फ़रवरी 25, 2013

जुगाली करता प्रेम और एक कमज़ोर सा चुप्पा नायक

कभी-कभी मुझे लगता मैं बंगाली क्यों नहीं हुआ। हो जाना चाहता था तुम्हारी तरह। बिलकुल तुम्हारी तरह। क्यों नहीं हो सका पता नहीं। तुम्हारी तरफ झुक गया। समझ नहीं पाया। कुछ भी पता चलता वैसा ही सोचता। पर यह भी तो है के कभी तुमसे पूछा भी तो नहीं। बस अंदर ही अंदर तुम्हे देखता रहा। बिन बताये। दिन रातें में तब्दील होती गयीं। रात दिन बनते गए। और मैं वही उन दोनों के बीच तुम्हे ढूंढ़ता रहा। तुम्हे नहीं आना था तुम नहीं आई। मुझे इंतज़ार करना था। इंतज़ार करता रहा।

सोचता कभी मिलेंगे। बैठेंगे। तब बता सकूँगा। अपने अंदर की झिझक। और गले में फंसी हुई कई सारी ढेर ढेर बातें। उनमें सिर्फ तुम होती। उनमे सिर्फ मैं होता। उनमे सिर्फ हम दोनों होते।

एक बार ऐसे ही ख़याल आया के तुम्हे कहूँ के इस शनिवार ओखला स्टेशन पर मिलना। हम दोनों किसी बेंच पर होते। बिलकुल अगल-बगल। तब कहता अपने दिल के पीछे की सारी कहानियाँ। के कब से तुम्हे सब बताना चाह रहा था। बताने में मेरे हिस्से बहुत कुछ होता। तुम्हारे जिम्मे सिर्फ सुनना होता। बोर होने ही नहीं देता। ऊबने लगती तो तुरंत उस जारी वाले कुर्ते की बात करने लगता। जो हम दोनों ने किसी दूकान पर देखा था। और तुमने उसकी कीमत देख सिर्फ हलके से दायीं तरफ मेरे आँखों में कुछ कहा था। सुनाई सिर्फ मुझे दिया था। उन दो बहनों को नहीं। जो घर जल्दी जाने को कह रही थीं।

वो दोपहर कभी नहीं आई। आई वो दोपहर जब ऑटो कर हमने वक़्त से पहले फैकल्टी पहुँच जाना था। फिर हमें कभी नहीं मिलना था। मेरे पास सिर्फ रह गयीं कुछ यादों की कतरनें। कुछ सपनों के टुकड़े। कुछ आड़ी तिरछी अपने हिस्से की कहानियाँ। और सबसे ज़यादा रह गयी तुम।

उन दिनों रात हो जाने का इंतज़ार करता और हाथ में फोन लेकर कई-कई बार छत नाप चुकने के बाद एक बार फिर खुद को मना करता और चुप, गर्दन झुकाए कमरे में आकर बैठ जाता। हिम्मत शायद गलत शब्द होगा। पर शायद मुझमे यही कुछ कम रह गयी थी। आमों के पेड़ हर साल बौराते पर उस साल मेरे मन में पतझड़ ही रहा। सिर्फ उसी साल नहीं। आगे आने वाले कई कई सालों तक। उन सालों तक जहाँ मुझे जूझना था। खुद से उन सारे दिन रातों से जहाँ मैं हर रोज़ सिर्फ हार रहा था। खुद से। खुद से कई जवाब मांगता। पर नहीं मिलते। मिलती उलझी हुई उलझने।

तुम्हे कभी फूल देने की सोचता। उस दिन भी नहीं जब पता चला कल तुम्हारा जन्मदिन है। चुप रह गया। के कुछ नहीं मालुम। किसी चुप्पे की तरह बैठ गया था जाकर सीढियों पर। हाथ में न पता कौन सी किताब थी। पर तुमने पास आकर सबसे पहले वही किताब देखी। और पूछने लगी के कहानी अच्छी लगती है मुझे। पता नहीं क्या कहा था। मैंने तुम्हे। शायद कुछ देर के लिए तुम्हे देखता ही रह गया था। कह नहीं पाया। के एक कहानी लिखना चाहता हूँ, तुम्हारे साथ। तुम्हे पता ही नहीं चलने दिया।

बस यही चाहता था के तुम साथ कुछ देर बैठी रहो। बिन बोले। मैं देखता रहूँ। तुम्हारी तरफ। ऐसा नहीं है हम दोनों उन दरमियानों में पहले कभी नहीं मिले थे। पर उधर कुछ दिनों से कुछ कुछ सोचने लगा था तुम्हे लेकर। बस्स यहीं आकर तो मैं चुप हो जाता। बिलकुल उस चोर की तरह जिसकी चोरी न पकड़ी जाए। इसलिए वो बस कनखियों से बस अपने बचे रहने की जुगत भिडाये रहता है। वो तो मैं आज समझ पाया हूँ के वो दोनों बहनों की जुगलबंदी हॉल्ट कर देर से क्यों आती थी। बस अगर उन दिनों कुछ भी ऐसा पता होता तो अपनी कहानी ऐसी किसी मोड़ पर अटकती नहीं।

मोड़ कभी चाहा नहीं था। न ही कोई खुबसूरत मोड़ था। जहाँ से छूटने चले जाने की प्रक्रिया को शुरू किये जाने का मुहूर्त देख लिया गया था। पर ज़िन्दगी किसी ढर्रे पर नहीं चलती वो बस चलती रहती है। चलती रही। और हम बिन बताये छूटते रह गए। कभी न मिलने के लिए। आज तक हम दुबारा नहीं मिले हैं। न कभी लगता है मिलेंगे। मिल भी गए तो पहचानने में मैं ही पीछे हट जाऊं। शायद। या उतना ही तुम भी खिसक जाओ। पर उन दिनों के हिस्सेदारी में तुम्हारा भी उतना ही हिस्सा है जितना मेरा। भले तुम्हे पता नहीं चल पाया। पर आज भी लायब्ररी तुम्हारे साथ ही जाने के मौके ढूंढ़ता था। के कहीं कोई याद का टुकड़ा मेरे हिस्से के साथ तुम्हारे यहाँ भी चला जाये। के कभी हमें भी याद कर लेने के कोई दो चार बहाने तो हों।

सोचता हूँ अच्छा हुआ हम नहीं मिले। मिलना ज़रूरी भी नहीं। हम न मिलने के लिए ही मिले थे। यह पिछली पंक्तियाँ मुझे ढक भी नहीं पा रही है। क्योंकि झूठ ऐसे ही होता है। लिजलिजा। कमज़ोर। झीना। उस दूकान पर आज भी अटका हुआ हूँ जहाँ वो ज़रीदार कुर्ता टंगा हुआ है। मुझे ही पता है यह अलगनी भी मेरा ही एक झूठ है तुम्हे ढकने के लिए।

{खैर इसे हफ़्ता दस दिन पहले आना था। पर कुछ नहीं। अब सही। }

फ़रवरी 20, 2013

दिहाड़ी डायरी की तारीख एक अगस्त

{जब पहले पहल आदर्श और सिद्धांत का द्वंद्व कुछ ज़यादा ही सर चढ़ कर बोलता था। धीरे धीरे अब बुखार उतर रहा है। वस्तुस्थिति को समझने की कोशिश अब दिखती है। किसी बने बनाये ढाँचे में कहीं से आयातित शिक्षाशास्त्र थोपा नहीं जा सकता। उसे वहीँ की चारदिवारी के बीच बनाना होगा। बस उन्ही दिनों कुछ-कुछ दिमाग में चल रहा था। 

पढ़ाने की दरमियानी के बीच अपने आपको बचाए रखने की जद्दोजहद है या वैचारिक विलास यह तो तय नहीं कर पाया हूँ पर इतना मालुम है के इन स्थापनाओं को अब और निकट से जान पाया हूँ। और इतना भी पता है के अगली पोस्ट वहां देखे झेले अध्यापकों पर ही होने जा रही है। दिमाग में काफी कुछ चल रहा है, उन्हें ही जुटाउंगा..बस अभी तो यही एक दिन की जूझती डायरी एंट्री..!! }

