जून 29, 2013

कई जगहों का गायब होते जाना


कभी-कभी कोई जगह हमारी न होते हुए भी हमारी जैसी ही होती है। बस उसका होना ज़रूरी है। उसका न होना, हमारा न होना है। बस वह रहे। हम उसे देखते रहें। कोई हमसे पूछता नहीं पर कोई कहे तो सही। तब बताएँगे। वह कितना हमारा है। बचपन से ही ऐसी एक जगह थी। यह।

लेकिन अब यह वहाँ नही है। हम कभी इस इमारत के अंदर नहीं गए। तब भी यह हमारी थी। जब कभी उसके सामने से गुज़रते हमे खींच लेती। के अंदर से यह होगी कैसी। ऐसा हम क्या देख लेने वाले हैं जो पहले कभी नहीं देखा होगा। हिन्दी फिल्में इस रूप में भी हमें बना रही थीं। क्योंकि इसके नाम में ‘क्लब’ जुड़ा था। साउथ इंडिया क्लब।

बिरला मंदिर जाते वक़्त डीटीइए स्कूल के बिलकुल चिपकी हुई। कभी अंदर जाना नहीं हुआ पर बगल से पीछे बनी कैंटीन में कई बार सांबर वाड़ा ज़रूर खाने ज़रूर चले जाते थे। पीछे दो तीन साल पहले काले रंग से इसे ‘Abandoned’ लिख प्रतिबंधित घोषित कर दिया। कि इमारत क्षतिग्रस्त है। अंदर जाने में ख़तरा है। इसलिए भी बाड़ेबंदी कर दी। पता नहीं वो जो वहाँ पीछे रहकर अपनी दुकान चलाते थे उनका क्या हुआ।

फिर एक एक कर अपने आस पास ही नज़र दौड़ाता हूँ तब लगता है दिल्ली का सबसे कम बदले जाने वाला इलाका होने के बावजूद कई चीज़ें अपनी जगह पर अब नहीं हैं। गोल मार्किट से ‘श्रीधरन’ गायब हुआ तब कई सालों तक पता नहीं डोसा खाने कहीं गए ही नहीं। फिर ‘सरस्वती बुक स्टाल’ के बगल से एक बंगाली दंपति अपनी दुकान खाली करके चले गए। अब वहाँ ठंडी बीयर मिलती हैं। ऐसे ही भूली भटियारी की तरफ से वंदेमातरम रोड पर निकाल पड़ते तब ‘रबीन्द्र रंगशाला’ दिख पड़ती। एक दिन उसे भी तोड़ देंगे। हमे पता भी नहीं चलेगा।

‘साउथ इंडिया क्लब’ को जिस टाटा की मशीन ने तोड़ा है वह दानवाकार बुलडोज़रनुमा क्रेन परसो तक वहीं खड़ी थी। दोपहर मन नहीं माना तब ही देखने चला गया। भाई ने सुबह बताया था। तभी से अंदर पता नहीं कैसा हो रहा था।

सोमवार के ‘हिन्दू’ में ख़बर भी है। स्कूल प्रशासन को डर है कि कहीं भू-माफ़िया उस ज़मीन पर कब्ज़ा न कर ले। सीपी के इतने पास होने का एक ख़तरा यह भी है। साथ ही क्लब वाले कह रहे हैं कि ऐसी कोई बात नहीं है। चूंकि इमारत जर्जर हो चुकी थी इसलिए उसे ढहाना ज़रूरी था। अब जो नयी बिल्डिंग बनेगी उसमे ‘सत्यमूर्थी ऑडिटोरियम’ भी होगा और वही पुराना क्लब भी। बेसमेंट में पार्किंग। दो-चार दुकानें जिससे क्लब का ख़र्चा चल सके। जो भी हो ऐसे ख़तरों को नज़र अंदाज़ नहीं किया जा सकता।

इस जगह को लेकर जो आख़िरी याद है उसमे एक रात बिरला मंदिर कालीबाड़ी की तरफ़ से सैर कर लौट रहा था कि एक आदमी पीसीआर से एक आदमी को लाया और क्लब के चौकीदार पर आरोप लगाने लगा कि साहब यह रात में दो आदमियों को यहाँ सोने देता है। सोने एटा है का मतलब पैसे लेने से था, जिसे वह खुद कहना नहीं चाहता था। मेरी तरफ़ बढ़ा तो लगा नशे में है। थोड़ी बात सुनकर मैं आगे बढ़ गया। आज न वो इमारत है न चौकीदार। सिर्फ़ मैं हूँ और उसकी यह घिसी पिटी तस्वीर।

जून 28, 2013

तुम मैं और शाम के बाद

अभी शाम हुई नहीं थी। हो रही थी। उसका अंधेरा कुछ देर से मेरे अंदर जाये इसलिए भी छत पर जाकर बैठ गया। अकेला। किसी को उस वक़्त वहाँ होना भी नहीं चाहिए था। था भी नही। एक अजीब तरह की अफरातफ़री के बीच कुछ देर खुद से बात करना चाह रहा था। पर शुरू कहाँ से करूँ इसी उधेड़ बुन में कटता सा लगा। घड़ियाँ रुक नही गई थी। मैं रुक गया था। उन्हे कोई बोलता भी तब भी नहीं रुकती।

छत छत न होकर मेरा मन हो गयी जैसे। उसकी मुंडेर पर एक ईंटिया दीवार थी। कभी तो वह भी गायब। जैसे कुछ देर के लिए मैं भी हो जाना चाहता था। पर गायब हो न सका। या कहूँ, होने का मन था भी नही।

इन सारी बातों में जितने भी ‘थे’ हैं सब साल भर पुराने हैं। बिलकुल इसी दिन मैं वहाँ छत पर अकेला हो जाना चाहता था। कुछ देर के लिए था भी। आज न छत है, न मन वैसा हो रहा है। घड़ी तब नहीं रुकी तो अब क्या रुकेगी। पर उसकी रफ़्तार थोड़ी धीमी तो हुई ही है। ऐसा दिन में रात में शाम में कभी भी कई-कई बार लगता है। चाह कर भी उसके कान नहीं उमेठ सकता। सिर्फ़ इंतज़ार कर सकते हैं, कर रहे हैं।

यह जो ‘एक’वचन का ‘बहु’वचन में बदल जाना है, आज तक की मेरे हिस्से की सबसे कोमलतम अनुभूति है। उसके लिए दिल का कोई कोना नहीं पूरा दिल कम पड़ जाता है कभी-कभी। तब की रात है और आज का दिन है रोज़ थोड़ा थोड़ा तुम्हारे करीब होता आया हूँ। छिन भर के लिए भी भूला नहीं हूँ। हम दोनों को।

थोड़ी देर और बैठना चाहता था। उतना ही शायद तुम भी। क्या बात करते पता नहीं पर करते ज़रूर। कुछ तुम पूछती, कुछ मैं पूछता। कुछ तुम कहती, कुछ मैं कहता। कुछ-कुछ और पास आते-जाते।

