जुलाई 22, 2013

बहराइच से लौटकर..


इस बार का बहराइच लगा पिछली बार से अलग है। वह लगातार बदल रहा है। इक्के-खड़खड़े दृश्य से अदृश्य होते जा रहे हैं। घंटाघर वाला तांगा स्टैंड अब खाली खाली-सा लगता है। उनकी जगह ले ली है बिजली वाले ऑटो ने। दरगाह क्रॉसिंग पर पुल का काम तीन सालों से चल रहा है। डिगिहा पर ‘वी-मार्ट’ नया-नया खुला है, जो दिल्ली विल्ली के ‘विशाल मेगा मार्ट’ की याद दिलाता है। छोटी बाज़ार का ’सांझा चूल्हा’ अब चुकने लगा है। संदीप कहने लगा तीन साल हो गए ‘शोभा सम्राट थियेटर’ दरगाह मेले में अब नहीं आता। जिससे जेठ मेला थोड़ा सा टूट गया है। अब वैसी भीड़ नहीं आती। चौपाल सागर आई टी सी द्वारा निर्मित खेती संबंधी हाट है। झिंगहा घाट से आगे। मिशन अस्पताल की तरफ।

फ़िर कई कहानियों में एक कहानी यह भी तैरती मिली कि बहराइच की डीएम किंजल सिंह अखिलेश यादव की पत्नी की सहेली हैं। डिम्पल के साथ पढ़ी हैं। इसलिए अतिक्रमण के खिलाफ़ बड़े बड़ों की एक नहीं चल रही। आज कोई आसाम चौराहे को पहचान नहीं सकता। सारे बराण्ड-खरी वाले ठीहे वहाँ से गायब हैं। छप्पर डालकर चाय समोसे बनाते चूल्हों वाले होटल अब वहाँ नहीं पाये जाते। नयी अनाज मंडी से लेकर पूरे शहर में सफ़ाई अभियान तेज़ है।

सुनने में कई साल पहले आया था बहराइच मे ब्रॉडगेज़ लाइन बिछने जा रही है। मैलानी की तरफ से या गोण्डा की तरफ़ से पता नहीं। फ़िर यह भी कि लखनऊ रोड को थोड़ा इधर उधर कर सीधे घाघरा की तरफ़ ले जाएंगे। जरवल रोड का घुमना ख़त्म करेंगे। एक बहुत पुरानी तस्वीर याद आ रही है। दैनिक हिंदुस्तान में छपी थी। दो हज़ार चार के आस पास की। राहुल गाँधी को बहराइच में चाँदी का मुकुट पहनाया गया था। तब शायद रुबाब सईदा जीती थी वहाँ सपा से। कॉंग्रेस के कमांडो कमल किशोर जीते अगली बार। पता नहीं इन्होने कौन-कौन से वादे कर रखे हैं। जो अभी तक वादे ही हैं।

हमारे नेताओं के साथ दिक्कत यह लगती है कि उनके जो आदर्श हैं वे उन जगहों को उनके मूल स्वरूप में बचाए रखने की जद्दोजहद से बचना चाहते हैं। जूझना नहीं चाहते। हम कितनी दिल्लीयाँ और बसाना चाहते हैं, पता नहीं। इधर कमाल ख़ान की रिपोर्ट आई कि इकौना से दो बार विधायक रहे भगौती परसाद बहराइच जिला अस्पताल में मौत से लड़ते हुए हार गए। अगर उनके साथ रहे विधायक अपने हाथ की मैल भी गिरा देते तो उनकी जान बच जाती।

इन सारे बदलावों में उन सबका क्या होगा जो विकास की परिभाषा में नहीं अटते। मतलब जो पुल क्रॉसिंग पर बन रहा है अगर उसे विकास का प्रतीक मान लिया जाये तब उसकी चढ़ाई करने में खड़खड़े की धीमी गति परिवहन को बाधित करे उससे कई साल पहले ही उसे बे-दखल कर दिया गया। इसे विकास की स्वाभाविक प्रक्रिया मान हम लोग उनके गायब हो जाने को नहीं देख पाते। हमे लगता है कि हम आगे बढ़ रहे हैं। पर क्या सच में ऐसा है। या उसके भ्रम में हम चुंधियाए बौराए से घूम रहे हैं।

गल्ला मंडी से जो भी सौ दो सौ लेकर लेकर इक्के वाले लौटते थे वो अब नहीं लौटते। उनका शाम रात जो भी इंतज़ार करते थे वो अब इंतज़ार भी नहीं करते। उनके सामने जीवन का संकट है। जो घर किसी तरह चल रहा था अब घिसटने लगा है। चक्की रोये चूल्हा उदास रहे नीति नियंता बेफ़िक्र हैं। उनके लिए लोकसभा की कैंटीन का मीनू हाजिर है। खड़खड़े वाला मानरेगा का मज़दूर बन जाए उनकी बला से। स्वावलंबन की परिभाषा और गाँधी का ग्राम स्वराज यहाँ बोरिंग से पानी भरते नज़र आते हैं। प्रेमचंद एकबार फ़िर परिदृश्य में उपस्थित होते हैं। उनका गोबर आज तांगा भी नहीं चला सकता। वह विकास की दौड़ में कई मील पहले ही छूट गया। और जो भगौती परसाद जैसे हैं वो जिला अस्पतालों में बेनामी मौत मरते रहे हैं।

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