मार्च 25, 2013

पिनक यह के बस जो तुम हो मैं नहीं हूँ..

{एक ख़त। पर यहाँ उसे ख़त रहने नहीं दिया है। जहाँ तहाँ सीवन मजबूत की है। तहें लगा दी हैं। कुछ और बातें कही थीं उन्हें रोक लिया है। }

पता नहीं कैसा कैसा होने सोचने के साथ कई-कई विचारों के झोल झाल से खुद को ऊबड़-खाबड़ पठार बनने से रोकता हुआ सोच रहा था तकनीक भी इसी समाज का प्रक्षेपण ही है। उसी को प्रतिबिंबित करती है। और इसी में घुसता मेरा एक विचार यह है के इधर एक दो पल से खुद को ठीक ठाक लिखने वाला मानने लगा हूँ। गलत भी हूँ या गलतफ़हमी जैसा भी हो तब भी 'रिस्क' ले ही लिया है। कुछ पढ़ा लिखा भी है और अपने अस्तित्व को बचा ले जाने की जद्दोजहद में पिल भी पड़ा लगता हूँ। हिज्जे 'क्लिष्ट' होते जा रहे हैं तो वह भी मेरी मानसिक प्रकाल्पनाओं का ही एक रूप हैं जहाँ सरल होने के चक्कर में जटिल होता गया हूँ। कहे। बिन कहे।

और इन सबके बीच जो पीड़ा पीड़ित कर रही है के अपन को कोई पूछ नहीं रहा है। कहीं कोई पुकार भी रहा है तो अपनी भाषा में नहीं होगा। वरना अब तक तो लपक लेता। अस्तित्व पर खतरा जैसा न भी हो तब भी इसी के इर्दगिर्द मंडरा रहा हूँ।

पर अगले पल लगता है ऐसा क्या सब लिख मारा है जिससे कोई जाने। कोई पहचाने। चीन्ह ले। यह सापेक्षता ऐसे ही गुल खिल रही है। यह माध्यम बिलकुल प्रिंट की रूपरेखा पर चलता दिख रहा है। जिन्हें लोग वहाँ पढ़ते हैं, उन्हें ही यहाँ नेट पर खोजते हैं। और जो भी लेखक नामधारी है दूसरे की दिवार पर ऐसी टीप करता है जिससे उसके नंबर बढ़ते जाएँ। भक्तिभाव का उत्तर आधुनिक संस्करण।

पर ऐसा क्यों लिख रहा हूँ। जो उनकी मर्ज़ी वो करें पर यहीं खुद के बारे में सबसे ज़यादा सोचता हूँ। लगता क्या है, यहाँ इन्टरनेट पर एक अदद ठीक ठाक ब्लॉग चला रहा हूँ। इसी खुशफ़हमी से रोज़ दो चार होते लगता है कहीं तो हैं ही जो मुझे पढ़ रहे होंगे। पर नहीं। आज तक मेरी पकड़ में कोई आया नहीं है। आज तक इन दो ढाई सालों में कहीं से कोई नया पाठक मिला हो इसके धूमिल होते संकेत भी नहीं मिले। फिर स्वांतः सुखाय वाले फ़ॉर्मूले पर टिके रहना छीजता है। कतरा कतरा लगने लगता है कहीं भी कोई नहीं है। 'खुद को पढ़े जाने' वाला भाव इधर लगातार हावी होता जा रहा है।

फिर यह भी सोचता हूँ के इसका रास्ता भी वहीँ छापेखाने की बगल से ही जाएगा। अगर इस रूप में देखूं तो यह दूसरों से सर्टिफिकेट लेने जैसा है खुद की वैधता हासिल करने जैसा। संस्थागत हो जाने के अपने लाभ हैं, लेकिन उतने ही मजबूत उनके बंधन भी। क्योंकर यह सब विरोधाभासी बातें लगातार दिमाग की परत-दर-परत टकरा रही है और लगातार कमज़ोर ही कर रही हैं। ऐसा न भी हो तो वैचारिक रूप से लेखन के लिए प्रोत्साहित तो नहीं ही करेंगी। यह 'मोटिवेशन' बाहर से ही आएगा ऐसा नहीं है पर कभी न कभी उसमें जो सम्प्रेषण जैसी प्रक्रिया वाला हिस्सा है उसके आग्रह ऐसा होते जाना चाहते हैं।

लिखना टूटफूट से से ज़यादा मुझे तोड़ता जा रहा है। जो लिख रहा हूँ उसे किसी के सामने लाने की यह जल्दबाज़ी है, आकुलता है, व्याकुलता है या कुछ और समझ नहीं पा रहा। शायद वही सापेक्षता वाला नुक्ता काम कर रहा होगा। यह अपने को साबित करने जैसा ही है। दूसरों के सामने। दूसरा कौन है? वही जो बाहर है। जो अन्दर नहीं है।

पता नहीं क्या सब कैसे कैसे वाक्यों से कह जाना चाहता था। हूँ। जो नहीं भी कहा है उसे कह लेना चाहता हूँ। और सच कहूँ तो कल एक कथित रूप से कविता को समर्पित ब्लॉग पर किसी बीए में पढ़ने वाले लड़के की कुछ कवितायें साझा की थी। कवितायें अनगढ़ भी हो फिर भी वहां थीं। और थीं तीस पार टिप्पणी। उन्हें उसमे संभावनाएँ फूट फूट कर दिख रही थी। और अपन अपने अड्डे पर चुपचाप बैठे लगातार अन्दर की खोहों में उमड़ते घुमड़ते रहे। इसे कुढ़ना भी कह सकते हैं और भाषिक रूप से प्रतिस्पर्धी भाव जैसा कुछ।

बस इसका अंत हुआ एक बार फिर इसी विचार पर के कोई कहानी लिखता हूँ। जो छप जायेगी तब तो लोग मुझे भी जानने लगेंगे। कुछ तो जान पहचान होगी ही। म.श.जो. की पहली कहानी तब छपी थी जब उनकी उम्र तीस के पास थी। बिलकुल हम भी उसी के करीब हैं। तब उन्हें लगेगा कहाँ थे तुम मियाँ अब तक। खुद को तुष्ट करता गालिबाना तुर्रा यह भी सही। दिल बहलाता मुंगेरी लाल का हसीन सपना। पर कब तक। सोचता ही हूँ लिखता नहीं।

पर नहीं लिखना चाहता के किन्ही दूसरों के दबावों में आकर लिखूं। उसमे सहजता होगी सोच भी नहीं पा रहा हूँ। पता नहीं यह सब जो लिखा उसमें मैं कहाँ हूँ। लिखना कहाँ है। बस यही सब था जो कहना चाह रहा था..

