तुम्हें वहाँ से हटना होगा। फ़िर भी वह वहाँ से हिलने को तय्यार नहीं है। उसे लगता है मुझे समझने के सारे औज़ार उसके पास पहले से हैं। यही उसका ‘राईटरस् ब्लॉक’ है। मुझे ‘प्लॉट’ तो समझा, पर कभी अपने मुताबिक़ ‘स्क्रिप्ट’ नहीं लिख सका। उसने कभी कोशिश ही नहीं की। सिर्फ़ नेताओं की तरह दावे किए। उन्हे कभी पूरा नहीं किया।

यही तो है जो हमें रोके रहता है। मैं उसे इसी तरह लेता हूँ। के इस तरह से वह कभी आगे नहीं बढ़ना चाहता। न मैं कहीं से टरने वाला हूँ। उसे लेकर जो आग्रह हैं, वह भले पूर्वाग्रह बन गए हों। पर उनसे अब पलट नहीं सकता। वहाँ से कहीं जा नहीं सकता। तभी तो लगता है वह मूलतः ‘पुरुष’ ही है। किसी विचार ने उसपर कोई काम नहीं किया है। वह अपने निर्णय ले चुका है। उन्हे भी कभी नहीं कहता। पर पता है, उसको लेकर वह क्या सोचता होगा। उसका ऐसे सोचना ही उसे ऐसा बनाता है। आवारा सोच का। ख़ालिस। बारह आने का। किसी को लगे कि यह सब उसके लिए कह गया हूँ तो मुझे भी बता देना। मुझे भी पता चल जाएगा वह कौन है जिससे इन बीतते सालों में इतनी सारी बातें ‘रिलेट’ होती गयी हैं। बताना ज़रूर। क्योंकि लिखते वक़्त वह कौन है नहीं जानता..

दिसंबर 13, 2013

सबसे ज़रूरी है इस रंग के मिथक का टूटना

कई दिनों से राकेश की बात घूम रही है। के हम लड़कों में गोरे रंग के प्रति इतनी तरह से पूर्वाग्रह पैठ बना चुके होते हैं कि हम लड़कियों में वही ढूँढते रहते हैं। बात किनसे करनी है, कैसी करनी है, कितनी करनी है। सब सवाल इसी रंग से निर्धारित होते जाते हैं। हम उसी लड़की को अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार करना चाहते है जो ‘गोरी’ हो। अगर यह लड़कों के मामले में चयन की सुविधा का प्रश्न है तब साँवली लड़कियों के चुने जाने की उतनी ही कम सम्भावना रहती है। प्रेम का प्रस्थान बिन्दु त्वचा का विशेष रंग ही होता है। कि अगर कल शादी की नौबत आ भी जाये तब वह अपने घर में कह सकें। गोरी लड़की है। चेहरा मोहरा भी ‘टिंच माल’ की तरह है। पूरे मोहल्ले में ऐसी शहराती लड़की मिल जाये तो नाम बदल लेंगे। अब हम शादी करेंगे, तो इसी से।

यह अपने आप में शोध का विषय है के टीवी में विज्ञापित गोरे होने वाली ‘क्रीम’ लगाने वाली कितनी लड़कियों के प्रेम प्रसंग चल रहे हैं। कितनों के साँवले होने के कारण नहीं चल पाये। इसे शिष्ट भाषा में पूछे तब यह कि लड़के उनकी तरफ़ कब आकर्षित हुए? उस क्रीम को लगाए जाने के पहले या उक्त क्रीम के प्रयोग के बाद? इसी समानुपात में यही प्रशनावली साँवले लड़कों से भी पूछे जाने लायक है। कि वह खुद को कब जादा लड़कियों से घिरा पाने लगे। कब लड़कियाँ आस-पास भिनभिनाने लगीं।

यह ‘रंगभेद’ उन लड़कों को किन तरह के भावों से भर देता होगा जिन्होने साँवली लड़की चुनी। या वह इतना पढ़-लिखने के बाद इस सर्वमान्य सिद्धांत से खिसक उन लड़कियों की तरफ़ आकर्षित हुए। चलो कैसे भी हो गए। पर अब क्या? मौका था किसी गोरी चिट्टी के प्यार में पड़ते। वह भी हाथ से गया। मिली भी तो यह। अब वह कैसे अपने घरों में किस मुँह से शादी की बात चलाएँगे। उस लड़की की तस्वीर कैसे डाक से, फ़ैक्स से, ईमेल से भेज पाएंगे। ‘फोटोशॉप’ का उपयोग किया तब क्या गारंटी है कि उनकी प्रेमिका में ‘ऐश्वर्या राय’ की तरह अपनी त्वचा के रंग के प्रति वही विचार प्रवाहित नहीं होगा। परिवार वाले तुरंत कह देंगे ‘यही करिया रंग वाली मिली रही। जब आपन मन की किए थे, तब कउनो दूसर नाय देख सकत रहे..?’ बुआ तुरंत अम्मा की बात दोहरा भाभी की तरफ़ हो जाएंगी कि ‘सब लड़कियां मर गयी रहीं का। कउनो गोरहर लड़की नाय धुढ़ सकत रहे..?’

हो सकता है आने वाले समय में कोई इस क्षेत्र में नयी-नयी कूदी क्रीम उत्पादक कंपनी अपने सर्वेक्षण में उन बलात्कार पीड़ित स्त्रियों के रंग के आधार पर इस निष्कर्ष पर पहुँच जाये कि उनकी क्रीम फ़ेयरनेस क्रीम नहीं ‘डार्कनेस क्रीम’ है। जिसे लगाकर आप किसी भी तरह के यौन शोषण से बच सकती हैं। जिसके साथ उसका यह दावा भी काम कर रहा होगा कि उनका यह सर्वे इसलिए भी प्रामाणिक है क्योंकि ‘अमुक टुडे’ के साथ हुए सेक्स सर्वे के आँकड़ों का प्रयोग कर वह इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि पुरुषों ने विकल्प देने के बाद गोरी महिलाओं के साथ यौन संबंध बनाने को प्राथमिकता देने की बात स्वीकारी है। इसके साथ उनका तीसरा पायलट प्रोजेक्ट ‘सेक्सकर्मियों’ के बीच सफ़ल रहा है। जिनमे इनकी क्रीम लगाने के बाद उन प्रयोगकर्ताओं की आमदनी में गिरावट दर्ज़ की गयी है। पुरुष साँवली महिलाओं की तरफ़ आकर्षित ही नहीं हुए। इसलिए भी इसे खरीदा जा सकता है।

भले आज हम इसे स्त्री विरोधी वक्तव्य कहकर ख़ारिज करने पर तुल जाएँ, पर यह उतना ही सच है जितना कि उन विज्ञापनों का झूठ। यह इन प्रेम सम्बन्धों से लेकर विवाह से पहले लड़कियों की परेड से लेकर न-मालुम कहाँ तक अपनी पैठ बना चुका है। ख़ून में साँसों की तरह घुल चुका है। हमें अपनी लड़ाई लड़नी है। सबसे पहले सबसे ज़रूरी है इस रंग के मिथक का टूटना।

दिसंबर 09, 2013

ढूँढे जाने लायक बनने की लड़ाई

सड़क। उसका किनारा। किसी सागर से कम उथला नहीं। बस दिखाई नहीं देता। बस कभी-कभी महसूस होता है। जैसे इन शामों को। जब ठंड थोड़ी बढ़ रही होती है। सूरज कहीं दिख नहीं रहा होता। अँधेरा उन रौशनियों के गायब हो जाने के इंतज़ार में कहीं किसी कोने में घात लगाये बैठा रहता है। दिल्ली का मौसम अभी इतना ठंडा नहीं हुआ है। यह मौसम की वर्गीय व्याख्या है। मेरे हिस्से का सच। पर चलते चलते जब कुछ दिख जाता है तब वहीं रुक उसे महसूस करने को जी चाहता है। पता नहीं इन दिनों की शामों में ऐसा क्या है जो अकेले रहने की तरफ़ ढेकेले देता है। जिसके पास होने को मन करता है वह अभी नहीं है, शायद इसलिए। पर उन बीतते क्षणों में आती जाती साँसें लगातार एकांत को रचती रहती हैं। बिलकुल अकेली। उसमे कुछ कहने का मन नहीं होता। बस चुपचाप धीरे-धीरे बढ़ते रहो। जैसे चल कर कहीं नहीं जाना। कहीं नहीं पहुँचना। बस कहीं ख़ुद को लेकर गुम हो जाना।

जो गुम हैं। कभी-कभी दिख जाते हैं। इनकी गुमशुदगी कहीं नहीं दर्ज़ है। इन्हे कोई नहीं ढूँढ रहा। कोई नहीं चाहता कि इन्हे पहचान लिया जाये। इनका चीन्हे जाना ख़तरनाक है। फ़िर भी वह ऐसे ही मिलते रहे हैं। रोज़। बेनागा। कहीं न कहीं। आसपास। हमारी आपस में कोई पहचान नहीं है। फ़िर भी जान जाता हूँ। वही हैं। वह इस बार छोटे-छोटे बच्चों हैं। लाल रंग की पोशाक में। किसी टेंट हाउस के उस रात के दिहाड़ी। वह शनिवार रात उस रेड लाइट पर, किसी अनाम शादी में लट्टुओं के गमले उठाए, अभी कुछ देर बाद, बारात के साथ अपने भारी हो गए पैरों के साथ घसिट रहे होंगे। कोई नहीं पूछेगा इन्होने आखिरी बार कब ख़ाना खाया। इन्हे ठण्ड तो नहीं लग रही। वह दूल्हा जो घोड़ी पर बैठा नज़रे नीची नहीं कर रहा। जिसकी गर्दन में अपनी होने वाली पत्नी की तरह कमर में कोई बल नहीं पड़ रहा। वह अधीर-सा घोड़ी को भगाने के मंसूबे बना रहा है। पर वह ऐसा कर नहीं पाएगा। बिलकुल ऐसी ही स्थिति तब आएगी जब रात ढले यह सब पैसा मांगने जाएंगे और उसका हाथ बटुए पर नहीं जा सकेगा। हाथ कहीं रुक जाएगा। 

कहीं न कहीं तो यह सब भी रहते ही होंगे। इनका भी कहीं घर होगा। जो अभी उन बिजली वाले गमलों के सभी बल्बों के जल जाने की ‘टेस्टिंग’ कर रहे हैं। इन्हे ठण्ड लग रही है। और अभी उस बंद पड़ी ‘एनडीएमसी’ की दुकान के आगे कहीं से ढूँढ लाये बड़े से रबड़ के टुकड़े को जला चुके हैं। उसका धुआँ इनके सपनों की तरह जादा ऊपर तक नहीं जा पा रहा। ऊपर से गिरती सीत में वह पहली मंज़िल तक पहुँच थक गया है। उसकी कालिख उन सपनों के कभी न पूरे होने की कहानी कह रही है। कहानी कभी ख़त्म नहीं होगी। कभी शुरू नहीं होगी। वह ऐसे ही रुकी रहेगी। उन गाड़ी वालों की गालियाँ सुनती रहेंगी जो इन्हे पछाड़ आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं। इनकी तरह रुक गए हैं। रुकना किसी को भी पसंद नहीं। पता नहीं यह सब कैसे रुकी हुई ज़िंदगी से चिपके उसे जीते रहे हैं?