एक दिन हम बिलकुल अगल बगल बैठे होंगे। तब किसी की पूछती आँखों को आँखों से कुछ बताने की ज़रूरत नहीं होगी। उन आँखों में तब सवाल नहीं, शरारत होगी। आज भी है पर तब उसे छुपाएंगे नहीं। डरेंगे नही। झिझकेंगे नही। बस तुम बैठी रहना। तुम्हारा हाथ हाथ में लेकर धीरे से चूम लूँगा। सब बस देखते रह जाएंगे। कह कुछ नहीं पाएंगे।

पर फिर ख़याल आता है दिन अभी कुछ दूर है। हम पास नहीं हैं। पास है फ़ोन। एक दूसरे की आवाज़ें। एक दूसरे के कान। उस कान में घुलती खट्टी मीठी यादें बातें। शामें। रातें। सब थोड़ी थोड़ी हैं। हर बार पहचान कुछ नयी बात से होती है।

बस इन दिनों में हमे कमज़ोर नहीं होना है। सबसे जादा मजबूत इन्ही दिनों में होना है।

उस दिन भी फ़ोन ही था हाथ में। नंबर मिलाया। उधर राकेश था। जितनी देर भी बात की उसका हासिल बस यही के अब दिन पुराने दिनों की तरह नहीं रहने वाले हैं। उनमे हम कुछ बदले बदले से होंगे। कह लेना चाहता था अपने अंदर की सब बातें। बे-तरतीब-वार। थोड़ी कही भी। फ़िर फ़ोन रख दिया।

मैं अभी भी वहीं था छत पर। के पता चला रवि आया है। चाचा के साथ। बड़े सालों बाद मिल रहे थे। बिलकुल इसी क्षण तुम सीढ़ियाँ चढ़ रही थी और मैं नीचे आ रहा था। इसके बाद दिमाग की नही दिल की सुनी। अब तुम्हारी सुनता हूँ। उस अदलाबदली में सबसे पहला काम यही हुआ। थोड़े-थोड़े एक दूसरे के पास रह गए हैं। अपने में कुछ कम, तुममे कुछ जादा।

उस दिन के बाद से लगता है, जितना तुम्हें जानता हूँ जानने लगा हूँ, उतना ही खुद से पहचान कुछ नयी हुई है। इसी नयी मुलाक़ात के नाम थोड़ा मैं, थोड़ी तुम।

कहना तो बहुत कुछ चाहता हूँ पर इस मीडियम की भी अपनी लिमिट है। उन बातों के लिए कलम वाली डायरी ही ठीक लगती है। कभी मौका लगा तो वही फ़िर पढ़ लेंगे। यहाँ अभी इतना तो कह ही सकता हूँ, ‘डिस्टप कर दिया म ड म..!!’

जून 27, 2013

हम पिंजरे में होते तब क्या तुम हमें भी गोद लेते


तब एयरसेल नयी-नयी कंपनी थी। उसे दिखाना था वह उन सबसे कुछ अलग है। उसने ‘टाइगर’ शब्द चुना। ‘सेव टाइगर’। उदय प्रकाश अपने ब्लॉग पर इसी शेर बाघ को लेकर दो ढाई साल पहले किसी की कविता को याद भी कर चुके हैं । इन वन्यजीवों का हम इन्सानों के रहमोकरम पर हो आना ही उस त्रासदी की शुरुवात है जहां से चिड़ियाघर की दीवार शुरू होती है।

दो हज़ार दस मार्च। हम ‘सरिस्का’ में थे। हमसे कुछ पहले मनमोहन सिंह यहाँ टहल आए थे। और बिलकुल उन्ही की तरह हमे भी कोई शेर नहीं दिखा। कतर्निया घाट से लेकर दुधवा नेशनल पार्क तक हलचल मची। खबर आई दो चार बचे हैं। उस कंपनी के दावे खोखले निकले जो चौदह सौ की गिनती को खींचखाँच कर दो हज़ार तक ले गयी थी। अब इधर उसने अपना पैसा आईपीएल की धोनी वाली टीम को प्रायोजित करने में लगा दिया है। और बराबर बता रही है के उसका भी बाज़ार बचा हुआ है।

आने वाली पीढ़ी के लिए इन्हे बचाकर रखने में जो दंभ है उसकी ध्वनियाँ भी हमारे हिंसात्मक समाज में गूँजती रही हैं। इसके शिकार और खाल को पहनने में जो पौरुष फूट फूटकर ओज की तरह बिखरा पड़ा है उसके लिए प्रेमचंद की कहानी ‘शिकार’ पढ़ने की ज़रूरत नही है।

जहाँ कई वैश्विक संस्थाओं की रोज़ी रोटी ही इन जानवरों के बचे रहने पर टिकी हुई हैं। वहीं इन सबके बीच बिना शोर शराबे के काम करते लोग दिखाई पड़ते हैं तब अच्छा लगता है। मैसूर चिड़ियाघर को किसी भी रूप में राज्य सरकार या केंद्र सरकार से वित्तीय सहायता नहीं मिलती। यहाँ के अधिकांश जानवरों को मैसूर निवासियों ने गोद लिया हुआ है। आपको सिर्फ साल भर का ख़र्चा देना है और सारी जिम्मेदारी इनकी। जहाँ यह चीते रखे गए हैं उसी के बगल में एक बोर्ड भी लगा हुआ है। उस बोर्ड पर लिखा है ‘We are thankful to The Children Of Sri Rahul Dravid Former Indian Cricketer For Adopting Two Hunting Cheetahs From 3 july 2012 to 2 July 2013.’

वहाँ लोग इस जैसे लगे हज़ारों बोर्डों को अनदेखा कर बस चले जा रहे थे। शायद उनके लिए यह कोई गैरज़रूरी चीज़ रही होगी। फिर जब हर पिंजरे के साथ कई कई ऐसे सूचनात्मक बोर्ड लगे हों तब उनका पढ़ा जाना किए जाने लायक काम कैसे हो सकता है। या फिर यह उस टूरिस्ट बस वाले की दी गयी समय सीमा का दबाव जो टीवी पर हैवल्स का ऍड देखते हुए हुए महसूस नहीं होता। वहाँ बस एक जोड़ी बूढ़े माँ बाप ही तो चाहिए। गोद लेने को।

हम ऐसे समय में रह रहे हैं जहाँ हमारा ‘विकास’ हमे अपने जैसे दिखने वाली ‘स्पीशीज’ से जोड़े नहीं रख पा रहा है तब इन जानवरों की कोई क्या सुनेगा। जहाँ हम आसानी से ‘डार्विन के सिद्धांत’ की आड़ लेकर खुद को बचाते आए हैं। इस मॉडल में एक दिन वह ऍड भी बनेगा जब गर्भावस्था को स्टेटस सिंबल की तरह दिखाकर ‘प्रेग्नेंसी रिज़ॉर्ट’ अपना विज्ञापन करेंगे। यही वह जगह है जनाब जहाँ ऐश्वर्या के डिंब अभिषेक के शुक्राणुओं से मिले थे।

जून 26, 2013

काश वो दिन लौट आते..


