मई 29, 2013

यह शहर अकेला करते हैं

इस लिहाज से दिल्ली बिलकुल भी ठीक शहर नहीं है। यहाँ वापस आए कुल जमा मेरे पास डेढ़ दो दिन ही हैं पर अंदर से लगातार यह मुझे अकेला करे दे रहा है। इसके ढर्रे में कुछ तो ऐसा है जो जोड़ता नहीं है। या ऐसा कुछ जो जोड़ नहीं पा रहा। कुछ तो है। पर क्या करूँ। लौटना तो था ही। लौट पड़े। जितने भी दिन बाहर रहा सुकून से था। अभी भी उन दिनों को छू लेने का मन करता है। कुछ-कुछ छू भी लूँ पर उन्हे फिर यहाँ की नगरीय गतिकी में जी न पाने की कसक है। टीस सी है के क्यों लौट पड़े। जो और कुछ नहीं तो तोड़ ही रही है।

यहाँ की परिधि की अपनी परिभाषाएँ है जो आते ही जकड़ लेती हैं। उन्ही में से एक है तकनीक। दो घंटे भी नहीं बीते थे के फ़ेसबुक पर हाज़िरी लगाने पहुँच गए। यह इन जैसे शहरों की त्रासदी ही कही जाएगी जहाँ सब आमने सामने नहीं मिलते। मिलने के लिए लॉगिन करते हैं। जीते जागते लोगों से मुलाक़ाते यहाँ ‘शेयर’ करते हैं। दोस्ती गाँठते हैं। एक ऐसी दुनिया में रहते हैं जहाँ मिलने से हमेशा बचना ही चाहते हैं। बहोत छोटे-छोटे घेरों में मिलते जुलते हैं। एक तरह की खोह जैसे। अंधेरे बंद कमरे।

पता नहीं यह इन शहरों के अकेलेपन को कितना भर पाते हैं। भर नहीं पाते तो आभास कितना देते हैं यह भी पूछे जाने वाला सवाल है। यहाँ जुड़ना खुद को दिलासा देने जैसा ही है। के हाँ कुछ हैं जिनसे बात करने के बहाने लगातार बन रहे हैं। कुछ अपनी कुछ उन दूसरों की पता चलती रहती है। यहाँ की ज़िंदगियों के क्षेपक की तरह। यह चिप्पक पतंग के कन्नों को कितनी देर तक संभाल पाएंगे कह नहीं सकते।

बाहर था तब तक फ़ोन सिर्फ फ़ोन वाले मूलभूत काम ही करता रहा। जैसे ही एनसीआर में दाखिल हुआ पता नहीं सुबह ही यह अपनी द्वितीयक भूमिका में कैसे आ गया। क्या हम इन जगहों का खालीपन इस तरह भरने की कोशिश कर रहे हैं। उसमे हम कितना सफल हुए उसके तफ़सरे में न भी जाएँ तब भी यह एकांत रिक्तता की तरफ ही ले जाता है और इस बिन्दु पर आकार शायद कहा जा सकता है के इन शहरों की संरचना में यह खालीपन अकेले हो जाने का भाव यहाँ की 'उपभोक्तावादी संस्कृति' की तरफ धकेल देता है। यह कुछ-कुछ इस रूप में भी अपनी स्वीकार्यता को वैध बनाता है जहाँ हमारे पास उन खाली क्षणों का कोई और विकल्प दूर-दूर तक नज़र नहीं आता।

इसे इस रूप में भी कहा जा सकता है के शहरों की बनावट में यहाँ का कोई मूल निवासी होता ही नहीं है। होता तो शायद कहीं का भी नहीं है। पर इन उत्तर पूंजीवादी संकल्पनाओं में शहर खुद नहीं बनता। उसे बनाया जाता है। इन शहरों की ज़रूरत किन्हे है यह भी ध्यान से देखे जाना चाहिए। हम इन जगहों में कर क्या रहे हैं खुद से पूछे जाने वाला सवाल है। कोई जवाब एक रेखीय नहीं होगा। न ही सर्वमान्य। पर फिर बात आएगी कौशलों की। जिनसे यह शहर आज तक टिके रहे हैं। उनमे परिवर्तन भी हुए होंगे और संशोधन भी। काँट छाँट के बिना जायदा देर तक टिके रहना संभव ही नहीं है। फिर संभव तो विस्थापन के बिना उन कौशलों को सीखने वाले भी नहीं मिलेंगे। प्रवासी भी इसमे अपनी भूमिका निभाते हैं और महत्वपूर्ण कारक के रूप में सदा से उपस्थित हैं।

‘विकसित’ हो जाना अगर ‘शहर’ हो जाना है तब हमने बिलकुल ठीक मेढ़ पकड़ी है। उन्ही को अपने आदर्श के रूप में देखने में कोई भी समस्या नहीं होनी चाहिए। उसे सभी को समान रूप से स्वीकार कर लेना चाहिए। पर लगता नहीं है के ऐसा कुछ भी सही है। अगर ऐसा न होता तब अपने को बचाए रखने के हिंसक अहिंसक संघर्ष कम से कम इस भौगौलिक नक़्शे के भीतर कहीं भी दिखाई नहीं देते। वे खुद को बदलते नहीं देखना चाहते -ऐसा सत्ता पक्ष सोच रहा है- तब क्या उन्हे ‘यथा-स्थितिवादी’ कह कर ख़ारिज कर देना चाहिए। किसी भी तरह के प्रतिरोध को उनके अस्तित्व की लड़ाई नहीं मानना चाहिए?!

जो संघर्ष नहीं कर सके आज वे अपने पुरखों की जगहों को छोड़ इन शहरों को बसा रहे हैं। इनकी बसावट में उनकी कोई पूछ नहीं है फिर भी वह यहीं हैं। यह सब खुद को अकेले होने से नहीं बचा पाये। भले उन जगहों पर उनका शोषण होता रहा हो पर यह शहर क्या कम हैं। लगातार उनकी स्थायी यादों को अपदस्थ कर खुद को स्थापित करती यह अमानवीय संरचना उन्हे ‘उपभोक्ता’ में तब्दील कर देती है। फिर दुनिया मुट्ठी में करता मोबाइल होगा और दस बीस रुपये वाला रीचार्ज कूपन। के इस इतवार अपनी मेहरारू से कुछ देर तो बतिया सकूँ। और फिर कोई बहाना बना उसके इस शहर आने को टाल जाऊँ।

मई 24, 2013

दिल नहीं भरा था पिछले दिन से..

उसी के दूसरे दिन हमने रेल म्यूज़ियम जाने का फैसला किया। हम यहाँ से मैं, मुनीन्द्र, रामकुमार, राजकुमार, किशोर और हर्षवर्धन तय्यार होकर निकले। हर्ष का जाना लास्ट मोमेंट पर तय हुआ। उसका जाना  तो मुमकिन न था। पर हम उसके लिए थोड़ा रुक गए।

हम यहाँ से पाँच सौ बाईस से शिवाजी स्टेडियम गए। वहाँ से छह सौ बीस नम्बर की बस में बैठे। दो दो रुपये की टिकट कटाई। पर वहाँ तक की टिकट सात रुपये की थी। हम स्टाफ चला रहे थे पर कंडक्टर भड़क गया। उसने हमे जंतर मंतर के पास उतार दिया। थोड़ा पैदल चल कर एक बस में फिर चढ़े। उसमे टिकट ही नहीं ली। स्टाफ कहा तो उसने कहा कोई स्टाफ नहीं चलता। हम अगले स्टॉप पर उतर गए। फिर वहाँ से एक और बस में चढ़े। फिर हमने दो दो रुपये की टिकट लेकर किसी तरह हम रेल संग्रहालय जा पहुंचे।

गेट पर हमने चार बच्चों वाली टिकट लीं और किशोर और हर्ष की अडल्ट की टिकट ली। वहाँ हमने पुराने रेलों के मॉडल देखे। उनके साथ एक बटन था उसे दबाने पर उसके बारे में जानकारी प्राप्त होती थी। हम हर मॉडल में वह बटन खोजने लगे। हमे वहाँ भी वैसे टच स्क्रीन कम्प्युटर मिले जैसे नेशनल म्यूज़ियम में थे। इसमे मेट्रो रेल के बारे में जानकारी दी हुई थी। पर वहाँ एक बच्चा पहले से ही खड़ा था वह हट हही नहीं रहा था। हम वहाँ से आगे चले गए।

फिर हमने मिनी रेल की यात्रा करने की सोची। हम चारों ने तो बच्चों वाली टिकट ली पर किशोर और हर्ष ने फुल टिकट ली। थोड़ी देर बाद बारह बजे ट्रेन चल पड़ी। दस मिनट के अंदर ट्रेन वापस आ गयी। कुछ मज़ा नहीं आया। हमें भूख लगी। हम ट्रेन ट्रैक को पार करके बीचों बीच रेस्टोरेन्ट जो कि ढलान से चढ़कर ऊपर था वहाँ गए। हमने वहाँ स्कूल वालों के लिए मिलने वाली कोक मांगी तो उसने कहा यह स्कूल ग्रुप वालों के लिए है। हमने वहाँ कुछ नहीं खाया। भाग गए।