दशहरा शहादरा हो जाता है। आज तक उन्हें किसी ने पढने के लिए नहीं कहा। ऐसा उन्होंने ही कहा। उन्हें मेरा पढ़ाने का तरीका भी अजीब लगता है। धीरे धीरे मेरा मन भी घंटी के इंतज़ार में निकलने लगा है। उस पहली क्लास में औपनिवेशीकरण, औद्योगिक क्रान्ति, संघर्ष, गांधी के हिन्दुस्तान आने तक का समय उन्हें नहीं मालूम..या मुझसे पढ़ने का मन नहीं था..पता नहीं।

सब इसलिए आते हैं जैसे एहसान कर रहे हों। उन्होंने तय कर लिया है कि मेरे साथ नहीं जायेंगे।
10:47 pm

क्लास में हवलदार हो गया हूँ। जहाँ से हरकत उसका चलान। पता नहीं बाहर होती बरसात कैसे इनके दिमागों में घुस कर सीलन की तरह बन गयी है। हो सकता है बारहवीं का गुस्सा यहाँ निकल रहा है। मज़ा भी तो नहीं है। क्लासें कुत्ते की पूंछ से भी बदतर हालात में हैं। पाण्डे ग्यारह पाँच पर आया और किन्ही मिश्र जी के पैसे लहराने लगा।

इन सरकारी स्कूलों में यह सब चलता है। उन टीचरों को कोई फरक नहीं पड़ता की किसी का हर्जा हो जायेगा। छात्र भी उनसे बनाने के चक्कर में चेले बनने की जुगत भिड़ाने लगते हैं। यह परस्पर लेन देन का सौदा है। हम तुम्हें अपना वक़्त देंगे तुम हमें नंबर दो या दिलवाओ।

अभी पौन घंटा पहले इस बैंच के इर्द गिर्द ही मंडरा रहा था। के देखूं क्या लिख मार है सर जी ने!! थोड़ा डरपोक टाइप का हवाबाज़ है। फड़फड़ाता ज़यादा है। उसी के उसी जैसे दोस्त भी हैं। सब राम भरोसे बारहवीं तक तो खिंच ही जायेंगे।
11:25 pm

पता नहीं लग रहा हूँ ज़यादा नैतिक होता जा रहा हूँ। क्या यह अध्यापक के साथ आया कोई सांस्कृतिक मूल्य है या उसमें किसी किसी सुधारक की आत्मा प्रवेश कर जाती है..?? शायद कहीं पढ़ाने को लेकर अंदर कोई रौशनी जल रही होगी, जिसे सीआइइ वाले दिया जलाना कहते हैं। पर यही भभकता प्रतिक और उससे पिंड छुड़ाने के चक्कर में फंस सा गया हूँ। इस तरफ सिद्धांत जैसे भारी भरकम आदर्श नुमा बोझ टेल दबने को अभिशप्त हूँ।
11:57 pm

मॉनीटर जैसी उपव्यवस्थाओं से अनुशाशन की पहेली सुलझा रहा हूँ। इनको क्या खुद महसूस होगी किसी गूंगे की संवेदना? क्यों किसी अधायपक के ज़रिये ख़ून में सुर्ख हरारत हो? क्यों यह सब चाहते हैं कि अध्यापक ही सब घोल घोल कर घुट्टी की तरह ब्लैक बोर्ड पर लिखता रहे?

क्या इन सबका इयत्ता अमानुषीकरण सिर्फ आदेशों के पालन के लिए ही रह गया है? सारे के सारे मेरे सामने उद्दंडता की सीमा पार करे जा रहे हैं।

गिनके चौदह बच्चे हैं दो चार बाहर हैं। इतने में बातचीत कब शोर में बदल जाए उन्हें नहीं पता। क्लास में एक हकलाता है उसे तो छोड़ते नहीं हैं पर जब कहा है गूंगे के बारे में लिखो तो सब के सब उस लड़के की तरफ मुड़ गए।
12:09 pm

छठा ख़त्म होने को है। टीचर नहीं बच्चे नहीं। सारी क्लासें बेगानी सी किसी इंतज़ार में हैं कि कभी तो बैठा करें, कुछ आकर लिख पढ़ लें। कॉमर्स की क्लास है। कुल चार हैं। तीन खिड़की से निचे प्रायमरी विंग और मेन गेट की तरफ झांक रहे हैं। चौथा सिर निचे करके सो रहा है। उसकी शर्त के पीछे कन्धों की तरफ शाहिद लिखा है। उसका असली नाम मनीष है। पर कोई जानता नहीं।
12:39 pm
***

पीछे के दो-चार पन्ने:
सीधे एग्जामिनेशन हॉल से
न समाज एकरेखीय है न बच्चे
दिहाड़ी अध्यापक की डायरी का पन्ना

फ़रवरी 09, 2013

पानी की देशज व्याख्या

उस दिन जबसे पानी वाली पोस्ट की है तभी से कुछ-कुछ छूटा सा लग रहा है। और यह छूटन उस 'मॉडर्निटी' के साथ आई। जहाँ से हम अपने आपको कुछ ज़यादा ही आधुनिक चेतस मानने लग जाते हैं और वहीँ गच्चा खाने की सबसे अधिक संभावना होती है। मुझे लिखते वक़्त बिलकुल भी एहसास नहीं था के अचानक प्रेमचंद की कहानी याद आ जाएगी और मेरी आधुनिकता मुँह के बल धड़ाम जा गिरेगी। फिर तो एक-एक कर कई सारी बेतरतीब बातें जिन्हें जोड़ने उधेड़ने का मन करता रहा। पानी पानी न हुआ अमलतास का पेड़ हुआ जा रहा था। कुछ कुछ समझने की कोशिश के साथ लिखने जा रहा हूँ।

शुरू करते हैं। 'ठाकुर का कुआँ' कहानी से। इसका कालखंड ठीक-ठीक नहीं पता। पर जहाँ यह घटित होती है उसी उत्तर भारत के एक धार्मिक शहर..नहीं नहीं, नगरी कहिये जनाब..वहाँ इनदिनों कुम्भ मेला चल रहा है!!

इस मेले पर भी बात करेंगे पर थोड़ी देर बाद। जो बात कहानी से गुज़रते वक़्त सबसे ज़यादा अपनी तरफ खींचती है वह है उस गाँव में कुओं की संख्या। और उन पर अधिकार के जातीय अधिकार के समीकरण। दो कुँए हैं। एक ठाकुर के पास। एक साहू के पास। उन बेगार करने खटने वालों के लिए दोनों जगह स्थिति शोषणकारी और दमनकारी ही है। पर 'गंगी' जाती है 'ठाकुर के कुएँ' पर। इसे सवाल की तरह ही पूछा जाना चाहिए। क्यों? प्रेमचंद कुओं पर जाने के बाद के परिणामों में से दो का ज़िक्र करते हैं। ठाकुर के कुएं पर जाने से 'ठाकुर लाठी मारेगें' और 'साहूजी एक के पाँच लेंगे'। मतलब एक अर्थ में हड्डी की टूट-फूट हो जाने पर बेगार में खटने वालों की संख्या कम हो जाने खतरा है इसलिए इलाज करवाने में वे एक हद तक आगे आ सकते हैं। पर साहू के महाजनी पाठ में रेहन पर गिरवी रखने के लिए छत भी न बचेगी। दूसरे अर्थ में कहानीकार दोनों शोषणकारियों में से एक को चुनता है। यह चुनाव उन दमितों का भी है। ऐसा लगने लगता है।

और जिस कुएँ में जानवर गिरकर मर गया है वह उन्ही की झोपड़ी की तरह गाँव के बाहर स्थित है। जहाँ अँधेरे में जाने के खतरे हैं। स्त्रियों के लिए। क्योंकि जोखू तो बीमार पड़ा है। वह जा नहीं सकता। यहाँ जोखू की घरवाली का नाम भी बहुत बारीकी से पढ़े जाने की मांग करता है। उसके माता पिता ने उसका नाम 'गंगी' रखा है। और उसमे 'पवित्रता' की जो ध्वनियाँ हमारे कान तक पहुँचती हैं उसमे से एक दो तो यही कहती हैं के जिस नदी के 'अपभ्रंश' रूप पर उसका नाम रखा गया है उस प्रवाहिनी के जल में डुबकी लगाकर धर्म विशेष के लोग सदियों से अपने पापों का कथित 'सफाई अभियान' चलाते आये हैं। कितने धुले-पुछे हैं इसका लेखा-जोखा चित्रगुप्त से कभी पूछा नहीं इसलिए बता नहीं सकता। पर इसी नाम की एक दलित स्त्री के वहां स्थित कुँए से पानी निकालने से पानी अशुद्ध हो जाने की शत प्रतिशत सम्भावना है। सिर्फ कुआँ चढ़ने भर से।

