जुलाई 28, 2013

महात्मा गाँधी, मॉडर्न स्कूल, मिड डे मील: कुछ विचार

सुबह के ग्यारह बजे होंगे। बस में था। सड़क पर जाम। बेतरतीब। रेड लाइट की कोई गलती नहीं। वह अपना काम कर रही थी। जब गाडियाँ कुछ जादा हो जाएँ तब क्या अपनी अर्थव्यवस्था पर उसकी विकास दर के परिणामों को देख छाती फूल कर कुप्पा हो जानी चाहिए या बाबा रामदेव के कहे अनुसार भ्रामरी प्राणायाम शुरू कर देना चाहिए। कुछ समझ नहीं आया इसलिए छाती अपनी पूर्वावस्था में बनी रही। साँस को आना जाना था, वह आती जाती रही।

कुछ देर बाद समझ आया कि जिस सड़क पर हमारी डीटीसी बस खड़ी है उसका नाम बाराखम्बा रोड है और इसपर सन् उन्नीस सौ बत्तीस में ही एक स्कूल को दरियागंज से स्थानांतरित किया गया था। तब हमारे समाज में आधुनिकता का कितना अनुपात किस मात्रा में व्याप्त था, उसके कौन कौन से सूचक, उसके मानकों पर खरे उतर रहे थे इसपर कोई दस्तावेज़ अभी तक खोजा नहीं गया है। पर तब उसका नाम रखा गया था ‘मॉडर्न स्कूल’।

उन्नीस सौ बीस के लगभग गाँधी दिल्ली के ‘बिरला भवन’ गाँधी बिरला भवन से परिचित न हों और न ही उन्हें पता हो कि वह सन् उन्तालीस में उन्ही बिरला द्वारा निर्मित मंदिर मार्ग स्थित ‘लक्ष्मी नारायण मंदिर’ का उदघाटन इस शर्त पर करने वाले थे कि जातिगत आधार पर निम्न जतियों के प्रवेश पर किसी भी तरह की कोई पाबंदी नहीं लगाई जाएगी। तब भी यह नहीं माना जा सकता कि वह दिल्ली से इतने दूर थे। शायद कोई लेख ‘हरिजन’ या ‘यंग इंडिया’ में छपा भी हो। यहाँ यह देखना मानीखेज होगा कि गाँधी ने इस स्कूल पर कभी कोई लेख लिखा या नहीं। यह इसलिए भी गौरतलब है क्योंकि अँग्रेजी राज में यह दिल्ली का पहला प्राइवेट स्कूल था। उस समय तक डी॰ए॰वी॰ स्कूल(1886) महात्मा हंसराज द्वारा स्थापित किए जा चुके थे जो इस आधुनिकता के आग्रह को ‘एंग्लो’ विशेषण के साथ चुनते हैं। इस आलोक में उनके क्या विचार थे जबकि उनके पास अपना शिक्षा का मॉडल था, देखने लायक होता।

नयी तालीम के कुछ हिज्जे बुनियादी शिक्षा के नाम से ‘एनसीएफ़ 2005’ में हैं। जिनपर कभी कोई खुल कर बात भी नहीं करना चाहता। जिस आधार पत्र 'काम और शिक्षा' में इस गाँधी विचार को रेखांकित किया है उसका आज तक हिंदी में अनुवाद भी उपलब्ध नहीं है। आपको उसे औपनिवेशिक भाषा में पढ़ना होगा। यह श्रम को एक सम्मानजनक स्थान देने उसके साथ मानवीय गरिमा के मूल्य को भी अपने साथ प्रसारित करती है। जिसमे मदद करती है फ़िल्म दीवार। एक लड़का बूट पॉलिश कर जीविकोपार्जन कर रहा है वह अपने द्वारा किए गए श्रम के प्रति संवेदनशील है और दूसरों से उसके बदले सम्मान चाहता है। तभी वह फेंके गए सिक्कों को उठाने से इंकार कर देता है। यह उसकी भीख नहीं है, उसके काम के बदले मिला पारिश्रमिक है। जिसे उसके हाथ में दिया जाना चाहिए। ऐसे कई दरीचे उसके बाद बनी किताबों में यहाँ वहाँ हैं, जो नयी-नयी युक्तियों से इस विचार को संप्रेषित करती हैं। ख़ैर।

अचानक ध्यान गया शिक्षा के अधिकार में सुझाये गए ‘पड़ोस के विद्यालय’ की अवधारणा पर। ‘मॉडर्न स्कूल’ का पड़ोस बनने के लिए या तो तिलक ब्रिज-शिवाजी ब्रिज की रेलवे कॉलोनी में रहना पड़ेगा या सामने बने नीलगिरी अपार्टमेंट्स में। वरना ज़ाकिर हुसैन कॉलेज तक जाते फ़्लाइओवर के नीचे बना ली गयी झुग्गी कब तक अपनी ख़ैर मनाएगी। एक दिन तो उसे बुलडोज़र तोड़ ही देगा। इतनी महँगे पड़ोस से पौने दो हज़ार के करीब बच्चे नहीं आ सकते। इसलिए यहाँ बड़ी से बड़ी हर ब्रांड की देसी विदेशी गाडियाँ खड़ी दिख रही थीं क्योंकि उस दूर के पड़ोस की दूरी इन्ही पहियों से पाटी जाएगी। गाड़ी के साथ स्कूल कितना बड़ा ब्रांड है यह किसी से छिपा नहीं है।

अगर इस स्कूल को बनाने वाले ठेकेदार का बेटा इस स्कूल में पढ़ा तो कोई बड़ी बात नहीं हो गयी। दिल्ली उनकी बनाई हुई होगी पर यह मौके उस अधिशेष से ही निकल रहे थे जहाँ खुशवंत सिंह ‘बर्नस्टीन’ के कहे अनुसार अपनी भाषिक अभिव्यक्ति करते रहे। दर्शनीय तो वह होता जब सरदार शोभा सिंह के यहाँ काम करने वाले मजदूर का बेटा वहाँ पढ़कर निकलता। और इस भाषाविद् की स्थापना को उलटकर रख देता। दया पवार मराठी में लिखते हैं और ओमप्रकाश वाल्मीकि हिन्दी में। उनके ‘सीमित कोड’ उस रसानुभूति और भाषिक संस्कार की शास्त्रीय कसौटियों पर खरे नहीं उतरते जितने कि अँग्रेजी में लिखी मानो माजरा। ट्रेन टू पाकिस्तान।

बस का ऐसी ठीक काम कर रहा था फिर भी यह सोचने लगा कि कभी इन स्कूलों में ‘मिड डे मील योजना’ से जुड़ी कोई ख़बर क्यो नहीं आती। क्या यहाँ उस वर्ग का बच्चा नहीं आता जिसका पेट घर से खाली रहता है। जवाब हम सबको पता है। अब जब फुर्सत से यहाँ लिखने बैठा हूँ तो याद आता है एमएड एंट्रेंस में पूछा सवाल। कि अगर एक माता अपने बच्चों को भूखे स्कूल  भेज रही है तो इसका कारण क्या है। चार विकल्प थे: माता अनपढ़ है, उसके घर में अनाज नहीं है, सरकार इसके लिए दोषी है और चौथा पता नहीं। आज थोड़ा-थोड़ा  उसे समझ पाया हूँ के वहाँ माँ के अनपढ़ होने को बच्चों की भूख के साथ क्यों जोड़ा गया था।

जुलाई 25, 2013

सद्गति


सुबह शनिवार की थी। मंदिर मार्ग पर आवाजाही बिलकुल बंद। लगा इतने सवेरे कौन नेता यहाँ से गुजरने को है। सात बजे आठ बजे कोई नहीं आया। बाद में पता चला एक पेड़ गिरहा है उसे ही ठिकाने लगाने का बंदोबस्त किया जाना है। हमारे समाज पेड़ों के प्रति इतने सहिष्णु नही कि छठी सातवीं कक्षा की हिंदी की किताब में पढ़े पाठ की तरह लोग बर्लिन की तरह यहाँ भी उसे काटने का विरोध करने के लिए इक्कठा हो जाएँ। अरे वो अशोक वाजपेयी का कभी कभार नहीं भीष्म साहनी टाइप लेखक का लिखा कोई संस्मरण था।

ऐसे ही अभी अष्टभुजा शुक्ल की पता नहीं कौन सी कविता उस शाम सर सुना रहे थे, याद नहीं आ रही। कि पीपल का पेड़, ब्रह्म देवता को काटने कोई हिन्दू सामने नहीं आता। जिसे बुलाते हैं वह कोई पास्मान्दा मुसलमान था। जिसे पता नहीं था पेड़ काटने पर कौन सा पाप लगता है।

