सितंबर 30, 2013

सुना कल अपने शहर में शेर दहाड़ने आया था

अपनी बात कहने से पहले थोड़ा पीछे बचपन की तरफ़ जाता हूँ जहाँ मेनका गाँधी का उदय होना अभी बाकी है। वहाँ की कोई याद नहीं है कि कभी लाल किले पर कोई सर्कस लगा हो और वहाँ शेर की दहाड़ सुनाई दी हो। शायद छोटे रहे थे जब आखिरी बार इन जानवरों वाला सर्कस देखा था। भूल गए होंगे। बहराइच वाले सर्कस छोटे थे जानवरों का ख़र्चा उठा नहीं पाते होंगे। वह कभी लाये भी होंगे याद नहीं। बस हाथी भालू से काम चलाते रहे। शेर पालना थोड़ा टेढ़ा काम लगता है। पर इसबार बहराइच वाले नवंबर में देख लेंगे। तब दरगाह मेला नहीं होगा तो क्या। वह देखेंगे।

सुना कल अपने शहर में शेर दहाड़ने आया था। हमारी तरफ़ बादल ही इतने थे के आवाज़ दब गयी होगी। सब कह रहे हैं भारत माता का शेर। अभी परसो राकेश ने कहा तो सर्च किया पहली बार भारत माता नाम से अबीन्द्रनाथ ठाकुर ने एक पेंटिंग बनाई थी। वहाँ उनके चार हाथ तो थे। पर माता खड़ी हैं। किसी पर बैठी नहीं हैं।

शेर किस वन्य जीव प्रेमी का क्षेपक है अभी तक अज्ञात है। वैसे ‘सशस्त्र’ हथियार वाला यह भाव कब उनके मन में आया होगा समझना इतना कठिन नहीं है। हम खुद जब कुछ नहीं कर पाते तब ऐसे ही मिथकों के बारे में कह सुन रहे होते हैं। ‘आनंदमठ’ इस अम्मा को मुक्त कराने का प्रयास है। ‘वंदेमातरम’ इस छवि के इर्दगिर्द आज भी ख़ुद को बुन रहा होता है। माँ के प्रति प्रेम तो है पर इस पितृसत्तात्मक समाज में उसकी दयनीय स्थिति देख यह विचार पहली बार आया होगा। कि अस्त्र-शस्त्र से सम्पन्न कर देने के बाद वह सबसे मुक़ाबला करने लायक हो जाएगी। काश ऐसा सच में हो पाता। वह चित्र से बाहर निकल आती। और हमारा ‘उन्नीस सौ सैंतालीस’ कई दशकों पहले आ जाता। शायद उस ‘शास्त्रीय भाषा’ को अभिधा में ले लेने के कारण ऐसे गड्डमड्ड करता जा रहा हूँ। बहरहाल।

कई शेर हमने ‘पंचतंत्र’ की कहानियों में देखें हैं। उन सभी को विष्णु शर्मा ने शहराती सभ्य अहिंसक नहीं दिखाया। सब के सब जंगलों में ही पाये जाते रहे। उसकी ताकत से डरते रहे। यह डर ही उसकी सबसे बड़ी ताकत बनी रही। कोई सशस्त्र विद्रोह भी दिखाई नहीं देता। उसके नुकीले दाँत और नाखून उसकी भागने की गति के साथ मिलकर और पाशविक होते रहे। लगता है हम सबको खरगोश हो जाना होगा। और गायब तालाबों के समय में एक-एक कुआँ ढूँढ लेना होगा। तभी हम बचे रह सकेंगे। यह डर की कहानी नहीं है। यह साहस की कहानी है। धैर्य की कहानी है।

फ़िल्में इस भारत माता वाले शेर की याद में कुछ मदद करती नहीं लगती। एक तो मेरे पास कोई टाइम मशीन भी नहीं है कि अपने क्रांतिकारियों के जेल प्रवास को अपनी आँखों से देख पाता। कि वह जेल में इस शेर को कितना याद कर रहे होते थे। या ख़ुद ही ऐसे पशु बनने की कामना उनके कोमल हृदयों में कितनी देर तक टिक पाती थी। बेचारी पिक्चरें जितना दिखा पायी हैं वहाँ इसे सब याद तो कर रहे हैं पर शेर की कलाकृति किसी क्रांतिकारी ने अपनी जेल की दीवार पर नहीं बना रखी। ‘खड़िया’ कहाँ से लाये इसका कोई अता पता नहीं। ऊपर से यह ‘याद’ ऐतिहासिक रूप से कितनी प्रामाणिक है इसपर भी संशय बरकरार है। ‘नेहरू फैलोशिप’ नहीं मिला वरना रिसर्च करता। बहरहाल। शायद वे सब कुछ कम कलाकार रहे होंगे या याददाश्त से मार खा गए होंगे।

वैसे हमारी सरकार इन शेरों के गायब होने से परेशान सी दिखती रही है। जंगल-जंगल इनके पैरों के छाप ढूँढती टीमें बेचारी ख़ाक छान रही हैं। प्रधानमंत्री बेचारे इतनी उम्र में भी चिंतित नज़र आते हैं। उनके के सरिस्का दौरे के बाद हम भी शेरों का हालचाल लेने वहाँ पहुँचे थे। पर हमें भी दिखे नहीं। पहले लगा था उनकी बूढ़ी आँखें देख न पायी हों। पर हमें भी कोई परिंदा पर मारता नज़र नहीं आया। मौसम गरम नहीं था फ़िर भी नहीं। अभी इस जून ‘मदुमलई टाइगर रिज़र्व’ भी होते आए। पर नहीं। वहाँ भी नही। जंगल घना था फ़िर भी नहीं।

बाघ और शेर अगर एक ही होते हैं तो इन्हे बाघ और शेर अलग अलग क्यों कहा गया। फ़िर केदारनाथ सिंह जब कविता लिखते हैं तो उसे 'बाघ' कहते हैं। वह बाघ इतना ख़ुदमुख़्तार है कि उसके बारे में हम जो भी बोलते हैं वह दरअसल बाघ ही बोलता है। अपने पक्ष में भी। विपक्ष में भी। और हमें यह मानने में किसी को कोई एतराज नहीं होना चाहिए कि आस-पास की सारी आवाजें अपनी जगहों को या तो बाघ की आवाज को समर्पित कर देती हैं या फिर अपने होने में, नहीं होने के सच को स्वीकार कर चुप हो लेती हैं। और जब पाणिनी ने उसके गुर्राने में हुई भाषिक अशुद्धियों पर डांटना शुरू किया तब वह बाघ उन्हे खा जाता है। उदय प्रकाश ने काफ़ी पहले लिखा भी है। 