मार्च 20, 2013

दिहाड़ी डायरी: किश्त चार: हाथ कंगन को आरसी क्या

भले 'प्रथम' की 'असर रिपोर्ट' ग्रामीण परिप्रेक्ष्य में परीक्षाओं को ख़त्म करने और 'सतत एवं निरंतर मूल्यांकन प्रणाली' को शिक्षा के गिरते स्तर के लिए उत्तरदायी माने लेकिन यह शहरी क्षेत्र का भी उतना बड़ा सच है। इस शहर-जो इस देश की राजधानी भी है- के विद्यालयों में उसके घुटने के बल होने के प्रमाण लगातार मिलते रहे हैं। इसी संदर्भ में आशीष की पोस्ट 'शिक्षक बनाम (?)' और नीचे लिखे अनुभवों को पढ़ा जाना चाहिए। जो पाओलो फ्रेरे  के इस कथन को दोबारा से गढ़ने की तरफ चले जाते हैं जहाँ वे विद्यार्थी के फेल हो जाने को विद्यालय की विफलता कहते हैं।  कब? आज नहीं। सत्तर के दशक में।

फौरी तौर पर भारतीय सन्दर्भों में यह विद्यार्थी के साथ विद्यालय की भी विफलता लगती है। पर ध्वनियाँ और भी आगे तक जा रही हैं, उनपर अभी नहीं। अभी बस वे दो दिन। जहाँ मैं क्या कर रहा था, मुझे नहीं पता..

शनिवार दो मार्च, तीन बजकर सात मिनट। पेपर शुरू हुए आधे घंटे से ज़यादा हो चुके हैं और दसवी क्लास एक दूसरे का मुँह ताक रही है। कभी कभी हमारी तरफ भी देख लेते हैं। क्वेश्चन पेपर पढ़ने के बजाय इंतज़ार कर रहे हैं उन घड़ियों जब नक़ल शुरू होगी। दसवी कभी बोर्ड की क्लास हुआ करती थी। इनकी परीक्षा स्कूल  में इसलिए हो रही है क्योंकि नीति निर्माताओं को डर था कि कहीं भावी संसाधन आत्महत्या न कर ले। टिक कर बैठ नहीं रहे हैं। बार बार बहाना बनाकर बाहर जाना चाहते हैं।

जो बाहर से लौट आये हैं वे बता रहे हैं कि अगल बगल की क्लासों में क्या हो रहा है! आप भी उसी रास्ते पर चलो सरजी। दूसरा बोला के कोई चश्मे वाले सरजी आपको बुला रहे हैं। इसी बीच विषय अध्यापक आये उन्होंने पहले नौ बहु-विकल्पीय प्रश्नों में खाली जगह का महत्त्व बताया और यह भी के नक़्शे में कौन जगह कहाँ है।

ऐसा नहीं है सवाल किसी और जमात की किताब से आये हैं। यह तो वे बच्चे हैं जिन्हें परीक्षा उपयोगी सहायक सामग्री भी मुहैया करवाई गयी है। पर साल भर कुछ पढ़ा हो, किसी घंटी में रुके हों तब न कुछ कर पाएंगे। पता नहीं की पायलट प्रोजेक्टों, एक्शन रिसर्चों के बाद यह फैसला लिया गया होगा कि दसवीं के बोर्ड को वैकल्पिक बना दिया जाये। शायद उनकी चिंता का एक ही कारण था। उन्हें चाहिए ऐसे ही अधकचरे दिमाग।

अभी अभी पैरवी आई है। कि ढील दे दी जाए। इतनी सख्ती पर तो बेचारे साँस भी नहीं ले पायेंगे। साँस उनकी नाक नहीं उनके कपड़े लेंगे। जहाँ चिटें फँसा रखी हैं। एक-एक कर निकलेंगी। तब कुछ जवाब देते बनेगा।..

सोमवार अट्ठराह मार्च, चार बजे करीब। मोर्चे पर डटे हुए काफी देर हो चुकी है। पर आज शांत होने का नाम नहीं ले रहे हैं। बेचैन हैं। सब। ग्यारहवीं तो ग्यारहवीं, दसवीं भी उन्ही के क़दमों पर। इधर जाओ तो उधर। दंगा ग्रस्त इलाके को संभालो। तभी किसी तीसरी तरफ से। बैठ नहीं रहे हैं। पेपर पर रोल नंबर के सिवाय कुछ लिख नहीं पाए हैं। जब बोलो के कुछ लिखो तो कहते हैं अभी सर जी आयेंगे। उन्होंने कहा था। तभी एक लड़का अंदर आया। कहने लगा सर दिवार की पिछली तरफ हैं। वहां से अभी आयेंगे।

मैं थोड़ी देर नीचे गया। वापस आया तो मास्टर जी ब्लैक बोर्ड पर अपना काम कर रहे थे। यही वे मास्टर हैं जो पीजीटी क्लासों में लगे अरेंजमेंट इसलिए लेने नहीं जाते क्योंकि बच्चे इनसे संभलेंगे नहीं। खुद इनकी नौवी दसवी देखी हैं जहाँ बच्चे बिन बताये बिन पूछे अंदर बाहर होते रहते हैं। कान पर मोबाइल लगा है। क्लास क्लास कम भिन्डी बाज़ार ज़यादा लगती है। खैर।

आज इनकी परीक्षा हो जैसे। एक-एक सवाल ब्लैक बोर्ड पर करते जा रहे हैं और वहीँ पड़े किसी अनाम बस्ते से चौक मिटाते जा रहे हैं। ऐसा नहीं है के इस पूरी प्रक्रिया में सब ध्यान लगा कर सामने देखते रहते हैं। नहीं। बल्कि अपने पड़ोसी के यहाँ ताँक-झाँक करते पाया जा सकता है। क्योंकि लिखने का कौशल उन्होंने अर्जित नहीं किया। न किसी अध्यापक ने इसे अपनी जिम्मेदारी समझा।

यह दृश्य देख किसी बाहरी को यह लग सकता है कि शायद सत्र के दौरान कक्षाएँ कम लगी होंगी। पर ऐसा नहीं है। कुल आध घंटे बाद हम अभी अंदर दाखिल हुए हैं। चुप नहीं बैठा जा रहा है उन सबसे। नक़ल का कोई सवाल रह न जाए। इसकी बेचैनी बढ़ गयी है। कुछ जिनके हाथ तेज़ चलते हैं वे अलग अलग तरह की भाव भंगिमाएँ मुख मुद्राएँ बनाकर पर्चियाँ चलने की अनुमति माँग रहे है।
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मार्च 18, 2013

कल आएगा साथ नौकरी लाएगा

कभी कभी लगता है जैसे अभी लग रहा था कि शादी भी एक निपटाए जाने वाला काम है। जिसके निपटने में लगातार देरी होती जा रही है। जिसे अर्थशास्त्री-समाजशास्त्री नौकरी में देरी पढेंगे, उसे हम जैसे बेरोजगार युवा जी रहे हैं और समाज में अपनी जगह बनाने की जद्दोजेहद में रोज़ दो चार हो रहे होते हैं।

अगर अभी तक जो भी कुछ पढ़ा लिखा है उसके आधार पर अपने को ठीक ठाक पढ़ा लिखा मान लिया जाए तब हमें यह सवाल किससे करना चाहिए, किससे पूछना चाहिए कि यदि सरकार के बचपन से हम पर सैकड़ों हज़ार रुपये फूंक देने के बाद भी हमें एक अदद नौकरी के लिए लाले क्यों पड़े हुए हैं? देश की राजधानी के एक विश्वविद्यालय से पास होने के बावज़ूद चप्पल जूते घिस रहे हैं। जहाँ से पढ़ने के सपने कम से कम उत्तर भारत में तो देखे ही जाते होंगे।

