अप्रैल 30, 2013

क ख भाषा संवाद वाया फ़ेसबुक

आगे की सुविधा के लिए लिख दूँ के 'क ' आलोक है और 'ख ' मैं। 'क' इन दिनों अपने घर हैं। अपन दिल्ली।  बात हो रही है फ़ेसबुक के ज़रिये। वहाँ की अपनी समस्याएँ हैं, फिर भी बातें होती हैं।  कुछ सूत्र हैं। आगे कभी काम आएंगे। इसलिए आज की आज इसे यहाँ पोस्ट किए दे रहा हूँ। क्या पता आपके भी कुछ काम आजाए..इसलिए थोड़ा ध्यान से..और बात अभी खत्म नहीं हुई है..

: कहाँ हो पंडित ?

: यहीं अभी तो दिल्ली ही हैं..जल्द कूच करेंगे।

: ये कूच करना भी हद शब्द है ! पहले सेना आदि के अभियान के लिए प्रयुक्त होता था और आज तुम्हारे जाने के लिए !

: अब क्या कीजे। भाखा है।

: नहीं नहीं ये हम हैं जो भाषा को बरतते हैं फिर कहते हैं कि ये बहता नीर है !

:  बरतने को ही तो कहा वह बह रही है।

: किस प्रकार ? विस्तार दो ! और छात्रवृत्ति और स्कॉलरशिप के अर्थ अलग अलग हैं क्या ?

:  अगर मैं या हम सब भी उन शब्दों को पीढ़ी दर पीढ़ी अपनी जुबान बनाते हैं उसका उपयोग करते रहे हैं उन्हे बेदखल नहीं करते हैं, तब वे हमारे साथ है। हमें नव भारत टाइम्स नहीं होना।

: अर्थ में अंतर है नहीं ये बताओ..और भाषा के संबंध में मेरा कहना है कि उसकी काट छांट हम ही करते हैं और उसमें भी सत्ता की भूमिका मुख्य होती है !

: अर्थ तो भिन्न हैं ही छात्र किस संस्कृति का शब्द है किन संदर्भों में उपयोग होता रहा है। स्कॉलर कहाँ से किन संरचनाओं का मामला है..आगे तो आप विद्वान हैं..

सत्ता कैसी यह देखना होगा। और सिर्फ इतना ही नहीं। हम उन लोकों से किन तरहों से बरतते हैं। उससे जुड़े रहते हैं या नहीं। तकनीक, समय, परिस्थिति से हम कितने मौके उनके लिए निकाल बना पाते हैं। सब बातें उतनी ही ज़रूरी हैं। जहां तक मुझे लगता है..

: तुम्हें नहीं लगता सत्ता किसी भी तरह की हो उसका सत्ता होना ही पर्याप्त है ! दूसरे ये सब तो सत्ता से जुड़े ही हैं शायद ही बाहर के किसी तत्व की इतनी भूमिका है !

: यहाँ फिर यह देखो के हमारे यहाँ वाचिक परम्पराएँ किस रूप में पहले थीं। क्या उनका स्वरूप वही रह पाया है। या यह के जो छात्र छात्राएँ इधर दिल्ली के स्कूलों में आरटीआई के आने के बाद दाखिल हुए हैं उनके भाषिक कौशल कैसे हैं। उनमे पैनापैन है। मतलब शिक्षित होकर ही हम इन दिनों सत्ता में बने रह सकते हैं।

: आज के समय में भी यह भाषा को अपने ही तरीके निर्धारित कर रहा है ! आरटीई को भी सत्ता ने ही अपने तरह से सब कुछ निर्धारित करने के लिए लगाया !  अन्यथा इसका शैक्षिक महत्व तो जाहिर ही है ।

 : पर जो बात ऊपर शिक्षा के अधिकार के अलावे भी थी उसका नज़र अंदाज़ हो जाना क्या इस बात का सूचक नहीं है के हम हमारी वरीयता में उसका मूल्य और स्थान अब बात करने लायक भी नहीं रह गया है। इसे ध्यान से पढ़ने और जवाब देने की ज़रूरत है..

: मैं इसे शिक्षा को बेदखल करना नहीं मानता हूँ बल्कि शिक्षा पर से बोझ हटाना मानता हूँ ! हाँ लेकिन यह इतना मासूम हो ऐसा नहीं है । शिक्षा को यदि इस तरह से परे किया जाता कि इसके बदले कौशलों के विकास पर ध्यान हो और स्थानीय ज्ञान को समृद्ध किया जाए तो शिक्षा का हटना बुरा नहीं लगता । बल्कि इसे अपूर्ण तकनीकी ज्ञान और अस्थाई वैश्विक बाजार के माध्यम से बेदखल किया गया !

: साजिन्दे जो गली गली कूचे मोहल्ले आते जाते थे, नौटंकियाँ होती थी। लिल्ली घोड़ी से लेकर दैवीय चरित्र हो आते जाते लोगों से मांगना। लोबान जला कर दुकानों पर जाना उन फकीरों को क्या भाषा के साथ रखा जा सकता है..??

: बॉस इसे रखने में क्या परेशानी है ! बस हमारे आपके बरतने से बाहर होने से इसे बाहर मान लिया जाए ? और इसे बाहर कर के हम लेकर क्या आए हैं ये देखो न !

: इस बेदखल किए जाने में कहीं न कहीं समाज की भी मौन स्वीकृति उतनी ही है जितनी सत्ता की मुखर उपस्थिति। देखते ही देखते कौशलों को स्थापित कर दिया गया जो सिर्फ किसी फर्म के लिए ज़रूरी काम कर दिया करें। दिक्कत यहीं से शुरू होती है जो इधर दिल्ली विश्व विद्यालय तक जा पहुँची है..

अप्रैल 28, 2013

वो जो गाँव जाना था : किश्त एक

{एक एक कर उन पुराने पन्नों से गुजरना थोड़ा रूमानी तो करता ही है। हम इस जल्दी में होते थे के जल्दी से जल्दी वो गाँव जाने वाला दिन आ जाए। फिर तो बस..इंतज़ार को पहली मर्तबा हमने तभी जाना होगा..उसी पुरानी डायरी से तबकी गाँव गए थे उसके बारे में आकार लिख लिया था। उसे लिखने का पहला प्रयास ही कहेंगे, उससे ज़ायदा कने पर रिस्क हमारे जिम्मे नहीं । आप भी देखिये हमारा बहराइच। पर इस बार इसकी किश्त तीन बन पड़ी हैं। आगे उनका लिंक भी लगा दूंगा। फिलहाल दिल्ली से चल पड़ते हैं..}

24.07.2002 यह तारीख़ सबसे आखिरी में लिखी थी। दिन पता नहीं।

हमारा सुबह सुबह तालकटोरा जाना तो छूट ही गया था। टीम टूट ही गयी थी। हम पार्क में खेलते थे। इसमे कुछ मज़ा नहीं आता था। हम गाँव चार मई मंगलवार को नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से रात आठ चालीस पर गोरखधाम एक्सप्रेस से गए। हम गोंडा सुबह साढ़े सात बजे तक पहुँच गए। उन दिनों रेलों का आना जाना शायद नही हो रहा था। उसी दिन से दुबारा प्रारंभ हो रहा था।

पापा टिकट लेकर आए फिर हम छोटी लाइन वाले प्लेटफॉर्म पर गए। वहाँ एक ट्रेन पहले से खड़ी थी। जिसमे लोग पहले से बैठे हुए थे। पर हमें यह मालूम नहीं था कि ट्रेन कभी जाएगी भी या नहीं। तभी नौ बजे के आस पास एक नयी ट्रेन प्लेटफॉर्म एक पर आती है। पर हमें डिब्बे में जगह नहीं मिलती। हम लगिज (माल वाले) डिब्बे में चढ़ गए। मैं ज़िंदगी में पहली बार इसमे सफर कर रहा था। कोई खिड़की नहीं कोई दरवाजा नहीं। मैं अटैची पर बैठा था। मेरे बगल में एक व्यक्ति कन्नौज इत्र लेकर जा रहा था। वह मज़े से सो रहा था।

हम ग्यारह साढ़े ग्यारह बजे तक बहराइच पहुंचे। फिर एक रिक्शे वाले से हमने बस स्टैंड तक पहुंचाने को कहा। वहाँ से हमें गाँव की तरफ़ जाने वाला तांगा मिल गया। वह केले लेकर जा रहा था। उसका मालिक भी हमारे साथ था। केले का झाऊआ था। केले छोटे थे पर खूब मीठे थे। माने ही आठ केले खा डाले। 

हम साढ़े बारह एक बजे तक सड़क पहुँचे। हमने वहाँ वीसीडी प्लेयर देखा। उस पर उन्होने धर्म-काँटा फिल्म लगा कर हमे दिखाई। डेढ़ बजे लाइट ही चली गयी। हमें पहले कुछ दिन मज़ा नहीं आया। लेकिन धीरे धीरे मज़ा आने लगा। वहाँ पर सुबह और रात तो बड़ी जल्दी कट जाती थी पर दोपहर काटना और वो भी एक से चार बजे तक का टाइम काटना बड़ा मुश्किल हो जाता था। दो दिन हम परसौरा वाली रोड पर गए। हम वहाँ एक गिरे पेड़ पर बैठे जोकि जीवित था। एक दिन मैं और भाई गए। भाई आठ जाजू वाले लेकर गया था। और गरी, सौफ़ वाली डिब्बियाँ। दूसरे दिन संदीप भी हमारे साथ था।

कभी-कभी हम भई सड़क पर चले जाते थे। एक सुबह हम पापा को चाचा के साथ छोड़ने गए। वहाँ एक सड़क थी अभी अभी अभी बनी थी वहाँ आम के पेड़ पर लटककर मैं झूलने बड़ा मज़ा आ रहा था। फिर आधे घने बाद हम पापा को छोड़ रतनापुर गए। वहाँ चाचा ने समोसा सुहाल चाय पिलाई। फिर हम वापस हो गए। हम बारह एक बजे घर पहुँचे। जब मैं गाँव पर सोता था तब पौने सात सात बजे ही उठ जाता था। और जब सड़क पर सोता था तो साढ़े पाँच छह बजे ही उठ जाता था। तब उठकर मैं चक्की पर जाकर डब्बा लेकर मैं शौच करने चला जाता था। एक घंटा वहीं चक्की पर बिताता था।