नीचे आने पर हमने मैगी खाने का प्लान बनाया। दस दस रुपये की मैगी थी। हमने सोचा अच्छी होगी। हम ट्रेन में उसके बनने का इंतज़ार करते रहे। जब वह आदमी दोने में मैगी सर्व कर रहा था तो ट्रेन चल पड़ी। हमारे अरमानों पर पानी फिर गया। मैगी भी बहुत कम कम थी। हमने ट्रेन का मज़ा एक ही टिकट से दो बार उठाया। और फिर हम बाहर आ गए।

फिर बस में सवार हुए। दो दो की टिकट देकर उसने कहा सात सात की लगेगी। हमने कहा स्टाफ है। वह नहीं माना। हम आगे स्टॉप पर उतार गए। फिर हम पैदल ही नेशनल म्यूज़ियम तक आए। एसएस\आरे प्राण निकाल गए। स्टॉप पर हर्ष और किशोर रुक गए हम आगे जाकर नहर पर पाव धोने चल दिये। वह दोनों तो ढाई बजे घर पहुंचे जबकि हमारे सारे सपनों पर गंदा पानी फिर गया। जगह बिलकुल भी बैठने लायक नहीं थी। फिर हम स्टॉप पर खड़े थे हमे फिर वही पाँच सौ बाईस दिखी जिसमे स्टाफ चला कर शिवाजी स्टेडियम तक आए थे। फिर हमे डीटीसी पाँच सौ बाईस मिली जिसमे हमने दो दो की टिकट ली। हम तीन बजे पहुंचे। 

{दिन पिछला यहाँ है }

मई 23, 2013

मई का वो दिन जब पता नहीं कितनी गर्मी थी

{वही पुरानी डायरी जिसमे पूरे ग्यारह साल पहले आज के दिन हम खूब  ऊब चुकने के बाद छोटे छोटे से नन्हें मुन्ने निकले थे दिल्ली घूमने। वो भी दो दिन लगातार। गर्मी तब भी इतनी पड़ती थी। उसके बावजूद..और हाँ उसी कॉपी में आगे तेईस मई की नेशनल म्यूज़ियम की टिकट चिपकी मिली जिससे पता चला के वो कौन सा दिन था ..!! }

24॰07॰2002
मई के किसी दिन हमने चिड़िया घर और नेशनल म्यूज़ियम घूमने का इरादा किया। उस दिन हम छह लोग थे। हम ने पंचकुइया से 851 पकड़ी और तिलक ब्रिज पर उतरे। हम वहाँ से चिड़िया घर पैदल आ गए। हम तो आने में ही तड़प गए। हमने सोचा अब चिड़िया घर क्या घूमेंगे। हमने पाँच पाँच रुपये की पाँच टिकट और चिड़िया घर के अंदर गए। 

वहाँ सबसे पहले हमने कच्छुआ देखा। फिर हम सड़क पर बने हुए तीरों के साथ चलना शुरू किया। तब हमने हिरण, जंगली गाय, बारहसिंघे, भेड़िये, कबूतर, तोते, बंदर, जिराफ, हलाकू बंदर देखा। वहाँ एक बंदर बाघ की माँद (बाघके खुले पिंजरे) में आकार उसे चुनौती देकर नहा कर भाग गया। बाघ सफ़ेद थे, वह उसका कुछ नहीं बिगाड़ सके। हमने लकड़बग्घे भी देखे। पर वहाँ सबसे ज़्यादा हिरण ही थे।

हमे बीच बीच में प्यास लगती थी हम थोड़ा रुक जाते आराम करते चलते। हमने भालू, बब्बर शेर भी देखे। उनके आगे ही एक कमरे में साँप शीशे की शेल्फ़ में रखे हुए थे। वहाँ पर नागराज, अजगर, पानी वाले साँप रखे हुए थे। एक साँप दस फुट का था। कुछ साँप जहरीले भी नहीं थे। कुछ साँप पेड़ पर रहते थे। हम घूमते घूमते बहुत थक गए। बहुत अधिक जानवर देख कर जा रहे थे परंतु राजू की तमन्ना चिम्पांजी को देखने की था। वो हम नहीं देख सके। वहाँ हलाकू बंदर चिल्ला रहा था। वहाँ रंग बिरंगेपंख वाले तोते थे। कुछ के रंग तो बहुत ही सुंदर थे।

इसके बाद हाँ एक बजे के आसपास चिड़िया घर के बाहर आगए। हम चिड़िया घर की कैंटीन में गए वहाँ डोसा पच्चीस रुपये का था। हम वहाँ से चुपके से खिसक लिए। फिर हमने बाहर पाँच पाँच रुपये की माज़ा पी। वह तो बिलकुल रसना की तरह लग रही थी। लिखा था आखिरी के तीन दिन। हम लालच में आ गए और छह बोतल ले ली। पता चला की यह तो रसना है। फिर हमने कुछ खाने की सोची। हमे दुकान वाले पकड़-पकड़ कर ले जा रहे थे। हम एक दुकान पर बैठे। हमने वहाँ छोले भटूरे लिए। उस छोले में इतनी मिर्च थी की लग रहा था छोले कम मिर्च जायदा थी। लग रहा था मिर्च में छोले मिलाये हों। दस या पंद्रह रुपये का छोला भटूरा था। फिर हम यह खाकर बाहर आए। बाहर हमने एक कॉमिक्स अंगारा खरीदी दस रुपये की। क्योंकि छुटकी चाहती थी। उस पर जानवर बने हुए थे।

फिर हम चिड़िया घर से राष्ट्रीय संग्रहालय पैदल जा रहे थे। बीच में इंडिया गेट पर हम रुके। वहाँ पैर डालकर कुछ देर बैठे रहे। सारी थकावट दूर हो गयी, पर मंजिल अभी दूर थी। मेरे खयाल से संग्रहालय वहाँ से एक दो किलोमीटर होगा। हम ढाई बजे वहाँ पहुंचे। वहाँ एक पंगा था। स्टूडेंट्स एंट्री फ़ी एक रुपया, पब्लिक टेन रूपीज़ पर हैड। हमने काउंटर पर टिकिट वाले को किसी तरह पटाया और पाँच रुपये की टिकट ली और अंदर आ गए।

अंदर जाते ही हमने देखा टॉयलेट। हमने सोचा इसका प्रयोग कर लिया जाए। सारे उस पर टूट पड़े। वहाँ हमने हैंड ड्रायर देखा। जिसमे हाथ आगे आते ही गरम हवा आने लगती थी। सारे उसके पीछे पड़ गए। हाथ हटाते ही वह बंद हो जाता था। फिर हम सबसे पहले हड़प्पा संस्कृति के कमरे में पहुंचे। हमे सबसे पहले टच स्क्रीन कम्प्युटर दिखा जिस पर हाथ लगाने पर ऐरो इधर उधर होता था। जिसके बारे में जानकारी चाहिए वहाँ ऐरो को लाओ और उसके बारे में जानो। ऐसे हम एक कमरे से दूसरे कमरे तक दूसरे से तीसरे तक पहुंचे। वहाँ कमरे के अंदर कमरा था। वहाँ उनके जीवन के बारे में, रहन सहन के बारे में, व्यवहार के बारे में, पूजा के बारे में, बर्तनों के बारे में पता चला।

चार बजे हम वहाँ की कैंटीन में पहुंचे। वहाँ पाँच रुपये में खाना था। हमने सोचा खाना खा लेते हैं। लेकिन खाना नहीं था। हमने वहाँ तीन कोल्डड्रिंक (कोक) ली। वहाँ सिर्फ मट्ठी थी दो दो रुपये की। हमने वो नहीं ली। इसके बाद हम वहाँ की दुकान (म्यूज़ियम शॉप) में गए। वहाँ एक किताब डेढ़ सौ की। पतली पतली किताबें बहुत महंगी थी। वहाँ क्राफ़्ट,  फ़र्नीचर, शतरंज, आदिवासियों द्वारा बनाए गए समान रखे थे। हमने सिर्फ देखा, लिया कुछ नहीं। यह सब देख दाख कर हम साढ़े चार बजे तक बाहर आ गए और वहाँ से पाँच सौ बाईस पकड़ कर पाँच साढ़े पाँच तक हम घर आ पहुंचे। हमने खूब एंजॉय किया। हमने पप्पू पर पैट्टी भी खाई।