पता नहीं हम सब रेल देख कर कैसे-कैसे होते रहते हैं। बचपन से ही खिड़की वाली सीट की भाई बहन से छीनाझपटी मारकुटाई वाली अवस्था रह रह कईयों को याद आती होंगी। उसके भागते पहिये, पटरी से टकराती आवाज़; सब एकएक कर गूँजती सी है। गुलज़ार की एक फिल्म है क़िताब। उसका ओपनिंग सीन ही इन सारी ध्वनियों के साथ खुलता है। बच्चा भाग लेना चाहता है। अपनी बहन के घर से दूर। वह अभी भी काफ़ी छोटा है पर सब उससे बड़ा हो जाने की माँग करने लगे हैं। उसने दूरी ख़त्म करने के लिए चुनी यही रेल।

वह जो बच्चा है उसने कान में पड़ती उन आवाजों के साथ भाप से भागते इंजन और डिब्बे से बाहर की दुनिया को अपना बनाया। वह बराबर बोले जा रहा है। बेतहाशा। ऐसा नहीं है उनका कोई अर्थ नहीं है। वे सब सार्थक ध्वनियाँ हैं। आप सुनेंगे उन्हें। चिकाचिक चिकाचिक चिकाचिक, भागचला भागचला भागचला, किधरचला किधरचला किधरचला..!!

थोड़ी देर उसकी आवाज़ नहीं आती। जब आती है तब पीछे पूछे सवाल का जवाब होता है।

माँकेपास माँकेपास माँकेपास, भागचला भागचला भागचला, माँकेपास माँकेपास माँकेपास..किधरचला किधरचला, चिकाचिक चिकाचिक, भागचला भागचला..!!

पढ़ने में थोड़ा अटपटा सा है पर इन सबको लगातार बोलने पर ऐसे लगता है जैसे सचमुच रेलगाड़ी हमारे साथ भाग रही हो। खैर, बातें तो और भी हैं पर यहाँ मालगाड़ी की आड़ में यह सात हिन्दुस्तानी क्या सोच रहे होंगे। शायद ऐसी ही कोई याद। किसी बिरवे में अरझ गए कनकौउए की तरह। शर्तिया यह सब अपने घरों से दूर हैं। बीते दिनों की गठरी के साथ। पैसे कुछ कम पड़ गए वरना ये फगुआ अपने यहीं मनाते। टिरेन हमेशा से ऐसे ही रही है। सुबह पाँच बजे मटेरा के बाद धड़धड़ाते कब रिसिया पहुँच सीटी बजाएगी पता नही चलेगा। इसलिए दूर से आती रेल की सीटी के दोबारा गुज़रने से पहले उठ जाना होगा। किसी से मिलने का वक़्त सँझा से पहले गुजरने वाली पैसेंजर रही होगी। अढ़री के खेत में। पुरानी मिल के पीछे। या बंद गोदाम के अहाते में। या गुज़रती रेलगाड़ी में भुट्टा सेंक सेंक बेचने के बाद भी शाम को मिलती होगी हताश रोटी। तभी तय किया होगा, भाग लेंगे।

भागकर आ गए होंगे यहाँ। दो जून की दाल रोटी के लिए।

कभी खुशवंत सिंह  का उपन्यास 'पाकिस्तान मेल'  पढ़ा था। मनो माजरा गाँव वालों के लिए बाद के दिन अँधेरी रातों की तरह थे। जहाँ उनकी आदत बन गयी आवाज़ तयशुदा वक़्त पर नहीं आ रही थी। सब कुछ बिगड़ गया था। बिगड़ रहे थे हालात। फिर इधर स्वयं प्रकाश  की कहानी 'क्या तुमने कभी सरदार भिखारी देखा है'  पढ़ी। लगा रेल गाड़ियाँ इतनी सुखद स्मृतियों के लिए याद नहीं की जाती जितना कि उनके हिस्से के स्याह पन्ने दिखते हैं। और तब तो बिलकुल लगा के यह पूरी की पूरी विलन ही है जब मो. आरिफ़  के अनुदित उपन्यास 'उपयात्रासे गुज़र रहा था। फिर पंकज सुबीर  की 'ईस्ट इंडिया कंपनी'  अपनी कमजोरियों के बाद भी याद रह गयी।

पर यहाँ सुबह वाली गाड़ी से चले जाने की उलाहना वाला भाव जादा दिख रहा है। रेल ही है जो उन्हें पंजाब ले आई है। वही उन्हें अपने घर वापस ले जायेगी। वो तो शुकर है ये सब हरित क्रांति के पुरोधा किसानों के हत्थे नहीं चढ़े। वरना बंधुआ मज़दूर बन उनकी कैद में सड़ रहे होते। यहाँ हमारी जनशताब्दी को देख सपनों में खो नहीं जाते। वो जो हाथ इधर उठा है ऐसी ही कोई बात सबमे साझा हो रही होगी। और तब छोटी सी मुस्कराहट कनअँखियों से चल होंठों पर आकर पसर गयी होगी।

एक दिन इन सबको अपने घर वापस जाना है। अभी गाँव में मनरेगा है फिर भी यह प्रवासी कामगार अगर अपने घरों पर नहीं हैं तब इनकी एवज़ में सोचने वालों को कुछ और सोचना चाहिए। न कि गोण्डा से स्पेशल ट्रेन चलाकर यहाँ मरने खपने के लिए ठेल देने का इंतज़ाम करना चाहिए। कि अगली बार खाने पीने की चिंता में घुलता मरद अपनी मेहरारू को भी साथ लाने की सोचने लगे। और उसे भी इस भट्ठी में झोंक दे। जहाँ सुकून नहीं। सिर्फ़ घर की याद है। जो हर दम पीछे छूटता जा रहा है। लगातार। बिन बताये..

चलता हूँ रात काफी हो गयी है। सवा एक बज रहा है। यहाँ बैठा तो पता नहीं और क्या क्या अकडम बकडम लिखता रहूँगा। फ़िर लग तो यह भी रहा है के आज कुछ जादा ही बोल गया। औकात से बाहर का..

जून 25, 2013

जब हम वापस आते थे, तुम्हे देखते थे

फूल हमें तुम्हारा नाम नहीं पता

जून ख़त्म होने वाला है और बरसात है के अभी तक दिल्ली पहुँची नहीं है। पर पहले ऐसा नहीं होता था। उनका होना न होना कहीं न कहीं हमें भरता है तो खाली भी करता है। उन सबमें कुछ चीजें अभी भी वैसे ही हो रही हैं। उनको स्वाभाविक मान हम टाल नहीं सकते। बस ऐसा लगता है के सिर्फ़ देखते रहने को अभिशप्त हैं।

इस तस्वीर में जो फूल है उसका नाम नहीं मालुम। पर बचपन से इन्ही दिनों गाँव से छुट्टियों के बाद लौट इनसे मिलते थे। अब इधर मुलाक़ात थोड़ी मुश्किल से होती है। थोड़े हम बिज़ी हो चले हैं, थोड़ी इस मौसम की काहिली खून में घुस गयी लगती है जैसे।

जिस जगह यह आज है वहीँ कल भी था। तभी से देख रहे थे। बस इसके कुछ संगी साथी पास ही जाली में लगे हुए थे, उनका रंग थोड़ा अलग था; वो ऐसे भी थे और थोड़े लाल-लाल गुलाबी से भी थे। बारिश की बूंदे बरस जाने के बाद भी यहाँ रुकी रहती। हमारा इंतज़ार करती। उनको छू भर लेने से जो ठंडक मिलती उसे इधर मिस कर रहे हैं। हम सब। जो इसके नीचे खड़े हो जाते और हममे से एक उसकी टहनी को हिलाकर उन छोटी नाज़ुक बूंदों को फिर से बरसाते।

इधर महीने तो वक़्त से आते जाते रहे रहे हैं। खुद यह फ़ूल वाली डांड़ पूरे साल अपने को सुखाये रहती है। माली इसको छेड़ता नहीं है। ऐसे ही रहने देता है। उसे पता है यह अखुआएगी। और हर साल हर बार यह हमें निराश नहीं करती। बताती है, इसमें अभी जीवन बचा है। ऐसा करके वह थोड़ा हमें भी बचा लेती है। अभी दो महीने बाद अगस्त आएगा, शायद तब हम फिर इसे वैसे ही देख पायें। पर..पता नहीं क्या..