पेड़ कट जाता है। पाप लग जाता है।

प्रेमचंद की कहानी है 'सद्गति' में दुखिया जाति से चमार है। भले 'चमार' शब्द आज असंवैधानिक घोषित हो गया हो पर भाव आज भी यहाँ वहां तैरता दिख जाता है। पर उस दिन पता नहीं क्यों उस कटर मशीन को देख दुखिया की याद हो आई। अगर इस मशीन का आविष्कार सन उन्नीस सौ तीस के शुरुवाती दशक में हो जाता तब वह पंडित जी के यहाँ घंटो धूप में लकड़ी नहीं फाड़ रहा होता। तुरंत मशीन उठाता और पांच मिनट भी नही बीतते कि लट्ठ साफ़।

पर पता है यह इतना साफ़गोई से बिना गया परदा ही है जहाँ आज भी दुखिया वहीँ किसी पंडित के दुआरे यहाँ घास गाय के सामने डाल दे और जरा झाडू लेकर द्वार तो साफ़ कर दे। यह बैठक भी कई दिन से लीपी नहीं गई। उसे भी गोबर से लीप दे। के हुकुम की तामील में  अपनी जान लड़ाए दे रहे हैं।

सपनों को यूटोपिया कह देना आसान है उनके लिए लड़ना मुश्किल।

जुलाई 23, 2013

अन्नपूर्णा डायनिंग की याद के बहाने

साल दो हज़ार सात। महिना हमारे सालाना इम्तिहान के बिलकुल बाद का। बीए ख़त्म हो रहा था। अब नए सिरे से ज़िंदगी को देखना शुरू कर देने के दिन आने वाले थे। उन सारी बेफ़िक्री से दूर। मौजों की तीमारदारी के बिना। नौकरी की टेंशन से फ़ारिग। हम सिर्फ़ कुछ दिन इन सारी बड़ी-बड़ी बातों से भाग लेना चाहते थे। कुछ देर बैठना चाहते थे। बेतरतीब सी दुपहरियों से दूर किन्ही पेड़ों की छाव में। उन सारे रोज़ाना की ऐसी तैसी से अलग।

हम तीनों चल पड़े राजस्थान। पहला पड़ाव जयपुर। ट्रेन पुरानी दिल्ली से थी। सवा नौ बजे के आस पास। मंडोर एक्सप्रेस। रिजर्व टिकट नहीं था। ऐसे ही किसी जनरल बोगी में खुद को बिठा लेना था। जद्दोजहद के बाद बैठने की जगह मिल गयी। दौसा चार सवा चार के आसपास थी। और हम जयपुर उतरे तड़के साढ़े चार के लगभग। फुर्सत से थे। बिना कोई नक़्शे। बिना किसी ट्रैवल एजेंट के चंगुल में पड़े।

किलों के बारे में कभी पढ़ा नहीं था पर थोड़ा बहुत जो भी दिमाग चलता था उसमे हमारा दिल्ली का लाल किला कहीं अटता नहीं था। किले भी कहीं इतने बंधे-बंधे होते हैं। इधर चाँदनी चौक की रेडलाइट पीछे रिंग रोड की गाड़ियों की आवाज़ें। लगा आमेर का किला ही है जिसने अपने आपको किले के रूप में बनाए रखा है। यहाँ जितनी भी भीड़ हो उसमे गायब हो जाती। दीवान-ए-खास से लेकर उन छतरियों तक जो सीढ़ियों से ऊपर आती हैं। फिर लंबे-लंबे गलियारे। उनसे झाँकते चहरे। इतमीनान से चलने का मज़ा। ऊपर नाहरगढ़ के किले में रखी तोप तो नज़र नहीं आती पर उसकी दीवारें अपनी तरफ़ खींचती सी हैं।

सिर्फ़ एक दिन के लिए हम जयपुर में थे। वो भी ऑफ सीज़न। जलमहल में पानी नहीं था। न तब तक तहलका का उसके ‘री-स्टोरेशन’ पर इशू ही आया था। हवामहल भी अपनी मरम्मत करवा रहा था। पर लोगों को जाने दे रहे थे। उसके पीछे सुबह घूमे जंतर मंतर, सिटी पैलेस, फिर आमेर दिखे। लगा सबकुछ इतनी पास-पास है। पंछी होते तो झट से उड़ जाते। पर वो जो सड़के हैं वहीं उन्हे दूर कर रही हैं। नीचे जावेरी बाज़ार। वहाँ फैली दुकानें। तब चौकी धानी के बारे में पता नहीं था न रात हम रुकने वाले थे।

शाम ही चल पड़े। वही लोकल डब्बा। अगला पड़ाव माउंट आबू। रेलगाड़ी आबू रोड तक ही आती हैं उसके आगे बस से। घंटे भर की दूरी भी नहीं है। हम घूम रहे हैं। सड़क घूम रही है। सड़क घूम रही है। हम घूम रहे हैं। हरे हरे पहाड़। दूर दिखे मोड़। कहीं किसी साइड व्यू मिरर की परछाई।

रात नक्की लेक के बगल बगल सड़क किनारे सैर कर रहे थे। भीड़ थी। आवाज़ें थी। कोई कॉलेज का ग्रुप था। फ़ोटो खिंचवा रहे थे। तभी झमाझम बारिश शुरू हो गयी। हम भी किसी दुकान के नीचे खड़े उसकी बूंदों का घनत्व नाप रहे थे। रात तो हो ही गयी थी। पूरा दिन आबू पर्वत घुमाने वाली बस ने तो जैसे जान ही ले ली थी। ऊँघते जागते शाम पाँच बजे ‘सनसेट पॉइंट’ पर जब उसने छोड़ा, तब कुछ जान में जान आई। हम ‘अन्नपूर्णा डायनिंग’ ढूंढ रहे थे। किसी ने बताया ही होगा ऐसे वैसे चले जाओ नक्की किनारे ही है।

तीन थाली ली। भर पेट खाओ। दाल पर छक के घी डलवाओ या मीठे चावल के साथ गुजराती दाल लो। सब कुछ अन-लिमिटेड। ऐसा नहीं था कि स्वाद में किसी से पीछे रह जाये। दाल बाटी भी उतनी ही स्वादिष्ट जितने गुजराती व्यंजन। हम यहाँ गए तो एक ही बार पर उसे आजतक अपने दिल में लिए घूम रहे हैं। लगा खाना वहाँ पेट भरने के लिए नहीं दिल जीतने के लिए बनाया जाता है।

छह साल लग गए मुझे यह लिखते-लिखते। आज मुकेश गोविन्दपुरी नहीं रहता। एम-तेरह आज नहीं चलती। पर गली नंबर तेरह आज भी वहीं है। वह हनुमान मंदिर भी। कभी-कभी शुरू की कई यादें वहाँ खींच ले जाती हैं। आज पहले की तरह मिलने के मौके कम हैं। फ़ोन पर लंबी-लंबी बातें भी गायब सी हो गयी हैं। नीरज भी कई साल पहले वापस पूर्णिया चला गया है। मुनीरका का वो कमरा किसी और ने किराये पर ले लिया होगा। मनोज से कई बार कह चुका हूँ मिलेंगे। प्लान बनाते हैं। पर वह कभी बना नहीं। लगता है वक़्त की किश्त या तो हमारे हिस्से कम पड़ती है या फ़िर हम खुद को जादा बिज़ी समझने लगे हैं।

[जारी..]

जुलाई 22, 2013

बहराइच से लौटकर..