पर यहीं याद आती है 'हृदयेश ' की कहानी 'मनु '। जिस जातिगत समाज में कुँए के पानी का छू जाना उसे अशुद्ध अपवित्र जैसे 'सांस्कृतिक' मूल्यों से भर देता है वहीँ एक ब्राह्मण अपने कुएं को उलीचने के लिए नीची जाति के हुनरसाज़ को बुलाता है। शायद इसे ही 'सामजिक गतिशीलता' कहते हैं जहाँ जातियों के बंधन कुछ तो ढीले पड़े है या होंगे। उनमे संस्कृतीकरण की प्रक्रिया भी कुछ हद तक अबाध गति से चलती ही रही है पर अचानक हमारे भारतीय इतिहास में एक क्षण आता है जो मंडल आयोग के बाद हमारे समाज की गतिकी को हमेशा हमेशा के लिए बदलकर रख देने वाला साबित हुआ। कहानी का कालखंड यही समय है जहाँ कुआँ साफ़ करने की दर अचानक बढ़ जाती है और उन ब्राह्मण वर्ग से एक नीची जाति वाला व्यक्ति अब सीधे मुँह बात नहीं करता। बल्कि अबतो तू-तड़ाक पर अमादा हो गया है।

यह तो हमें कई दिनों बाद मालुम चला के जहाँ हम पढ़ रहे हैं वो वही देशबंधु कॉलेज है जिसे मेन गेट पर राजीव गोस्वामी ने खुद को आग लगा ली थी। बिलकुल इस कहानी का मुख्य चरित्र भी अंत तक आते-आते खुद को उन परिस्थितियों से घिरा पाता है जहाँ से निकलना उसके लिए उस वक़्त संभव नहीं लगता। वे पुरोहित भी आत्मदाह करने की कोशिश करते हैं। कई साल पहले पढ़ी थी, इसलिए कह नहीं सकता के बचे या नहीं। पर इतना इतना ज़रूर कह सकता हूँ कि जातियाँ यहाँ कई चोर दरवाजों के साथ मौज़ूद हैं। उनके हमारे समाज में कई-कई संस्करण है। सह-अस्तित्व तो बड़ा सकरात्मक सा शब्द है, इसकी जगह कहना चाहिए 'छद्म' का पैबंद। के सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला ' का 'बिल्लेसुर ' पुरी मंदिर जगन्नाथ में अपने मालिक के साथ एक ही पत्तल में भोजन इसलिए भी कर सका क्योंकि वहाँ की मान्यता के अनुसार वहाँ कुछ भी जूठा नहीं कहा जाता। कुछ भी अशुद्ध नहीं है। सब की भली करेंगे राम!

और ऐसा ही एक अवसर इन दिनों इलाहाबाद में चल रहा है जहाँ आने वाली मौनी अमावस्या पर साथ-साथ डुबकी लगाने वाले अगल-बगल जाति पूछ कर डुबकी नहीं लगाते हैं। इसे किस रूप में लिया जाना चाहिए समझ नहीं पा रहा हूँ..या यहीं दिल्ली बैठा मैं यह कह तो रहा हूँ पर वहाँ जाने पर पता चले घाटों का जातिवार वर्गीकरण किया गया है..क्या इन डेढ़-दो महीनो के लिए जातियां टूट जाती हैं या उन्हें स्थगित कर दिया जाता है..?..पता नहीं..कई सवाल अभी भी सवाल की तरह ही खड़े हैं उन्हें समझने की कोशिशें लगातार करनी होंगी वरना हमारे पंचकुय्या रोड पर एक महापुरुष की मूर्ति लगी है और उनकी उठी हुई अंगुली को देख लोगों से यही सुनाई देता रहेगा कि वे कह रहे हैं, 'ठेका उधर है..!!'

{जिस पोस्ट का ज़िक्र सबसे शुरवाती पंक्तियों में आया है, उसका नाम है 'पानी पर कुछ फुटनोट '. पढ़ने के लिए उसपर क्लिक करें }

फ़रवरी 07, 2013

विज्ञापनों में छिपी देह राजनीति

अभी बहुत दिन नहीं बीतें हैं जब दूरदर्शन पर वह विज्ञापन प्रसारित होता था जिसमे एक बड़ी सी हवेलीनुमा इमारत के सामने विस्मय से भरे कुछ लोग उतरते दिखाए जाते हैं। शायद रिश्ता लेकर आये थे। लड़की उनकी, लड़का हवेली वालों का। पर कुछ ही सेकेण्ड बीतते हैं और उनका विस्मय पहले आश्चर्य फिर जुगुप्सा जैसे किसी भाव में तब्दील हो जाता है। क्योंकि उन सेकेंडों में इत्ती बड़ी इमारत से कुछ महिलायें झुण्ड बना कर 'शौच' को जाती दिख जाती हैं। गाड़ी जैसे ही पलटती है वहां चारदिवारी के भीतर एक दिवार से चिपकी फोटो की मूंछे नीची हो जाती हैं। यह अलग पूछे जाने वाला सवाल है के जिनके मूंछे नहीं होती उनके साथ शरीर के किस अंग में ऐसी कोई प्रतिक्रिया होती है और साथ में यह भी के क्या उनके पास इतनी बड़ी इमारत होती भी है या नहीं।

खैर, 'मेरी शादी हो उस घर में शौचालय हो जिस घर में' का यह 'दृश्य काव्य' है जिसको विखंडित कर कुछ और बातें साफ़ दिख रही हैं उनका लिखा जाना ज़रूरी है। उसमे पहली यह के क्या इतनी बड़ी हवेली का रुतबा गाँव खेड़े में अब जाता रहा है, जिस भय की व्याप्ति इन इमारतों के इर्दगिर्द पहले किसी जमाने की ठसक लिए होती थीं उनमे अब कोई दम नहीं बचा है (इस संदर्भ में तिग्मांशु धूलिया की साहिब बीबी और गैंगस्टर ज़रूर एक पाठ मुहैया कराती है पर उसपर फिर कभी)। ऐसा इसलिए के वहाँ बाहर जाती एक महिला नहीं पूरा का पूरा झुण्ड है। मतलब कहीं खेत-ताल-तलइये के आसपास कहीं कोई ऊँच नीच हो जाती है तो उसका ज़िक्र वह स्त्री घर में नहीं करेगी। इसलिए पहले से ही सुरक्षा के इंतजाम कर लिए गए हैं।

यहीं वह बिंदु है जहाँ एक साथ कई-कई संदर्भ याद आ रहे हैं। इधर विद्या बालन वाले 'निर्मल भारत अभियान' के जिन जनहित विज्ञापनों में दिखाई दे रही हैं वही देह की राजनीति को सिरे से फिर मजबूत ही कर रहा हैं। पुरुषसत्ता के लिए दोबारा गढ़ रही है। एक-एक कर उठाते हैं। सबसे पहले प्रियंका भारती। डाकघर में चिट्ठी पोस्ट कने से पहले प्रेषक का नाम लिख रही थी के विद्या की नज़र पड़ी और शुरू हो गयी गाथा। अपनी 'इज्ज़त' और 'स्वच्छता' की खातिर अपने लगन (गौने) के दूसरे ही दिन अपना ससुराल छोड़ने की हिम्मत दिखाई। अपने मरद से शौचालय बनवाने की मांग की। सुना उसने? एक महिला बोली। जब सोच और इरादा नेक हो तो सब सुनते हैं जैसे इसके मरद ने सुना। आप भी अपने घर में शौचालय बनवाये और इस्तेमाल करें। जहाँ सोच वहां शौचालय।

यह स्त्री की देह ही तो है जिसके इर्दगिर्द यह विज्ञापन गढ़े जा रहे हैं। कई बातें गड्ड-मड्ड करके कोई और ही पाठ बनाया जा रहा है। 'स्वच्छता' को 'इज्जत' के साथ जोड़ देना ऐसी ही बौद्धिक चालाकी है जहाँ चुपके से उनको देह के घेरे में कैद कर देने में समाज का स्थायित्व निहित है। जब तक देह ढकी है तभी तक इज्ज़त बची है। उसका निर्धारण पुरुष ही कर रहा है। कितना कहाँ दिखाना है, कहाँ छिपाना है सब 'पब्लिक' और 'प्राइवेट' स्फीयर का मसला है। हम शहरों में स्त्री शौचालय नहीं बनाते इसलिए निर्मल भारत अभियान सिर्फ ग्रामीण इलाकों का कायाकल्प करने में जुटा है। या शहरों में 'जनसुविधा' की परिभाषा में औरतें अटती नहीं हैं। या यहाँ 'देह की राजनीति' दूसरे तरीके से हमें अपना शिकार बनाती है।