हम सब बचपन से देखते तो आ रहे हैं पर इनके लिए कुछ कर नहीं पाए। क्या करना इसका कोई कच्चा ख़ाका भी नहीं है। बस यही घूमता रहता है कि बागबानी कैसे परम्परागत थाती है और उसका हस्तांतरण माता पिता अपने बच्चों तक करते हैं। समझ में थोड़ा थोड़ा आता भी है। तब भी यह सवाल वहीँ का वहीँ है के इसे ज्ञान की वैधता क्यों नहीं मिली। जिनके पास यह ज्ञान परम्परागत रूप है या था तब उनकी सामाजिक पृष्ठभूमि इतनी पिछड़ी कैसे रह गयी कि दिल्ली की गलियों कॉलोनियों में सायकिल भाँजते, दो अदद पैर, सुबह सुबह पीछे झउआ बांधे फिरते हैं। सच कहूँ तो इसका जवाब उन फूल पौधों की नर्सरियों में छुपा है जिनके मालिक सुजान सिंह पार्क जैसे इलाकों में भी ज़मीन वाले बने रहे और उस वर्ग को अपने यहाँ बतौर माली तनख्वाह देते रहे हैं।

जून 24, 2013

सैर कर दुनिया की..

रात कितनी देर सोया पता नहीं। पर लगातार उससे जूझते हुए करवट बदलता रहा यही याद रह गया है। दिल्ली की रातें बीते कई सालों से ऐसे ही चिपचिपी सी उमस भरी रही हैं। उनमे हमारा व्यवहार भी ढर्रा सा बनता जा रहा है। रात नींद पूरी न हो, तो उसे सुबह दुपहर शाम की शिफ़्ट में पूरा किया जा सकता है।

लिख तो ऐसे रहा हूँ कि जैसे अभी पुरानी फिल्मों की तरह इस भूमिका के बाद यहाँ भी मुख्य कलाकारों के नाम आने वाले हैं। ख़ैर..

घूमना ऐसे ही मौसम से भाग लेने वाले ‘एस्केप रूट’ की तरह आता है। अभी दिल्ली उतरे ही थे के दस दिनों से जो ठंडक हमारे इर्दगिर्द बारिश की बूंदों के साथ रातें कंबल के साथ लाती थी, सब गायब हो गईं। दिमाग रुक नहीं रहा था। भागे जा रहा था।

तभी ख़्याल आया ब्लॉग बनाते हैं

पर उसका मिजाज़ कैसा होगा। जब एक पहले से ही है तब यह दूसरा क्यों। पर इस वाले नुक्ते पर जादा रुका नहीं। कहीं दूर पीछे मुड़ गया। शायद ग्यारहवीं या बारहवीं की अँग्रेजी की किताब में एक चैप्टर था। ‘इको टूरिज़म’। स्कूल में ‘इको क्लब’ तो ठीक से चल नहीं रहा था। ख़स्ता हाल था। फिर यह कौन सी बला थी जनाब!! कोई भी सिरा पकड़ में नहीं आ रहा था।

जितना समझे उतने में तब यही भेजे में घुसा के पहाड़ों पर भी पर्यटन के लिए जाया जा सकता है। पर थोड़ी जिम्मेदारियों के साथ। उसके मूल स्वरूप को बिना बिगाड़े। मानवीय क्रियाओं से वहाँ के जनजीवन को बिना बाधित किए। आज जितना समझ पाया हूँ उसका हासिल यही है के तब हमारे यहाँ ‘पर्यटन’ तब तक एक ‘उद्योग’ के रूप में अपने पैरों के बल खड़ा होना सीख रहा था। तब ‘प्राकृतिक सौंदर्य’ को ‘दुहने का सौंदर्यशास्त्र’ विकसित किया जा रहा था।

अगर ध्यान से देखें तब हमे दिखाई देगा कि ‘कूड़ा’ अपने आप में जीवनशैली है। उस भोग लिए गए ‘उत्पाद’ का अपशिष्ट रूप। इस सूत्र को थोड़ा और विस्तार से समझें तब लगेगा हमारे दुर्गम स्थल इसी ‘उत्पाद’ के दुह लिए जाने के बाद की अवस्था में पहुँचते जा रहे हैं। वहीं यह पाठ हमसे टकराता है और थोड़ा नैतिक होकर हम आगे आने वाली पीढ़ी से थोड़ा सामाजिक रूप से उत्तरदायित्व लेने की माँग करता है।

कि अगर कल हम कहीं ऐसी जगह जाएँ तब ऐसा अनपेक्षित व्यवहार न करें। पर लगता है वह उसमे पूरी तरह फ़ेल हो गया। अगर ऐसा न होता तब एक इजारेदार अख़बार ऐसा न लिखता के आज का दार्जिलिंग सोलन की तरह लगता है, सोलन कसौली की तरह, मसूरी गाज़ियाबाद की तरह।

दिखने में यह भारतीय वाणिज्य के लंबे हाथों की कारस्तान लगती है जिसने विविधता को इस तरह छिन्न-भिन्न किया। पर जाना इसके पीछे होगा। गहराई में उतरना होगा।

इतने नेगेटिव नोट पर ब्लॉग को शुरू नहीं करना चाहता था पर जो चीज़ साफ़-साफ़ दिख रही है उसे कैसे नज़रअंदाज़ करूँ।

फिर महत्वपूर्ण यह सवाल भी है के जिन ज़ायको की प्रायोजित तलाश में विनोद दुआ एनडीटीवी की टीम लेकर निकलते हैं उन सबको खुद को बचा लेने के लिए कितना संघर्ष करना पड़ता होगा। जहाँ एक तरफ़ पानी की खाली बोतलों के ढेर के ढेर स्पीति में ‘ताशी-द-लेक’ होटल के पिछवाड़े पड़ें हों दूसरी तरफ़ मनाली शिमला के मालरोड पर एक से एक विदेशी ब्रांड अपनी दुकान खोलने को लालायित हो वहाँ उनका खुद का बचना काफी मुश्किल है।

यह ‘फील एट होम’ वाला जो नुक्ता है वही सब खेल बिगाड़ रहा है।

जब मेरे खुद के विचार इस तरह के हैं तब यह ब्लॉग बनाया ही नहीं जाना था। ऐसा कई लोग सोच रहे होंगे। पर नहीं। कई धाराएँ हैं। वे उसे कैसे लेते हैं, यह उनके ऊपर है। मैंने भी कोई सामाजिक दायित्व वाला हिस्सा नहीं उठा लिया है। पता है घूमना भरी जेब वालों का शौक है। जो घुमक्कड़ी कहते हैं, फाकामस्ती कहते हैं; उनके यहाँ भी विदेशी ब्राण्ड के फोटो खींचक कैमरे तस्वीरें उतार रहे हैं।