मई 09, 2013

वो जो साइकिल से जाना था: किश्त तीन

इक्कीस जून शुक्रवार की चन्द्र्भान गाँव आकार हमे कहते हैं कि गिलौला चलोगे। हम तैयार हो गए। साढ़े आठ बजे हम वहाँ से चले। हम चले ही थे कि चंद्र को शौच लगा। वह पल के बाद वाले खेतों में करने बैठ गया और हम आगे बाग में उसका इंतज़ार कर रहे थे। फिर हम रत्नापुर पहुँचे। हमने वहाँ हवा भरी और गाँव गाँव के रास्ते हम नहर पर पहुँचे। मैंने ज़िंदगी में तावे नहीं देखे थे वो भी एक साथ तीन तीन। हम उसपर चढ़ गए। वह दो तीन मंज़िला तो था ही। हमने दो पर चढ़ कर देखा।

उस दिन खास बात यह थी की उल्टी हवा चल रही थी। हम पूरब की तरफ़ जा रहे थे और हवा भी पूरब की तरफ़ से आ रही थी। एक जगह से आठ पल पार करने पर गिलौला वाली सड़क आती थी। एक पल को पार करने पर लगता हम कितनी दूर आ गए। पुल तो पास लगते पर चलने पर पता चलता की कितनी दूर है। हम आरा मशीन पर रुके और हाथ पैर मुँह धोया। फिर चल पड़े। हम गिलौला साढ़े ग्यारह पर पहुँचे।

चंद्रभान को किरायेदार से पैसा लेना था छह सौ रुपया। उसने वहाँ पीपल के पेड़ की गर्दन तोड़ दी। वह किरायेदार बड़ा चालू था उसने कहा की रुपया कल दूंगा। बाईस को बैंक से रुपया निकलवाकर। तो हमें एक दिन गिलौला ही रुकना पड़ा। हम सदासिव तरफ़ निकाल पड़े। नहर के पल पर हमने बैठकर बड़ी बातें करी। राज़, जानी दुश्मन, जोड़ी नंबर वन आदि फिल्मों की। फिर रात को खाना खाया और फिर मामा की दुकान पर चले गए। साढ़े दस बजे घर पहुँचे। वहाँ पर डेढ़ रुपये का पान देते थे और डाली ज़्यादा डालते थे।

उसी रात को बारिश हो गयी हम टीवी वाले कमरे के बगल में गली के बगल वाले कमरे में सो गए। सुबह छह बजे उठे। बारिश के कारण सब जगह पानी पानी कीचड़ कीचड़। सुबह सौच करने एक पुराने भट्टे के पास गये। हम एक किलोमीटर ही दूर तो चले ही गए होंगे। बीच में सुबखा किसान कॉलेज था और इंडियन ऑइल पेट्रोल पम्प भी था। हम वहाँ से खा पीकर ग्यारह बजे चले। इस दिन साढ़े नौ बजे आशुतोष गोवारीकर का इंटरव्यू हैलो डीडी में आया था।

बहराइच में मुझे चप्पल भी लेनी थी। पहले हमने तेरह तेरह रुपये वाली लस्सी पी। कचहरी रोड पर। फिर पक्का तलाव के पास (चाँदनी स्टार चप्पल्स) दो जोड़ी चप्पल खरीदी। फिर हमने कहा चलो फिल्म की सीडी लेते हैं हमने नदिया के पार की सीडी तो उसी रात चलायी। फिल्म अच्छी थी। उसी दोपहर हम तीन साइकिल पर छह बहिनों को मेला दिखाने लाये। मेरी साइकिल पर के भाई की साइकिल पर दो, चाचा की साइकिल पर तीन। उन्होने मेले से बीस बीस रुपये वाली गुड़िया खरीदी, दो दो रुपये वाला गाड़ी वाला झूला झूला। और दो दो रुपये वाला ही इंडिक चलता फिरता सरकस देखा। जिसमे हम बड़े छोटे मोटे दिखते हैं। मेला देख लेने के बाद हमने चाट खाया। टिक्की दो दो रुपये की। उसी दिन पापा बीस को चलकर इक्कीस को आए थे।

तेईस को 'राज़' लगाने की बात थी पर भाभी और भईया में झगड़ा होने के कारण और बैटरी देर में लाने के कारण राज़ नहीं लगी। झगड़ा नीतू के साथ बीना को ले जाने पर हुआ था। यह हमारी गाँव में आखिरी रात थी इसलिए यह रात मैंने सड़क पर बिताई। और भाई ने गाँव में बिताई। रात को हमने अंताक्षरी खेली। संदेप और मैं तथा बीना और नीतू। वह हार गए फिर हमने भूत भूत खेला। पहले मैं और संदीप बने फिर वे। इसके बाद हमने खाना खाया और सो गए। सुबह उठा चक्की पर गया मंजन शौच किया चाय पी।

हम दो बजे घर से चले। उस दिन भोला मामा और मामी भी आए हुए थे। और खास बात यह की रीना यहाँ थी ही नहीं। तीन बजे हम तांगे से रोडवेज़ पहुंचे। बाबा भागते भागते हमसे मिलने आए। चार सवा चार बस चल पड़ी। साढ़े छह बजे लखनऊ तिरतालीस किलोमीटर रह गया था पर ड्राइवर ने हमें साढ़े आठ पर चारबाग पहुंचाया। हमने प्लेटफॉर्म पर खाना खाया। हमारा डब्बा एस-स छह था। दस बजे ट्रेन चल पड़ी और हम आठ बजे दिल्ली रेल्वे स्टेशन पर पचीस को थे। 


{बकाया दो पीछे की कन्नियाँ ; पहली : वो जो गाँव जाना थादूसरी : तब जो मेला देखा था..}

मई 08, 2013

परसो रात की अधूरी पोस्ट..(कुछ लेने न लेने के बीच)

शाम लौटा तो पता नहीं बैठने का मन नहीं हुआ। लगा कुछ है जो अभी भी चल रहा है। अंदर ही अंदर। कई फ्रेम एक साथ आगे पीछे हो रहे थे। चकरघिन्नी की तरह घूम रहे थे और उनके हाथ लगा एक लट्टू मैं था। धूप कुछ ज़यादह ही थी। सीधे खोपड़ी को चीरती हुई। अन्दर तक धँस जाये। पर तब भी चलना तो था। चल रहा था। शुरू हुआ था मेट्रो ट्रेन के डब्बे से।

दो लड़के। दोनों साथ-साथ बैठे थे। एक के हाथ में कोई बड़ा सा 'सैमसंग' का टचस्क्रीन फोन था। और शायद 'वॉट्स ऐप्' पर किसी लड़की से बात कर रहा था। ऐसा इसलिए लगा क्योंकि वो जो दूसरा था बीच-बीच में ऊपर बीत गयी लाइनों को पढ़ कभी अपने उस दोस्त को कनअँखियों से देखता और देख मुसका देता। या फिर थोड़ी देर बाद जब गाने से ऊबता तब फिर फिर यही क्रिया दोहराता। उसका ऊबना कहीं दोनों की बातों का बहाना तो नहीं था। बहरहाल।

इस दरमियान अपन खुद उधेड़बुन में लगे हुए थे। पढ़ने के लिए कौन सी किताब दें। लड़की को कुछ देने की भी सोची तो किताब!! दिक्कत क्या थी। कि कुछ लड़की को देना है। या हम उस समय में लड़की के लिए कुछ लेने की सोच रहे हैं जहाँ 'किताब' किसी मीना बाज़ार की ड्रेस या हाईटेक मोबाइल फोन या तनिष्क की पाँच हजारी एअररिंग के मुकाबले कहीं पिछड़ी आउटडेटेड सी चीज़ है। या मेरा ऐसा सोचना खुद को हीन भावना से भर लेना है। या कोई तीसरा तर्क। कोई जवाब नहीं मिला। बस दिखी अपनी जेब। उसमे चिल्लर की तरह पड़े कुछ नोट। जिनसे अपने आप को आसानी से साहित्य अनुरागी कहलवाया जा सकता है और उन व्यवस्थाओं के प्रति मुखर प्रतिरोध भी किया जा सकता है। कमज़ोर का सच्चा साथी। उसका विचार।

एकबारगी मेट्रो में चढ़ने से पहले तो मन यह भी हुआ के फोन करता और कमला नगर जाता। लड़कियों को लड़कियों के बारे में जादा पता होता है। पर तब तक पेपर निपट चुका था और मैं कैवलरी लेन की तरफ़ से माल रोड पहुँच रहा था। लगा ठीक ही किया जो फोन हाथ में लेने के बाद नंबर काट दिया। धूप में किन्ही मैडम के साथ निकलना ठीक नहीं। तुरत ख़ारिज। अगली बार। सोचेंगे नहीं। फोन कर ही देंगे। या वहीं खड़े हो जाएंगे। कमरे के बाहर। या उस बैंच पर बैठे पाये जाएंगे।

