अगस्त 22, 2013

पिछली शाम का हासिल: तीन अधूरे ड्राफ़्ट

पहला ड्राफ़्ट

दीपिका मुझे कभी भी अच्छी अदाकारा नहीं लगी। अदाकारा बोलना ही उससे कुछ जायदा की डिमांड करने जैसा है। बिलकुल वैसे ही जैसे कल ‘दामिनी’ के आखिरी सीन में ऋषि कपूर अपने परिवार के खिलाफ़ बयान देकर मुस्करा रहे थे। सोचता हूँ कि पता नहीं अगर रणबीर कपूर  फ़िल्म इंडस्टरी में नहीं कूदे होते, तब देखते इस मोटे तुंदियल को कौन ‘दो दुनी चार’ में लेता और कौन इस बुढ़ाते दंपति को ‘बेशरम’ में साथ काम करने का मौका देता।

यह अमिताभ के अपने बेटे अभिषेक को लगातार सत्रह फिल्में फ्लॉप हो जाने के बाद भी टिकाये रहने के बाद की उत्तर आधुनिक मीमांसा है जहाँ बेटे का रुतबा अपना काम कर रहा है। ख़ैर।

बारह अगस्त। इतवार। घोषित सरकारी चैनल पर ‘रंगोली’ आगे आने वाले तीन दिन की तय्यारी में जी-जान से जुटा था। आजतक हमने देशभक्ति जैसे संप्रत्यय को सेना के अलावा किसी सीमा पर कहीं और देखने की जहमत नहीं उठाई है। उनका होना किसी पड़ोसी राष्ट्र के विरुद्ध अपने अस्तित्व को बनाए रखना है।

दूसरा ड्राफ़्ट

‘पोशम पा भई पोशम पा, लाल किले में क्या हुआ’ की तर्ज़ पर बने लुंगी डेन्स’ के साथ अभी-अभी ‘चेन्नई एक्सप्रेस’ ख़त्म हुई है। फ़िल्म कुछ ख़ास नहीं। बर्बर समाज के अवशेष की तरह है। लड़ लो अपनी होने वाली बीवी के लिए। जीत जाओगे तो जिंदा भी रहोगे और लड़की मिलेगी सो अलग। पर यहाँ इस के बारे में तो लिखने बैठा नहीं। रजनीकान्त को ‘डैडिकेट’ हाइ बीट हाइ वोल्टेज गाना।

दिल्ली का मौसम इतना रोमेंटिक हो रहा है। रह-रह बूँदें गिर रही हैं और उसका रूमान और बढ़ता जा रहा है। यह पंक्ति जितनी ‘स्टीरियोटाइप’ है उसी अनुपात में कालांतर की सीमाओं के परे जाकर उस गाने में दीपिका की पोशाक है। जिस तरह के ब्लाउज़ में नायिका वहाँ नृत्य कर रही है और नाभि के दो-ढाई इंच नीचे साड़ी लपेट रखी है। क्या इसी तरह कोई महिला दिल्ली मेट्रो में यात्रा कर सकती है। ‘दोस्तना’ की प्रियंका भी कुछ कम ‘सेक्सी’ नहीं लगती उन डिजाइनर साड़ियों में। पहाड़गंज में घूम के दिखाएँ तब जाने।

शायद ऐसी मांग ही पुरुषसत्तात्मक समाज की गहरी उपस्थिती बताने के लिए काफी हो। कपड़ों पर और उनके सीमित सौंदर्यशास्त्र में उन्हे ऐसे ही होना है।

तीसरा ड्राफ़्ट

कभी-कभी जो सबसे बकवास सबसे कमजोर शुरुवात लगती हैं उन्ही से शुरू करना पड़ता है। जैसे कि अभी। बिलकुल अभी। कि बताऊँ पिछले पौने घंटे में तीन पोस्टों को ड्राफ़्ट मे रखकर बाहर बारिश में भीग लेने के बाद चार पाँच मिनट लेटे रहने की दरमियानी में यही सोचता रहा कि लिखूँ तो कैसे। कितना अजीब है न कि एक बंदा लिखना चाहता है पर लिख नहीं पा रहा। वह ऐसा क्या लिख देना चाहता है जो कह नहीं पा रहा। वैसे नहीं लिखेगा तो कोई आसमान नहीं फट पड़ेगा। पर नहीं। हम तो ढीठ किस्म के जीव हैं। कुछ भी कूड़ाटाइप लिखे बिना मानते कहाँ हैं।

मन में कई बातें एक साथ चल रही हैं। सबको तरतीबवार उतारने का धैर्य चुकता जा रहा है इसलिए भी लैपटाप के और पास आकर उसी मेज़ पर चढ़ बैठा हूँ। कि अब कहाँ भागोगे बच्चू।

अगस्त 21, 2013

पता नहीं ऐसी कितनी ही बातें तुमसे नहीं कही हैं

06:22 शाम, सत्रह अगस्त 2013

तुम्हारे कानों के पास बिलकुल बगल से अभी गुज़रा हूँ। तुम देख भी नहीं पायी। तब तुम सीढ़ियों पर बैठी कुछ याद करने की कोशिश में थी। कि तभी यह हुआ। मैं गायब होकर तुम्हें ऐसे ही देखता रहा हूँ। तुम्हें बिन बताए। तुम्हारी बगल कुछ देर बैठ खुद के पास लौटता हूँ जैसे।

हर बार नहीं देख पाती हो तुम। तुम्हारा न देख पाना ही तो देखता रह जाता हूँ।

अभी कल की ही तो बात है पानी बतासे खाते हुए तुम्हें याद हो आई मेरी। कि कैसे मना कर रहा था। नहीं खाऊँगा। तीखा है। और छिपा ले गया था कि तुम्हारे मुँह का छाला चल कर मेरे पास आ गया था। तुम चुप सी बस बैठी रही। तभी तुम्हें अकेला देख फ़ोन किया था।

ऐसी पता नहीं कितनी बातें हैं जो मैंने तुम्हें कभी नहीं बताई। या कभी बोला तो बस चुपके से मैं भी चुप हो गया।

दोपहर एक डेढ़ के बीच, बीता इतवार
काश ऐसा कोई कैलेंडर बनाता जिसमे नवंबर से पहले फरवरी आती। हर साल के लिए नहीं। बस इस बीतते साल के लिए। तुम बोली तब तो अगस्त के बाद ही होती तो क्या बात होती।

रात दस बजे, अट्टठारह अगस्त
कभी जातिवाचक संज्ञा का भाववाचक संज्ञा में बदल जाना अखरता नहीं है। पर जब संख्या की मद के दिन दूरियों को कम करने के बजाय बढ़ाते जा रहे हो तब दिल एक एक बीतते दिन उसे बे रुखी से सोखते चले जा रहे हैं। वहाँ कोई नहीं है। मैं भी नहीं। बस मेरी परछाई सी रह गयी है तुम्हारे पास।

उसी परछाई का एक हिस्सा तब लेता आया था। वरना जितना अभी बचा हूँ उतना भी नहीं बचता।

02:36 सुबह, अट्टठारह अगस्त
पता नहीं ऐसा क्यों था कि जब हम दोनों साथ थे तो चुपके से मोबाइल के म्यूजिक प्लेयर में मेहदी हसन की गज़ल चला देता। तब की शरारत मेरे आज को और खाली कर रही है। उसकी धुन ही अंदर तक धँसती चलती है। तुम्हारी याद बहोत बे-क़रार करते हैं। वो दिन जो साथ गुज़ारे थे प्यार में हमने, तलाश उनको नज़र बार-बार करते हैं।

इस हद तक इतना सुनता हूँ के रोने को हो आता हूँ। फ़िर भी मन नहीं मानता। दिल नहीं माना तो क्लाउड पर अपलोड कर यहाँ लगा लिया है। मौके बे-मौक़े रात बैठा दिल को और उदास कर लेता हूँ। जैसे अभी रात के ढाई बज रहे हैं। मैं अकेला बैठा बस बैठा ही रह गया हूँ।

उन्नीस अगस्त शाम पौने छह
तुम्हारे मेरे हिस्से रहेंगी ऐसे कई यादें
ऐसे कई दिन, ऐसी कई -कई शामें

उन्नीस अगस्त पौने बारह बजे रात
एकबार फ़िर मोबाइल उठा कर देखता हूँ। कोई मिस कॉल नहीं। तुम्हारी भी नहीं। ऐसा करके एकबार फ़िर अकेला हो जाता हूँ। बिलकुल उस आसमान से गिरी अभी-अभी बूँद की तरह। पता नहीं ऐसा क्यों होता जा रहा है। अपने आप को इस तरह होने से दूर रखने के बावजूद। इधर दिल्ली में हफ़्ता भर हुए बादल डेरा जमाये हुए हैं। तुम नहीं हो इसलिए भीग नहीं रहा। बस अबेस्टस की छत के नीचे बैठा कुछ-कुछ सोचता रहता हूँ। मेज़ पर चॉक्लेट को बीते कई दिनों तक पड़े रहने दिया है। आज फ़िर उसके रैपर पर छोटे-छोटे अक्षरों में तुम्हें ढूँढ रहा था। तुम कहीं नहीं मिलती। फ़िर उदास हो आता हूँ।