इस बार का बहराइच लगा पिछली बार से अलग है। वह लगातार बदल रहा है। इक्के-खड़खड़े दृश्य से अदृश्य होते जा रहे हैं। घंटाघर वाला तांगा स्टैंड अब खाली खाली-सा लगता है। उनकी जगह ले ली है बिजली वाले ऑटो ने। दरगाह क्रॉसिंग पर पुल का काम तीन सालों से चल रहा है। डिगिहा पर ‘वी-मार्ट’ नया-नया खुला है, जो दिल्ली विल्ली के ‘विशाल मेगा मार्ट’ की याद दिलाता है। छोटी बाज़ार का ’सांझा चूल्हा’ अब चुकने लगा है। संदीप कहने लगा तीन साल हो गए ‘शोभा सम्राट थियेटर’ दरगाह मेले में अब नहीं आता। जिससे जेठ मेला थोड़ा सा टूट गया है। अब वैसी भीड़ नहीं आती। चौपाल सागर आई टी सी द्वारा निर्मित खेती संबंधी हाट है। झिंगहा घाट से आगे। मिशन अस्पताल की तरफ।

फ़िर कई कहानियों में एक कहानी यह भी तैरती मिली कि बहराइच की डीएम किंजल सिंह अखिलेश यादव की पत्नी की सहेली हैं। डिम्पल के साथ पढ़ी हैं। इसलिए अतिक्रमण के खिलाफ़ बड़े बड़ों की एक नहीं चल रही। आज कोई आसाम चौराहे को पहचान नहीं सकता। सारे बराण्ड-खरी वाले ठीहे वहाँ से गायब हैं। छप्पर डालकर चाय समोसे बनाते चूल्हों वाले होटल अब वहाँ नहीं पाये जाते। नयी अनाज मंडी से लेकर पूरे शहर में सफ़ाई अभियान तेज़ है।

सुनने में कई साल पहले आया था बहराइच मे ब्रॉडगेज़ लाइन बिछने जा रही है। मैलानी की तरफ से या गोण्डा की तरफ़ से पता नहीं। फ़िर यह भी कि लखनऊ रोड को थोड़ा इधर उधर कर सीधे घाघरा की तरफ़ ले जाएंगे। जरवल रोड का घुमना ख़त्म करेंगे। एक बहुत पुरानी तस्वीर याद आ रही है। दैनिक हिंदुस्तान में छपी थी। दो हज़ार चार के आस पास की। राहुल गाँधी को बहराइच में चाँदी का मुकुट पहनाया गया था। तब शायद रुबाब सईदा जीती थी वहाँ सपा से। कॉंग्रेस के कमांडो कमल किशोर जीते अगली बार। पता नहीं इन्होने कौन-कौन से वादे कर रखे हैं। जो अभी तक वादे ही हैं।

हमारे नेताओं के साथ दिक्कत यह लगती है कि उनके जो आदर्श हैं वे उन जगहों को उनके मूल स्वरूप में बचाए रखने की जद्दोजहद से बचना चाहते हैं। जूझना नहीं चाहते। हम कितनी दिल्लीयाँ और बसाना चाहते हैं, पता नहीं। इधर कमाल ख़ान की रिपोर्ट आई कि इकौना से दो बार विधायक रहे भगौती परसाद बहराइच जिला अस्पताल में मौत से लड़ते हुए हार गए। अगर उनके साथ रहे विधायक अपने हाथ की मैल भी गिरा देते तो उनकी जान बच जाती।

इन सारे बदलावों में उन सबका क्या होगा जो विकास की परिभाषा में नहीं अटते। मतलब जो पुल क्रॉसिंग पर बन रहा है अगर उसे विकास का प्रतीक मान लिया जाये तब उसकी चढ़ाई करने में खड़खड़े की धीमी गति परिवहन को बाधित करे उससे कई साल पहले ही उसे बे-दखल कर दिया गया। इसे विकास की स्वाभाविक प्रक्रिया मान हम लोग उनके गायब हो जाने को नहीं देख पाते। हमे लगता है कि हम आगे बढ़ रहे हैं। पर क्या सच में ऐसा है। या उसके भ्रम में हम चुंधियाए बौराए से घूम रहे हैं।

गल्ला मंडी से जो भी सौ दो सौ लेकर लेकर इक्के वाले लौटते थे वो अब नहीं लौटते। उनका शाम रात जो भी इंतज़ार करते थे वो अब इंतज़ार भी नहीं करते। उनके सामने जीवन का संकट है। जो घर किसी तरह चल रहा था अब घिसटने लगा है। चक्की रोये चूल्हा उदास रहे नीति नियंता बेफ़िक्र हैं। उनके लिए लोकसभा की कैंटीन का मीनू हाजिर है। खड़खड़े वाला मानरेगा का मज़दूर बन जाए उनकी बला से। स्वावलंबन की परिभाषा और गाँधी का ग्राम स्वराज यहाँ बोरिंग से पानी भरते नज़र आते हैं। प्रेमचंद एकबार फ़िर परिदृश्य में उपस्थित होते हैं। उनका गोबर आज तांगा भी नहीं चला सकता। वह विकास की दौड़ में कई मील पहले ही छूट गया। और जो भगौती परसाद जैसे हैं वो जिला अस्पतालों में बेनामी मौत मरते रहे हैं।

जुलाई 20, 2013

रात, अधलिखा सपना, सपने में लौट आई मेज़, उस पर पड़ी डायरी और थोड़ी बारिश की बातें

रात के डेढ़ बज रहे हैं और मैं बाहर घूम रहा हूँ। छत पर। बिलकुल अकेले। मेरी परछाई भी साथ नहीं है। क्योंकि चाँद नहीं है। उसकी रौशनी नहीं है। उसे ढक लिया है बादलों ने। मैं उसकी तरह देखता नहीं। पर पता है। उसे ऐसा ही कर दिया होगा। बादलों ने। हवा और रातों की तरह ठंडी है। अँधेरा उतना नहीं है कि अपनी शक्ल नज़र न आए। पर साथ आईना नहीं है न इसलिए बता नहीं सकता कैसा लग रहा हूँ।

पता नहीं सपने में हूँ या क्या है। सामने लगा जैसे कोई खड़ा है। कोई एक नहीं। कोई दो। एक लड़का। एक लड़की। उस पेड़ की आड़ में। कभी उससे बाहर आ जाते। कभी छिप जाते। कुछ-कुछ एक दूसरे में समाते। तभी लौट आता हूँ। मेज़ के पास।

मेज़। जो कभी तरतीब से नहीं रही। बे-वजह किताबों से अटी पड़ी। बार-बार याद दिलाती। मैं बार-बार भूलता जाता। वो फिर याद दिलाती। मैं एकबार फिर भूल जाता। और इस याद दिलाने भूल जाने की कई कई किश्तों में वहाँ जमा होती रहती धूल। धूल में छिप जाते किताबों के नाम।

इसी पर पड़ी रहती है डायरी। दर्जन भर दिन बीत जाते हैं। कुछ नहीं लिखता। बस उसे नीचे पड़े दिन में एक दो बार देख लिया करता हूँ। पिछली तारीख़ का लिखा पढ़ लेता हूँ। और कुछ नहीं।

पता है पिछले दिनों हुआ क्या है जो लगातार इनसे दूर होता गया हूँ। मुझे खुद नहीं पता। कभी उनमे उनके कुछ न होने की बात याद आती है। कभी लगता है, किताबे वक़्त के उलट ठहर सकती हैं। जो नहीं ठहर सकती उनकी फिक्र में पतले होने से कुछ होना जाना नहीं। बस जो कर सकता हूँ वो इतना ही के चढ़ गयी धूल को झाड़ दूँ। कि दूर से ही नयी सी लगे। फिर न पढ़ने का कोई बहाना मिल जाएगा।

यह सब रात को ही लिख लेना था। पर बारह घंटे बाद लिख रहा हूँ। रात कोई घूमा-वूमा नहीं था। बस एक चक्कर काट लौट आया। लेट गया। नींद में एक सपना देखा। अभी नहीं बताऊंगा उसमे क्या था। फिर कभी। बस कहा न ठंडी हवा था। मैं था। छत पर कोई नहीं था। कोई नहीं था मतलब कोई नहीं।

बारिश भी नहीं। बारिश पिछले शनिवार गोल मार्किट से पेशवा रोड पर मिली था। रायसीना बंगाली स्कूल आते-आते फुस्स। आज हम दोनों मिले आराम बाग के बाद पहाड़गंज थाने से पहले। नूतन मराठी स्कूल के बिलकुल सामने। मन था उसे किसी छत के नीचे छिप कर चुपके से देखने का। खुद भीगने की कोई प्लानिंग करके नहीं गया था। भागा। तुरंत बस में चढ़ गया। उनतालीस नंबर। लक्ष्मी नगर। झील। रामलीला मैदान तक आते-आते उसकी साँसे फूल गयी। वह पीछे रह गयी।

आज भी शनिवार है। जहाँ छोड़ा था बस से उतरते वहीं उसने पकड़ लिया। आराम से दस बारह लाख वाले बस शेड के नीचे आया। पर आने का कोई फ़ायदा जान नहीं पड़ा। टुहने तक बारिश पहुँच चुकी थी। लोग सिमट कितना पीछे खिसकते। बौछारे उन्हे  की-ऑक्स तक आ चुके थे।