पापा एक हफ़्ते बाद काम पड़ने के बाद दिल्ली वापस आ गए। उसी बीच भाभी की बहन वहाँ आई घूमने। हमारा भी मन था दिल्ली आने का। लेकिन पापा इलाहाबाद होकर दिल्ली आए थे। मैंने वहाँ वीसीडी प्लेयर पर कई फिल्में देखी जैसे जानी दुश्मन, धरम काँटा, नदिया के पार। डीडीएलजे की कैसेट ही खराब थी तीनों। हमारा प्लान राज़ देखने का भी था पर बैटरी न आने के चक्कर वह रह गयी। हम उसके अगले दिन वापस आने वाले थे दिल्ली। हमने सोचा अगली बार देखेंगे। जानी दुश्मन मैंने पूरी तथा पहली सीडी फिर से देखी। हम तो स्पाइडर मैन लाने के चक्कर में थे पर किसी कारण नहीं ला सके।

{आगे की दो कड़ियाँ: दूसरी: तब जो मेला देखा थातीसरी: वो जो साइकिल से जाना था }

अप्रैल 24, 2013

सपनों की डाड़ के सहारे कुछ देर सुस्ताते मील के पत्थर

तो हमारी बस ऐसे ही किसी दिन सड़क किनारे खड़ी है। शायद पेट्रोल ख़त्म हो गया है। गर्मियों के मौसम में इस बार फ़रेन्द खूब आए हैं। इस दरमियान जबतक किसी गाड़ी को रोककर उसपर सवार होकर कंडक्टर खाली पीपा भर कर लाये तब तक क्या किया जाए। यही सोच अधिकतर पुरुष यात्री बस से नीचे उतर गए। लगे उठा उठाकर अद्धा मारने। कुछ समझदार किस्म के दिमाग वाले लोग भी थे जो बस की छत पर चढ़ गए और डाड़ हिलाने लगे। पता नहीं जब भी यह चित्र मेरे सामने आता है तब उसमे न जाने कहाँ से बादल भी आ जाते हैं। बरसते नहीं हैं। बस ढलते सूरज को ढक लेते हैं। हवा बहने लगती है। कुछ ठंडी ठंडी सी।

उन दिनों हम भी बहुत छोटे हुआ करते थे। पर मौका लगे डरते डरते नीचे उतर लिए हैं। सड़क का डर अभी भी है। के कहीं से भी गाड़ी आ जा रही हैं। इसलिए पार नहीं करते हैं। जिस तरफ़ बस खड़ी है उसी तरफ खड़े नज़रों से एक दो बच गए फ़रेन्द उठा लेते हैं। खाते हैं या नहीं देख नहीं पाते। आज जब भी इस तरह किसी जगह को सोचता हूँ या बेमौके खयाल आ जाते हैं। तब यह बस मुझे खाली सड़क के किनारे थोड़ा नीचे उतर के दूर पीछे से खड़ी दिखाई देती है। और शायद तभी से दिल में बैठ गया है के कभी मौका मिला तो ऐसी ही कहीं सुनसान सड़क किनारे अपनी गाड़ी खड़ी कर देंगे। आराम से फुर्सत के कुछ पल समेटते वहाँ थर्मस में भरी चाय की चुसकियाँ होंगी। कुछ दिल के करीब साझेदारियों वाले लोग होंगे। कहीं पहुँचने की जल्दबाज़ी नहीं। खूब इतमीनान के साथ।

सड़कें हमेशा ऐसे ही खींचती रही हैं। कहीं कोई तस्वीर देखी नहीं के जगह का पता लगाने लगता। चार पाँच मर्तबा ऐसा हुआ भी है पर उसमे मेरी भूमिका नगण्य सी ही रही है। इस फ़रेन्द वाली याद के आस पास वाले दिन होंगे। हमारी बस अहमदाबाद पहुँच चुकी थी या कोठपुतली के आस पास से गुज़र रही थी। हम सबसे पीछे वाली सीट पर थे। बस टू बाय थ्री थी। खिड़की साफ़ इतनी नहीं भी थी पर पीछे भी शायद कोई बस थी। और हम हाथ हिला हिला कर उन्हे सड़कीय अभिवादन कर रहे हैं। खूब चिल्ला भी रहे हैं। तभी हमारी तरफ से कोई बुज़ुर्ग कहते हैं ऐसे नहीं चिल्लाते। घुड़की खा कर हम सब चुप्प। अब सिर्फ देख रहे हैं। घुटने के बल। मुँह अभी भी पीछे की तरफ़ है। सड़क कैसे भाग रही थी। मुड़ रही थी।

उसी याद में संगमरमर के पहाड़ों के बीच इतनी तेज़ी से ड्राइवर बस मोड़ता कि सवारियों के दिल बैठे से जाते। पर हम मज़े में थे। रात को ड्राइवर बादल जाता तब लोग सुकून से सोते। वे पुलिस में हवालदारी से रिटायर हुए थे या ड्राइवर ही थे वहाँ। इतमीनान से गाड़ी भागती। सड़क से चिपके चिपके। वे उसे उड़ाने के पक्ष में थे ही नहीं। फिर अलवर वाले दिन हैं। जहां अरावली हमारे साथ साथ चलती। बड़ी दूर दूर तक। हमारे स्कूल की मेटाडोर छोटी थी पर उसमे होते सब जान पहचान वाले। कन्या गुरुकुल दाधिया। कई साल लगातार ऐसे इतवार अक्तूबर नवंबर में आते रहे। बेनागा। दिन ठंडे इतने नहीं होते थे। फिर भी सुबह पाँच छह बजे के हिसाब से स्वेटर पहन लेते थे।

ऐसे ही एक सड़क है। उसे सुनसान कहना ठीक नहीं होगा। फिर भी बहुत खाली है। हमारे सिवाय वहाँ कोई नहीं है। हम भी कम नहीं पूरे तीस के आसपास थे। मनाली रात रुककर अगली सुबह मढ़ी होते हुए रोहतांग पास पहुँचे। पर वो जो सड़क किनारे बस खड़ी करने वाली छवि थी वह यहाँ की नहीं नीचे उतर कर कोक्सर की हैं। जहां से रोहतांग की बर्फबारी से ठंडी हवाएँ नीचे आरही थी। और हम चन्द्र नदी के किनारे रुके हुए थे। बिलकुल जैसे सपनों में होता है। दूर दूर तक सिर्फ और सिर्फ हमारी बस खड़ी है। न कोई आ रहा है न जा रहा है। हम कभी नदी की तरफ हो रहे हैं, तो कभी पहाड़ को काटकर बनी जगह में ढाबे में मैगी खा रहे है और कई उस ठंड में पाउडर के दूध की चाय पी रहे हैं। बाहर सड़क का रंग बिलकुल काला है। धूप पड़ती है। पर उसे भूरा नहीं कर पायी है। दिल्ली की सड़कों से जायदा खुरदरी है। आवाजही कम है न।

आगे कुछ लिखने का मन नहीं हो रहा। कुछ देर वहीं रह जान चाहता हूँ। बिलकुल अकेले। उनमे जो मेरे आस पास हैं भी उनकी आवाज़ सुनाई नहीं दे रही है। बस वहाँ नहीं का बहना है। मैं हूँ। हवाएँ हैं। थोड़ी देर रुके रहना चाहता हूँ। भूरा बादल जू डरवावय, काला बादल पानी लावय। उन सारे सपनों उन सारी छवियों में सीधे एक बारगी कैसे चला जाऊँ। थोड़ा ठहर कर देख लेना चाहता हूँ। उन सबको। वे सब बिलकुल थम से गए हैं। जैसे फूलों का खिलना थोड़ी देर स्थगित हो गया हो। सूरज उग नहीं रहा है। मुझे देख रहा हो जैसे।

लिखना विखना तो चलता रहता है फिर कभी आऊँगा अभी जारहा हूँ छत पर..जो पीछे जाना चाहें ज़रूर जाएँ..

अप्रैल 23, 2013

पर्देदारियों वाली साझेदारियाँ मतलब जो बातें छिपाता रहा हूँ

कमरा था। मेज़ थी। मेज़ पर डायरी रक्खी थी। मैं नहीं था। यही था शनिवार। घर पर थोड़ा देर से पहुँचने वाला था। एक तरह से आकस्मिक तौर पर मुझे लौट आना पड़ा। मना क्यों नहीं किया समझ नहीं पाया। चलो कोई नयी, चलता है। कुछ साझेदारियाँ ऐसी भी सही। पर दिक्कत मुझे यहीं हैं। और इस बार जितना व्यक्तिगत तौर पर मुझे महसूस हुआ उसके पीछे जाने के लिए ‘पर्सनल’ हो जाना होगा। दिल विल भी दुख सकता है। कमज़ोर दिल वालों से अनुरोध है के आगे एक क़दम न बढ़ावे। पुलिहा कमज़ोर है।

तो कभी नहीं चाहा था के मेरी गैर-मौजूदगी में कोई मेरी उन बातों को जान जाएँ जो हिम्मत करके लिख दी हैं। उनका वहाँ ऐसे सुविधाजनक अवस्था में होना कई स्वतंत्रताओं का खुला निमंत्रण नहीं था के पीठ पीछे उन पन्नों से गुज़रा जाए। वह कोई बाग बगीचा या एमसीडी का म्यूनिसिपल पार्क का बैंच नहीं है जिसपर वक़्त गुजारने की गरज से बैठ गए। उनका वहाँ होना ‘पब्लिक स्फेयर’ में आ जाना नहीं है। वह सिर्फ और सिर्फ मेरे लिए ही थी कम से कम जबतक ऐसा कुछ करने का मेरा मन न हो। वह मेरा ‘स्पेस’ है। इसका एक मतलब तो यह भी हुआ के जो बातें मैं तुम्हें या किसी को नहीं बता रहा हूँ उसमे लगातार तुम्हारी दिलचस्पी बनी रही है। वो तो अच्छा हुआ के पीछे की सारी डायरियाँ वहाँ से हटा ली हैं।

पता है बात यहाँ से क्यों शुरू की है क्योंकि पीछे भी ऐसा हुआ है। तुम्हारी हमेशा आकुलता व्याकुलता इसी बात को लेकर बनी रही है के इस लिखे हुए में तुम्हारी मौजूदगी कितनी है। कितनी बार कहाँ कैसे कब मैंने तुम्हारे बारे में लिखा। अगर तुम्हें कहे पर यक़ीन ही नहीं होता तभी तो तुम उसके पीछे जाने को आतुर रहते हो। के कई सारी बातों पर परदेदारी है। जो असल है वह बताया नहीं जा रहा है। छिपाया जा रहा है। मुझे पता है मैं कभी भी तुम्हारा राज़दार नहीं था। तुम तो नीम हकीम खतराय जान के संपर्क में ज़ायदा रहते हो। दाँत कटी रोटी बोटी का साथ है। मैं तो वैसे भी क्षेपक की तरह एक चिप्पक ठहरा।