सुबह उनींदे सपने में था। उठते वक़्त याद भी था। मन में था के लिख लूँगा। पर नहीं सुबह की शाम हो गयी नहीं लिख पाया। और अब धुंधली याद भी नहीं। पर हाँ उसमे कहीं किसी कोने पर अभी भी हम दोनों अटके हुए हैं। किसी पीपल के पेड़ की डाड़ में साथ साथ। हवा के झौंको के साथ हिलते से।

बादल गड़गड़ा रहे हैं। खूब पानी है। कुछ और तस्वीरें होती। लिखने का मन नहीं है। बस सोचे जा रहा हूँ। तुम होती। मैं होता। दोनों साथ कहीं से चलना शुरू करते। उनकी बनती बिगड़ती बूंदों के संग अपने कदमों की छाप होती। तुम्हारा ऐसे मेरे पास न होना अंदर तक खाली कर देता है। इस कमरे में जीने लायक कुछ कम हो गया हो जैसे। कुछ तुम कम हो कुछ मैं कम हूँ।

इन कमज़ोर से दिखते शब्दों वाक्यों की तरह रोज़ मैं भी कमज़ोर होता जा रहा हूँ।

अगस्त 20, 2013

पेड़ की छाव का सपनों से भी गायब हो जाना

जिनको हम बचपन से देखते आ रहे हैं उनमे से कई धीरे-धीरे गायब होते जा रहे हैं। यादें बातें मुलाकातें, किसी मोड़ पर अधूरी रह गयी कहानी ही नहीं, किसी के हाथ की छुअन, किसी के होंठों की मुस्कुराहट भी है। बड़े आहिस्ते से यह सब हमारे सामने गुज़रता रहता है और जब तक हमें उनके बारे में पता चलता है वह अपनी जगह से कई इंच पीछे खिसक चुके होते हैं। अलविदा न कह पाना सबसे ज़ायदा कसक देता रहता है। आखिर तक।

हम अपने आम के पेड़ को मरता देख रहे हैं। धीरे-धीरे वह बूढ़ा होता रहा पर अपनी उमर हो जाने के बाद भी उसकी फल देने की आदत गयी नहीं। हर साल नहीं तो क्या, एक-एक साल छोड़कर। उसकी जड़ें आसपास की कंक्रीट हो गयी जमीन से कितना अंदर जाकर गुठलियाँ इकट्ठा करती होंगी। धीरे-धीरे उसकी गति औरों की तरह नहीं रह पायी। उनमे मिठास घोलने के लिए किसी से कहा नहीं। अपने आप सींचता रहा।

आज लगता है वह अकेला नहीं था। उसने बाकी सबको भी कह रखा होगा। तभी बाकी तीन पेड़ों में कभी आम नहीं आये। वह सब नीचे ही नीचे गुपचुप अपना काम करते रहे। सब मिलकर उसे जिंदा रखने की कोशिश करते रहे। अब लगता है उस जमीन से लड़ते-लड़ते हार रहा है। उसकी जड़ें अब वैसी नहीं रहीं।

बहुत पुरानी याद में इसकी छाव में पिट्ठू खेल रहे हैं। हम चार पाँच से जादा होंगे। बार-बार जब भी गेंद से दूसरी तरफ़ का साथी मारना चाहता मैं नए-नए बड़े हो रहे उस पेड़ की आड़ में छिप जाता। बारी-बारी हम सब ऐसा ही करने लगे। उसने कभी मना नहीं किया। वह हमें छिपा भी लेता और हमारे हिस्से की मार भी खाता। उमर में हमसे छोटा ही रहा होगा। अभी आम नहीं दे सकता था न इसलिए हमे बचाता रहता।

एक दिन उसे काट दिया गया और हमारे उस मैदान के गायब होने के साथ ही कभी बड़े होकर उसकी डाड़ पर चढ़ने देने के सपने बिखर गए। थोड़ा हम भी बिखरे। पर संभल गए। शायद हमें दुख हुआ भी हो पर उसे जताते किसपर। उसी साल इस आम के पेड़ के चारों तरफ़ मिट्टी की जगह कंक्रीट ने ले ली। बिना सोचे समझे। कि वह साँस कैसे लेगा।

ऐसे ही अमरुद के पेड़ के साथ हुआ। हम कभी समझ ही नहीं पाये कि वह हमसे कितना प्यार करता था। ख़ुद बीमार रहने के बावजूद बारहमास हमें अमरुद देता रहता। बेवकूफ़ बनाने के लिए उन टहनियों पर ख़राब अमरुद उगने देता जिसके इर्दगिर्द कीड़े जादा रहते। धीरे-धीरे उसका तना झुकने लगा। पास बहती नाली से साफ़ पानी मिलता भी कैसे। तब भी अपने को खड़ा किए हुए था। उसने भी कटने का कोई इरादा ज़ाहिर नहीं किया था। पर एक शाम कुल्हाड़ी आई और वह वहाँ से चल पड़ा। कभी लौट के न आने के लिए।

धीरे-धीरे हो सकता है हम उसे भूलने लगें। कि छुपन छुपाई खेलते वक़्त कैसे नीचे से ऊपर, ऊपर से नीचे की सीढ़ी बन जाता था। किस को मना नहीं करता था। शायद तब वह हमारे सपनों में आए। साथ उसके अमरुद भी ज़िद करने लगें। ख़ुद वह चलता हुआ आ जाये। तब क्या जवाब देंगे।

पता नहीं यह कैसी पढ़ाई हमने पढ़ी और आज के बच्चे पढ़ रहे हैं। पेड़ों के सामान्य रोग तक हमें नहीं मालूम। कई बार उनके नाम तक पता नहीं होते। अपने आसपास के प्रति यह तादात्म्य बिठाने के बजाय यह हमें उजाड़ रही है। इस आधुनिक शिक्षा ने हमे हमारे लोक में अजनबी की तरह बड़ा किया। उनके प्रति प्रेम तक नहीं जता पाते हैं, आभार तो दूर की बात है।

अभी पार्क के पास वाला अशोक भी लगता है रूठ गया है। उसके भी पत्ते झड़ने लगे हैं। शायद आम के पेड़ ने उसे भी अपने साथ यहाँ से चलने को राजी कर लिया होगा। और सच में एक दिन आएगा जब दोनों नहीं होंगे। दोनों की बातचीत भी नहीं। बस हम रह जाएंगे। अकेले। किसी की छाव नहीं होगी। तब तन जाएँगी किसी कोक लिमका की बड़ी बड़ी छतरियाँ और ब्लैकबेरी फोन में इनकी तस्वीरें देख बच्चे पूछेंगे। तब हम उन्हे क्या जवाब देंगे। कि उनके बचपन में कोई पेड़ नहीं है।

सब हमसे नाराज़ होकर यहाँ से हमारे सपनों में चले गए। एक दिन वहाँ से भी कूच कर देंगे।

अगस्त 14, 2013

पन्द्रह अगस्त की पूर्व संध्या पर एक ग़ैर-ज़रूरी वक्तव्य

आज पंद्रह अगस्त की पूर्व संध्या पर मैं कोई प्रधानमंत्री भारत सरकार की कोई स्पीच तय्यार करने नहीं बैठा हूँ। साधारण से भी साधारण दिखने वाला अदना सा भारतीय नागरिक होने का दावा करने वाला व्यक्ति हूँ, जो थोड़ा बहुत मौका लगे तो ख़ुद से ख़ुद की बात कर लेता है। आज भी करूँगा। किसी से पूछूंगा नहीं। जो कहना है कहकर रहूँगा।

कभी-कभी सोचता हूँ मेरी यादों के साथ खेलने वाले, उन्हे छेड़कर तितर बितर करने में इस राष्ट्र राज्य की क्या भूमिका है। मेरे पास इस दिन की मद में मुट्ठी भर दिन थे जब हम छत पर चढ़े हुए पर पूरा पूरा दिन पतंगबाजी के नाम कर सकते थे। तब धूप लगते हुए भी नहीं लगती थी। पछियाव में बस हवा थी। आसमान में पतंगे। तब उस आसमान में आगे आने वाले दिन नहीं थे। उनकी आहट भी नहीं। बिलकुल चुपचाप धीरे से मेरे अंदर यह बीतते साल उतरते जा रहे हैं। जितनी गहराई तक ये सब पहुँच गए हैं वहाँ सिर्फ़ सवाल के ढेर हैं। उस झऊये में किसी का भी कोई कमज़ोर जवाब भी नहीं है।

जिस रफ़्तार से यह समय आधुनिक हुआ है उतनी ही गति से कुछ मूल्य अमूर्त होते गए हैं। यह उनके रूप (‘फॉर्म’) बदलने का, ट्रांस्फ़ोर्म होने का काल है। एक राष्ट्र राज्य के लिए यह संकटकालीन परिस्थिति है। जिसमे वह स्वयं गायब हो रहा है। उसके ‘चिह्न’ उसमे न बदल किसी और रूप में तब्दील हो रहे हैं। किसी राष्ट्रपिता के नाम पर कोई योजना उस भौगोलिक क्षेत्र में उक्त पार्टी का प्रतिनिधित्व करती है न कि राज्य राष्ट्र की। किसी खेत में किसी भी कम्पनी के मोबाइल टावर का होना उस कम्पनी का होना है न कि इस अमूर्त प्रत्यय की उपस्थिति के। सड़क किसी प्रधानमंत्री के नाम पर है न कि उसके।

