जनवरी 31, 2013

एक जो है आलोक

सोच नहीं पा रहा हूँ कहाँ से शुरू करूँ। चार बार तो रीड्राफ्ट कर चुका हूँ। लिखना क्या है और लिख क्या रहा हूँ, बिलकुल भी तालमेल नहीं बन पा रहा है। शायद ऐसा होता होगा। इसलिए दोबारा एक कोशिश। पर इतना आसान होता भी कहाँ है। हमारे आग्रह, पूर्वाग्रह हमारे सामने आने वाले दृश्य किसी भी व्यक्ति को कितना दिखा पाते हैं इसी को लेकर सोच रहा हूँ। छवियाँ हमेशा से ऐसी ही रहती होंगी। मॉडर्न आर्ट की तरह। सबके अपने-अपने पाठ अपनी-अपनी व्याख्याएँ। इसलिए भी लिखना खीर बनाने की तरह टेढ़ा है। और इधर कई बार आलोक भी पूछ लेता है, 'तुम तो मेरे बारे में लिखने वाले थे क्या हुआ?' तो आलोक आज तुम पर। खतरें हैं फिर भी।

दिन बड़ी जल्दी पुराने होते जाते हैं पर उनकी याद नहीं। और ऐसा ही एक दिन है जब आलोक और मैं एमएड का एंट्रेंस देने के बाद खालसा कॉलेज से निकलकर खाने की खोज पर पिल पड़े थे। अमित से बीच में जय जवान स्टाल के पास भेंट हुई थी। तुम्हे याद है क्या बात हुई थी? मुझे कुछ जयादा याद नहीं। खैर, यहीं से शुरू क्यों कर रहा हूँ इसकी भी एक वजह है। वह यह के हम दोनों को बिलकुल नहीं पता था के हम एक साथ इस कोर्स के लिए चुन लिए जायेंगे। और एक तरह से यह हमारी फिर से मुलाक़ात ही थी। कई सारी बातों मुलाकातों जैसा। जो अब हर रोज़ होनी थीं।

यह बात शायद तब शुरू हुई जब तुमने अपनी एक कहानी सुनाई। उसमे एक ऐसा ऑटो है जो लड़कियों से भरा है और तुम उसे अपने यमुना विहार ले जाते हो और एक-एक लड़की अपने हिस्से की कहानी कह रही है। और शायद तब भी जब हम क्लास में लिबिडो के बारे में फ्रायड को पढ़ रहे थे। समझ नहीं पा रहा था यह सब जो सामने हो रहा है, है क्या? क्या एक ही व्यक्ति एक ही समय में स्त्री के पक्ष में हो और दूसरे ही पल घोर देहवादी हो जाए। यह भी हो सकता है कि यह बायनरी मैंने खुद ही गढ़ ली हो। या हो सकता है एक पुरुष होने के नाते अपने सजातीय को कुछ छूटें देने का मन कर रहा हो।

जबकि दो साल पहले वाली छवियाँ एकदम से अचानक टूट रही थीं। बीएड में ऐसे सिलसिलेवार बातों के दौर कम ही थे। मुझे आजतक समझ नहीं आया के क्यों बार-बार तुम्हारे मैथिल होने के साथ ब्राह्मण होने की बात रेखांकित करते जाते। हाँ यह बात ज़रूर है के हम हिंदी वाले एक किसम से अंतर्मुखी बनते जाते हैं पर एक तुमसे मुलाक़ात हुई एक राकेश से मुलाक़ात हुई और एक मिले सीबी। तीनों विशुद्ध हिंदी वाले और तीनों मेरे से अलग। जितना मैं उस दरमियान अन्दर का प्राणी था, उतने ही तुमसब बाहर के। फिर लगा मैं अपनी उस स्थापना को संशोधित करने। आज काफी हद तक उससे खिसका भी हूँ। खुद उस अन्दर से बाहर आ गया हूँ। शायद।

तो जो बात ऊपर रह गयी उसमे यही कह रहा था के तुम जितनी आसानी से खुद को जता लेते हो वह मुझे  उतना ही मुश्किल लगता है। आज इस वक़्त भी। शायद यह अपने घर से दूर इस दिल्ली में रहने का 'बाय- प्रोडक्ट' हो। पर एक बात थी जो बिलकुल हिंदी वालों की तरह तुममे भी थी। वो यह के एक तरफ़ हम उन दो सालों में इस दुनिया को देखने भालने के नए औज़ार तो तेज़ करने लगते हैं पर यही व्यवस्था हमें 'मिसफिट' बनाती चलती है। फिर एक क्षण ऐसा आता है जब हमें यह लगने लगता है कि जितने के हम अधिकारी थे उतना हमें नहीं मिला! यह ओवरकॉन्फिडेंस है न आत्मशलाघा। पर कुछ अंदर ही अंदर सालता रहता है। फिर शुरू होती है अपने अस्तित्व की लड़ाई। इसे खुद को साबित करना भी कह सकते हैं। तुम्हारा पूरा बीएड शायद यही था।

अगर ऐसा नहीं होता वो अन्दर बैठा लेखक बार-बार यह नहीं कहता के 'हिंदुस्तान' के इतवारी पन्नों पर जो तुम्हारे साथ छपे थे वे आज कहाँ से कहाँ पहुँच गए। यहीं 'क्षमता' और 'अवसर' तब हमें सबसे ज़यादा समझ आने लगते हैं। और लिखना इसी रूप में हमारे अन्दर किसी कोमल कोने में सुरक्षित रहता है। तभी तुम्हारी कहानी पढ़ी थी 'एक चम्मच ज़िन्दगी'. कहानी तो याद नहीं आ रही पर अभी भी वहाँ तुम अपनी मूंछों के साथ चिपके दिखाई दे रहे हो। मूंछ उस रूप में जुड़े रहना है, अपनी ज़मीन से, अपने 'संस्कार' जैसी किसी अमूर्त सत्ता से। धीरे-धीरे तुम वहां से खिसके हो। अब तो बिलकुल यकीन से कह सकता हूँ के अबकी बार तुम्हारी माता जी दिल्ली आतीं तो तुम्हे बिन मूंछ ही पातीं। यह किन्ही 'परम्परागत चीजों' को 'गैर- परम्परागत' तरीकों से करने की तय्यारी जैसा है।

यहाँ जिस जगह हिंदी में दो ढाई साल से खटर-पटर कर रहा हूँ उसकी शुरुवात इससे पहले फ़ेसबुक पर हुई। एक दुपहरी 'संचेतना' के सम्पादन के लिए हम लोग तस्वीरें जुटा रहे थे। कंप्यूटर लैब में तब तुमने अपना प्रोफाइल खोल बताया के इसपर हिंदी में भी लिखा जा सकता है। यह बिलकुल फ़िल्मी संयोग है के कल से इस गूगल ट्रांसलिट्रेशन सेवाओं की जगह नयी व्यवस्था ने ले ली है और कल बिलकुल इसी वक़्त तुम्हारी फ्लाइट तुम्हे एर्नाकुलम उतारने वाली होगी। तुम आज भी फ़ेसबुक पर त्वरा टिप्पणियाँ करते रहते हो और उस अनुपात में मैं वहाँ से बिलकुल गायब हो चुका हूँ।

याद है वो शाम जब हम विश्वविद्यालय मेट्रो स्टेशन पर बैठे आते जाते पॉपुलर कल्चर पर कुछ कुछ बोले जा रहे थे तब मैंने कहा था के मुझे लगता है कहीं न कहीं ये फेसबुक हमारी रचनात्मकता हमारे प्रतिरोध को एक सरल मार्ग निकासी उपलब्ध करा रहा है और वहां लिखना अब कुछ जँचता नहीं है। तब मैं वहां से हटने के बारे में सोच रहा था। पर कभी कभी तुम्हारे फेसबुक स्टेटस उस पत्रकारीय शैली को नए सिरे से रचते हैं। और सच कहूँ वहीँ तुम्हारे साथ बैठ-बैठ उन एमएड की क्लासों की बौद्धिक समझों को माँजना पोछना तेज़ करना एक बहाना जैसा लगता है, जिसकी आड़ में बैठ हम दोनों विशुद्ध पुरुषों की भूमिका में होते थे। भारतीय पितृसत्तात्मक पुरुष।