और तुम। तुम कहते हो के मित्रता में परिसीमन हो जाना चाहिए फिर तो। तब मेरे दोस्त बेचारे अगर ऐसा न करके यदि तुम चलते हो तब तो गड़बड़ है। वैसे लगता नहीं है के तुम ऐसा नहीं करते। उस दिन तुम कह रहे थे के मैं तुम्हारी बातों को तो जानने के लिए बार बार कुरेदता हूँ पर जब अपनी बात आती है तो चुप मार लेता हूँ। ऐसा है क्या। मुझे नहीं लगता। हाँ यह ज़रूर है के उसकी टाइमिंग थोड़ी दुरुस्त न हो पर कहता सब हूँ। वैसे यह मैं तय नहीं करूंगा के किसे क्या बात बतानी है, किसे कब क्या नहीं बोलना है; तब तुम हठ कर रहे हो के मैं तो खुली किताब हो जाऊँ। जिसे जब चाहे कोई भी पढ़ ले। ऐसा शायद तुम चाहोगे। मैं नहीं।

पता नहीं मैं सही लिख रहा हूँ के गलत पर हम सब दोस्तियों में लगातार एक दूसरे को नापते तौलते रहते है। किससे कितना निकट होना है किसे क्या बात कहनी है किसे अभी नहीं कहना है। यह दूरी जितनी भौतिक है उससे कहीं ज़ायदह मानसिक। कम से कम मेरे लिए तो यही है। उस दिन जा तुमने कहा के मैं अपनी बातें छिपा रहा हूँ तो समझ नहीं पाया क्या छिपाया है। यही के उस दिन दिल्ली किसके साथ घूम रहा था। चलो एक रात पहले नहीं बताया ना सही। पर फोन पर तुम्हें मालूम तो चल गया था ना। फिर इतनी तरह से पूछने का मतलब क्या था। खैर। फिर तुम जो कह रहे थे के मैं अपनी तरफ़ से छिपाता हूँ, तो मित्र अगर हम लगातार इतना मिलते हैं। हर बात कम से कम तुम तो मुझे बता ही देते होगे। फिर जिस पर्चे को देकर तुम आरहे थे वह क्या तब भरा गया था जब हमारी मित्रता शैशवकाल में थी। फिर ऐसा कई मर्तबा हुआ के तुम लोग पर्चे देते रहे और उन नतीजों के इंतज़ार में पतराते रहे। यह तो बहुत ही छोटी सी बात है। मुझे फरक नहीं पड़ता के तुमने नहीं बताया। पर दोस्त यह कहना नहीं था के मेरी तरफ से बाड़ेबंदी कुछ मज़बूत की हुई है।

इतना ही नहीं तुम तो भविष्यदृष्टा बनकर आने वाले दिनों की कल्पना करने में भी तल्लीन हो गए। मैं कैसा होने जा रहा हूँ। कैसा नहीं रहूँगा। तुम सब बोले जा रहे थे। बेजान दारुवाला ने तुमसे ट्रेनिंग ली है उसी दिन पता चला। मैं स्वार्थी लीचड़ आत्मकेन्द्रित और पता नहीं क्या क्या हो जाने वाला हूँ। इसलिए मुझे लिखना भी छोड़ देना चाहिए। एक तरफ़ तो समाज को कंधे पर लिए डोलता हूँ ऊपर से खुद वैसा नही हूँ तो यह फाँक तुम्हारी कोमल आँखों में गड़ रही है। तुम्हारी तरह के दो-चार शुभचिंतक पहले मिले होते तब तो अपना बेड़ा पार कब का हो चुका होता। तुम आ गए हो तब भी नहीं कर पा रहा हूँ तो कुछ कमी मुझमे रही होगी।

वैसे यह मुझे तुम्हारे साथ रहकर ही पता लगा के मैं कम से कम इस गुण से सम्पन्न हूँ के मेरे सामने तुम्हारे जैसे अपनी सारी निजी बातों को -कथित तौर पर- आसानी से रख सकने में कोई झिझक नहीं करते। रखते। तुमने अपने सारे प्यार के कसमें वादे मुझे बता दिये हैं। अब कुछ भी बताने को नहीं है। अगर है भी तो वह मेरे हिस्से मेरे जिम्मे है। वहीं तुम गच्चा खा गए। गलत पात्र को सब बता दिया। अब वो तुमसे सब छिपा रहा है। ऐसा उसे लगे ना लगे तुम्हें ज़रूर लग रहा है। तो भईया किस मुगालते में जी रहे हैं। तुम्हें खुद पता है के तुमने कितना बताया और कितना कभी ना बताने के लिए रख छोड़ा। वो जो तुम्हारा मरीज़ है जिसे तुम बेनागा सलाह-पे-सलाह चेप मारते हो उसे जितना तुम्हारे बारे में पता है क्या उन सारे किस्से कहानियों को तुम मुझे कह गए हो। चलो हटाओ।

कभी कभी लगता है अभी भी हमारी साझेदारियाँ किशोरवय लड़कों की तर्ज़ पर राग आलाप रही हैं। उसमे किन्ही के पीछे छूट जाने की संभावनाएं भी लगातार बनी रहती हैं। और अगर ऐसा हुआ तो अपनी दोस्ती ‘रॉक ऑन’ बनाने से पहले तुम मुझे वहाँ नहीं पाओगे। इस सबके लिखे जाने के बाद जिसके खतरे सबसे अधिक जान पड़ते है। जहाँ हमें सबसे ज़ादा समझदार होकर रहना था वहीं हम लगातार बेवकूफी पे बेवकूफी करते चले जा रहे हैं। हम समझ नहीं रहे। अपने को जताने के न-मालून कम उम्र के नुस्खों पर अटके पड़ें हैं। बस यही लगता है मेरे हिस्से से यह दोस्ती अब कुछ कम ही रहेगी। आगे पता नहीं। और मेरी दिक्कत भी है जैसा सोचता हूँ बोलने से कई-कई साल पहले उसे लिख लेता हूँ। याददाश्त ठीक-ठाक काम न भी कर रही हो तब की यादगारी के लिए भी दिक्कत नहीं होती।

अप्रैल 20, 2013

नमक इश्क़ का

अपूर्वानंद रंगभूमि में शायद प्रेम पर ही कुछ कह रहे थे। सुचिता को स्पर्श से जोड़ बोले सोफ़िया और विनय दोनों एकांत में मिलना टालते हैं और एक दूसरे को छूते भी नहीं हैं। फिर उसके कई सालों बाद राकेश मिला। उसने कहा प्रेम छूने और न छूने के बीच का द्वंद्व है। खुद मैंने कितनों को छुआ या नहीं छुआ या कितना किससे कितनी बार प्यार किया इस पर पहुँचने से पहले कई और बातें हैं जो ज़रूरी हैं। इधर जितनी भी दो चार कहानियाँ पढ़ी, अढ़ाई-पौन उपन्यासों से गुज़रा, फ़िल्में देखी उन सबमे साला प्यार- माफ कीजिएगा 'प्यार' मेरी प्रेमिका का भाई नहीं है फिर भी उसे यही कहने का मन किया- हमेशा कोने में दुबका खड़ा रहा। छुपा छुपा।

वह शुरू होता है स्कूल में। ट्यूशन क्लास में। लड़की को देख भर लेने की चाहत के साथ। आकर्षण है। उसके पास थोड़ी देर अकेले में मिल छू लेना है। कुछ तो अपने मन की कह लेने का मन है। कि क्या सब सोच रहा हूँ तुम्हारे बारे में। तुम्हारी किताब के बीच में क्या रखने को जी कर रहा था। तुम्हें देखते ही कैसा कैसा होता रहता हूँ। 'जानकीपुल ' का किशोरवय लड़का आगे पढ़ने की गरज से कस्बेनुमा शहर से निकाल पड़ता है। पीछे रह जाती है किताबों के पन्नों पर छूटी कहानी। वो लड़की वैसे ही फ़र्स्ट आती रही। उसकी ख़बरें भी लगातार मिलती रहीं। जो पुल तब तक नहीं बना था अब बन गया है। और जो मन की जानकी थी उस तक जाता पुल अब इतने साल बीतने जाने के बाद भी दिल की किसी धड़कन के साथ वहाँ चहलकदमी करने लगता है। 'शाला ' फ़िल्म है इसलिए भी कुछ कुछ इसकी तरह होते हुए भी अलग है। यहाँ लड़का साथ पढ़ती लड़की को एक सुबह रोककर लड़का अपने दिल की बात कह देता है। वह अपने पिता को कह देती है। और लड़का अपने बाप से खूब पीटा जाता है। वह प्रेम नहीं कर रहा था लड़की को राह चलते छेड़ रहा था। प्रेम मारा जाता है। कि कहीं अम्मा को न दिख जाए। बाप को पता चल जाएगा तो पता नही..