सारा डर किसी परपुरुष द्वारा उनके लिए नामित- इसे पढ़े गढ़ी- स्त्री के उपभोग का है। यही तो विद्या का दूसरा विज्ञापन कहता है। दृश्य शुरू होता है पप्पू बैंड के वाद्य यंत्रों से। कि तभी एक बुज़ुर्ग उन्हें डपटते हुए बाजा बजाना बंद करने को कहते हैं। अरे बंद करो ये, निपट गया ब्याह..!! और मूंछों पर ताव। ध्यान देने लायक है मूंछें। अब नयी नवेली बहू बिना घूँघट उठाये पानी कैसे पिए इस कौशल के लिए सास ज़रूरी बातें भी नहीं कह पायी है। के ससुर इशारा करता है। इशारा सास तक पहुचता है फिर दूल्हे तक। दुल्हन तत्काल घूँघट नीचे कर लेती है। घूँघट नीचे सरका, मूंछे ताव की अँगुलियों के साथ ऊपर।

तभी बहू विद्या के कान में कुछ कहती है। ध्यान देने लायक है 'यह' 'कहना'। जहाँ ऐसी बातों की साझेदार दूसरी स्त्री ही हो सकती है, कोई पुरुष नहीं। भले पति बगल में बैठा प्लेट चाट रहा हो या उड़ा रहा हो। काकी घर में शौचालय कहाँ है, बहू को..बात पूरी भी नहीं होती कि काकी उवाची, घर में कहाँ खुले में ही जाना पड़ेगा। अब बारी कन्या पक्ष की थी। बहू फिर तो तुम घूँघट भी खोल ही दो। पीछे बैठे ससुर के चहरे पर आते जाते भाव पढ़े जाने लायक है। के कैसे उन्हें साँप सूंघ जाता है। एक तरफ तो आपको बहू का घूँघट भी सरकाना गँवारा नहीं है और दूसरी तरफ उसे खुले में..?!

यह बात अलग है के कहाँ वधु पक्ष ऐसी किसी गैर ज़रूरी सवाल को उन क्षणों में उठा पाता होगा जहाँ दहेज़ पर ही हायतौबा पहले से मची हो। ख़ैर, देखने लायक बात तो यह भी है के यहाँ सारा दृश्य रच गया है, वर के आंगन में। ध्यान दें। कि काकी मारे शर्म के कह नहीं पाती के बहु को तो अब खुले में ही जाना होगा। यह उस विज्ञापन निर्माता की सांस्कृतिक कमजोरी ही है जहाँ शादी का इच्छुक वर अपने लाव लश्कर के साथ लड़की के यहाँ जाता है। जिसे बरात कहने का रिवाज़ है। पर यहाँ क्या हो रहा है। दुबारा देखें कि शादी हो चुकी है इसका संकेत ससुर दे रहा है और काकी से यह पूछे जाने पर के कन्या अब कहाँ जाए वाले सवाल पर दुल्हे की माँ शर्मिंदा होती हैं और ससुर की मूंछ नीचे आ जाती हैं। खैर, वापस..

पिछले पैरा का अंतिम वाक्य बार-बार पढ़ा जाना चाहिए जिसमें एक फाँक तो पकड़ी जाती है पर तुरंत उसे ढक दिया जाता है। क्या यह विरोधाभास हमारे समाज की पहचान नहीं बनता जा रहा है। इन्हें बनाये रखना शायद इस समाज को बनाये रखने जैसा है। तभी युनिसेफ ऐसी योजनाओं के लिए तो वित्त/ऋण देता रहा है पर उन देशों की आमूलचूल संरचनाओं को छूता भी नहीं है। वरना ऐसा क्योंकर हुआ के इन विज्ञापनों की खेप में सिर्फ मूंछों पर ताव तो है, दाढ़ियों पर हाथ फिराते चहरे नहीं। और जो तीसरा विज्ञापन बचा रह गया है उसे खुद ही देख जानिये कि कैसे हमारे ग्राम्य समाजों में किसानों के घर खिसक कर घरों की ज़द तक आ गए हैं। उनपर मौका लगे फिर कभी।

फ़रवरी 05, 2013

बदलने जाने की बीती दरमियानी

इधर सब कह रहे हैं मैं कुछ बदला हूँ। पहले जैसा नहीं रहा। जिनसे मुलाक़ात नयी हो पुरानी हो, सब। क्या यह कुछ-कुछ वैसा ही है के हमारे सामने हमारी शक्ल बचपन से लगातार बदलती रहती है और हम देख भी नहीं पाते। शीशा रोज़ देख रहे हैं फिर भी नहीं। और जो बदला है वो कभी भी सामने नहीं आ पाता। भले वह वहीँ हमारे दायें बाएं घूम रहा हो। हमारे साथ हो। फिर भी नहीं। यह भी पूरी पूरी संभावना है के जो हमारे आस पास को बदलता दिख रहा हो उसे वैसे ही हो जाना था। पर बदलना तो बदलना ही है।

समझ नहीं पा रहा हूँ के कैसा सा होता जा रहा हूँ। इसे वैचारिक प्रक्रिया का परिणाम माना जाये या कई-कई दिनों तक एक जैसी स्थितियों में रहने की जुगुप्सा के बाद उत्पन्न कोई प्रतिक्रिया। प्रतिक्रिया इस रूप में कि वहां से भाग कर ऐसी जगह आ जाना जहाँ खुद को भी पहचानने में थोडा वक़्त लगे। जान पहचान खुद से भी बहुत ज़रूरी है। क्यों तुम्हे नहीं लगता..नहीं लगता तो लगने लगेगा!

फिर वही उन घिसे पिटे दिनों को नहीं लिखना चाहता जहाँ से चल कर यहाँ तक पहुचे हैं पर मुझे बनाने में कहीं न कहीं उनकी भूमिका ज़रूर है। अपने उस मित्र का नाम नहीं लिखूंगा जिसने कहा था के तुम लिख इसीलिए पा रहे हो क्योंकि तुम बोलते कम हो। न तुम्हारा नाम किसी को बताऊंगा कि तुमने कल मुझे कहा के मेरी सारी बातों का शिकार मेरी डायरी सबसे पहले बनती है। और न राकेश का नाम कहकर लिखूंगा के उसी ने मुझे पहली बार लिखा कि तुम्हारी जटा जूट और वस्त्रों के साथ प्रयोग उदासीनता की नहीं प्रतिक्रियात्मक का सा बोध कराता है प्रतिक्रिया चीजों को तोडती ज़रूर है, परन्तु संरचना के आभाव में गैर ज़िम्मेदाराना हो जाती है।

लगता है धीरे धीरे अपने आस पड़ोस को देखकर वहां बनते दबावों से बच निकलने के लिए हम सब कभी न कभी कहीं एक अदद चोर दरवाज़े को तलाश ही लेते हैं। मेरी खोज पूरी हुई मेरी कलम के साथ और कुछ हद तक इस ब्लॉग पर पहली पोस्ट जाने के बाद। मेरी डायरी के पन्ने उन दिनों के साथी हैं जब एक एक कर दोस्त छिटक रहे थे। बिन बताये। अकेले पड़ जाना उन दिनों की सबसे बड़ी त्रासदी जैसे दिन थे। कोई भी मेरी बात सुनने वाला नहीं था। अकेला बैठा गुमसुम सा इंतज़ार करता। पर कोई आता नहीं।

यह बिलकुल उन दिनों की बात है जब हमारी ग्रेजुएशन के दिन ख़तम हो रहे थे और मैं अजीब सा होता जा रहा था। किसी से अपने दिल की बात नहीं कहना। छिपाए रखना। छिपाना दबाने जैसी पीड़ा के साथ दिल की किसी ब्लैक होल में दबाये रखने की टीस जैसा होता गया। उम्र बिलकुल उस तरफ झुक रही थी जहाँ एक अदद लड़की के लिए दिल के किसी कोने में कई-कई नरम कोने एक साथ उग आते हैं। रातों को जागना था। जगा। कहना था। कह न सका। कैसे कहूँ इसके कई सारे मजमून तय्यार करता पर एक भी न जंचता..