फिर कई शामें हैं उनकी यादें हैं जब मिश्रा जी की चाय पीते कई-कई दौर की वार्ताएं चलती थी। 'आर्ट्स फैकल्टी' के लम्बे रोचक शिखर सम्मलेन। वहां खून से लिखे प्रेम पत्र की खुनी प्रति। एक बार तो इसी की छत पर चढ़ गए थे। 'स्पिक मैके' कैंटीन। ऐसे ही एक दिन हम तीन जन हडसन लेन 'कावेरी' तक आये थे और वहीँ पार्क में बैठे कई किश्तों में सपनों की पोटली भरे जा रहे थे। इंतज़ार रहेगा उन सबके सच होने का। पता नहीं ऐसी कई यादें लगातार आ जा रही हैं। 'एफ़.एम.एस. कैंटीन' की थाली और उसमें कुरकुरी कुरमुरी पूड़ियाँ। बिलकुल एनसीइआरटी वालों जैसी। पर उन सबको लिखने का बूता खुद में नहीं है। इसलिए भी अब चलता हूँ। शायद कुछ लिख भी नहीं पाया। लगातार बचता रहा। अपने आप से। तुमसे। फिर कहते भी हैं न सबका लिखा जाना ज़रूरी भी नहीं। उसे रहने दो। किसी कोने अंतरे की कोमलता की तरह अनछुआ।

हाँ, इतना बताता चलूँ कि यह तस्वीर जो ऊपर बायीं तरफ लगी है, वहीँ बालकनी में इसी पीछे बीते इतवार सुशील और शरद खड़े हैं और हम दोनों परमानंद कॉलोनी से वापस लौटते हुए एक बार फिर उस अड्डे को देखते हैं। पिछले दस साल में दिल्ली की कई-कई साझेदारियों को एक बार फिर से देखने का वक़्त थोड़ा कम पड़ गया है आलोक के हिस्से। पर आलोक उस शाम तुम्हारा बनाया निमौना बार-बार याद आएगा। वो यमुना विहार जाकर 'आम्रपाली' और 'मल्लिका' आम खाना भी। ख़तम वहीँ कर रहा हूँ जहाँ सबसे पहले अपनी डायरी में तुम पर कुछ लिखने की सोच रहा था। तारीख है अट्ठारह अप्रैल, दो हज़ार बारह। बस जगह 'चाँदीपुर' के बजाय 'एर्नाकुलम' हो गयी है। बाकी सब वही।

'कई मुलाकातें जो आलोक के चलते गाहे बगाहे हो जाती थीं, उसके दिल्ली से चाँदीपुर चले जाने के बाद वैसी स्वाभाविक आकस्मिकता का आभाव हो जाएगा। उन लोगों से मुलाक़ात बात नहीं होंगी। अनूप 'सर' से लेकर मिश्रा टी स्टाल की बतकहियाँ गायब हो जायेंगी। सबकी किश्तें गट्ठर बनकर अपने अपने हिस्सों में तहबंद। मेट्रो स्टेशन की बैठकें सिरे से गायब हो जाएंगी। उन्हें गायब होना ही था। क्योंकि अगर वह नहीं भी जाता तो इधर तेईस मई के बाद की हमारी यारबाशी इतनी रोजाना होना ज़रा मुश्किल सी बात लगने लगती। पर उसका आगे अब कभी नहीं होना होगा।'

जनवरी 24, 2013

सीधे एग्जामिनेशन हॉल से

दिहाड़ी अध्यापक की डायरी का दूसरा पन्ना

पता नहीं सुबह आते वक़्त क्या सोच रहा था। शायद बाहर निकलते ही सड़क पर क्रिकेट खेलते उन बच्चों को देख कुछ कौंधा होगा। कि पीछे कुछ महीनों की दरमियानी में यहाँ की आबोहवा को जितना पास से देख जान सका हूँ उतने में यह तो पता ही चला की शिक्षा का मिथक धीरे-धीरे और टूटेगा। मिथक इस रूप में कि पढ़ लिखकर नवाब बनाने वाली सारी व्यवस्थाएं या तो पहले ही नहीं थीं या जिनका भरोसा उसके ऐसा कुछ कर दिखाने से है तो वह और सतह पर आ जायेगा। कि यह विशवास एक तरह का नवसामंती विशवास ही है। रत्ती भर भी इससे ज़यादा नहीं।

यह सारे विचार अगर कुछ भी सम्प्रेषित नहीं कर पा रहे हैं तो इसका एकमात्र कारण मेरा इस कमरे में होना है, जहां बैठ कर कुछ लिखने की कोशिश कर रहा हूँ। इतना लिखने के दरम्यान ढाई तीन बार उठकर चीखना चिल्लाना पड़ा है। अगर मैं बता दूँ के यहाँ बारहवीं क्लास का प्री-बोर्ड का इम्तहान चल रहा है तो कई शिक्षाविद 'अध्यापक' की इस 'बदलती भूमिका' पर कुछ सोचने से पहले वहाँ हो रहे पर्चे की 'वैधता' पर सवाल उठायेंगे। पर क्या करूँ यह सब जो लिखा है सब सच है। चाहते हुए। न चाहते हुए।

पहले पहल बड़ा अजीब सा लगता था अब शायद आदत हो चली है। इस लिजलिजे गिजगिजे वातावरण में अपने को बचा कर रखने की जद्दोजहद कुछ ज़यादा ही करनी पड़ रही है। खुद को ढालना नहीं है पर उसी में सहना-रहना है। बिन भागे। भागने वाले सारे रास्ते फिलहाल बंद हैं। उन सारे आदर्शों में व्यवस्था लगातार पुराने अर्थों की आत्मा से निकल नए की तरफ कूच कर गयी है। इस कमरे में सैद्धांतिक स्तर पर परीक्षा हो रही है। परचा बाहर से आया है।

थोड़ी-थोड़ी देर बाद असहनीय हो जाती स्थिति से बचने के लिए कुछ-कुछ अंतरालों में दरवाज़े पर ऐसी घुटन से निकल बाहर खड़े हो जाते हैं। लगता है थोड़ी देर के लिए ही यह सब हमारी आँखों के सामने नहीं हो रहा है। दूसरे तीसरे शब्दों अर्थों में पलायन और अध्यापक शब्द के चुक जाने जैसा भाव भी घेर ले, तो भी कुछ नहीं कर सकने की कसमसाहट लिए अन्दर दाखिल हो जाते हैं। फिर होता यही है के गालियाँ अपने को पुनःपरिभाषित करती हैं और नामों के स्थानापन्न की तरह इस्तेमाल होती सुनी जा सकती हैं। इसके परम्परागत रूप में भी कईयों की माताएं बहनें इस कक्ष में बराबर उपस्थित रहती हैं।

मेरी, मेरे साथ अजय की सत्ता सिर्फ और सिर्फ व्यव्स्थापक की है और इस पूर्वधारणा के साथ इस कमरे में आये सारे लड़के इस पर्चे को कर रहे हैं। करवा भी रहे हैं। इस लिहाज से यह उत्तरआधुनिक कक्षा है जहाँ 'सपुस्तक परीक्षा' (ओपन बुक एग्जाम) से पहले के प्रयोग इनके कर-कमलों द्वारा संचालित हो रहे हैं। एक की शीट किन-किन हाथों से होते हुए आखिर में हमारे पास पहुचेगी। इन्हें शायद पता नहीं है, न ही कभी आदत जैसी व्याधि से ग्रसित हुए कि ऐसी परीक्षाएं इनके बौद्धिक-भाषिक कौशलों का परिक्षण है। इनकी समझ में यह सिर्फ एक विशेष संख्या वाली मद को पारकर इस कक्षा से लांघने की व्यवस्था भर है। जिनके बाद इन सबको बारहवीं पास मान लिया जाएगा।

कभी-कभी बीच में तकरीरे भी हो ही जाती हैं और हर बार यहीं आकर वो सारे हमें लाजवाब करने की गरज से कहते पाए जाते के इतनी सख्ती तो बोर्ड में भी नहीं होने वाली सरजी! वहां तो पाँच-पाँच सौ रुपये देंगे और पास हो जायेंगे। पर उन्हें खुद नहीं पता कि अगर सच में ऐसा होता भी है तब उनकी क्लास में पिछले साल के फेल छात्र क्या कर रहे हैं? तब एक उठता है और कहता है, 'सरजी! वो तो उस प्रिंसिपल की हमारे प्रिंसिपल से ठन गयी थी। वरना पास तो पिछली बार में ही हो जाते।

लगातार इन्ह तरहों की नक़ल करती कक्षाओं में नहीं समझ पाता के अभी भी 'पास' हो जाने में ऐसा क्या है? जब इन सबके पास उस किताब के अक्षरों का भी अता पता नहीं मालूम- शायद यहाँ मैं गलत हो गयी, खारिज हो गयी बात की बात कर रहा हूँ। शायद इसे ही अपने मूल्यों को घसीटना भी कहते हैं। यहाँ यह सवाल बेमानी सा है के परीक्षा को लगातार कमज़ोर किया जा रहा है और साल दर साल इन चारदीवारियों से निकलती भीड़ की भीड़ का कोई भी अर्थ नहीं है। एक अर्थ में सत्ता इन्हें कहीं का भी नहीं छोड़ती। जो रहे सहे परम्परागत कौशल इस समय अपनी अंतिम घड़ियाँ गिन रहें हैं, उनसे भी यह पीढ़ी दूर होती जा रही है। यह रोना नहीं इस नवउदार व्यवस्था के सह-उत्पाद में अपने जीवन को दीर्घजीवी बनाये रखने की एक युक्ति ही ज़यादा लगती है।