जिनके पेट भरे हैं, जिनहे कल की चिंता खाये नहीं जा रही है जो सुकून से रोटी कपड़ा मकान वाले त्रिभुज से निकलने में सफल हो चुके हैं उनके हिस्से यह मेक माय ट्रिप, ट्रिप ऍडवायज़र, क्लब महिन्द्रा, महागौरी विकेशन्स जैसे पूरे तंत्र पड़े हैं। फिर घूम चुकने के बाद फ्लिकर, फ़ेसबुक, इनस्टाग्राम, टंबलर जैसी साइट्स हैं, वहाँ महंगे-महंगे कैमरों वाली तस्वीरें अपलोड की जा सकती हैं।

इन सबके बीच एक मैं भी हूँ। और मेरा यह नया अड्डा भी। पता नहीं यह कैसा रूपाकार लेगा। इसके हाथ पैर कैसे अखुयाएंगे।

खुद मेरे लिए दुनिया के मानी क्या हैं? अपने आप में घूमना सैर करना क्या है? यह 'पर्यटक' बन निर्लिप्त भाव से चलते जाना है या उसमे रच बस जाना ? उन रीति रिवाजों परम्पराओं मान्यताओं के प्रति कैसा रुख लेना है? सैर क्या हमेशा नयी नयी जगहों पर कूच करते जाना है या पुरानी जगहों को भी नए सिरों से तलाश जा सकता है? उस लोक में खुद को कहाँ स्थित करूँ? वहाँ तैरती कथाएँ किवदंतियाँ किस्से कहानियाँ किन रूपों में हमारी ज़िन्दगी को प्रभावित करती हैं? सवाल ढेर ढेर सारे हैं और जवाब किसी एक का भी अभी पाना नहीं चाहता। धीरे-धीरे उन कतरों अंतरों गलियों सड़कों से गुज़रते उन्हें छूते चलेंगे।

आप रहेंगे न साथ..!!

जून 14, 2013

निपट अकेले खाली से ये दो दिन

गाड़ी अभी चली नहीं है, चलने वाली है। यह लिख अभी रहा हूँ पर कहूँगा नौ बजे के करीब। जब सच में ट्रेन की किसी बोगी में समेट अपनी अब तक की सबसे बड़ी रेल यात्रा पर निकलने को होऊंगा। गाड़ी धीरे से सरकना शुरू करेगी। पीछे छूटते जायेंगे ये बोझिल दिन। रातें भी कम अकेली नहीं थीं।

मुझे बीच में कहीं उतरना नहीं है। जहाँ तक वह जाएगी उससे भी एक सौ चालीस किलोमीटर आगे जाना है। कहाँ जा रहा हूँ अभी नहीं बताऊंगा, वापस आकर। ख़ैर, मुझे भी नहीं पता है यह सफ़र कैसा होने जा रहा है। शायद उन सबको पता नहीं होता होगा जिनका टिकट 'कंफ़र्म' न होकर 'वेटिंग' में जूझ रहा हो। अभी तक 'आरएसी' भी नहीं हुआ है। बस सोचे जा रहा हूँ के ढाई हज़ार किलोमीटर कैसे निकलेंगे।

पर पीछे बीते दो दिन छूटते जाने के बीच होने न होने की तरह थे। कुछ-कुछ इस बीतते दिन में अभी भी महसूस कर रहा हूँ। घर की सब चीज़ें वहीँ की वहीँ हैं। खुद घर भी वहीँ डटा हुआ है। पर परसो रात मन ट्रेन पकड़ कर पहले ही यहाँ से चलता बना। मुझे अकेला छोड़कर। बिलकुल निपट अकेला। तुम हो। पर पास नहीं हो। यही सोच और अकेला होता रहता।

कभी कभी लगता यह वह घर ही नहीं है जहाँ मैं परसों आया था। एक अजीब तरह की अफ़रातफ़री थी जो बड़ी धीमे से यहाँ वहाँ रेंग रही थी। उसमे मम्मी-पापा भाई-बहन चाचा-मैं सब थे। पर थोड़ी ही देर बाद ऑटो में बैठ सब मुझसे पहले चल पड़े। उसी क्षण मुझे कुछ लग तो रहा था पर वह तब तक सतह पर नहीं था। रात के खाने में परवर आलू की सब्जी थी। दसेहरी आम थे। अरहर की दाल थी। जो मुझे अगली सुबह दिखी जब धोने के लिए बर्तन उठा रहा था। सब्जी खराब हो गयी थी। दाल की तरह।

मैंने ही कहा था के थोड़ी दाल बचा देना पर खुद ही भूल गया। नौ बजे तो कुछ खाली खाली सा लगा। आधा घंटा बीत जाने के बाद आया के कुछ आवाज़े गायब हैं। टीवी पर कभी रवीश तो कभी अर्नब की तकरार के साथ हम सब भी बात करते करते खाना खा रहे होते थे। ऐसा पहले नहीं होता था। जब भी जाते कोई पीछे नहीं छूटता था। इधर कई सालों से हम इतने बड़े हो गए के छुट्टी मई जून में पड़ना कम होती गयी। जब वो होती तो हम कहीं बिज़ी रहते। हमारे पास वक़्त रहता तब छुट्टियाँ व्यस्त। सब कुछ गड्ड-मड्ड सा।

हम यह तो समझ रहे थे के छुट्टियों का शास्त्र बिगड़ रहा है पर कुछ कर न सके। अभी पीछे मई की ग्यारह तारीख से एक रात पहले ऐसे ही किन्ही भावों के बीच झूल रहा था। तब मैं यहाँ रह नहीं गया था बल्कि अकेले जाने वाला था। उस दफ़े भी टिकट कंफर्म नहीं हुई थी। वेटिंग लिस्ट छह तक आई और चार्ट बन गया। लग ऐसा रहा था के मैं कहीं ऐसी जगह जा रहा हूँ के वापस इन चीजों को कभी नहीं देख पाउँगा। या ऐसा कहूँ कि उन कमरों की आदत मुझे जाने से रोक रही थी। रोज़ सुबह उठकर कुछ सोचने की ज़रूरत नहीं। सब काम अपने आप होते जायेंगे।

पर इधर यही काम नहीं हो रहा है। मैं यहीं हूँ पर फिर भी मन यहाँ लग नहीं रहा है। इन दोनों स्थितियों में क्या चीज़ बदली है क्या चीज़ सामान है कह नहीं सकता। ऊँगली मेरी तरफ़ आकर रुक जाएगी शायद। सुबह तो यह घर इतना सूना सा लगा के रिमोट उठाया और उसे किसी चैनल पर लगाकर चलने दिया। मेरा देखना ज़रूरी नहीं बस उस वक़्त कान तक समझ में न आने वाली आवाज़ दिल को थोड़ा बाँध कर रख रही थी। बिखरना हमेशा आसान होता है। मुश्किल है ख़ुद को जोड़े रखना।