अगर इसी तरह मानव पूंजी निर्मित करने में कमअक्ली से बहुमूल्य द्रव्य हम लोगों पर बर्बाद(?)होता रहा, तब हमें ऐसे अनुपयोगी-अनुत्पादक बनाये रखने की जिम्मेदारी किसपर आती है? इसे क्या हम खुद वहन करें या हमें कम नौकरियों वाले देश में नौकरी न माँगने के लिए ही गढ़ा गया है। जैसा कृष्ण कुमार कहते भी थे कि शिक्षा व्यवस्था चयन की प्रक्रिया को वैध बनाकर लगातार असंतोष की स्थितियों को टालती रहती है। और बेवकूफ सिर्फ वही बनते हैं जो उसके रास्ते से नौकरी वाले हो जाना चाहते हैं।

हम 'पढ़ेंगे लिखेंगे बनेंगे नवाब' जितना सामंती न भी सोचें पर इस तर्ज़ पर धुन बिठा रहे थे और लगता था हम इसलिए पढ़ लिख रहे हैं क्योंकि पढ़ लिख लेने के बाद नौकरी लगेगी। नहीं पता था के नौकरी लगना और पढ़ लेना एक ही सिक्के के दो पहलू कभी नहीं रहे। बल्कि वह तो सलीम जावेद की 'शोले' वाले सिक्के में तब्दील हो चुका है। शायद तब के प्रस्थान बिंदु ही गलत थे जहाँ नौकरी को स्थायित्व का पर्याय मान लिया। और उस स्थायित्व का मतलब हर माह एकमुश्त तन्खवाह का आना।

पता है अर्थशास्त्र के तर्क इतने ही अमानवीय हैं और उनका मतलब सिर्फ किन्ही विशेष संस्थाओं में राजस्व घाटे और चालू वित्त वर्ष में सकल घरेलू उत्पाद की दर से ज़यादा नहीं है। पर उसकी एक कीमत हमारी स्थगित हो चुकी ज़िंदगियाँ भी दे रही हैं। जिन्हें स्वाभाविक मान लेना उससे भी अधिक अमानवीय है।  

अट्ठाईस साल की उमर में किसी भी इम्तिहान के हो जाने के बाद नतीजों का इंतज़ार करना लॉटरी टिकट खरीद लेने के बाद इनामी नंबर लग जाने वाले जुए की तरह है। जिसका हमारी योग्यता, कार्यकुशलता से कोई लेना देना नहीं। बस उन सबको मात्र संयोग बनाते रहना है। फिर जैसा कि फिल्म के शुरू लिखा होता है उसी की तर्ज़ पर यहाँ भी औपचारिक तरीके से यह कहना शुरू कर देना चाहिए कि 'आपकी नौकरी लग जाना मात्र एक संयोग है और इसका किसी जीवित या मृत व्यक्ति या किसी भी वास्तविक घटना से कोई सम्बन्ध नहीं है। न ही इस नौकरी लगने के दौरान किसी कुत्ते बिल्ली हो कोई चोट ही लगी है। '

इन सबके बीच हम लगातार 'मिसफिट' होते जा रहे हैं। कहीं किसी मशीन के वैसे पुर्ज़े बनते जाना है जो किसी कारीगर ने गलत डाई उठाकर गलती से बना दिए। अब बन गए हैं तो रक्खे पड़े हैं किनारे। हम शायद वह पहले पुर्ज़े हैं जो उस मशीन में लगेंगे जो कभी नहीं चलने वाली है। जो चल रही हैं उनके इतनी जल्दी पुराने होने की कोई गुंजाईश नही है। पर इसकी पूरी पूरी संभावना है कि उस इंतज़ार में बिना ओवर हॉलिंग के हममे जंग लगता रहेगा।

जबकि ऐसे होते जाने में खुद हमारी कितनी भूमिका है हमें नहीं पता। फिर भी इस अवस्था का दोष हमीं सबसे ज़यादा लेते हैं। लेना पड़ता है। हम तो उस मांग पूर्ति वाले शास्त्र में कहीं से भी अट नहीं पाए। हमें बाहर फेंका नहीं गया, उसकी मंद रफ़्तार ने खुदही हमें बाहर कर दिया। इस तंत्र का लगातार अमानुषीकरण होते जाना दमनचक्र को और तेज़ करेगा। कभी हमारे दिल के कोने में कसमसाती तड़पती धड़कन को सुनेगा नहीं। सुनने लायक कान उन कारीगरों ने बनाये ही नहीं, जिन्होंने हमें बनाया था।

फिर इस बिंदु पर आकर बार बार अपने निरर्थक होने का बोध घेर ले तो इसमें कहाँ से हम गलत हैं। सारी प्रक्रियाएं हमें बाहर खदेड़ रही हैं। जबकि हम तो सोचे बैठे थे कि इस देश के संभावना शील संसाधन थोड़ा बहुत तो
हम भी हैं। पर इधर ऐसा न लगने वाला भाव ज़यादा हावी होता जा रहा है। लगता है इस तंत्र में छोटी मोटी सेंध के लिए अब नए सिरे से तय्यारी करनी होगी। पर क्या जिसे हम आज तक राष्ट्र राज्य'  समझते आये थे वह हम पर कई हज़ार किश्तें फिर भरने को राजी है। उसी की भाषा में कहें तो क्या हम 'निवेश' करने लायक 'उपक्रम' हैं भी या नहीं ?..

पता नहीं सारी जिरहें कब अपने अंदर सारे सवालों के जवाब उगाएँगी? भले उसके लिए लाल अमेरिकी गेंहू के साथ उग आई खरपतवार ही लगे, पर कहीं कोई चोर दरवाज़ा मिलेगा इसकी संभावना लगती नहीं है। लगता तो यह है कि इन्हें बस यूँ ही राष्ट्रीय अभिलेखागार में महत्वपूर्ण सवाल मानकर उसकी पाण्डुलिपि को अभी से संरक्षित करने के उपायों पर विज्ञान भवन में कई कई दौर की वार्ताएं आयोजित करवाई जाएँगी।

और हम, हमारे जैसे छोटी मोटी नौकरी लग जाने के बाद शादी वाले कामों को निपटा लेने के बाद बच्चे ऊगा-जमा रहे होंगे।