ऐसे ही असगर वजाहत की एक लघु कथा है 'शेर'। शेर का मुँह 'पशु संसाधन विकास मंत्रालय' में तब्दील हो गया है और गधा घास के मैदान की तलाश में, लोमड़ी रोज़गार पाने के लोभ में और कुत्ते स्वर्ग में दाखिल होने की लालसा लिए उसके खुले मुँह में बिना प्रतिरोध के घुसे जा रहे हैं। उनके लिए प्रमाण से बड़ी चीज़ विश्वास हो गया है। क्या ऐसा ही विश्वास इधर की जनता पर भी अपना जादू कर गया है। क्या मालूम।

सितंबर 27, 2013

कभी-कभी कुछ तस्वीरें अंदर तक पकड़े रहती हैं


पता नहीं तुम कैसे होते गए होगे। तुमने बिन कहे मना किया होगा। थोड़ा झिझके होगे। थोड़े पैर लड़खड़ाए होंगे। बिलकुल जुबान की तरह वह भी कुछ कहते-कहते रुक गए होंगे। कैसे कहूँ। यही सोचते-सोचते तुम बस खड़े रह गए। चेहरा किसी नयी नवेली दुल्हन की तरह शरमाया सा नहीं लग रहा। बस तुम्हारा वहाँ होना दिल तोड़-सा रहा है। सच कहता हूँ, तुम्हें वहाँ से भाग लेना चाहिए था। तुम्हारी एक तरफ़ झुक गयी गर्दन अभी भी मेरी आँख में आँसू की तरह माजूद है। तुमने आँसू पोंछ लिए होंगे। उसमे तुम ही नहीं, मैं भी हूँ। पता है तुम वहाँ नहीं होना चाहते थे। पर तुम्हें घेर लिया होगा। किसी भेड़ की तरह। किसी मेमने की तरह। कितना अमानुषिक हो गया होगा वह तस्वीर खींचने वाला। जो तुम्हें बिलकुल ऐसे ही उतार लेना चाहता होगा। बिलकुल ऐसी ही जैसे तुम सच में हो। जैसे कुछ-कुछ सच में मैं भी हूँ।

कमीज़ में बटन नहीं हैं। खुली हुई है। छाती दिख रही है। कमर में अँगोछा बाँधे घूम रहे हो। तुम्हारी माँ को पता था तुम आज तस्वीर खिंचवाकर आए हो? जब उसे पता चला होगा तब उसे गुस्सा नहीं आया होगा। बल्कि दौड़ कर कोने में रखे डिब्बे से सूई धागा ले आई होगी। फ़िर थोड़ी देर तुमसे चिपटकर खूब रोयी होगी। बताया नहीं होगा क्यों उसका दिल भर आया। तुम भी समझ नहीं पाये होगे। तब पता नहीं गले की माला उतार एक बार फ़िर नज़र भी उतारी हो। चूल्हे में लाल मिर्च झोंक बाहर निकल गयी हो। फ़िर निकाली होंगी सैकड़ों गालियाँ। उस कलमुंहे दाढ़ीजार को ख़ूब कोसा होगा। और इस गुस्से पीड़ा दुख को मुँह से थूक बनते बाहर निकलते तुम देख रहे होगे। सब देख रहे होंगे। बोला कोई नहीं होगा। 

तुम्हारी आँखों की तरह उसकी आँखें भी खाली होंगी। उसमे कोई सपना इंतज़ार नहीं कर रहा होगा। वह बस इंतज़ार कर रही होगी तुम्हारी उम्र के बड़े होने का। पर डरती भी होगी कि तुम भी कहीं उसे छोड़ चले न जाओ। इसलिए तुम्हें कुछ कहती नहीं है। बस रोती रहती है। वह जो तुम्हारी कमर में कमरबंद है वह उसके हिस्से की सुनहली सी सपनीली सी याद है। तुम्हारे पिता की। उसने तुम्हारी कमर पर बाँध दिया है कि कभी अपने पिता याद आए तो हमेशा वह तुम्हारे साथ रहें। तुम बार-बार उनके बारे में न पूछो। इस बहाने वह तुम्हारे छुटपन में ही तुम्हें इतना प्यार कर लेना चाहती है जिसके सहारे अपनी सारी ज़िन्दगी गुज़ार सके। जिसका कुछ हिस्सा कल याद आए तो रोये नहीं।

पता है तुम उस स्कूल में नहीं पढ़ते। तुम्हें कोई घुसने भी नहीं देता होगा। पर उस ‘ब्लॅकबोर्ड’ के सामने खड़ाकर जो विद्रुप रचने की कोशिश की है, वह भी पता नहीं कितनी सफ़ल हुई होगी। कितनों ने तुम्हें खोज निकाला होगा। चुनाव आ रहे हैं इसलिए थोड़ा डर रहा हूँ। पर यहाँ कह दूँ राजेश जोशी की तरह भावुक नहीं हूँ के तुम्हारे उस चारदीवारी, जिसे स्कूल कहते हैं, से बाहर हो जाने पर मासूम सी कविता लिखने बैठ जाऊँ। क्योंकि मुझे पता है वह तुम्हें आठवीं तक खाना खिलाएँगे और बाहर फेंक देंगे। हमने तुम्हें आगे तक पढ़ाने का क़र्ज़ नहीं लिया है, तुम्हें जाना होगा। वहीं बाहर की दुनिया में। तब तक क्या पेट तुम्हारे पेट को छोड़ कर कहीं चला जाएगा। या उसे भूख नहीं लगा करेगी। पता नहीं।