सोच रहा था इनको नहीं लिखूंगा। पर क्या करूँ। फिर क्या हुआ? वही जो होता है। न कहने। कह पाने के बाद दिन बड़ी जल्दी उड़ते नहीं जाते अटका देते हैं। अटक गया। उलझ गया। और तब शुरू हुआ मोहभंग का सिलसिला। ऐसा वैसा नहीं वैचारिक लबादे में ओढ़ा हुआ। उसकी पैकिंग नए सिरे से की गयी कि कथनी और करनी में कोई फांक न रह जाए। 'प्रैक्सिस' से तो तीन साल हुए मुलाक़ात हुई। और न किसी को इस सबकी पूर्वपीठिका की सेंध भी लग सके। कि 'वन साइडेड लवर्स एसोसिएशन' के मनोनित सदस्य हैं।

ऐसा नहीं था कि मैंने छद्म आवरण ओढ़ लिया था, पर मुझे मालुम था इस विलासिता को ज़यादा दिनों तक उपभोग करते रहना संभव नहीं होगा। इसलिए भी जितना हो सका उतना उन सको ताक़ पर रखकर चलता। किसी को भी कुछ नहीं समझता। समझता तो आज भी नहीं हूँ, पर उसकी धार को थोड़ी देर के लिए विलंबित कर मिलता हूँ। फिर एक-एक कर उन्ही प्रचलित औजारों में घुसपैठ..अरे! तुमसे ये सब क्यों कह रहा हूँ, तुमने थोड़े विचारधारा में बीए-फीए किया है..!! वो तो..चलो छोड़ो..

तो ऊपर हम थे डायरी के पास। यही पन्ने तो थे जिनसे कुछ देर बोल लिया करता था। अभी भी करता हूँ। इनको खूब डांटता भी था के मेरे सब बातों को जान लेने के बाद भी मुझसे उस पर बात नहीं करते थे। एक शब्द भी इनसे नहीं बोल जाता था। आज भी मेरे हिस्से की कई बातें सिर्फ इनके हिस्से हैं। उन निपट अकेले क्षणों में जब सबसे अकेला होता मेरे पास यही डायरी होती। कहीं भाग भी तो नहीं सकती थी न। इसे सब कुछ पता है। अभी भी कई बातें हैं जो नहीं कह रहा हूँ। आगे के लिए बचाकर रख ली हैं।

शायद यह मेरा ही विस्तार हैं, जिन्हें ऐसे ही होना था। एक विस्तार इधर तुम बनती दिख रही हो। तुमसे भी बिन किसी परदे दारी के सब कह देना चाहता हूँ। कुछ भी छिपाना नहीं चाहता। और जो तुमने कहा न के मैं बदल रहा हूँ। तो मोहतरमा उसमे आपकी भागेदारी भी उतनी ही ज़रूरी है जितनी मेरी। हमेशा से चाहता था के एक हांड माँस के जिन्दा व्यक्ति से अपने दिल की सब बातें कहूँ। अगर यकीन नहीं होता तो मेरी डायरी से पूछ लेना। मैं नहीं बता पाया तो वो तो ज़रूर ही बता देगी..पर क्या करूँ ये जो फोन का बिल है न कभी-कभी रोक देता है..इतना तो आप समझ ही सकती हैं न..!!

फ़रवरी 03, 2013

सिनेमा की संभावनाओं का शैक्षिक पाठ

{पीछे से जारी..} प्रस्तुत शोध से यह बात बिलकुल स्पष्ट रूप से उभरकर सामने आयीं हैं कि सिनेमा को लेकर पुरानी प्रस्थापनाओं की जगह अब नयी व्याख्याओं को स्थान देना होगा। सिनेमा संभावनाओ से भरा संसाधन है जिसके रचनात्मक उपयोग की तरफ हमें बढ़ना होगा। फिल्म दूसरे माध्मों की अपेक्षाकृत ज्यादा प्रभावशाली माध्यम इसलिए है क्योंकि आवाज, चित्र, दृश्यों के साथ मानव अनुभव का सम्पूर्णता में सम्प्रेषण कर पाने में सक्षम है। फिल्म सामान्य साधारण मनुष्यों की भाषा बोलती है। यह एक शक्तिशाली संसाधन है जिससे अधिगम-अस्मिता निर्माण और सामाजिक परिवर्तन को आकार देने की क्षमता है।

बच्चे फिल्म के साथ अन्तःक्रिया करते समय निष्क्रिय न होकर उसे अपने जीवन से भी जोड़ते चलते हैं। उनके सामजिक प्रत्ययों पूर्वाग्रहों को फिल्म के उपरान्त परिचर्चा के माध्यम से सरलता से जाना जा सकता है। सिनेमा की तीव्रता, देखने की क्षमता और अनुभव कुछ ऐसे होते हैं जो उसे रोकेते हैं। दर्शक तेजी से आंखों के सामने से गुजर रहे फिल्मांकन से वंचित नहीं होना चाहता, अत: ऐसे में सुस्थिर चिंतन-मनन का तो प्रश्न ही नहीं उठता।

लेकिन यहाँ हम देखते हैं कि बच्चे सक्रीय रूप से अपनी भागीदारी कर रहे थे। इस प्रक्रिया से यह भी ज्ञात किया का सकता है कि उनके संज्ञान में उनकी लिंगीय भूमिकाएँ क्या आकार ले रही हैं। यह उस वृहतर शिक्षाशास्त्रीय में शिक्षक की सहायक हो सकती है जहाँ आज जो विद्यालयों में जो प्रवेश करते हैं वे इन संचार माध्यमों के कारण बाहरी दुनिया के बारे में पहले से अधिक जानते हैं। उनकी जिज्ञासा ज्ञान सामग्री अभिवृत्तियों में तेजी से परिवर्तन हो रहा है। जीवन की स्थितियों के फलस्वरूप उनका मानसिक जगत पुराने बच्चों से अधिक चुनौती की मांग करता है।

फिल्म के शिक्षण का एक अर्थ यह भी है कि वे न सिर्फ उन बच्चों द्वारा लाए जा रहे अनुभवों का सम्मान करें अपितु विशिष्ट समस्याओं से उन अनुभवों को जोड़े भी। साथ यह भी महत्वपूर्ण है कि वह कक्षा स्वयं में कहाँ स्थित है। इस शोध में यादृच्छिक रूप से चुने गए शिक्षकों ने सिनेमा को सशक्त माध्यम तो माना है परन्तु वे इसका उपयोग किसी भी स्तर अपने विषय से जोड़ कर नहीं कर रहे हैं। इस सन्दर्भ में वे अपनी भूमिका को स्पष्ट करते हुए इसका एक कारण अतिरिक्त कार्यभार को बताते हैं, वहीँ इस माध्यम का उपयोग वे किस रूप में करें इसके लिए पर्याप्त प्रशिक्षण के अभाव में स्वयं को असहाय पाते हैं। बच्चों को पाठ्यपुस्तक निर्धारित समयावधि में समाप्त करने के दबाव भी काम करते हों तब इसे एक अतिरिक्त कार्यभार की तरह ही देखा जाता रहेगा।

इसे इस रूप में भी देखा जा सकता है कि जब व्यवस्था द्वारा 'कम्पूटर आधारित अधिगम कार्यक्रम', 'कैल लैब' को स्थापित किया जाता है तब समय सारिणी में उसके लिए स्थान भी निकाला जाता है और नियमित कक्षाएं भी होती हैं। इसी तरह वे सिनेमा के सन्दर्भ में कोई व्यवस्था चाहते हैं। यह भी देखने में आया कि जहाँ भी सिनेमा का उपयोग किया जा रहा है वहाँ उसके विषयगत प्रयोग को लेकर एक प्रकार की उदासीनता है। भाषा के अध्यापक ने तो इसकी किसी भी प्रकार की सक्रिय भूमिका से इन्कार ही कर दिया था। वहीँ जिन विद्यालयों में सिनेमा दिखाया जा रहा है वे इसकी उपयोगिता केवल और केवल सिनेमा के नकारात्मक प्रभाव को कुछ कम करने के उद्देश्यों में प्रयासरत दिखते हैं।