समझ नहीं आता के राजेश जोशी की कविता क्यों बच्चों को काम पर जाता देख उदास हो जाती है? उन्हें शायद किसी ने गलत स्कूल का पता बता दिया होगा। जहाँ से निकले बच्चे, बच्चे नहीं कुछ और ही होंगे। अभी एक अपने हाईटेक सैमसंग मोबाइल से एक थोड़ा पढ़ लिख गए बच्चे की आंसर शीट की तस्वीर उतार कर पानी सीट पर जाकर बैठ गया है। वहां 'ज़ूम' कर उस तस्वीर से नकल करेगा। सवाल यह उठता है फिर हम वहां क्या कर रहे हैं हमारी ज़रूरत क्या है? यही सवाल तो अपने से भी कर रहा हूँ। पर कुछ समझने लायक बात आती इससे पहले ऊपर आसमान में छब्बीस जनवरी की परेड में उड़ने वाले लड़ाकू विमानों की गड़गड़ाहट से नीचे ज़मीन से एक मंज़िल ऊपर इन बच्चों को कौतुक से नहीं नहीं गालियों की बौछारों से भर दिया है। पता नहीं यह सब क्या कह डाला। खिड़की से नीचे मैदान में 'खिलाड़ी 786' का 'बलमा' गाना बज रहा और ये सब कह रहे हैं आज 'गोट्टेया' इस पर नाचेगा।

11:23 A.M.


{आज तारीख़ चार फ़रवरी, दो हज़ार तेरह।  'जनसत्ता 'के 'समांतर 'में यह ब्लॉग पोस्ट 'नाम की परीक्षा ' शीर्षक के साथ आई है। वहां पढ़ने के लिए यहाँ चटकाएँ..}

जनवरी 22, 2013

जहाँ मैं कहीं नहीं था

{यह छोटा सा पुर्जा सत्ताइस जुलाई, दो हज़ार ग्यारह का है जब अगले दिन साउथ कैंपस जाने न जाने के बीच उलझ रहा था। इधर इसलिए भी याद आया के इन्ही दिनों के साथियों से दोबारा मुलाक़ात इस हफ्ते होने है। देख रहा था तब क्या सब सोच रहा था। अपनी यादगारी के लिए भी और उनके लिए भी। उमर कैसे वहाँ बेगाना सा बना रही थी और मैं जुड़ने छिटकने के बीच लगातार वहां जाने से बचना चाहता था। पर कभी लगता है कैसे भी दिन हों, थे तो सब साथ ही..}

पता नहीं ऐसा इस बार फिर हुआ कि वो सारे फिर कहीं पीछे छूट गए। उनके साथ चलना न चलना दूसरी बात है। एम।ए। के सिर्फ दो तीन दोस्त रहे जिन्हें मैं जानता था। यहाँ भी उत्नो के करीब हूँ। फोन से बात करने का भी मन नहीं हुआ। कभी करता भी है तो मिला नहीं पाता। शायद उनसे जुड़ा भी सतही स्तर पर था। जहाँ उन्होंने मेरे लिए एक खांचा गढ़ उसमें मूर्ति की तरह रख दिया था।

माने सबको एक बारगी सर से नकार देने वाला ऐसा जीव जिसे निराशावादी जैसे शब्द नहीं बोले गए पर यह नजरिया उनसे मुझको जोड़े नहीं रख सका। उन्होंने सबने मिलकर एक अव्यवस्थित से दाढ़ी वाले के रूप में मुझे देखा। और वैसे भी जब आप किसी से किसी भी स्तर पर सहमत न होकर तीसरा पक्ष रख उसका राग अलापते रहेंगे, तो इसकी संभावना ज़्यादा है कि आपकी उपस्थिति उनके बीच अनामंत्रित अतिथि सी ही होगी। और ऐसा होता भी था।

मेरे लिए भी उन छिछली किसम की घोर आदर्शवादी बातें पचाना संभव नहीं था, इसलिए उनकी हर बात को काट अपनी सजाता गया। मैंने उनको बोलने का अवसर तो दिया पर मौका पाते ही उन्हें उल्टा टांगने में कोई कोर कसार नहीं छोड़ी। फिर शुरू हुआ प्रतिघात, काउंटर अटैक। उन्होंने भी मेरे किसी भी बात का समर्थन करना छोड़ दिया। मैं एक अतिवादी ध्रूव की तरह वे दूसरे सिरे पर अवस्थित मुस्काते। मुझे नहीं सुनते। खारिज करते। साथ रहते भी तो कैसे? जो मित्रता में होता है उससे अलग बुज़ुर्गवार की तरह ट्रीटमेंट कभी भी अच्छा नहीं लगा। इसके चलते दोनों सिरों ने एक दूसरे पर बिब सोचे समझे मानसिक-वाचिक-शाब्दिक अत्याचार किये।

कल शशि शेखर अपनी दुर्गति के बारे में उवाचेंगे। माने हिंदुस्तान हिंदी के सम्पादक पत्रकारिता की चुनौतियों पर व्याख्यान देने आ रहे हैं। सोचता हूँ चले चलूँ। एक बार फिर उन कैंपस वालों से मिल आऊं!!

27.07.2011, 08:54 P.M.

जनवरी 21, 2013

पानी पर कुछ फुटनोट

बिलकुल भी नहीं सोच रहा था के आज लिखूंगा। पर नीचे सप्लाई का पानी भरते हुए ख़याल आया, उन बोतलों का, जिनमे पानी भर रहा था। और उस पानी की पाइपों का। जिनसे गुज़र कर पानी की पीने लायक व्यवस्था की गयी है। यह शहर जिस तरह से बस गए हैं या वे इस वर्तमान संरचना को पा गए हैं, उनमे पानी को इसी रूप में पहुँचाया जाता है या जिनकी जेबों में पैसा कुलबुलाता है वह फोन कर इन टैंकरों को बुला लेते हैं। जिनकी जेबें फटी हैं उनकी भीड़ की भीड़ कहीं रेल की पटरी के किनारे बसी किसी कबीर बस्ती में टूट चुकी टूटी और बजबजाते नालों के ऊपर खड़ी अपनी बारी का इंतज़ार करती हैं। 

इसी पानी की आड़ में कई नेता बड़े-बड़े चुनावी वादे भी करते हैं और कई स्वप्रबुद्ध जन इन्ही झुग्गी झोपड़ियों को पहले तो अवैध कहते हैं और फिर ये के इन्हें इन नेताओं ने ही पाला पोसा है। और हमारे यहाँ पानी भले न आये पर बजबजाती गन्दी नालियों के नीचे से गयी लाइनों से इन्हें चौबीसों घंटे पानी पहुँचाया जाता रहा है। फिर एक दिन ऐसा भी आता है जब पर्यावरण के नाम पर उन्हें वहां से खदेड़ दिया जाता है। अभी पीछे यह ख़बर भी आई गयी हो गयी के दहिसर, गणपत पाटिल नगर में बम्बई नगर पालिका ने समुद्र किनारे उगे मैन्ग्रोव को बचाने के लिए वहां बसी रिहाइश को उजाड़ दिया है। यही सत्ता है जिसको लवासा में पहाड़ों के बीच बनती टाउनशिप कायदे से हजम भी हो जाती है। बिलकुल वैसे ही जैसे बड़ी-बड़ी नदियों को साफ़ करने के एवज़ में योजनायें तो टेम्स का ख़्वाब दिखाती हैं पर पैसा पानी की तरह बहता दिल्ली के ख़ास लुटियन इलाके में पहुँच जाता है। ख़ैर। वापस। ज़यादा नहीं सत्ता जाग जाएगी। उसे सोने दिया जाये।

इस पानी को लेकर कई भविष्यवाणियाँ यहाँ तक भी पहुंची के तीसरा विश्व युद्ध इसी के इर्दगिर्द लड़ा जायेगा। पर बड़ी-बड़ी हथियार बनाने वाली कंपनियों ने इस इंतज़ार करने के बजाय देशों के बीच युद्ध प्रायोजित करवाने के कई तरीके इज़ाद कर लिए हैं। वर्ना कब तो जंग छिड़ती और कब उनके दलाल सक्रीय होते। उस इंतज़ार में खतरा उनके कारखानों पर ताले लगने का भी तो था। तब जंग उन कारखानों पर लगे तालों को खोखला करता, देशों को नहीं।


यह पानी कभी इस नागर संस्करण में उन जगहों में नहीं पाया जाता जहाँ राज्य की या विचारों की व्याप्ति आधुनिक अर्थों में न हो। वहाँ यह पानी इलाहबाद के कुम्भ की डुबकियां हैं। 'हर हर गंगे' की पाप हरती धार्मिक उदघोषणायें हैं। पर उन सड़ी गली नदियों में नाक हथेली से बंद कर नहाने वालों की त्वचा किन चर्म रोगों से संक्रमित होगी इसका कोई लेखाजोखा कहीं कोई स्वास्थ्य विभाग नहीं जुटाता, न रखने की सोचता है।