पता नहीं कैसे 'सतनाम स्टेशनरी' पर नज़र नहीं पड़ी। एक पैन तो ले ही लेता। जब 'अरुण वस्त्र भंडार' दिखा तो लगा वो दुकान तो टाउन हाल के पास ही थी। आज गायब कहाँ हो गयी। पीछे लौटा नहीं। लौटकर जाने का मन नहीं किया। पैदल था न। फिर चल कर इतना ही मुझे खुद आना पड़ता। इसलिए टाल गया। पर वहाँ जो लोग थे सारंग की तरह भिनभिना रहे हों जैसे। सड़क को खाली तो बिलकुल नहीं कह सकते। यही तो सीज़न है। खूब खूब शादियाँ हो रही है। ढेर ढेर झोले ढोये जा रहे हैं। बेखटके। रिक्शों पर बच बच बैठे निकल रहे हैं। और उचक उचक रिक्शे वाला उन्हे खींच रहा है।

अब खुद को मैं नई सड़क पर देख रहा था। क्या करने के आया हूँ। किताब लेने।नहीं लूँगा किताब विताब। शायद मेरे अंदर का साहित्य थोड़ी देर के लिए कहीं कूच कर गया। अब खाली हाथ जमा मस्जिद के बिलकुल तीसरे गुंबद के पीछे था। चावड़ी बाज़ार शुरू हो रहा था। वहीं सुदर्शन की दुकान पर तीस रुपये दिया केसर मिल्क बादाम वाली बॉटल ली। दिमाग जो गरम हो गया था उसे ठंडा कर रहा था। चल नहीं रहा था। ठहर गया था। उसका रेंगना भी बंद था। पर अब क्या। क्या दिया जा सकता है।यह सवाल उतना ही बड़ा था जितनी छोटी मेरी जेब।

पर उस फूल को भी ले जा सकता हूँ जिसे रोज़ गिरते देखता हूँ। उसकी कीमत कोई नही लगा सकता। देखा दिमाग काम करने लगा। सच कहूँ तो बड़ी जल्दी अपनी 'औकात' पर आ गया। कम धनी का दिल ऐसे ही तो सोचेगा..

सोच रहा हूँ..पता नही क्या..लिखने का मन नहीं है..

मई 07, 2013

फ़ोन की लहलहाती खूंटीयों का उत्तर पाठ

मन तो कर रहा है अपना बीस हजारी फोन दीवार पे दे मारूँ। और फिर जो टुकड़े हो जाएंगे उन्हे उठाऊंगा भी नहीं। फोन होता किसलिए है। कम से कम वक़्त पड़ने पर किसी से बात की जा सके। किसी का फ़ोन आए तो बिलकुल उसी क्षण घंटी बजे। न के घंटेभर बाद उसपर पैबंद लगते ‘छूटी कॉल’ के एसएमएस आएं। मतलब तब फ़ोन सिर्फ डिब्बे में तब्दील हो जाता है जब उसके मूलभूत प्रकार्य भी उससे संभव न हो सके। उसकी सारी ‘स्मार्टनेस’ धरी की धरी रह जाती है। जब आपका सेवा प्रदाता ‘एमटीएनएल ’हो।

यह कोई एक दिन में उपजा ज्ञान नहीं है। भईए पाँच साल से भी ज़ायदह का अनुभवजनित ज्ञान है। हालत तो यहाँ तक पहुंची हुई हैं के इतनी बड़ी छत होने के बावजूद हफ्ते दो हफ़्ते में वह जगह खुद तलाशनी होती थी कि कहाँ फ़ोन से सिग्नल टकरा रहा है। तब कोई मैसेज उसके दक्षांश अक्षांश की सूचना नहीं दे पाता था। कब कहाँ से बात करते करते फ़ोन कट जाए फ़ोन धारक को पता ही नहीं चल पाता। पर जब कट जाता है तब सोचता है घंटे भर पहले तो इसी बक्से पर चढ़ उससे बात की थी।

कल ही संचार हाट पर एक विद्वान टकर गए। लगा गलत जगह हैं। उन्हे तो कोर्ट में प्रैक्टिस करनी चाहिए। बोले देखिए बात दरअसल यह है के हम तो उतनी फ्रिक्वेन्सी पर फ़ोन चला रहे हैं जितने पर सुप्रीम कोर्ट का जजमेंट है। आप तो देख ही रहे हैं कितना रेडिएशन मोबाइल टावरों से हो रहा है। कैंसर के केस बढ़ गए हैं। और रही बात प्राइवेट कंपनियों फ़ोनों की तो साहब जिस दिन कोर्ट का डंडा चलेगा उस दिन सब बंद। मतलब सत्ता पक्ष की जो मोबाइल सेवा हैं उनकी भागीदारी गौरैया के विलुप्त हो जाने में नगण्य है। क्योंकि जब टावर होंगे तभी सिग्नल पकड़ेगा। तभी नीचे के माले पर भी फ़ोन की घंटी बजेगी। तभी रेडिएशन होगा। तभी कैंसर की संभावना बढ़ जाएगी। मतलब एक तो इतनी लचर सेवा उसपर परम तार्किक हो जाने के खतरे।

किसे नहीं पता है के यही वह सत्ता के गलियारे हैं जो ‘स्पेक्ट्रम’ औने पौने दाम में बेच किनारे हो चुके थे। लगातार सेना पर दबाव बनाया जा रहा था के वह अपने हिस्से की तरंगों में कुछ ढील करे। इस देश के नागरिकों के हिस्से पड़ने वाला संसाधन कैसे बंदरबाँट का मौका लेकर आया था। किसे नहीं पता के इस दिल्ली के बाहर ‘बीएसएनएल’ क्या खेल खेलता है। दुर्गम से दुर्गम स्थानों पर उसकी उपस्थिती व्याप्ति सत्ता के उपकरण के रूप में अगर ढीली हुई है तो उसकी अर्थशास्त्रीय, समाजशास्त्रीय व्याख्याएँ क्या कह रही हैं।

अभी केरल के ‘रेन फॉरेस्ट’ की बुकिंग देख रहा था। जिन भी रिज़ॉर्ट की वैबसाइट खंगाली वहाँ किसी ने भी इस सरकारी उपक्रम का नाम नहीं लिया। वहाँ या तो ‘आइडिया’ है या ‘वोडाफोन’। देश में जितने भी सर्कल हैं वहाँ क्या स्थिति इसके उलट है? बिलकुल नहीं। बल्कि खुद वह अपने आपको लगातार पीछे खींच वहाँ निजी सेवा प्रदाताओं के लिए जमीन बनाई जा रही है। कि सरकार या ऐसे किसी तंत्र कि वैधता से लगातार खिलवाड़ किया जाये कि जिससे कि ‘उपभोक्ता’ इनके खंबों से परेशान होकर खुद ही खिसक जाए। वहाँ अगर बिजली न होने को बहाना बनाया जा रहा है तब क्यो किसी ‘एयरटेल’ कि खूंटी सबसे जादा दिखाई पड़ती है।

इसे दूसरे रूप में भी देखने कि ज़रूरत है के जिन खेतों में उनके बड़े-बड़े टावर अढ़री की बालियों की जगह लहलहा रहे हैं तो क्यों। जो काम सरकारी उपक्रम नहीं कर रहा उसकी अनुमति उन प्रदाताओं ने कैसे प्राप्त की। अपने आप को लगातार ‘अविश्वनीय’ करते जाना इस रूप में भले अल्पकालिक लाभों को सृजित करे। पर एक स्वस्थ्य लोकतन्त्र का निर्माण करने में उसकी भी एक अपरिहार्य भूमिका है। जिसे बारीकी से धूमिल किया जा रहा है।

लगातार सार्वजनिक प्रतिष्ठानों की साख का गिरते जाना कभी भी उस ‘जनहित’ में नहीं होता जिसे मुखौटा बना उसे रचा जाता है। फिर बिजली से लेकर पानी सबको निजी हाथों में सौपने के नए दरीचे खोले जाएंगे। इन अव्यवस्थाओं से उपजा असंतोष उस तंत्र के प्रति जुगुप्सा ही निर्मित करेगा। सवाल है सरकार किस कीमत पर अपने निकम्मेपन को सहर्ष वहन कर रही है। यह हमें उसी गली में ले जाएगा जहां होगा यही के जो धनपति हैं उनके पास विकल्पों की लंबी फेहरिस्त होगी और जिसकी फटी जेब है वह बस उन पाँच सितारा अस्पतालों के चमकते शीशे से डरता रहें। कि इतने महंगे चिकने फ़र्श पर अपनी गंदी टूटी चप्पल कैसे धर दे।

मई 06, 2013

तब जो मेला देखा था: किश्त दो

पंद्रह जून शनिवार को हमने चाचा के साथ दरगाह मेला देखने का प्लान बनाया। उस दिन मैं, भाई, संदीप, चाचा मेला देखने गए। हम साढ़े तीन बजे गाँव से चले। चाचा ने अशोक(सरकारी तेल की दुकान) से सरसों का तेल लिया। पंद्रह किलो और किसी मुसलमान अमीन के यहाँ रख कर आए इसी में पाँच बज गए। साढ़े पाँच बजे हम डायमंड पहुंचे। फिल्म अभी चल रही थी।