कितना मुश्किल होता होगा ऐसी जगह साँस लेना। जिसे घर भी नहीं कह सकते। पर वहीं रहने को अभिशप्त हैं। इनसे मुलाक़ात आज अचानक हुई पर रोज़ उस 'सबवे' से गुज़रते हुए उस स्त्री का पति कहीं नहीं दिखता। न उसके माथे पर ही कोई ऐसा चिन्ह है जिससे उसके होने के भौतिक प्रमाण मिल सकें। शायद वह उसके दिल में ज़िंदा है। उसने तीन पहियों वाली हाथ गाड़ी अभी भी छोड़ी नहीं है। रखे हुई है। पिछली ठंड तक इसे चलाने वाला भी था। आज उसकी दो लड़कियाँ औए एक लड़का उसे घेरे रहते हैं। घेरे रहते हैं उस तीन ईंट वाले चूल्हे को भी। जिससे उठता धुआँ इनके पेट की आग को शांत करेगा। खाने में वह क्या बनती होगी इससे ज़रूरी है रोज़ सुबह उठकर अपने ज़िंदा होने का सबूत देना। एक-एक सेफ़्टी पिन उन चादरों की दीवार को बाँधे हुए है। कहीं से उघड न जाये। उघड़ना उसकी गरीबी हमारी सत्ता की एक व्याख्या भर नहीं उसकी सबसे बड़ी आलोचना है। यह प्रतीक नहीं उसका जीवित बिम्ब है। जिसे कोई समझना नहीं चाहता। कोई नहीं देखना चाहता। बड़ी होती लड़कियाँ कहाँ जाएंगी। लड़का क्या करने लग जाएगा कोई नहीं कह सकता। ख़ुद उस माँ को इन्हे बड़ा करने की क्या कीमत देनी होगी वह अभी भी क्या दे रही है पता नहीं।

कम से कम वह माँ यह तो नहीं चाहती होगी कि उसका बेटा बूढ़ा होकर किसी बड़े शहर में कहीं रेहड़ी लगाकर बेनामी सी ज़िन्दगी जी रहा हो। जिसके जीने-मरने से किसी को कोई फ़र्क नहीं पड़ता। अगर यह सब ज़िंदा रहे तब यह बूढ़े होने की त्रासदी का निषेध नहीं कर पाएंगे। लड़के की माँ रोज़ उस बूढ़े को देखती है। वहीं उसके चादरों वाले घर के पास। जो रोज़ वहीं खड़ा रहता है। कहाँ से आता है कहाँ जाता है पता नहीं। एक दिन वह कहीं चला जाएगा। गायब हो जाएगा। उसे कोई ढूँढेगा भी नहीं। ढूँढने के औज़ार इन्हे कहीं नहीं देख पाएंगे। यह इस दुनिया में ढूँढे जाने लायक बनने की लड़ाई है। जो यह सब हार चुके हैं।

दिसंबर 07, 2013

मोहन राकेश की डायरी पढ़ते हुए

कुछ ऐसी जगहें होती हैं जहाँ हम ख़ुद होते हैं। अपने आप में बिलकुल नंगे। बिलकुल अकेले। बेपरदा। बेपरवाह। लिखने के पहले, लिखने के बाद, हम कुछ-कुछ बदल रहे होते हैं। शायद ख़ुद को। अपनी लिखी उन बातों को। जो चाहकर भी किसी से नहीं कह पाये। कहते-कहते रुक से गए। रुक गए उन्हे सबकी नज़रों में लाने से पहले। या उसे अपने लिए ही बगलों में छिपाते रहे। कि कोई देख न ले। पहचान न ले। यह जान पहचान ख़तरनाक है। इसलिए उनसे हम उन निपट खाली अकेले क्षणों में उनसे गुजरते रहते हैं। अपने सबसे करीब से देखते पूछते हैं। उन्हे ऐसे ही जीने की ज़िद के साथ। यह हलफनामे हैं। आप-कबूलियाँ हैं। यह हमारी सांसें हैं। हमारी ज़िन्दगी का अहम हिस्सा है।

डायरी के पन्ने ही हैं जो हमें झेलते हैं। हमारी हर बात अपने तक छिपाये रखते हैं। किसी से कहने नहीं जाते। चुपचाप सब सहन करते जाते हैं। इन अबोली मुलाकातों में कभी ख़ुद कुछ नहीं कहते। सिर्फ़ सुनते जाते हैं। उन कही बातों को जज़्ब करते रहते हैं। यह कहने की ज़िद है, पर सिर्फ़ ख़ुद से। इसके अलावे यह बयान कहीं और नहीं हो सकती। दिल के बाहर इनकी यही जगह है। यहाँ हमें कोई देख नहीं रहा। हमारे सिवा। यही ख़ुद से ख़ुद की ईमानदारी है। साहस है।

कई सालों बाद, पिछले हफ़्ते ‘मोहन राकेश की डायरी’ हाथ लगी। न जाने कब से इसे पढ़ने की ख़्वाहिश दिल में थी। सोचता था कहीं एकबार फ़िर दिख जाये। फ़िर जाने नहीं दूंगा। एक लेखक अपनी ज़िन्दगी लिख रहा है। जो सिर्फ़ उसने जी। बिन कहे। बिन बताए। किसी से कह सकने की हद तक। अपने अकेलेपन को भर लेने की तरह। कभी तो कोई समझ पाएगा उसे। वह था। पर कितना अकेला था। कोई पास नहीं था उसके, जिससे वह कह सके। कहना सिर्फ़ साथ होना नहीं है। एक साझेदारी है। उन्हे कोई साझेदार नहीं मिला। वह सिर्फ़ लिखते रहे। बार-बार उन्हे लगता, नहीं लिख रहा हूँ। पर एकबार वह फ़िर लौटते। यह डायरी उन्नीस सालों के दरमियान कई बार टूटती है। फ़िर जुड़ती है। न लिख पाने की टीस बार-बार मवाद की तरह यहाँ हर पन्ने पर मौजूद है। दर्द है। पीड़ा है। अकेली बीतते दिनों शामों रातों की खामोश आवाज़ें हैं। दीवारों से लौट वह बराबर वापस आती रहीं। उन्हे सुनने वाला कोई नहीं है।

आहिस्ते से पन्ने खोल कभी शाम ढले पन्ने पढ़ने लग जाता हूँ। कहीं से भी शुरू कर देने की आदत। यह बेतरतीब होना नहीं है। फ़िर भी ऐसे ही कहीं रुक जाता हूँ। ठहर सोचने लगता हूँ। वह खालीपन कितना तोड़ रहा था। कोई भी इतनी पास नहीं था। जिसे कह सकें। किसी के इंतज़ार में वह कितनी कितनी देर तक वहीं ठहरे रह सकते थे। बिन हिले। बिन कहे। कैसा होते जाना है अकेले रहना। ख़ुद अपनी तरफ़ लौटता हूँ तो लगता है यह सब लिखा ‘डायरी’ में नहीं समाता। रोजनमचा की तरह लिखना आसान नहीं। बराबर लिखते जाना। मन हो न हो। उन पन्नों पर बस दिमागी बयान हैं। उन क्षणों की झुंझलाहटें हैं जो लगातार सोखती रही हैं।

इसे ऐसे भी तो कह सकते हैं कि उस हद तक नियमित नहीं बन पाता। रोज़ कहीं आने की आदत नहीं बन पाती। जितना कि वे सब जो डायरी की छपी तारीखों में ख़ुद को लिखते रहे हैं। शायद कभी उन तारीखों वाले खाँचे में नहीं बैठा पाया इसलिए उन साल वाले पन्नों पर नहीं लिखता। ख़ुद अपनी तफ़तीश करना कष्टकर है। उन दिनों के हवालों को बयानों में तब्दील करना इतना आसान नहीं। बहुत मुश्किल होता है उन खाली छूट गए पन्नों का बोझ। दिल नहीं उठा सकता। कभी मन नहीं होता तो कई-कई दिन नहीं आता। आना पीछे छूटते रहना है। कहीं पीछे छूटना नहीं चाहता। इसलिए भी उन्हे खरीद कभी तारीख़ दर तारीख़ लिखने की पैमाइश नहीं की। यह नोटबुक ही चलती रहे। इसमे ही बराबर लिखता रहूँ, यही सोच अपने को मना लेता हूँ। कि कुछ तो लिखना चल ही रहा है।

अभी तक कुछ जादा नहीं पढ़ पाया। यह पढ़ना नहीं उन भावों उन क्षणों से गुज़रना है। महसूस करना है उन शब्दों के पीछे का एहसास। उन घड़ियों का भारीपन। के कैसे होते गए होंगे हाथ। दिल कितना रोया होगा। कितना हल्का हुआ होगा मन। ऐसा ही क्यों लिखा उन्होने। कोई और ज़िंदगी नहीं हो सकती थी उनके हिस्से? एक रात पढ़ते-पढ़ते जहाँ पहुँचा वहाँ एक जून उन्नीस सौ सत्तावन की एक एंट्री है। वह अभी दिल्ली नहीं आए हैं। जालंधर ही हैं। कॉलेज की उबाऊ ज़िन्दगी से भाग लेने का मन है। माँ साथ ही रह रही हैं। पैरों में दर्द बना रहता है। कभी उनसे ही झगड़ लेते हैं। नौकरी छोड़ने का मन बना रहे हैं। बीयर पीकर सुबहें सरदर्द के साथ शुरू होती हैं। इन्हे फ़िर न छूने की कसमें शाम होते-होते कई बार टूटती रही हैं। ख़ूब घूमते हैं। पैदल रिक्शे पर। ऐसे ही एक शाम बक्शी से बात हो रही थी। उसने कोई किस्सा सुनाया है। जिसमे वह अपने लिए किसी ‘द वूमेन’ कह सकने वाली किसी दिल्ली की लड़की की बात कर रहा है। किस्सा मुख्तसिर यह हुआ के उसने पुरखों की परम्परा के अनुरूप आर्थिक सुरक्षा के अभाव में किसी और लड़के से शादी कर ली। पाल अक्सर इसी ‘द वुमन’ के मसले पर भाषण दिया करता था। मोहन राकेश लिखते हैं:

मैं उससे कह रहा था कि ऐसे वातावरण में मुझे किसी के अभाव का बहुत अनुभव होता है। पुरुष-पुरुष में बहुत घनिष्ठता हो जाती है लेकिन वास्तविक घनिष्ठता एक पुरुष और एक स्त्री में ही संभव है क्योंकि इमोशन की सही परिणति शारीरिक उपलब्धि में ही जाकर होती है। The climax of true intimacy is the complete merger of two bodies. Intimacy is incomplete without that merger and the merger is incomplete without that intimacy. इसलिए पुरुष को स्त्री का सहचर्य मात्र ही नहीं चाहिए- हर पुरुष को एक विशेष स्त्री का सहचर्य ही वास्तविक सुख दे सकता है। It is a question not of a woman but the woman.

यह ‘आधे अधूरे’ लिखने वाले मोहन राकेश की डायरी है। यह उनकी साँसों की कहानी है, जो यहाँ दर्ज है। अनीता राकेश बारह साल रुकी रहीं के सही वक़्त आ जाने पर इसे छपवाएंगी। दोस्त तुम्हें यह डायरी ज़रूर पढ़नी चाहिए। चाहकर भी तुम्हारा नाम नहीं दे रहा। एकबार लिख कर मिटा चुका हूँ। शायद इसके बाद ख़ुद को दोबारा जानने की शुरुवात फ़िर हो सके। तुम्हें ऐसे नहीं होना। यह उन दिनों में ताक़त देती है जहाँ हम सबसे जादा अकेले होते हैं। पता है तुम ख़ुद से बाहर आओगे एक दिन। उस दिन तुम अकेले नहीं रहोगे। और जहाँ तक पेज नंबर उनसठ पर लिखी इस बात है, आगे फ़िर कभी। अभी तो काफ़ी कुछ पढ़ने को बचा है। फ़िर अभी लिखना भी नहीं चाहता कि अपने ऊपर इस विचार का कैसा प्रभाव पड़ा। पड़ा भी या नहीं। यहाँ इसकी अपनी व्याख्या करना अभी बाकी है। और समानुपातिक रूप में वहाँ पहुँचना भी जहाँ स्त्री पुरुष के लिए ऐसा कहे तब इसके क्या मानी हो सकते हैं। अभी जा रहा हूँ। बस इतना कहते हुए के इतनी ईमानदारी से लिखने की कोशिश ख़ुद भी लगातार होती रहे। बस।



{आज देवेश ने फ़ोन कर बताया के कल हिंदुस्तान में यह पन्ना आया है। क्लिक करके वहाँ पहुँच सकते हैं। पेज नम्बर दस। साइबर संसार।  शीर्षक  ‘डायरी के पन्ने’। तारीख बारह दिसम्बर। }

दिसंबर 02, 2013

लड़की होना पर लड़की जैसी दिखाई मत देना

इस जगह जहाँ हम हैं वह कैसी है। इसे ऐसे पूछना चाहिए के यह हमारे लिए कैसी है? जगह या तो हमें ‘स्पेस’ देती है या नहीं देती। यह देना न देना गुणात्मक रूप से कैसा है? किन भूमिकाओं को वह बल दे रहा है। जब यह संचार माध्यम में हो, तब इसका जवाब इतना एकरेखीय नहीं हो सकता। इसके आयाम और गतिकी लगातार हमें गढ़ रहे होते हैं। इस वर्तमान तंत्र में यह ‘माध्यम’ मूलतः यथा स्थितिवादी ही बने रहते हैं। जैसे अगर यह देखा-जाँचा जाये कि हमारे ‘पुरुष’ होने में इनकी क्या भूमिका है? ‘लड़का’ होना कितनी सुविधाओं से भर जाना है। यह इसी अनुपात में समाज में आरामदायक स्थिति में पाये जाना है। कितनी ही सहुलियते बिन माँगे मिलती रहती हैं। यह बड़ी बारीकी से अपना पुनरुत्पादन करता रहता है। हमारे बीच जगह बनाए रहता है। इस सामाजिक ढाँचे ने ख़ुद को बचाए रखने की यही युक्ति अपनाई है।