 
{कई महीनों बाद भी वहीं ढाक के तीन पात: ये कोई बहुत अच्छ दिन नहीं हैं }

मार्च 13, 2013

अलसाता बिखराता मौसम और अंगड़ाई लेती देह

जैसे सर्दियाँ गुलाबी गुलाबी होती हैं वैसे आती गर्मियाँ इसी रंग की क्यों नहीं होती। ठण्ड में दिमाग ठंडा रहता है और हरारत बढ़ते ही दिमाग का पारा देखने लायक होता है। अभी शनिवार पटेल नगर से लौट रहे थे। बस में। बस तप रही थी। तारकोल की सड़क की तरह। उस पर दौड़ते हुए। अजीब तरह का रंग होता है। सड़क का उसपर पसरते मौसम का। जिसे देखने का मन नहीं करता। उसमे ज़रा रंग होता भी कम है। अमलतास का पीलापन नहीं। सरसों की बालियाँ भी नहीं। सिर्फ लाल। सेमर के पेड़ पर पत्ते नहीं होते। बस होते हैं लाल लाल फूल जैसे। हमारे यहाँ मतलब इस दिल्ली शहर में बसंत केदारनाथ सिंह के बनारस की तरह भी नहीं उतरता। इस शहर की जीभ किरकिराती है उसके बिलकुल बाद आये पतझड़ के समय।

रातें अब थोड़ी कम ठंडी है। उस वक़्त तो बिलकुल नहीं जब सोने के लिए लेटते हैं। एक पैर रजाई में। दूसरा बाहर। बचपन से इन दिनों की यही आदत आज भी साथ है। दो दिन हुए रजाई नीचे धर आया हूँ। अगली ठण्ड के लिए। खिड़की खुलने लगी है। हफ्ता भर पहले जब पहली बार खिड़की खोली थी तब उस पर पर्दा लगा रखा था। अब वो भी नहीं। पर मच्छर इतनी जल्दी आ धमकेंगे सोचा न था। नींद कभी टूटी तो राग मल्हार नहीं उनके बेने जैसे पंख वो सबके सब झल रहे होते हैं। बिलकुल उसी तर्ज़ पर जैसे किसी नुक्कड़ पर आती गर्मियों में कोई बूढ़ा बैठा मुफ़्त में पानी पिलाता दिख जायेगा।

दिल्ली चंडीगढ़ नहीं है। न अब हो सकता है। वर्ना यहाँ भी सड़क किनारे बोगनवेलिया के लाल नीले फूल खिलते। यहाँ फूलों का खिलना सरकारी बागों में ही होता है। या किसी की बालकनी में लगे गमलों में। सुबह सड़कों पर सायकिल के पीछे झउये में छोटे छोटे रंग बिरंगे पौधे लिए किसी नर्सरी का माली आवाज़ लगता घूमता फिरता है। पर आज तक सिर्फ इन लोगों को देखता ही आ रहा हूँ। कभी रोक कर पूछा नहीं के गुलाबी सफ़ेद पंखुड़ियों वाले फूल को क्या कहते हैं। मैं क्या कहूँ। इसलिए आज तक कोई नाम उसे नहीं दे पाया हूँ। जो मेरे दिल के करीब है उसका नाम मुझे मालुम है। फिरंगी पानी

दिन धीरे धीरे बड़े होते जा रहे हैं और करने को जो भी काम हैं उन्हें बराबर बाँट नहीं पा रहा हूँ। उधर लिखने की जो आदत अँधेरा होने के साथ बन गयी थी उसे फिर से देखना होगा। वक़्त बढ़ गया लगता है। पर साथ आई है उबासी। अलसाई सी शामें। आँखों की नींद। आसमान में एक भी रुई का फाहे जैसा बादल नहीं। उसका नीलापन अपने विस्तार को बता रहा है। पर मेरा रोज़ाना खाली करता जा रहा है। मेरे पास भरने के लिए जो भी चीजें हैं उन्हें जब तक जेब से कोनो अंतरों से निकालता हूँ वो अपना रंग ही बदल लेता है। तब होते हैं तारे और एक चमकता इठलाता चाँद। उसे अपनी कहूँ, पर कैसे। मिल ही नहीं पा रहे हैं। हम दोनों।

हवा शाम होते ही ठंडी हो जाती है और थर्मोकोट को अभी निकाल नहीं है। पर शाम की सैर में तीन चार दिन से कटौती होती जा रही है। चाहता नहीं हूँ फिर भी। वो सर झुकाए, गर्दन उठाये धीरे-धीरे अपनी खोह में उतरना डूबना अब नहीं हो पा रहा है। शामें शाम कुछ ज़यादा देर तक रह रही हैं पर उसमे अपने हिस्से इधर दुबारा से बनाने पड़ेंगे। किताबें न पढ़ने का बहाना ठण्ड के साथ ही विदा हो लिया है। किताबें अब उठाई जा सकती हैं। अब तो हाथ भी ठन्डे नहीं होंगे। पर मन भी तो होना चाहिए। अपने आस पास कुछ भी दिखाई दे उसमें सूरज की तपिश देखने नहीं देती।

खिड़की से देखता हूँ बिन बताये आम के पेड़ पर बौर आ गयी हैं। मतलब इस साल आम आयेंगे। एक एक साल के अंतराल पर आम आने का उसका खुद का बनाया तंत्र है। और एक तरीके से उस कंक्रीट की ज़मीन से उसके संघर्ष की गाथा भी। जड़ें कैसे चारो तरफ से घिर चुकी पत्थर बन चुकी जमीन से पानी और आवश्यक तत्व ले रही हैं सिर्फ उसे पता है। अभी सिर्फ यही पेड़ खिला है। उसका पड़ोसी पकड़िया बीते साल कटते कटते किसी तरह बचा है। पत्ते अभी नहीं छोड़ें हैं। अशोक भी वैसा है। बस सड़क किनारे आती होली के इंतज़ार में पीपल के पत्ते सबसे पहले विदा हो गए हैं। हमारी तरफ सड़क के दोनों तरफ सिर्फ़ पीपल हैं। जो अमलतास के पौधे बरसात के वक़्त अगस्त में लगाये थे उन्हें किसी बड़ी कंपनी की ऑपटिकल फाइबर तारों को बिछाते वक़्त रातरानी के पौधे के साथ अनदेखा कर मजदूरों के पैरों ने कुचल दिया है।

सुबह दूध लाते वक़्त पीपल के पत्ते पैर के नीचे पड़ते हैं। उससे पहले उजाला खिड़की से कमरे के अन्दर आ जाता है। तड़के कभी चार वार बजे आंखों के साथ कान भी खुल जाते हैं तब पीछे रिज़ की तरफ से मोरों की बतकहियाँ सुनाई दे जाती हैं। जैसे अभी बरसात वाले बादल आने हो वाले हों। पर नहीं। ऐसा कुछ नहीं होता। और फिर दोबारा लेट जाता हूँ। जैसे दिन होते जा रहे हैं उनमे देह टूटती सी लगती है। जैसे-जैसे दुपहरी लम्बी, उबाऊ, थकी-थकी दरवाज़े के पीछे लगी कील से फुदक फुदक भागेगी, उतनी ही रातें उसे सीमाओं से परे ले जाना चाहेंगी। सात बजे के बाद भी उठने का मन नहीं करता। पता नहीं क्यों। सुबहें सुबह की तरह पिछले कई सालों से नहीं रहीं। उनका ताज़ापन कहीं गुम है। हम भी पीले पत्तों की तरह मुरझाये से चेहरों के साथ रोज़ उठते हैं। उठाना पड़ता है। पर अभी भी कबूतरों की उस जोड़ी का इंतज़ार कर रहा हूँ जो हर सुबह छज्जे से होते हुए कमरे में दाखिल होते थे। इधर अभी तक वह भी गायब हैं।