उस रेल व्यवस्था को ‘भारतीय रेल’ कहने में क्या भारतीय है जो उसे भारतीय बनाता है। सिर्फ़ एक नक्शा भर ही तो है, जिसे हमने एक नाम दे दिया है। या ऐसा कहना इस राष्ट्र के बनने की ऐतिहासिक प्रक्रियाओं को सिरे से नजर अंदाज़ कर देना है; उन सबके बलिदान को एकबारगी नकार देना है। जिसकी कमज़ोर सी याद दिलाते यह दिन हर साल आते हैं।

हिज्जे और जटिल हो सकते हैं इसलिए अधीर आगे अपना धीरज खोने की गरज से आगे न बढ़ें।

एक अर्थ में यह महत्वपूर्ण सवाल है जिसमे उन सारे लोगों को याद करना शामिल है जिनके ‘त्याग’ ‘बलिदान’ जैसे अमूर्त होते अवयवों की वजह से आज हम आज़ाद महसूस करने लायक देश में साँस ले रहे हैं। पर क्या यह उनके द्वारा देखा गया समेकित सपना है जिसको आज हम नाम विशेष से जानते हैं। चलिये जादा मुश्किल नहीं करते हैं हमारे घोषित राष्ट्रपिता की एक छोटी सी पुस्तक नवजीवन ट्रस्ट ने ‘मेरे सपनों का भारत’ नाम से छापी है। क्या उस लायक भी हम हो सके हैं।

ख़ैर, राष्ट्र कई-कई धाराओं, विचारों, मतों को एक साथ अपने में समा कर चलता है उनमे से कभी कोई ऊपर होता है तो कोई नीचे। यह उठापटक चलती रहती है और इन्ही के बीच वह अपना रूपाकार बदलता रहा है, बदलता रहेगा।

इन्ही सबके बीच वह नागरिक भी है जो लगातार जिंदा रहने के लिए संघर्ष कर रहा है। क्या कोई राष्ट्र उसके बिना ज़िंदा रह सकता है। अगर नहीं, तब हम एक मृत राष्ट्र में रह रहे हैं। सिद्धान्त रूप यहाँ उसके होने को सिर्फ़ विश्व बैंक के सामने ‘मानव संसाधन’ के रूप में तब्दील कर दिया है जिसके एवज़ में वह कई करोड़ डॉलर कर्ज़ आसानी से ‘वर्ल्ड ह्यूमन इंडेक्स’ में ऊपर आने के लिए ले सकता है। उसके नाम पर कई कल्याणकारी योजनाएँ खाद्य सुरक्षा विधेयक, सर्व शिक्षा अभियान, ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के नाम पर बनाई जा सकती  हैं।

दिक्कत तब होती है जब वह इन व्यवस्थाओं के विफल हो जाने के बाद सवाल पूछता है। किसी दिखाई न देने वाली चीज़ से उसी अनुपात में दिखाई न देने वाली चीज़ की माँग करने लगता है। शोषण के खिलाफ़ अपनी कमर सीधी करने की कोशिश में उठना चाहता है। यह उठना मुट्ठी बंद कर उठना है, जिनमे कई-कई सपने साँस ले रहे होते हैं।उन्हे कैसे पूरा करना है इसका एक ही तरीका उन्होने सीखा है। इतिहास उन्हे यही सिखाता आ रहा है। जो तुम्हें उपनिवेश समझे तुम उसका प्रतिकार करो।

तब, बिलकुल इसी क्षण उन्हे लाल किले की ज़रूरत पड़ती है। वहाँ से किसी आवाज़ में किसी समझ न आने वाली भाषा में वह समझा लेना चाहता है, लोग कुछ समझते हैं, काफी कुछ नहीं समझते हैं। जो काफ़ी कुछ नहीं समझ रहे हैं उनको ठिकाने लगाने के तरीके, उन्हे बहुत अच्छे तरीके से आते हैं। राज्य सत्ता के दमनकारी औज़ार जो करते हैं वह सब देख लेते हैं। वह हिंसात्मक हैं। पर उनके पास कुछ उपकरण ऐसे हैं जो दिखाई नहीं देते। ‘देशभक्ति’ वाला मुखौटा ऐसे ही आड़े वक़्त बहुत साथ देता हैं। आड़ा वक़्त है सवालों का सामने आ जाना।

हम पंद्रह अगस्त के ‘फ़ेनॉमेना’ में अपने को खो देना चाहते हैं। यहाँ इतिहास विचारधारा के रूप में काम कर कई सारी वास्तविकताओं को छिपाने का काम करता है। इतिहास इस रूप में हमें अतीत की तरफ मोड़ तो देता है पर उसकी व्याख्याएँ समझ नहीं आती। वह हमारे पूर्वाग्रहों की तरफ़ खींचती हैं। ग्रंथियों का ऐसे ही बने रहना इस समय की राजनीति उसका समयानुरूप दोहन कर सके। वह हमें पीछे ले जाकर उस स्वतन्त्रता संग्राम की कच्ची पक्की यादों में रौंद रहा होता है और हम किसी भारत कुमार के गाने सुन-सुन अपने पकते कानों को टपकने से बचाए रहते हैं। फ़िर हर साल हम उसी विभाजन को अपने दिलों में कसक की तरह यादकर किसी राष्ट्र को सबक सिखाने के मंसूबों पर काम करने लग जाते हैं। यह नहीं सोचते कि उन्होने भी इस आज़ादी के लिए उतनी ही बड़ी कीमत हमारे साथ दी है।

फ़िर ऐसे बिन्दु पर आकार अगर मैं सोचता हूँ कि इस लोकतन्त्र में अगर मेरी कीमत सिर्फ़ एक वोट से जादा नहीं है और इस चुनी हुई सरकार में वह एक वोट भी नहीं लगा है तब मुझे उसके सुझाए ‘राष्ट्र’ के लिए ‘त्याग’ ‘बलिदान’ की सारी बातें बहाने लगती हैं, तो क्या गलत है। मैं उसके लिए अपने तरीके से काम करूंगा। किसी लाल किले से निर्देश लेकर नहीं। वह जितना उनका है, उससे जादा मेरा है। हमारा है।

{साल दो हज़ार ग्यारह,चौदह अगस्त,  दो साल पहले की एक पोस्ट। }

'छोटी सी बात' के अरुण का 'कुन्दन' में बदल जाना

जहाँ पीछे छोड़ा था।

खुद इतना बूढ़ा नहीं हुआ हूँ, न इस उम्र को ऐसा वैसा कुछ कहा जाता है। पर इस आज वाली पीढ़ी के सामने ऐसा महसूस करने के कई बहाने कई-कई कारण मौजूद हैं। उनमे से एक है ‘झिझक का होना’। संकोच किसी भी बात को लेकर हो सकता है। किसी लड़की की तरफ़ देखना है, कैसे देखना है, कहाँ से कनअखियों का काम शुरू होगा, कब खुद ही पलक को झुका लेना है। पहली बात तो यह के उसे जिसे देख रहे हैं पता नहीं चलना चाहिए। गर पता चले भी तो उसे असहज नहीं करना है।

अपना अरुण इसी ‘कटेगरी’ का नायक है। शक्ल से भोला भाला। साधारण सा दिखने वाला। आज के लड़कों की तरह नहीं जो अख़बार में खबर बन टंग जाते हैं। ‘जेएनयू में साथी छात्रा पर हमले के बाद युवक ने की ख़ुदकुशी’

अरुण के पास एक ठीकठाक नौकरी है दफ़्तर में बाबू है उसके नीचे चार छह लोग काम करते हैं। माँ बाप हैं नहीं। उम्र इस पाएदान पर है जहाँ एक साथी की तलाश शुरू की जा सकती है। उसने कर भी दी है। इस सारे ब्योरे में वह है, उसका अकेलापन है, उसके इच्छाएं हैं। मतलब प्यार करने लायक लड़की की तलाश उसने शुरू कर दी है। दूसरे अर्थों में उसे यह कूट संदेश सामने वाले पक्ष की तरफ़ प्रेषित करना है और सकारात्मक उत्तर की प्रतीक्षा करनी है।

उस रात इस ‘छोटी सी बात’ के साथ जो फिल्म याद आ रही थी वह धनुष की 'राँझणा' थी। इन दोनों को यदि समय का दस्तावेज़ मान उन मनोवृतियों को भी काल-सापेक्ष समझ लिया जाये तब इस पूर्वधारणा के बाद क्या हम कह सकते हैं कि अरुण और इस नए नायक के बीच जो समय बीता है उसने हमारे समय के लड़कों को कुछ अलग तरीकों से गढ़ा है। कुछ बदला है तो कई सारी बातें अभी भी वैसी ही हैं। एक-एक करके शुरू करते हैं। बातें काफ़ी जटिल और उबाऊ हैं।