इसी टेलीविज़न पर इधर एक विज्ञापन तैर रहा है। उसमें रणबीर कपूर हैं और शायद ‘रॉकस्टार’ फ़ेम वही हीरोइन। नर्गिस फाखरी। लड़की खड़ी है। इंतज़ार कर रही है। लड़का देर से आता है। वह अकेली क्यों नहीं चली गयी यह अलग पूछे जाने लायक सवाल है। पर अभी नहीं। नीचे। वह पीछे बैठे-बैठे सवाल करती जा रही है। ‘लुक आय एम नॉट कमफ़र्टेबल’। लड़का कहता है, इतना आरामदायक तो है। लड़की बात दोनों के भविष्य की कर रही है पर रणबीर की हर बात उस ‘हीरो मायस्टरो’ से आगे जा ही नहीं रही। पीछे बैठी लड़की फ़िर पूछती है, ऐसा कब तक चलेगा? लड़का फ़िर कहता है, दूर तक। वह फ़ंकी टाइप कपड़ों में है। उसकी शर्ट ऐसी है जैसे किसी ज़माने में बर्फ़ी के डिब्बे पर चढ़ा कागज़ का कवर। नीचे उतर वह घुटने तक ऊपर चढ़ी जीन्स नीचे उतार रहा है। और वह कहती है, कभी तो ‘सीरिअस’ हो जाओ। लड़का चश्मा उतार एक क़दम पास आकार आँखों में आँखें डाल अचानक कहता है, ‘मैरी मी..’!! यू आर नॉट सीरिअस। लड़की कहती है और लड़का लड़की का हाथ पकड़ता है। फ़िर दोनों अंदर की तरफ़ चल पड़ते हैं।

देखने-सुनने में यह दृश्य संवाद बड़े सरल सहज लगें पर गहराई में यह उतने ही पुरुष-सत्तात्मक चरित्र लिए हुए है। जहाँ रणबीर कपूर वापस पीछे आते हैं और उनकी ही आवाज़ का वॉइस ओवर कहता है, ‘बॉय्ज़ की लाइफ और मायस्टरो की राइड ईज़ी है’। ‘सच आ बॉय थिंग’। अब यहाँ विखंडित न भी करें तो यह दिख ही रहा है के कैसे उस विज्ञापन को गढ़ा गया है। जहाँ लड़की अपने अनिश्चित भविष्य को लेकर चिंतित है। बार-बार सवालों से किसी जवाब पर पहुँचना चाहती है। एक तरह से यह पुरुष की इच्छा पर आश्रित होने की तरह लगने लगती है। स्वयं उसकी इच्छा जैसे उसके लिए कुछ मायने ही न रखती हों। यह हमारे समाज का एक ‘पाठ’ है जहाँ लड़कियों के लिए किसी बंधन की ज़रूरत उन्हे महसूस होती है और उनके समानान्तर लड़के जादा स्वतंत्र रहते हैं। स्त्री अपने लिए जगह बना ही नहीं पा रही। प्रियंका चोपड़ा की ‘स्कूटी’ इसका मुक़ाबला नहीं कर पाएगी। यह पुरुषों का पुरुषों द्वारा संचालित सामाजिक ढाँचा है। यहाँ उनकी पैकेजिंग कुछ अलग हाथों से होती है। शर्तिया यह हाथ पुरुषों के हैं। दिमाग तो हैं ही। 

इससे अलग वास्तविक दुनिया कितनी विद्रुप है, वह यहाँ नहीं दिखती। यथार्थ जितना कठोर है उसकी सघनता हमें कभी भी महसूस नहीं होती। यहाँ लड़कियाँ सच में जैसी हैं, वैसी इन माध्यमों में कभी नहीं आ पाती। वह कैसे अपना रोज़ाना गढ़ रही हैं। कितना कुछ उन्हे अकेले करना है। कितना वह करती हैं। यह नज़र कभी इन घटनाओं को अपने ‘उत्पाद’ के रूप में नहीं देखती। देखना चाहती भी नहीं। यह उसका अभीष्ट नहीं है। उस नज़र को इस पूंजीवादी तंत्र में यथास्थिति को बनाए रखना है। और प्रकारांतर से उन्हे मज़बूत करना। यह नियंत्रण और इस आवारा पूँजी का अपना पाठ है। जिसका नियंत्रण स्त्रियों के हाथों में नहीं है।

अभी उस दोपहर लौट रहा था। मेट्रो स्टेशन से गोल मार्केट की तरफ़। सामने से दसवीं ग्यारहवीं में पढ़ने वाली एक लड़की आ रही है। उसकी पहचान उसके स्कूली कपड़े थे। जर्सी स्कर्ट पहने थके कदमों से वह चल रही है। वह अकेली है। लड़के बड़ी देर से उसके अपने पास से गुज़रने का इंतज़ार कर रहे हैं। इस दरमियान मैं भी इतनी पास आ चुका था के उनके बीच होते संवाद को सुन सकूँ। उन दो में से एक लड़का बोला। ‘इधर देखती तो जा..आई लव यू बोल दूँगा..’!! लड़की कुछ नहीं बोलती। गर्दन झुकाये उनके पास से चुपचाप गुज़र जाना चाहती है। वह गुज़र जाती है। वह मेरे पास से भी गुज़री। बिन पलटे। बिन कुछ कहे। बिन कुछ बोले। उसका सपाट चेहरा देख लगा यह पहली बार नहीं है। ऐसा कई बार हो चुका है। होता रहा है। लड़की का अकेले होना उसे छेड़े जाने लायक बनाता रहा है।

जब कुछ दूर निकाल आया तब पीछे मुड़ा। थोड़ी देर रुक गया। एक नज़र उन लड़कों को देखता रहा। अब किसी भी तरह से पिटे जाने का ख़तरा भी नहीं है। वह अभी भी वहीं खड़े हैं। किसी और के ऐसे ही इंतज़ार में। वह ऐसे ही बोलते रहेंगे। वह ऐसे ही सुनती रहेंगी। सोचने लगा के उस लड़की को रोक पूछा क्यों नहीं। कि वह इन लड़कों को जानती है या नहीं। अगर नहीं जानती तब पुलिस में रिपोर्ट कर इनकी शिकायत क्यों नहीं कर देती। इन्हे ऐसे ही समझाया जा सकता है। पर दूसरे ही क्षण लगने लगता है कितना खोखला है यह विचार। पैबंद लगता। डैमेज कंट्रोल की तरह। अपने आप को बचाता। कि सब वैसे नहीं होते। मैं वैसा नहीं हूँ। वैसे भी मैं तुमसे उमर में कितना बड़ा हूँ। तुम्हें छेड़ूँ ऐसा भी नहीं हूँ। डरो मत। अपने अंदर साहस भरो। कह दो जो नहीं कह रही हो। उसे बता दो तुम भी बोल सकती हो। गाली दे सकती हो। यह चुपचाप गुज़र जाना प्रतीकार नहीं है। उन्हे बता दो तुम अब चुप नहीं रहोगी। बिलकुल नहीं।

और बीती शाम पहाड़गंज की किसी गली से गुज़रते एक लड़की पूरे मुँह को ढके किसी अनाम से होटल से निकली। पीछे दो लड़के जो अटेंडेंट लग रहे थे, उसका ऐसे जाना विस्मित होकर देखते रहे। साथ जो दोस्त था बोला 'कॉल गर्ल' है। यहाँ तो यह सब बिलकुल आम है। पर दिल में उसकी नीची निगाहें धँस गईं कि उस छिपा लिए गए चेहरे के बाद भी वह किसी से आँख नहीं मिला रही है। उसे अभी भी डर है। डर है कोई देख लेगा। और सबसे ख़तरनाक है इस बात का आम होना। वह जो इसके साथ कमरे में था थोड़ी देर बाद बिन मुँह ढके वहाँ से निकलेगा। उसे कुछ भी छिपाने की ज़रूरत महसूस नहीं होगी। तब भी यह आँखें उसे ऐसे देखेंगी। नहीं। उसे डर क्यों नहीं है। वह उस चली गयी देह का खरीदार है। फिर भी नहीं। उसे कोई फ़र्क नहीं पड़ रहा। यही जवाब है। इन सब सवालों का।

अभी कहीं से कभी ऋतुराज की पढ़ी कविता की पंक्तियाँ याद आ रही हैं: ‘माँ ने कहा लड़की होना / पर लड़की जैसी दिखाई मत देना’। यही पंक्ति लिख क्यों ख़त्म कर रहा हूँ, पता नहीं..

{इस पोस्ट का एक छोटा हिस्सा 'हिंदुस्तान'के ब्लॉग कोने 'साइबर संसार' में छह दिसम्बर को 'साहस बटोरकर देखिये' शीर्षक के साथ प्रकाशित हुआ। वहाँ पढ़ने के लिए इसपर चटकाएँ। }

नवंबर 27, 2013

हम दोनों थोड़े खोये-खोये से हैं..

कितना अच्छा होता न कि मैं यहाँ लिख रहा होता और बिलकुल इसी वक़्त तुम्हारी आँखों के सामने खुली किताब में वह दिखते जाते। एक-एक शब्द मेरी लिखाई में वहाँ छपता जाता। स्याही अभी सूखी भी न होती। इतनी तेज़ गति से वह तुम तक पहुँचते जाते। तुम उन्हे छूती तो लगता गाल छू रही हो। बड़े आहिस्ते से। वहीं तुम्हारा हाथ पकड़ लेता। कुछ देर छोड़ता नहीं। तुम कुछ कहती नहीं। बस उस स्पर्श को हृदय में सँजोती रहती। और वहीं पास होती मेरी आवाज़। वह सारे शब्द उन्ही अहसासों से भरते जैसे उन्हे लिखते हुए महसूस करते गुज़रते रहे हैं। फ़िर जैसे तुम होती जाती, वैसे ही इधर मैं भी होता जाता। जानने से भी पहले हम ऐसे होते गए हैं। 

प्यार ऐसे ही एक दूसरे के दिल की तरह होते जाना है। एक दिल में दूसरे दिल का घुलते जाना। खोये-खोये से रहते हुए भी पास रहना। इतने पास कि धड़कन भी सुनाई दे जाये। वहीं पास धीमी-सी भीनी-सी गंध होती। जो तैर जाती। कान के पास से जैसे हवा तैर जाती है कभी-कभी। कभी लगता के अभी कोई छू के गुज़रा है। छू के गुज़रना उन एहसासों से। बार-बार।

यह दूरी रोज़ ऐसे ही रचती रही है। इंतज़ार के उन पलों में जितना अकेला होता जाता हूँ, उतना ही तुम पास चली आती हो। जैसे अभी एक पल बाद जब आँखें खुलेगी, पास तुम होगी। पता नहीं कितनी दिन में ऐसा कितनी बार करता हूँ। तुम्हें बिन बताए। बिन कहे। देखता रहता हूँ तुम्हारा चुप-सा होते जाना। कुछ न कहना। इन पंक्तियों की तरह इंतज़ार करते रहना। अनमने से उठना। बैठ जाना। जैसे उस तस्वीर में जो छत पर खींची थी। यहाँ आने से पहले। तुम्हें साथ लिए नहीं चल रहे थे। बस तस्वीर जा रही थी। तुम कोहनी घुटने पर रखे, हाथ को गालों के पास लाकर बैठी हुई हो। उदास। खोयी हुई। कहीं और देखती-सी। इतनी उदास तुम्हें कभी नहीं देखा। वह अकेले हो जाने की हद तक अंदर जाकर धँस जाता है। लगातार तोड़ता है। पर इसे याद नहीं रखता।

याद रखता हूँ वह तस्वीर जिसमे हम अगल-बगल हैं। तालाब किनारे। वहाँ कछुए हैं। हम उनका इंतज़ार कर रहे हैं। इस बहाने भी साथ हैं। वह बाहर निकलेंगे, तो दिखेंगे। गर्मी का सूरज है। हवा चल रही है। तुम्हारा दुपट्टा उड़ रहा है। तुम उसे संभाल रही हो। और अचानक वह फ़ोटो खिंच जाती है। उसे संभालते वक़्त का चेहरा वह क्षण बार-बार खींचे लेते हैं। के कैसे इतनी जल्दी दिन उड़ गए। यहाँ से लेकर तो बहुत गया था। पर जल्दी से उड़ते गए। उन्हे थोड़ा और रोक लेना था। मिलकर। मिलकर कुछ और रातें साथ छत पर बैठते। उन सुनसान-सी चुप-सी उपस्थिति में गुम से होते एक दूसरे को देखते रहते। देखते रहते उन रातों का और रात होते रहना। 