{ग्यारह अप्रैल, बिफ़य। आज जनसत्ता में यह पोस्ट पीले पत्तों की तरह नाम से आई है। अखबारी कतरन पढ़ने के लिए इस लिंक पर घूमा जा सकता है।}

मार्च 12, 2013

'शोभा सम्राट थियेटर' का उत्तर आधुनिक पाठ

बिलकुल भी एहसास नहीं था के चार पाँच साल पहले दरगाह मेले में देखे शोभा सम्राट थियटर के बारे में दिल्ली आकर उस दरमियानी में लिखी कुछ पंक्तियाँ को लिखने के बाद उन्हें कोई अनाम अज्ञात व्यक्ति इस कला रूप को तलाशता गूगल सर्च कर उस पोस्ट तक जा पहुँचेगा। डैशबोर्ड में इस खोज को देखा तो लगा इसपर कुछ देर और रुकने की ज़रूरत है। इस रूप में इसकी कई और व्याख्याएँ होंगी..उन्ही में से कुछ को पकड़ने की जद्दोजहद में बैठ रहा हूँ..

अचानक मन में आया तो खुद भी गूगल कर देखा तो सबसे ऊपर पन्द्रह मार्च दो हज़ार बारह के दो वीडियो दिखे। किसी सिंघेश्वर मेले के हैं। हिंदी में टाइप करके सर्च करता रहता तो कुछ भी पता नहीं चल पाता। इस माध्यम में अंग्रेजी के अपने फ़ायदे हैं। जैसे ही अंग्रेज़ी में 'सिंघेश्वर मेला' लिखा, एक लाख से ज़यादा एंट्री दिखी। और यहाँ भी पहले यह नहीं पता चला के यह मेला मधेपुरा से आठ नौ किलोमीटर दूर सिंघेश्वर मंदिर पर लगता है। और सिंघेश्वरी भवानी कहाती हैं और सिंघेश्वर शिव हैं। यहाँ इस स्थान की पहचान को ढक लिया है शोभा सम्राट थियटर ने।

जो लोग इसे -इन्टरनेट को - आधुनिक माध्यम समझते हैं उन्हें फिर से दिमागी ओवर हॉलिंग की ज़रूरत है। क्योंकि खुद में आधुनिक लगता मीडियम उतना ही रूढीवादी है जितना हमारे समाज का ढाँचा। तकनीक के रूप में यह आधुनिक हो सकता है पर उपयोग के स्तर पर नहीं। क्योंकि माध्यम का स्वरुप उसके प्रयोक्ता ही निर्मित करते हैं। बनाते बिगाड़ते हैं। फिर यह पूछा जा सकता है इस समाज का ढाँचा कैसा है? हमारी अपनी सहूलियत के हिसाब से इसके कई उत्तर हो सकते हैं। और जहाँ से मैं इसे देखता हूँ वहाँ से यह मुझे अधिनायकवादी, पितृसत्तात्मक, निरंकुश, यथास्थितिवादी, प्रतिगामी होने के अलावा कुछ और नहीं लगता। इतनी थियरी इसलिए भी बघार रहा हूँ क्योंकि जो बाते आगे हैं उनके लिए कुछ ठोस आधार चाहिए।मजबूत पाये। इसलिए भी अगर आप अभी से असहज महसूस कर रहे हैं तो आप आगे न पढ़ने के लिए स्वतंत्र हैं। कोई बाध्यता नहीं है।

पर सबसे पहले इस शोभा सम्राट थियटर से पहले जो छवियाँ मौजूद थी।हैं। उन्हें एक एककर लेना ज़रूरी है। शुरू करते हैं 'वीसीआर' के साथ आई उन बरातों की जब पूरे गाँव के लोग खुले आसमान के नीचे धर्मेन्द्र जितेन्द्र मिथुन की फ़िल्में देखते थे या साथ आई 'नौटंकी'। कम ही बरातें होती जिनमे यह दोनों साथ आते। यहीं कहीं 'लौंडा नाच' भी रहा होगा और नसीबन के लिए बदनाम होते लौंडे। 'लिल्ली घोड़ी' को नाचते देखना कठपुतली के तमाशे जैसा। यह मनोरंजन की ग्राम्य व्याख्याएँ थीं जिनके बीच विशाल भारद्वाज बिल्लो चमनबहार एंड ऑर्केस्ट्रा, निशांतगंज, बिलावल को रचते हैं और उसके चार साल बाद अभिनव कश्यप मुन्नी को। भले वहाँ आधुनिकता के चिह्न न पाए जाते हो पर सिनेमाई गानों की भौंडी नकलों के सस्ते लुगदी संस्करणों की तरह शास्त्रीय के बिलकुल उलट उनके अपने रंग ढंग उत्तर आधुनिक मनों का निर्माण कर रहे थे। बैंड वाले 'ये देश है वीर जवानों' के साथ रेडियो पर नए सुने गाने की धुन बजाने की कोशिश ज़रूर करते। भले गाल गले नसों को फुला फुला कर दम निकाले दे रहे हों। वहां उमराव जान अदा नहीं थी तो क्या वहाँ मिस मीरा, चाँदनी, लक्की, सिमरन जैसे झूठे नामों के साथ स्त्री सॉफ्ट पॉर्न के रूप में तब भी वहां मौजूद थीं। हैं।

जैसे दिल्ली के लाल किले पर हर साल धार्मिक रामलीला कमेटियाँ अपने प्रवेश द्वारों को भव्य बनाने में खूब पैसा और कारीगर लगाकर किसी प्रसिद्द ईमारत की नक़ल करती हैं वैसे ही इस थियटर का मुख्य आकर्षण उनका यूएसपी होता है। जब भी लगता भीड़ कुछ कम होती तो परदे को कुछ देर के लिए उठा देते और अजीबो गरीब परिधानों मेकप में लिपी पुती देहों को देखने का कोई मौका वहाँ से गुज़रता शख्स नहीं छोड़ता। के उसका मन ललचाया और अस्सी सौ रुपये की टिकट खरीद कर अन्दर। कोई हिरामन हो और तीसरी कसम खा चुका हो तो बात अलग है।

इसका मूल चरित्र हमारे संविधान की तरह धर्मनिरपेक्ष ही है। भले वह बहराइच का दरगाह मेला हो या बिहार के मधेपुरा में लगने वाला सिंघेश्वर मेला। बिना भेद किये यह दोनों जगह सम्मिलित होता है। फिर यह भी के हमारे समाज के पुरुष भी धर्म के सापेक्ष अपने व्यवहार को बदलते नहीं हैं। वहाँ दर्शक दीर्घा में सबकी मौजूदगी इसे सत्यापित करती है। इससे धार्मिक सत्ता भी अपने समाज के ढाँचे के लिए किसी भी तरह का खतरा महसूस नहीं करती। मूलतः धर्म का ढाँचा भी तो यथा स्थितिवादी ही है। बस वे तो यही सोचते मंद मंद मुस्काते होंगे के उनके क्षेत्र में कोई देवदासी नहीं है। है भी तो किसी अज्ञात स्थान पर। उन्हें बस अपनी ज़मीन के किराए से मतलब है।