सारे सवाल उस कमीज़ के बाहर झाँकते पेट से शुरू होकर उसी पेट तक जाते हैं। तुम उसे ढक नहीं पाये। तुमसे जानबूझकर किसी ने कहा भी नहीं होगा। तुम्हारे खाली पेट को देख कर ही हम और पैसा उठा सकेंगे। इंतज़ार करो तुम्हारे नाम पर भी कोई योजना जल्द घोषित होने वाली होगी। तब तक अपना मरना टाल सको तो बड़ा अच्छा होगा। तब तुम जान पाओगे जिस बीमारी ने तुम्हारे पिता को ज़िंदा मार दिया उसके लिए भी हम कुछ न कुछ करने की सोच रहे हैं। तब तुम्हें पता चलेगा हम कितने संवेदनशील समाज में जी रहे हैं। तुम्हारी माँ को आंगनबाड़ी में नहीं लगाया या एएनएम बहनजी न बनाया तो नाम बदल देना। जहाँ तुम रोज़ मरने से बचने की लड़ाई लड़ रहे हो। वहाँ हम तुम्हारे बारे में कितना सोच रहे हैं। अंतर इतना है कि खाली पेट कभी भरता नहीं। काश इन बातों से भर जाता।

सच कह रहा हूँ तुम कभी इन सरकारी स्कूलों में पढ़ने मत आना। तुम्हें हजम कर जाएंगे। पता है जिस विशेषांक के मुखपृष्ठ पर तुम्हारी यह सकुचायी-सी तस्वीर लगी है, वह यही बता रहा है कि इस पढ़ाई ने तुम जैसे बच्चों को आँकड़ों में तब्दील कर गायब कर दिया है। वह अब कहीं नहीं हैं। वह विश्व बैंक की ‘स्टेटस रिपोर्ट’ की गिनती भर रह गए हैं। पता नहीं तुम पढ़ना जानते भी हो या नहीं। यह सब लिखा है तुम तक कभी पहुँचेगा भी कि नहीं। पर कई दिन से टाले जा रहा था। बिल्कुल उस दिन से जबसे प्रमोद सिंह ने अपनी नोटबुक में लिखा। अभी भी कह रहा हूँ इन सबसे दूर ही रहना। पढ़ना लिखना सीख गए तो बर्बाद हो जाओगे। क्योंकि तुम पढ़ना लिखना सिर्फ़ कागज़ पर सीख रहे होगे, असल में तुम्हें चारे में तब्दील कर लिया जाएगा। जिससे किसी की थाली भर रही होगी।

सितंबर 24, 2013

तुम इस तरह से मेरी ज़िन्दगी में शामिल हो

आज उस तस्वीर वाले ‘मैं’ को बीतते सालों में यादकर बहुत दूर बैठा हूँ। इसके बाद आगे क्या लिखूँ समझ नहीं पा रहा। इन बीतते सालों में कैसा होता गया हूँ। शायद कुछ कुछ जानता हूँ। शायद नहीं भी जानता होऊंगा। किसी का भी अपने कल से आज में आना पूरी तरह से व्यक्तिनिष्ठ है। उसके अपने तरीके हैं। कोई बना बनाया ढर्रा नहीं है। सबकी ज़िंदगियाँ, उनकी अपनी ज़िंदगियाँ हैं। जो साथ थे और जो साथ नहीं थे। सब लगातार बदलते रहे हैं। उनमे उनका नया भी है, पुराना भी। वह कैसे हो जाना चाहते हैं यह जितना उनपर है, उतना ही उनपर नहीं है। ख़ुद को लग रहा है जैसे खेल रहा हूँ। पर नहीं। बस थोड़ा थोड़ा समझने की कोशिश में हूँ।

कहाँ से शुरू करूँ। दिन से, रात से, शाम से, कहाँ से। धीरे-धीरे सब बदला है। पहले लिखते-लिखते किसी के फ़ोन का इंतज़ार नहीं रहता था। पर अब है। सवा छह होंगे और घंटी बजेगी। उधर तुम होगी। तुम्हारी आवाज़ होगी। फ़िर मैं होऊंगा और मेरी आवाज़ होगी। ढलती शाम कभी ऐसे महसूस नहीं करता था। अब करता हूँ। के थोड़ा मैं रहूँ, थोड़ी तुम रहो। धीरे-धीरे एक दूसरे में घुलते जाएँ। फ़िर धीरे से कान में कुछ कह, चुपके से मुस्कान होंठों से होते हुए, दिल में उतरती जाए। आती जाती साँसों के साथ धड़कन भी तेज़ होकर आहिस्ते से किसी कोने में छिप जाये। और चुपके-चुपके हमारी सारी बातें सुनती रहे।

सच कहूँ तब यह एहसास मेरे पास नहीं था।मेरे पास तुम नहीं थी। तुम्हारे पास मैं नहीं था। बस ऐसे ही दिनों शामों की अन बनी यादें थीं। किसी से कहता नहीं था। बस दूर से किसी के न होने पर उदास से सूरज को और उदास किए देता था। वह मुरझाया-सा डूब जाता। बिलकुल मेरे दिल की तरह। उसकी धड़कने महसूस करने वाला कोई नहीं था। कितने अकेले से पल थे। हर पल किसी के न होने की टीस आसपास मंडराती सी रहती। कितने ही पन्ने मेरी आँखों से न निकालने वाले आँसू देखते रहे हैं। उन्हे बचाकर ख़र्च करता। कि सब एकबारगी न चलें जाएँ।

मेरे अकेलेपन में मैं अकेला ही था। उसे बाँटने वाली तुम नहीं थी। फूलों की तरह मुसकुराती तुम्हारी मुस्कान नहीं थी। तुम्हें बता नहीं सकता के तुम्हारे साथ के लिए कितनी रातें बस ऐसे ही लेटे-लेटे काट दी। मेरे पास वह शब्द नहीं हैं के उन गुज़रते पलों के अकेलेपन को बिलकुल उन्ही की तरह दोहरा जाऊँ। शायद अनुवाद भी न कर पाऊँ। उन कटती रातों में बस सोचता था। कर कुछ नहीं पाता था। करवट-करवट पता नहीं कैसा होता जा रहा था।निपट अकेलाबेकारबेकामबोझिल सा। 

अभी बस तुम्हारे, तुम्हारी आवाज़ के आसपास हो जाना चाहता हूँ। के कुछ देर उस नम घास पर बैठ एक दूसरे से कुछ कहते। तुम्हें फ़िर बताता अपने वो दिन किसी के गुमशुदगी के दिन थे। मैं खो गया था, खुद से। अपनी पहचान से गायब होकर भटक रहा था। कोई ढूंढ नहीं रहा था। किसी के लिए इतना ज़रूरी नहीं था के रोक कर पूछे। कैसे हो। बस चलते-चलते अकेला होता जाता। कभी-कभी ख़ुद को भी नहीं मिलता था। सब मेरी धड़कन के साथ चुपके से दिल की कब्र में दफ्न होते चलते। उसकी आवाज़ें सुनने के लिए पास से गुज़रना ज़रूरी था। थोड़ी-सी मेरी चुप्पी सुनने का इतमीनान ज़रूरी था। ज़रूरी था मेरे साथ रुक जाना। पर इस अनुपात में औरों की नज़र में गैरज़रूरी-सा मैं किसी अनचाहे कोने में अपनी बन्द आँखों के साथ बैठा रहता। उस अकेलेपन से भागता भागता लगातार थक रहा था। थक सा गया था। हार रहा था। हार सा गया था। थोड़ा नाराज़ था। थोड़ा और नाराज़ हो गया था।