कुछ हज़ार ख़्वाहिशें हैं। दम निकालती। उन्ही में हमदोनों कैसे-कैसे होते जा रहे हैं। एक ही तरह। एक ही इंतज़ार। वस्ल की राहत। इसी इंतज़ार में खोये-खोये से। बेतरतीब। बेपरवाह। उकताए से। सिलवटों जैसे। किसी को समझ नहीं आ रहे। बस ऐसे हो गए हैं। उलझे-उलझे से। अबूझ। पहेली की तरह। जिनके जवाब हम दोनों हैं। हम एक-दूसरे की तरफ़ खिंचते जा रहे हैं। बड़ी आहिस्ते-आहिस्ते। डोर से बंधे। उसकी झंकार सुनते-सुनते जा रहे हैं उन दिनों की तरफ़। जहाँ दोनों साथ होंगे। साथ होंगी अनगिन यादों बातों सपनों की पोटली। पोटलियों की तहें। तुम आ जाओ। तब देखें और क्या-क्या है उनमे ख़र्च करने लायक। 

परसो शाम आवाज़ और उदास कर गई। अंदर तक खाली होता गया। के तुम आओ तो भर लूँ अपने आप को। इस अकेलेपन में हम साथ हैं। पर साथ नहीं हैं। यह उदासी स्थायी भाव नहीं है। पर है। पता है जल्द दिन ऐसे नहीं रहेंगे। यह रातें करवटों की तरफ़ सिलवटों को बुनती रहेंगी। सुबहें उबासी की तरह नहीं खुलेंगी। लेकिन इन दिनों की होती शामें कुछ अजीब सी हैं। जब अँधेरा जल्दी होकर अपने अंदर किए लेता है, तब यह एहसास सबसे जादा दिल में घूमता कचोटता है। पास क्यों नहीं हैं। उस अँधेरे में उभरती छवियाँ जितना बुनती नहीं, उससे जादा, उस ताने बाने की सीवनों को बड़ी बेदर्दी से तोड़ती हैं। दर्द होता है। उसे सहन करना आसान नहीं। नहीं कर पाते। तब बुनते हैं सपनों की किश्त। यही तो हैं जो हरबार बचा लेते हैं। दोनों तरफ़ से उन अनकहे ख़्वाबों की ख़ुशबू दोनों को साथ महकाती रहती है। हम साथ होंगे। साथ होंगे यह सारे सपने। बोले अबोले। कहे अनकहे। उन्हे हर शाम दोहराते हुए। हर रात देखते हुए।

नवंबर 24, 2013

दीक्षा: दैहिक शुचिता का स्त्री पाठ

हमारे समाज में लड़की ‘बनकर’ रहना इतना आसान नहीं। बनकर रहने में जो ध्वनि छिपी है वह चुनी नहीं जा सकती। वह इसी समाज द्वारा ‘प्रदत’ है। इसमे किसी भी तरह का विचलन स्वीकार्य नहीं। चूंकि समाज का आधार यही बनी बनाई भूमिकाएँ हैं इसलिए इन्हे कोई तोड़ने की कोशिश भी नहीं करता। सच यह समाज हमने कभी स्त्रियॉं के लिए बनाया ही नहीं। कभी उनके लिए ‘स्पेस’ नहीं रचा। यह रचना या उनके लिए बनाना पुरुष की तरफ़ से दी जा रही सहूलियत-सलाहियत की तरह ही है। जिसमे कुछ उसके अधिकार क्षेत्र में है और उस बाड़े के भीतर की कुछ जगह में इन स्त्रियों को समा जाना है। यहाँ उसकी उपस्थिती हमेशा शोषित की ही रही। वह किसी निर्णय को ख़ुद से नहीं ले पाती।

अभी पीछे बीती दिवाली अचानक डीडी भारती पर जा ठहरे। देखा यू. आर. अनंतमूर्ति की कहानी ‘घटश्राद्ध’ पर बनी फ़िल्म ‘दीक्षा’ आ रही है। फ़िल्म वहाँ तक पहुँच चुकी है जहाँ गुरुकुल के आचार्य अपनी बेटी को कुछ दिनों के लिए आश्रम की ज़िम्मेदारी सौंप बाहर जा चुके हैं। वह अकेली ही सारी व्यवस्थाएं संभाल रही है। सहायक कथा में उसका प्रेम प्रसंग वहीं गाँव में रहने पढ़ाने वाले मास्टर के साथ आकार ले रहा है। एक दिन पता चलता है के उसे गर्भ ठहर गया है। इस बात को अब छिपा रखना है कि वह गर्भवती है। चूंकि वह विधवा है इसलिए यह निषेध क्षेत्र में उसकी कमज़ोर-सी सेंध है। जब वहीं गुरुकुल में पढ़ने वाले शिष्यों को इस बात की भनक लगती है तो वे अवज्ञा के साथ-साथ उस लड़की का बहिष्कार तक करने लगते हैं। यह बहिष्कार एक स्त्री के पदस्खला हो जाने के बाद शुरू होता है। वे ख़ुद को पुरुषों की भूमिका में तब्दील कर लेते हैं जहाँ दैहिक सुचिता नैतिकता स्थापित करना उनके अधिकार क्षेत्र में स्वतः आता है। फ़िर वह पुरुष जिससे गर्भ ठहरा है उसके हिस्से यह अपमान कितना आता है, सिरे से गायब है। मास्टर क्यों बच गया या कहानी में वह अंश हैं के नहीं यह मूल पाठ को पढ़ने के बाद ही पता चल पाएगा। पर वह पुरुष है इसलिए ऐसे किसी भी कथित ‘लांछन’ से वह बच निकलेगा। उसका कुछ बिगड़ेगा भी नहीं। फ़िल्म आगे बताती है वह मास्टर गाँव छोड़ भाग चुका है। यह भाग कर जाना भी स्त्री के हिस्से नहीं आता। जिससे वह प्रेम करती थी उसका साथ मात्र देह प्राप्त कर अचानक गायब हो जाता है।

परंतु इस कहानी में वह किसी आलंब की इच्छा नहीं करती। वह कहती है के वह इस बच्चे को जन्म देगी। उसे विश्वास है के जिसके साथ उसने प्रेम किया है वह कोई न कोई रास्ता ज़रूर निकाल लेगा। वह गर्भ में पल रहे बच्चे की धड़कन को महसूस कर रही है। पल-पल उसी बंद कमरे में आने वाले सपनों को बुन रही है, जिन्हे बुनने का अधिकार उसके विधवा होते ही छीन लिया गया है। यह स्त्री द्वारा अपेक्षित व्यवहार नहीं है। उसे ऐसी किसी कामना से बचना चाहिए। पर वह बचती नहीं है। कि वैधव्य में वह किसी पर पुरुष द्वारा गर्भ धारण करे। वह मास्टर कुछ देर के लिए उसके जीवन में आशा की किरण की तरह आते हैं पर वह जादा दूर तक नहीं बढ़ पाते। उनका निर्णय है लड़की गर्भ गिरा दे। कितना आसान होता है पुरुषों का यह निर्णय लेना। 

गर्भ गिरा देने के लिए कहने वाला पुरुष उस पीड़ा को नहीं समझ सकता जो वह अजन्मे बच्चे की माता महसूस करेगी। यह उस पुरुष का कमज़ोर निर्णय है जो कहीं न कहीं उसी समाज के दायरे में वापस चला गया है। उसने भी मान लिया है कि यह अनुचित है के एक विधवा किसी बच्चे को जन्म दे। एक शाम वह लड़की को कहता है के गर्भपात के लिए उन्हे शूद्रों की बस्ती में जाना होगा। नियत दिन वह वहीं आ जाये। मास्टर उसकी वहीं प्रतीक्षा करेगा। वह इतना डरपोक है के शोर मचने पर एकदम वहाँ से भागना ही उचित समझता है। इधर यह ‘ब्राह्मण’ होने की त्रासदी भी है। कि आपको उन आदर्शों को बचाए रखना है, जिन पर समाज को चलना है। उससे विचलन किसी भी कीमत पर स्वीकार्य नहीं होगा। क्योंकि नियामक होने के बावजूद ख़ुद ऐसा करने से यह समाज क्षण में धूल-धूसरित हो सकता है। यह स्वयं को शुद्ध बनाए रखने का आग्रह है। शुद्धता रक्त से ही प्राप्त की जा सकती है। इसलिए स्त्रियों द्वारा ऐसे प्रकरणों के लिए उचित दंड दिया जाना चाहिए। यह योनि की सुरक्षा की चिंता है। उसपर एकाधिकार का पाठ है।

पर यह कहानी उस स्त्री के पक्ष में मज़बूती से खड़ी है। के धर्म-समाज-पुरुष सब स्त्री को अपने मुताबिक ढालते रहे हैं। इस प्रक्रिया में वह इतने अमानुषिक होते गए हैं जहाँ उन्होने स्त्री को स्त्री नहीं रहने दिया। उसकी इच्छाओं का अधिकारों का कोई मूल्य नहीं। वह यहाँ उपभोग की वस्तु से जादा कुछ नहीं है। उसकी हैसियत हमारे बीच मात्र शोषित की है। प्रताड़ित की है। यह कहानी उसके दुख की है शोक की है। उसके हिस्से केवल कष्ट पीड़ा यातनाएँ उपेक्षा है। जहाँ साँस भी पूछ के लेनी पड़ती है। फ़िल्म आगे भी बहुत कुछ लिए हुए है। ख़त्म नहीं हुई है। पिता के वापस आने के बात जीवित लड़की के श्राद्ध तक। एक पुरुष पिता की भूमिका में वह, अपनी लड़की जो कि स्त्री भी है, उसका त्याग कर देता है ताकि वह समाज में सिर उठा कर चल सकें। कोई उसपर अपनी लड़की का पक्ष लेने का आरोप न लगाए। वे निष्पक्ष हैं। तटस्थ नहीं। यह उनकी व्याख्या है। जहाँ उनकी पुत्री के लिए भी जगह नहीं।

लेकिन उस वाले हिस्से को अभी छू नहीं रहा। आगे।

फ़िर बातें अभी भी बहुत हैं जो लगातार दिमाग में चल रही हैं। बेतरतीब। पर रात जादा हो गयी है। और ठंड भी। पैर में मोज़े के बाद भी वह गल रहे हैं। डेढ़ बजने वाला है। खिड़की खुली हुई है। हवा अभी नहीं है। एक और फ़िल्म याद आ रही है। दीप्ति नवल की। उसके बारे में भी कहने का मन था पर अभी नहीं। इस फ़िल्म के बारे में और ख़ुद दीप्ति की रेंज पर कम ही बात हुई है। उन्हे हमेशा शबाना आज़मी से कमतर मानने का आग्रह खटकता है। अभी नहीं, जल्द..

{दीप्ति की फ़िल्म, 'मैं ज़िंदा हूँ ' का संदर्भ..इसकी अगली कड़ी, जो जोड़ सकें उनके लिए.. }

नवंबर 22, 2013

स्त्री तुम केवल देह नहीं हो

कभी-कभी लगता है हम अपने आप को दोहरा रहे होते हैं। बार-बार वैसी ही बातें। उन्ही तरीकों से अपने को कहते हुए। जैसे कल। रात लिखने के दरमियान बराबर लगता रहा क्या कर रहा हूँ। जो मन में चल रहा है उसे कह क्यों नहीं पा रहा। अगर वह आ भी रहा है तो कितना। कैसे। क्या उसे ऐसे ही आना था। क्या है जो उन शब्दों के पीछे छिप गया होगा। किसे जानबूझकर नहीं कहा होगा। यह सिर्फ़ ख़ुद को बचाए रखने की चालाकियाँ हैं। जिन्हे लिखने वाले बख़ूबी जानते हैं। उन्हे पता है वह क्या कर रहे हैं। कौन से हिज़्जे कैसे बुने हैं और उनमे क्या नहीं कहते हुए भी कह दिया है। किसे कितना कहते नहीं कहा। अगर ऐसा न हो तो इसके बिना लिखना जीने की तरह नहीं लगता। सारा कुछ कहना भी कौन चाहता है। कभी हमसे भी तो आमने सामने की मुलाक़ात करो। पूछो तो क्या बात है। पर नहीं ऐसे कभी कोई नहीं मिलता।

हम बातों से बचते क्यों हैं। उन्हे कह क्यों नहीं देते। उनका कहा जाना हमें किसी अनिश्चय में क्यों डालता रहा है। हम कभी मौके ही नहीं बनाते। कभी कहने की सुनते ही नहीं। 

बड़े दिनों से सोच रहा हूँ। के कह दूंगा । कहना पूछने की तरह है। क्योंकि इसके कई सारे जवाब आज तक टकराए और लगातार टकराते रहे हैं। यह ‘आदिम इच्छा’ है जो हमें कभी कभी ‘ख़ालिस मर्द’ बनाती है। ‘मर्द’ लिखना ही ‘पुरुषसत्तात्मक विन्यास’ को पकड़ लेना है। मर्द को दर्द नहीं होता। वह अपना लिंग लिए घूमता रहता है। वह ढका रहता है। पर तना रहता है। यह किसी भी स्त्री को मात्र देह मान उसे भोगने की इच्छा है। अगर इसे ही बड़े ढके-ढके स्वर में पूछा जाता, तो शायद, वह कुछ इस तरह होता, के ‘पुरुषों का स्त्रियॉं के प्रति आकर्षित होने का कारण क्या है’? कारण बहुवचन में नहीं हैं। इसलिए उत्तर भी इस वचन में नहीं हो सकते। ऐसा पूछना ही बौद्धिक चालाकी है। आपको कोई मौका न देना है। शुरू से ही एक ही उत्तर की अपेक्षा। कहीं से भी दायें बाएँ न होने की गुंजाइश। यही अंदर उस पुरुष को खोजना है, जो उनकी पूर्वधारणा में ‘ख़ालिस’ है।