शोधार्थी को ऐसा इसलिए भी लगा क्योंकि एक तरफ वैश्विक होता संचार माध्यम है जिनके मूल्य शिक्षा के मूल्य के प्रतिपक्ष में समरूप संस्कृति के आग्रह के साथ अपनी उपस्थिति दर्ज रहे है वहां भले आप स्कूल में कुछ दृश्य काट दें पर यह विद्यालाओं की ही जिम्मेदारी है कि वे उन छात्रों में आलोचकीय चिंतन को प्रोत्साहित करते जिससे वह स्वयं निर्णय लेने में सक्षम हो पाते।

दूसरे शब्दों में यह उतना ही सच है कि कहीं न कहीं माध्यम भी अपने साथ सीखने-सिखलाने के तरीके लाता है। पर इस माध्यम का उपयोग आलोचनात्मक रूप से करने की जरूरत है क्योंकि एक तरफ मानवीय मूल्यों की तरफ ले जाते शिक्षा के वृहत्तर लक्ष्य हैं तो दूसरी तरह इस माध्यम पर नियंत्रकों के लक्ष्य। जो विपरीत दिशा में जाते हैं। एक तरफ वैविध्यपूर्ण संस्कृतियाँ हैं तो दूसरी तरफ समुदायों के समरूपीकारण का आग्रह। दोनों के बीच द्वन्दात्मक संबंध हैं। जिसके बीच हमें यह देखना होगा कि कैसे इसे विवेकीकरण की प्रक्रिया का साझेदार बनाने की तरफ मोड़ा जाए एवं शिक्षा के साथ उसे एक रचनात्मक अन्विति में कैसे गढ़ा जाए? एक और बात जो यहाँ ध्यान देने वाली है कि विद्यालय सिनेमा का उपयोग करते समय वे 'प्रद्योगिकी सापेक्ष' चिंतन से आगे नहीं बढ़ पाते हैं न ही अपने विषय विशेष के लिए इसके रचनात्मक प्रयोग की रूपरेखा प्रस्तुत कर पाते हैं।

यहाँ शैक्षिक तकनीकी आधार पत्र को उद्धृत करना अति आवश्यक हो जाता है जहाँ वह कहता है कि "शैक्षिक तकनीकी सिर्फ उपकरण आधारित कार्य नहीं है वह वैकलिपक पद्धतियों-माडलों का समुच्चय है। शिक्षक को लेकर चली आ रही धारणा भी पूरी तरह बदलनी होगी। उसे पुरानी भूमिका से निकल आगे का एक मददगार या मार्गदर्शक बनना होगा। यह तकनीकी के बदले 'सीखने की संस्कृति' पर ज्यादा बल देती है।" जबकि पाठ्यपुस्तकें ऐसे उदाहरणों के साथ यहाँ उपस्थित हैं जो फिल्म को फिल्म की ही तरह नहीं देखते बल्कि वे फिल्मों को 'पाठों'(टेक्स्ट) की तरह प्रस्तुत करते हैं। वहां इन वैकल्पिक युक्तियों, प्रयोगों, प्रवेशद्वारों की श्रृंखला हैं जिनमें गीत हैं , दृश्य हैं , घटनाएँ हैं , जीवंत भाषाएँ हैं, किस्से कहानियाँ हैं।

इस तरह फिल्म को रुढ़ शब्दावली में केवल दृश्य श्रव्य माध्यम के रूप में देखने के अलावा इन्ही रूपों में और रास्तों की खोज में निकलना होगा। जिसकी तरफ 'अंकुर' जैसी संस्थाएं बढ़ कर वैकल्पिक शिक्षाशास्त्र निर्मित करने के प्रयास में हैं। आधारभूत ढाँचे और पाठ्यपुस्तकों के उदाहरण भारतीय परिप्रेक्ष्य में विद्यालयों में मूलभूत संरचनागत संसाधनों के अभाव में दूसरा अर्थ भी देती हैं जिसे इस प्रकार पढ़ा जाना चाहिए कि उन विद्यालयों में वह तकनीकी जो यंत्र आधारित है उसकी कोई ज़यादा उपयोगिता नहीं रह जाती। वहाँ यह पाठ्यपुस्तक ही है जो उन क्षेत्रों में सिनेमा और पाठ्यपुस्तकों की रचनात्मक अन्विति की तरफ भी हमें ले जाती है।

सतही तौर पर यह विरोधाभासी स्थिति प्रतीत होती की जहाँ मूलभूत विद्यालयी ढाँचा तक नहीं वहाँ सिनेमा किस रूप में पहुँच रहा होगा। लेकिन ध्यान से देखने पर हमें पता चलेगा कि हम दो भिन्न भिन्न प्रक्रियाओं को एक ही दृष्टि से देख रहे हैं। विषयांतर से बचने के लिए इसे स्पष्ट करता छोटा सा उदाहरण ही काफी होगा कि जहाँ राज्य की व्याप्ति सड़क के रूप में दूर दराज़ के इलाकों में नहीं है वहाँ किसी निजी कंपनी का मोबाईल टावर भी दिख जाते हैं। इस व्याख्या में न भी जाएँ तो वहाँ दूरदर्शन की उपस्थिति तो है ही, और उन पर आती फ़िल्में कौन देखता है।

शिक्षा को इकतरफा रूप से प्राप्त की जाने वाली वस्तु की जगह इसमें दोतरफा संवाद बनाने के लिए इसका उपयोग किया जा सकता है। जहाँ शिक्षाशास्त्र मात्र एक तकनीक या प्रविधियों का सेट न रह कर, शिक्षक के लिए ऐसी स्थितियों की संभावना पैदा कर पायेगा, जहां शिक्षार्थी कक्षा के सिद्धांतों को उसके बाहर की परिधि में ले जाने में सफल होता है। इसके लिए एक संसाधन के रूप में स्कूल के समय को लचीले ढंग से नियोजित किए जाने की जरूरत है। जहाँ हम सिनेमा का उपयोग उसकी सम्पूर्णता के साथ एक सशक्त शिक्षाशास्त्रीय उपकरण के रूप में कर पाएंगे।

फ़रवरी 02, 2013

शिक्षाशास्त्रीय उपकरण के रूप में सिनेमा

{यह उस प्रस्तावना का संशोधित अंश है जो पिछले साल मेरे एमएड के लिए लिखे गए लघु-शोधपत्र 'शिक्षाशास्त्रीय उपकरण के रूप में सिनेमा ' (Cinema as a pedagogical tool)की भूमिका बनते-बनते रह गया। थोड़ा सैद्धांतिक है पर भाषा के स्तर पर उस शोध की जटिल भाषा से बचने की कोशिश लगातार करता रहा। जूझना सही शब्द होगा, पर नहीं लिख रहा। इसकी मानसिक तय्यारी विनोद अनुपम के लेख सिनेमा का शैक्षिक सन्दर्भ पढ़ने के बाद से ही चल पड़ी थी, जिसे बीते साल विद्यालयी स्तर पर इस माध्यम की संभावनाओं को टटोलते जाँचते परखते पहुँचा था। 

आप यह लघु-शोधप्रबंध दिल्ली विश्वविद्यालय के सी.आई.इ.लाइब्रेरी (केन्द्रीय शिक्षा संस्थान) और सीआरएल, में आसानी से खोज सकते हैं। इसलिए भी कॉपी पेस्ट करने की न सोचे। क्या करेंगे, ऐसे तो कितने ही ड्राफ्ट अभी भी पड़ें हैं, ठीक से सन्दर्भ भी नहीं दे पा रहा हूँ ..बस सौ साल के होते सिनेमा के मौके पर यहाँ चेप दिया। देखिये कैसी जिरहें करनी पड़ती हैं..}

सिनेमा समकालीन विश्व में मीडिया संचार के तंत्र में सबसे प्रभावशाली तरीके से फैला है व उसकी व्याप्ति बढ़ी है। वह सूचनाओं को बनाते एवं पहुँचाते ही नहीं है अपितु ध्वनि, चित्र और शब्दों के द्वारा सूचना के जरिए समझ बनाते हैं। इस समझ के जरिए हमारी इन्द्रियाँ इस विश्व के साथ हमारे संबंध को भी स्थापित करती हैं। निश्चित ही यह जनता के काफी बड़े हिस्से के लिए अभी भी मनोरंजन का सबसे बड़ा जरिया है लेकिन इसे सिर्फ मनोरंजन का माध्यम नहीं माना जा सकता। मानसिक रूप से अपने आप को दृश्य के अंदर महसूस करवा लेने की क्षमता ही है जो सिनेमा को इस कदर संप्रेष्य बनाती है कि लोग बिना फिल्मी भाषा व तकनीक के समझ, उसे देखते हैं, और समझते स्वीकारते हैं। फिल्म देखते हुए वे अपना मन ही नहीं बहलाते, वे अपने साथ अपने समय समाज के बारे में नए अनुभव और नई समझ भी लेकर जाते हैं। ये अनुभव और समझ जीवन और समाज संबंधी अपनी पहले की समझ को किसी न किसी रूप में प्रभावित जरूरत करते हैं। या तो जाने-अनजाने उनका नजरिया बदलता है या पहले से बनी समझ और मजबूत होती है।