मेरे आज में तुम हो। तुम्हारे आज में मैं हूँ। हम दोनों एक दूसरे में हैं। इन पलों के लिए अंदर ही अंदर कितना  छटपटाया हूँ उन्हे बस धड़कता दिल ही कह सकता है। जो बिलकुल तुम्हारे बगल में बैठा धीरे-धीरे तुम्हारी तरफ़ खींचे रहता है। तुम्हें चुपके से पुराने दिन बताता भी होगा। के कितना इंतज़ार किया है मैंने। उन दिनों का बीतना मेरे बीतने जैसे था। अजीब तरह की उधेड़बुन में लगे रहना। चिड़चिड़ेपन से लगातार चिड़चिड़ा होते रहना। बात-बात पर गुस्सा। चेहरा चेहरा न होकर मातम होता जा रहा था। तुमने मुझे निकाला। बड़े आहिस्ते से खींचा। इतमीनान से पास बुलाया। बिठाया। साथ चलने को कहा।

आज हर बात के बाद तुम हो, हर बात से पहले तुम हो, हर बात में तुम हो। तुम्हें छोड़ कर जाने का मन नहीं होता। कहीं कान में पहनी बाली को निहारने का मन होता है। तुम्हें बिन बताए। अब जब कभी उस कल को सोचता हूँ जहाँ तुम नहीं थी तो लगता है कितना अधूरा सा था सब। मेरी सुबह, मेरी शाम, मेरी रात। कुछ-कुछ मैं भी भरा हूँ तुमसे। कुछ-कुछ तुम भी भरी होगी मुझसे। उस खालीपने की ऊब से निकल अब पेड़ की छाव में चुप से बैठे हमदोनों कभी नज़र आते हैं। उससे कुछ ही देर पहले कोई बात हाथों को छूती सीने के पास से अभी-अभी गुज़री हो जैसे। और हम चुप्पे से देख रहे हों किन-किन तरफ़ों से सब हमें देख रहे हैं।

सितंबर 23, 2013

सुदीप तुम्हें ऐसे नहीं होना था..

पिछला पन्ना, दिल तोड़ देने वाली फ़िल्म..

ख़ुद को थोड़ी देर सुदीप की जगह रखकर देखने का पहला मिनट बीता नहीं कि अपने आप से कोफ़्त होने लगी। जिसके साथ ज़िन्दगी बिताने के दिन बुन रहा हूँ, उसे कह दूँ, के अपने हिस्से के सपनों को पूरा करने के लिए वह उस अमीर कंपनी के मालिक से शादी कर ले। शायद उसका बूढ़ा होना मुझे खटक रहा है या कुछ स्थापित आदर्श आड़े आ रहे हैं। पता नहीं। उसकी उमर कुछ जादा है तो क्या। क्या ऐसा होने से वह कुछ कम इंसान हो गया है। उसमे संवेदनाएं नहीं हैं। उसके पास सीने में दिल नहीं है। थोड़ा बूढ़ा ही तो है। और इत्तेफ़ाक से उसकी दिवंगत  पत्नी की शक्ल हू-ब-हू छाया से मिलती है। कर लेने दो शादी। शादी ही तो है। कितने दिन ज़िंदा रहेगा बुड्ढा।

जिन तर्कों से सुदीप छाया को समझा रहा है, उन्हे ख़ुद को नहीं समझा पाया। कैसे इतनी तरहों से अपने प्यार को छोड़ रहा है। शायद यह मामला मेरी नैतिकता में आकार फँस भी गया है। सुदीप जहाँ से सोच रहा है वहाँ कम से कम मैं नहीं हूँ। वह कह रहा है शादी के बाद भी कुछ नहीं बदलेगा। मतलब मेरे मन में कहीं-न-कहीं चल रहा है, के कुछ तो है, जो बदलेगा। यह बदलना पति-पत्नी के रूप में उन्हे स्वीकार करने के बाद से शुरू होगा। उनकी भूमिकाओं के ‘सेट’ हैं, जो उन्हे वह रहने ही नहीं देंगे। वह बस एक सपने को स्थगित कर दूसरे सपने की तरफ़ बढ़ रहा है।

मतलब यह मामला पुरुष होने का भी है। उसने सिर्फ़ ‘मोदी एंड मोदी’ के मालिक को सीढ़ी नहीं कहा। उसने छाया को भी इसी रूप में लिया। चलिये क्षण भर के लिए सुदीप के इस विचार को उन दोनों की साझा इच्छा मान भी लें, तब भी तो यह इतना एकरेखीय नहीं लगता। ‘अर्थ’ यहाँ निर्णायक भूमिका में लगता है जो अभी किसी दूसरे के पास है, उसे अपने पास लाने का कोई और विकल्प न दिखना न सूझना उस समाज में विकल्पहीनता का सूचक है या कुछ और। क्या जितना है, उस से कोई भी शुरुवात नहीं हो सकती। छाया तो छोटे से कमरे में भी साथ रहने को तय्यार है। पर सुदीप पीछे क्यों खिसक रहा है। फिर इतने सालों बाद अब जबकि आवारा पूँजी का दौर है ऐसी कहानियाँ कितनी बची रही हैं शोध का विषय है। यह पैसा अभी भी इसी रूप में विद्यमान है या कुछ बदला भी है। लगता तो है के इस समाज की तह में वह ज़िन्दा भी होंगी।