सवा छह बजे खिड़की खुली। हमने बालकनी की बीस बीस रुपये की टिकट ली। उस दिन हमने 23 मार्च 1931 शहीद देखी बॉबी देओल वाली। फिल्म बहुत अच्छी थी। गाना देस नू चल्लो देस मांगता है कुर्बानियाँ कर्तार सिंह सराबा ने गाया था। भगत सिंह उन्हे अपना प्रेरणा स्रोत मानते थे। भगत प्रताप प्रैस में आज़ाद के साथ क्रांतिकारी आंदोलन में सहयोग करते हैं। फिल्म बीच में तीन बार बिजली जाने के कारण साढ़े नौ बजे समाप्त हुई। फिर हम साइकिल लेकर साइकिल रात भर खड़ी करने के लिए ले जा रहे थे। चाचा ने साइकिल किसी नियामत के भाई के घर खड़ी कारवाई। यूनानी दवाखाना के पास।

दस बजे के करीब हम मेले में थे। सबसे पहले हमने हवाई झूला दो दो रुपये में झूला। हमे लालच आ गया चाचा तो माना कर रहे थे पर हमारे कहने पर ही वह झूले। हमारे तो प्राण ही निकाल गए। लगता था अब गिरे अब गिरे। झूला बड़ा डांवाडोल हो रहा था। तब मुझे पता चला ज़िंदगी कितन्नी मूल्यवान है। यह मेरी ज़िंदगी का सबसे भयानक क्षण था अब तक का। झूला झूलने के बाद हम एशिया सर्कस देखने गए। वहाँ टिकट दस दस रुपये की थी। उस समय तीसरा शो चल रहा था। सर्कस बच्चे चला रहे थे। उनका प्रदर्शन लाजवाब था। बच्चे ही सर्कस में थे। बीच बीच में गाने पर लड़कियां छोटी छोटी नाच करती थी। सर्कस साढ़े ग्यारह बजे खत्म हुआ।

 उसी के पास मौत का कुआं चल रहा था। जिसमे कार और मोटरसाइकिल साथ साथ चल रहे थे। टिकट पाँच रुपये की थी पर हमने यह नहीं देखा। यही मलाल रहा। फिर हमने कोक पी फिर जाकर हमने ओपी सरकार का सड़ा हुआ जादू देखा जो डेढ़ बजे समाप्त हुआ। ज़ंजीरी दरवाजे के पास एसके सरकार का भूत महल था। फिर हमने चाय और सुहाल देश की मशहूर दुकान में खाये। घूमते घूमते दो बज गए। रात में फिर मेले में हमने इलेक्ट्रॉनिक्स की दुकान देखी जिसके यहाँ एरोप्लेन एक सौ पैंतीस रुपये का था। हमने नही लिया। हमने सारा मेला घूमा। हम मोटर साइकल पर भी बैठे तीन तीन रुपये में।

फिर हमने सोने की सोची। हम वहीं पाहुचे यूनानी दवाखाने के पास। पीसीओ के पास हमने पल्ली डाली। वहाँ एक बुड्ढा बाबा बैठा था। वह हमसे सवाल ऐसे कर रहा था की हम चोरी करने आए हों। हम साढ़े तीन पर सोने लगे। पर नींद न जाने पहले तो आई नहीं फिर पता नहीं कब आ गयी। फिर मैं साढ़े चार बजे उठ गया। रात भर कभी ट्रक, ट्रॉली, बैलगाड़ी जाते रहे। सुबह मैं जनरेटर की आवाज़ से उठ गया क्योंकि वह पास ही तीस मीटर की दूरी पर चल रहा था। हम सुबह उठे मुँह हाथ धोया और चल पड़े साइकिल उठाई फिर रास्ते में सारसो का तेल लिया और में चाचा वाली साइकिल पर, भाई संदीप एक पर।

हम छह बजे तक गाँव पहुँच गए। हमने देखा कि मम्मी वहाँ नहीं हैं हमने सड़क पर जाने का प्लान बनाया। रास्ते में बड़े आम के पेड़ के पास बारिश तेज़ हो गयी हम रुक गए। पर बारिश नहीं रुकी। हमने सोचा चलो चलते हैं भीगते भागते हम वहाँ पहुँच ही गए।

{अभी खत्म नहीं, आखिरी किश्त बची है । किश्त पिछली :वो जो गाँव जाना था , किश्त अगली : वो जो साइकिल से जाना था }

मई 05, 2013

एक्सट्रीम पर्सनल: इसे ख़त ही समझना बेनामी

इतवार। सुबह। सवा सात बजे।

पता नहीं यों दिल सुबह सुबह उदास नहीं होता। पर आज है। और साथ मौसम भी। रात से ही हम दोनों साथ उदास होने लगे। नींद डेढ़ बजे लेटने के बाद भी आँखों से गायब। सोच रहा था ऐसा क्या हो जाए, जिससे तुम्हारे चहरे पर वही मुस्कुराहट लौट आए। पर तुम्हारे पास नहीं हूँ। सोचता हूँ नागमती ने 'पद्मावत' में जिस काग से अपने प्रियतम को संदेसा भेज लिवा लाने को कहा था, थोड़ी देर के लिए वही बन जाऊँ। उड़ तो सकूँगा। तुरंत तुम्हारे जागने से पहले पहुँच जाता और तुम हैरान होती। के बिन बताए कैसे। और तब हम बिलकुल आस पास होते। अगल बगल।

थोड़ी देर लेट गया। कुछ सोच नहीं पा रहा। खिड़की के बाहर अशोक पर नए आए पत्ते हैं। कोमल मुलायम चिकने। किसी की याद की तरह। तुम्हारी याद की तरह। कभी तुम्हारे गालों को छुआ नहीं है पर लगता है ऐसे ही होंगे। तुम्हारे हाथ भी क्या इतने कोमल हैं के उनमे हड्डी का पता नहीं चलता। और जो रोज़ कहता हूँ के घर से बाहर निकलते काला टीका लगा लिया करो। लगाती हो के नहीं।

कभी पढ़ा याद आया के कामदेव के तरकश में पाँच बाण थे। उनमे से दो को बचपन से देखता बड़ा हुआ हूँ। एक कहानी में अपर्हता ने किसी की पत्नी को अशोक की बगिया में बंधक बनाकर रखा हुआ है। कि वह उसके प्रति कामासक्त होकर अपने पति को भूल जाएगी। पर उसे याद आए अपने पति। कहानी स्किनर या पैवलॉव ने पढ़ी होती तो आज ‘कंडिशनिंग’ की कोई और ही परिभाषा हमारे सामने होती। वह उस समाज में पत्नी थी जहाँ औरतों को सिर्फ अपने खसम से इश्क़ करने के लिए गढ़ा जाता है। वह भी मर्द की शर्तों पर। नहीं तो उसे भी दर्द होता है सबको पता चल जाएगा।

पर यहीं आकर रचियता दखल भी देने टपक पड़ सकते हैं कि ‘नहीं वत्स..!! कामदेव ने अपना काम ही किया। एक स्त्री को पदस्खलित होने से बचा लिया। बड़ी बारीकी से महीन काम किया। प्रेम कहानी इसलिए भी प्रायोजित है क्योंकि कलयुग को थोड़ी देर और टाला जा सके। देवासुर संग्राम रचा जा सके। इसी गरज से वहाँ ‘विरह’ को रचा जाता है।

मिथकों के साथ यही दिक्कत है। उसका जो अर्थ मैं हृदय से लेना चाहता हूँ वहाँ कइयों का दिमाग दौड़ने लगा होगा। इस भाव और विचार के चक्कर में मारा हमेशा प्रेम जाता है। कहानी को अपने तरीके से उसके कई हिस्सों को छोड़ देना चाहता हूँ पर तुम हो के लग्गी से घास खिला रहे हो। वैसे किसी सांस्कृतिकप्रेम में विश्वास नहीं करता जो हमेशा ‘अमूर्त’ बने रहने की कोशिश में रहता है। मेरे हिस्से में जो इधर है वह देह जितना मांसल है। उसे छुआ जा सकता है। और तब प्रेम के नए अर्थ खुलते हैं। दोनों का साथ होना जितना स्वाभाविक है, उससे कहीं पीड़ादायक वह क्षण हैं जब दूसरा संगी सामने उपस्थित नहीं है। उसे कहने के लिए मेरे पास अभी एक ही भाव है ‘करुणा’।