इसके साथ यदि हम एम.एन. श्रीनिवास को 'लौकिकीकरण'[1] या 'पंथनिरपेक्षीकरण' [2] की प्रक्रिया के संदर्भ में पढ़े तब हम इसे इस माध्यम को इसकी प्रत्यक्ष प्रभावशीलता के साथ और स्पष्ट रूप से समझ पाएंगे, जहां वे द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम  के लेखकों द्वारा जाति और पारंपरिक धर्म के विरूद्ध प्रचार के लिए फिल्मों के उपयोग और मैसूर में तमिल फिल्मों के लोकप्रिय होने, कस्बों में शहरों में उनके हफ्तों चलने के प्रभाव को स्पष्ट करते हुए मैककिम मैरियर  को उद्धत करते हैं कि 'जनवादीकरण'[3] से, चाहे फिल्मों के द्वारा हो, आकाशवाणी के द्वारा हो, अथवा लोकप्रिय पुस्तकों तथा पत्रिकाओं में हो, पारंपरिक संस्कृति के तत्व में मूलभूत परिवर्तन आते हैं।’

वस्तुतः सिनेमा हमारे समय के यथार्थ का हिस्सा भी है और उसे अभिव्यक्त करने का माध्यम भी। यह समाज के विभिन्न वर्गों, समुदायों, गतिविधियों के प्रतिनिधि बिंब निर्मित करता है, उसे रचता है। फिल्म जिस हद तक यथार्थवादी है उस हद तक तात्कालिकता के साथ इसकी समानता से नहीं बचा जा सकता। इसका कोई ऐसा सौन्दर्यबोध नहीं हो सकता जो सिनेमा के समाजशास्त्र को शामिल न करे। फिल्म ही दैनिक जीवन के सौन्दर्य का आविष्कारक है।

मीनाक्षी तापन इस समकालीन वैश्विक विश्व में प्रसारित छवियों ध्वनियों, वस्तुओं को इस परिप्रेक्ष्य में व्याख्यायित करती हैं जहां इसका प्रत्यक्ष प्रभाव राश्ट्रीय अस्मिता और जातीय संबद्धता के साथ-साथ लैंगिक अस्मिता पर भी पड़ रहा है [4]। इसे एक उदाहरण के माध्यम से समझा जा सकता है. फिल्म 'सन ऑफ इण्डिया ' (1962) के एक गीत में जहाँ लड़का गाता हैः ‘नन्हा मुन्ना राही हूँ देश का सिपाही हूँ ’ वहां इस गाने का सारा बल भविष्य की स्थिति और इच्छा पर है जिसने उस छोटे से लड़के को सिपाही में बदल दिया। एक तरफ यह बतला रहा है कि देश की रक्षा सभी के लिए महत्वपूर्ण बात है 'यहां तक कि बच्चे के भी', वहीं दूसरी तरफ यह भी संप्रेषित कर रह है कि भारत की एवज में वह स्वयं की इच्छा को पूरा करना चाहता है। बच्चा अपनी पुरूष छवि से भली भांति परिचित है कि वही भारत का सिपाही बन सकता है। यहां उस नन्हें मासूम लड़के और उस परिपक्व सिपाही का द्वय रोचक है जिसमें सिनेमा से लड़की गायब है।

यह एक साथ कला माध्यम, सम्प्रेषण का सशक्त स्रोत, दृश्य-श्रव्य माध्यम, एक लोकप्रिय मनोरंजक, सूचनाओं और सामाजिक मूल्यबोध को संचारित करने वाला माध्यम ही नहीं है अपितु सांस्कृतिक वातावरण निर्मित करने वाले अभिकरण के रूप में यह परिप्रेक्ष्य सिनेमा पर विस्तार से विचार करने की अपेक्षा करता है। यही वह क्षण है जब सिनेमा को शिक्षाशास्त्रीय उपकरण के रूप में प्रयोग करने के संदर्भ में अध्ययन करने की सबसे ज्यादा महसूस होती है।

यहां हमारे सामने सवाल यह है कि ऐसे विकासशील समाज में, जहाँ इजारेदार वर्ग की प्रबल उपस्थिति हो, वहाँ जनसंस्कृति और मनोरंजन की परिकल्पना के बीच शिक्षा के साथ उसे एक रचनात्मक अन्विति में कैसे गढ़ा जाए? इस पूर्वपीठिका में जब हम विद्यालय आने वाले संभावनाशील मस्तिष्कों को देखते हैं तब यह प्रतीत होता है कि बच्चों की न सिर्फ तात्कालिक आवश्यकता की पहचान बल्कि जिस समाज में वह तैयार हो रहे हैं उसे संबंधित उनकी भविष्यकालीन आवश्यकताओँ की भी पहचान जरूरी है। तब उस ज्ञान को केवल केंद्रीय स्रोत द्वारा उत्पन्न होने वाले के रूप में न देखकर इसे हमारे अपने ही आसपास उत्पन्न होन वाले के रूप में हम देख पाएंगे। शिक्षित करने का मतलब है, दिशा देना। जैविक व जीवंत तरीके से जीवन से जोड़ने को प्रोत्साहित करना। आज जब सिनेमा हमारी जीवनशैली में शामिल हो चुका है तब दिमाग को ऐसे साधनों से सम्पन्न किया जाना चाहिए कि वे इस गूढ़ दुनिया को समझ सकें। सिर्फ फिल्म को बिन दिमाग देखने के बजाए एक स्वस्थ्य आलोचकीय समझ के साथ ग्रहण करें।

जहाँ सिनेमा एक तरफ संस्कृति समाज की उपज है तो दूसरी तरफ अपनी संस्कृति भी निर्माण करता चलता है. यह एक सामाजिक उत्पाद के रूप में हमारे लोक में व्याप्त है. इस रूप में सिनेमा अपने समय समाज के बीच आकार लेता है उसकी प्रवृतियां उसे सामजिक दस्तावेज़ बनती हैं. इसमें एक साथ किस्से है कहानियाँ है लोक, संवाद, घटनाएँ, भूमिका-निर्वाह, साधारणीकरण है और एक सीमा तक यह रंगमचीय विधियों के प्रयोग के कारण इसमें समानता भी है लेकिन दूसरे ही क्षण तकनीकी के कारण यह उससे पर्याप्त भिन्न भी है.

अब हमें इसको शिक्षा शास्त्रीय उपकरण के रूप ने संभावनाओं के अन्वेषण के क्रम में शिक्षाशास्त्र का परिचय प्राप्त करना इस उपक्रम में सहायक होगा ताकि शिक्षा शास्त्रीय उपकरण के रूप में इसकी संभावनाओं को देख पायेंगे.