प्यार कुछ कुछ हमारे हिस्से ऐसा ही है जैसे शहर में अचानक दंगे भड़क जाएँ और नायक बदहवास सा यह जुगत भिड़ाने में लगा रहे के किसी भी हालत में बुद्धा गार्डन कैसे पहुँचे। जहाँ उसकी प्रेमिका कुछ ही देर में पहुँच रही होगी। खतरा तब और बढ़ जाता है जब दोनों विधर्मी हों। 'अँधेरा ' कहानी ऐसी ही है। ज्ञानरंजन इस इंतज़ार वाली बात को छिपा ले जाता है और साइबर कैफ़े मालिक से इसी क्षण घर पहुँचने और पिता की बीमारी की आपातकालीन अपरिहार्यता को स्पष्ट करता है। हम हमेशा से ऐसे ही प्यार करते आए हैं। मो॰ आरिफ़ की 'चोर सिपाही ' तद्भव में काफी पहले पढ़ी थी। एक डायरी ऐसे ही दंगों की छाया में लिखी जा रही है। उसमे जिससे मन लग गया है उसके सकुशल घर पहुँचने की दुआएँ माँगी जा रही हैं। ऐसा नहीं है के एक ही धर्म के होने से प्यार में कोई बाधा नहीं आती। धर्म इतनी सरल संरचना तो नहीं है। उसमे जातियों के उपवर्ग है। अभी कथादेश के मार्च अंक में हुस्न तबस्सुम की कहानी 'तय्यब अली प्यार का दुश्मन ' पढ़ रहा था। लड़का लड़की दोनों मुसलमान हैं पर जिंदगी भर साथ नहीं रह रह सकते। सद्द्न कसाई का लड़का अबरार सेंडो बानियान में भागते भागते ही नसीम खाँ की बेटी नूरा से छुपकर मिलता। वह एक जगह कहता भी है दादी अम्मा, ये जातें मजहब से ज़यादह खराब होती हैं। यहाँ सारा मामला कसाई के खान न होने और खान के कसाई न होने का है।

पर इस प्यार की दिक्कतें और भी है। शायद पंकज मित्र की कहानी है। 'पप्पू कांट लव साला '। पता नहीं कहाँ पढ़ी थी। जिन जिन संभावित पत्रिकाओं में लगा उन्हे खंगाल लिया पर मिली नहीं। खैर। लड़का जो है उसका उड़ीसा (तब भी उड़ीसा ही था, ओड़ीशा नहीं हुआ था) के किसी इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला होना है। पैसे की तंगी है। पिता का गैराज इतना उठा नहीं सकता। यहाँ दोनों प्रेमियों के पास मोबाइल है। सम्प्रेषण की कोई समस्या नहीं। नंबर भी ठीक ठाक जुगाड़ से मिल गया लगता है। दोनों के बीच बातचीत मैसेज मैसेज से हो रही है। यह सीधे बात न होना ही इसका ट्विस्ट है। प्रेम आपको संकटकालीन अवस्थाओं में संबल देता है। वह नायिका भी दे रही है। पर वहाँ प्रेम तभी तक रहता है जब तक वह पर्दे के पीछे है। जैसे ही पता चलता है फोन बंबई से नहीं आ रहे थे और जिस लड़की को वह भाव नहीं देता था वही उसी के मोहल्ले की लड़की है तब उसका पारा चढ़ जाता है। कहानी खत्म। मतलब जिससे हम प्यार करना चाहते है उसका भी उधर से वैसा ही रिसपॉन्स न मिले तब दिक्कत है।

पर मन में यह सवाल बना रहता है के इस प्यार की परिणिती कहाँ होगी। मतलब किस मुकाम तक यह पहुंचेगा। यह प्रयोजनवादी हो जाना है के किस ध्येय को लेकर आप प्रेम करने चले थे या इस रूप में ही यह आकार लेता है। मतलब यह दोनों को कहाँ तक लेकर जाएगा। अगर मान लें शादी उनमे से एक अनंतिम लक्ष्य है तब 'दुष्यंत की कहानी  ' में नायिका शादी से इंकार क्यों कर देती है। उसका तर्क था के वह अपनी गर्भावस्था को वैध बनाने की गरज से उसे शादी नहीं करनी। यह कॉल सेंटर में काम करने वाली पीढ़ी की एक लड़की कहती है। उसकी नयी तरह की नैतिकता किसी अपराधबोध को ढोने के मूड में नहीं दिखती। जैसे शादी के टैग बिना दैहिक संबंध उसके लिए कोई मैने नहीं रखते वैसे ही गर्भपात उसके लिए कोई बड़ी बात नहीं है। फिर उसी उधेड़बुन पर वापस लौटे तब यह भी दिखता है के ज़रूरी नहीं के दोनों साथ रह भी पाएँ। कुणाल की 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे  ' ऐसी ही कहानी है जहां लड़की तो शाहरुख़ की फिल्मों के साथ बड़ी हो रही है और उसके पिता उन नवउदारवादी सालों के बाद एनसीआर हुए गुड़गाँव और कंपनियों के उग आने के बावजूद खुद को नहीं बदल पाये। यह मानसिकता के साथ आधुनिकता का संकट भी है जिसके चिह्न सिर्फ गाड़ी बंगले बड़ी-बड़ी कोठियों में ही दिखाई दिये। उसके आगे नहीं जा सके। पर निहारिका राहुल के साथ लिवइन में भोगल आश्रम के वन बेडरुम अपार्टमेंट में शिफ्ट हो जाती है। जिसके बाद सिर्फ उसकी हत्या ही हो सकती है। और आखिर में होती भी है।

वैसे जो साथ रह भी रहे हैं और फ़ेविकॉल के मजबूत जोड़ की तरह चिपके भी हैं उनके बीच 'दांपत्य ' (मो॰ आरिफ़) जीवन की अपनी जटिलताएँ जो कि पितृसत्ता के ढाँचे के चलते है, लगातार स्पेस को खत्म करती जाती हैं और तब आती है संवादहीनता। फुर्सत के दो क्षण भी नहीं मिलते। मिलते भी हैं तो आकस्मिक किसी की मृत्यु हो जाने के बाद। पति का घर पर ही रह जाना किसी भी तरह उमंग से नही भरता। उल्टे पत्नी के रोज़ाना को बाधित ही करता दिखता है। जब पति उसे छत पर कुछ देर साथ बिताने को बुलाता है तब वहाँ बचती है सिर्फ़ झुंझलाहट। खीज। अनमनापन। वहाँ पत्नियों को 'मंजू फालतू ' होते जाना है। या उसे प्रौढ़ावस्था में अपने पति को यह समझाना है के प्रेमिकाएं और प्रेम रसोईघर में जाते ही उड़ जाते हैं। वह प्रेम का हत्यारा है। भले प्रेमिका सुगंधा जैसी हो पर बूढ़े होते पति के देवदास हो जाने को भी पहचानती है। नन्दिता को पता है ऐसे पति के साथ क्या करना है।

हमारे समाज में ज़िंदगियाँ 'जब वी मेट ' की तरह हैप्पी एंडिंग नहीं होती वहाँ सच कहें तो प्यार है ही नहीं वहाँ प्यार के दुश्मन ही हैं। तभी तो बार बार 'पीली छतरी वाली लड़की ' पढ़ पढ़कर बार बार उसे सच मानने की कोशिश करता हूँ। पर काश ऐसा हो पाता। शायद यह कृति से कुछ जायदा की मांग करना है। पर फिर दिख जाती है भागती रेलगाड़ी उसमें बैठे दोनों। अंधेरी सुरंग की तरफ जाती। कहाँ जा रहे हैं। पता नहीं। शायद पता है। उसे याद नहीं करना चाहता। पर याद आ जाता है जिस समाज में रह रहा हूँ वह मूलतः यथास्थितिवादी ही है और यही सब समाजों की गति उनका डायनेमिक्स एक सा लगता है। इसलिए आगे जाकर जहां की कहानी हमारे पास नहीं है वहाँ की स्थितियों के अनुमान अंदाज़े लगाए जा सकते हैं। शायद यह दिक्कत मेरी भी है जितना जब प्यार करना था, मैं इन्ही किन्ही नुक्तों पर रुक सोच रहा था। प्यार कर रहा होता तो आज जिंदा नहीं होता..यही सोच रुक जाता हूँ हर बार..डरे हुए दीवाने की तरह..

अप्रैल 16, 2013

हमारे भाटिया सर

{कल ट्रंक के पास जो गोल मेज़ है उसकी सफ़ाई के दौरान दसवीं पास कर चुके लड़के की डायरी हाथ लगी। दस बारह साल पुरानी तारीखों वाली। उसी में से किसी पन्ने पर दिख पड़े भाटिया सर। वहाँ कोई तारीख नहीं पड़ी है। बॉल पॉइंट पेन से लिखा हुआ है। अंदाज़ से लगा के बोर्ड के इम्तिहान के बाद उन दो ढाई महीनो में यह सब लिखा होगा। वाक्य संरचना वही है। बस सहूलियत के लिए पूर्ण विराम लगा दिये हैं। जो वहाँ नहीं थे। }

भाटिया सर का 2002 आखिरी साल था। परंतु लगता नहीं था कि वो इसी साल जा रहे हैं क्योंकि उनका पढ़ाने का ढंग ही कुछ ऐसा था। वो हमे इंग्लिश पढ़ाते थे। मैं तो कंपार्ट्मेंट से दसवीं में आया था परंतु पहले मैं मैथ्स के पीरियड में नाइन्थ में और बाकी पीरियड टेंथ में पढ़ता था। उन्होने फुटप्रिंट विदाउट फीट बहुत ही अच्छे ढंग से पढ़ाया। उनके एक्स्प्रेश्नस बहुत ही सजीव व कहानी के अनुरूप लगते हैं।

उनका बोलने का स्टाइल ही अजीब था जैसे उनका सर्वलोकप्रिय शब्द हरामखोर या हरामखोरी था। गाली जैसा था पर लगता नहीं था। बोलते अरे हरामजादे पढ़ता क्यों नहीं? माँ बाप की परेड करवाऊँगा तब पता चलेगा। जब बेटा फेल हो जाता है तब कहते हैं रिज़ल्ट नहीं आया। आगे पढ़ो। उसको मार डाला। तूफान आता है आने दो हवा आती है आने दो, सब आओ, मोस्ट वैल्कम। वो देखो अभी से मरा पड़ा है, इसे तो मेरे जैसे हो जाने पर चार आदमियों की ज़रूरत पड़ेगी। धमाका कर दिया उनकी कहानी थी। की हमने प्रकटिकल में नीचे जाली नहीं लगाई जिससे धमाका हो गया। ये देखो टॉयलेट का पेपर भी इसे पास नहीं करवा सका। पहले पेज पर ही काटा हरामखोर है न इम्प्रैशन खराब कर दिया।

जब सर पढ़ते थे तब उन्हे पहाड़ गंज थाने से शादीपुर तक के एस्से लिखने में दो महीने लग गए। कभी चोरी करवा दी, कभी हवा निकलवा दी, कभी चेकिंग, कभी पुलिस, कभी झगड़ा, कभी कुछ तो कभी कुछ। सर की एक पूरी किताब भर गयी। रोज़ एक घंटा लिखते। पर उन्होने हमे ऐसा लिखने से मना किया था क्योंकि टाइम कम था बोर्ड क्लास थी न। उनका ये किस्सा साल भर चलता रहा की एक आदमी का घोड़ा था जो हाँ हाँ करने पर चलता था। तो एक बार काँटों के बीच लगे शहतूत के पेड़ से घोड़े पर खड़ा होकर शहतूत खाने लगा उसे खूब आनंद आया तो उसके मुँह से निकल गया हा हा तो घोड़ा चल पड़ा और वो काँटों में गिर पड़ा।