अभी डायरी वहीँ उसी रात छत से नीचे आकर लेटने पर रुकी हुई है। आगे बढ़ी ही नहीं। कुछ दिन ही ऐसे थे के लिख ही नहीं पाया। बड़ी मुश्किल से तो यह भी लिख पा रहा हूँ। अभी पौने छह हो रहे हैं। एक घंटे बाद घड़ी थोड़ा और पास आ जाएगी और कहेगी चलो। इससे पहले वह कुछ और कहे दो तीन किताबें निकाल लाया हूँ। 'रात का रिपोर्टर' पिछली बार रह गयी थी। और अभी जब घर के दरवाज़े पर ताला लगा रहा होऊंगा, तब यह मुझे सबसे पास बुलाकर यही कहेगा जैसे; कि सबके साथ आना। मुझे भी अच्छा नहीं लगता, तुम सबके बिना।

जून 10, 2013

जहाँ कुछ देर सही हम अपनी किताबों से तो मिल सकें

विश्वविद्यालय का मूल चरित्र क्या है? क्या उसे यथा-स्थितिवादी होना चाहिए। प्रतिगामी होना चाहिए। निरंकुश होना चाहिए। हम कम से कम उस विश्वविद्यालय से यह अपेक्षा तो बिलकुल नहीं करते जिसका आदर्श वाक्य निष्ठा, धैर्य, सत्य को साथ लेकर चलने की बात करता हो। पर इधर लग यह रहा है ‘सत्यमेव जयते’ वाला मुहावरा यहाँ अपना रंग दिखा गया। उस आदर्श चित्र में ही इसके संकेत भी थे। वहाँ एक ‘विरासत पशु’ इंगित है। जिसका अर्थ हुआ दाँत दिखाने के और, खाने के कुछ और।

दिल्ली विश्वविद्यालय इधर चार साल के डिग्री प्रोग्राम को लागू करने के लिए अधीर होता दिख रहा है। शायद हम जैसे तीन साल की डिग्री से जो नौकरी नहीं लपक पाये वो इन चार सालों बाद बेलों पर अंगूर की तरह लटकी पायी जाएंगी। खैर, इसकी ख़बरें तो लगातार मुख्यधारा मीडिया और समानान्तर मीडिया में आ रही हैं। पर चुपके से एक बड़ी ख़बर को वहाँ से गायब ही कर दिया गया।

यदि हम विचारों का आदान प्रदान करना इन संस्थानों का एक मौलिक कर्म मानने की भूल करें तब यह अपेक्षा सहज ही ऐसे किसी संस्थान से होगी कि लगातार उसके लिए ‘स्पेस’ बनाएँ। पर आश्चर्य कि दिल्ली स्थित ‘पेस सेटर यूनिवर्सिटी’ इस विश्वविद्यालय में किताबों के लिए कोई जगह नही है। जो जगह थी भी उसे खाली करवा लिया गया है और अब वहाँ ताला लटक रहा है।

यह हमारी उन अभिरुचियों की तरफ इशारा कर रहा है जहाँ यह संस्थान मात्र परीक्षा पास करने के की टकसालों में तब्दील हो चुके है। उस खाँचों साँचों से अलग जो एक दुनिया और हो सकती थी उसके लिए अब वहाँ जगह नहीं है। आप पुलिस को हफ़्ता देकर सालों वहीं छात्रा मार्ग पर भेलपूड़ी बेच सकते हैं पर आप किसी बने बनाए ढाँचे के अंदर किताब नहीं बेच सकते।

यह आश्चर्यजनक है कि नॉर्थ कैंपस, ‘यूटिलिटी सेंटर’ स्थित स्पिक मैके का ‘हॉलिस्टिक फूड सेंटर’ और ‘यू-स्पेशल बुकशॉप’ दोनों को खाली करवा लिया जाता है और कुछ समय बाद खाने पीने की जगह भारतीय रेल के ‘आईआरसीटीसी’ को सौंप दी जाती है पर किताबों वाली जगह अभी तक अपदस्थ है।

जिन हिन्दी विभाग के उत्तर-आधुनिक विद्वान से हम पढ़े थे वे इस कैंटीन के पुनः उद्घाटन पर चाव से खाते पीते फ़ोटो खिंचवाते देखे गए थे। उन्ही को श्रद्धांजली देते हुए यह बात लिखने का मन कर रहा है -गुरु दक्षिणा देने में अंगूठा हाथ से जाने का खतरा है इसलिए श्रद्धासुमन- कि यह पूरा परिदृश्य एक ऐसे ‘पाठ’ का निर्माण कर रहा है जहाँ विचारों के लिए कोई नहीं खड़ा है जो ठीहे प्रायोजित थे भी उन्होने अपनी दुकाने या तो बढ़ा ली हैं या अब उनके ताक पर अब विचार नहीं पाये जाते।

यह सोचनीय स्थिति है के अब सीधे विश्वविद्यालय आगामी भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार करने का दंभ तो भरते हैं पर एक सिरे से चिंतन का अवसर देने वाले पैबंदों को भी उनकी जगहों से हटा लेना चाहते हैं। यह सिर्फ़ इन संस्थानों का पतन नहीं है अपितु वैचारिक रूप से खोखलापन है। जो इस समय की राजनीतिक आवश्यकताओं को भले पूरा करता हो पर आने वाले भविष्य में कमज़ोर दिमागों की एक बड़ी भारी फ़ौज इकट्ठी होती जाएगी। जो सोचने से लेकर जीवनशैली के स्तर पर समरूप होंगे। यह विविधता को बड़े बारीकी से मिटाना है। उन जातीय आग्रहों से खुद को वंचित करना है जो हमारी पहचान हो सकते हैं।

प्रायोजित रुचियों-अभिरुचियों के युग में आपका स्वागत है जहाँ आपसे जुड़े निर्णय आप नहीं करेंगे। कर पाने की स्थिति में होंगे ही नहीं। इन संकटों से बच पाने के लिए हम भी किन्ही खुराना जी को याद करेंगे। जो जुबली हॉल से लेकर मानसरोवर, ग्वॉयर हॉल तक हॉस्टल के कमरों में किताबों के साथ हाज़िर हो जाते थे। यह निर्णय हमे करना है कि हम किधर हैं। जिन जगहों को खत्म किया जा रहा है उन्हे वापस हम लोग ही बना सकते हैं। चलिये चलें क्रिश्चन कॉलोनी, विजय नगर, बंगलो रोड या आसपास कोई किराये की जगह देखते हैं जहाँ कुछ देर सही हम अपनी किताबों से तो मिल सकें।

{यह पोस्ट 'जनसत्ता में 'अठारह को आई है। जाते जाते एक गलती यह हो गयी के वो जो आदर्श वाक्य वाली बात है उसमे निष्ठा, धैर्य, सत्य की जगह ‘धैर्य’ और ‘विनय’ चला गया है। बाकी सब वही है। पीडीऍफ़ में पढने के लिए यहाँ चटकाएं और वर्ड के लिए इधर। }

जून 07, 2013

शायद इसके बाद हम कुछ नए होकर मिल सकें

खुद नहीं पता है क्या लिखने बैठा हूँ। जैसे ही कमरे का पंखा बंद किया है पसीना बहने लगा है। खिड़की से हवा तो आ रही है पर वो नाकाफ़ी है। बेचारी। दिल्ली लौटे आज एक हफ्ते से एक दिन ज़ायदह हो गया। मज़ा बिलकुल भी नहीं आ रहा। बोरियत भरी दोपहरें हैं। उनमे बस कमरा बंद कर सोया जा सकता है। और वही कर भी रहा हूँ। बाहर झुलसने से तो कई गुना दिमागदारी वाल फैसला है।