इसे जितना कम जटिल करने की सोच रहा था उतना ही इस पिछली पंक्ति से गुज़रते हुए महसूस हुआ के काँटा फँस गया। बिलकुल इसी क्षण अभी पार साल हज़रतगंज के साहू की याद हो आई जहाँ सिनेमा हॉल के अन्दर मेरे हाथ में बोतल देख एक अजान व्यक्ति को भी प्यास लगती है और मेरे अन्दर यह विचार कुलबुलाने लगता है यह मेरी खरीदा हुआ पानी है और इसपर उसके गले से ज़यादा मेरे हलक का अधिकार है। इसलिए हाथ की पकड़ मजबूत करने के साथ ही गर्दन भी नब्बे डिग्री के कोण पर कहीं दूसरी दिशा में फेर ली थी।

इस 'अधिकार' को विखंडित करें तो पाएंगे यह भी आधुनिक पद लगता है और जिसका जन्म स्वाधीनता आन्दोलन के प्रकारांतर हम भारतियों में हुआ लगता है और इसकी सत्ता मेरे इर्दगिर्द 'अर्थ' या 'पूंजी' के रूप में जुड़कर साथ मंडरा रही थी। कभी हम सोमवार पहाड़गंज जाते थे तो 'इलीट शूज' के बाहर पानी एक लोहे के ड्रम में गिरता रहता था। जिसे पीना है भरना है भर ले, पी ले। पीछे वहां गया तब उस जगह नल लगा दिया गया है और पानी की कटौती को पानी की बचत कह दिया गया है।

हज़रतगंज औरमपार घूमने पर एक भी प्याऊ नामक व्यवस्था न मिली। मिला हमारे गोल मार्किट, शहीद भगतसिंह मार्किट में। एक पियाऊ लगा है, पर कई साल पहले टूटियाँ गायब हुई फिर धीरे-धीरे पानी। अब वहाँ धूल है और कुछ नहीं। 
भले उसमे धार्मिक पुण्य और बहीखाते में प्यासे को पानी पिलाने की संतुष्टि ज़यादा थी। वह जगह किसी लाला की स्मृति में 'श्वेताम्बर स्थानकवासी जैन कॉन्फ्रेंस' ने किसी परिवार को दी होगी। पर अब न उनकी संतानों ने उनकी याद में लगे इस जगह की याद है, न उन धार्मिक संस्थाओं के लिए यह अब कोई ध्यान देने लायक बात ही लगती होगी। यह बिलकुल उसी वक़्त हुआ होगा जब उस 'जैन भवन प्याऊ' लिखने वाले पेंटर की दुकान उजड़ चुकी होगी और उसे 'चूना मंडी' फ्लेक्स प्रिंटिंग की मशीनों को संभालने के लिए नियुक्त किया जा चुका होगा।

पर अगले ही पल इस पर 'अधिकार' वाली बात जो ऊपर बड़ी 'आधुनिक चेतस' लग रही थी 'प्रेमचंद' की कहानी के आगे धराशाही हो पानी भरने लग जाती है। कहानी है, 'ठाकुर का कुआँ'। उस पर अधिपत्य। शोषण के औज़ार के रूप में एक मनुष्य के स्पर्श को भी वह कुआँ स्वीकार नहीं कर सकता। उन विकट होते क्षणों में पानी की एक-एक बूंद की कीमत का एहसास होता है और तभी उसी क्षण दोबारा 'आधुनिकता' के छद्म को ओढ़ दिखाई देती है बाज़ार में बिकती पानी की बोतलें। इस पानी पर यहाँ के नागरिकों का स्वाभाविक अधिकार है, उसे अपदस्थ कर इसे इन बड़ी-बड़ी दैत्याकार बहुराष्ट्रीय कंपनियों को 'एफ़डीआइ' पर बहसों के कई बरस पहले ही हस्तगत किया जा चुका है। पर इसपर कहीं कोई बात भी करना 'पसंद' नहीं करता। 'पसंद' उनका स्वाभाविक संवैधानिक अधिकार है।

इसे दूसरे रूप में भी पढ़ सकते हैं। जहाँ यह पानी धीरे-धीरे बिलकुल उसी तरह गायब होता गया जैसा अनुपम मिश्र यह बताते हैं के लोधी गार्डन के अठपुले से होते जो झील आज वहीँ तक सिमट गयी है, कभी वह आज के खान मार्किट से बहते हुए पुराना किला की उस झील से जुड़ती थी जो किले के पीछे से होते हुए यमुना में जा मिलती थी, आज कहीं किसी की याद में नहीं है। हमने उसे उन्ही आठ सौ छोटे बड़े तालाबों की तरह पाट दिया विकास की आधुनिक परिभाषा में कहीं किसी भी तरह अटते नहीं थे।तब हमें मिली भागती दौड़ती सड़कें आसमान छूती इमारतें। और गायब हो गयीं वहाँ रहने वाली मछलियाँ और इसी विकास के सहउत्पाद के रूप में हमें मिले, डेंगू के मच्छर।


{बाद की एक और पोस्ट:  पानी की देशज व्याख्या }

जनवरी 12, 2013

तुम अपना नाम मत पूछना बस

मैं अभी भी लिख नहीं रहा हूँ, बहाने बना रहा हूँ। इसीलिए तो सबसे बाद में किया जाने वाला काम इस दफे सबसे पहले किया। के बाद में दिक्कत न हो। दिक्कत पढ़ने वालों को नहीं, इस लिखने वाले को है। कि क्या लिखना है और क्या नहीं, उसे बाँध कर खूंटे से रख लूँ। खैर, ये सब तो चलता रहता है। आते हैं उस रात पर जब तुमने कहाँ मैं कहाँ हूँ। मतलब 'तुम कहाँ हो?' तुम ढूंढ़ रहे हो अपने आप को। गुम हो जाने के बाद जैसे। पर मैं गुमशुदा तलाश केंद्र की रिसेप्शन पर तो बैठा नहीं हूँ के खोने वाला खुद पूछ बैठे, 'कहाँ से चल, कहाँ आ गया हूँ?'  पर इस सवाल का जवाब शायद मेरे पास शायद ही हो। दो बार 'शायद' इसलिए भी, के, जो सब तबसे मेरे दिमाग में चल रहा है उसे कह तो दूँ.. पर डरता हूँ।

डर लगता नहीं, उसका एहसास होता है। इसलिए अभी पर इतना डरूंगा तो चलेगा कैसे, इसलिए बिन हीला-हवेली आता हूँ सीधे तुम पर..

बढती उम्र के साथ सपने देखना न कम होता है न उनका आना। बल्कि वे जादा आते हैं बेखटके। कहीं अटके अरझे हुए हो जैसे। किसी डाड़ पर। किसी बिलजी के खम्भे पर। तुम्हारे कई सपनो में से तुमने चुना साथ रहना सपनो के। उस सपनो वाली दुनिया को बिलकुल उन्ही की तरह नाज़ुक हाथों से बनाया। जैसे बुन हो उन्हें। आहिस्ता आहिस्ता। करीने से। सपना थोड़ा दूर था। पर पीछे हटना, उस बढ़ा दिए कदम के खिलाफ होता। शायद इसलिए भी पीछे नहीं हटे। हटना किसी भी तरह से मोर्चे से भी है और उन क्षणों में हमारे भविष्य की रुपरेखा जैसा भी। जहाँ बेफिक्री है। अपना मन है। समझौते जैसा कोई सवाल तब न मन में उठता है। न लगता है। हम पूरी कोशिश करते हैं उसे सच करने की। और यहाँ एक क्षण रुक सहसा कई साल पहले आये सवाल पर दोबारा लौट पड़ता हूँ के अगर तुम दोनों सजातीय न होते तब क्या होता?