यह उत्तर आधुनिक विमर्श ही है जो इतना ‘स्पेस’ दे रहा है। उसी को खोल बनाकर यह सवाल ख़ुद से पूछता हूँ। इसे ‘टेक्स्ट’ की तरह पढ़ रहा हूँ। के इस सवाल का मेरे पास क्या जवाब है? कोई जवाब है भी या वह बनने की प्रक्रिया में है। वह जैसा है, उसे वैसा ही कह भी पाऊँगा। इतना साहस मेरे अंदर किस हद तक है। कई सवालों के जवाब कभी कभी ख़ुद को देने पड़ते हैं। जितना ईमानदार ख़ुद से कोई हो सकता है उतना शायद ही किसी से हो पाये। इसलिए जब कभी भी यह द्वंद्व की स्थिति मेरे सामने आती है तो इसका एक ही जवाब मेरे हिस्से पड़ता है। बार-बार। शायद यह पढ़-लिख जाने के चलते है या फ़िर मेरे ऐसे होते जाने का कोई कारण अभी पास नहीं देख पाता। एक परत लगातार हम ओढ़े रहते है, चादर की तरह।

के मेरे यहाँ आकर्षण कभी देह को लेकर नहीं हुआ। सच में। कभी ख़ुद से झूठ नहीं बोलता। पता नहीं ऐसा कब से हूँ। शायद जब से किसी लड़की को देख अनदिखी हरारत से भर जाने की शुरुवात हुई हो, तब से..पता है मैं क्या चाहता था? किसी लड़की का साथ। साथ सिर्फ़ हमबिस्तर होने तक नहीं, ज़िन्दगी भर तक। ऐसा नहीं है के मेरे यहाँ प्रेम ‘अशरीरी’ ही रहा, पर वह दिखता ही ऐसा है। उसे दूसरों ने ऐसे ही पाया। छूने न छूने के द्वंद्व कभी दिलो दिमाग में नहीं चले। शायद एकांत के अभाव में उन अनहुई मुलाकातों के बाद यह विचार मेरे पास आया हो..पर कभी ऐसा सोचा नहीं। यह शायद मेरी ख़ुद से ख़ुद की नैतिकता है। यह कुछ कुछ लिजलिजा सा भी है। कमज़ोर-सा। तोड़ता-सा। मैं इंतज़ार कर रहा था किसी ऐसे का जो करीब हो। जो मेरी बात सुने। हम दोनों आने वाले कल को बड़े आहिस्ते से एक-दूसरे में बुनते रहें। कहीं कोई धागा न चिटक जाये, इतनी सावधानी के साथ। चुपके से एक-दूसरे को जानते हुए। एक-दूसरे के हिस्सों को अपने में शामिल करते जाएँ। जितना अपने में हम हों उतने ही वह साथ चलने वाला। किसी भी राज़दारी के लिए वहाँ कोई जगह नहीं। बस हों ढेर-ढेर अनगिन सपने।

कभी कहता नहीं। पर अब कह दूँ। के किसी ज़माने यह देह बीच में आ गयी थी। कई साल हुए। उसे याद करने का मन भी नहीं करता। बस हवाला दिये देता हूँ। कोई नाम नहीं है। बस एक ख़याल। शायद सपना छिपा रहा हूँ। एक दिन अचानक ऐसे ही मन में आया। जिस लड़की की तरफ़ में खिंचा चला जा रहा हूँ उसके लिए सच में प्रेम करता हूँ भी या ऐसे ही। यह कितना जैविक है और कितना शारीरिक। कहीं मैं भी उन्ही लड़कों की तरह उसके साथ कुछ दैहिक क्रियाओं के बाद अलग हो जाने वाला हूँ। पता नहीं इस बात ने मुझे कैसे गढ़ा। शायद अजीब तरह की ग्रंथि से भर दिया। यह ऐसे लड़के की तरह बड़े होना था जिसकी पढ़ाई लड़कों वाले स्कूल में हुई थी। वह उन अहसासों से भाग लेना था। जो किसी लड़की के लिए महसूस होना उतना ही स्वाभाविक था जितना कि सांस लेना। पर समझ नहीं सका। एक झटके से लड़कियों के लिए किन विचारों से भर गया था। क्या यह उन अजनबी स्पंदनों का निषेध था। ख़ुद को खोह में समेट लेना। जिसने मुझे सहज नहीं रहने दिया। मैं लगातार बचने लगा। लगता कहीं इस या उस लड़की की तरफ़ जो महसूस कर रहा हूँ, वह उसकी देह का आकर्षण तो नहीं। जहाँ पहुँचकर प्रेम अपने आप मर जाएगा।..

राकेश आज इस पढ़ते हुए इसी तरह कहेगा, ‘तुम हमेशा से अतिवादी ही रहे’! कभी खुले नहीं। तुमने जितना प्रेम नहीं किया उससे जादा उस पर विचार किया। किसी लड़की से बात करना उससे दैहिक प्रस्ताव करना थोड़े है। बात दोस्त समझकर ही हो सकती है। यही सबसे बड़ी गलती रही के यह कभी नहीं सोच पाया। जो मुझमे उस आत्मविश्वास को लगातार कम करती रही जिसके बल किसी लड़की से बात भी करता। उन बातों के दरमियान बड़ा सचेत रहता के कहीं उसकी देह, कहीं खींच न ले। इसने जितना बनाया नहीं उससे जादा बिगाड़ा। मैं किसी लड़की से बात करने लायक ही नहीं रहा। अपने में ही उलझा उलझा सा। किन्ही उधेड़ बुनों में अरझा सा। इससे निकलते निकलते आज यहाँ पहुँचा हूँ जहाँ मेरे हिस्से दो-तीन ऐसी दोस्त हैं जिनसे कुछ भी कह सकता हूँ। बोल सकता हूँ। सीमाओं के अंदर सीमाओं के बाहर।

पता नहीं शाम क्या लिखने बैठा था क्या लिखता चला गया। फ़िर तो जो जैसा आता गया उसे रोका नहीं। रोकना चाहिए भी नहीं। किसी का डर होता तो कभी एक पंक्ति भी नहीं लिख पाता। जो कह दिया है उसे संपादित करने का मन भी नहीं है। जो जैसा आया वैसा ही रहने दिया है। बस अभी जा रहा हूँ। पानी भरना है। साढ़े पाँच हो रहे हैं। जो सोचकर लिखने बैठा था उसे फ़िर कभी।

नवंबर 21, 2013

हमारी उमर लगातार हमें तोड़ रही है

हमें ऐसा क्यों लगता है के हम गलत जगह पर हैं। क्यों लगता रहा है हम जिस क़ाबिल हैं वहाँ कभी पहुँच ही नहीं पाये। जैसे अभी। 'अभी' काल विशेष में होना है। जहाँ हमारी बढ़ती उमर लगातार हमें तोड़ रही होती है। हम जहाँ हैं वहाँ से कई साल पहले हमें नौकरी वाला हो जाना चाहिए था। लेकिन नहीं हैं। अब हमें बहाने चाहिए। अपने 'फ़ेलियर' को 'जस्टिफ़ाय' करने के लिए। ख़ुद को टूटने से बचाने के लिए। कहीं हम पीछे छूट से गए हैं। पीछे रह गए हैं। अपने आस पास को देखते रहने के कारण अजीब सी कुंठा से भर गए हैं। ख़ुद की क़ाबिलियत पर शक करने लगने की हद तक। उस हद तक जहाँ हम अपने दिनों को पैसों में तब्दील नहीं कर पाते। पर हमारी बेरोज़गारी हमें ऐसे ही बनाती जाती है। यहाँ लिखने भर से पेट नहीं भरने वाला। कोई एक कौर रोटी के लिए भी नहीं पूछेगा। यह इन सारे दिनों का गायब हो जाना है। इनके होने का कोई मतलब ही न हो। जैसे हमारे होने का कोई मतलब नहीं है। पता है यह दुख की पंक्तियाँ हैं। पर यह भी हमारी तरह कमज़ोर हैं।

पता नहीं इन दिल्ली के चुनावों में नौकरी किन-किन पार्टियों के घोषणापत्रों छप सकेगी। उसे जगह मिल भी पाएगी या नहीं। इन फ़ालतू के सवालों से वे लोग अपने आप को चिंतित नहीं करते होंगे। जब हमारी अर्थव्यवस्था का चरित्र पूंजीवादी होता जा रहा है तब हम इन सत्ता प्रतिष्ठानों से किसी भी तरह की उम्मीद कर भी सकते हैं, कह नहीं सकता। यह उनका एजेंडा ही नहीं है। ऐसा होना प्रतिगामी होते जाना है या संशोधनवादी होते जाना। यह विचलन है या एक इच्छा। किसी भी तरह से उस तंत्र में घुसपैठ करने की आतुरता को ऐसे ही किसी पद से विश्लेषित किया जाता रहेगा। हासिल सिर्फ़ विश्लेषण होगा। नौकरी नहीं। 

हम वही लोग तो हैं जो अपनी ज़िन्दगी के उन चमकते सालों में लगातार 'मिसफिट' होते रहने के लिए ख़ुद को तय्यार करते करते रहे जबकि हमारे साथी 'करियरिस्ट' होकर नौकरी वाले। हम विचारों के तहख़ानों में ख़ुद को बंद कर दुनिया को देखते रहे। हमने ख़ुद ही इसे बाँट लिया। और मान लिया के यह दुनिया हमारे लिए नहीं है। हमारे लिए तब होगी जब हम ख़ुद इसे अपने लिए बनाएँगे। इसे अपनी मर्ज़ी से उस तरह बनाएँगे जैसा हमें लगता कि उसे हो जाना चाहिए। इसमे काम करने की गुंजाइश लगातार बनती रही है। स्थितियाँ और विकट होती गयी हैं। नव-साम्राज्यवादी अधिनायकवादी सत्ता का वर्चस्व जितना कठोर होकर जनवादी विमर्शों मूल्यों को पीछे धकेल रहा है वहाँ हम लोगों को हमेशा उसके प्रतिरोध के लिए तय्यार करते रहना चाहिए। उनके औजारों के बरक्स हमें अपने विश्लेषण को और पैना कर उन अमानुषिक प्रक्रियाओं को उघाड़ फेंकना है। यह विचारों से अपनी बात को कहना है। 

ऐसा नहीं है के आज इनकी ज़रूरत नहीं है या समय कुछ बदलकर सकारात्मक हुआ है। यह विचलन ही कहलाएगा। के हम अपने इस प्रस्थान बिन्दु से थोड़ा पीछे खिसक कर दो कदम पीछे हुए हैं। ताकि लंबी छलांग लगा सकें। हम समझ नहीं पाये थे के किन वैचारिक प्रक्रियाओं के तहत हम इन विचारों तक पहुंचे? यह विचार हमें किसी सहज विमर्श के चलते नहीं मिले थे। यह बने बनाए खाँचे थे जिनमे हमने खुद को जमाना शुरू किया। उन साँचों को परखने का वक़्त नहीं था। उस वक़्त बस वह थे। उनका रोमान था। अगर आज यह हमें हमारी सबसे बड़ी गलती लग रही है। और हम अपने कल को न बदल पाने की कसक लिए घूम रहे हैं तो इसकी सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी उन लोगों पर आती है जो हम तक इन विचारों को लेकर आए। वे सुविधा सम्पन्न लोग थे। जिनका पीछा किसी भी हालत में आगे आने वाले सालों में कोई आर्थिक सवाल नहीं करने वाले थे। हम जिन परिवारों से आए थे उनमे हमें इसलिए पढ़ाया लिखाया जारहा था के कल हम एक अदद नौकरी वाले हो जाएँगे। पर हमें नहीं पता था के यह विचार मिलकर हममे ऊब की तरह भरते जा रहे हैं जिसके बाद हम इस दुनिया को एक अलग तरह से समझ तो पाएंगे पर किसी क़ाबिल नहीं रह पाएंगे।