अपने इस अर्थ में सुदीप ‘उत्तरआधुनिक’ है। उसने स्त्री को ‘देह’ के रूप में ही लिया। कि अगर इसी से कुछ मिलना है तो ठीक। यह सीधा रास्ता नहीं है, पर एक रास्ता ज़रूर है। इस रूप में भी वह प्रयोजनवादी है कि संस्थागत रूप से उसकी प्रेमिका के किसी की पत्नी बन जाने के बाद भी वह उस ‘भोगी गयी देह’ को स्वीकार करने को तय्यार है। कितना विशाल हृदय है हमारे नायक का। यह ‘भोगा जाना’ लिखना मेरे उतने ही पुरुष होने का सबूत है जितना सुदीप का सोचना। हम दोनों में मूलतः अंतर क्या है समझ नहीं पा रहा। क्या कोई अंतर है भी। या मैं उससे जितनी जल्दी हो सके इससे दूर हो जाना चाहता हूँ। बहरहाल इसके पीछे गंध तो कुछ ऐसी ही आ रही है जहाँ आर्थिक रूप से सबल विधवा प्रेमिका को वह सहजता से पूर्व रूप में स्वीकार कर लेगा। बाद में करे न करे अभी कह तो यही रहा है।

यह कोई शास्त्रीय उद्दात नायक की कामना नहीं एक साधारण से निम्न मध्यमवर्गीय व्यक्ति की बड़ी छोटी सी दुनियावी इच्छा है। वह बने बनाए मानकों को तोड़ रहा है। हमारे मन पर आघात करता है। मन में स्थित आदर्श हिलने लगते हैं। यह उन सभी पिछली फिल्मों की तरह नहीं हो जाती। कि प्यार कभी हारता नहीं। नहीं। वह हारता है। यहाँ हार रहा है। और जब हारता है तब उसे ऐसा ही निर्मम हो जाना पड़ता है। सारी कोमल भावनाएं कहीं उड़ जाती हैं। यहाँ परिस्थितियाँ उनके सपने को हर चुकी हैं। साथ ही यह इसकी भी कहानी है के एक जवान लड़की किसी बूढ़े की पत्नी नहीं बन सकती। वह अपने प्यार भरे दिनों को भूल भी सकती है। उन सारी शामों को अपनी याद्दाश्त से मिटाने लगती है।

पर यह उतनी ही यथास्थिति को पोषित करने वाली भी है कि कम पैसों में ज़िन्दगी ‘पीले चेहरे वाला यथार्थ’ बन जाती है और उसे वह जीना नहीं चाहता। जो जी रहे हैं वह मर रहे हैं। उनके पास कोई चारा नहीं है। लेकिन  यह उतना ही सच है जितना सतह पर तैरता लगता है। नीचे कई संरचनाएं अपना काम कर रही हैं जो इसे बस इतना सरल नहीं रहने देती। मैं ख़ुद कितनी आसानी से अपने दिल के पास उग आए इन दोनों के प्यार के साथ को छोड़ रहा था। पर नहीं। शायद मन में खयाल फिर आ गया है के जब दोनों ने प्यार किया था तब इसे उसके मुकाम तक ले ही जाना था। मतलब यही मेरी प्यार की ‘क्लासकीय’ समझ है जो बार-बार फ़िल्म को फ़िल्म के रूप में देखने से रोकती रही और आखिर तक आते-आते बिफ़र पड़ता हूँ। फ़िर याद करता हूँ अपनी ही देखी हुई कई सारी फ़िल्में। एक एककर सोचे जा रहा हूँ जैसे।

सितंबर 22, 2013

इस तस्वीर में सबसे पीछे होने की थियरी


कभी-कभी पुराने दिन आकर ठहर जाते हैं। और ठहर जाते हैं हम। उनमे हम हैं। कुछ दृश्य हैं। कुछ आवाज़ें गायब सी हो बाहर खड़ी हैं। हम भी बोल नहीं रहे हैं। बस देखे जा रहे हैं। देखना लगातार बदलता रहता है। उसमे बदलते है दिन। हम सोचते नहीं हैं। पर ख़याल ख़ुद आकर पूछते हैं। के कैसे दिन थे। उनकी याद दिल के कोने से निकल सामने आ जाती है। धीरे-धीरे उनका होना किसी किताब के पीले होते पन्नों की तरह अपने अंदर घुलने लगता है। घुलना दिखता नहीं। पर होता हमारे आस पास ही है। पता नहीं कैसे उन सड़कों को बीतती शामों के हिस्से से निकाल लाया..

इधर बराबर कई-कई सीन कट-टू-कट दिखते रहे हैं। उनका होना मेरे होने जैसा है। जैसा तब था। अब कैसा हूँ। थोड़ा बहोत कितना बदला हूँ, लगातार पैमाइश होती रही है। खोह से निकलना किताबी समझ से निकालने जैसा है। ज़िन्दगी से लेकर प्यार मोहब्बत तक पर किन्ही दूसरों के अनुभवों से ख़ुद के होने को कब तक ढोते। ऐसा ढोना बोझ लगता है और जितनी जल्दी हो सके इसे उतार फेंकना चाहिए। खेत में जोत दिये गए बैल की तरह घाम में नहीं बने रहना।

ज़िन्दगी जितना जी नहीं रहे थे उससे जादा ‘थियराइज़’ कर रहे थे। कि उस छोटे से कमरे वाले घर में कैसे शादी के बाद रहेंगे। कैसे वह नयी आने वाली काया अपने को वहाँ ‘अडजेस्ट’ करेगी। दिन कैसे भी हों, रातें कैसी होंगी। यह परेशान करने वाले सवाल थे। जिनपर सोचने का मन कभी हुआ तो हर बार उदास हो गया। उस मेज़ पर रखी किताब की तरह जिसे उठाने की जहमत कभी की ही नहीं। जब की तब उन्हे लौटाने की तारीखें पास आ जाती। और इतनी जल्दबाज़ी में कुछ भी सोच कहीं पहुँचने के बजाए वह उलझी जादा हैं। हर बार। अभी भी इतने क़ाबिल हो भी सके हैं कि इन सवालों से ख़ुद को 'रिलेट' कर सकें। कह नहीं सकता। कभी होगा तो लिख दूँगा।

पर यह बिलकुल सच है के कभी मुक्त होकर प्रेम भी नहीं कर सके। क्योंकि उन किताबों के ऊपर चढ़कर बैठ चुके थे। वही दिमाग पर चढ़ी रहती और उन्होने कभी ख़ुद से आगे बढ़ने की हिम्मत दी नहीं। या ऐसे कहूँ ख़ुद में यह हिम्मत कहीं से आ ही नहीं सकी। फ़िर यह भी याद नहीं आता कि हम इस जैसे किसी भी अनुभव से दुतरफ़ा गुज़र रहे हों। अकेले हरारत को महसूसते रहने की दरमियानियों में किसी तरह साँस ले पारहे थे, यही काफ़ी था। इस ‘फ़्लैशबैक’ ‘बैक्ग्राउण्ड’ की ‘स्कैफ़-होल्डिंग’ के साथ जीते मरते ख़ुद से ख़ुद की पहचान बढ़ाने का मौका लिए यह तस्वीर वाली जगह आई। रोहतांग के आस पास कहीं की है। साल दो हज़ार नौ। महिना अक्टूबर।