तब शायद होता ये के.. मैं होता कौन हूँ किसी भी सम्भावना को लिखने कहने वाला? मुझे अधिकार क्या है? उनकी ज़िन्दगी थी वही सबसे पहले वहां तक पहुचते। आज ये क्या कलम घिस्सुओं की तरह पिल पड़ा हूँ। और लगा हूँ कीबोर्ड से शब्दों को खटकाने। पर नहीं। इसे उनका कह भी कौन रहा है? ये सब तो मेरा है। किसी के कहने पर तो जाता भी नहीं। जो मन में आएगा कहूँगा। पता नहीं क्या हो जाता है बीच बीच में। अपने को सतर्क कर रहा हूँ। जहाँ अगली बार ऐसा हुआ वहीँ पोस्ट बंद।

वापस सपनों पर। सपनों के साथ दिक्कत यही है वो हमारे सामने घटित तब होते लगते हैं जब हम उनसे काफी दूर चले जाते हैं। मतलब ऐसा बिलकुल नहीं है के हम उनको चाहते नहीं हैं। पर कभी-कभी होता ये है के उनको हू-ब-हू होता देख अपने से रश्क तो नहीं, पर उनकी इतनी देरी पर गुस्सा ज़रूर आता है। कई बार उसके चरित्र (कैरेक्टर) बदलने का भी मन करता है। इंतज़ार वह बेकरारी सब पीछे कहीं छूट जाता है। रह जाती है खुरदरी सी लगती जमीन। जिसपर रेंगने का मन नहीं होता। पर पिछली ही किसी पंक्ति में कहा जा चुका है यह देर से सच हुआ सपना है। जहाँ उसके बिलकुल वैसा ही घटित होना है, जैसा वह देखा गया। ऐसा भी नहीं है के वह जबरिया हम पर थोपा जा रहा है। पर कुछ-कुछ रूमानियत कम ज़रूर हो जाती है क्योंकि उसी के समानांतर कई ऐसे सपने चल रहे होते हैं जिनको अभी काफी लम्बा सफ़र तय करना है। और तब वह क्षण आता है जब हम अपने उस सच होते सपने को थोड़ी देर के लिए स्थगित भी करना चाहे तो नहीं कर सकते। अंग्रेजी वाला 'रेक्टिफाय' भी नहीं कर सकते। न पॉज। फिर वहीँ से 'रिज्यूम' वाला फंक्शन भी अब तक सपनो के सन्दर्भ में इस्तेमाल करने होने वाला कोई प्रमाण भी सामने नहीं आया है, इसलिए इन पर चर्चा अभी सिर्फ विषयांतर ही होगी इसलिए फिलहाल अभी यहीं तक। 

पर तब क्या हम अपने उस आने वाले कल को कुछ देर रोकने की नाकाम कोशिश नहीं कर रहे होते हैं। कुछ-कुछ यह ऐसा ही लगता है। जहाँ हमने जिसके साथ जिंदगी बिताने के ख्वाब देखे थे, उसमे दूसरे के साथ लगता है, इतना वक़्त पहले ही बिताया जा चुका..पता नहीं क्या..क्या लिथारता हुआ आ रहा है..कह नहीं सकता के पहले सपने से तुम भाग रहे थे या तुम्हारे मन में क्या चल रहा था। पर इतना तो कह ही सकता हूँ के वो भागना नहीं किसी तरह मन को तैयार न कर पाना था। इसमें सच कितना है कभी तुमसे पूछा नहीं। पर पता नहीं क्यों ऐसा ही लगता रहा है अब तक। जहाँ हम खड़े होते हैं उसे फिर हर तरह से बचाना चाहते हैं। पता नहीं फिर ऐसा क्यों लग रहा है के इन सपनों के पीछे बहुत कुछ है किसे छिपा रहा हूँ। कहना चाहता हूँ, पर..बहुत कुछ जो स्थूल रूप में दिखाई देता है उसे अमूर्त कर कहीं गायब कर पोटली बंद कर देना चाहता हूँ। ऐसा लिखना मुझसे न होगा। कभी फिर आऊंगा। तब लिखूंगा। बिन पर्देदारी। अभी जाते जाते इतना ही के जहाँ आज तुम हो मन के बिन मन के वहाँ ही तुम्हे अपने लिए रास्ते खोजने हैं।

सपने देखना बंद मत करना मेरे दोस्त!! वही तो हैं, जो हमें जिन्दा रखते है। वरना सांस तो सभी ले ही रहे हैं। लेते रहेंगे। तुम जब तक अपने अंदर की सोयी चुप्पी से डरते रहोगे, तब तक यूँ ही घुटते-घुटते दिन तुम्हे काटते रहेंगे और रातें किसी ओ' हेनरी को पढ़ते पढ़ते गुज़र जाएँगी। उस रात भी कहा था उसी को दोहरा रहा हूँ। कोई बाहर से नहीं आएगा चुप्पी तोड़ने। उससे डरना भी बंद करना पड़ेगा। बहुत हो गया डरना वरना। लिखो। वही तुम्हे फिर खुद के पास तक ले जायेगा। नहीं चाहते तो यूँ ही चुप्प रहो। तुम्हे शायद याद न रहा हो इसलिए फिर लिख रहा हूँ के अगर हम यही सोचने लग जाएँ के सही वक़्त आएगा और तब मैं लिखना शुरू करूँगा तब न मालूम मुझे लगता है हम कभी लिख ही न पायें। लिखना अशांत मन की उत्पत्ति न भी माना जाये पर लिखने की कोशिशें लगातार होती रहनी चाहिए।

तुम्हारे संदर्भ में लगता है न लिखने का वक़्त कभी नहीं आ पायेगा, अगर तुम सिर्फ न लिखने के बहाने बनाते रहे। लिखो। वह हमारी इस ख़तम होती मानसिक उर्जा को शक्ति भी तो देता है। न भी देते हों पर भ्रम तो हो ही जाता है। बस उसे जानने की ज़रूरत है। शुरुवात करके तो देखो। मुश्किल है। पर करना तो पड़ेगा तुम्हे ही। खुद को दोबारा ऐसे ही पाया जा सकता है। और जहाँ तक असफल होने का मामला है, उसमे स्थायित्व की बात है उसपर यहाँ अभी नहीं..

सोच रहा था तुम्हारी किला-ए -कोहाना मस्जिद  वाली तस्वीर लगाऊंगा। पर नहीं। नहीं लगा रहा। इस बार फिर तुम बच गए

जनवरी 09, 2013

लिखे देता हूँ आड़ा तिरछा

आज न दिल भारी रखना चाहता हूँ न दिमाग। दिन ही कुछ ऐसा है। धीरे-धीरे या के चुपके से अपने पीछे बीत चुके सबमें उतर जाने का मन है। बिलकुल उस चुप्पे की तरह जो इतना चुप्पा है के सीढ़ियों पर बैठी बिल्ली भाग भी नहीं पाती। कल करीब रात होते होते बड़ा दार्शनिक होने का मन कर रहा था और लगा अँधेरा ऐसा कर भी रहा है। उस वक़्त धीरे क़दमों के बीच टकरा गया। क्या अपने आप को विचार में बदल देना चाहता हूँ और जितना भी अब तक जिया है उसे तुरंत किसी वैचारिक प्रक्रिया का हिस्सा मान भाग लेना चाहता हूँ। दर्शन के साथ दिक्कत सबसे बड़ी यही लगती है वह शुरू-शरू आपके सिवा किसी की समझ में नहीं आता और जब दूसरे समझने लायक होते हैं, आप अपने उस बिंदु से आगे खिसक चुके होते हैं। मुझे कम से कम आज तो इतनी घुमाफिरा के बातें नहीं करनी चाहिए। तकाज़ा कहता तो नहीं है पर कर लेता हूँ।

दरवाज़ा खुला है और बाहर अनाम पक्षी अपने किसी सभाषी को डांट रहा है। नहीं भी खुला होता तब भी आवाजें कान तक पहुचती ज़रूर। जिस कान से सुनता उसकी भी तो कोई न कोई उम्र होगी। बिलकुल होगी जनाब!! बिलकुल उसी तरह जैसी इस दरवाजे की है। और जब हम बहुत छोटे थे तब यहाँ झरोखेदार जालियाँ लगी थी। उसी की आड़ में छुपन-छुपायी खेलता मैं खड़ा हूँ। बहुत छोटा सा। नन्हा सा। मुलायम हाथ, मुलायम यादों की तरह। तब इस बरस की तरह चींटे हमारे एक कमरे वाले घर में नहीं आये थे। हमारे क्या किसी के घर की तरफ ये ऐसे खिसके भी नहीं थे। तब नीचे पार्क की तरफ ही घूमते सैर करते थे। हम चेन-चेन खेलते और ये चींटे कतारबद्ध एक के पीछे एक चलते रहते। कोई कभी अकाल मृत्यु हो भी जाती तब कोई बुज़ुर्ग चींटा अपने सधर्मी चींटे के पार्थिव शरीर को अपने मुह में दबाये अपने घर लौटते हुए कई बार देखा। हम ऐसे जाते चीटों को खूब परेशान किया करते। नहीं समझते थे उनके प्रेम को।