सर ने हमे जो आर्ट बताया कि एस्से, लेटर, पैराग्राफ़ कैसे लिखते हैं वो गज़ब का था। कभी आज तक किसी ने नहीं बताया था। सर ने बच्चों के खेल की तरह हमे सिखाया। लेटर का फ़ारमैट चार नंबर का था पर वो कहते थे की यही मत लिख देना। नंबर नहीं दूंगा। वो कहते जितनी प्रैक्टिस करोगे उतना अच्छा होगा। उन्होने बहुत ही अच्छे ढंग से हमे पाठ पढ़ाये। जैसे लूसी ग्रे, लिटल ब्रदर, आ लेटर टू गॉड, टैगर ट्रबल, द पेरफेक्ट लाइफ, द बेट, द एंड ऑफ द रोप, चेरी ट्री। वो पूरी ज़िंदगी याद रहेंगे कि कभी इंग्लिश हमने भाटिया सर से पढ़ी थी। वो मज़ाक मज़ाक में सब समझा देते थे। नालायक से नालायक बच्चों को उनकी बात समझ आ जाती थी। उनकी कुछ बातें तो कभी नहीं भूलेगी। वो चश्मा, वो हरामखोर कहना, अभी तो हँस रहे हैं बाद में रोएँगे। मैं उन्हे शत शत नमन करता हूँ था भगवान से प्रार्थना करता हूँ की उनके जैसे अनेक टीचर दे जिससे बच्चों का भविष्य न सके।

अप्रैल 15, 2013

बस जो जाती है चारबाग़

पता नहीं कितने साल पहले की बात है जब हम सब पूरा परिवार दरगाह मेला घूमने बहराइच गए थे और घूम घूम कर थक लेने के बाद दरगाह में अस्थायी पुलिस चौकी के बगल से पीछे की इमारत को दिखाते हुए पापा ने कहा था यह बहराइच की भूलभुलल्या है बिलकुल ऐसी ही एक लखनऊ में भी है। साल बीतते गए पर हर साल की तरह रोडवेज़ से कानपुर वाली बस में बैठते। लखनऊ वाली में नहीं। कानपुर वाली बस की खासियत यह होती की यह आलमबाग़ या क़ैसरबाग़ जाती भी तो भी चारबाग़ रेलवे स्टेशन से होते हुए। इसलिए भी सहूलियत होती। कि अगर बस थोड़ा लेट फेट भी हो जाए तब भी स्टेशन के सामने ही उतरें। जिससे कि भागकर लखनऊ मेल पकड़ी जा सके।

खैर वैसी नौबत कभी आई नहीं। हम हमेशा वक़्त से पहले पहुँचते रहे। वहीं प्लेटफॉर्म पर ही चादर बिछा कर खाना खाते गाड़ी के लागने का इंतज़ार करते। इस इंतज़ार की दरमियानी में कभी किताबों की दुकान तक चले गए या और कुछ खाने के लिए कुछ खरीद लाये। प्लेटफॉर्म हमेशा प्लेटफॉर्म ही बने रहे। वहाँ की आपाधापी कभी कम नहीं होती। उसका अपना ही चरित्र होता। वहाँ मौजूद लोगों में कई ऐसे भी होते जो अपनी पत्नियों बच्चों को लेकर पहली बार परदेस को निकल रहे होते। उनके चेहरों पर अजीब सा भय भी उतना ही तैर रहा होता जितना विस्मय और रोमांच। इनलोगों की पहचान इनके सामान से हो जाती। या फिर पैरों से। उनमे पहनी चप्पलों से। और इनसे कई गुना बड़ी संख्या में वे लोग थे जिनहे उनके कपड़ों से चीन्हा जा सकता था। उन लोगों के लिए लखनऊ मेल वहाँ के नवाबी ठाठ बाट की तरह ही एक और स्टेटस सिंबल थी। है।

मुझे हर बार दिल्ली आने में जो सबसे अच्छी बात जो लगती वो ये के हम पांच सात घंटे बस से होते हुए लखनऊ पहुँचते। बस का सफर कभी डराता नहीं था। छुटपन से ही। हम उस बस में चढ़ते ही नहीं जिसमे भीड़ होती या मन मर्ज़ी की सीट नहीं मिलती। ऐसी सीट होती कौन सी। जो खिड़की के बिलकुल बगल हो। इसके लिए एक डेढ़ बस छोड़ी जा सकती थी। सफर रहता इसलिए भी पानी की बोतल खरीद लेते या फिर खाली बोतल भर ली जाती। पर पानी का स्वाद उसके गरम होने के साथ ही उसे गले से नीचे उतरने की सारी योग्यताएं जाती रहती।

मरी माता मंदिर का बड़ा सा गेट पहले था या इधर नयी शताब्दी में बना कुछ कह नहीं सकते पर जवाहर नवोदय विद्यालय शुरू से दिखाई देता रहा। बुद्धा रिज़ॉर्ट भी एक नयी चीज़ ही था। फिर फखरपुर क़ैसरगंज कुंडासर(कुडासर) तक तो बस रोते पीटते चलती। बीच में बहराइच पार करते रोक लेते कि जब तक सब सवारियों कि टिकट कट नहीं जाती तब तक बस चलेगी ही नहीं। पर एक साल ऐसा हुआ जब हम पवन हंस बससेवा में बैठे। नॉन स्टॉप। इसका भी अपना वर्ग चरित्र है जिसकी नज़र में यह छोटे मोटे हॉल्टकिसी ज़रूरत के नहीं थे। कंडक्टर शुरू से ही चिल्लाता रहता कोई भी सवारी रामपुर से पहले उतरने वाली न बइठे। उसे उतारा नहीं जाएगा। यह शायद तब की बात है जब लखनऊ रोड पर डामर की चोरी के बाद भी चिक्कन सड़क बनी थी। उसे वकार अहमद ने गड्ढामुक्त सड़क कह कर प्रचारित भी किया होगा। वाकई सड़क शानदार थी। सरपट भागती हुई। तब से लखनऊ पहुँचने में घंटा पउन घंटा कम लागने लगा। और इसी वक़्त फैज़ाबाद वाला लखनऊ हाइवे भी दुरुस्त हो रहा था।

कई सालों तक तो हम जब जरवल रोड पहुँच जाते तब पता चलता के जरवल क़स्बा कई किलोमीटर पीछे छूट गया। उस क्रॉसिंग के बाद उधर गोंडा वाली बसें भी मिलने लग जाती। इसी फाटक पर फ़रेन्द वाले बस यात्रियों को खीरे खाने नहीं देना चाहते और समानुपात में खीरे वाले पानी वाले पाउच से बाज़ी लगाते दिख जाते। पानी के पाउच वालों की भीड़ वाली बात वैसे काफी बाद की है। इनकी जगह भुट्टे वाले आसानी से दिख जाया करते थे। पहली बार पानी के पाउच एक-एक रुपये में दो हज़ार आठ वाले दरगाह मेले में मिलना शुरू हुए थे। आम इतनी गर्मियों में कम ही लोग खरीदते। बस में उसे खाये जाने से जायदा मुँह ललचाने वाली बात होती है। वही समान लो जो कम लोगों को दिखे ख़त्म हो जाए। पता भी न चले।

पर हम लोग इंतज़ार करते थे घाघरा नदी का। हम बस वाले पल को नहीं रेल वाले पुल को देखते और देखते उसके खंबे कितने डूबे हुए है। कोई रेल उस पर से गुज़रते हुए दिख जाये तो कहना ही क्या। पहले मम्मी से सिक्के लेकर नदी में फेंकते भी थे। शायद घर वालों के हिस्से की कोई बाकी दुआ रहती होगी। उसी के लिए। पुल पार करते गनेसपुर की तरफ जो ढाबे भोजनालय थे। यात्री सुविधा केंद्र थे पिछले साल सब पर धूल जमी दिखी। कोई भी चालू स्थिति में नहीं था। वो बंद रिलायंस के पेट्रोल पंप के बाद रोडवेज़ वाले ने वहीं रोका था। सब बस वाले वहीं गाड़ी लगा रहे थे।

अप्रैल 09, 2013

ऊब बनते जाने के बीचों बीच: चाँद@आसमान डॉट कॉम

चाँद@आसमान डॉट कॉम॰ शुरुवात दो जगहों से होती है। पहला पन्ना: नन्दिता सुगंधा और मिहिर के लिए/ जो प्रेम पाने के लिए तूफ़ान से जूझ रहे हैं। दूसरा पन्ना दो उक्तियाँ। मैन इस फ्री एंड एव्रीवेयर ही इज़ शकलेस: रूसो। "मेरे लिए प्रेम एक लालटेन है/ जिसे अँधेरा होते ही जला लेना चाहता हूँ"

कुछ कुछ अंदाज़ ज़रूर लगता है पर पढ़ने से पहले कयास लगाना कुछ ठीक नहीं। पर अभी जब पहली पंक्ति को दोबारा देख रहा हूँ तो लगता है सब इसी के इर्दगिर्द है। इसे विखंडित करते चलते हैं जिससे दरीचे शायद और खुलें। पढ़ते लगता है यह प्रेम कहानी होने जा रही है जहाँ कोई त्रिकोण-चतुर्भुज जैसी गणितीय आकृति बनेगी। प्यार की प्रमेय जितना सुलझेगी नहीं उससे ज़्यादा उलझ जाएगी। इस समय कम होते जा रहे स्पेस के कुछ बयान होंगे। प्रेम का वर्ग-चरित्र होगा। कोई मिलेगा। कोई पीछे छूट जाएगा। आहें होंगी। बाहें होंगी। और चलताऊ भाषा में कहें तो क्लाइमैक्स तक आते आते भी पत्ते नहीं खुलेंगे।

पर सारा रूमानीपन एक एक पन्ने के साथ उड़ता जा रहा था। नन्दिता मिहिर की पत्नी हैं पर वहाँ मिहिर का नाम सुगंधा के साथ है और योजक है 'और'। कहानी नन्दिता से नहीं मिहिर के चाँद को लिखे पत्र से शुरू होती है। मतलब यह प्रौढ़ो की प्रेम कहानी जैसा कुछ है। जिसे लेखक मिहिर के प्रति सचेत आदर और स्पष्ट कर देता है। यहाँ ऊब का कारण वैवाहिक जीवन मे एक ही साथी के साथ बिताए साल हैं या शहर लगातार बेगाना होता जा रहा है या दोनों कहना मुश्किल है। जहाँ मिहिर को लगातार लगता है के अब यह पुराना वाला शहर तो बिलकुल नहीं रहा। जिन सपनों के साथ वह यहाँ फ्रीलांसिंग पत्रकार के रूप में अपने जीवन की पारी शुरू करते हैं खुद उस अख़बार का चरित्र कॉर्पोरेट बिजनेस कंपनी की तरह होता जा रहा है। सरोकार दरवाज़े के आस पास फटकने भी नहीं पाता है। उल्टे उनकी स्टोरी की एडिटिंग कर दी जाती है। उन्हे यह भी लगने लगता है के गलत लाइन चुन ली। पर अब हो कुछ नहीं सकता। वे अपना स्पेस बचाने के लिए जूझ रहे हैं।