वहीं दो लोग आज पहली बार मिले होंगे। शुरू हो गए। पुराने साथी की तरह चिंतन की मुद्रा ले चुके थे। पहले लोगों की अंटी में कम पड़ गए वक़्त पर नज़र पड़ी। कि देखिये साहब इतनी ज़ोर से बारिश हो रही है और लोग रुककर, उसके थम जाने का इंतज़ार भी नहीं कर सकते। भागे जा रहे हैं। हमें देखो एक स्टैंड आगे जाना था। पर यहाँ रुक गए हैं। इतमीनान से हैं। फिर दोनों कूदे गाँव के मैदान में। कि आज के गाँव वो गाँव नहीं रहे। खाना खाये बिना पहले कहाँ कोई जाने देता था। वहीं आज अगर चाय नसीब हो जाए तो बड़ी बात है। और तो और कोई रोकता भी नहीं। आपने बोला नहीं के अभी आखिरी बस तो आती ही होगी, वो महाशय आपकी हाँ में हाँ मिला आपकी विदाई के ताबूत में आखिरी कील ठोंक देंगे।

थोड़ी देर की इस गपशप ने मेरे दिमाग पर पता नहीं क्या असर डाला कि कुछ देर बाद ही उन दोनों की शक्लें मुझे एक सी लगने लगी। कुछ देर और रुकता तो क्या पता यह भी खुलासा हो जाता कि वह नाटा उस लंबू का कुंभ के मेले में बिछड़ गया वही सातवाँ भाई है, जो तब हज़ार रुपये लेकर किसी की औरत के साथ उड़ गया था।

अच्छा हुआ वहाँ से भीगता भागता ही चल पड़ा। वर्ना पता नहीं कितनी देर रुकना पड़ता। अब लैपटॉप के सामने हूँ। फ़िल्म देखने का मन नहीं है। भीग पहले लिया इसलिए अब नहीं। खुद तो बोर हो रहा था सोचा चलो इधर भी सबको बोर करता चलूँ। क्यों कैसी रही.. कभी-कभी हम भी कुंबले वाली गुगली डाल लेते हैं। हरभजन का ‘दूसरा’ तो मुरलीधरन की कॉपी है। और नक्कालों से सावधान वाली चेतावनी हमने खूब पढ़ी हैं।

जुलाई 17, 2013

एक अश्लील एकालाप

यहाँ इस चेतावनी के साथ आगे बढ़ने की हिदायत दी जाती है कि पुलिहा संकरी है। साथ ही टुटही भी है। पलस्तर उखड़ गया है, ईंटें दिख रही हैं। जिसके चलते नैतिकता के पुतलों का कौमार्य भंग हो जाने के ख़तरे के साथ जान और माल का भी नुकसान हो सकता है। ऐसा किस तरह संभावित है, जानने के इच्छुक व्यक्ति, जिनमें समान रूप से स्त्री-पुरुष दोनों शामिल हैं, वह सब मनोहर श्याम जोशी के उपन्यास ‘कसप’ के पेज नंबर एक सौ चौदह, ऊपर से उन्नीसवी, नीचे से तेरहवीं पंक्ति (राजकमल पेपरबैक्स, पहली आवृति: 2001) पर जाकर इस ज्ञान से परिचित हो सकते हैं। 

बहरहाल, अब काम की बात..

साला लड़की भगाने के लिए भी पैसे की ज़रूरत पड़ती है। फटी जेब में पैसा टिकता कैसे है, इस ज्ञान के बिना बिना गाड़ी एक दिन भी खिसकेगी नहीं। जेब में पैसे हो तो बहुत कुछ हो सकता है। बिन टिकट ट्रेन चढ़ टीटी को घूस देकर बच सकते हैं। कमरा किराये पर लिया जा सकता है। कुछ दिन एक वक़्त भूखे पेट रहने की नौबत नहीं आती। सब कुछ रूमानी सा लगता है। या फिर कुछ यूं होता के लड़की संग बंबई पहुँचते। पर करते क्या। हमारे खानदान के जातीय संस्करण ऐसे भी नहीं हैं कि ताज होटल वाले हमारे वंशानुगत वृक्ष के स्वाभाविक अंग होते। तो कुछ दिन खाने रहने की चिंता से दूर रहते। रात रंगरलियों में बीतती।

पर अगर इतना पैसा होता तब भागने का वाहियात खयाल भी नहीं आता। भागते तो वो हैं जिनके पास पैसा नहीं होता। जिनका पैसा उनकी जातियों को ढक नहीं पाता। फ़िर जो भागते हैं, उन्हे मारना पड़ता है। लड़की अकेली क्यों मरेगी। लड़का भी मरेगा। उनके ही परिवार वालों को कई-कई बैठकों के विचार विमर्श के बाद इस मर्मांतक निर्णय पर पहुँचना पड़ता है। लेकिन मेरी उमर के जो लड़के मरना नहीं चाहते, वह परिवार द्वारा सुझायी कन्या के संग हमबिस्तर होना स्वीकार लेते हैं।

इन सांस्कृतिक विवाहों में आर्थिक योगदान के फलस्वरूप जो दहेज़ मिलता है, उसके बूते लड़का अपने हनीमून के लिए किसी ऐसे स्थान का चयन करता है जो उसके सपनों का स्वर्ग हो। अधिकतर लड़कों के सपनों में ‘स्वप्नदोष’ होते हैं और कपड़ों का अभाव रहता है। इसलिए वह वहाँ जाता है, जहाँ उसकी पत्नी के अलावा अन्य स्त्रियाँ कपड़ों की न्यूनतम अवस्था में सरलता पायी जा सकें। जिन्हे देख उसके ब्याहता रात अंधेरे बंद कमरे में अपनी सामाजिक, दैहिक झिझक तोड़ उसके लिए खुद को समर्पित कर दे। भले उसकी इच्छा महात्मा गांधी के कथनानुसार संतानोत्पत्ति के लिए हर रात संसर्ग करना न भी रहा हो, पर पत्नी तो उसकी बाहों मे पायी ही जाती है। उसके मन की बात कैसे टाले। इसलिए कर लेते हैं। अगली रात नहीं करेंगे।

इस सबमे खुद को कहाँ रखूँ। रखने की ज़रूरत क्या है। अपनी तो चूलें ही हिल जाती। लड़की अपने साथ कितने गहने ला पाती। जिससे एक महिना दो महिना कोई आंटी किराये का कमरा दे भी देती और हमारा भाई बहन वाला बहाना चल भी जाता, फ़िर भी, हम उन रातों में किसी विज्ञापन कंपनी द्वारा अनुबंधित नहीं किए गए थे कि कमरे से आती पलंग की आवाज़ों को नज़र अंदाज़ किया जाए। कभी न कभी गर्भ-निरोधक के खाली छिलकों पर उनकी नज़र तो पड़ ही जाती। फ़िर इस मुसीबत से बचने के लिए अस्पताल पहुँचते। ‘कॉपर टी’ लगवाने की बात करते और तब वह लेडी डॉक्टर हमारा मैरेज सर्टिफिकेट माँगती तब क्या होता।

यहाँ यह बात साफ़ कर दूँ कि जितने भी साहसी लोग यहाँ तक मेरे साथ नीचे तक आये हैं, वह इन पंक्तियों से गुज़रते वक़्त, इन सब बातों को किसी भी तरह से इस ब्लॉग की ‘यूएसपी’ बढ़ाने का ‘मोदीय संस्करण’ मान बैठने की भूल न करें। हाँ, इस सबकी ‘फ्रॉयडियन सेटअप’ में कई-कई व्याख्याएँ हो सकती हैं। जिनमें उन दमित-अपूर्ण दैहिक इच्छाओं के पूरे न हो पाने के बाद बन गईं गाठों को देखा जा सकता है। पर ख़ुद इसे मनोविज्ञान से जादा, उस परिवार के निकट खींच लाना चाहता हूँ, जहाँ असद ज़ैदी की कविता ‘घर की बात ’ इंतज़ार कर रही है। उसकी शुरुवात होती है यहाँ से:
उस लड़के को स्वप्न में दिखते रहते हैं स्तन
उसके होंठ हिलते रहते हैं नींद में
जीभ कुछ चाटती रहती है

उसकी माँ समझती है
इसकी शादी हो ही जानी चाहिए
शादी की यही उम्र है
फिर जिम्मेदारियाँ आयेंगी तो यह नौजवान
अपने आप ठीक हो जाएगा
पर बात क्या सिर्फ़ इतनी सी है। लगता नहीं। यह स्त्री पुरुष के सहचर्य की परंपरागत अवस्था से कुछ जादा है। यह नाटकीय क्षणों में काव्योचित तर्क से विचित्र शब्द समूह प्रस्तुत करना नहीं है। कुछ है जो और भी मुझे कचोटता रहता है। उससे भाग नहीं सकता। मैं यह सोचकर भी संतुष्ट नहीं हो सकता कि कदाचित यह इसलिए हो रहा है कि मेरे मस्तिष्क में सहसा ‘मोनो एनीमो ऑक्सिडोज़’ नामक रसायन कम हो जाने से ‘सेरोटोनिन’ नामक रसायन बढ़ गया है और स्नायु पथों पर अवसाद गहरा उठा है।

बस नौकरी न होने की बात से इसलिए बच रहा हूँ कि इधर लगता है मैं उसे तीतर-बटेर की तरह इस्तेमाल करने लगा हूँ। फिर उसके बाद तो पता नहीं क्या क्या..