तुम्हारी आवाज़ से लगा कहीं तुम्हारे घर के पास भी तो अशोक के पेड़ नही उग आए हैं। आम के तो शर्तिया होंगे। शायद उस तालाब की तरफ। जहां कभी कभी बगुले बैठे रहते होंगे। आवाज़ कानों में अब मिशरी कम घोल रही है। तुम्हारी परछाईं ने ढक दिया हो जैसे। मुझे। मेरे दिल को। उनसे निकलते भावों को। उन स्पंदनो को। जो बाहर आ रहे हैं रहे हैं उनमे सिर्फ़ और सिर्फ़ तुम्हारा ही नाम है। वो सारी दुपहरियाँ तुम्हारे हिस्से काटना चाहता हूँ। उसमे हम दोनों साथ हों। सिर्फ़ हाथ से कान की तरफ बोलें नहीं उसे छू भी सकें। कहते हैं वहाँ छूने से कुछ होता है। पर तुम बिलकुल उस वक़्त फिल्मी हिरोइनों की तरह शरमाना मत। और वो तो बिलकुल मत करना। के कान के पास जो लट छोटी जानबूझकर ऐसे ही किनही अवसरों के लिए रहने दी है, उन्हे चुपके से आँखों के सामने से कान के पीछे ले जाना। और पलकों को नीचे झुका लेना।

मैडम हम फिल्मों में नहीं हैं। हमें इज़हार करने के कई कई तरीके खुद से भी बनाने होते हैं। किसी की नकल वहाँ काम नहीं करती। वैसे हम खुद इन मौके बेमौकों पर इसके सख़्त खिलाफ़ है। अभी से बताए दे रहे हैं। उनको ईज़ाद करने में आपकी भी उतनी भूमिका चाहिए जितनी कि हमारी। जाते जाते फिर कहे देता हूँ इन सबको पढ़ लेने के बात तो काला टीका वही कान के पीछे बालों में छिपाकर अब लगाना शुरू कर ही दो। पता है यहाँ सब नज़रों के खेल खेलते हैं। हमने तो लगाना शुरू कर दिया है। आपके भी। हमारे भी। दोनों के।

और देखो..चलो, वो फ़ोन पर..

मई 04, 2013

फिर होगी शाम और मैं कहूँगा शाम हो गयी

इतने पर भी दिन खत्म कहाँ हुआ। घड़ी की काँटे अपनी जगह दुरुस्त हैं। पर पता नहीं लगता है जैसे सबके सब किसी कंट्री मेराथन में भाग लेने चले गए हों। जो जितना धीरे चलेगा, देर में पहुँचेगा वही विजेता घोषित कर दिया जाएगा। उनकी रेस चल रही है पर अपनी तो साँस ही अटक जाती है। सोचने लग जाता हूँ जब करने को एक अदद काम सिर्फ़ टाइमपास करना ही हो और करने लायक कुछ न हो तब उससे जादा उबाऊ काम और कोई नहीं हो सकता। पर सारे उड़ कहाँ गए। वैसे इतने पर भी दिमाग चल रहा है। बराय मेहरबानी। इतनी ख़ैरियत है।

तबतक उस कुर्सी, रंग उड़ गए आसमान, डायरी, पैन, कबूतर सब को कई-कई मर्तबा देख-सोच लेने के बाद मुँह लटकाए नीचे आने का वक़्त हो चुका होता है। मतलब अबतक सिर्फ़ दोपहर के खाना खाने का वक़्त हुआ है। रात नहीं हुई है। अभी दिल्ली दूर है की तर्ज़ पर खाना खाने पहुँचते हैं। पर खाना गर्मी के कारण कम खाता हूँ या कोई और वज़ह है समझ नहीं पाता। जबड़ों की जोड़ी बराबर ऊपर नीचे होते हुए अपना काम कर रही है। थाली अपनी जगह गिलास अपनी जगह पहुंचाए जा चुके हैं। आँखें टीवी पर लगी है। और दिल डूबा जा रहा है।

मन करता है जल्दी से ऊपर भाग लूँ और कुछ देर के लिए सो जाऊँ। शायद उसी दरमियानी वक़्त सबसे तेज़ दौड़ लगा ले। पर नहीं तुम बहुत बेरहम हो। तुम्हारी आँखों में पानी नहीं है। सूख चुका है। इस मौसम में कुएं नदियां सूख जाएँ आँखें क्या बला हैं। कातर नज़रों से उसकी तरफ़ देखता हूँ। पर तुम नहीं देखते। थोड़ी देर बाद मैं भी हुंह करके मुँह फेर लेता हूँ। फिर सोचता हूँ करूँ क्या। तुम्हारी कुछ तस्वीरें भी मोबाइल में नहीं हैं के दिन में दो बार देख लिया करूँ। और ये ससुरी आउटगोइंग भी। बंद भी होना था इसे। इस तरह।

बड़ी देर की जद्दोजहद से जूझने के बाद खिड़की पर पर्दा चढ़ा कर लैपटॉप उठाता हूँ। के थोड़ा तो सिनेमाहॉल का फील आए। लेकिन उसके लिए ज़रूरी है कोई धाकड़ सी फिल्म हो। इसी गरज से सारी ड्राइव खंगाल लेने के बाद याद आता है के 'डी' ड्राइव में कभी झउआ भर हॉलीवुड फ़िल्में थीं। पर पिछली बार जब विंडो करप्ट हुई तभी उन्हे डिलीट कर दिया था। 'इ' में जो बची रह गयी थी उनमे से किसी में भी इस तपती दुपहर को काट लेने का माद्दा नहीं। टॉरेंट से कौन सी फ़िल्म डाउनलोड करनी है समझ नहीं आता। कौन सी करूँ। मुँह फिर लटक जाता है। इस बार दुख जादा होता है। पर खैर। सोने के ऑप्शन पर एक बार फिर सोचने लगता हूँ।

पर याद आजाती है पिछली रात। दुपहरी भी सो गया था। जिसकी कीमत रात उल्लू की तरह जाग कर चुकाई थी या कुत्ते की नींद में था इसका फैसला अभी होना बाकी है। इसलिए तुरत ख़ारिज। आज सोएँगे नहीं। भले बोर होते रहें। हिम्मत करके एक फ़िल्म चलता हूँ। पर दिल का क्या करूँ बेचारा कभी-कभी बड़ा कमीनगी कर जाता है। अभी कल ही लो। ठीकठाक फ़िल्म चल रही थी। कि क्या ज़रूरत थी हीरोइन की शक्ल और तुम्हारे नाकनक्श चहरे मोहरे को मिलान करने की। पर नहीं। हुज़ूर करने लगे। अब यही कर लो या फ़िर फ़िल्म देख लो। आधे पर बंद कर दी। नहीं देखेंगे। इसलिए तो बिलकुल नहीं देखेंगे। ऐसा एक रोज़ और हुआ था तब इसे समझा दिया था। लगा था समझदार है। अब नहीं करेगा। पर आदत के मजबूर हैं। क्या ज़रूरत है तोते उड़ाने की। नहीं उड़ाने हमने तोते। तीतर बटेर भी नही।

इन सबसे लड़ते भिड़ते घड़ी देखना भूल जाऊंगा। जब याद आएगी तब तक पौने पाँच बज रहे होंगे। थोड़ी देर बाद पानी भरना है। सप्लाई वाला। साढ़े पाँच तक क्या करूँ। मन किया तो मोबाइल उठा लिया। थोड़ी देर ‘एयर कंट्रोल’ खेलता हूँ। रोज़-रोज़ वही करूंगा क्या। यही सोच किनारे रख देता हूँ। डायरी पास ही पड़ी है। कुछ लिख ही लेते हैं। बस इतना लिखता हूँ के लिखने आ गया हूँ। साढ़े पाँच बज जाते हैं। पानी अब साफ़ हो गया होगा। मयूरजग उठाया। चले गए पानी भरने। वापस ऊपर आते आते छह बज गए। अब इंतज़ार सात बजे का करना है। जब अंधेरा हो जाने वाला होगा। और वो गेट के सामने से गुज़रेगी।

आजतक दो तीन ही बार उसे देखा है। सामने बसस्टैंड से वह इधर ही सड़कपार कर लेती है। आज तक उससे बात नहीं हुई है। और रोड साइड रोमियो बनने का कोई शौक भी नहीं चर्राया है। उसे कुछ बोलूँगा भी नही। सच कहना नहीं चाहता था पर कहे देता हूँ। हिम्मत नहीं है। वैसे बोले जाने की ज़रूरत पर ध्यान दिया जाना चाहिए। बस उसे अपने आगे-आगे चलते जाते देखना चाहता हूँ। उसे बिन बताए। और कल जब मैं वहाँ से लौट रहा था उसने मुझे देखा। मतलब उसकी आँखों ने। वहाँ कोई ‘बलम पिचकारी’ गाना सुन नहीं पाया। जो मेरे कानों के पास बज रहा था। बिना हेडफोन लगाए।