जैसे हम जिन्हे किन्ही ज्ञात-अज्ञात कारणों से पसंद करने लगे हैं या उन्हे पास महसूस करने लगे हैं उनके प्रति हमारा व्यवहार कैसा है। हम खुदको किन रूपों में जता रहे हैं। अरुण बेचारा इस तरह से देखता है कि दिख न जाये के देख रहा हूँ। पर कुन्दन ऐसा नहीं करता। वह ज़ोया को बचपन से पहली नज़र से पसंद करने लगा है और वहीं किसी प्रेम में गिर भी गया है। उसका पीछा करता है। जगह जगह उसे दिख जाता है। कि कभी-न-कभी लकड़ी उसे देख ले और वही सारी विचार प्रक्रियाएँ उसके मस्तिष्क में अपना काम करने लगें।

सत्रह थप्पड़ खाकर भी नाम पूछे बिना नहीं रहता और बनारस की गलियों में लगातार पीछा करने से भी नहीं चूकता। रिक्शे वाले से कहता है ‘पैसे न लेना भाभी है तुम्हारी’!! वहीं अरुण एक सुबह विद्या सिन्हा के अपने दफ़्तर आने पर काटो तो खून नहीं वाली सिचुएशन में पहुँच गया है। कि अब लड़की आई है तो क्यों। कहीं उसकी कंपनी के मालिक से शिकायत तो नहीं कर देगी। यह डर ही अरुण को अरुण बनता है।

अरुण ने एक सेकंड थर्ड हैंड मोटरबाइक खरीद ली है। वह प्रभा को उसपर घुमाने के सपने देखता है। प्रभा एक सुबह उसके साथ चल भी पड़ती है पर उस पहली बार में ही जब हीरोइन पीछे बैठी है तभी उस मोटर सायकिल के प्राण पखेरू कहीं उड़ जाते हैं और पीछे से आते नागेश के स्कूटर पर वह चली जाती है। यहाँ बड़े ध्यान से राँझणा में यही सब देखने लायक है कि ज़ोया कुन्दन को अपने बचपन के दोस्त की हैसियत से अपनी दिल्ली वाली कहानी बताती है और कुन्दन क्या करता है। ले जाकर नया नवेला स्कूटर ज़ोया के साथ जल समाधि धारण कर लेता है। उसके अन्दर गुस्सा है कि जिसे शिद्दत से वह प्यार कर रहा है उसे अरमानों पर यूँ नंगे पैर चल नहीं सकती। उसे रौंद नहीं सकती। यह उस एकाधिकार को भी स्पष्ट करता है जो उस ज़ोया को उसकी वाली बनाता था।

यह वही शाहरुख़ खान है जो 'डर' में है या 'तेरे नाम' के सलमान खान में। लेकिन शाहरुख़ उसे ख़ुद बदलते हैं और थोड़े 'फेमिनिन मेल' के रूप में सिल्वर स्क्रीन पर आते हैं। जो थोड़ा केयरिंग है, 'मर्द को दर्द नहीं होता' वाला मर्द नहीं, 'उसके सीने में भी एक अदद दिल है' वाला। पर यहाँ क्या कुंदन को कस्बाई मानसिकता का प्रतिनिधि मान सारी बातें स्वीकार कर लें। नहीं। हमें उन प्रक्रियाओं को समझना होगा जो वहाँ उन जगहों को बना रही हैं।

कुन्दन के चरित्र में इस पुरुष सत्तात्मक समाज के चिह्न सतह पर तैरते दिखाई देते हैं। वह ज़ोया का नाम ले तो एक बाप की औलाद नहीं। ऐसा वह ख़ुद कहता है। बचपन में एक बार कलाई काट चुका है और दूसरी बार भी काट लेता है। लड़की उसकी तरफ़ आकर्षित नहीं है फ़िर भी बार-बार उसे जतलाने के लिए उन हिंसक तरीकों से भी परहेज़ नहीं करता। मतलब स्त्री की इच्छा का कोई मोल नहीं। तुम हमे प्यार कैसे नहीं करोगी वाली ज़िद। उस हद तक ज़िद कि सगाई के वक़्त पहुँच कर सबको यह बता देना कि लड़का मुसलमान नहीं है।

यहाँ दोनों नायकों में अंतर यह भी है कि दोनों की उम्र जब दोनों को प्यार होता है उसमे किशोरावस्था और युवावस्था जितना अंतर है। पर देखा जाये तो किशोरावस्था वाला आकर्षण जवान होते-होते कम होने के बजाय बढ़ गया है। तो क्या इसे नवउदारवादी काल के साथ आई सांस्कृतिक सामाजिक प्रक्रियाओं का प्रतिफलन मान सहज स्वीकार कर लें जहाँ वह दोस्त के साथ सिनेमा ‘साजन’ फ़िल्म देख कर निर्णय करता है कि ज़ोया को वह अब जाने नहीं दे सकता।

सवाल है लड़कों में आया यह परिवर्तन उन्हे किस तरह गढ़ रहा है? उन्हे कैसे सामाजिक प्रक्रियाओं का उत्पाद बना रहा है। मराठी फ़िल्म ‘शाला’ में किशोर होता लड़का अपनी कक्षा में पढ़ने वाली लड़की को सिर्फ़ यह बोलने के लिए कि वह उसे अच्छी लगती है, उसे रास्ते में कलाई पकड़कर रोक लेता है। फ़िर क्या होता है। लड़की उसके साथ दिबाकर बेनर्जी के लक्की के साथ किसी रेस्तेरा में किसी काइयाँ वेटर के हाथों ठगा जाना स्वीकार कर लेती है। नहीं। वह अपने घर पर सारी बात बताती है। फिर होती है पिटाई। इसका काल खंड है आपातकाल के आस पास। मतलब तबतक परिवार नामक संस्था की कोशिशों को धूमिल करने वाले माध्यम तब तक प्रकाश में नहीं थे। उनका हस्तक्षेप जितना कुन्दन की ज़िंदगी पर है उतना अरुण की ज़िंदगी पर नहीं।

जितना समाज इधर खुलकर सामने आया है उसमे कुछ छिपाने लायक इस पीढ़ी को लगता ही नहीं है। ध्यान दें कि यह पंक्ति किसी भी तरह से उन दक्षिणपंथी विचारों की तरह प्रतिगामी नहीं मानी जानी चाहिए जिसके दरीचे किसी ‘नैतिक’ कहलाई जाने वाली शिक्षा पर खुलते हैं। बल्कि उस संक्रमण काल की तरफ़ इशारा करने भर के लिए हैं जहाँ हम किसी भी चीज़ को इतनी साफ़गोई से सही और गलत में नहीं बाँट सकते। बस उन्हे समझ सकते हैं।

अरुण कुन्दन में बदल गया है। उसने चुप रहकर छिपकर प्यार करना छोड़ दिया है। अपने अर्थों में पूरे औज़ारों में वह भी इस समाज में पला बढ़ा युवा है पर उसके पास उत्प्रेरक के नाम पर ऐसी ऐसी इच्छाएँ  हैं जिन्हे वह पूरा कर लेना चाहता है। आज प्यार के मंज़िल पर न पहुँचता देख खुद को मिटा लेना नहीं है बल्कि तेज़ाब खरीद उस लड़की का चेहरा जला देने तक पहुँच गया है। यहाँ प्यार सिर्फ़ रूमान नहीं एक सामाजिक आर्थिक प्रक्रिया है जिसे कई-कई कारक निर्धारित व पोषित कर रहे हैं।

अगस्त 12, 2013

हमारे भूलने की नव साम्राज्यवादी पटकथा

तारीखें आती हैं चली जाती हैं हमें कोई फरक नहीं पड़ता। उनका होना न होना भूलने के खिलाफ़ एक मौका हो सकता है पर हम चूक जाते हैं। यह चूकना उस दिन को भूलना नहीं हमारे प्रतिरोध का साल दर साल कमजोर होते जाना है। उसकी स्वीकृति जैसा है। स्वीकृति उस संस्कृति के सहज हो जाने की। कि हमे उसके साथ रहने में कोई दिक्कत नहीं है। यहाँ सह-अस्तित्व आकर विचारधारा का रुप ले लेता है और उस सच को ढक लेता है, जिसे उघाड़ देने की सबसे जादा ज़रूरत है।

छह अगस्त। तारीख़ ऐसे बीत जाती है जैसे कुछ हुआ ही न हो। पता नहीं हमारे जापान के साथ कैसे संबंध है और क्या इस दिन दूरदर्शन ने कोई रिपोर्ट दिखाई भी थी या नहीं। हम अगर डर रहे हैं उन लोगों को याद करने से तो एक दिन आएगा जब हम भी याद करने लायक नहीं रह जाएंगे। पहले ही ईरान से गैस पाइपलाइन ठंडे बस्ते में सुस्ता रही है फिर इधर हम अपने निर्णयों के लिए किसी दूसरे राष्ट्र के मुखापेक्षी रहना अपनी स्वतन्त्रता को कमतर करना है।