भाग रहे है सामना करने से। पर शहर को भी क्या किसी के लिए रुके रहना पड़ेगा। के वह किन्ही लोगों के लिए वैसा ही बना रहे। क्योंकि वे उसे वैसे ही प्यार करते रहना चाहते हैं। या यह स्थापना ही गलत है। जैसे मिहिर वहाँ रहते हैं वैसे ही कई और भी होंगे। लेकिन सब एक जैसा नहीं सोचते। यह सोचना शहर को रोके रहना भी है और उसे कथित रूप से आगे ले जाना भी। लेकिन मूलतः उसे बदलता कौन है इसका एकरेखीय जवाब मिलना इतना सरल नहीं है। फिर सवाल उठता है के इतनी साझेदारियों के बीच में, हमारी मौजूदगी में ही वह क्षण-क्षण परिवर्तित होता रहता है और हम कहते हैं हमारी आँखों के सामने वह बदलता रहा। पर इसमे अपने हिस्से ढूंढने की कोशिश या तो हम करते नहीं हैं या फिर इतने पस्त हो चुके होते हैं के लगातार उससे पीछे खिसकते रहते हैं। फिर एक दिन ऐसा आता है के हम मिहिर हो जाते हैं।

मिहिर के हिस्से सपनों की एक पोटली भी थी। जैसे हम सबके होती है। उसमे उसके पुराने दिन थे। पुराना मतलब मुग्धाभाव वाली यादें। यादों में याद आई रुचिका। डीएन झा की शिष्या। करियरिस्ट निकली। इलीटिस्म से पीड़ित। जेएनयू ऑस्ट्रेलिया पीएचडी के बाद बड़े आदमी से शादी। उधर मिहिर अपने कस्बाई पिता के आईएएस वाले सपने को पलीता लगाते हुए एसएफ़आई की सदस्यता ले ली। और सीआरएल के दरवाज़े पर एक संवेदनशील युवा आज भी उसे देख जाता है। नन्दिता से प्रेम उन्हे प्रायोजित सा लगता है। क्योंकि उसे उन्होने नहीं चुना। चुना मतलब प्रेम पहले नहीं शादी के बाद की निर्मिति के रूप में वहाँ उत्पन्न होता है। यह भी सहचर्य से उपजा प्रेम है पर शायद मिहिर उसमे आकस्मिकता वाला रोमांच थोड़ा कम पाते हैं।

ऐसा नहीं है के इस दंपति में आपसी समझ नहीं है। उसका स्तर ज़ायदा सुलझा हुआ लगता है। पत्नी जानती भी है के इन बीतते सालों में दोनों के बीच दैहिक ऊर्जा ही नहीं और भी बहुत कुछ है जो अब पहले सा नहीं रहा। वही है जो मिहिर को अब तक संभाले हुए है। बराबर साथ है। उसे सुगंधा के बारे में भी पता है। यह भी के इन पिछले सालों में वे उसकी तरफ खींचे चले गए हैं और उसकी जगह लगातार कम होती गयी है। फिर भी वह उनसे बात करना बंद नहीं करती। उल्टे मिहिर को समझाती बुझाती रहती है। बुढ़ाती उमर में देवदास होना क्या है उसे पता है।

उसे यह भी पता है के रसोई ऐसी जगह है जहाँ प्रेमिकाएं जाते ही साधारण औरत में बदल जाती हैं। आटे दाल का भाव पता चल जाएगा। किचन सारे प्रेम का हत्यारा है। वह तो यह भी कहती है के पुरुष होने के नाते ही मिहिर इतनी स्वतंत्रताओं का उपभोग कर पा रहे हैं। यदि स्त्री भी समानुपात में यही करने लग जाये तब परिवार चल नहीं सकते। टूट कर बिखर जाएंगे। एक रात कई दिनों मन ही मन जूझने के बाद वह उस लड़के की कहानी भी कह डालती है जो शादी के पहले उसे प्यार करता था। वह मिहिर को कहती है पुरुष ऐसे ही महीन जाल बुनते हैं जहाँ कोई स्त्री आकार वापस न लौट पाये।

मिहिर की समस्या यह है के अपने सुख दुख के भागीदारीके साथ वह बिन जिम्मेदारियों वाला प्रेम चाहते हैं। जिसे नन्दिता अच्छी तरह जानती है। पर वह बौद्धिकता को आड़ बनाकर बरतते रहते हैं। वेवलेंथ का मिलना बहाना है। उन्हे पता है सुगंधा कल्पना में ही ठीक है, नन्दिता की तरह यथार्थ के रूप में ठीक नहीं। मिहिर को लगता है वे दो उदासियों के बीच फँस गए थे जहाँ पहिया धँस गया हो। वह बस इसी पहेली को सुलझाने में लगे रहते हैं के पुरुष स्त्री में क्या चाहता है। शरीर मन या बुद्धि, या तीनों।

पर महत्वपूर्ण सवाल यह है के फिर स्त्री क्यों नहीं? क्या स्त्री को संपूर्णता नहीं चाहिए? चाँद तो ठीकठाक बहाना है खुद से बचने का। आसमान में उड़ने की खवाहिश जितनी पुरुष के हिस्से है उतनी ही स्त्री के भी।

अप्रैल 06, 2013

कुछ रीडिंग्स 'मुन्नी मोबाइल' की: उर्फ़ ये जो शहरों के किनारे रहना है

मुन्नी मोबाइल। शुरू कहीं से भी कर सकते हैं। शहर से। मुन्नी से। मोबाइल से।साहिबाबाद गाँव से। इलाहाबाद की लायब्रेरी से। वहां इंतज़ार करती आँखों से। लन्दन की किसी नामचीन गली में अवध के ग़दर में क़त्लेआम करने करवाने वाले अँगरेज़ नायक की प्रतिमा से। महँगी होती ज़मीन से। गुजर्र त्यागी समीकरणों से। संबंध विच्छेद के बाद उपजे खालीपन से। मोदी के गुजरात से। दो हज़ार दो के दंगों से। पत्रकारीय मूल्यों के अवमूल्यन से। खुद आनंद भारती से। एक अर्थ में यह शुरू इन सभी बिन्दुओं से एक साथ होता है। यह इकहरा न होना ही इस समय की पहचान है। यह एक साथ कई-कई छवियों को लेकर चलता है उन्हें लगातार बनता बिगाड़ता रहता है। यही इसे कॉस्मोपॉलीटिन रियलिटी बनाते हैं।

कहानी शुरू नहीं होती है के बिंदू यादव के हाथ मोबाइल आ जाता है। नाम के बदल जाने से या शास्त्रीय शब्दावली में उसके अपभ्रंश हो जाने से। मुन्नी कैसी गढ़ी जा रही है। खुद को कैसा बना रहा है। यह पहचान का मिट जाना भी है और उसका नए सिरे से गढ़ा जाना भी।

के 'बिन्दू' होकर वह पुराने अर्थों से चिपकी रहती। उसके 'बिन्दू' बने रहने की कहानी के फ़्लैशबैक कुछ कम हैं मुन्नी मोबाइल हो जाने के बाद की कहानी फ़्लैश फॉरवर्ड में। दिलचस्प यह देखना भी है के मुन्नी जहाँगीर पुरी, नन्द नगरी, खिचड़ीपुर, मुनीरका, खानपुर, त्रिलोक पुरी, से नहीं आ रही है। वह दिल्ली की परिधि उस एनसीआर के एक औद्योगिक बसावट से ताल्लुक रखती है जहाँ रेल की रफ़्तार धीमी होते ही बक्सर से लौटते वक़्त वह आसानी से कूद पड़ती है। उद्द्योगों को खदेड़ा भी इस दिल्ली ने ही है। वहाँ पटरी के किनारे गंधाते हगते देखना जिस विष्टि से आँखों को भर देता है वही हेयता उस वर्ग के प्रति हमारे रक्तबीजों में समायी हुयी हैं।

यह किसी प्रवासी कॉलोनी में रहना नहीं है। न स्वेछा से इस शहर में दाखिल हुई होगी। काम का लगातार इन जैसी संरचनाओं के इर्दगिर्द सिमट जाना एक संकट ही है। उस संकट से कई और संकट लगातार निकलते रहे हैं। ज़मीन के दाम कई गुना बढ़ गए हैं उसे बेच कर त्यागी गुजर्र खूब पैसे भी बना रहे हैं। जो अपने बेटों को उसमे हिस्सा नहीं दे रहे उन्हें दराती गंडासे से काट मार डाला गया है। नैशनल हाईवे के पास से गुज़रती मेढ़ पर मूतने का पैसा आज नहीं लग रहा है। कल भी नहीं लगेगा कह नहीं सकते। आबादी का बड़ा हिस्सा मुन्नी की तरह ही बाहर से आया है। उसके पास कोई कौशल नहीं। सिवाय इसके कि किसी काम को करने में वह झिझकती नहीं है। बस ख़ुद को झोंक देती है। सोचना बाद का काम है।

सवाल उठता है के हेमा मालिनी जया प्रदा के गालों वाली सड़कों के बिहार से पलायन करके वह अपने साथ लौंडा नाच तो लाये पर छठ पूजा का उदय बिहारी अस्मिता के साथ वज़ीराबाद के पुल और यमुना किनारे नहीं दिखता। फिर यह भी के जो विकास के दावे निज़ाम बदलने इधर आज हो रहे है तो क्या साहिबाबाद जैसे गाँव, वे जगहें क्या अब खाली हो गयी हैं..?? पर इसे दूसरी तरह भी देखा जाना चाहिए के ज़मीन खरीदने में कम पड़ रहे पैसे पूरे करने के लिए तो वह अपने गाँव जाती है। जो लडकियाँ वह सेक्स रैकेट के तहत सप्लाय करती है उनमे भी अच्छी खासी तादाद में बिहारी मूल की लडकियाँ थी। पर कहीं से भी राजनीतिक रूप से वह खुद को नहीं जोड़ती। इस राजनीति-रसूख-पहचान-पहुँच वाले हिस्से की भरपाई के लिए शायद आनंद भारती हमेशा वहां मौज़ूद रहते हैं। राजनीति के मॉडल में इसे पहचाना जाना बाकी था।  