इस तस्वीर में सबसे बाएँ मैं खड़ा हूँ। मफ़लर गले में न होकर कानों को ढके हुए है। गले पर शाल है। जैकेट के अंदर ‘थर्मोकॉट’ भी पहने हुए हूँ। बर्फ़ की शक्ल में ठंड दिख भी रही है। जानता हूँ इस तरह स्मार्ट तो बिलकुल भी नहीं लग रहा। पैंट पहाड़गंज के दर्ज़ी ने मन लगाकर पैजामे की तर्ज़ पर सिल दी थी। कुछ कहते तब भी यह अमिताभ की ‘बेलबॉटम’ होने से रही। इसलिए कुछ कहे बिन अपने कपड़े वहाँ से उठा लिये थे। कपड़ों को लेकर ‘कुन फ़ाया टाइप’ विचार रणबीर की ‘रॉकस्टार’ आने से कई साल पहले ही ‘अंतर्भुक्त’ कर चुका था। इसलिए अजीबो गरीब दिखने में कोई टेंशन न थी। जिसको जो भी लगना हो लगता रहे। यह भी उसी सैद्धांतिकी का एक पक्ष था। कोई फ़र्क न पड़ने वाला।

इतनी रात गुज़र जाने के बाद जब घड़ी ढाई और तीन के बीच रुक सी गयी है ठंडी हवा बगल से गुज़रते हुए कान में कुछ कहते हुए झींगुर की आवाज़ के पास ले आई है, तब सोचता हूँ, इतना इत्मीनान कहीं नहीं था। लिखने में अजीब तरह की बेचैनी तैरती रहती, जो कहीं बैठती नहीं थी। न बैठ कुछ सोचने के क़ाबिल रखती थी। यह अकेलापन अंदर तक तोड़ता जा रहा था। इसे किसी भी तरह आज पारिभाषित करने का मन नहीं होता। बस एक ऊब सी होती थी। ऊब होती थी यह लिखने में कि हम भी हाँड़ माँस की देह को ढूँढ रहे थे। जिससे कुछ देर बोल बतला सकें। उसे अपना कह सकें। राकेश इसे कहता ‘भावनाएं अशरीरी भले होती हों परन्तु उनकी जीवन्तता और उर्जा तो शरीर ही महसूस करता है। अपनी स्थूल अभिव्यक्ति में वो शारीरिक है। तुम्हारी इस अतिवादी धारणा से मैं सहमत नहीं हूँ कि ‘प्रेम अशरीरी होता है’। मेरी समझ से इसे, छुआ जा सकता है, और नहीं छुआ जा सकता है, का द्वंद्व कहा जा सकता है’।

पता नहीं आज इन पंक्तियों को पढ़ मुझे कैसा हो जाना चाहिए। पर तब एक स्तर पर किसी विपरीतलिंगीय अनुभूति को महसूसते वक़्त देह बीच में नहीं लाता था। आकर्षण का हेतु इस तक पहुँचने का प्रयोजन कभी न बन सकी। अपने आप में यह लिखना ख़ुद को कई संभावित आरोपों से मुक्त कर लेने के लिए गढ़ ली गयी ढाल है। पर क्या करूँ ख़ुद को बचाना भी तो है। फ़िर ऐसी बहुत सी बातें हैं जो अभी भी चल रही हैं। कई बातें हैं, जो रही जा रही हैं। पर रात जादा हो गयी है। सोने जा रहा हूँ। उन्हे भी कभी कह दूंगा। बस अभी तो यही सोच रहा हूँ एक तस्वीर मुझे कितना पीछे खींच ले गयी। इसने किन बातों को कहने का बहाना बनाया। किन्हे जान बूझकर रहने दिया। पर बात सिर्फ़ इतनी ही नहीं है जितनी लिख भर दी हैं। मेरे आज में इनकी स्थिति कैसी है यह भी मार्के का सवाल है। 

बहरहाल..वह सब फ़िर कभी..

सितंबर 21, 2013

दिल तोड़ देने वाली फ़िल्म..

शायद बहुत पुरानी बात है कॉलेज से लौटते वक़्त ‘रीगल’ पर बस के धीमे होते ही उतर लिया। आहिस्ते से सड़क पार कर पालिका में एक फ़िल्म ढूंढ रहा था। कई लोगों को नाम भी लिखवाया था। कहा था अगली बार आऊँ तब तक लाकर रख लेना। इसके बाद तो कईबार गया। पर उसकी सीडी मिली न डीवीडी। हरबार पूछता। हर बार वही जवाब। अभी नाख़ुन काटते वक़्त बिलकुल यही सब दिमाग में चल रहा था। फ़िर कल दोपहर जैसे-जैसे फ़िल्म आगे बढ़ती जा रही थी लगा जैसे कुछ अंदर टूट रहा है।

सुदीप और छाया। दोनों एक ही दफ़्तर में टायपिस्ट हैं। छाया नयी नयी आई है। सुदीप पुराना है। दोनों के पास एक दूसरे के निकट आने के कई मौके हैं। कई गलतियों पर दोनों एक साथ हँसते हैं। कई बार दफ़्तर के बाद साथ-साथ वक़्त भी बिताते हैं। कई सपनों को साथ देखने के दिन अभी शुरू हुए हैं।

प्यार कुछ-कुछ ऐसा ही रूमानी-सा करता जाता है। यह धोखे में रखता है या सपनों के पास ले आता है तब कोई कह नहीं सकता। यह दोनों भी नहीं कह सकते थे। बस देख रहे थे एक सपना। ज़िंदगी साथ बिताने के लिए यह सपना था घर का। नौकरी है इसलिए पहला सपना नौकरी के बजाए सिर पर एक छत का है। सुदीप बंबई की किसी ‘चॉल’ में रहता है। छाया भी ऐसी ही किसी रिहाइश में रहती है। दोनों वर्गीय दृष्टि से समान हैं। पैसा उतना ही कमा पाते हैं जितने से पेट भर जाये। सपनों को भरने के लिए लड़ना होगा हिम्मत करनी होगी। यह हिम्मत ज़ुर्रत भी हो सकती है।