अभी पीछे बीते दिन स्टार मूवीस पर ‘टर्मिनेटर साल्वेशन’ आ रही थी। दृश्य कंप्यूटर से रचे हैं पर उस ‘जजमेंट डे’ के दिन जो जहाँ है वहीं ठहरा रह गया है। सड़कें वीरान हैं, पहाड़ सुनसान से पसरे खड़े देख रहे हैं। इस परमाणु विस्फोट के बाद अमेरिका में रह रहे इन्सानों की लड़ाई ‘स्काय नेट’ कंपनी के बनाए उच्च तकनीक सम्पन्न मशीनों से चल रही है। जो इंसान हैं वे अपने आप को ‘रेसिस्टेंस’ कहकर संबोधित कर रहे हैं। माने उनका प्रतिरोध उस मशीनी आक्रांता से है जो मानव जाति को समूल समाप्त करना चाहता है। यह मानव जाति की लड़ाई बिलकुल उसी तर्ज़ पर लड़ी जा रही है जैसे कई देशों में लोकतन्त्र स्थापित करने की गरज से उन देशों के बदले यह देश युद्ध लड़ता रहा है।

उनकी कल्पनाओं में युद्ध स्थायी भाव है। ऐसे कल की कल्पना जहाँ सिर्फ़ उनके देशवासी इस धरती पर आए संकट से किसी नायक की तरह मुक्त कराएंगे। मूलतः यह ‘हिरोइज़्म’ उस हथियार उद्योग को कच्चा माल मुहैया कराने जैसा है जहाँ डर का कारोबार गोली की नली से होकर गुज़रता है। डर नहीं होगा कोई कल्पित शत्रु नहीं होगा तो कैसे हजारों करोड़ के फंड पास होंगे। कैसे किसी मित्र राष्ट्र को रुपयों के बदले अपने देश में निर्मित हथियार सहायता के नाम पर दिये जा सकेंगे। फ़िर वहाँ का जनमानस विकास के सवाल उठाएगा ही नहीं वह उठाएगा बंदूक, रॉकेट लौंचर। बलास्टिक मिसाइल।

स्काय फॉल’ के साथ जेम्स बॉण्ड पचास साल का हो गया। एक ध्रुवीय हो गयी दुनिया में इंग्लैंड की छटपटाहट बढ़ गयी है। ऐजेंट ‘डबल ओ सेवेन’ के सामने ख़ुद को बचाए रखने का सवाल है। यहाँ भी छवियाँ कुछ ऐसी ही मौजूद हैं। उनका पुराना ऐजेंट खूफिया सूची को अपने कब्ज़े में कर लेता है। एम ने पीछे बॉण्ड को लगा रखा है। उन सारे जासूसों को जो दूसरे देशों की गोपनीय ख़बरे लगातार उन तक पहुँचाते रहे। हम लोग ‘एजेंट विनोद’ और ‘एक था टाइगर’ बना कर हाँफने लगते हैं उनके एजेंट पूरे आइलेंड को रातों रात रासायनिक प्रदूषण की अफ़वाह उड़ाकर हड़प उसे अपना बेस बना लेता है।

वहाँ वह अपने बचपन की एक कहानी सुनाता है। कि उसकी दादी के पास भी एक आइलेंड था। खास बड़ा नहीं फिर भी वह उनके लिए जन्नत से कम न था। उसका चक्कर वे आराम से तब घंटे दो घंटे में लगा लिया करते थे। एक बार वह गर्मियों की छुट्टियों में उनसे मिलने गए। और देखा वह जगह चूहों से भर गयी थी। वह किसी मछ्ली पकड़ने वाली नाव के साथ चूहे आ गए। और नारियल से पेट भरते थे। तो अब चूहों को उस आइलेंड से कैसे निकालें। तब उसकी दादी ने उसे सिखाया। एक तेल के ड्रम के उन्होने जमीन में गाड़ दिया और उसके मुहाने पर नारियल का चारा लगाया। चूहे नारियल खाने आते और उस तेल के ड्रम में गिर जाते। एक महीने में उन्होने सारे चूहे पकड़ लिए।

पर अब वह इस ड्रम का करते क्या? उसे आग लगा देते? समंदर में फेंक देते। नहीं उन्होने यह दोनों विकल्प नहीं चुने। उन्होने उसे वैसे ही रहने दिया। फिर उन्हे भूख लगने लगी। और एक एककर वह एक दूसरों को खाने लगे। आखिरी में बचे सिर्फ़ दो हिम्मत वाले। अब इन दो चूहों का क्या हुआ। दादी ने अपने पोते के साथ उन दोनों को नारियल के पेड़ों पर छोड़ दिया। पर अब उनकी नारियल खाने की आदत नहीं रही। वह चूहों को खाने लगे। उनकी तासीर बदल गयी।

इस कहानी को आज की इस दुनिया पर आरोपित कर हम समझ सकते हैं कि इस ज्यामिती में हमारे देश की क्या भूमिका है। इन देशों की तासीर एक दिन दो दिन में नहीं बदली। यह तरक़ीब इन्ही नव-साम्राज्यवादी देशों की आज तक इस्तेमाल की जाने वाली कूटनीति है जिसके बल पर वे आज तक कायम हैं। हम बस एक दूसरे को खा रहे हैं क्योंकि किसी ने हमे ऐसा करने को कहा है।

फ़िर अगर किसी को तारीख़ याद नहीं रहती तब तो वह बड़ी छोटी सी बात है। क्यों सही कहा न..!!

{कल बीस दिसम्बर थी। अचानक बी.एस.पाबला कमेंट न करते, तो पता भी नहीं चलता के जयपुर से निकालने वाले 'लोकदशा' में यह पोस्ट वहाँ 'नारियल छोड़ एक दूसरे को खाने लगे' नाम से सत्रह अगस्त को प्रकाशित हुई थी। वहाँ तो नहीं पर उसकी छायाप्रति के लिए इस जगह जाया जा सकता है।

अगस्त 11, 2013

मेरे शहर में मेरा इंतज़ार

बिरला मंदिर, सन् चालीस
हमारे लिए शहर कहाँ होता है। पूरे शहर में? शहर के एक हिस्से में? या उन हिस्सों के छोटे छोटे टुकड़ों में। वहाँ भी शर्त यह कि उनसे हमारी जान पहचान कितनी है। जिस छत पर बने कमरे में बैठकर लिख रहा हूँ, उसे कौन लोग जानते हैं; कितने यहाँ तक मेरे साथ आए हैं। सवाल ‘पर्सनल’ है इसलिए जवाब भी व्यक्तिगत ही होगा। बिलकुल इसी तरह उन कोनो सड़कों मोहल्लों गलियों जगहों में हम होते हुए भी नहीं हैं। बस हम तभी तक हैं जब तक हम वहाँ से गुज़र रहे होते हैं। वरना किसे पड़ी है किसी के हिस्से का शहर बचाने की।

तभी तो लगातार वह बदलता रहता है। हमें बदलने से पहले बताता नहीं है। बस बदल जाता है। अब कोई गोरखधाम एक्सप्रेस से सुबह दिल्ली उतरे और अजमेरी गेट की तरफ़ निकले एकबारगी वह भौचक रह जाएगा। ये कहाँ आ गए हम। सामने हरी लाल बसें खड़ी हैं। एयरपोर्ट जाने के लिए मिनट मिनट पर मेट्रो है। पर इससे जादा नहीं। लोग वैसे ही हैं उनकी आवाज़ें ऐसी ही हैं। थोड़े कदम कमला मार्केट की तरफ़ बढ़ाएगा उसे वही रुका घंटाघर दिख जाएगा। वह भी वैसा ही है। उसकी सूई आज भी बरसों पहले की तरह कहीं चली नहीं गयी हैं। वहीं बंगाल से आये उन कारीगरों के इंतज़ार में हैं जिन्होंने एसआरसीसी की घड़ी ठीक की है।

थोड़ा और आगे जाने पर शजहानाबाद वैसा ही बसा मिलेगा। अजमेरी गेट भी वहीँ है। खारीबावली जाती सड़क का नाम भी तो आज तक जी बी रोड है। पिछली बार जिस लड़की को पकड़ कर लाया था इस शहर के साथ ही बड़ी हो गयी होगी। कुछ साल बाद इस बार वाली भी हो जाएगी।

शहर हमसे जायदा बड़े होते हैं। अभी चार बजे दूरदर्शन पर चश्मे बद्दूर में दिखने वाली दिल्ली आज की दिल्ली से काफी अलग है। यहाँ आज तालकटोरा स्टेडियम तो है पर कोई दीप्ति नवल फ़ाहरुख शेख़ के साथ बैठी ट्रूटी फ्रूटी नहीं खाती। बस वहाँ बनी छतरियों झाड़ियों में बैठने के एवज़ में कुछ रुपए ऐठने वाले ज़रूर उग आए हैं। नहीं बदला है तो लोधी गार्डन का अठपुला। जिसके पार उस लड़की का प्रेमी पहले से इंतज़ार कर रहा था और रवि बासवानी की सारी चतुराई धरी की धरी रह जाती है। इससे जादा दिल्ली उसमे दिखाई देती भी नहीं है। बस ईस्ट वेस्ट निज़ामुद्दीन की रिहाइश के कुछ सीन। हुमायूँ के मकबरे के पास नीले गुंबद वाला सब्ज़ बुर्ज़ और चिकनी सड़कें। लुटीयन दिल्ली की तीमारदारी।