अब जबकि ब्लू लाइन बसों का कहर दिल्ली की सड़कों से गायब है यह मौजू है के एक खिड़की से हमें यह दिख जाए के उन दिनों की मारकाट खून से रंगे पहियों के बीच प्यार जैसा भी कुछ उन बोनटों स्टेयरिंग के बीच भी हो जाता था। बोनट उसके आस पास की विशेष जगह लड़कियों के लिए हमेशा खाली रहती। बस के भरे होने से इस क्षेत्र का कोई लेना देना नहीं। यहीं है जस्सी-सतिंदर की प्रेम कहानी। 'जस्सी एक्सप्रेस' का दौड़ना उसका पटरी से उतर जाना। कि कैसे नॉएडा रूट के अधिकतर ड्राइवर कंडक्टरों ने अपनी बस में आने जाने वाली लड़कियों से शादी कर रखी है। कईयों ने दो दो तीन तीन। कर्नल पिता और भाई के विरोध के बावज़ूद बस ड्राइवर से वह शादी करती है। सतिंदर भी बस का ड्राइवर था। एक इतवार 'पंजाबी बाय नेचर' में दोनों शादी का फैसला करते हैं। शादी हो जाती है। जस्सी बस खरीदकर सतिंदर को देती है और सतिंदर उसकी जस्सी एक्सप्रेस को हड़प लेता है।

बिहारी होना गाली की तरह है पर मुन्नी उसे पेरीफरी से मुख्यधारा के बीच दख़ल की तरह दाखिल होती है। अपने बलबूते। नामराद बनती है। खटकने की हद तक। जहाँ सिर्फ हत्या हो सकती है। क्या बिन्दू यादव यहाँ स्त्री विमर्श के लिए कुछ नए दरीचे खोलती है उसमे से नए झोंके हवा वेंटिलेशन से निकलते हैं। या उसके मुन्नी मोबाइल हो जाने के बाद से इसे समझा जा सकता है। मतलब पावर डिस्कोर्स के रस्ते से। सवाल टेढ़ा है जहाँ उसे उसके पति के संदर्भ में देखें तो उसके हिस्से दारु पीना है या बक्सर रहते रंडियों का नाच देखना है या खुद लौंडा नाच करना। या मुन्नी को लगातार छह साल तक गर्भधारण करवाकर पुरुष कर्म से मुक्त हो जाना। उसके मुन्नी हो जाने में मुख्य भूमिका निभाई उसके हाथ आये मोबाइल ने। तकनीक यदि उसे ऐसा बना रही थी तो जिस स्त्री को देख दिवाली के इनाम में वह भी मोबाइल मांगती है वह दृश्य क्यों नहीं होती। या होती है पर हम उसे देखना नहीं चाहते। डॉक्टरनी शशि खोखरा अवैध गर्भपात करवाने का क्लीनिक चला रही थी। क्या हमें उसके मरने या उसकी हत्या के संकेत यहाँ दिखते हैं। नहीं।

वैसे इस उपन्यास में मौतें प्राकृतिक न होकर प्रायोजित ज़यादा रहीं। गाजियाबाद के पत्रकारपुरम आने से पहले गोधरा काण्ड की रिपोर्टिंग हो या लन्दन प्रवास के दौरान खुद मुन्नी के फोन से उसकी बेटी की नकली दवाई से हुई मौत की खबर हो या बाद में रेखा से उसकी मर्डर की खबर हो। सब जगह संदेह। संशय। लेकिन जो बात रह गयी वह यह के मुन्नी की हत्या क्यों होती है?

एक कारण स्वयं आनंद भारती भी हैं और इस विकास के साथ उग आई प्रकारांतर संस्थाएं। पत्रकार महोदय मुन्नी के प्रतिरोध-जिसे ज़िद भी पढ़ा जा सकता है- को शह देते हैं तभी मुन्नी कहीं भी टांग अड़ा देने में झिझकती नही है। उसने बड़े बड़े अधिकारियों को उनके घर पर हाथ जोड़े देखा था। उसे हमेशा लगता आनंद भारती उसे बचा लेंगे। उसकी मदद ज़रूर करेंगे। वे करते भी। पर कुछ तो मुन्नी में था जिसके बलबूते वह कई-कई घरों में कई-कई औरतों को लगवा चुकने के बाद। घर बना लेने के बाद। बच्चों को पढ़ाने की तरफ़ मुडती है। उन्हें अफ़सर बनता देखना चाहती। पर इन सबके साथ उसकी महत्त्वकांक्षा ही थी जो उसे पुरुषों का प्रतिस्पर्धी बना रही थी। बस खरीद उसे गाजियाबाद मोरी गेट के बीच चलवा लेने के बाद ही यह हुआ होगा। ऐसा इसलिए भी के उसकी बस में ही उन कॉल गर्ल्स से उसकी पहली मुलाक़ात होती है। हर्र लगे न फिटकरी रंग चोखा के खांचे में जो सोचने लगी थी। पर इस रास्ते पर आगे अंधी गली भी हो सकती है जहाँ से वापसी संभव नहीं।

फिर इस मुन्नी की कहानी के बीच कई चोर दरवाज़ों की आवाजाही भी खूब है। अगर आप कलकत्ता लन्दन इलाहबाद अहमदाबाद देखना चाहता है तो इसमें बहुत स्कोप है। कईयों को यह विषयान्तर लग सकता है। कुछ हद तक लगते भी हैं। पर कई सूत्र थे जिन्हें पकड़ने की ज़रूरत भी है। एमिरेट्स की फ्लाइट में माँसाहारी भोजन को शाकाहारी कह कर परोसना। सोहो के ओल्ड कॉम्पटन स्ट्रीट के 'गे क्लब' में आगे 'तीसरी ताली' की आहट। फ़िर लन्दन की किसी गली स्क्वायर पर ब्रिटिश जनरल हेनरी हैवलॉक का आदमकद स्टैचू आज भी लगा है। 1857 के स्वतंत्रता आन्दोलन को कुचलने वाले खलनायकों में से एक। आनंद भारती उस बुत पर थूककर औपनिवेशिक जुए को उतार फेंकने की थोथी कोशिश करते हैं जिसे लखनऊ के लोग आज भी ढो रहे हैं। इधर जलियावाला बाग़ आकर ब्रिटिश प्रधानमन्त्री यही कोशिश कर रहे हैं। उसके भी कई पाठ हैं। खैर।

ऐसा ही विषयान्तर पाठकों को डायरी-रिपोर्टिंग शैली में आनंद भारती का अहमदाबाद प्रवास भी लग सकता है। जहाँ नतमस्तक बिरादरी है तो दूसरी तरफ उनके जैसे जुझारू पत्रकार भी। एस-छह बोगी में आग के बाद की घटनाओं का घटाटोप भी है। शाहआलम कैम्प से लेकर मज़ारों को तोड़े जाने तक। इसकी रेंज 'हाथ में बीड़ी पान, नहीं बनेगा पाकिस्तान' से लेकर साबरमती के आरपार विभाजन की सामजिक गतिकी भी नए अर्थ देती है।पर दंगों के बाद वैश्यावृति में उन्ही राहत कैम्पों से हिन्दू बहुल इलाकों में पहुंचाई जा रही लड़कियों को लेकर कोई साम्प्रदायिकता आड़े नहीं आती। जिसे भुला देने पर इधर बल दिया जा रहा हो और खुद उसके दोषी भाग लेना चाह रहे हों किसी उपन्यास में इतनी सशक्तता से आना उस सच को उघाड़ देने की तरह है। उस राजनीति से असहमति है। अनन्तर वहाँ बदलता प्रेम भी है जहाँ मानसी और आनंद कभी नहीं मिल पाते पर उन्ही की भांजी अपनी मर्ज़ी से शादी कर लेती है। जातीय बन्धनों को तोड़ता है आजीविका का स्रोत। कॉल सेण्टर का धमक के साथ हिन्दुस्तानी युवा पीढ़ी की जीवन शैली उसके मानस को परिवर्तित करने में महत्वपूर्ण भूमिका में आ जाना।  

ऐसा नहीं है इन सब से गुज़रते हुए लेखक नहीं बताता के हम ऐसे कैसे होते जा रहे हैं। इस होते जाने का एक अंदाज़ा एक जवाब ख्रुशचेव की इस बात लगता है( पृष्ठ 131) जहाँ वे कहते है कि पूँजीवाद से समाजवाद में शांतिपूर्वक संक्रमण संभव है। उसी पल माओ ने इसका ज़ोरदार खंडन करते हुए कहा था कि वर्ग-समाज में वर्ग-संघर्ष अवश्यंभावी है। ख्रुशचेव की थीसिस वर्ग-सहयोग की और ले जा रही है और वर्ग-संघर्ष से दूर कर रही है। यह एक प्रकार का संशोधनवाद है। यहाँ सवाल हमें खुद से पूछना है हम वर्ग संघर्ष की तरफ हैं या संशोधनवाद की तरफ। मुन्नी की पूरी ज़िन्दगी उस वर्ग संघर्ष को वर्ग-सहयोग बनाने के कई पैटर्न है। लेकिन आखिरी पन्ने तक आते आते हमें दिख जाता है के सौन्दर्य के प्रचलित पूंजीवादी मानक कैसे रेखा के चहरे पर उभर आये सफ़ेद दागों के कारण उसे किनारे कर देते हैं। जिस वर्ग से वह आ रही थी वहाँ शिक्षा भी कोई मदद नहीं कर पाती। उल्टे उसका लैपटॉप कैसे उसे कॉल गर्ल वर्ल्ड की नयी अवतार बना देता है, क़ाबिले गौर है। रेखा चितकबरी। जो इन्टरनेट के जरिये अपने कस्टमर बनती है। लड़कियों की तस्वीरें उसने अपने ब्लॉग पर डाल दी हैं। पर उन पैटर्नों- ढर्रों में सेंध की तरह उसकी लड़की को देखा जाना चाहिए।