इस गर्मी में दोस्त बुलाएँ तो भी बाहर न निकलूँ। निकल नहीं भी रहा था। पर आया बीता इतवार। चार चालीस के करीब। कहने को तो दोस्त है पर इधर से ‘हैलो’ बोलते ही गाली कान को छूती दिल में धँस गयी। धँसी इसलिए नहीं कि यह श्रीसंत के स्पॉट फिक्सिंग में गिरफ़्तार होने जितनी अप्रत्याशित घटना थी। बल्कि इसमे मेरी भूमिका गुरुनाथ मयप्न जितनी भी नहीं दिख रही थी। पर गाली थी। दी जा चुकी थी। इसके पीछे आत्मीयता, निकटता, बंधुत्व वाला नुक्ता समझने का मन नहीं हुआ। बहरहाल।

मैं कहाँ जाता हूँ, किन लोगों से मिलता हूँ, कितना समय निकाल लेता हूँ, इस गर्मी में भी बाहर पाया जाने लगा हूँ; इस पर इनकी नज़र बराबर बनी हुई है। और इन सबमे उनकी मदद कर रहे हैं मार्क जुकरबर्ग। फ़ेसबुक पर अपना भी एक अदद अकाउंट हैं। उस बस्ती में अपनी भी रिहाइश है। इसी तुर्रे पर वे थोड़ा अर्थशास्त्री होकर बोले कि उन मुलाकातों कि ‘अवसर लागत’ हम लोग हैं। तुझे हमसे मिलने के लिए सोचना पड़ता है और देख कैसे उस शाम सेंट्रल पार्क घूम रहा था।

फिर तरकश से एकलव्य का एक और तीर निकलता है। छलनी कौन हुआ पता नहीं। पर तब तक उसका अँगूठा माँगा जा चुका था। विद्वत जन कहाते हैं कि आज भी इसलिए आया हूँ क्योंकि फोन पर उस शाम उक्त व्यक्ति के साथ वाली बात कहीं लग गयी होगी। मतलब मिलने जाओ तब भी परेशानी। न मिलने जाओ तब भी। मुझे पता है दोनों कई दिनों से घेरने की तय्यारी में लगे होंगे पर टलते-टलते मौका हाथ भी लगा तो दो-ढाई घंटे। इसमे तो मज़मून भी नहीं पढ़ा जाता। आगे की तो क्या कहें।

साफ़-साफ़ फिर कहे दे रहा हूँ मुझे मेरे ‘पर्सनल स्फेयर’ में किसी की भी आवाजाही नहीं चाहिए। तब तो बिकलूल भी नहीं जब मेरी मर्ज़ी न हो। पर नहीं तुम मानने वाले कहाँ थे। आदत जो ठहरी। अगर दोस्ती बराबर की साझेदारी है, उसमे जीतने तुम हो, उतना ही मैं हूँ; तब क्यों लगातार इन मुलाकातों में छिझता रहा हूँ। महसूस तो ऐसा ही हुआ मुझे। कि मेरा इंतज़ार सिर्फ़ कुछ देर की खींचतान से जादा आगे नहीं बढ़ पाता। टाइमपास की ‘भेजा फ्राई’ ने जो नयी व्याख्या दी है उसी के इर्दगिर्द। पर दोस्त कितनी बार विनय पाठक की भूमिका निभाऊँ। और तब तो और जबकि मुझे पता है के मेरे साथ क्या होने वाला है।

तुम मेरे मोबाइल न दिये जाने के कारण कुछ जादा ही आहत हुए लगते हो। बाद में दूसरे की ‘वॉल’ से कह रहे थे ‘हम किसी की सामाजिक प्रयोगशाला के यन्त्र नहीं हैं जिन पर प्रयोग किया जा सके’। तो मियाँ मिट्ठू किसने कहा कि होने दो। पर जब एक बार, दो बार, चलो तीन बार माँगने पर भी मैं अपना मोबाइल नहीं दे रहा हूँ तब उसकी टीका करने की ज़रूरत क्या थी। एकबार फिर कह रहा हूँ के जो दिखाया नहीं जा रहा है उसको लेकर तुम्हारा हठ कभी-कभी कोफ़्त से भर देता है। बार-बार वही पैटर्न। थोड़ा तो परिपक्व हो जाओ। अब ‘मच्योर’ नहीं होगे तब कब।

इसमे तुम्हारे आत्मसम्मान को ठेस भी लग गयी। इतने पर भी तुम रुके कहाँ। तुम भले मेरे दोस्त हो। पर जब मना कर रहा हूँ, तब उसे भी समझाने की ज़िम्मेदारी भी क्या मेरी है। कहने लगे के आगे से हम भी इसे कोई तस्वीर नहीं दिखाएंगे। न इससे खिंचवाएंगे। तो साहेबान आज तक जितनी भी तस्वीरें इस फोटो-खींचक ने उतारी हैं उनमे बराबर की सहमति तुम सबकी भी उतनी ही थी, जितनी मेरी। इसमे छिपाने-दिखाने वाली बात आनी ही नहीं चाहिए थी।

वैसे कहना नहीं चाहता था पर अब बात आई है तो कह दूँ उस ‘सोश्ल नेटवर्किंग साइट’ पर तुमसे जादाह ‘पर्सनल’ हूँ। ढाई तीन हज़ार तस्वीरें ऐसे ही वहाँ मौजूद नहीं हैं। और बताओ कब तुम्हारे कहने पर तुम्हारी तस्वीरों की ‘प्राइवेसी सैटिंग’ चेंज नहीं की हैं। उस मोटे के एकबार कहे पर वहाँ से फ़ोटो डिलीट नहीं की। तुम कह तो ऐसे रहे थे जैसे हमारी दोस्ती इसी शर्त पर हुई थी कि हम अपनी फॅमिली फ़ोटो एल्बम छमाही छमाही दिखाया करेंगे।

क्या कभी-कभी तुम्हें मेरी तरह ऐसा तो नहीं लगता के गलत पात्र से दोस्ती गाँठ ली। या कभी समझने की कोशिश की है के हम सब एक दूसरे को समझने में लगातार विफल हो रहे हैं तो इसका कारण क्या है। या समझना ही कौन चाहता है। टूट रहा है, उसे टूट जाने दो। कोई फ़र्क नहीं पड़ता। तभी मैं बार-बार वहाँ आना टाल रहा था। मुझे पता है पीछे हमारे बीच बातें कम हुई हैं। वे सिमट रही हैं। उनमे सिर्फ़ और सिर्फ़ दोहराव है। जो उमंग उल्लास प्रीति आनंद होना चाहिए वह ख़त्म हो रहा है। शायद इसे ही ठहराव कहते हैं। जो हमारे बीच आ रहा है। फ़िर यह भी लगता है इसमें से स्वभाविकता कम हुई है जो इसे सहज नहीं रहने दे रही। वहाँ आकार मैं असहज नहीं होना चाहता था। पता है हम छूट रहे हैं। लगातार। बिन बताए।