हम सब इन विचारों के रूमान में इसलिए भी फँसते जाते हैं क्योंकि हमें अपने अस्तित्व को साबित करना सबसे ज़रूरी लगता है। लगता है हम भी अगर सभी की तरह होते गए तब हमारी पहचान कैसे विशिष्ट रह पाएगी। यह भीड़ में अलग दिखने का आग्रह है। आग्रह है अपने जैसों से अलग दिखने का। यह जाति धर्म जैसी संज्ञाओं के विपरीत ख़ुद को स्थापित करना है। जहाँ विचारधारा  उन सबको एक जैसा बना रही होती है। पर यह समरूपता उसे खलती नहीं है बल्कि वह सोचता है वह इसी के लिए तो चला था। यह भी एक तरह का समूह बनता है, जिसमे रहने के लाभ किसी न किसी रूप में उन्हे मिलते रहते हैं। उनके विरोध में उनके पक्ष में एक बना बनाया संगठन काम करता रहता है। यह सलाहियत उनके लिए बराबर बनी रहती है। हम जिस दिल्ली विश्व विद्यालय में पढ़ रहे थे वहाँ विचारधारा के रूप में सबसे जादा फ़ैशन में 'वामपंथ' अभी भी अपना काम कर रहा है। साहित्य अपने आप में 'जन' के बिना एक कदम भी नहीं चल पाता। जिसे अपनी प्रामाणिकता सत्यापित करनी होती है वही इसका कुर्ता पहन निकाल पड़ता है। वरना कम से कम उस समय कोई भी निर्मल वर्मा, विनोद कुमार शुक्ल नहीं होना चाहता। सब पाश की कविता पढ़ते हैं। मुक्तिबोध की तरह अग्रसेन की बावड़ी में ब्रह्म राक्षस को ढूँढते पाये जाते हैं। निराला हो जान चाहते हैं।

हो सकता है विचार का आग्रह किन्ही वैचारिक पाठकों को हताश निराशावादी युवक का प्रलाप लगे व वे इसे व्यक्तिवादी इच्छाओं का अश्लील एकालाप कह सीधे सिरे से ख़ारिज कर आगे बढ़ जाएँ। पर यह किसी भी तरह का पलायन नहीं है। सवाल उठाने अपनी आलोचना करना हमने भी उन्ही विचारों के पास से सीखा है, जिसका झण्डा आप बुलंद किए हुये हैं। अगर नहीं सुन सकते तो यह संवाद को नकारने के सिवा कुछ नहीं कह सकते। व्यवस्था बदलने के आग्रह में वह स्वयं कितने निरंकुश होते गए हैं, यह उन्हे दिखना होगा। किसी प्रति विचार को बिन विचारे नकार देना उनकी ख़राब आदत है। सपने सिर्फ़ उन्होने ही नहीं देखे, हमारी आँखों ने भी देखें हैं। अगर कह रहा हूँ के मुझे भी नौकरी चाहिए तब क्या यह माँग बिन सुने अनदेखी करने लायक है? यह पुराना सवाल मुझे किससे पूछना चाहिए? कितने साल और इंतज़ार करने के बाद मेरे हिस्से की तनख़्वाह मुझे मिलेगी? मेरे कुंद होते कौशलों की भरपाई कैसे होगी? इतने सुनहरे साल जो आँखों के सामने बीत रहे हैं उनकी कीमत कितनी ज़िंदगियाँ चुकाएंगी? पता है इन सारे सवालिया निशानों को सिरे से खत्म होने में और कितने साल लगने वाले हैं यह कोई नहीं बता सकता। कोई नहीं। बस यह ऐसे ही बने रहेंगे।

{ऐसे ही कभी कभी मन उदास हो जाता है: ये कोई बहुत अच्छ दिन नहीं हैं } ; 

नवंबर 20, 2013

दो चार रह गयी गैर-ज़रूरी बातें..

 1.
मन रुका नहीं। थोड़ी देर में ही बाहर निकला। थोड़ा चल भी लेना चाहिए। शाम ढले दुनिया थोड़ा बदलती भी है। पूरे रास्ते सोचता रहा काफी कुछ रहने दिया या छूटता गया। उसे चाहकर भी कह न पाया। सब कुछ कहना वैसे भी कहाँ अभीष्ट है? कौन चाहता है सब कह दिया जाये। पर अभी बैठा हूँ तो दिमाग भागे जा रहा है। ठहर नहीं रहा। कई सारी बातें टकरा रही हैं। 

चीज़ें वही नहीं रह जाती। लगातार बदलती जाती हैं। सब बदल रहे हैं। पल-पल। डीटीइए स्कूल की दीवार के बगल से गुज़रते वक़्त उस जगह से रात रानी की गंध गायब है। पता नहीं जुखाम नहीं है। नाक भी ठीक है, फ़िर भी वह वहाँ क्यों नहीं थी। इतनी जल्दी तो जाती नहीं थी। इस बार क्या हुआ? ठंड तो अभी और बढ़ेगी। उसके बिन कुछ कम सी शाम लगती है। पर वो मेट्रो स्टेशन के पास सावनी के दो चार फ़ूल धुए से जूझते अभी भी वहाँ लगे हैं। इस साल के अगले साल में बदल जाने से वह भी चले जाएँगे। उनका ऐसे बने रहना अंदर तक भर जाना है। 

पता नहीं इतवार माली को क्या सूझी उसने फ़िरंगी पानी की सबसे मोटी डाँड काट डाली। अभी तो उसपर फ़ूल आते। इतराते। ख़ुद बुलाते। कहते देख लो। हम फ़िर आ गए। इस बार तुम उसे दे ही देना। हमारी ख़ुशबू के साथ। किताब में रख कर नहीं बिलकुल ताज़े। सुगंध के साथ। 

2.
पता है अभी भी बच रहा हूँ। जो कहने के लिए आया हूँ, उसे कह नहीं रहा। टाल रहा हूँ। सोचता हूँ जब सीधे उसे नहीं कही तब यहाँ लिखने का कोई मतलब नहीं। पर दूसरे पल मन करता है कह दूँ। शादी के कुछ ही दिन बाद वह पत्नी संग दिल्ली लौट आया। ऐसे ही एक रात दोनों नीचे रात के खाने के बाद वाली सैर कर रहे थे। मैं गेट की तरफ़ से आ रहा था। मुझे देख थोड़ा शरमाया या असहज हुआ। पर सामने था इसलिए बात करना ज़रूरी लगा। ज़रूरी लगा कुछ कहना। सिर्फ़ कहने के लिए कहना। पता है उस बचपन के साझीदार उस दोस्त ने उस रात क्या कहा? वह कहता है, यह शचीन्द्र है। हमारे पड़ोसी। मैं भी कुछ बोला। कुछ और पूछना चाहा। पर चुप रहा। 

यह हमारी पहली और आखिरी औपचारिक मुलाक़ात थी जिसमे वे दोनों साथ थे। अकेले कभी न उसने देख रुकना मुनासिब समझा। न कभी मैंने ज़रूरत समझी। हम कुछ दूजे क़िस्म के पड़ोसी हैं। बात कम करता करते हैं। पहले माले वाले दूसरे माले के पड़ोसी के ऐसे ही पड़ोसी हो सकते हैं। यह शहर ही कुछ ऐसा है। दोस्तों के पड़ोसी हो जाने वाली बात पता नहीं क्यों दिल में कहीं धँस-सी गयी। मैं किसी ऐसी 'संज्ञा' में तब्दील हो चुका था जहाँ मेरी पुरानी पहचान मिटायी जा चुकी थी। मैं मैं नहीं रह गया था। कुछ और होता गया। 

यह कोई अचानक घट गयी परिघटना तो बिलकुल भी नहीं होगी। बस अचानक हमारे सामने आ गयी होगी। हम इससे बच रहे होंगे। के उघड न जाये। कहीं से कोई फाँक दिख न जाये। हम समान रूप से अपनी बढ़ती समझदारियों में दूर होते गए होंगे। जहाँ किसी के पीछे छूट जाने का एहसास भी नहीं होता। बस हम छूटते जाते हैं। बिन बताए। बिन बोले। आँखों के सामने।

3.
आज पूरा दिन सोचता रहा वह जीशान वाला पुर्ज़ा स्कूल मैगज़ीन के लिए देना ठीक रहेगा के नहीं। खन्ना ने कहा के हमें भी कुछ देना है। तभी से अटक गया हूँ। क्या दूँ? अजय से पूछा। पर बात अटक गयी नाम पर। वह छोटा सा बच्चा इसके छप जाने पर कैसा महसूस करेगा। सारे विद्यालय के सामने उसकी क्या छवि जाएगी। वह कैसा-कैसा सा होकर अपने को छिपा लेना चाहेगा। कहीं गुम सा उन सबकी आँखों में खो जाएगा। इसके आने के बाद वह और गुमसुम न हो जाये। और अंदर तक इतना सिकुड़ जाये के कभी बाहर निकालने की सोचे भी न।

नहीं। यह ठीक नहीं है। यह मेरी और उसकी बात है। हमारे बीच की। यहाँ चलता है। वह इसे नहीं पढ़ेगा। स्कूल वाले यहाँ तक नहीं पहुँच पाएंगे। उसकी पहचान उसके नाम की तरह ही छिपी रहेगी। उससे कोई नहीं पूछेगा। किसी सवाल का जवाब नहीं देना होगा। पर उस पत्रिका में आने के बाद उसके ऐसे उसे सबके सामने लाने में खतरे हैं। सोच लिया यह नहीं दूंगा।

4.
स्वाति हॉस्टल के बगल बारात घर में आज शादी है। अभी पिछले हफ़्ते हिन्दू महासभा भवन में एक शादी थी। आज लौटते वक़्त ध्यान दिया तो उस रात के वही दो लड़के नकली भाले लिए उसी पोशाक में नीचे दरवाज़े पर खड़े हैं। टेंट भी वही है। सजावट भी। यह शायद उनका परमानेंट जुगाड़ है। जैसे शुक्रवार बिरला मन्दिर के उस लॉंन की तरफ़ जाते रास्ते पर बिलकुल वैसी ही सजावट थी जैसी की आज। कभी इसी पार्क में राम किंकर हफ़्ता दस दिन रामकथा कहते थे। शायद नवरात्रों के आसपास। हम छोटे-छोटे हुआ करते थे। फ़िर सुनने में आया है के इस उत्तर आधुनिक 'प्रेम' ने इस वाटिका के हिस्सों पर प्रवेश निषेध के बैरिकेड लगवा दिये हैं। कैमरों में प्रेमी युगलों का अभद्र शारीरिक व्यवहार गाहे-बगाहे नीचे दफ़्तर में लगे एलसीडी पर दिखने लगा था। अब ऊपर उस दक्षिण शैली में बने स्थापत्य की तरफ़ हम चाहकर भी नहीं जा सकते। गुफाएँ तो जमाना हुआ ताला बंद की जा चुकी थीं। 

बहरहाल।    

इधर मोहर्रम या उसके पहले पड़ी ईद से हमारी तरफ़ नमाज़ की अज़ान सुनाई देने लगी है। सुनाई देना इसलिए भी थोड़ा विस्मित करता है कि यह कैसे संभव हुआ के 'दिल्ली एक' में कोई मस्जिद कहीं से चल कर आगई हो। याद करता हूँ तो आस पास एक मस्जिद मिंटो रोड चौराहे पर दिखती है। जिसके मीनार रातों रात खड़े किए थे। हमारे ग्रेजुएशन के सालों तक वहाँ चारों तरफ़ मीनार नहीं थी। एक रात वह अचानक उग आई थीं। उसके स्पीकर की आवाज़ कुछ जादा दूर तक नहीं आ रही क्या? 