जुलाई 15, 2013

तुम्हें पता है। मुझे पता है।

ग़ालिब को दरबदर करने के बाद अभी और उस दरमियान लगातार लगता रहा कुछ तो है जिसे लिख नही पा रहा। कुछ-कुछ बातें हैं पर उन्हे शब्द नही दे पा रहा। कुछ कहना है, पर वह है क्या। उसे कैसे कहूँ जो अंदर ही अंदर होता जा रहा है। कभी-कभी लगता है उनको कह भी पाऊँगा। सब कुछ इतना साथ है के बस। रेलमपेल। ऊपर नीचे। गुत्थम-गुत्था।

बिलकुल उस चौसा आम की तरह जो खिड़की पर दो दिन से घड़े पर रखा है। अभी तक खाया नही है। बारिश हो गयी है तब कुछ स्वाद तो बदला ही होगा। कुछ मिठापन कम हुआ होगा। थोड़ा पानी उसमे भी चला गया हो जैसे। और मिठास में पानी घुल गया हो। मिसरी अगर घुल जाती तो घोल देता।

कहीं से बैंगन के ऊपर के छिलके के जलने की गंध आ रही है। भर्ता बन रहा है। धीरे-धीरे वो नीली-नीली आँच उसे पकाती रहेगी। उसका स्वाद बनाती रहेगी। ताप उसे सेंक रहा है। भून रहा है। उसे नरम कर रहा है। पर अचानक उसकी खुशबू हवा के साथ कहीं और चल पड़ी है। इस तरफ बस इतनी ही।

दिल के अंदर भी कुछ ऐसा ही चल रहा है। उसके ऊपर की परत के पास कहीं खून के थक्के इकट्ठे होकर एक तरफ़ चल दिये हैं। मुझे पता है, कहाँ जा रहे हैं। चाह कर भी कुछ करने का मन नही है। शायद मेरी मर्ज़ी भी यही हो। कि चलने दो। फिरने दो। उन्हे आज नहीं तो कल वहाँ जाना ही था। पता है, वहाँ तुम हो। इंतज़ार में। तभी तो कुछ ऐसा नहीं करता के तुम इन धड़कनों से बाहर निकल पड़ो। बड़ी धीरे से धड़कने को कहता हूँ दिल को। कि तुम्हें जब पता चले तब उस वक़्त मैं तुम्हारे कान के बिलकुल बगल में खड़ा होऊँ। कनअँखियों से तुम मुझे देखो। मैं तुम्हे देखूँ।

जिस कमरे में बैठ लिख रहा हूँ वह जितना गरम है, उससे कहीं जादा ठंड बाहर छत पर घूमते हुए महसूस कर सकता हूँ। पर नहीं। फ़िलहाल तुम यहीं हो। कमरे में। मेरे साथ। मेरे पास। दिल के बिलकुल सिराहने। तुम्हें छोड़ कैसे जाऊँ। बारिश नहीं हो रही। पर होगी ज़रूर। तब हम दोनों उसकी आड़ में कुछ देर बैठे रहेंगे। कुछ तुम मुझे देखोगी। कुछ मैं तुम्हे देखूँगा। तुम्हारे बालों में अरझ गयी बूँदों में कहीं मेरा दिल भी होगा। तुम्हारी धडकनों के साथ।

घड़ी की तरफ़ देख रहा हूँ। दस बज कर दो मिनट। थोड़ी देर बाद नीचे जाऊंगा। तुम मेरा इंतज़ार कर रही होगी। इस कमरे से निकल हम वहीं पार्क के पास मिलते हैं। हमे कोई देख नहीं पाता। चुपके से तुम्हारे करीब होता आता हूँ। फ़िर से किसी को पता नहीं चल पाता। सिर्फ़ तुम महसूस करती हो। उस मुलायम घास पर बैठे वक़्त पता नहीं कैसे बितता जाता है। तब दोनों थोड़ी देर बाद उठेंगे। साथ चलने को होंगे। पर दोनों एक साथ कहेंगे। थोड़ी देर रुक जाओ न। और दोनों रुक जायेंगे। फ़िर से।

हरबार खलता है यह जाना और लौट के आना। पर अन्दर ही अंदर पता है के बार-बार ये जो जाकर वापस आना है उसी के आसपास हम मिलने के बहाने ढूंढ़ते हैं। और हर बार ढेर ढेर बहनों के साथ फ़िर मिलते हैं। फ़िर चुपके से तुम्हारे कान में कहता हूँ। तुम नहीं कहती। चलते हैं। रात हो गयी है। कल फिर मिलेंगे। तुम कुछ नहीं कहती। बस सुन थोड़ा उदास हो जाती हो। चेहरा ठीक से दिख नहीं पाता पर आवाज़ सब बता देती है।

पर तुम्हें पता है। मुझे पता है। हम दोनों को पता है। एक रात ऐसी आएगी जब हमें यह बोलना नहीं पड़ेगा। न तुम्हे। न मुझे। हम दोनों ऐसे ही बैठे रहेंगे। बिलकुल अगल बगल।

जुलाई 14, 2013

मेरी दिल्ली में ग़ालिब नही

आसमान में बादल हैं। कुछ बरस भी चुके हैं। कुछ मौके की ताक में होंगे। यहाँ बारिश ऐसे ही रोते गाते आती है। पर नहीं, इस बारिश पर ‘नॉस्टेलजिक’ होने का मन नहीं हो रहा। उन यादों को फ़िर किसी दिन। इधर कल अख़बार से पता चला अपना इतने सालों से दिल्ली रहना एकबार फ़िर बेकार हो गया। प्राण यहीं बल्लीमारान के थे। उसी ग़ालिब वाले बल्लीमारान के। ग़ालिब की हवेली के कँगूरे भी इंतज़ार करते रह गए, पर आज तक हम वहाँ नहीं पहुँचे।

कई उनके दीवान को सिराहने रख सोते आह-वाह भरते रहते हैं पर सोचता हूँ इनके लिए पहले कुछ कुछ उर्दू को सिरे से सीखा जाये। सुनने में आ रहा है के कश्मीरी गेट वाली कोतवाली अब वहाँ नहीं पायी जाती। वहीं मोरी गेट के सामने सड़कपार कभी किसी ज़माने से ‘रिट्ज़’ सिनेमा हाल है। पीछे ‘था’ लगने की नौबत थी भी। पर अभी उसका भी ‘री-स्टोरेशन’ उसके मालिक में अपने दम पर करवाया। बिना किसी सरकारी मदद।

समझ नहीं आ रहा इतना गोल-गोल क्यों घूम रहा हूँ। कुछ काम की बात कर भी रहा हूँ या सिर्फ़ हवाबाज़ी? सोच रहा हूँ हमारा लोक कैसे निर्मित होता है। उसके उत्प्रेरक कौन कौन हैं। उसमे हमारी खुद की क्या भूमिका है। कोई भूमिका है भी या बस वह ख़ुद बना बनाया ‘रेडीमेड’ कहीं मिलता है। कौन कब कैसे इसका हिस्सा बनता है। कैसे दूर छिटक जाता है।

सीधे सीधे कहूँ तो क्या ग़ालिब मेरे लोक का हिस्सा हैं। अगर हाँ तब कैसे और न तो कैसे नहीं। सिर्फ़ दिल्ली में रहने भर से या चाँदनी चौक की तफ़री से हमारे ख़ून में थोड़ा बहुत गालिबाना अंदाज़ घुस गया हो। या लाल किले का ‘लाइट एंड साउण्ड’ शो देख कुछ कुछ शायराना हुए जा रहे हों। इश्क़ मोहब्बत ख्वाहिशों के हज़ारो हजार होने उनके अधूरे रहने पर कोई गज़ल गुनगुनाते दोस्तों ने पकड़ लिया हो।

इन सबमें से कुछ भी हमारे साथ घटित नहीं हुआ। तब सवाल उठना वाज़िब है कि यहाँ की मुख्यमंत्री कितना भी इस दिल्ली को ग़ालिब की कहती बताती रहें, दोस्त लोग कितने ही शेरों से फ़ेसबुक की दीवारें पाट दें, दूरदर्शन किन्ही नसरुद्दीन शाह को गुलज़ार कृत शायर दिखाते रहें, कोई संस्कृति मंत्रालय के पैसों से कितने ही प्रायोजित मुशायरे करवाते रहें, विलियम डेलरिम्पिल ‘सिटी ऑफ़ जिन्स’ लिख हमे इनकी दिल्ली वाला कहते रहें; वह आज अभी तक हमारे नही हो पाये हैं। कोई ऐसे ही चाचा नहीं बन जाता।