शिक्षा शास्त्र क्या है? यह शिक्षक-विद्यार्थी-समाज के मध्य एक अंतः क्रिया है जिसके बीच शिक्षाशास्त्र निर्मित होता है। शिक्षाशास्त्र कई स्तरों पर बनता-बिगड़ता रहता है. यह जीवंत है और हर कक्षा की चारदीवारी के भीतर अपना स्वतंत्र आकार-प्रारूप लेता है। इसमें निरंतर परिवर्तन की संभावनाएं समाहित हैं। ज़ेरोम ब्रूनर के अनुसार (1996 ) इस समाज से ही शिक्षक के पूर्वाग्रह, धारणाएं, मान्यताएं जन्म लेती हैं, जिसके द्वारा वह अपने सामने बैठे छात्र विद्याथी की छवि गढ़ता है। वह सोचता है कि बच्चों तक कैसे पहुंचा जा सकता है? अगर हम कक्षाएं कैसे ली जाती हैं, इसका अध्ययन करें तो दिखाई देगा कि अध्यापक  हमेशा ऐसे सवाल पूछते हैं जिनके जवाब ‘हाँ’ या ‘न’ में प्राप्त हों। अपने अध्यापन को वह हमेशा छात्रो की क्षमता, प्रकार, रूचियों के आधार पर समायोजित करते रहते हैं। [5]

इसे हम अल्थ्युज़र की ‘व्यावहारिक विचारधारा’[6] से भी समझ सकते हैं जिसमें एक तरफ प्रत्यय-प्रतिनिधानों-बिंबों के मोंताज हैं तो दूसरी तरफ व्यवहार - आचरण रूझान और संकेतों की जटिल संरचना। इन प्रत्ययों (नोशन ) - जो कि मस्तिष्क में हैं और व्यवहार-जो सामने प्रत्यक्ष दिखाई देते हैं - की समग्रता ही वस्तुओं, वैयक्तिक और सामाजिक समस्याआं के प्रति अध्यापक के कुछ रवैयों को अपनाने के मानक होती है। यह वह ढांचा है जिसमें विचारधारा मात्र वह रूप है जो अवधारणाओं, विचारों, मूल्यों और मानदण्डों के स्तर पर यथार्थ स्थिति के अंतर्विरोधों पर पर्दे डालता है। इन सबके बीच यह भी देखना होगा कि वह कक्षा किस स्थान, समय, समाज में स्थित है। उस स्कूल के अनुभव तथा बच्चे की बाहर की दुनिया के अनुभव को मल्पनापूर्ण ढंग से जोड़कर हम वहां के वातावरण के अजनबीपन को कुछ कम कर सकते हैं। बच्चे के अनुभवों को शामिल करके शिक्षाशास्त्र समृद्ध होगा। बच्चे हमेशा अपने अनुभवों और मान्यताओं के प्रति सचेत रहते हैं। अतः उनको मानसिक कौशलों के विकास की तरफ प्रोत्साहित करना चाहिए ताकि वे उन पर चिंतन कर सकें व स्वतंत्र रूप से तार्किक दृष्टि रख सकें।

इस प्रयत्न की सफलता इस बात पर निर्भर है कि अध्यापक बच्चों को कल्पनाशील गतिविधियों और सवालों की मदद से सीखने और अपने अनुभव पर विचार करने का अवसर देते हैं। सीखना अपने आप में एक सक्रिय व सामाजिक गतिविधि है। इवान इलीच इस अध्यापक के लिए कहते हैं कि वह केवल एक वचन में एक व्यक्ति नहीं है बल्कि वह स्वयं में बहुवचनीय व्यक्ति है। इसलिए उसके तीन रूप हैं जिनमें पहले में वह मात्र शिक्षक नहीं, बालक का मेंटर, कस्टोडियन भी है। दूसरे में उसकी नैतिकता का स्तर ऊंचा होता है और वह ‘उपदेशक शिक्षक’ राजा की तरह प्रजा को समान मानते हुए सब बच्चों को समान मानता है। तीसरे, वह चिकित्सक शिक्षक है ऐसे शिक्षक में वह थेरेपिस्ट को देखते हैं जो बच्चों की जिन्दगी में झांक कर उसमें हस्तक्षेप का अधिकारी बनता है। जबकि आज हम देख रहे हैं कि अध्यापक-छात्र की भूमिकाएं बदली हैं। शिक्षा कोई भौतिक वस्तु नहीं है जिसे शिक्षक या डाक के जरिए कहीं पहुंचा दिया जाए। यह ज्ञान की अवधारणा को पुनः रचित करने का समय है जिसमें बालका/बालक के अपने साथ लाए अनुभव उनका सामाजिक सांस्कृतिक परिवेश उतनी ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं जितना अध्यापक के दिमाग और किताब में छपे शब्द ।

हमें उस चारदीवारी के भीतर लगातार ऐसी परिस्थितियां बनानी चाहिए जहां वह अपनी बात को रख सके, उसे ऐसे कौशलों से सम्पन्न किया जाना चाहिए ताकि वह स्वयं सोच सके और पूर्वज्ञान को संरचित करने के लिए तर्क क्षमता से स्वतंत्र कुछ रच सके। इतना ही नहीं कक्षा के भीतर लैंगिक, वर्ग और वैश्विक असमानताओं के प्रति भी संवेदनशीलता को प्रोत्साहित करना होगा. ज्ञान कोई एकात्मक संकल्पना नहीं है, उसके कई तरीके व प्रकार हैं। साहित्यिक-रचनात्मक-कलात्मक भी ज्ञानात्मक उपक्रम का हिस्सा हैं। इसे हमेषा रचनात्मक खोज करने वाले संसाधनों पर निर्भर होना चाहिए।

अब हम बिलकुल उस स्थान पर पहुंच चुके हैं जहां हमें स्वयं से पूछना होगा कि क्या माध्यम विशेष अपने साथ सीखने-सिखलाने के तरीके भी लाते हैं? क्या शिक्षा शास्त्रीय उपकरण भी समय के साथ बीतते पिछड़ जाते हैं और उन्हें दोबारा मांजना-पोंछना तेज करना होता है? अर्थात् क्या उन्हें किन्हीं लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए बनाया गया था और अब वे वैसा करने में असफल हो रहे हैं? इन लगातार घटित होती प्रक्रियाओं में शिक्षक-छात्रा/छात्र की भूमिकाएं क्या रूपाकार लेती हैं? इस तरह उपरोक्त भूमिका के आलोक में इस शोध का उद्देश्य ‘शिक्षाशास्त्रीय उपकरण’ के रूप में सिनेमा की संभावनाशील संभावनाओं का अन्वेषण करने के साथ-साथ ज्ञान सृजन में माध्यम के रूप में सिनेमा की भूमिका को देखना है।

टिप्पणियाँ:-

[1]‘लौकिकीकरण' की जगह ‘पंथनिरपेक्षीकरण’ शब्द का प्रयोग एनसीईआरटी की कक्षा बारहवीं की पाठ्यपुस्तक में किया गया है। यह अंग्रेजी के ‘Secularization’का अनुवाद है।

[2] ‘जनवादीकरण’ Democratization का अनुवाद है।

[3] पंथनिरपेक्षीकरण - ऐसे प्रक्रिया जिसमें धर्म के प्रभाव में कमी आती है। इसमें सभी सूचक मानव के धार्मिक व्यवहार, उसका धार्मिक संस्थानों से संबंध, लोगों की आस्था, विश्वास, सभी को ‘विचार’ में लेते हैं। माना जाता है यह सूचक आधुनिक समाज में धार्मिक संस्थानों और लोगों के बीच बढ़ती दूरी के साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं। लेकिन हाल ही में धार्मिक चेतना में अभूतपूर्व वृद्धि व धार्मिक संघर्श के उदाहरण सामने आए हैं।

[4] मीनाक्षी तापन इस लेख में युवा मध्यवर्गीय लड़कियों की किषोरावस्था में उस प्रक्रिया को समझने का प्रयास है जिसमें परिवार-विद्यालय जैसे पुनरूत्पादन और वर्ग लिंग केो कैसे ‘ हैबिटस ’ के रूप में स्थापित करते हैं। साथ ही उनमें मूलतः लैंगिक अस्मिता के प्रकारों को वर्तमान समय, समूह, संस्कृति, पितृसत्ता के संदर्भ में देख्ना था कि वह इनमें कैसे रूपाकार लेती है।

[5] ब्रूनर लोकप्रचलित मान्यताओं को शिक्षाशास्त्र गढ़ने में महत्वपूर्ण भूमिका में देखते हैं। उसमें अध्यापक के अपने प्रत्यय-धारणाएं-उसकी सामाजिक सांस्कृतिक स्थिति भी उतनी ही निर्णायक होती है। वे इसे 'फोक पैडागौजी' कहते हैं। जहां संज्ञान संस्कृति द्वारा प्रदत्त मनोवैज्ञानिक व तकनीकी औजारों के बीच प्रकार्य से उत्पन्न होता है। उनके यहां भाषा महावृतांत चिंतन के सामूहिक तार्किक प्रयास है।

[6] Althusser defines “Practical Ideologies” in opposition to “theoritical ideologies” as the “Complex formation of montages (sets) of notions – representations – images on the one hand, and of montages (sets) of behaviour – conduct – attitudes and gestures on the other"

[जारी..
आगे की ज़रूरी कड़ी..]

आवाज़ें..

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