यह उत्तर आधुनिक इस रूप में भी हैं कि यह अपने साथ एक विशिष्ठ जीवनशैली और चिंतन को भी अपने साथ संप्रेषित करती हैं। ब्लाउज हैं पर उसके दर्जी कूचा रहमान के पुश्तैनी दर्जी नहीं बल्कि वे हैं जो करीना कट और प्रियंका जैसे उभारों को संभालने वाले वस्त्र बना सकें। पेटीकोट को कपड़े की तरह लिखना जितना अश्लील लग रहा है उतना ही उस स्टेज की लड़कियाँ इससे दूर भाग रही हैं। वहाँ जींस टॉप से भी आगे की श्रृंखलाएं मौजूद हैं। बिलकुल उसी तर्ज़ पर जैसे इधर भोजपुरी फ़िल्में और उनमे डाले गए गानों का पिक्चरायजेशन। जो लोकल से ग्लोबल हो जाना चाहता है। भले उस रूप में गाने भारतीय फिल्मों के अभिन्न अंग हों, उन्हें परिधान हॉलीवुड से आयातित ही चाहिए। यह शोध का मौजू विषय हो सकता है के समानुपातिक रूप से किस माध्यम में किसे और किस रूप में कितना परिवर्तित किया। खैर। जिन वस्त्रों जिन प्रसाधनों का उपयोग वहां मंच पर इतराती इठलाती महिलायें करती हैं उनकी खरीदारी में मेले में आई दुकानें विशेष ध्यान रखती हैं। लाली लिपस्टिक से लेकर अपनी औरत के कहने पर उनकी छाती के नाप के अंतःवस्त्रों को वे वहाँ खरीदते पाए जाते हैं। और वहां से लौट कर उसके मन में रह गए उन अंतर द्वंदों पर कोई मनोचिकित्सक उसे सलाह देने के लिए मौजूद नहीं है। बस उन अपेक्षाओं से अब जूझने की बारी उसकी ब्याहता के हिस्से आती है और वहां की दीवारें किसी हाकिम एम शाकिब से हर जुमेरात मिलने को कहती हैं।

जिन किन्ही चिंतकों को यह अपरिष्कृत अतृप्त कुंठाओं का मनोरंजन जैसा कस्बाई पाठ लगता रहा है या लगने वाला है उनके लिए एक छोटी सी सेंध इसी तकनीक ने लगायी है। जहाँ अब यह शोभा सम्राट थियेटर जैसे स्थानीय संस्करण यू ट्यूब जैसी वीडियो साइट्स के ज़रिये किसी भी परिधि में सीमित होकर नहीं ग्लोबल पाठ का निर्माण कर रहे हैं और बकौल वहाँ प्रकाशित एक कमेंट एक विशुद्ध पुरुष आग्रह करते हुए कह रहा है, 'गुरूजी प्रणाम..थोड़ा हॉट वीडियो डालो ना..मज़ा आ जाए..छोट छोट कपड़ा वाली लौंडिया..दिल खुश हो जाता है आपका वीडियो देख के..'

मार्च 11, 2013

विवाह योग्य लड़के

यह टुकड़ा दरगाह मेले के प्रसंग के साथ ही लिखा था। पर तब का बातचीत के क्रम को थोड़ा सुस्त कर देता इसलिए भी वहां से हटा लिया था। तब हम साढ़े सात बजे रात के आसपास मेला जाने की तय्यारी कर रहे थे, साथ ही वहाँ आई भाभी की बहिन को भी लेजाने के दबावों को महसूस कर रहे थे। और फिर जैसा होता ही है कुछ आवाजें ऊपर नीचे होने के बाद हम गए सात लोग ही। चार सायकिलों पर। एक सायकिल कमज़ोर भी थी। किसी से माँगी हुई।

खैर दो हज़ार आठ का एक और पुर्ज़ा..पिछली कड़ी {दरगाह मेले के बहाने से } के साथ बीच में कहीं भी लगाकर इसे पढ़ा जा सकता है।

हममे जो बड़के भईया हैं उनकी पत्नी माने हमरी भाभी की छोटी बहन भी पहले से प्रकट थीं और हमारी चाची के दामाद के यहाँ उनकी दूसरे नंबर की बेटी सैर सपाटे पर थी। दोनों अपनी अपनी बड़ी ब्याहता बहनों के यहाँ किसी शादी मुंडन को देखने हाजिरी लगाने के उद्देश्य से वहां नहीं थी। अब इन छोटी बहनों का अपनी विवाहिता बहनों के यहाँ बेमियादी प्रवास क्या संकेत कर रहा है कुछ कुछ समझ आ रहा है। 'नमक का दरोगा' में पिताजी के कलयुगी प्रवचन में यह उक्ति भी थी कि लडकियाँ घास फूस की तरह निरंतर बढती जा रही हैं। एक मतलब यह भी कि इन्हें खरपतवार की तरह उखाड़ कर 'अपने घर' भेज दिया जाना ताकि एक बोझ तो कम हो।

यह भी समझ आया कि माता पिता लड़की जल्दी बड़ी होती क्यों आँखों में खटकती रहती है। शायद इसलिए कि वे लड़कों के मुकाबले इन भौगोलिक परिस्थितियों में जल्दी शारीरिक परिपक्वता प्राप्त कर लेती हैं। और नित्त कुछ समय पश्चात उनके कपडे छोटे होने लगते हैं। यहीं उनके खगोलविद पिता माता समेत यह गणना करने लगते हैं कि उनकी बिरादरी, पटीदारी, रिश्तेदारी, जाति में कितने विवाह योग्य लड़के हैं और आगे आने वाले समय में होने वाले हैं- विवाह योग्य!

और इसी उधेड़बुन में वे अपने दामाद को 'आधी घरवाली' की कुछ दिन तक पहरेदारी करने का जिम्मा सौंपते हैं। ताकि तुम भी हमें इस बला से छुटकारा दिलाने में हमारी मदद करो। हम तो दिमाग खपा खपाकर सूख कर काँटा होते जा रहे हैं।..जबकि लड़कों की स्थिति में यह सारे तर्क कसौटियाँ बेमानी प्रतीत होती हैं और वे तब तक इंतज़ार करने में विशवास रखते हैं जब तक कोई मोटी आसामी उनके जाल में न फँस जाए ताकि बाकी बेटियाँ भी उस 'वैतरणी' को पकड़ कर पार हो सकें..

इनके साथ वह स्थितियाँ भी आती हैं जब हर माता अपने यहाँ आये हुए लड़के को देखते ही उसे अपने भावी दामाद के रूप में देखने लगती है और खुद को उसकी भावी सास मान बैठती है। फिर शुरू होता है अपनी सुयोग्य कन्या की प्रसंशा में चार चाँद लगाता वर्णन। कि उस के दिमाग में कोई छवि तो उभरे। साथ ही अपनी घास फूस की तरह बढ़ती बेटी को यह निर्देश देते हुए नहीं चूकती कि आगे से उस अमुक लड़के को 'भईया' पुकारने कहने की कोई ज़रूरत नहीं है, बात करो तो बिना इस संबोधन के! ..