इधर उधर कर इस सपने की पहली किश्त सुदीप के जिम्मे आती है। पर इन दोनों का प्यार इस ज़ुर्रत की पहली किश्त अदा करके अपनी हिम्मत हार जाता है। जो पैसे सुदीप ने कहीं-कहीं से इधर-उधर जुगाड़ करके इकट्ठा किए थे, उन्हे मकान दिलाने का वादा करने वाला लाला लेकर भाग जाता है। साथ ले गया इनका बंबई जैसे शहर में अपने घर का सपना। इसी आघात से साथ रहने वाला दोस्त किसी चलती गाड़ी के चलते पहिये के नीचे अपना सिर देकर आत्महत्या कर लेता है। दोनों साथ टूट रहे होते हैं। दोनों को एक दूसरे को संभालना है। यह मुश्किल दिन हैं। दोनों साथ रहेंगे तो कट जाएंगे।

जितना मैं फ़िल्म देखते इनके साथ जुड़ रहा था उतना ही आगे बढ़ती कहानी अपना दम तोड़ती जाती है। मेरी एक नहीं सुनती। कभी तो बीच में लगता है यह किसी ऐसे व्यक्ति ने लिखी है जिसने ख़ुद कभी प्यार ही नहीं किया। मेरे लिए कहानी उसी क्षण उसी पल ख़त्म हो जाती है जब सुदीप छाया से ‘पीले चेहरे वाले यथार्थ’ पर बड़ी निर्ममता से अपने हिस्से की हारी हुई लड़ाई कहता जा रहा है। वह नहीं चाहता के छाया हाथों में पेट लिए घूमे और वह पेट पर हाथ रखकर। पर इसके लिए वह कर कुछ नहीं रहा है। वह बस किसी सीढ़ी को तलाश रहा है।

यहाँ प्यार नहीं रह पाया। सुदीप अपने हिस्से का प्यार हार रहा है। हार चुका है। उसे हारता हुआ देखता रहा। उसे ऐसा देख दुखी होता जा रहा था। मन करता है खींच के एक झापड़ दे मारूँ। पर नहीं, मैं वहाँ नहीं हूँ। मैं इस तरफ़ हूँ। प्यार को बचाए रखने के लिए दोनों लड़ते नहीं हैं। बस चुपके से हार मान लेते हैं। बड़ी बेरहमी से वह इस ‘वर्गीय व्याख्या’ में अपना दम तोड़ देता है। दो कमज़ोर लोग मिलकर एक सपना पूरा नहीं कर पाये।

शायद मेरे पास प्यार की ‘क्लासकीय समझ’ हो जिसपर इन दोनों को बराबर कसता जा रहा था। दोनों अपने साझा सपने को पूरा करने की कोई भी कोशिश नहीं करते, यही बात दिल में गाँठ की तरह उभर जाती है। पता नहीं शुरू से ही यह हारी हुई लड़ाई की तरह लगने लगती है। सोच नहीं पाता ऐसा क्यों होता जा रहा था। ख़ुद उन दोनों को कैसा लग रहा होगा। जिसके साथ आने वाले कल में शामें बुनी थी उन्हे अपने हाथों से उजाड़ते हैं। बिन बोले। बिन सुने।

वह लड़की जानी पहचानी नहीं थी पर अच्छी लग रही थी साड़ी में। पर प्यार को ऐसे मारता देख बार बार किसी बुरे सपने से गुज़र रहे होने का एहसास हो रहा था। कि सपना है, टूट जाएगा। पर टूटा मैं। लगा इस प्यार के लिए कम होती जा रहे समय में कोई तो होगा जो उसके लिए लड़ेगा। पर नहीं। फ़िर लगा जब इस प्यार को जिंदा रख पाने का बूता नहीं था तब इस सपने को दिखाया क्यों। पता नहीं बनाने वाले ने क्या सोच मोदी एंड मोदी कंपनी वाले से छाया की शादी करा दी। लगा कहानी ‘पढ़ो गीता बनो सीता’ वाले ट्रैक पर दौड़ने लगी। ‘वो सात दिन’ से कई साल पहले आई फ़िल्म..

सितंबर 17, 2013

तीन साल बाद आज यह तीसरा साल

समझ नहीं पा रहा आज मुझे कैसा हो जाना चाहिए। पूरा दिन आत्ममुग्ध रहना चाहिए या आत्मालोचन वाली शैली ओढ़ लेनी चाहिए। जो भी हो इत्मीनान से रुककर कुछ देर ठहरने इतराने का मन भी करता है। फिर अगले ही पल सुस्ताने को हो आता हूँ। थोड़ा जी उन बीत गए दिनों में वापस टहलने को करता है। कैसे अजीब से दिन थे। अभी भी कुछ जादा दिन हुए नहीं हैं फ़िर भी इस ब्लॉग को बनाने के दरमियान अंदर बाहर आते जाते भावों से फ़िर गुजरना चाहता हूँ।

रुक कर देखूँ तो कभी सोचा नहीं था, कहाँ के लिए चलें हैं। बस चल दिये थे। इन बीतते सालों में कई कई दिन ऐसे भी आते जब न डायरी में कुछ लिखता न यहाँ आता। यहाँ आना बराबर अपने अंदर के खालीपने को भरने जैसा है। कुछ प्यार भरे सपने हैं जिनके पीछे भागा रहता हूँ। उनके बनने बिगड़ने में अंदर तहों तक टूटना बिखरना भी लगा रहता है। सबकी याद साथ है। कुछ पीछे कहीं सुस्ता रहे होंगे। कुछ की उमर हो गयी होगी। कुछ थक गए होंगे।

जितना अपने अकेलेपन में शिद्दत से लिखने को महसूस करता, उतना सुकून कोई और बात देती नहीं लगती। यह मेरी खुद से बातचीत ही तो है। पर फ़िर कभी लगता है यह लिखना अपने आपको दोहराने जैसा है। जिसे कहीं आने वाले कल सड़क किनारे किसी सुनसान पुलिहा से गुजरते वक़्त याद कर होंठों पर मुस्कान तैर जाए। आँखों की चमक बढ़ जाए जैसे।