अप्रैल 01, 2013

मन की किताब से तुम मेरा नाम ही मिटा देना

कभी कभी सोचता नहीं हूँ फिर भी तुम ख्यालों में आ जाती हो। बिन बताये। जाने अनजाने। कोशिश नहीं करता कि तुम चली जाओ। बस देखता रहता हूँ। तुम्हारी आँखों में। कहीं मैं छिपा होता। उसी क्षण के इंतज़ार में जैसे। पर नहीं। तुमने शायद मुझे बंद कर लिया होगा। अपनी पलकों में। अगर ऐसा नहीं भी है तो तुम मुझे बताना मत। नहीं तो टूट जायेगा सपना। खुली आँखों वाला सपना। तुमने न भी देखा हो पर मेरे हिस्से में उसे बने रहने दो। पर अगले ही पल ख्याल आता है कब तक? शायद तुम आती रहोगी मैं जाता रहूँगा। पर उसे अभी कुछ देर भूल याद कर लेना चाहता हूँ वो सारे बहाने, वो सारे पल-पल बीतते दिन। बेतरतीब होते जाने के खतरों के बावज़ूद।

बिलकुल तुम्हारे कानों के पास से। छूता हुआ। हवा के झोंके जैसे। पता नहीं ऐसा कुछ भी तुमने कभी सोचा भी नहीं होगा के नहीं। उसमे तुम हो। मैं हूँ। और कोई नहीं। हम चुप हैं। कभी बोल भी लेते हैं। पर ज़यादातर हम एक दूसरे को देख रहे हैं। क्या करूँ उस दिल का जिसकी कई किश्तों में से एक तुम तक छोड़ आया था। तब।

मुझे बराबर लगता मैं सवालों जैसा था। तुम जवाबों जैसी। पर पता है हम दोनों कभी-कभी अदला बदली भी कर लिया करते। बिन बताये। जब जिसका मन करे। पर ये तो बताओ क्या हम दोनों कभी एक दूसरे को देख पिघलने लगते थे। शायद तुम नहीं। पर मैं ज़रूर। हर बार। उन दिनों ज़यादा ही। जब दिन ख़त्म हो रहे थे। जब हम पास थे बिलकुल। जब भी तुम्हे देखता लगता तुम भी उतना ही मुझे भी देख रही हो। और लगता अगर मेरे पास से गुज़रते हुए तुम्हे सुनाई देगया तुम्हे तुम्हारा नाम तब क्या होगा। सुनाई दे जाता तभी अच्छा होता। दिल की धड़कन के साथ तुम्हारी तरफ़ खिसकता चला जाता।

यह खिसकना सिर्फ मैं देख पा रहा था। क्योंकि खिसक फिसल मैं ही रहा था। हर शाम मेट्रो स्टेशन की सीढ़ियों पर बैठे रहने की कई-कई किश्तें सिर्फ तुम्हें देख भर लेने के लिए वहाँ थीं। शायद देख लेना उस प्रेम जैसे शब्द के इर्दगिर्द अपने को रच रहा था। इससे पहले कभी किसी के लिए ऐसा नहीं होते जा रहा था। कोशिश कर रहा था तुम्हारे पास आने की। बहाने जितने कम बनाने आते हैं उतने ही कम मौके हम दोनों को  मेरी तरफ से मिले। तुमने कुछ जब बनाये भी होंगे, तो उन्हें मैं समझा नहीं। या न समझने की..

उस बार मुझे विश्वविद्यालय किसी किताब के लिए नहीं जाना था। यह बस छोटा सा झूठ भर था। तुम्हारे साथ कुछ पल बिताने का। और मैंने भी क्या सवाल किया था। तुम्हारा सेल्फ़ प्रोफाइल बन गया। इतनी झिझक थी के हम दोनों के बीच आकर कोई बैठ भी गया। वो तो किसी तरह बोल कर उसे वहाँ से उठाया था। के हम अगल बगल बैठ सकें। बात कर सकें। इस पास बैठने पर जो हरारत होती उसी से कहीं डरता सा रहा। फिर ऐसे ही एक दुपहरी हम लोग क्लास शुरू होने का इंतज़ार कर रहे थे। वहीँ दरवाज़े पर। और अचानक तुमने कहा था। अरे!! तुम बोलते भी हो। और उस बार तुमने बिन बोले उस सुबह जब हमसब बस में बैठने ही जा रहे थे के उसके पहले सब फोटो खिंचवा रहे थे। तुमने अपनी सहेली को कैमरा दिया और झट से मेरे बगल में आकर खड़ी हो गयी।

ऐसी ही सेकेण्ड से भी छोटे पल से भी छोटी बातों को दिल के किसी कोने में सहेजे रखे हूँ। उस शाम बस से उतरने के बाद पता नहीं तुम्हारी चप्पल कब टूट गयी। पहले लगा के कहीं पैर में चोट तो नहीं लग गयी। पर नहीं। वहाँ मोची कहाँ बैठते हैं मुझे नहीं पता था। अजनबी जगह थी। खैर। बाद के दिनों में वैसी ही चप्पल फिर बल्लीमारन से लाया था। किसके लिए। यह मत पूछना। ऐसे ही उस रात वहाँ से निकलते निकलते कुछ ज़यादा ही रात हो गयी थी। इस बार बस का स्टीरियो ठीक था। फ़रहान की आई नयी फिल्म का गान बज रहा था। सब नाच रहे थे। और मैं जयपुर की सड़कों और दिल्ली की सड़कों में कोई अंतर खोजता खिड़की के बाहर देखने की कोशिश कर रहा था। पर देख नहीं पाया। हवा तेज़ थी। आँख में लग रही थी। के तभी तुम जो के बड़ी देर से पास ही खड़ी थी। बोली। थोड़ा बैठ जाऊं। मैं खिसक गया। तुम बैठ गयी।

पता नहीं मेरे हिस्से कितने ही ऐसे छोटे छोटे पल समेटे रखे हैं। डायरी के पन्नो में। उन जगहों पर। किसी मोड़ पर। किसी सीट पर। किसी पेड़। किसी पत्थर के पास। कई कई जगह तो उन दिनों के बाद मन भी नहीं करता। के जाऊं। वहाँ जब तुम नहीं मिलोगी तब क्या करूँगा। यही सोच बचता हूँ। ऐसे ही उस दिन के बाद कई-कई बार रिक्शे पर बैठने से मना करने लगा। और बैठता तो दिल्ली में तो बिलकुल नहीं। किसी लड़की के साथ तो और नहीं। वैसे अगर आज तुम न मिलती। न ऑटो वालों की हड़ताल होती। तब न तुम किसी दूसरे का इंतज़ार करती। न मैं वहाँ टपकता। और जाता भी तो अकेले ही। पैदल। कॉलेज तक।

सच कहूँ उस दिन किसी बॉलीवुड की फिल्म के हीरो की तरह मैंने तुम्हे बोल तो दिया पर उसके बाद कभी हिम्मत जुटा ही नहीं पाया। यह बिलकुल वैसा ही था जैसे किसी चोर की चोरी सबके सामने आजाये। जैसे काले सफ़ेद या किसी भी रंग की बिल्ली रास्ता काट जाये। जैसे साँप सूंघ जाए। बिलकुल सूंघ ही गया। चुप लगा गया। कुछ बोल ही नहीं पाया। कुछ भी। कभी भी। कमज़ोर से डरे हुए। सहमे घुन्ना साइड हीरो की तरह। लव स्टोरी में भांजी मारते शरीफ से दिखते विनोद मेहरा की माफ़िक। जिसकी सारी ऊर्जा जैसे ख़त्म हो गयी हो। प्रेम ऐसे कमज़ोर लोगों के हिस्से नहीं आता।

मेरे हिस्से से भी कूच कर गया। आज भी वह क्षण कभी-कभी कौंध जाता है जब तुमने बिन बोले अपनी पलकों को उठाकर पूछा था। कैसे हो? और मैंने गर्दन हिलाकर कहा था। ठीक हूँ। इसे अब कुछ समझ भी लूँ। पर। अब देर जैसा कुछ हो गया है। जिसमे पीछे लौटकर जाना मुमकिन नहीं है। न उन दिनों को फिर से दुरुस्त किया जा सकता है। तुमने भी सोचा होगा कैसा फट्टू लड़का था दिन भी कौन सा चुना? और अगर दिल से ही बोल था तो फिर बोलती क्यों बंद हो गयी?

तो मेरी 'तुम' से इतना ही कहना चाहता हूँ के मैंने जितना तुमसे प्रेम नहीं किया उससे ज़यादा उसपर सिर्फ विचार किया। फिर तब तो एक ही चीज़ होगी। जो हुई भी। हम दोनों कभी नहीं मिले। इधर यह सब लिखने की बजाये तुम्हे बता देता तब क्या होता। क्या हम साथ होते। या ऐसे ही मैं यहाँ कीबोर्ड पर किटिर पिटिर कर रहा होता। मालुम नहीं। शायद मुझ जैसे चुप्पे को याद रखने की कोई ज़रूरत होती भी नहीं। धीरे धीरे दिन पीले पन्नो की तरह पुराने होते जायेंगे और छवि धुंधली। जितनी जल्दी यह होगा उतनी ही जल्दी कोई नयी याद वहां अपनी जगह पर दुरुस्त होकर दिल के पास रहेगी। धुंधला होना खोते जाना है। और मैं खो जाना चाहता हूँ। उन सभी जगहों से जो मेरी सही जगह अब नहीं रहीं। शायद तुम्हारा दिल भी ऐसी जगह है।

पर आज यह सब इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि पीछे किसी सुबह उठा तो तुम सपने में थी। उठकर याद भी कर लिया था। के लिख लूँगा। पर भूल गया। जितना याद रह गया उसमे सिर्फ हम दोनों थे। बातें कुछ कम थी। एक दूसरे को देख ज़यादा रहे थे। जैसे फिर कभी न मिलने के लिए अपनी अपनी खोहों में लौट जाने से पहले की कोई तय्यारी। कैसे कैसे होते जा रहे थे कुछ समझ नहीं पा रहा था। यहाँ हम असहज नहीं थे। बिलकुल नहीं। बस पिछले कई मिनिटों से बोल नहीं रहे थे। के अचानक तुमने कहा 'तुमने ऐसा किया ही क्या के मैं तुम पर विश्वास करूँ। सिर्फ बोल भर देना ही प्यार नहीं..। यहाँ यह बात बेमानी हो गयी के हम दोनों एक दूसरे को जानते ही कितना हैं। शायद कुछ-कुछ जान भी गए हों। पर अब आगे नहीं। तब मैं बोला 'जितना भी मैं तुम्हें याद हूँ उसे अपने मन की किताब से मिटा देना..' जैसा मैं नहीं हूँ वैसा क्यों कह गया समझ नहीं पाया..और वहीँ सपना टूट जाता है..

आवाज़ें..

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