जिस मंदिर मार्ग पर हम रहते हैं दिल्ली का सबसे कम बदले जाने वाला हिस्सा है। दो हज़ार दस न आया होता तो इसे भी बदलना कहाँ था। अब यहाँ नया स्कूल है। हरकोर्ट बटलर के सामने नवयुग स्कूल। पर नहीं इन लगातार सामने बीत गए सालों में यहाँ भी काफ़ी कुछ नहीं रह गया है। दो सौ सोलह दो सौ पंद्रह नंबर की बसें उसी नवयुग स्कूल की जगह बने बस स्टैंड से चलती थीं। हमारी ग्रेजुएशन तक थीं। चालीस नंबर तो गायब ही हो गयी। बदरपुर बार्डर जाती थी। सीधे। पीछे उदद्यान मार्ग पर तब सीएनजी पंप स्टेशन बन रहा था। जगमोहन ने वहाँ बसी झुग्गी बस्ती को झटके से गायब कर दिया। और झटके से गायब हो गईं सारी सब्जी की दुकानें।

बहुत छोटे थे तब की याद है जन्माष्टमी आती तो साथ वहीं से सैकड़ों दुकाने उग आती थीं। भीड़ की भीड़ कालीबाड़ी मार्ग से होते हुए घूमती खाती पीती सैर करती रहती थी। अब कई सालों से बिरला मंदिर के सामने बहुत बड़ा पार्क बन आया है। तब ‘महाबोधि सोसाइटी’ के सामने कई टूरिस्ट वाले थे निगम की कई दुकानें थी। एक ऐसी ही शाम याद है जब सुमन के साथ वहाँ ‘थम्सअप’ पी थी। बिरला मंदिर को आती सारी बसें वहीं बनी पार्किंग में ही खड़ी होती थीं।

इससे भी छुटपन की याद जनवरी में लिख रहा था जब आज जहाँ नया स्कूल है वहीं बस स्टैंड से होते हुए वहाँ बनी पंद्रह बीस दुकानों तक जाते थे। एक तरह से टैक्सी स्टैंड था। फिर वहीं से बिरला मंदिर के बिलकुल सामने बना पार्क। तब वहाँ तांगे वाले भी दिख जाते थे। कभी तांगे नहीं दिखते थे तब घोड़े की लीद की गंध नाक में घुस जाती।

अब वहाँ कुछ नहीं है। इधर साउथ इंडिया क्लब भी तोड़ दिया गया है। बिल्डिंग तो कई सालों से बंद थी इस जून उसे ढहाकर नयी इमारत बनाई जा रही है। वहाँ अब पता नहीं सांबर वडा खाने का मौका लगेगा कि नहीं। तब तक शायद और दो चार लोग चले जाएँगे। कुछ और अकेले रह जाएंगे। फिर ऐसी किसी इतवार की शाम होते होते निकल पड़ूँगा अपने हिस्से का शहर देखने। उसमे कहाँ कहाँ अभी भी पाया जा सकता हूँ। कितनी हद तक वह वैसा ही मेरा इंतज़ार कर रहा है। शायद वह इंतज़ार मेरा होगा। जो मैंने बड़े चुपके से उसकी जेब में डाल दिया है। कि आऊँगा तो वहीं मिलना। कुछ देर तुम्हारे साथ भी बैठूँगा। दिन पुराने होते जाएँगे। यादों की तरह। तब इन पन्नों पर लौटूँगा। देख भर लूँगा। फिर चला जाऊंगा।

{ यह पोस्ट जयपुर से निकालने वाले दैनिक 'लोकदशा ' में चौबीस अगस्त को 'पुराने शहर से मिलने मैं ज़रूर जाऊँगा ' शीर्षक के साथ प्रकाशित हुई है। 'ब्लॉगस् इन मीडिया 'के लिंक पर इसे देख सकते हैं ।

अगस्त 10, 2013

'छोटी सी बात' के बहाने प्यार पर कुछ

प्यार क्या हमेशा एकतरफ़ा होता है। कम-से-कम शुरुवाती दिनों में यह ऐसा दिखाई देता है। हमारी फिल्में भी इसी रूप में हमे संस्कारित करती रही हैं। संस्कार की जगह अगर ‘कंडीशनिंग’ कहा जाये तब और दृश्य साफ़ होता है। दोनों की प्रक्रिया है लगभग एक ही। एक लड़का है। किसी लड़की को पसंद करने लगा है। उसका दोस्त है, उसकी सब बातें जानता है। उसे ढाढ़स बँधाता है। एक दिन पट जाएगी। अपने आप नहीं उसके कहे पर चलने के बाद।

यह पसंद उसके रूप को लेकर है रंग को लेकर है या किसी और स्वभाव गुण आदत को लेकर यह बिलकुल ‘व्यक्तिनिष्ठ’ मामला है। ‘व्यक्तिनिष्ठ’ में केवल पुरुष है इसलिए इसकी भाववाचक संज्ञा पुल्लिंग है। हमारे पुरुषसत्तात्मक समाज की बपौती। उनकी जुबान। उनकी भाषा बोली। डीएनए की तरह ख़ून में समाई। कभी धर्मेन्द्र जो काम करते थे वही अपने जमाने में गोविंदा करने लगे। किसी लड़की के गुरूर को अपने प्यार में फँसाकर तोड़ना। लड़की की हेकड़ी तुरंत गायब।

बीते साल आई इशकजादे भी इसी रूप में देहवादी फिल्म है जहाँ लड़का योजना के तहत लड़की की तरफ़ आकर्षित होता है तो सिर्फ़ उसकी देह को रौंदने के लिए। कि एकबार बस एक बार इसके साथ हमबिस्तर हो जाने के बाद इसका सारा लड़कपन तुरंत गायब हो जाएगा। परिणिति चोपड़ा और लड़कियों की तरह ‘बिहेव’ भी करने लग जाती हैं और उसी ‘स्टीरियो इमेज’ में क़ैद होकर रह जाती हैं। यह बिलकुल ‘सावित्री’ जैसा किरदार है जहाँ जिसे देह अर्पित की उसी के संग प्रेम जैसा पवित्र लगने वाला कृत्य किया जाने लगता है। झोलझाल वाली कहानी को ‘ऑनर किलिंग’ बनाने की हबीब फ़ैसल की तड़प यहाँ बार-बार देखी जा सकती है।

बिलकुल इसी तरह शारीरिक अंगों-प्रत्यंगों की तस्वीर देख लेने के बाद देव विदेश से भारत लौटता है। पर स्त्री देह पर पुरुष के एकाधिकार वाली बात उसके खिंचाव को तहस नहस कर देती है। जब उसे लगता है लड़की ओवर स्मार्ट है। खुद साइकिल पर गद्दा लिए खेत खेत डोल रही है। ऊपर से हमारे कान के कच्चे लड़के। लड़की हमें नहीं मिली तो दूसरों को भी लगे कि जूठी मिल रही है। जूठे उसके अंग प्रत्यंग। फ़िर जब शादी कहीं और तय हो जाये तो ड्रामेबाजी। वोदका की बोतल पहले गले के नीचे उतारना फिर उल्टी कर देना।

आज कोई मन नहीं था के फ़िल्म पर समाजशास्त्रीय विश्लेषण देने पिल पड़ूँगा। बस शाम अमोल पालेकर की ‘छोटी सी बात’ देख रहा था। अरुण प्रभा की तरफ़ आकर्षित है पर बोलने की हिम्मत नहीं है। बीच में नागेश नाम का काँटा इस मुश्किल को और बढ़ा रहा है। दोनों को मिलने नहीं देगा। ख़त लिख लिख खंडाला के विलफ़्रेड सिंह वगैरह वगैरह से प्यार पर टिप्स लेता रहा है। कहानी सरल एकरेखीय लगती है। हम भी इस भागमभाग वाली ज़िंदगी में इन इतमीनान से बनाई गयी फिल्मों को देख हँस बोल लेते हैं। किसी ऐसी ही फ़िल्म की फ़िर से ताकीद करने लगते हैं।

पर मामला इतना ही नहीं है। जहाँ से हमने शुरू किया था वहीं दोबारा पहुँचने पर दिखाई देता है कि यह तो वही लड़का है जो लड़की की तरफ़ खिंचा चला जा रहा है, जबकि लड़की की तरफ़ से ऐसी कोई कोशिश नहीं दिखाई देती। यहाँ कई पूर्वधारणायेँ एक-एक कर हमें मिलती हैं जिंहोने हमारे समाज के युवा वर्ग को कभी न कभी प्रभावित ज़रूर किया है। जैसे लड़कों के मन में जो लड़कियों का रूपक है और समानुपातिक रूप से लड़कियों के मन में लड़कों की छवि। यह कब कैसे किसने बैठायी कहना मुश्किल है। बिलकुल वैसे ही जैसे यह कि इन मामलों में शुरुवात लड़कों को ही करनी पड़ती है आदर्श स्थिति यही कहलाई और मानी जाती है जब लड़का हिम्मत करके खुद से आगे बढ़े। मतलब ‘कुछ है’ और ‘कुछ हो सकता है’ की संभावनाओं को परखने की दृष्टि से भी लड़के को सम्पन्न होना पड़ता है।