पिछले वाक्य की तरह यह जटिल प्रक्रिया है कि कैसे हमारी दिल्ली में ग़ालिब का होना ऐतिहासिक तथ्य तो है, उनकी पैदाइश की जगह खंडहर बनती इमारत की तरह आज भी मौजूद है पर वह मेरी तरह अपनी आज तक की सारी उम्र दिल्ली में बिताने के बाद भी ग़ालिब मेरे नहीं हो पाये।

शायद ऐसा कह कर मैं उस समानांतर चलने वाली प्रक्रिया को देख नहीं पा रहा हूँ जिसमे अपने हिस्से की अभिरुचियों के लिए ख़ुद भी आगे आना पड़ता है। उसके लिए कोशिश करनी होती है। यह सयास होता है। पर यहीं बड़ी बारीकी से उस तरफ़ को आड़ में कर देता हूँ, जहाँ यह अनायास है और हद दर्ज़े तक प्रायोजित भी। लगता है हम इसके शिकार हो गए। ख़ैर।

अगर थोड़ी खुराफ़ात कर इसे भाषा तक खींच लाऊँ और कहूँ के तर्जुमे के बाद भी ग़ालिब थोड़ा दूर लगते हैं तब उसी पल भाषा विमर्श उठ खड़ा होगा और तब सवाल ख़ुद मुझसे होगा कि मेरी भाषा कैसी है जिसमे ग़ालिब के लिए जगह नहीं। मैं ख़ुद किसी भाषा के साम्राज्यवादी एजेंडे के तहत मारा जाऊंगा। अभी किसी भी तरह से इस ‘सद्गति’ को प्राप्त नहीं होना चाहता। और पता है ग़ालिब और इंतज़ार कर सकते हैं। भले एक दिन मैं दिल्ली में न रहूँ, पर वह रहेंगे। पर अभी दिल्ली मेरी है और वो अभी यहाँ नही हैं।

जुलाई 11, 2013

अशोक के फूल


कल दोपहर छत पर बैठा तो नज़र अचानक अशोक के पेड़ पर आये फूलों पर गयी। यह फूल जैसे तो नहीं पर हैं फूल ही। हजारी प्रसाद द्विवेदी ने इन्हें ही देख वह अशोक के फूल वाला निबन्ध लिखा था। थोड़ा खोजा तो एक वेबसाइट पर यह निबन्ध मिल तो गया पर उसके साथ जो तस्वीर लगी थी वह 'इन छोटे-छोटे, लाल-लाल पुष्पों' के मनोहर स्तबकों में कैसा मोहन भाव है! देख कर किसी अजनबी लाल फूल को वहाँ लगाये बैठे हैं। जबकि इसे कहते फूल हैं पर यह रूढी बद्ध फूलों की तरह दिखते नहीं हैं। और इनका मौसम भी यही जून जुलाई है। जून ख़तम हुए छह दिन हो चुके हैं। यह होते ऐसे ही हैं, बिलकुल ऐसे..


ऐसा तो कोई नहीं कह सकेगा कि कालिदास के पूर्व भारतवर्ष में इस पुष्प का कोई नाम ही नहीं जानता था, परंतु कालिदास के काव्यों में यह जिस शोभा और सौकुमार्य का भार लेकर प्रवेश करता है वह पहले कहाँ था! क्या यह मनोहर पुष्प भुलाने की चीज़ थी? सहृदयता क्या लुप्त हो गई थी? कविता क्या सो गई थी? ना, मेरा मन यह सब मानने को तैयार नहीं है। जले पर नमक तो यह है कि एक तरंगायित पत्रवाले निफूले पेड़ को सारे उत्तर भारत में 'अशोक' कहा जाने लगा। याद भी किया तो अपमान करके। महाभारत में ऐसी अनेक कथाएँ आती हैं जिनमें संतानार्थिनी स्त्रियाँ वृक्षों के अपदेवता यक्षों के पास संतान-कामिनी होकर जाया करती थीं! भरहुत, बोधगया, सांची आदि में उत्कीर्ण मूर्तियों में संतानार्थिनी स्त्रियों का यक्षों के सान्निध्य के लिए वृक्षों के पास जाना अंकित है। इन वृक्षों के पास अंकित मूर्तियों की स्त्रियाँ प्राय: नग्न हैं, केवल कटिदेश में एक चौड़ी मेखला पहने हैं। अशोक इन वृक्षों में सर्वाधिक रहस्यमय है।


अशोक-स्तबक का हर फूल और हर दल इस विचित्र परिणति की परंपरा ढोए आ रहा है। कैसा झबरा-सा गुल्म है! अशोक का फूल तो उसी मस्ती में हँस रहा है। पुराने चित्त से इसको देखनेवाला उदास होता है। वह अपने को पंडित समझता है। पंडिताई भी एक बोझ है - जितनी ही भारी होती है उतनी ही तेज़ी से डुबाती है। जब वह जीवन का अंग बन जाती है तो सहज हो जाती है। तब वह बोझ नहीं रहती। वह उस अवस्था में उदास भी नहीं करती। कहाँ! अशोक का कुछ भी तो नहीं बिगड़ा है।

जुलाई 09, 2013

वो जो फ़िल्मों वाला ऊटी था..


पहाड़ पहाड़ अलग तरह के होते हैं। हम लोग जो मैदानी इलाकों में रहने वाले लोग हैं, पहाड़ों को लेकर कई तरहों से सोचते हैं, उनकी कल्पना करने लगते हैं। उन अनुभवों की पहली खेप न भी हो, तब भी, उसकी कोई न कोई छवि, हम अपने लिए गढ़ लेते हैं। बिलकुल स्वयं प्रकाश की कहानी ‘संधान’ की तरह। जो जो यहाँ है वो वो शर्तिया वहाँ नहीं होगा। जैसे यहाँ की गर्मी, यहाँ का चिपचिपा मौसम, बिन बरसात के उड़ते आवारा बादल। सबकुछ। कुछ भी नही।

फिर कई चीज़ें छवियाँ ऐसी होती हैं जिसे हम खुद नहीं गढ़ते। किसी के कहने पर उसे वैसा मानने लगते हैं। जैसे ज़ायकों के लिए विनोद दुआ हिंदुस्तान के लिए खाने का दावा तो करते हैं पर कई चीज़ें छिपा ले जाते हैं। बिलकुल उसी तर्ज़ पर जैसे कई विशिष्ट चैनल पर्यटन उद्योग के लिए कच्चे माल का काम करते हैं। दूर-दूर ले जाते हैं। अच्छे-अच्छे दृश्य दिखाते हैं। खाने स्वाद मसालों पर बड़ी-बड़ी बात करते हैं। रहन सहन संस्कृति समाज पर रुक कर ठहर कर‘एथनॉग्रफी’ करने का मन न भी हो, तब भी दूरदर्शन की तरह या इम्तियाज़ अली की फ़िल्मों की तरह पंजाब को, लद्दाख को दिखाने का मोह छोड़ नहीं पाते।

ऐसा ही मोह कभी रणबीर कपूर के पिता के ज़माने में फ़िल्मों में ‘ऊटी’ को दिखाने का था। पहली बार इस ‘ऊटी’ का नाम सन् अस्सी  में आई ‘कर्ज़’ को उसे रिलीज़ हो जाने के कई सालों बाद टीवी पर देखते हुए सुना था। टोनी या मोंटी नाम के अपने दोस्त को किसी शाम की महफ़िल मे ‘दर्द-ए-दिल, दर्द-ए-जिगर’ वाले गाने के बाद से उत्पन्न प्रेम संकट का समाधान करने की दवा के रूप में डॉक्टर दोस्त इसी जगह का नाम सुझाता है।

तब असम, अरुणाचल प्रदेश, दार्जिलिंग के चाय बगानों के क्या हालचाल थे, कह नहीं सकता। इन पूर्वोत्तर के राज्यों को आज की तरह हम उत्तर भारतीय कब से आतंकवाद से ग्रस्त मानते आए हैं, इसका भी कोई ख़ाका नज़र नही आता। ख़ैर। ऊटी में अभी ठीक से दाखिल हुए नहीं थे कि हमारे गाइड ने बताया यह ‘हिंदुस्तान फ़िल्म फ़ोटो कंपनी’है। फ़िल्मों से इसका कुछ लेना देना है। यह कोई आश्चर्य की बात नहीं कि इस ‘नीलगिरी’ से एक सौ साठ किलोमीटर की दूरी पर मैसूर का ‘बृंदाबन गार्डन’ है। जहाँ आज भी पाँच साल पहले बजने वाले गानों पर ‘म्यूज़िकल फाउंटेन’ नाचता है।