फ़िर ध्यान आया रेल्वे स्टेशन पर लाइन बदलते इंजनों की सीटियों की आवाज़ें भी इस मौसम में ख़ूब सुनाई दे रही हैं। क्या बात है। कहीं मौसम के साथ आती हवाएँ पूरब से आ रही हैं इसलिए। आ तो चुनाव भी रहे हैं।

नवंबर 19, 2013

दिल, दिल्ली की ठंड, शादी और सपना

दिन पता नहीं कैसे बीतते जा रहे हैं। करने को कुछ है ही नहीं जैसे। खाली से। ठंडे से। दिन अब छोटे होने लगे हैं। तीन बजने के साथ जैसे गायब से। उबासी नींद के साथ बुलाती है। पर नाम नहीं करता। रज़ाई ठंड से भी ठंडी कमरे में पड़ी रहती है। पैर भी ठंडे रहने लगे हैं। फ़िर नीचे साढ़े पाँच पानी भरते-भरते अँधेरा हो जाता है। अभी सवा छह भी ठीक से नहीं बजे हैं पर घुप्प अँधेरा छा गया। खिड़की के बाहर की दुनिया बस इस कमरे तक सिमट गयी है। सामने छत पर एक बल्ब जलता भी है तो कुछ देर बाद बंद हो जाता है। सड़क पर गुज़रती गाड़ियों का शोर इतना परेशान नहीं करता।

परेशान करता है इतने इतने दिन बाद भी कुछ न लिखना। दिमाग चलना बंद कर देता है। सोचता रहता हूँ तब लिखा जा सकता था, पर नहीं लिखा। चलो फ़िर लिख लेंगे। पर एक बार जो टला वह कभी लौट कर नहीं आता। कितना कुछ इकट्ठा हो जाता है फ़िर भी नहीं कहता। कहता हूँ तब जब खाली हो जाता हूँ। कहने को कुछ ख़ास नहीं होता। जैसे के अब।

इन सारी बातों के दरमियान दिमाग में यही चल रहा है के अभी कमरे से बाहर निकलूँ और थोड़ा घूम आऊँ। मन थोड़ी देर अकेले में बिताने को हो रहा है। जहाँ फ़िर से तरतीब से तुमसे कही सारी बातों को लगा सकूँ। के जब उन्हे डायरी में कहने को होऊँ तब वह सलीके से करीने से आती जाएँ। उनको कहीं ढूँढना न पड़े। कहीं किसी कोने में छिप न जाएँ। वह वैसी की वैसी बनी रहें। बिलकुल पास। अनछुये एहसास की तरह। घास पर चुपके से पड़ी ओस की बूँद की तरह। आहिस्ते से पैरों के बिन आवाज़ बगल में आ जाने के जैसे।

दिल्ली की ठंडीयों के साथ शादियों का मौसम भी आ गया है। उन न्योतों में कई कार्ड अपनी उमर में छोटे उन संगियों के भी हैं जिनके संग बचपन की कोई याद कभी बनी हो न बनी हों; पर उनके हवाले हमारे घर आए उनके माता-पिताओं की बातचीत में लगातार आते रहे। हम उन्हे ऐसे ही सुनते रहे। कभी उनसे मिले नहीं। मौके कभी आए भी नहीं। बस धुंधले से चहरे याद रह गये। उन्हे वैसे ही रहने दिया। ऐसा नहीं हैं के सिर्फ़ हम ही बड़े हो रहे थे। वह भी हमें अनदिखे उतने ही बड़े होते रहे। साथ-साथ। आज उनकी शादी के कार्ड आए हैं। देखकर अजीब सा भाव गुज़र जाता है। लगता है सब इतने बड़े हो गए। शादी होने वाली है। हमें पता भी नहीं चला। कभी बात भी नहीं हुई।

इसे ऐसे कभी नहीं लिखना चाहता था। पर अब बात आ गयी है तो कहता चलूँ। थोड़ा दिल तोड़ देने वाली बात है। इसलिए कभी सतह पर आने नहीं दिया। पर ख़ैर। अब यह पता नहीं कैसा है कि जिनके संग बचपन बीता, खट्टी मीठी यादों के ढेर-ढेर पुलिंदे अब भी खुल-खुल जाते हैं, उन्ही में से दो दोस्तों की शादियाँ इस बीते मई थी। दोनों दिल्ली के बाहर। एक ही हफ़्ते के भीतर। पहली सीहोर, मध्य प्रदेश में, दूसरी लखनऊ। जाना किसमे है यह बड़े दिनों तक तय नहीं कर पाया। तय करने के लिए शायद कुछ ज़िंदा साझेदारियों की ज़रूरत पड़ती है। कुछ ऐसा जो अभी भी जोड़े रहे। उस बंधन को जो बचपन से इस उमर तक आए। जब हम अपने हमसफ़र के साथ होने जा रहे हैं, तब तक। जिसके साथ ज़िन्दगी बिताने की शुरुवात कर रहे हों। पर नहीं। उसने कभी ऐसा महसूस नहीं किया। कभी नहीं कहा। के चल मैं जा रहा हूँ, तुम भी पीछे से आना ज़रूर। कुछ था, जो उस दिन टूट गया। ऐसा नहीं था के जाते वक़्त सामने नहीं पड़ा था। उसकी मुश्किल आसान कर दी थी। वहीं नीचे तब पानी भर रहा था। पर नहीं। उसे तब भी कुछ नहीं कहना था। नहीं कहा। नहीं बुलाया। बस पहिये लगे बैग को घसीटता हुआ चला गया।

पर पता नहीं कैसा हूँ। उसके पापा के दिये कार्ड के बाद ट्रेन में सीटें देख रहा था। देख रहा था सीहोर भोपाल से पास पड़ेगा या होशंगाबाद से। बस से कितने घण्टे लगेंगे। खाली कोई नहीं थी। सब वेटिंग लिस्ट। न नयी दिल्ली से न निज़ामुद्दीन से। पर बड़ा कमज़ोर सा विचार था। फ़िर तो ऐसे मन हटा के चलो हटाओ। है बचपन का दोस्त तो क्या? नहीं जा रहे। जिसने बुलाया उसकी शादी में गए। लखनऊ।

यह शादियाँ ऐसे ही कर जाती हैं। इतवार आशीष की शादी की तस्वीरें कुछ नए तरह से मुझे बुनती लगीं। उनमे कहीं-कहीं आगे आने वाली भूमिकाओं को देख भर लेने का रूमान खींचे ले रहा है। उनसे बचना आसान नहीं। पता नहीं तब से क्या सब सोच लेना चाहता हूँ। उन्हे कह पाने की अपनी सीमाएं हैं। जिन्हे यहाँ कहने से पहले फ़िर से गुज़र जाने का मन होता है। के चुपके से तुम्हें देखता रहूँ। तुम्हें सब कह दूँ जो अंदर ही अंदर उन साझे दिनों की याद के बाद हममे जुड़ते गए। जुड़ गए हैं हमारे दिन और रात। शाम और सपने। करवट और नींद। और वह सब भी जो कटहल के अचार आम के गलके से तुम कहती गयी थी। जो कहते हुए भी नहीं कहती। मैं नहीं कहता। अचानक चुप्पी सी लगा कहीं किसी चाँदनी रात में कॉफी मग लिए छत तक पहुँच जाता हूँ। के इस मुलाकात के बाद कहूँगा अपने हिस्से का सपना..

{आगे की बातें..}

नवंबर 14, 2013

बिन यादों बिन सपनों वाला दिल

जीशान। उसका नाम जीशान है। कभी नाम का मतलब नहीं पूछा। शायद उसे मालुम भी न हो। क्लास में पढ़ने वाले और भी बच्चे हैं पर पता नहीं क्यों इस पर आकर ठहर जाता हूँ। शक्ल से बिलकुल मासूम सा। पढ़ने से जी न चुराने वाला। रोज़ स्कूल आता। पर सितम्बर के बाद इसका आना एकदम से कम हो गया। और पता नहीं क्यों उसका चेहरा उदास लगने लगा। कुछ-कुछ खोया-खोया सा। पढ़ रहा होता तो देखता उसकी आँखें कुछ ढूँढ रही हैं। वह वहाँ नहीं होता। उसका वहाँ होना वहाँ नहीं होने लगा। उसने बोलना लगभग बंद कर दिया। अपने आप में गुमसुम सा। बिलकुल चुप। शांत। अकेला। बातों को न कहने वाला। अंदर ही अंदर सब ऐसे चलता जो उसे परेशान करता लगता। लगता मेरी पकड़ से दूर जा रहा है।

कई बार बहाने से पूछा। उसके दोस्तों से जानना चाहा। पर कुछ नहीं। हरबार कह देता सर कुछ भी तो नहीं है। फ़िर पूछता तो कोई ऐसा ही गोलमोल जवाब देता के आगे कुछ कहना ठीक नहीं लगता। हरबार लगता कुछ छिपा रहा है। बताने का मन नहीं है। 

फ़िर सोचा किसी बच्चे से लड़ लिया होगा। ठीक हो जाएगा। पर नहीं। बात इतनी ही होती तो ठीक रहता। इस बहाने दोस्ती मज़बूत होती। बात बनती। पर समझ नहीं आया कि इतने छोटे बच्चे इतने समझदार कैसे हो जाते हैं। वह अपने आप ही अपने स्तर पर उन्हे संभाल लेना चाहते हैं। जीशान मुझे नहीं बताना चाहता था। नहीं बताया। पर लगातार सोचता रहा क्या है जो इसे ऐसे अकेला करते जा रहा है। किसी से घुलमिल क्यों नहीं रहा। किसी से कुछ कहता क्यों नहीं। चुप क्यों रहता है। बोलने में ऐसा क्या बोल जाएगा जो हम समझ नहीं सकेंगे। एक सुबह ऐसे ही रजिस्टर देख रह था। फ़ौरी निगाह इसके नाम पर जाकर थम गई। हफ़्ते में दो बार ही स्कूल आया। जिसमें से एकबार आधे दिन बाद ही भाग गया। यह ऐसे स्कूल छोड़कर जाने वाला बच्चा तो नहीं है। अगर कोई बात थी, तबियत ख़राब थी तो कहकर जाना था। पर कुछ नहीं। वह चला गया। बिन बताए।

अगली सुबह वह फ़िर नहीं आया। लगा मामला कुछ गड़बड़ है। कुछ हो तो नहीं गया। बच्चों से पूछा। पहले तो कोई नहीं बोला। थोड़ी देर बाद नोमान खड़ा हुआ। बोला, ‘वो तो अपने अब्बा के साथ फलों की रेहड़ी लगता है, पता नहीं अब आएगा के नहीं’!

कितनी आसानी से वह कह गया। अगर इतना ही आसान इसे सुन लेना होता तो कितना अच्छा होता। पता नहीं इस तस्वीर को जब भी देखता हूँ तो लगता है अभी कुछ कहेगा। कहेगा उसे स्कूल आना है। उसे भी पढ़ना है। खेलना है। झगड़ना है। ख़ूब-ख़ूब बातें करनी हैं। किताबों के पन्ने पलटने हैं। सोचता हूँ कभी मन करे तो थोड़ा रो दे। दिल हल्का हो जाएगा। जब भी देखता हूँ तो उसकी आँखें खींच लेती हैं। लगने लगता है कितनी मुश्किल से वह वहाँ आया होगा। कैसे उसके घर वाले रोज़ भेजने से पहले सोचते होंगे। उसका वहाँ रुके रहना आगे आने वाले दिनों में और विकट होता जाएगा। उम्र जैसे-जैसे बढ़ेगी वह ख़ुद उन लाद दी गयी जिम्मेदारियों को उठाना चाहेगा। फ़िर एक दिन ऐसा आएगा, वह कभी स्कूल नहीं आ पाएगा। मन होगा फ़िर भी नहीं।

उसके हिस्से कौन-कौन से सपने हैं। कोई नहीं कह सकता। उन्हे वह सच भी करना चाहता होगा, पता नहीं। चाहकर भी नहीं कर पाता होगा। कितनी छटपटाहट लिए वह दूसरे बच्चों को देखता होगा। वह कभी टीवी पर किसी विज्ञापन में नहीं आने वाला। उसके हिस्से का बचपन ऐसा ही है। निर्मम कठोर संताप से भरा हुआ। किसी त्रासदी की तरह। यह सपनों की दुनिया में आने से पहले ही उनका चकनाचूर हो जाना है। बचपन के दिन अभी से कहीं उड़ से गए। यह सारे रंगों का बेरंग हो जाना है। आवाज़ों का एकदम से चुप हो उसके शोक में बदल जाना है। बच्चे शोर नहीं मचाते तो अजीब लगता है। वह भी शोर नहीं मचाता। चुप-चुप रहता है। किसी दोस्त से कुछ नहीं कहता। उमर से जादा बड़ा हो गया है। कुछ इसे जादा समझदार होना कहेंगे पर उसका ऐसे होते जाना कचोटता है। यह बचपन से बचपन के दिनों का गायब हो जाना है। यह ऐसे गुमशुदगी के दिन नहीं हैं। उनमे डूब जाने के मौके हैं।

स्कूल की दुनिया सपनों को सच न भी करती हो पर यह बचपन को साँस लेने का मौका ज़रूर देती है। वह पढ़ लिखकर भले कोई नौकरी न करे पर यह दिन उसके दिन हैं। दिन कभी रात की तरफ़ वापस नहीं लौटते। यहाँ लौटना नहीं है। कोई रिवाईंड  का बटन नहीं है। जो जीना है जैसे जीना है वह यही है। अब बीते तो कभी वापस नहीं आएंगे। यह दोस्तियाँ फ़िर कभी नहीं मिलने वाली। इनकी नोकझोंक लौटकर उससे कुछ नहीं पूछेंगी। कभी कोई खट्टी-सी याद भी उसके दिल से नहीं गुज़रेगी। दिल बिलकुल खाली याद के कैसे धड़कता होगा पता नहीं। कभी उससे पूछूंगा। शायद कभी नहीं।

अभी भी तस्वीर में उसे देख रहा हूँ। कहीं खो गया है। इसे वापस लाना है। कैसे। पता नहीं। पर लाऊँगा ज़रूर।