हम तो उन उड़ते फाहों को इक्कठा करने में लगे रहते जो गर्मियों की छुट्टियों में दूर देश से उड़ कर हम तक आते। सुनहरे सफ़ेद।चमकते दमकते। सेमर का पेड़ उसके लाल फूल दिल्ली में बसंत के साथ जुड़े हैं या नहीं ये बात अज तक नहीं पता। पर अभी बिलकुल अभी गूगल करने पर यह मालुम चला के जयशंकर प्रसाद की कहानी आँधी में मुसहरिन सेमर की रुई बीन लेती थी और रामविलास शर्मा निराला की साहित्य साधना के दूसरे खंड (पृष्ठ: दिवा-स्वप्न/457) में 'राम की शक्ति पूजा' के सन्दर्भ में 'हिरनी' कहानी के बाद जिस 'अर्थ' नामक कहानी पर आते हैं उसमे कुलीन ब्राह्मण पुत्र रामकुमार भीम का स्मरण करते करते उनकी गदा तक पहुँचता है और याद करता है कि कैसे भीम के गदा घुमाने पर भगदत्त के हाथी सेमर की रुई की तरह उड़ गए और कुछ तो अभी भी हवा में चक्कर काट रहे हैं।

इधर उम्र के साथ बड़े होने में दिक्कत सबसे बड़ी यही हुई के बात हो कही रही होती है, पहुँच कहीं जाती है। इसका एक तो कारण यह हो सकता है के अपने बचपने के बारे में खुद कुछ अब ज़यादा याद न हो या जो भी याद हो उसमे इतने सालों बाद शब्द ध्वनियाँ बचे ही न हों, बस बची हो बेतरतीब सी यादें, जिनको किसी ने करीने से लगाने की ज़रूरत महसूस नहीं की। या वक़्त ही कौन निकाले इन सबके लिए। पर हैं तो यह सब हमारी थाती जैसा ही कुछ।

कभी-कभी इनके पार चले जाने का मन होता है जैसे आज सुबह से ही उस गायब हो चुके पार्क में रॉकेटनुमा झूले पर बराबर बेतहाशा भागे जा रहा हूँ। ऊपर नीचे।नीचे ऊपर। ढलान से लेटे लेटे उतारते थे। पीछे की दिवार पर चढ़ने में डर कभी नहीं लगा। वहां से बिरला मंदिर की दूरी बस एक सड़क पार थी। कितनी ही नन्ही शामे अँधेरा होते वहां से पैदल लौटते हमारे पैर थक जाते। बिलकुल बेजार। फिर हमें एक तरकीब सूझती। डीटीइए स्कूल के बाद जो तरणताल (आज तक हम उसे तरणताल ही बुलाते आ रहे हैं बोर्ड पर तब से यही लिखा पढ़ा इसलिए भी, और स्विमिंग पूल कहने में हम उससे जुडा महसूस नहीं कर पाते हैं। इसलिए भी तरणताल) आता उसके बाद कीकर के पेड़ के पास आते ही पापा से हमें कन्ना (गोदी) लेने की जिद करने लगते। थोड़ी देर बाद एक कंधे पर मैं होता दूसरे पर भाई। फिर वहीँ बिरला मंदिर से लौटते हुए कभी टिक्की खाते, कभी किसी चमकीली कलम पर चिपके शीशों पर दिल लुटाते उनपर मर मिटते। कभी यूँ होता के एनपी बॉयज स्कूल के बाद जो कूड़ाघर आता वहां से दोनों भाई रेस लगाते भागते पर जीना चढ़ने से डरते।

इसी जीने पर जलते रोशनी करते कई लट्टूओं पर पानी की दो तीन बूँदें  डाल उन्हें फोड़ चुके थे। पर डर तो डर होता है वो अँधेरे के साथ ही रोज़ रात आता हमें डरता और सुबह होते चला जाता। तब यही जीना हमें अँधेरे में छत पर जाने से रोकता। हम रुक जाते। इसे रुकना नहीं तब डरना कहता। तहकीकात के एक एपीसोड में जॉन परेरा की टब में नहाती लाश कई सालों तक हमारे पीछे पड़ी रही। इस टीवी से बहुत छुटपन से ही जुड़ गए थे। इतवार सुबह 'रंगोली' आता था। उसपर हेमा मालिनी होती थी। पर हमें तब गानों से मतलब था न कि बुढाती हिरोईन से। फिर 'स्ट्रीट हॉक' की भागती मोटरसायकिल उसके काले चमकते कपड़े अपनी तरफ खींच लेते थे। कहानी शायद 'ट्रॉन लेगसी' जैसी किसी फिल्म पर होगी।

पर शाम चार वाली फिल्म से ज़यादा इंतज़ार रहता था पीछे बीते दिन शनिवार को फिल्म से पहले आते धारावाहिकों का। विक्रम बेताल। 'सॉर्ड ऑफ़ टीपू सुलतान' की धुन तो बस!! 'हमलोग' के अशोक कुमार की ऐनक लगायी तस्वीर कभी-कभी बोलती दिख जाती है। इस टीवी वाले हिस्से पर गाँव शटर दरवाज़े वाला टेलीविजन भेजने, 'अच्छा सिला दिया तूने मेरे प्यार का' एल्बम की कैसिट, हमारा गर्मियों की छुट्टी पर महिना-महिना भर के लिए जाना। तब 'शरलाक होल्म्स' न देख पाने का एहसास आज भी बहुत करीब महसूस होता है। और भी काफी कुछ है जिस पर कभी तसल्ली बक्श काम किया जायेगा। भूल जाऊं तो याद दिला देना साहब!

ऐसी ही एक याद है जिसमे हमने बाबा खड़क सिंह मार्ग से बस पकड़ी थी। तब न दशकों तक रिलाइंस एअरपोर्ट मेट्रो लाइन वहां आनी थी न ही मल्टी लेवल ऑटोमेटिक कार पार्किंग बनने की किसी ने सोची थी। जबकी बात है तब न जगह का नाम मालूम था और न ये के हमलोग सब जा कहाँ रहे हैं। बिलकुल जफ़र पनाही की फिल्म 'द मिरर' की उस छोटी लड़की की तरह जो जगहों को नाम से नहीं बल्कि उनकी छवियों से याद रखती थी। मुझे भी बस दीवारें याद हैं लाल-लाल सी और खूब सी भीड़। एक बस हम लोग छोड़ देते हैं। दूसरी भी जाने देते पर जहाँ पहुँचना था वहां के लिए और देर हो जाती इसलिए मन मारकर चढ़ ही लेते हैं। बात इसी बस के अन्दर की है। हम दोनों भाई (तब तक बहन नहीं आई थी) खड़े थे, पापा ने एक बैठी महिला से कहा के बच्चे छोटे हैं इसलिए थोड़ी जगह दे दें तो बैठ जायेंगे। पर वो मानी नहीं। हम खड़े रहे। खड़े खड़े ही सारा रास्ता गुज़र गया। वो तो कई सालों बाद एल्बम में फोटो देख कर पता चला वह जगह जहाँ हम उस दिन जा रहे थे वो सूरजकुंड मेला थी। शायद पाँचवा या छठा साल होगा इसका।

हमरी स्काफ़ पहने फोटो हाथ में छोटे-छोटे लेम्प। कई सालों तक वो 'बाबा वाले डब्बे' (इसकी भी कई कहानियों में महत्वपूर्ण भूमिका है पर अभी नहीं) की बगल में रखे रहे। कभी मिट्टी तेल डाल उन्हें जलाया नहीं। पता नहीं कई साल हुए अचानक वे गायब होकर कहाँ खो गएतब से हमें कभी नहीं दिखे। न साल दर साल बड़े होते हमने उन के यूँ गुम हो जाने की बात मम्मी पापा से पूछी। पीछे सूरजकुंड है और हम दोनों खड़े मुस्का रहे हैं। साल शायद वो रहा होगा जब मेरा मुंडन हुआ था और सर पर बाल कम हैं। या एक दूसरी तस्वीर को इस के साथ गड्ड-मड्ड कर रहा हूँ, पता नहीं। पर स्काफ का रंग ज़रूर याद है। महरून।

तुमने अभी चार बजे बात करते करते पूछा था न के अपने बारे में बताऊँ। उसी अपने में से थोड़ा सा लिख पाया हूँ। मुझे जिन्दगी जीना ज़यादा आसान लगता है बनिस्पत इसके के उसे लिखते लिखते जिया जाये। और फिर कभी-कभी खुद को इतना काबिल भी नहीं पाता के कुछ अपने बारे में उन बीत गयी नाज़ुक सी यादों के लिए शब्द जुटाऊं। उन सबको साधना मेरे बस की बात नहीं लगती। कोशिश करता हूँ उनको एक तरतीब से सहेजे रखूं। पर डरता हूँ कहीं कभी अल्जाइमर का शिकार हो गया तब कौन याद दिलाएगा इसलिए भी लिखे देता हूँ। आड़ा तिरछा। और जो फोन रखते वक़्त कहा था न के आज की तारीख याद रखना। तो मोहतर्मा आज अपनी सालगिरह है। पता नहीं मैं तुम्हारे फोन का इंतज़ार करता रहा और जब आया भी तो तुमने याद न दिलाया। खैर।