जहाँ बैठा यह सब सोच रहा था वहां ऐसी ही एक सास अपनी पुत्रवधु को हिदायत दे रही थी की यह दवाई जो मैं तुम्हारे लिए लायी हूँ और चूँकि इसका दाम मैंने बीस रुपया अदा किया है इसलिए भी तुम्हारा ठीक होना अनिवार्य है। इस कथन के बाद उनके चहरे पर ऐसी मुस्कान आ जाती है मानो वे उसे समझा रही हों कि देखो मैं तुम्हारे सामने हट्टी कट्टी खड़ी हूँ और इस साम्राज्य को संभाले हुए हूँ तब तुम किस खेत की मूली हो ..मेरी सास तो मुझे इतना भी नहीं देखती भालती थी। ..लगता है औरत जात अभी भी बिना दवाईयों के ठीक हो जाती हैं जैसा रेणु 'मैला आँचल' में लिख चुके हैं।

मार्च 09, 2013

गुमशुदा पेट की तलाश


तीसरा क्षण

1.
अगर वहाँ रेड लाइट नहीं होती 
तब उसे ढूंढ़नी पड़ती कोई नयी जगह
जहाँ से वह मिल सके अनजान भीड़ से 
भीड़ से वह न भी मिलना चाहे
पर उनकी जेबों में
खनकते पैसों से ही दूध आएगा
जो उसके स्तनों में इस बार भी नहीं उतरा है

किसी ने मुझे बताया नहीं है 
कि इस बार भी वह मरते मरते बची है
इस गोद में लिए बच्चे को जनते हुए
लेकिन जब से देख रहा हूँ, यही लगता है

और इस बार भी नहीं कहूँगा के 
उसका पेट पीठ को छूता दिख रहा है
बहुत पुराना लगता है
मैं कहूँगा के उसके पेट में पेट ही नहीं है 

बस है एक गर्भाशय

पेट का यूँ गायब हो जाना 
किसी शेर के जंगल से गुम हो जाने से भी बड़ी त्रासदी है 
त्रासदी नहीं। उसमे तो शास्त्रीय दुःख होगा। पीड़ा होगी।
और इस पर तो उसका अधिकार भी नहीं है।

वैसे यह ऐसी पीड़ा भी नहीं है 
कि कोई कम्पनी उसे अपना ब्रांड अम्बेसडर बना ले।

इसे कुछ और कहूँगा। फिर कभी।

वैसे किस कोतवाली में इस गायब हुए पेट की रिपोर्ट लिखी जाएगी??

2.
यहाँ मेरी भूमिका किसी फिल्म के हीरो की तरह 
हो जानी चाहिए थी। पर नहीं हुई। 

होती कैसे? 
जेब में रियायती पास लिए सरकारी बस की खिड़की पर डटा रहा

कुछ दिन लगातार उसे देखता रहा 
सोचा
मुक्तिबोध जिसे रचना का तीसरा क्षण कहते हैं
उसके पास पहुँचने ही वाला हूँ 
तब लिखूंगा एक कविता

और यहाँ तक पहुँचने में लग गए चार साल
रेड लाइट वहां अब भी है 
कभी कभी खुद भी उसी रस्ते पर चलना हो जाता है 
पर नहीं दिखाई देती वह 

पता है आज भी कुछ नहीं कर पाउँगा 
पर कुछ देर उससे बोलता बतलाता ज़रूर

पूछता नहीं कौन है उसके बच्चों का पिता 
पूछता कहाँ है उसके बच्चे 

3.
वह कोई नायिका नहीं थी
जो मेरे सपनों में आये
जैसे कई लोगों के सपनों में रोज़ नायिकाओं की हाज़री लगती आई है
उसके चहरे का बचपन याद आ जाता है कभी-कभी
मेरी ही उम्र की रही होगी
या मुझसे कुछ छोटी ही।

एक रात अचानक उठ बैठा 
इसे सकपकाना लिखूं या हड़बड़ाना या कुछ और 

पिछले ही पल दिखाई दी थी वह मुझे 
अपने बच्चों के साथ

जन्तर मन्तर पर मिली
अनशन पर बैठने नहीं जा रही थी
पूछने से पहले ही बोली 
सीधे जहाँगीर पुरी से आ रही हूँ, एक सौ इक्यासी में

और कहने लगी मैं भी जा रही हूँ संसद
घेराव करने नहीं। सवाल पूछने नहीं।
जवाब देने।

आगे कुछ लिखुँगा तो मुझे भी पकड़ ले जायेंगे 
जैसे उन्हें ले गए। और थोड़ा डरता भी हूँ।
इसलिए 
बस इतना कहूँगा, उनके हाथ खाली नहीं थे। 
न उनके हाथों में जो थे वो दिवाली के खिलौने लग रहे थे।

मार्च 02, 2013

दरगाह मेले के बहाने से..

आज भी हमारे चाचा लोग लम्बे सफ़र पर सायकिल से ही निकलते हैं। चाहे नानपारा जाना हो या भिन्गा। बहराइच तो हफ्ते में दो तीन बार सौदा लेने तो जाते ही हैं। हम भी इसी सायकिल की शरण में जा पहुचते हैं। कौन उन बढ़ते किरायों पर डीज़ल के दामों का पैबंद लगाये। जब मन किया जहाँ मन किया रुके छाँव में सुस्ता लिए बिस्कुट खा कर पानी पी रपट लिए। वहीँ अगर गाडी बस से जाओ तो पहले घंटा भर इंतज़ार करो। कब आएगी, कब चढ़ेंगे।

कभी गिलौला जाना भी होता है तो नहर नहर लेंगड़ी गूलर होकर ही जाते हैं। अब वहां न तो शहरों जैसी सड़कें ही हैं न उनके किनारे किनारे खम्बों पर टंगे लट्टू। स्ट्रीट लाइट गाँवों को बिजली पहुँचाते खम्बे भी नहीं होती। इसलिए भी वहां सायकिल सवारों को उन रात में निकलने के लिए वो रातें चुननी पड़ती हैं जब आसमान में चाँद चमक रहा हो। वरना पिछली बार दूसरी तरफ से आती सायकिल कब हमारी लें में घुस गयी और हमारी सायकिल से टकरा गयी थी।

इस बार भी पिछले सालों के अनुभवों को संज्ञान में लेकर इस बार भी दरगाह माला रात में घूमने की बात तय हुई। साढ़े नौ वाला शो देखेंगे फिर मेला घूमेंगे।..खाना खा चुकने के बाद करीब सवा आठ बजे पैर-गाड़ियों की सेटिंग देख हम लोग रवाना हुए। चिचड़ी चौराहे से आसाम रोड़। आसाम रोड़ से बायपास लेकर नयी बख्शीपुरा बस्ती से होते हुए रेलवे क्रॉसिंग पार करते कराते अस्पताल मोड़ पहुँचे। और वहां से 'कुमार पिक्चर पैलेस'।