पर्यटन स्थल के रूप में फिल्मों ने इसका जो भी कुछ विकास किया हो, ‘हिल स्टेशन डेव्लपमेंट बोर्ड’ को आज भी उसका विकास करना पड़ रहा है। ऊपर से गाइड का तुर्रा ये कि साहेब ये जो मोड़ पर दुकान देख रहे हैं न यहीं कभी माधुरी दीक्षित की ‘साजन’ फ़िल्म वाली किताबों की दुकान थी। और वो जो सड़क पार लाल बोर्ड वाली दुकान है वहीं संजय दत्त बैठकर चाय पीते पाये जाते थे। फ़िर किसी धोबी घाट को दिखा कर कहता है यहाँ ‘मैंने प्यार किया’ की शूटिंग हुई थी। फ़िल्म भी क्या गजब हिट थी। और भी पता नहीं क्या-क्या कहा उसने।

पर कहीं मन में लगता जा रहा था कि आज का ऊटी वैसा क्यो नहीं दिख रहा जैसा हम उन फिल्मों में देखते आए हैं। जो नहीं देखा था, उसे खुद ही बनाते आए थे। कहाँ गायब हो गए हैं सारे नज़ारे। सारी धड़कने। धुनें, उनसे निकलता संगीत। मन में एक बार ऊटी देख लेने वाली बेचैनी। कहाँ हैं सारे पंछी, झीलें, पेड़, ढलान पर उतरती साइकिलें। वो पहाड़ के कोने तक जाती सड़क। वहाँ से आती कोई आवाज़।

आज उसकी हालत बिलकुल बोट क्लब की झील के किनारे से टकराती खाली पानी की बोतलों के लगते ढेर की तरह होती गयी है। धीरे-धीरे वहाँ इतने ‘रिज़ॉर्ट’ बन गए हैं जो अपने स्थापत्य में कॉटेज से बड़े नहीं हैं। जिस इत्मीनान के लिए, अकेलेपन में खो जाने के लिए कभी जो लोग यहाँ आते रहे होंगे, उन्हे यह भीड़-भाड़ अखरेगी। एकांत के क्षण यहाँ से गायब होते रहे हैं। खुद इसपर लाद दी गयी बातों से आज यह इतना दब सा गया है कि वैसा ही बने रहने का संघर्ष दबाव वहाँ नज़र नहीं आता। उसने अपने को छोड़ दिया है।

वह ‘तमिलनाडु सुपर मार्केट’ और ‘वीनस सुपर मार्केट’ जैसी दुकानों में सिमटकर रह गया है। वह भी सिर्फ़ तीन चार चीज़ों में। घर-घर बनती होममेड चॉकलेट, नीलगिरी की पहाड़ियों पर ही पाये जाने वाले तेल और यहाँ बागानों में उगाई जाने वाली चाय। ‘बॉटेनिकल गार्डन’ के इर्दगिर्द उग आई दुकानें मनाली-शिमला के माल रोड का फ़ील देने की कोशिश करती हैं, पर पता नहीं उसकी यह कोशिश दिल को दुखाती जादा हैं। सुकून नही दे पाती।

सच कहूँ उन बीतते घंटों में यही लगता रहा कि जगहें कैसी बताई जाती रहती हैं और असल में वह कैसी होती गयी हैं। तीन साल पहले पंचमणि छोड़ दिया था, अब कुन्नूर। शायद फिर कभी वहाँ जाएँ तो उनकी हालत कहीं ऐसी न मिले। डर लगता है, जब वह बने बनाए, जीवित मिथक, हमारे सामने मरते दम तोड़ते हैं। ऊटी तभी हमारे लिए हमेशा के लिए मर गया।

[जारी..]

जुलाई 07, 2013

मेरा लगातार खुद से बचना और कहानी 'घोंघा'

जबसे कहानी ‘घोंघा’ पढ़ी तब से सन्न हूँ। सुन्न भी कह सकते हैं, पर अब थोड़ा थोड़ा अपने में हूँ। तब तो एक बारगी जैसे उस अवस्था में पहुँच गया के काटो तो खून नहीं। अंदर खून बह भी क्यो रहा है, सोचने लगा। उसकी जकड़ इतनी मज़बूत जान पड़ी कि लिखने को जानबूझ कर टालता रहा, ऐसा नहीं है। ऐसा खूबसूरत बहाना बना सकता तो ठीक रहता। कुछ सोचने से जादा उसके अंदर खुद को महसूस करने लगा। अब थोड़ा बराय दूरी उसे देखने ही आया हूँ। अभी भी कुछ खास नहीं है। बस बैठ गया हूँ। देखते हैं कहाँ तक पहुँचते हैं।

गठरी। थोड़ा भदेस सा है। थोड़ा बेतरतीब भी। पर इसे कहूँ क्या? रूपक-बिंब-प्रतीक या कुछ और। शायद मेरी भाषा में इसे इनमे से कुछ न कहने का आग्रह तो है, पर शब्द नहीं। यह पूरी-पूरी मेरी कमजोरी है। जिसकी ज़िम्मेदारी सिर्फ और सिर्फ मुझ पर आती है और शायद यही उस कहानी की सबसे बड़ी जीत। वैसे यह कोई हार जीत वाल खेल नहीं है। पर अभी कहा न, थोड़ा कमज़ोर हूँ। उदय प्रकाश ‘मोहनदास’ में कई-कई मर्तबा कह चुके हैं कि हम कैसे समय में जी रहे हैं। पता नहीं वहाँ यह भी लिखा है के नहीं कि यह समय सिर्फ़ ‘हम पुरुषों का, पुरुषों के लिए सदैव’ रह गया है।

इधर बढ़ने से पहले मैं बात शुरू कर रहा था ‘गठरी’ की। मम्मी की कोई पुरानी साड़ी होती है जो गुदड़ी बनने से पहले गठरी बन जाती है। उसमे कपड़ों, गैर ज़रूरी चीजों को समेट उसे गद्दों के कोने में छिपा देते। कि अगले मौसम में निकालेंगे। या तब जब उसकी ज़रूरत पड़े तब। उसे बांधने उसे खोलने का तरीका अगर किसी स्त्री पर आरोपित कर दिया जाए तब क्या होगा। ऐसा क्या है जिसे उसने उन गांठों में समेट लिया है। उसके बाजू वह गाँठ हैं। सबसे मजबूत गाँठ।

पता नहीं लिखते हुए कैसा-कैसा सा होता जा रहा हूँ। खुद इसको लिख लेना उस गठरी बन गयी स्त्री के अंदर उठते सवालों की तरह आस पास घूम रहे हैं। शायद क्योंकि मैं खुद एक लड़के के रूप में इस समाज में बड़ा किया गया हूँ इसलिए भी उन अंदर तक धँस गए नुकीले सवालों की जद से काफी दूर हूँ। कितना आसान है न समाजशास्त्र की आँड़ में छिप जाना। कि हम नहीं चाहते किसी जितुआ और उसके मामा की तरह हो जाना। हम उसे सदर अस्पताल ही पहुँचाते। अपने साथ कमरे पर नहीं लाते। ले भी आते तो उसे गठरी न बनाते और न उस गठरी बन गयी नंगी देह को बराबर मामा भांजे की तरह खोलते बंद करते।

यह जो जीतू हो जाना है यह बराबर उस देह के प्रति निर्मम हो जाना है, अमानवीय होते जाना है। ‘घोंघे’ की रूपक कथा लगता है, यहाँ चुक जाती है। क्योंकि मन नहीं मानता कि यह समाज घोंघो से बना है।  यह तो रेत में मुँह बाए बगुले की तरह हो जाना है। यह कोई ऐसा मोर नहीं है कि जंगल में मोर नाचा और किसी ने न देखा हो। उसके नाच पर उसका कॉपीराइट भी नहीं रहा अब तो। कॉपी‘लेफ़्ट’ हो चुका है।

इस अरण्य में आपका स्वागत है। यहाँ के नीति नियंता हम ही हैं। हम ही इसके स्थपति हैं। बस इस कहानी में उसका नाम जितेंद्र है। जितुआ है बड़ा शातिर। वह हर कमरे में अपनी हंसी और किस्सों के साथ कथित ईश्वर की सार्वभौमिकता को टक्कर देता मौजूद रहता है। जिसकी सैद्धांतकी वहाँ के लड़के उसकी किस्सागोई और उसमे समाये ‘काम’शास्त्र के बूते अपने पाये मज़बूत करते रहे हैं। जो लड़कियों से बात न करने से उपजी कुंठा है, उसमे स्त्री सिर्फ़ भोग्या के रूप में ही उनके सामने आती है।