तो साहिबा सूरजकुंड से लौटते वक़्त सीन बिलकुल उलट था। इसी फ़िल्मी भाषा में संयोग कहेंगे शायद। के तब हम बैठे हुए थे और वे महिला अपने पूरे परिवार के साथ खड़ी थीं। पापा ने हमें गोदी में ले लिया और थोड़ी जगह बनायीं ताकि वो छोटी लड़की तो बैठ ही सके। फिर पता नहीं हमें कौन सी सड़कें कब वापस ले आईं। जबकि पूरे रस्ते मैं खिड़की के बाहर ही झाँकता रहा था। और ऐसी पता नहीं कितनी बातें इधर जबसे लिखने बैठा हूँ दिमाग में दौड़ भाग रहीं है। पर अभी मुझे इस पोस्ट के लिए एक अदद तस्वीर भी खोजनी है। इसलिए इसे यहीं समेटते हुए बस इतना ही याद आ रहा है के तब बिरला मंदिर से दो सौ पंद्रह दो सौ सोलह चलती थी। इन्ही बसों ने लाल किले से पहले पहल हमारी मुलाकात करायी थी और वहीँ से चालीस नंबर बदरपुर बॉर्डर जाती थी और गुप्ता जी वहीँ से कई इतवार आते थे।

वहां तब अस्तबल भी था और बारह पंद्रह दुकाने भी। पता नहीं तब बहुत छोटा था, वरना तभी उनको ढूंढ़ निकालता। अब तो पता नहीं कहाँ कहाँ होंगे। वो रॉकेट नुमा लोहे का ढांचा भी कबका पिघलाकर पता नहीं क्या बना लिया गया होगा। फिर याद आ रही है उस मेले में बांस के पैरों पर चलता लंबा आदमी और भी पता नहीं क्या क्या..

जनवरी 07, 2013

मेरे हिस्से के कुछ सवाल

अब तो इधर दो चार दिनों से कुछ समाजशास्त्रीय विश्लेषण भी कूद पड़े हैं जो नर मादा की बायनरी में स्त्री पुरुष के समझौतों सौदेबाजियों को समझा रहे हैं। इसके अलावा कई व्याख्याएँ 'बर्बर' हो जाने की हद तक जा पहुची हैं, कई पाठ 'न्यू मीडिया' पर अपना विखंडन प्रस्तुत कर चुके हैं। तब इतने दिनों बाद अगर मैं ये कहूँ के कई रातों से नींद दिल्ली में बलात्कार की घटना और उसके बाद बनी परिस्थितियों के कारण नहीं आ पा रही है तो यह सरासर झूठ होगा। और रजाई में हवा घुस जाने की बात को मैं अपनी तरफ से बिलकुल नहीं कहना चाहता। अब तो सवाल दिल्ली में रहने और उस विरोध-प्रतिरोध का हिस्सा होने न होने पर भी सवाल बालकनियों की ज़द में आ चुके हैं और वहीँ से पूछे जा रहे हैं। खैर मैं होता कौन हूँ इन सबके प्रति ज़िम्मेदारी महसूस करने वाला!! बस एक अदद दिल है, उसे कभी-कभी उदास कर लेता हूँ बस। जिनके मजबूत ठीहें हैं, दुकाने ठीक ठाक जम गयी हैं वहां मक्खियाँ भिनभिनाये हमें क्या। पर अपनी तरफ से कुछ कहना चाहता हूँ इसलिए बिन बोले नहीं रहा जा रहा। तरतीबवार नहीं बेतरतीब।

रंग दे बसंती फिल्म ने जिस नए रूप में मोमबत्तियों को गिरजाघरों और दिवाली की सांस्कृतिक व्याख्याओं से निकाल एक नया अर्थ दिया और इंडिया गेट जैसे औपनिवेशिक ढाँचे के साथ प्रतिरोध का जो बिम्ब गढ़ा वह कुछ-कुछ इस शहर के बीच रहते बनते युवाओं की बन रही छवि की तरह ही था। जिसे उसने खुद नहीं बनाया वह कहीं और बन रहा था। कोई और बना रहा था। बिलकुल इसी तरह का एक रूपक इन्ही युवाओं की तरह गतिवान पिछले दस वर्षों से इस दिल्ली में मौजूद है। अभी बीते दिसंबर में समर्पण सेवा का एक दशक भी पूरा किया है। पर यहाँ आकर एक पेंच फंस जाता है। वह यह के यही दिल्ली मेट्रो अन्ना आन्दोलन के वक़्त अपने स्टेशनों से गुज़रती जंतर मंतर रामलीला मैदान आती जाती भीड़ को तो आमदनी का एक हिस्सा मान उनके प्रवेश निकास को बाधित नहीं करती थी। पर इस बार के दबाव समूहों को वहाँ पहुँचने से रोक गया। संविधान का थोड़ा कम ज्ञान है नहीं तो पूछता के किसी व्यक्ति को देश में कही भी आने जाने से रोकने पर कौन से मौलिक अधिकार का हनन होता है। पर यह ज़रूर कहूँगा के यही मेट्रो है जो गति की दिशा में पहला डिब्बा स्त्रियों के लिए आरक्षित करती है पर एक लड़की के बलात्कार के बाद उत्पन्न हुए जन उभार को दबाने में अप्रत्क्ष रूप से सत्ता के सहायक की भूमिका में आ जाती है।

फिर एक बात जो ध्यान देने लायक है कि सरकार प्रदर्शनों को हिंसक भी कहती है और उन विरोध स्थलों तक खुद चल कर जाती है। और जब विरोध के कारण मुख्यमंत्री को बैरंग लौटना पड़ता है तब वे सरकारी सहायता प्राप्त महिला सुरक्षा सम्मान पदयात्रा का आयोजन करतीं हैं। यहाँ एक बार फिर स्थलों का चयन देखने लायक है। बाल भवन से राजघाट तक ढाई किलोमीटर। मतलब यह के सत्ता स्त्रियों की भूमिकाओं में आमूलचूल परिवर्तन किसी भी रूप में उन सांस्कृतिक दायरों से बहार जाकर नहीं सोचने वाली है। शुरू बाल भवन से उनकी पारंपरिक पारिवारिक भूमिका से और समाप्त गांधी पर सत्ता के अहिंसा पर होलसोल विक्रेता होने की मुहर के साथ। वैसे मूलभूत परिवर्तन उनके हिस्से का काम है भी नहीं। और जिनका है वे सिर्फ कड़े प्रतिगामी कानूनों, लिंग विच्छेद के सुझावों, पहनावे के चयन को लेकर अपनी स्वतंत्रता तक ही सिमट कर रह गयी हैं। जो कुछ नारे सुनाई भी दियें हैं उनमे माता पिताओं से भावुक सी अपील है के अपने लड़कों को संस्कारित करें।

सवाल यह भी उठ रहे हैं क्या हमारे देश में इस घटना से पहले बलात्कार होते ही नहीं थे या हम उन सबके प्रति इतने उदासीन क्यों थे। महत्वपूर्ण सवाल यह भी है कि पहले भी कितनी दलित स्त्रियों के साथ अमानवीय घटनाएँ प्रकाश में आती रहीं पर तब क्यों यह जामुनी या गुलाबी क्रांति नहीं हुई। भारत इण्डिया वाली पुनुरुथान के आग्रह से पुष्ट दलील के आगे जाकर इसकी जातीय और वर्गीय व्याख्याएं भी निकल कर आ रहीं हैं। एक अर्थ में अब एक पैट्रन बनता जा रहा है। उसकी व्याप्ति यह के जिस वर्ग जिस समुदाय के साथ हिंसा हो रही है अधिकारों का हनन हो रहा है वही अब बौखलाकर सड़कों पर उतर रहा है। शायद अस्मिताएं ऐसे ही अपना काम करती हैं। वे तुरंत अपने और परायों में भेद करना जानती हैं। यहाँ इस बार के प्रतिरोध को अभिजीत मुखर्जी की टिपण्णी को इस सन्दर्भ में समझना होगा तब शायद नया ही पाठ खुल कर सामने आये।

फिर एक बात जो यहाँ महत्वपूर्ण प्रतीत होती है के क्या कारण है यह युवा दयामनी बारला को नहीं जानता। बारह साल से शर्मीला इरोम संघर्ष कर रही हैं। सोनी सोरी के साथ हो रहे अमानवीय व्यवहार पर कुछ नहीं बोलता। सीमा आज़ाद को किन्ही कथित किताबों को रखने के लिए गिरफ्तार कर लिया जाता है। उनकी जमानत की खबर उन्ही युवाओं की तरह उदार मीडिया गायब कर देता है। कुडनकुलम परमाणु संयंत्र के विरोधों का कारण नहीं जानता। एकता परिषद की पदयात्रा क्योंकर ग्वालियर से चलकर दिल्ली कूच कर रही थी। ओमकारेश्वर बाँध की ऊँचाई से क्या हो जाने वाला था कि ग्रामवासी जल सत्याग्रह कर रहे थे। इसका एक जवाब शनिवार को मिला के यह युवा किसी भी रूप में विचारधारा के प्रभाव से मुक्त है और इसकी रुचियों अभिरुचियों का निर्माण उन उदारवादी परिस्थितियों में हुआ है जिनमे उनके निर्माण में क्या भूमिका निभाई, उसे नहीं पता।

खैर, अब जबकि मलाला युसुफज़ई को इंग्लैंड के अस्पताल से छुट्टी मिल गयी है एक सवाल वहाँ से यह आ रहा है के जो लोग यहाँ इस देश में अभी भी खुद को तालिबान के कम बर्बर मानते हैं उन्हें एक बार फिर सोचना चाहिए।

जनवरी 02, 2013

रात आखिरी

पीछे से आगे..