मई 03, 2013

इतने पर भी दिन ख़त्म कहाँ हुआ है

तारीख तीन मई। साल यही दो हज़ार तेरह। बिस्तर से जागे हुए यही कोई चार घंटे चार मिनट के लगभग हो गए हैं। और सुबह की किश्त के सारे काम निपटा चुका हूँ। एक बार ब्लॉग डैशबोर्ड खंगाल लिया है। दो बार फ़ेसबुक खोलकर देख चुका हूँ। कोई नया नोटिफ़िकेशन नहीं है। सब वही ग्रुप अप्डटेस। इनबॉक्स भी खाली। कोई इंतज़ार नहीं कर रहा है। और जिसके इंतज़ार मे हूँ वो एक तारीख़ की रात बारह बजे के बाद से गायब है। आखिरी बार तभी उनका फोन आया था। इधर कल शाम मेरा मन था तुमसे बात करने का। करता भी। पर ‘आउटगोइंग’ बंद है। दो महीने से बिल नहीं भरा।

इन सारी बातों को एक बार फिर दोहराने के बाद भी मेरे पास कोई ऐसा काम नहीं बचा है जिसे काम कह सकूँ। थोड़ी और गर्मी बढ़ेगी, लेट जाऊंगा। छतपंखा खराब है इसलिए भी नींद आएगी नहीं। उठकर बैठ जाऊंगा। फिर यहीं मेज़ के सीधे हाथ पर असगर वज़ाहत का ‘बरखा रचाई’ उठाऊंगा। पढ़ने लगूँगा। हफ़्ते भर से ज़्यादह हो गया है। पर खत्म होने का नाम नहीं ले रहा। उल्टे मेरी स्पीड धीमे कर दी है। सच कहूँ तो पका रहा है। शुरू में लगा दिल्ली ने कमर पर लात मारी है उठने में वक़्त लगेगा। बाग बगीचे में लगे हैं तो उसके तफ़सरे होंगे। पर साजिद मियां वहाँ से भाग लिए। एक लड़की से चाँदनी रात में बेपरदा होकर मिलते थे पर पलंग के सिवा उसे कुछ न दे सके। बस कैंसर से मरते वक़्त उसकी माँ की हथेली में कुछ नोट धर दिया। खुद पत्रकार बने देश दुनिया बघार रहे हैं।

सच में इतना ख़राब इधर कम ही पढ़ा है। इसलिए भी मन नहीं होता। हरबार कोशिश करता हूँ। लेकिन दस बारह पन्नों बाद किनारे। अधलेटे कमर भी कुछ पिराने लगती है। उसे सीधा करने बाहर निकाल जाता हूँ। एक कुर्सी रखी है। बैठ जाऊंगा। थोड़ी देर उन कबूतरों को छत पर पानी पीते देखता रहूँगा। नहीं हुआ तो उस चौंधते आसमान को ही थोड़ा देख लूँगा। बारिश अभी कई दिन दूर है। ‘फेड ब्लू’। आसमान से रंग भी उड़ गया हो जैसे। उसका भी वहाँ रहने का मन न हुआ तब क्या होगा। तब शायद मैं उसकी जगह और वो मेरी इस कुर्सी पर। पर पता है वो दिन भी बरसात की तरह नज़दीक नहीं हैं।

पता नहीं कबूतरों के साथ कउवे क्यों नहीं हैं। इधर सुबह भी नज़र नहीं आते। हाँ उस दिन उस डाड़ पर कोई नन्ही सी चिड़िया थी। अपन सलीम अली होते तो नाम पता होता। पर जाने दो। हटाओ। वह किसी को बुला रही थी। मैं भी सुन पकड़ने की कोशिश में था के क्या कह रही है। पर समझ नहीं पाया।

तो हम कुर्सी के इर्द गिर्द थे। वहाँ इस तपिश में और देर बैठा भी नही जा सकता। मन किया तो अंदर जाकर मुँह पर पानी के छींटे मरूँगा। पर सोच रहा हूँ, आज तक मन हुआ नहीं है। शायद आज हो जाए। तो खैर, वापस अंदर आकार जो भी मन में खुराफ़ात चल रही होगी उसे डायरी में लिखने क मन होगा। पर लिखना इतना आसान है क्या। कलम की स्याही इस गर्मी से सूख चुकी होगी। क्योंकि पिछली मर्तबा कब जनाब लिखने बैठे थे ठीक से उन्हे भी याद नहीं। फिर तो वो बेचारी 'चीन' में बनी मामूली सी कलम है। उसकी क्या गलती। गलती इन हाथों की है।

वहाँ तारीख़ देख खुद को कोसने को होऊंगा। कि क्या बीते दिनों में एक भी बार यहाँ नहीं आया जा सकता था। या साहब उबासी लेने में इतने बीजी थे के नज़र नहीं पड़ी। पर क्या करूं। बीते दिन वापस तो आ नहीं जाने वाले हैं। इसलिए चुपचाप स्याही कि बोतल खोल इंक भरने लगूँगा। फिर भी पैन चलेगा नहीं। मेज़ पर कहीं कागज़ दिख गया तो उसकी शामत। निब पर इस तरह दबाव पड़ेगा के लगता उसकी नटई होती तो वहीं नसे ज़रूर उभर आतीं। इतना होने पर कौन लिख सका है। मुँह लटक जाएगा। उसका ही कोई पन्ना पलट पढ़ने लगूँगा। कुछ शक भी होने लगेगा। पर खुद को मना लेता हूँ। कि लिखाई मेरी ही है।

पर अभी फिर याद आ जाएगा इतने पर भी दिन ख़त्म कहाँ हुआ है। तारीख़ वही है। साल वही है। तीन मई। दो हज़ार तेरह।

मई 02, 2013

गर्मी-मौसम-विखंडन और मेरी विचार प्रक्रिया का वाष्पीकरण

जैसे जैसे मौसम गर्म होगा वैसे-वैसे देह से कपड़े और छिटकते जाएंगे। अपने आप। उनका न्यूनतम अवस्था में पहुँच जाना ही ध्येय है। मेरा नहीं। उन बहु-प्रचारित विज्ञापनदाता कंपनियों का। इस दरमियान जो पीठ पर घमौरियाँ हो गयी हैं उसपर किसी कंपनी का पाउडर छिड़का जाएगा। वह ठंडा-ठंडा भी है और उसमे 'मिंट' भी पर्याप्त मात्रा में मिला हुआ है। फूलों की ख़ुशबू के साथ। इसलिए फिकर करने की ज़रूरत नहीं। चूंकि धूप में शरीर में पानी की कमी हो जाने का खतरा हमेशा बना रहता है इसलिए भी कुछ शक्तिवर्धक पेय उनका इंतज़ार करते मिलेंगे। जो काम ‘स्वास्थ्य मंत्रालय’ को करना चाहिए था उसे यहाँ बखूबी निभाया जा रहा है।

इतना ही नहीं समाजशास्त्र का कुछ हिस्सा भी उन कक्षाओं से चलकर यहाँ-वहाँ छितर गया है। जो उम्र में थोड़े बड़े है चाहे लड़के हो या लड़कियाँ, वे इन टेल्कम ऍड में आते हैं। पर उन विशुद्ध ‘समाजशास्त्रीय भूमिकाओं’ की रेखा को स्पष्ट करते। यहाँ उपभोक्ता को लिंग में विभाजित कर दिया जाता है। उनकी आदिम इच्छाओं के साथ। भले सिनेमा स्टडीज के जाधवपुर यूनिवर्सिटी और जेएनयू के छात्र फिल्म ‘पर्फ्यूम’ देखकर यह अंदाज़ न लगा पाये हों कि कौन सी गंध से स्त्रियॉं को पहचाना जाने लगा और कौन सी गंध मर्दों के हिस्से आई, तो उन्हे यह विज्ञापन देखने चाहिए। यहाँ इतिहास तो नहीं पर वर्तमान के कई ‘टेक्स्ट’ पढ़ने को मिल जाएंगे।

थोड़ा ध्यान से देखने पर और भी कई चीज़ें साफ-साफ दिख जाती हैं। के यहाँ प्यास का मतलब पानी नहीं है। पानी से तो सिर्फ गला तर होगा। यह पेय तो आपको उससे कहीं आगे की छलांग लगवा कर ही दम लेंगे। वहाँ इसे किन-किन रूपकों से जोड़कर उस पानी को अपदस्थ कर दिया गया है देखने लायक है। पानी तो इसका कच्चा माल है जो इन बड़ी-बड़ी कंपनियों के प्लांटों में जमीन से बेतहाशा निकाल जा रहा है। यह किसी से छिपा नहीं है के इस भू-गर्भीय जलदोहन में वे अव्वल रही हैं। तभी कई साल पहले आमिर खान कुएं की बाल्टी से पानी नहीं निकलते। वहाँ निकलता है ‘ठंडा मतलब कोका कोला’।

जिसने सैकड़ों लोगों से उनके हिस्से से मूलभूत जीवन का आधार छीन लिया वही इधर टीवी पर ‘बेवजह खुशियाँ लुटाने’ को कह रहा है। पानी 'स्पेक्ट्रम' की तरंगों से ज़्यादाह मूर्तरूप में हमारा प्राकृतिक संसाधन है और इस देश के निवासियों का उस पर उन कंपनियों से पहले अधिकार है। फिर भी यह लूट कईयों की नाक मूँछ के नीचे लगातार चलती रही है। लगातार चलती रहेगी।