नवंबर 11, 2013

नवंबर नौ एक रुकी हुई शाम

हम लोग इंतज़ार कर रहे थे शायद ऐसे ही किसी दिन का । ऐसी ही मुलाक़ात का। राकेश इस बार दस दिन लिए दिल्ली आया। दिवाली के दो दिन पहले। पर बे-तक्कलुफ़ होकर उस इत्मीनान से अपने-अपने हिस्से कभी खोल ही नहीं पाये। एक दूसरे से कुछ कह नहीं पाये थे। तय हुआ सब इस शनिवार इकट्ठे हो राकेश के यहीं चले चलें। वहीं बैठेंगे। फुसरत होगी। वक़्त होगा। मौका होगा। तब धीरे-धीरे अपने अंदर उमड़ती-घुमड़ती बातें कह एक दूसरे से कह लेंगे। सुन लेंगे। कुछ बोलेंगे। कुछ नहीं कहने का मन हो तो ख़ुद को वहीं तय्यार कर लेंगे। जो है उसे वैसा ही कहेंगे। बे-लाग लपेट। 

बीच में दो बार मिले तो पर मन से बैठ बात नहीं हो पाई। कुछ था जो लगता रहा रह गया है। इतने दिनों में काफ़ी कुछ कहने के लिए हम सब इकट्ठा करते रहे। उसे जब तफ़सील से सामने रखते उससे पहले जाने कहाँ देने वाले थे।

स्टैंड पर पहुँचा ही था बस आ गयी। पंद्रह रुपये की टिकट। अरुण आशीष दोनों मेट्रो में संग थे। उमेश के बारे में अरुण से पूछा तब कुछ नहीं बोला। पर अच्छा हुआ, वह भी था। एमपी मॉल के पास। धूप आज निकली थी। पर सूरज बादलों के कभी पीछे कभी आगे होता रहा। ठंड थी। गोद में बिहू लिए वहीं राकेश मिला। वे तीनों साढ़े बारह के बाद आए। इस बार भी राकेश बिहू के लिए चॉकलेट लेना भूल गया। हम सब नीचे से फ़िर ऊपर आकर बैठ गए। कहीं हिले नहीं। मन पता नहीं क्या-क्या सोच वहाँ गया। क्या-क्या बाँधना भूल गया याद नहीं। पर लंबे इंतज़ार बाद हमारी बैठक लग रही थी। फ़िर एक बार शुरू हुए तो बस पता नहीं कहाँ कहाँ से होते हुए गुज़रते रहे। शुरू हुए आज के बोझिल से उकताए से बे-नौकरी वाले दिनों से।

इतनी उमर हो जाने के बाद भी एक अदद नौकरी का ना होना सबसे जादा तोड़ता है। जितना वह बाहर से नहीं देखता उतनी ही बारीकी से वह अंदर का रेशा-रेशा उधेड़ रहा होता है। हमे पता है, हम वहाँ नहीं होना चाहते। पर वहीं हैं। कहीं भाग नहीं सकते। कहीं जा नहीं सकते। स्थितियाँ लगातार विकट होती जा रही हैं। पर हम कुछ नहीं कर पा रहे। बस उन पुरानी बीती इमारतों को देख खीज से जाते हैं। उनका वहाँ होना किसी भी बहाने से अंदर उल्लास आह्लाद आनंद से नहीं भरता।

उनका होना हमें याद दिलाता रहा है हमारे बर्बाद होने के दिन। वह दिन जब हम किसी को कुछ नहीं समझ रहे थे। बस एक धुन थी। हम हैं। बस हम ही हैं। और कोई नहीं। नौकरी के प्रति घृणा जैसे भाव लिए विचारों को शिद्दत से महसूस करते रहे। ‘करियरिस्ट’ हो जाना गाली की तरह लगना। यह कुछ अलग हो जाना है। कुछ अलग करना है। इसने हमें खांचे-साँचे दिये। पर इसकी जकड़न सबसे जादा आज अंदर सीलन की तरह लगती है। ‘एस्टब्लीश्मेंट’ को हर तरह से तोड़ते रहने ने जैसे हमें गढ़ा उसने हमें इस दुनिया के लिए ‘मिसफिट’ साबित किया। आज हम उसी दुनिया में एक नौकरी के लिए इतना जूझ रहे हैं। इसका कारण वही लोग हैं जो इस ‘विचारधारा’ को औज़ार की तरह इस्तेमाल कर हमें बनाते-बिगाड़ते रहे। इस रूप में वह ‘ओवर-स्मार्ट’ थे। उनके पास विकल्प थे। यह विकल्प होना उनकी जुगाली करते रहने की खाद की तरह है जहाँ से यह लगातार ताकत पाते रहे हैं। एक बात यह भी निकली के इसमे ‘जेआरएफ़’ की भूमिका को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। वे इस तरह के ‘एलीट’ थे जो कुछ भी किसी भी तरह रह सकते थे। उन्ही लोगों के जादा ‘फॉलोवर्स’ बने जो कहीं से पैसा पाने लगे और आगे चलकर उनकी नौकरियाँ हुईं। और बहुत सारे जो इसे ‘अफोर्ड’ नहीं कर सके वह वहाँ की मुंडेरों से उड़ रीवा या दिल्ली के स्कूलों में मास्टर बन उस तंत्र से बाहर धकेल दिये गए। आज भी हम ही हैं। पर अकेले हैं। पैसों की कंगाली ऐसे ही बुनती है।

यह विचार की ‘विचारधारात्मक’ भूमिका है। जिसने हममें नकार का भाव तो भरा पर हमारी दृष्टि को भी उतना ही सीमित संकुचित किया। यह ऐनक की तरह हमारी नाक पर चढ़ गया। हम देख ही नहीं सके के हम कहाँ हैं। अपने साथ क्या कर रहे हैं। फ़िर मसला जितना एक-रेखीय दिखता है उसे समझना उतना ही जटिल है और सबसे पीड़ादायक इस सबके साथ जीना। 

बातें इतनी बोझिल नहीं थीं। पर थीं यही। हम सब मिलकर इस बात तक पहुँचे जहाँ मानविकी विषय हम सबको एक तरफ़ धकेल रहे होते हैं। बातों-बातों में यह भी के साहित्य में ‘वामपंथी’ होना अपनी वैधता को सत्यापित करने जैसा है। और अधिकतर लोगों ने इसी ‘फ़ैशन’ के तहत इसे ओढ़े रखा है। यह ‘फैब इंडिया’ का कुर्ता पहनने की तर्ज़ पर अपना काम करते हैं। वरना सब अपने मूल चरित्र में कितने सामंती और बुर्जुआ हैं यह उनसे अधिक और कोई नहीं जानता।

कभी-कभी लगता है जब हम बाहर के हो जाते हैं तब चीजों को जादा अच्छी तरह से देख समझ पाते हैं। वहीं हम लोग कर भी करते रहे। एक-एक कर अपने आज के कल के चीथड़े उधेड़ते रहे। एक एककर उन बारीक सीवनों को अपने भोथरे नाखूनों से खींच रहे थे, जिन्होने हमें बुना। आज तक हमें बनाए रखा। उनकी उपादेयता इतनी ही भर थी के हमें हम जैसा बनाए रखा जा सके। हम प्यार भी कर रहे थे तो उसका वर्ग चरित्र पहले निश्चित कर आगे बढ़ते। राकेश और अरुण उस दिन नई सड़क पर पूछे गए सवाल का जवाब देते रहे। सुंदर क्या है? हम किसी भी लड़की की तरफ़ आकर्षित होते हैं तबकौन-सी चीज़  काम कर रही होती हैं? हम किन मानकों को गढ़ अपने मन को तय्यार करते हैं? क्यों उसके पीछे हमारी आँखें भागने लगती हैं। पता नहीं इसका कोई और जवाब हो भी सकता है या नहीं। यहीं शादी के सवाल भी टकराए। जो ‘टु बी ग्रांटिड’ है वह ऐसा ही क्यो होता गया है। इसमे ऐसा क्या है जो ऊब पैदा करता है। यह कई सारे सामाजिक सवालों का बड़ा नैतिक सा जवाब है। पर इसमे रहते हुए घुटन क्यों महसूस करने लगते हैं। अगर इसके समानांतर स्त्री भी वही करने लगे जैसा पुरुष करते हैं तब?

जवाब स्त्री ने ही दिया। राकेश की सहचरी ने। भाभी लिख नहीं रहा क्योंकि बोल नहीं पाता। और नाम लिखना थोड़ा अजीब सा किए जा रहा है। वे कहती हैं प्रेम जितना दुतरफ़ा है शादी के बाद वह कई और दिशाओं में लगातार खुलता है। उसे इतनी सारी जिम्मेदारियाँ एक साथ उठानी पड़ती हैं के उसके हिस्से का वक़्त भी कम पड़ जाता है जहाँ वह ख़ुद के लिए कुछ क्षण निकाल ले। यहाँ उसकी कुछ अपेक्षाएँ हैं। वह अगर अपने पूर्व प्रेमी जो कि अब उसक पति भी है से थोड़ी देर के लिए साथ माँग रही है तो उस पति को क्या करना चाहिए? यह सवाल की तरह बीच में आया। जिसका जवाब आशीष दे रहा था। अरुण कुछ भी कहे पर वह भी कुछ ऐसा ही सोचता होगा। जिससे पूछा जा रहा था वह भी कुछ बोला। पर उसका जवाब पारित नहीं हुआ। उन दोनों के बीच यह जीवंत सवाल उनके रिश्तों की तरह है। भले यह सवाल जवाब उन्हे कैसे भी लगते रहे हों पर यही उसकी मजबूती का सबसे बड़ा आधार बना हुआ है। यह एक तरह की पारदर्शिता है जिससे कई दंपति बचे ही रहना चाहते हैं।

इन सारी बातचीत में वह सबसे चुप। एक कोने में बैठा सब सुनता रहा। कुछ-कुछ वह भी जोड़ता। पर अंदर ही अंदर काफ़ी कुछ उसके भी चलता रहा होगा। उसके पास भी कुछ सवाल रहे होंगे। थे भी। उसमे पूछे भी। अपनी कही भी। कुछ के जवाब मिले। पर उनके लिए यह जगह नहीं है। जब पूरे-पूरे जवाब मिल जाएँगे तब। उससे पूछकर। इतना तो कर ही सकता हूँ।

राकेश जितना विचारों में व्यवस्थित लगता है उतना उनको लेकर जीने में वह उतना ही अव्यवस्थित जान पड़ता है। शायद एक हद तक हम सब ऐसे ही होते होंगे। पर इस तरह होने से वह बचना चाहता है। जैसे हम। वह सुलझा हुआ है पर लगता है दूसरों के लिए जादा। फिर वही वाक्य संरचना दोहराकह रहा हूँ हम जैसे ही अपने से बाहर निकलते हैं थोड़ा सहज महसूसते हैं। के चलो यह बात हमारे लिए नहीं है। वरना हम ख़ुद कितनी तरहों से फँसे हैं हमें ही पता है। पर वैवाहिक सम्बन्धों पर जितनी संजीदगी से वह एक एक बात स्वीकारता चला जाता है ऐसा करने की हिम्मत सबमे नहीं होती। यही उसे राकेश बनती है।

इस पूरी बातचीत में आशीष दूसरा पिता था। घर के अपने अनुभवों का ख़ूब इस्तेमाल करते हुए हम सब देख रहे थे। कुछ घंटों की दोस्ती में बिहू उसे जाता देख रोने लगा। हम सबको अब चलना था साढ़े आठ बज रहे थे। ठंड का मौसम है। अँधेरा कुछ जादा घना लगता है। सीढ़ियाँ उतरते बिहू की मम्मी बोलीं अभी दोस्ती है रिश्तेदारी नहीं है। पता नहीं वह कितना मतलब समझा होगा। फ़िर भी उसका रोना बंद नहीं हुआ। रोता रहा। हम नीचे उतरते उसकी आवाज़ में फ़िर से ऊपर नहीं आ सकते थे। जाना था।

पर चुपके से उस शाम की रिकॉर्डिंग अपने साथ लिए आया हूँ। एक दस मिनट की है और एक आधे घंटे से कुछ जादा की। यहाँ अभी दस मिनट वाली। यह मेरी पहली पोस्ट भी है जो पॉडकास्ट के साथ जा रही है। और वह कहानी बाद में कि कैसे बस स्टैंड से उन तीनों को विदा कर मैं राकेश के साथ वापस चल पड़ा। शायद बहुत कुछ था जो अभी भी कहना सुनना बचा रह गया था.. पर पहले तुम सुन लो। जब तुम कहोगे तब यहाँ ‘पब्लिक स्फेयर’ में उसे लाएँगे..इसलिए बाकीयों के हिस्से थोड़ा और इंतज़ार..

यह पिछली शाम है, लिंक दिये दे रहा हूँ ऐसी ही पिछले साल की पिछली शाम  और यह रही रिकॉर्डिंग..

आवाज़ें..

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