फिल्म लगी थी 'जन्नत'. हॉल में फिल्म देखने हम घुसे तो सात लोग थे पर बीच में देखा तो पाया कि चार तो मधुर निद्रा में लीन हैं। बार बार जगाने पर भी उनकी तपस्या में कोई व्यवधान पड़ा हो ऐसा नहीं लगता क्योंकि हर बार जगाने के बाद भी वह आँख मूंदे परदे पर देख रहे होते। फिल्म का मेन किरदार इमरान हाशमी मैच फिक्सिंग का शातिर खिलाड़ी है। पर क्रिकेट कितना जानता है इसकी बानगी एक डायलॉग में साफ़ दिख जाती है जहाँ यह विशेषज्ञ एक खिलाड़ी को प्रलोभन देते हुए कहता है, "यहाँ तो आपको लॉन्ग लेग दिख रहे हैं (पीछे एक लड़की नंगी टांगो के साथ खड़ी है, उसे देखते हुए) हम आपको उस जगह ले चलते हैं जहाँ शॉर्ट लेग के साथ साथ स्लिप भी होगी।" और वे दोनों एक डांस बार में दाखिल होते हैं जहाँ विचित्र काया युक्त स्त्रियाँ अपने नृत्य का दैहिक प्रदर्शन कर रही थीं।..यदि महिला आयोग स्त्री छवि के प्रति इतना ही सजग होम चाहता है और कड़े कदम उठाने की सोच रहा है तो क्या वह ऐसे दृश्यों को फ्लिमों में सिर्फ दर्शकों के साथ देखता रहेगा या कुछ चिल्ल पौं भी करेगा; यह संघर्ष देखने वाला होगा।

खैर, शो करीब बारह बजे ख़तम हुआ और हमें लगा अभी इतना ही बजा है। सिनेमा हॉल से सायकिल उठा हम दरगाह की तरफ चल पड़े। पैदल नहीं उसपर बैठ कर। दरगाह मेल हर साल जेठ में लगता है। हर इतवार बरात आती है। महिने भर वह जगह गुलज़ार रहती है। जंजीरी दरवाज़े को लोग चूमते, हलवा परांठा खाते मेले की दुकानों का लुत्फ़ उठाते हैं।

पर दरगाह के अलावा भी खूब मेला रहता है और कईयों के लिए तो यही मेला है जहाँ 'शोभा सम्राट' जैसे महलनुमा थियेटर मौजूद थे। जहाँ पता नहीं कहाँ कहाँ से लायी गयी लडकियां नृत्य प्रदर्शन करती हैं और दर्शकों का एक ही ध्येय होता है उन (पतुरियों) की अदाओं, अंग प्रत्यंगों पर मर मिटना। इसका एक सहचर भी है पर यह पूरी रात हाथ पर थियेटर की मुहर लग जाने के बाद बराबर अन्दर बाहर जाने की स्वतंत्रता नहीं देता। यह वाला संस्करण उससे थोड़ा सस्ता और उन लोगों के लिये रहता है जो पूरी रात वहीँ नहीं गुज़ार सकते। इसमें पाँच गानों की श्रृंखला होती है। पर ध्यान रहे जितना भाषा के स्तर पर मैं संस्कृत निष्ठ होता जा रहा हूँ अपने मूल स्वरुप में यह उतने ही आदिम होते हैं।

मौत का कुआँ देखने वालों की भी कोई कम तादाद नहीं होती। कुछ जो अपनी पत्नी, बच्चों और छोटी सालियों के साथ उन मेले में आते हैं उनके लिए 'शोभा सम्राट' जैसे कार्यक्रम जले पर तेज़ाब छिड़कते हैं। वहां विवाहिता की उपस्थिति में जाने के अपने खतरे हैं इसलिए भी वे बेचारे अपने स्वर्णिम 'कुँवारे युग' की वीथियों में घूम घूम मातम मन रहे होते हैं। वे मुँह लटकाए चुपचाप पी सी सरकार की तर्ज़ पर आये किसी जादूगर के जादू को देखने पहुँचते हैं। या सर्कस वाले खुद को महानतम बताते हुए बड़ी सी जगह छिकाये मिल जाते हैं। इस बार का सर्कस था 'ग्रेट पद्मा सर्कस'..

जब इन सबसे मन ऊब जाये तो चाट पकौड़ी की दुकाने दूधिया रौशनी में आपका स्वागत ही नहीं करती बल्कि स्वयं को भारत की सबसे 'पवित्र' और सर्वाधिक प्रसिद्ध देशी घी से युक्त दूकान बतलाते हुए प्रचार करते बोर्ड लगाये रखती हैं। साफ़ सफाई का आलम यह के भिनभीनाती मक्खियों के साथ कुर्सी टेबल की मूक लड़ाई देखते हुए आप खुद चल कर आप विराजे। कुछ ऑर्डर करें। फिर जब जीभ भी खा खाकर उकता जावे तब मन बहलाने के लिए झूले किस मर्ज़ की दवा नहीं हैं। बचपन में बचपन सहता बच्चा भी झूलों को उतना इंजॉय कर सकता है जितना कि उसके माता पिता उसे सहते हुए।

बात बात में हम सात तो कहीं गम ही हो गए इन्सबके बीच। हम सातों में हम पांच भाई (दो हम तीन दादा के लड़के) एक फूफ़ा और एक चाचा। सात में से तीन का ब्याह हो चुका है और इस जुलाई में हमारे सबसे छोटे चाचा को देखने उनके घर का मुआयना करने लड़की वाले पधार रहे हैं। इसलिए इस बार उनके चहरे पर एक असहज सी चिंता की रेखा तो थी ही कि कहीं रिजेक्ट न कर दें; इसी उधेड़बुन में उन्होंने अपने यहाँ पीछे की तरफ छप्पर छवाया है। वह भी इस शर्त के साथ कि बिफय को नाय छावा जात हय..!!

तो इन्ही सब के दरमियान दरगाह मेले से लौटते लौटते डेढ़ तो बज ही गए थे। चन्द्रदेवता आकाशमग्न होकर चिर अन्धकार को हर रहे थे। पर जब हम आसाम रोड़ पहुँचते उससे पहले संदीप की पैरगाड़ी बार बार चेन का साथ छोड़ रही थी। शायद कह रही थी कि जैसी तन्मयता से तुम मुझे बहराइच लाये थे वैसा आनंद अनुभव अब क्यों नहीं हो रहा। ..तुम्हे यह नहीं पता के जल्दबाज़ी में वह कोमलता गायब हो जाती है। जब भी चेन उतरती और हम सबको रुक जाना पड़ता तब तब दिल कुछ और बैठ जाता। क्योंकि जिस सड़क से हमें वापस लौटना था उसके कई कई किस्से हम सबने कुछ ज़यादा कुछ कम सुन रक्खे थे।

{यह वाला टुकड़ा उन आगे आने वाली तीन चार किश्तों में से पहला है। इसकी तारीख है अट्ठाईस जून दो हज़ार आठ। एक दो पीछे भी लिखी हैं उनके लिंक यह रहे : सिनेमाघर वाया शहर दिल्ली जिला बहराइचश्रावस्ती की सैरदिल्ली का सूरज पता नही इतनी दूर क्यों है..। }

आवाज़ें..

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