तभी लिखा था कि ‘लगता है इधर कई दोस्तियों का स्थगन काल कुछ लंबा चलेगा’। शायद इसके बाद हम कुछ नए होकर मिल सकें। पर अपने इस कहे को बदलूँगा नहीं। मैं किसी भी सामजिक बंधन के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। बशर्ते मेरी मर्ज़ी न हो। जिसे जो कहना है कहता रहे। कोई फ़र्क नहीं पड़ता। अब तो बिलकुल भी नही।

जून 04, 2013

उधर अनाम दो दिन

दिन पहला: इंतज़ार

10:07 बजे, 15.05.2013
मुझे इंतज़ार करना बिलकुल भी अच्छा नहीं लगता। खासकर किजब इंतज़ार धूप में करना पड़े। इंतज़ार वहाँ पर अच्छा लगता है जब चारों तरफ़ हरियाली, शांत वातावरण, ठंडी हवाएँ चल रही हों।

मेरे भतीजे का मुंडन था मैं अपने परिवार के साथ वहाँ पर गयी हुई थी। मुंडन तक तो मुझे बहुत अच्छा लगा पर उसके दूसरे दिन से मुझे वहाँ पर बिलकुल भी अच्छा नहीं लग रहा था। मैं यही सोच रही थी कि कितनी जल्दी शाम हो और मैं अपने घर जाऊँ। दिन भर मैं कभी बड़े फूफ़ा तो कभी छोटे फूफ़ा के घर मुस्कान के साथ राउंड लगा रही थी।

यही करते-करते शाम के चार बज गए। तब मैं और मुस्कान लूडो खेल रहे थे। फिर मेरी दीदी आई मेरे जीजा को घर ले जाने के लिए तो उन्होने कहा कि मेरा झोला फटा हुआ है। तो दीदी ने उनका झोला सिला। फिर पाँच बज गए। फिर भी मैं इंतज़ार नहीं कर पा रही थी कि कितनी जल्दी मैं अपने घर आ जाऊँ। फिर सवा पाँच बजे संदीप भईया ने ऑटो रुकवायी और हम सब असपे बैठ गए। फिर भी मेरा इंतज़ार खत्म नहीं हुआ। फिर हम सब घर पहुँच गए और मेरा इंतज़ार खत्म हुआ।

दिन दूसरा: मेरे मन की बात

01:10 बजे, 16.05.2013
कल रात से मैं यही सोच रही थी कि साढ़े आठ बजे मुझे स्कूल जाना है क्योंकि आज मेरा रिज़ल्ट निकालने वाला था। ये सोच कर कि मेरा रिज़ल्ट निकलेगा थोड़ा ख़ुश हो जाती थी और दुखी भी।

खुश इसलिए कि मेरा पेपर बहुत ही अच्छा हुआ था। और दुखी इसलिए कि हो जाती थी कि हर साल की तरह इस बार भी मेरे साथ बेईमानी न हो। ये मैंने महसूस किया है कि मैं चाहे जितना पढ़ूँ, कितनी भी मेहनत करूँ पर मेरा रिज़ल्ट अच्छा नहीं आता है। पता नहीं ये मेरे साथ ही क्यूँ होता है।

मैंने कई कंपटीशन के पेपर दिये हैं और नवोदय के पेपर को छोड़ के मेरा सारे पेपर में नाम भी आया है। नवोदय के पेपर में मैंने कितनी तैयारी की थी ये में और मेरे घरवाले ही जानते हैं। लेकिन फिर भी मेरा नाम उसमे नहीं नाम नाम नहीं आया। यहाँ तक कि मैं नवोदय में पहुँचने के बाद जब तक कि पेपर शुरू नहीं हुआ तब तक मैं पढ़ती ही रही। मैं आज भी नवोदय की किताब देखती हूँ तो मैं दुखी हो जाती हूँ। और कोई मुझसे पूछता है कि तुम्हारा नाम आया तो मैं नही का जवाब दे देती हूँ। पर बाद में जब मुझे अपना नहीं का जवाब याद आता है तो मैं रो पड़ती हूँ।

सोचती हूँ कि काश मेरा जवाब हाँ होता। पर जीतने भी पेपर में मेरा नाम आया है मैं उन पेपरों के पुरस्कारों को देख उत्साहित हो जाती हूँ। 

जून 03, 2013

अकेले हो जाने के बीच

सोमवार, ‎मई 13, ‎2013, ‏‎9:37:28 बजे 

रात पता नहीं कैसा कैसा हो रहा था। उन्हे बीतते हुए लगा जैसे मैं खुद को गलत समय पर गलत जगह पाने की बात से अंदर ही अंदर पनपे भावों से लगातार हारता जा रहा था। उन्हे लिख देने मेरे लिए शायद कुछ देर का बच जाना होता। पर नहीं। उस हारे दिल को संभाल पाना मेरे उतना ही मुश्किल होता जा रहा था जितना कि यह के कहीं भी अट नहीं पा रहा हूँ। मेरे हिस्से की साझेदारियाँ दूसरे बटोरे ले रहे हैं। या छिटक कर चली गयी हैं। कह नहीं सकता। उनमे खुद मेरे क्या भूमिका रही। नहीं पता। यह सब लगातार इकट्ठा होता रहा है अचानक हुआ। यह भी नहीं पता। या जान कर भी अंजान बन जाना ही ठीक होगा।

उन लगातार सालों में इधर के हिस्से वाली ऊष्मा अगर कम हुई है तो क्या उसकी ज़िम्मेदारी दोनों के हिस्से बराबर आती है या किसी के हिस्से में कम बेसी हैं। फिर वही पुरानी लाइन याद आई के..पता नहीं क्या लिखने जा रहा था। दिमाग में थी पर टाइप करने की दरमियानी में गायब।

यह कहना उस वक़्त तो बिलकुल फ़िजूल जैसा ही है के जब हम सात छह सौ किलोमीटर चलकर उनमे शामिल होने आए हैं तब हमारी तरफ वाला उत्तर दायित्व थोड़ा तो कम हुआ ही होगा। ऐसा लगना गलत भी हो सकता है पर यहाँ के दिन किसी तकनीकी यंत्र के साथ तो गुजारने आया नहीं हूँ उसकी सही जगह शायद यह है भी नहीं। वहाँ ये लोग नहीं हैं, इसलिए मैं यहाँ हूँ। अगर ऐसा मुझे लग रहा है तो मैं कब हसीन बहाना बन गया के मुझे टाला जा सक्ने वाला मान लिया गया। या यह सब उल्टियाँ यहाँ कर रहा हूँ उनका कोई मतलब है ही नहीं। ऐसा सोचे जाने के प्रस्थान बिन्दु के समय से।

क्या यह मेरे यहाँ का न होना अपना खेल रहा है। जहां मैं अजनबियों के बीच फंसी साँस की तरह हो गया हूँ। जहां खुद मेरे साथ मैं न्याय नहीं कर पा रहा हूँ। यह सब कह देना..

[इसके बाद भी बहुत कुछ लिखना था पर कई लोगों के एक साथ आने के बाद लैपटॉप बंद कर दिया था। जल्दी से। और तुमसे बात तो बीती रात हो ही चुकी थी ]

आवाज़ें..

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