इधर यह भी देखना मौजू होगा के मर्दों वाली क्रीम का विज्ञापन करते शाहरुख़ खुद तो लक्स साबुन का ऍड टब में नहाते हुए कर लेते हैं पर पुरुषों को रूखी त्वचा पर कौन-कौन सी मलाई पोती जाए इसके भी वे ज्ञाता हैं। पर इन दिनों वे कटरीना के मुकाबले खड़े हैं। आम मलीहाबाद के बागों से बाज़ारों में न पहुँचा हो पर बोतलबंद पेय में 'अल्फ़ान्सो' आम का रस पहुँच चुका है। पूरे बारह मास पहुँचा रहता है। और तब कि जब गर्मीयाँ अपने शबाब पर हो, यह दोनों फ़िल्मी किरदार दर्शक को अपनी भाव भंगमाओं से 'सिड्यूस' कर रहे हैं। इसमे उस आमरस का पिया जाना इतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना के उसका इन दोनों का उस क्रिया विशेष को विशिष्ट मुद्राओं के द्वारा किया जाना। एक क्षण के लिए तो उन गंधों के विज्ञापनों और इनकी विभाजक रेखाएँ तक धूमिल हो जाती है। मुश्किल नहीं है के फ़्राएड का ‘लिबिडो’ यहाँ अपना काम करने लगे।

फिर आखिर में जाते जाते एक विज्ञापन मुझ अविवाहित को भी रिझा लेता है। उसकी तरफ खिंचा चला जाता हूँ। जाना न जाना मेरी इच्छाओं से परे है। जहाँ इन गर्मियों के रूखे दिनों में देह पर विशेष कोमलता बनाए रखने का आग्रह लिए वे आते हैं। और तो और उसकी बोतल तक स्त्री देह की बनावट लिए हुए है। ब्लाउज़ और कमर के नीचे लिपटी साड़ी के दरमियान जो खाली जगह है वहाँ हाथ फेरना कितना मुलायम एहसास होगा। तभी मुझे लगता है यही उस विज्ञापन की जीत है। जो मेरी सत्ता को अपदस्थ कर खुद को स्थापित करती है। इतना लिखना पढ़ना सब धरा का धरा रह जाता है।

{पीछे का ज़रूरी पन्ना। इसी नाम से : गर्मी-मौसम-विखंडन और मेरी विचार प्रक्रिया का वाष्पीकरण |यह पोस्ट सोलह मई को जनसत्ता में आई है। वहाँ पढ़ने के लिए यहाँ जाएँ। }

मई 01, 2013

असल संघर्ष मूल स्थानों को बचाने का भी है

आज तारीख क्या है। एक मई। मजदूर दिवस। क्या मेरे ऐसे लिखने से उसे दिहाड़ी रोज़ के रोज़ मिलने लगेगी। रिक्शे पर चढ़ने से पहले कोई भी सवारी पैसों को लेकर चिकचिक नहीं करेगी। वो जो औरत अपने मरद के साथ इस चिलचिलाती धूप में तपते तारकोल से सड़क बना रही है उसे भी शाम पूरे पैसे मिलेंगे। खेलगाँव की लाल बत्ती पर भाग-भाग किताबें बेचते लड़के-लड़कियों को शाम भर पेट खाना मिल जाएगा। और उन का क्या होगा जो गले में ढ़ोल और सर पर चोटी वाली टोपी पहने करतब दिखा रहे थे। उनकी ख़ुद को ज़िंदा रखने की ज़िद क्या हमसे कहीं भी कम है। या हम जिंदगी जी रहे है और वे सब उसे काट रहे हैं। उनके श्रम का मूल्य इतना कम इतना अमानवीय कैसे है? पता नहीं मुझे भी क्या हो जाता है कभी कभी। शायद उस दिन धूप में घूम लिया था न!! सिर ठिकाने पर नहीं है।

पर ख़ुद पूछा है इसलिए भी पूरी तरह नकार नहीं सकता। कहीं ना कहीं किसी के दिल में कुछ तो ज़रूर बदलेगा। नहीं बदल रहा है यह भी नहीं है। पर कोशिशें इसलिए भी बंद नहीं हो जानी चाहिए के वह बदलाव दिख नहीं रहा है। किसी कंपनी के पंखे के विज्ञापन से प्रभावित नहीं हूँ पर लगता है हवा बदलेगी। उसे बदलने के लिए होना होगा गरम हवा।

सोचता हूँ क्या इसलिए भी मैं कभी रिक्शा नहीं करता उससे लगातार बचता हूँ के वह मुझे अमानवीय लगता है। के किसी की मांसपेशियाँ मेरे बोझ से काँपती कान तक आते-आते फूल जाएँ। उसके फेफड़े जवाब देने लग जाएँ। हाथ जो हैंडल पर है वह पसीने से फिसलने लग जाए। पर तब ऐसा ना करके क्या मैं उसकी दिहाड़ी नहीं मार रहा हूँ। उसका किराया कैसे निकलेगा। शाम दाल के बजाए सूखी रोटी खानी होगी। पर अच्छा है मेरे जैसे उनसे कम ही टकराते हैं। पर फिर अचानक कहीं से मानो और सुकिया याद आ जाते हैं। लगता है वे शायद ही कभी अपना घर बना पाएं। ईंट के भट्टे ने उनके सपनों को झुलसा दिया है। मिट्टी पाथते पाथते उनकी ज़िंदगी ख़ुद मिट्टी हो रही है। गाँव से ना भागे होते तो कबके मार दिये जाते। उनकी कहानी में कभी घर नहीं है। सिर्फ उसका सपना है। अधूरा सपना।

पर कभी कभी मुश्किल होती है उनके चहरे याद करने में। एक बाबा मेट्रो स्टेशन के पास वजन करने की मशीन लेकर बैठते हैं। दिन में कितने लोग उसपर चढ़ कर वजन करते होंगे, पता नहीं। पर उन्होने भीख माँगने का विकल्प नहीं चुना। चुनी दिल्ली विश्वविद्यालय के सुलभ शौचालय की दीवाल। पीठ में बैठे बैठे दर्द होने लगे तो टेक लगा लें। भीख मांगना एक तरह से सभी प्रकार के श्रम कौशलों से स्वयं को च्युत मान लेना है। पर उस शाम हज़रतगंज साहू के सामने लगी बैंच पर बैठे जोड़े से एक नन्ही सी लड़की आकार खाने की गरज से रुपये मांगती है। दोनों बड़ी देर से उसे आसपास घूमता लोगों से मिन्नतें करते देख रहे थे। लड़का जेब से दस का नोट निकालकर उसकी तरफ दे देता है। उस लड़की, उसकी पास ही घूमती माँ के पास क्या और कोई भी मानवीय विकल्प नहीं बचा है।

देर तक सोचता रहा। कोई जवाब नहीं मिला। उल्टे मिले कई सवाल। के जहां के यह मूलनिवासी होंगे क्या वहाँ इनके श्रम का मूल्य लगाए जाने लायक कोई भी परंपरागत कौशल इनके पास नहीं बचा है। पट्टे पर खेती भी नहीं। बँटाई में भी नहीं। या किसी के क़र्ज़े से बचने के लिए वहाँ से भाग लिए। फिर वह सौ दिन के रोज़गार वाली भ्रष्ट योजना ने इन्हे भी बेदख़ल कर दिया।

लगा यह संकट इतना उनका नहीं जितना हमारी बदल गयी उत्पादन प्रणाली का है। वह आपको देती नहीं। छीन लेती है। हमारे विकास के मॉडलों में वह पुराने घिस चुके कलपुर्ज़े हो गए हैं। यह अवमूल्यन इस स्तर तक जा पहुँचा है जहाँ लाभ की कुछ संख्याओं के बराबर पहुँचने में उसे बाधक तक मान लिया गया है। और वह अकेला नहीं है। पूरा तंत्र, पूरी मशीनरी उसके साथ है। तभी किसी मानेसर की घटना में श्रमिकों का पक्ष गायब रहता है। जहाँ से वे आए हैं वहाँ संसाधनों की लूट इस कदर मची हुई है के भूमि-अधिग्रहण उस कथित विकास के लिए अपरिहार्य मान लिया जाता है। वक़्त है अपने मूल स्थानों को बचाने का। वह बचेंगे, तभी हम बचेंगे। उनका होना, हमारा होना है। फिर कभी किसी को किसी का मजदूर होने की ज़रूरत नहीं होगी। तब जो दिन आएगा वह ‘मजदूर दिवस’ नहीं ‘श्रम दिवस’ होगा। पर काश ऐसा हो पाता..हम ख़ुद को बचा पाते!!

आवाज़ें..

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