इसी रस्ते डेढ़ सौ रुपये जुटाकर टीवी सेट वीसीआर और कैसट का जुगाड़ किया गया था। साँस फूलने औक्सीजन कम पड़ने वाले दृश्यों को देख लेने के न्योतों के बाद कहानी उस हॉस्टल से बाहर एक रात मामा भाँजे के चंगुल में पड़ गयी घबराई सी लड़की पर आकार ठहरती है। लड़की रात दस बजे स्टेशन पर उतरी है और उसकी किस्मत में ‘जब वी मेट’ की करीना कपूर की तरह किसी शाहिद कपूर से मिलने वाली स्क्रिप्ट इस राईटर ने लिखी नही है। भटकते भटकते काफी देर हो जाने पर भी वह सदर अस्पताल नहीं पहुँच पायी है। रात इतनी हो चुकी है के नाइट शो भी ख़तम हो चुका है।

पता है अभी भी सवालों से सीधे टकराने से बच रहा हूँ। शायद हिम्मत भी नहीं है। इसलिए पहले से ही आड़ लेकर चलता रहा। जितनी आसानी से लिख दिया कि सब इसी में छिपा हुआ है, क्या हम पुरुष उसे ऐसा ही नहीं रहने देना चाहते? अगर ऐसा न हो तब इस तरह की पुरुष ठेकेदारी खत्म नहीं हो जाएगी? मैं खुद कभी नहीं कहना चाहता कि उन मामा भांजे ने उस लड़की की क्या दशा कर दी।

क्योंकि मुझे पता है जैसे ही कोई कहता है कि 'हमारे' 'समाज' में स्त्रियॉं की दशा ऐसी है/वैसी है। तभी इस वाक्य की पड़ताल शुरू कर देनी चाहिए कि यह ‘हमारा’ किन्हे उसके भीतर का मान उन्हे ‘अंदर’ समाहित कर रहा है। और किन्हे ‘बाहर’ का मान उसके अधिकारों की रक्षा उसके हितों के लिए लामबंद होना चाह रहा है।  शर्तिया यह वही कह सकेगा जिसका वह समाज बनाया होगा। वही उसके 'हमारा' होने के सबसे जायदा दावे करेगा। उसकी गतिकी में उसकी निर्णायक भूमिका होगी। और किसी भी तरह से वह इसमे विचलन को स्वीकार नहीं करेगा।

{कहानी तो इससे भी जायदा कहती है। पर शायद उस पर आगे फिर कभी लिख पाऊं। फ़िलहाल जो संजीव सर की 'बनास ' में छापी यह कहानी पढ़ना चाहते हैं वह 'तिरछी स्पेलिंग 'के इस लिंक पर जाकर पढ़ सकते हैं। यह मुझे सबसे ऊपर लिखना चाहिए था। पर खैर। }

जुलाई 06, 2013

वाया जुगाली: दो महीने से विलंबित रचना प्रक्रिया

अभी सुबह उठा तो पता नहीं नज़र, छिप गयी डायरी, पर चली गयी। बड़ी देर तक याद करता रहा के आखिरी बार कब लिखा था। याद आना था नहीं, याद आया भी नहीं। इस छिप जाने को वरीयता क्रम में नीचे हो जाना भी समझा जा सकता है। बिलकुल वैसे ही जैसे इधर दिल्ली विश्वविद्यालय दूसरी तीसरी कटऑफ आते-आते नब्बे प्रतिशत वालों की साँसे भी फूलने लगें, तब यूपी बोर्ड वालों को पूछता कौन है। खैर।

डायरी उठाई। पन्ने पलटे। दिन रात उंगली पर गिने तो नहीं पर अंदाज़ लग भर गया कि आने वाली ग्यारह को दो महीने होने वाले हैं। दिल्ली से कूच करने की पहली तारीख़। इस पर पैबंद लगाने की गरज से ही पाँच रुपये वाली छोटी पतली सी कॉपी बैग में रख ली थी कि रास्ते में लिखेंगे। पर क्या ख़ाक लिखा।

इधर याद्दाश्त के हालचाल कुछ यूं है के दिन पुराने पड़ने लग गए फिर भी कुछ कागज़ पर उतरा नहीं। हाँफता-हाँफता थोड़ी देर रुक भी जाऊँ तो लौटकर लिखे आठ पन्ने दिखाई देते हैं। उन्हे भी दस बारह दिन की कई-कई शिफ़्ट में लिखा था।

पता नहीं समझ नहीं पा रहा हूँ के ऐसा क्यो हुआ होगा। शायद उन दिनों की आपाधापी में कागज़ पर लिखना इस लैपटॉप पर लिखने से जादा मुश्किल लगा होगा। सोचा होगा बार-बार स्याही भरने से तो अच्छा है ‘वर्ड’ पर लिख मारो। मेज़ पर पसीने की चिपचिप से भी छुटकारा। फिर एक सहूलियत यह भी के यहाँ लिखे को सीधे ब्लॉग पर पेस्ट कर सकते हैं। कौन पहले कागज़ पर लिखे फ़िर उसी को दोबारा टाइप कर वहाँ शाया करे।

पर देख रहा हूँ वहाँ जितनी भी आपाधापी रही हो, यह इस सहूलियत से जादा दिल्ली की काहिली ही लगती है जो खून में दाख़िल हो गयी है। वरना कागज़ पर लिखे की बात ही कुछ और है।

ब्लॉग पर चाहकर भी कुछ बातें कह नहीं सकते। या कह तो दें पर उसके अपने ख़तरे हैं। इन्हे ख़तरे न भी कहने का मन हो, तब भी, फ़ोन की घंटियाँ बजने लगती हैं। खुली किताब होने का मन होने पर भी कुछ तो रह ही जाती हैं। पर डायरी के साथ ऐसा नहीं है। वो तो सिर्फ़ ‘हमारे’ लिए है। ‘एक्सट्रीम पर्सनल’ होने की हद तक। कुछ कोनो अंतरों की हद तक यहाँ भी हूँ, पर उतना नही।

दोबारा ऊपर से नीचे दो-तीन साँस में पढ़ गया होऊंगा। लग रहा है अपना लिखने का स्टाइल भी कुछ कुछ पॉलिटिक्स की तरह होता जा रहा है। मुद्दे को सेंटर ही न करो। वापस ट्रैक पर आने की कोशिश।

किसी मुकम्मल तरीके से दिन की शुरुवात न होकर एक ही तरह से रोज़-रोज़ उठना। उसके बाद खुद दोपहर में रात की नींद पूरी करने की जद्दोजहद में पिल पड़ने की दरमियानी में कोई लिखे तो लिखे कैसे। खाओ, हग्गो और सोओ। इन तीन ही क्रियाओं के इर्दगिर्द घूम रहे हो जैसे। जैसे तीनों आपस में गड्डमड्ड हो गए हैं। कब कौन पहले है इसे सुलझाने के चक्कर में ही दिन खल्लास। सच में दिन इस सूत्र के इर्दगिर्द ही अपने को गुंफित कर इस कदर छाया हुआ है के निकल ही नहीं पा रहा।

ऐसा नहीं है कि पूरे दिन सुषुप्तावस्था में ही रहता हूँ। खूब-खूब सोचता हूँ। पर सिर्फ़ सोचने से क्या हुआ है आज तक, जो अब होने जाने वाला है। पर अपन थोड़ा दूसरे तरीके से सोचने वालों में से हैं। कहते हैं सोचना कुछ करने से पहले की पूर्वपीठिका है। पहली सीढ़ी है। और ऐसा नही है, हमने नही सुना। हमने भी वो चुट्कला सुना है। कई बार सुना है। बाबर ने हिंदुस्तान पर पहला कदम रखने के बाद क्या किया। कॉमन सेंस। दूसरा क़दम रखा। नहीं तो बेचारा, कब तक, एक ही पैर पर खड़ा रहता। गिर नहीं जाते मियाँ।

इसलिए नर हो, न निराश करो मन को। और नारी तू भी हमारे वाले ‘एडिशन’ में है। मैथिलीशरण गुप्त ने नहीं लिया तो क्या। हम बिलकुल तेरी बगल में खड़े हैं। साथ-साथ। चिपक के। सट के। 'सिड्यूस' तो नहीं कर रहे न हम तुमको!!

आवाज़ें..

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