यहाँ प्रेम को आत्मविश्वास से जोड़ा गया है जहाँ लड़का बार बार अपने लूस कॉन्फ़िडेंस को नाक पर हाथ मलकर लूस नहीं करता। इससे कहीं कॉन्फ़िडेंस में तो रजनीगंधा का आमोल पालेकर है। सीधे कहता है। या कहें वहाँ ट्रीटमेंट अलग किस्म का है। थोड़ा सतही किस्म का। पढ़े लिखे वर्ग की लड़की भी ऐसे प्रेम नहीं करती। वह तो चश्मेबद्दूर की ‘मिस चमको’ की तरह खुद आगे बढ़ती है और रौ में अपना पता तक बोल जाती है। पर ऐसी नायिकाएँ सई परांजपे के बाद कई सालों की छुट्टियों पर चली जाती हैं।

यहाँ लड़के को ओवर हौलिंग की ज़रूरत है। उसकी पर्सनलिटी को डेंटिंग पेंटिंग की ज़रूरत है। यहीं आकार मुझे पिछले दिनों देखी राँझना याद हो आती है। जिसके बारे में ही लिखने बैठा था। पर ख़ैर आगे जल्द उसको भी लेंगे। आज कई सारी बाते रहने दे रहा हूँ कि अभी तो इस टॉपिक को शुरू ही किया है।

अगस्त 09, 2013

बेतरतीब दिन बेतरतीब बातें

30 ‎जुलाई , ‎2013, ‏‎7:05 शाम
कभी-कभी मेरे दिल में खयाल आता है। कि तुम मेरे बिलकुल पास हो। जैसे अभी शाम बाहर बारिश में मैं नहीं था, तुम नहीं थी, पर थी हमारी आवाज़ें। घुलीमिली। अगल बगल। लेटे लेटे बस खोया रहा। उठ कर गया नहीं दरवाज़े के पार। बस सुनता रहा। उन कदमों की कदमताल। कुछ आगे कुछ पीछे। बूंदों का आसमान से गिरना। उनके बीच हमारा आ जाना। हमारा चले जाना।

उस बूँद का हमारी हथेलियों के बीच से गुज़रना। कुछ देर ठहर जाना। उस नमी में, उस एहसास का होना जब उस बूँद के बहाने तुम्हारी हथेली को चुपके से पकड़ लिया था। तुम्हें बिन बताये।

रात इतना लिख रहने दिया। आगे कह ही नहीं सका।
***

05 ‎अगस्त, ‎2013, ‏‎6:49 शाम
दोपहर खूब बारिश हुई। अब उमस है। बादल नहीं हैं। आसमान खाली है। कमरे में हवा के जीतने रास्ते हैं सब खुले हैं। छत पंखा कई महीने हुए खराब है। अभी तक ठीक नहीं करवाया। जो टबेल फैन है उसके डैने आवाज़ करते हैं इसलिए नहीं चला रहा। पौने सात हो रहे हैं मौसम गरम नहीं है। तुम्हें यह सब कहूँगा तो कहोगी पंखा तो चला लीजिये।

पता है कभी कभी खराब ओवरएक्टिंग करता हूँ। पकड़ा नहीं जाता, यही ख़ैर है। कल कह बैठा कि बुखार है इसलिए धूप में बैठा हूँ। पीपल के पत्तों से छनती सूरज की किरणें इलाज कर रही हैं। पर दवाई नहीं खाऊँगा। पसीना निकल कर अपने आप ही ताप कम कर देगा। पर दोपहर होते होते लगा काम चलेगा नहीं। पैरासीटामौल खाकर लेटे रहने का मन था।
***

06 अगस्त, ‎2013, 08:05 शाम
यह बीतते दिन बिलकुल उस डकार के जैसे हैं जो शाम पाँच बजे दाल चावल के साथ दही खाने के वक़्त कम पानी पीने के बाद आ रही हैं। जिसपर नींद के वक़्त ने उन्हे आठ बजे तक टाले रखा।

06 ‎अगस्त, ‎2013, 08:11 शाम
तीन दिन से पादे जा रहा हूँ। पेट खराब है। तबीयत खराब है।

तिस पर एयरटेल वाले पाँच मिनट में नेट सर्फ करने के बीस रुपये काट लें तब और ठीक नहीं रह सकता। मेल का मैसेज न आया होता तो ही ठीक रहता बीस रुपये का मतलब पचास मिनट की चपत। एसटीडी कॉल पर।

06 ‎अगस्त, ‎2013, 08:18 शाम
हम पकड़े गए हैं और थर्ड डिग्री रम में रख लिए गए हैं। यहाँ से कैसे भाग निकलना है समझ नहीं आता। उसकी मार से रोज़ छलनी पीठ लिए सो जाते हैं कि कभी तो खुला आसमान होगा, साँसें होंगी। उस जहाँ में सपने उड़ सकेंगे।

पता है कितनी कमज़ोर पंक्ति है। टूटने बिखरने से खुद को बचाए रखने की जद्दोजहद लिए। झूठ से कम नहीं। छलावे की तरह। लगातार तोड़ती हुई।

06 ‎अगस्त, ‎2013, 08:25 शाम
कुछ कीड़े होते हैं जिनहे जाने अनजाने हम हाथ लगा लेते हैं, तब उनसे बदबू आने लगती है। हमारी पढ़ाई ने हमारे साथ यही सलूक नहीं किया क्या?

सवाल पूरे होशो हवास में है, दिमाग जग रहा है। आँखें खुली हुई हैं।
***

अगस्त 08, 2013

एक्सट्रीम पर्सनल: इसे ख़त समझना बेनामी

दिल थोड़ा भारी है। बस लिख रहा हूँ। ताकि आगे वाले दिन ऐसे न हों।

कल रात लगा मेरे सारे शब्द कहीं गायब हो गए हैं। उनका कोई अर्थ ही नहीं रह गया। वह कभी बोले ही न गए हों जैसे। बिलकुल वैसे ही जैसे कि मैं तुम्हारे लिए। सुबह अब तक कि सबसे भयानक पंक्ति सोचते हुए सिहरहन न बाजू से गुज़री न आँखों से होते हुए पैरों की तरफ निकली। उस क्रिया के बाद सारे सवाल अपने आप शांत हो जाते। पर उसका होना पलायन कर जाना है। जबकि लड़ना उन स्थितियों से जूझना ही है। पर यह हम दोनों बैठ कर सुलझा लेंगे। कहीं लगता है। बस

जिससे रात बात होने के बाद ठीक से नींद आती हो, मन न लगता हो अचानक आज वह अवांछनीय हो गया। तुम्हारा फ़ोन 'स्विच ऑफ' है। रात भर लगता रहा फ़ोन अब घरघरा रहा है। उधर तुम हो। बराबर उचक उचककर गर्दन मोड़ता इस मेज़ पर रखी किताबों तक लाता। कोई रोशनी नहीं दिखती तो उठकर आता। और निराश हो हर बार लेट जाता। रोने को हो आता। कुछ आँसू आते भी। चुपके से। पर नहीं आता तो उधर से एक मैसेज भी। 

पूरी रात ऐसे जाग उठ बैठने में बीत गयी। पर नहीं।  सुबह छह बजे कुछ लिखा था। कविता में कहने की आदत नहीं। फिर भी। लेट होरहा था फ़िर भी:
कल तक कही मेरी सारी बातें शून्य में बदल गईं
उनमे कोई अर्थ बचा नहीं रह गया 
उनका होना न होने के बराबर है।

वरना ऐसे कैसे होता कि मैं कहूँ और तुम्हें सुनाई न दे।
बात न करना बिलकुल सही रास्ता है
जब दो लोग बात न करना चाहें। 
या कहूँ 
जब कोई एक दूसरे से बात न करना चाहे।
लगता था मैं और पुरुषों की तरह  नहीं हूँ, उनसे कुछ अलग हूँ। कुछ बात है मुझमे। जो अलग करती है। पर नहीं। सारा तिलिस्म एकाएक आज टूट गया। तुमने तोड़ दिया। एक झटके से। अचानक लाग्ने लगा हम कितना कुछ लिए बैठे हैं एक दूसरे के लिए। जिनके जवाब एक दूसरे से कभी लिए भी नहीं। बस उनमे जुड़ता गया जुड़ता गया। 

पता नहीं मुझे क्या हो गया है? शायद खुद से नाराज़ चल रहा हूँ। खुद के बाद दूसरी तुम हो, जिसे पता चलता है। तुरंत। प्रतिकृया की तरह। तीर से भी तेज़ बातें कभी कभी बोल जाता हूँ। पता नहीं आवाज़ में पहले वाला विस्मय कहाँ खो गया है। तुम्हें भी नाराज़ करता चला हूँ। तुम्हें जाता देता हूँ किस्से बात कर रही हो। वहाँ अब हैरानी नहीं है। आश्चर्य में बाल सुलभ चंचलता भी नहीं है। बस रह गयी है आवाज़। 

मुझे लगता था के अपने हिस्से के सच बताकर उन पुरुषों से तो अलग ही काम कर रहा हूँ जो छिपाते बगलें झाँकते हैं। एक हाँड़ माँस का जीव अब मेरे साथ था। पर मालूम नहीं था इस बनाने में कहीं सबसे जायदा पुरुष होता गया। तुम्हें ऐसे साँचे में ढाल रहा था जिसे मैंने गढ़ा था। लेकिन असली तुम को ढकता गया ढकता गया। बिन पूछे। 