लिखने के बीच मोहित का हॉल्ट भी आया। के पापा नॉर सूप नहीं मैगी के मिक्स वैज सूप लाये हैं। चालीस का एक। तब थोड़ी देर बाद रुक गया। ग्यारह बजे की बात थी। दस मिनट पहले ही लिखना रोक दिया। इस बार कुर्सी को छत से नीचे नहीं कुदाना था। अब तो गार्ड भी यही रहते हैं यहाँ। मोहित सीढियों के वहां जहाँ हर्षवर्धन के पापा साइकिल रखते हैं वहां से एक टूटी फूटी कुर्सी उठा लाया।

ऊपर तसले में आग लगायी जाएगी, यह पहले से ही तय कर लिया था। पहले धोबी पछाड़ से राजकुमार ने कम, मोहित ने ज़यादा कुर्सी का कचूमर निकाल, उसे लकड़ी में बदल दिया। उसका स्वरुप विखंडित कर दिया। कोई वैसी ही कुर्सी दोबारा बड़ी मुश्किल और महारत से अपना वक़्त खर्च करके ही बना सकता था। पर इतनी जटिल प्रक्रिया के लिए उसे खंड खंड तोड़ा नहीं था। हमें तो उसे जलाना था। इसलिए हम निश्चिंत थे। 

उसमे फोम तो था ही, जलने में रबड़ जैसी गंध दे रहा था। उसका सहारा पाकर जल्द ही उस ढेर ने आग पकड़ ली। फूँकने धोंकने पंखा बना करने कागज़ ढूंढने की नौबत नहीं आई। रामकुमार थोड़ी देर बाद फोन पर बुलाने के बाद आया। बैठे बात करते करते विश्लेषण होते हवाते साढ़े ग्यारह बज गए। अब आठ पैक वाली मैगी भी बना ही लेनी चाहिए। यही सोच विचार कर मोहित को कढाई लाने के लिए कहा। घर से। पानी के साथ।

पर दिक्कत ये के कैसे उन पहाड़ीनुमा उबड़खाबड़ लकड़ियों पर जलते तसले में कढ़ाई को टिकाया जाये। तत्काल कुछ आड़ी तिरछी बिदुरी हुई लकड़ियों को निकाल कर किनारे कर दिया। जगह बना कर उसकी पेंदी को टिका दिया।। और यही कामना करने लगे के कहीं कढाई हिल न जाये। अब रसोई विमर्श यहाँ आकर रुक गया के मैगी मसाला पानी उबलने के साथ ही डाल दें या मैगी डालने के बाद। पहला विचार विजयी हुआ। पानी खौल रहा था। बुलबुले उठ रहे थे। आग भड़की हुई थी। मसाला पानी में मिल रहा था।

कढ़ाई का वो हाल न हुआ होता अगर उस गैस स्टोव का परिक्षण उसी समय करने के बजाये पहले ही शाम को कर लिया जाता। दो ढाई किलो गैस तो होगी ही। ऐसा मोहित ने कहा था। हम आश्वस्त भी थे के चलो ठीक है। पर उसके कान ऐठने के बाद भी सिर्फ हवा के अन्दर ही अन्दर पाइप से टकराकर गुजरने की आवाजें ही बाहर आयीं। गैस नहीं। और न उस रात को अपनी ज़िंदगी की आखिरी शब बनाने की ही कोई मुकम्मल दरहम बरहम फैसला किया था। इसलिए तुरंत उस सिलेंडर बर्नर को किनारे कर दिया। लौट आये तसले पर।

इन सारी बातों को पढ़ते वक़्त ये न सोचें कि एक क्षण के लिए भी ठण्ड हमसे अलग हुई होगी। खुले आसमान के नीचे। छत पर पांच लड़के मैगी बना रहे हैं। हम सब जहाँ बैठे थे उस तसले की गोल परिधि के एक निश्चित दायरे में तापमान ज़रूर पांच आठ डिग्री कम होगा। लेकिन जैसे जैसे लकडियाँ जलकर राख में बदलती गयीं वैसे वैसे ठण्ड जो अभी तक हमारे पीछे पीठ की तरफ दुबकी थी अब सर उठा कर अब आगे आ चुकी थी..हम सरक कर उस आग वाले तसले की तरफ और खिसकते जा रहे थे। अपने आप। 

बीच बीच में मोहित कढ़ाई के लगातार धुएं से काले होते जाने के बाद अगली सुबह की त्रासदियों से घिर जाता। हम ढाढस तो क्या बंधाते, मज़ाक जैसा ही उड़ा रहे थे। के हम भी धोने में हाथ लगा देंगे। अगर गैस जल जाती तो ये हाल न होता। दूसरा कोई बर्तन पहले से काला होता तो और पता नहीं क्या क्या। मैंने सूप बनाने वाले कर्यक्रम को इसलिए भी रद्द करने की बात कह दी। पर नहीं। बनाने की पहले से ही ठान चुके थे। रामकुमार बोल मोहित सोच रहा होगा के आज रात को कभी याद कर यही सोचेगा की किसी ढाबे पर काम कर रहा था। बार बार कभी चम्मच प्लेट कभी कांटे कभी पानी कढ़ाई के लिए दौड़ाये जा रहे हैं। चैन से बैठने नहीं दे रहे।

फिर बात घडी पर आ कर रुकी। दो मिनट हैं तीन मिनट हैं। सबकी अलग अलग वक़्त बताती मोबाइल डिजिटल वॉचें। पर एक एक कर सबने बारह बजा दिए। कुछ दिवाली वाले पटाखे अब छोड़ रहे थे। दूरदर्शन ने सुनामी के बाद इस साल राष्ट्रीय शोक मनाते हुए तब राजेश खन्ना की मृत्युबोध की छाया वाली आनंद दिखाई थी। इस बार अपने नए साल के सारे विशेष कार्यक्रम अपराजिता निर्भया अमानत की सिंगापूर में मृत्यु के कारण रद्द कर दिए थे। मैसेज भी कम ही आये। हमें दो हज़ार तेरह में आये एक दो मिनट हो चुके थे पर इसका मुगालता न पहले था न तब, के कुछ भी बदला है सिवाय गिनती में एक और साल के जुड़ जाने के। हमारी सलाहियत के लिए ही है। खैर।

तुमने कहा था देखते हैं कौन पहले फोन करेगा। बारह बज कर चार मिनट पर इधर से नंबर मिलाया। के अब तक तो वहाँ सब सो गए होंगे। एक दो घंटी बाद फोन काट दूंगा। पर वहाँ सब जाग रहे थे। 'स्टार परिवार' देख रहे थे। शुभम को भी बुखार था। दवाई ली है। राकेश ने इस बार फोन नहीं किया। फोन घरघराया होगा। तुम स्कूल में अकेले थे। बिहू भी नहीं है अभी वहां। ओ' हेनरी की कोई कहानी पढ़ रहे थे तुम। नाम अभी याद नहीं आ रहा। भाई तब कढ़ाई धो रहा था। फिर अजय को फोन खड़काया। रजाई में लेटा टीवी देख रहा था। फिर सोचा के अभी रत में नहीं कल बात करूँगा। पर राजकुमार ने तो रिकॉर्ड ही तोड़ दिया। पंद्रह अट्ठारह लोगों को नींद से जगाकर उठाया और बोलता सो तो नहीं रहे थे सर!!

कई सालों बाद यह रात आई थी जब हम बाहर आग जलाकर बैठे थे। उस बीच गंजी - शकरकंद रह ही गयी। मूंगफली रेवड़ी की बात आगे कभी के लिए दिमाग में रख ली गयी। एक बीस अन्दर कमरे में रजाई सोझा रहा था। मोबाइल इतना ही बजा रहा था तब। तसला वहीँ बाहर जल रहा था। ठिठुर रहा था। ज़मीं के चिटकने के डर के बिना। एक छोटा सा वीडियो भी यू-टयूब पर भी डाला। लास्ट विडियो :2012 ग्यारह चालीस के आसपास का। उसमे जो गाना बज रहा है वो एफ़ एम के किसी चैनल से है, जो उस वक़्त बज रहा था। हमारा स्पेशल इफेक्ट नहीं।

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