फ़िर कल लगा के मेरी इस रौं में तुम भी चल पड़ी थी। पर उसमे तुम कहाँ थी। वहाँ भी मैं था। सीधी और सबसे आसान बात यही समझ में आती है कि मैं तुम्हारी ज़िन्दगी में दखल की तरह आया। जैसी तुम कल जी रही थी उनमे कतरब्योंत करने न करने की चाहिए अनचाही चाहत लिए। हम एक दूसरे की तरफ़ खिंच रहे थे, खिसक रहे थे, लुढ़क रहे थे या इनमे से सब कुछ होते जा रहे थे या इनमे से कुछ भी नहीं होते जा रहे थे। पर दिख रहा था कि ऐसा कुछ हो रहा है। लगातार। भ्रम ऐसे ही काम करता है। करता रहा। 

और तुम उन सारी बातों में लगातार नाराज़ होते जाने का समान इकट्ठा करती जा रही थी। मुझे बिन बताए। जबकि मुझे लगता रहा उन सारी बातों में हम दोनों हैं। बराबर हैं। पर नहीं। उनमे सिर्फ़ मैं था। मेरी दिल को लग जाने वाली बातें थी। मतलब एक तरफ़ तुम्हें मेरी बातें जैसी भी लग रही थी तुम उनको हँस कर टाल रही थी और मैं था कि ताव दिखाकर तुरंत फ़ोन काट देने कि आदत बनाए जा रहा था। पर कल तुमने भी वही किया। जो जो बातें कभी न कभी लगीं दिल के गहरे उतर गईं उन्हे एक साथ कह गईं। 

इन सारी बातों के बावजूद कल डायरी में नौ पचपन पर क्या लिखा था पता है? बताता हूँ: 

पता नहीं हम दोनों यहाँ कैसे पहुँच गए? इतनी सारी बातों के बाद भी? तुमने साथ के साथ अपनी बातें क्यों नहीं कहीं? तुम्हें कहा तो नज़र लगी है। बिस्तर पर तकिये के नीचे दो सिक्के रख सोना। फ़िर तालाब में फेंक देना।

बात करना छोड़ूँगा नहीं। लगातार बात होगी तब यह आ गयी दूरी मिटेगी। तुम बात करोगी न! बस यह मत कहना कि मेरा फ़ोन है मेरा बैलेन्स है, मेरी मर्ज़ी। यह थोड़े दिनों कि बात है, फ़िर ठीक हो जाएंगी ये बिगड़ी रातें।
जिस बात को लेकर डर रहा था वही हुआ। शाम सवा पाँच से जायदा हो गए हैं और हमारी तुम्हारी एक भी बार बात नहीं हुई है। पता नहीं दिल कैसा कैसा हो रहा है। यह गाना सुनकर तो और भारी हो गया।

अगस्त 02, 2013

दो ब्लॉग: दिल के पास: सोचालय और लहरें

लग रहा है थक गया हूँ। खूब थक गया हूँ। अभी डायरी में लिखते लिखते शब्द झिलमिला से गए जैसे। तारों की तरह। पलकें भारी हैं। लेटने का मन हो रहा है फ़िर भी सोचता हूँ जो मन में चल रहा है उसे कहे बिना दिल मानेगा नहीं। थोड़ा तुमसे भी बात करने का मन शाम से हो रहा है। पर नहीं कर सकता। अभी तुम्हारे पास फ़ोन होगा नहीं। कैसे बात करूँ। फ़िर ये जुखाम भी किसी को कहीं का नहीं छोड़ता। कल आइसक्रीम क्या खा ली, नाक सुड़सुड़ाने की नौबत आ गयी।

कई दिनों पहले सागर की पोस्ट पढ़ी थी। ठीक से याद नहीं क्या था उसमे। अभी गूगल कर यहाँ लिंक देने से पहले खुद भी पढ़ लूँगा पर अभी कुछ भी सही से कह नहीं सकता के क्या बात थी। जितना याद है उसमे शायद एक लड़का महबूबा के बेवफाई के किस्से बेतरतीब होकर कह रहा है। मतलब पता नहीं क्या। मेरे में हिम्मत ‘राँझणा’ के धनुष की तरह नहीं पायी जाती कि सोनम को बिठाकर स्कूटर का स्कूटर गंगा में कुदा दूँ। अभी महिना भी नहीं हुआ एक पोस्ट लिखी भी तो उसे खुद ही अश्लील एकालाप कह देता हूँ। अभी कुछ ही महीनों से सोचालय को पढ़ना शुरू किया है शायद बंगलोर की पूजा के ब्लॉग के साथ। कभी-कभी लगता है मैं वो सब वो सारी बातें क्यों नहीं लिख पाता जो सागर के यहाँ बड़ी सहजता से ‘स्पेस’ पा जाती हैं। उमर में हम दोनों शायद हमउम्र ही हों। पर नहीं। जैसा वह लिख लेता है वैसा लिखने की हिम्मत शायद मेरे में नहीं। मेरे यहाँ वह डायरी के पन्नों पर है। पर मैंने कभी उसे पूजा की तरह ‘कथार्सिस’ कभी नहीं कहा। मेरे लिए वह थोड़ा पर्सनल है। जिसे यहाँ लिख लेना इतना आसान नहीं लगता। अभी जो मन में चल रहा है उसे इर्दगिर्द बस घूमे जा रहा हूँ। बोल कुछ नहीं रहा।

कभी लगता है अपने अनुभव इकहरे क़िस्म के हैं। उनमे ‘ग्रे एरिया’ है ही नहीं। वही एकतरफ़ा प्यार करने वालों की तरह घुट घुटकर आहें भरना, कहीं दिल भारी हो जाने पर किसी दोस्त के कंधे पर सिर रखे बिना रो देना। या जादा हुआ तो डायरी को साझेदार बना लेना। पर फ़िर कभी अपनी ही पोस्टों को पढ़ता हूँ तो लगता है जो भी लिख दिया है उनमे अगर जिन व्यक्तियों को पता हो कि उनकी बात कही है तब मेरी स्थिति और विकट होती जाती। और अधिकतर वह हिस्से मेरे दिल के कोनों में उग आए प्यार के हैं। जिनमे वह सब हैं, उन्हे बिन बताए लगातार यहाँ लिखता रहा हूँ। उन्हे बताने की ज़रूरत कभी लागू भी नहीं। क्यों बताऊँ। मेरे हिस्से वह सब लड़कियाँ इतनी ही पड़ी होंगी या फ़िर उन्हे इतना ही समझा होगा।

कभी-कभी सोचता था अपने जैसी लड़की को ढूंढुंगा। मिल जाएगी तब उससे बात करूंगा। बात करूंगा अपनी हमसफ़र बनाने की बात तक। पर जिस तरह भी पढ़ाई की उनमे सब की सब पूंजीवाद के चलती फिरती देह से जायदा कभी नहीं लगीं। कहीं पहले कह भी चुका हूँ, फ़िर कह रहा हूँ। मेरे हिस्से वह कभी पड़ी ही नहीं। फ़िर एक दिन ऐसा आया कि यह तलाश बंद कर देनी पड़ी। पुरातत्व विभाग की अनुमति खत्म नहीं हो गयी अपन उन लड़कियों को ‘पॉपुलर कल्चर’ की पुरोधा मान अपनी तरह बनाने में पिल पड़े। सिर्फ़ पिल पड़े, मिली कोई नहीं। जो हमारी तरह बनने को तय्यार हो। वैसे असल में बात ये थी कि उन्हे कानो कान भनक भी न पड़ी के हम सोचते क्या हैं। भनक पड़ी होती तो पता नहीं क्या होता।

ख़ैर, कभी कभी जब किताब नहीं पढ़ रहा होता हूँ तब इन्ही ब्लॉगों पर घूम रहा होता हूँ। लगता है जैसा मैं जिस चीज़ पर सोचता हूँ या अगर कभी लिखता तो बिलकुल वैसा तो नहीं पर है कुछ-कुछ उस हद का लिखता। अभी जब सागर ने ‘ईएमआई’ के बाद कोई पोस्ट नहीं की और पूजा की ‘शिप ऑफ थीसियस’ पर अचानक पोस्ट आई। उनके दरमियान यही सोचता रहा के इनकी यहाँ से गैरहाजरियाँ अकेला क्यों कर रही हैं। उनमे मैं कहाँ छूटा जा रहा हूँ। पता नहीं क्यों जानना चाहता था के जब ये दोनों यहाँ नहीं होते, तब क्या कर रहे होते होंगे।

आगे लिखना थोड़ा मुश्किल हो रहा है क्योंकि ट्यूब टाइट की रौशनी में दो तीन ततैया घूम रही हैं। उनसे अपने आपको छिदवाने की कोई प्लानिंग नहीं है। इसलिए जा रहा हूँ। और वैसे भी इस पोस्ट को पढ़कर कोई भी कह सकता है कि मैं ब्लॉग का कोई गंभीर पाठक नहीं हूँ। जिनहे दिल के पास मानता हूँ बस वही कहा। आगे जो नहीं कहा है, फ़िर कभी..!!

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