इसमे कई शेड्स भी लगते हैं। और जिसे ‘स्टाइल’ कहते हैं उसके साथ जिसे ‘ढर्रा’ कहते हैं कहीं न कहीं वह भी बनता रहा है। हम इन सालों में यहाँ लिखते लिखते इतने भी पुराने नहीं हुए जो हम उस बने बनाए ‘पैटर्न’ को ही ‘रिपीट’ करते रहें। मन होता है भाग लेने जा। कुछ साल ऐसे हैं कुछ उमर ऐसी है। कभी अपनी ही पुरानी पोस्ट पर लौटता हूँ तो यक़ीन नहीं कर पाता के ऐसा भी लिख लेता था कभी। ऐसा लिखते हुए जो अंदर तक भर जाना है उसे साँसों के साथ धड़कते दिल के साथ बहते हवा के झौंकों में खिलते फूल बन जाने का मन करता है। मन करता है उड़ जाऊँ। कहीं दूर से अपने आपको लिखता देखूँ। एक दुनिया मेरे इर्दगिर्द भी घूमा करती है।

इस छोटी सी बसावट में कभी लगता है बने बनाए खाँचे साँचे अपना काम कर रहे होते हैं। उनका वहाँ होना मेरे होने को अपदस्थ करता सा है। पर उससे लड़ता हूँ। उसे तोड़ बाहर आने की छटपटाहट किसी और को महसूस होती हो, न होती हो, पर उसका ऐसा होना लगातार मुझे तोड़ता रहा है। उससे लड़ता हूँ। लड़ते-लड़ते उसे इतनी बुरी तरह पछाड़ना चाहता हूँ के वह कहीं न रहे। फ़िर ठहर कुछ देर रुक सोचता हूँ तो लगता है काफ़ी हद तक उससे जूझने के बजाए उससे बचने के रास्ते पर चल निकला हूँ। पर यह ‘एस्केप रूट’ काम करता नहीं लगता।

उस ‘सामाजिक’ को पीछे ढकेल जितना ‘व्यक्तिगत’ होता गया हूँ उतना कभी नहीं था। ‘लिखने’ का भी ‘डर’ होता है जैसा ‘विचार का डर’ होता है। हमारे लिखे से जो छवि जा रही है उसमें हमारे व्यक्तित्व का कितना प्रतिशत कितना प्रक्षेपण होगा इसका चयन कई लेखक बड़ी सावधानी से करते हैं। कई के अवचेतन इस ज़िम्मेदारी को निभा रहे होते हैं। अपन कभी ऐसा सोच नहीं पाये। बस उस स्वीकृत मानक वाली अवधारणा पर बराबर चोट ज़रूर करते रहे। किसे यहाँ जाना है किस सीमा तक शब्दों को सार्वजनिक करना है यह सब अपने आप होता रहता है।

तो आज भी कई ऐसे विषय हैं कई ऐसी बातें हैं जिन्हे वह आग्रह पूर्वाग्रह आने से रोकते रहे हैं। कई कई चीज़ें लगातार दिमाग में तो चलती रहती हैं पर यहाँ उतर नहीं पाती। जैसे किसी नयी जगह को घूम कर आने के बाद लिखने का मन तो होता है पर वही उनही साँचों में ढलकर वह सब पुरानी आकृतियों में तब्दील होते जाते हैं। यह चुक जाने जैसे भाव के करीब है, पर ऐसा है नहीं। यह सबसे बड़ी हार जैसा तो है पर कुछ नए की गुंजाइश ही मुझे बचाए हुए है।

जैसा आज लिख रहा हूँ पता नहीं कैसा है। उसका मूल्यांकन करने के लिए मेरे पास फ़िलहाल एक ही विधि है आत्मसंतुष्टि। कुछ दोस्त भी हैं जो कभी कभी बताते रहे हैं। कुछ कुछ कहते रहे हैं। भले वह हमेशा सामने नहीं आते हों पर बने हुए हैं। पता नहीं वह मुझे पढ़कर कैसा सोचते होंगे। कभी लगता है उनके लिए लिखता भी नहीं हूँ। यहाँ बस ‘मैं’ हूँ। यह ऐसे होते-होते मेरा ‘क्ंफ़र्ट ज़ोन’ है, उनका कितना होगा मालूम नहीं। उन्हे यहाँ आकार कैसा लगता होगा कह नहीं सकता।

कई बार इसे इसकी बनी बनाई सीमा के पार ले जाने की कोशिश ज़रूर करता हूँ। लोग पहले चिट्ठियाँ लिखा करते थे। अब मन में कोई बात तुम्हें कहनी है या कभी ख़ुद तुम ही आजाती हो तो ख़त नहीं लिखता। सीधे तुम्हारे इनबॉक्स में लिंक डाल देता हूँ। कि चिट्ठी आई है। पढ़ लेना। पता नहीं यह कैसा होते जाना है। इस तरह का मिलना भी अजीब किए देता है। तुम भी यहाँ पढ़ कैसी होती जाती होगी। पता नहीं। पर कुछ है जो जोड़े हुए है। बेतार।

बस आज भी सहज हो जाने की कोशिश लगातार करना चाहता हूँ। आज भी सहज हो जाना चाहता हूँ। भाषा के स्तर पर ही नहीं व्यक्ति के स्तर पर भी। सबसे सरल होकर मिल सकूँ। पता नहीं जितना ऐसा सोचता हूँ, उसमे कितना कहाँ तक पहुँच पाता हूँ। देखते हैं। यह तीसरी सालगिरह बस सारा दिन यही सब सोचते बीनते बुनते निकाल गयी। कई सपने हैं। कई ख़्वाब हैं। उन्ही के सहारे चल रहा हूँ। उनमे से एक यह भी है। हमारा तीन साल का ब्लॉग।

*** 
बीती दो जमा दो, पाँच सालगिरहें। पहला सालदूसरा सालसाल चौथापाँचवा साल

सितंबर 16, 2013

लाद दिया गया दिन और बेचारा मास्टर

लगातार लिखना टालता रहा हूँ। इसपर लिखने का मन ही नहीं होता जैसे। किस बारे में लिख रहा हूँ। एक दिन है, बीत जाएगा। हमारे कहने लिखने से कुछ होना जाना तो है नहीं। कोई कुछ हर्फ़ पढ़ लेगा बस। या हो सकता है जो सपना इस शहर में टूटता लग रहा हो, कहीं किसी कोने में इसी के सहारे कोई अपने हिस्से के सपने बुन रहा होगा। दिन कुछ खास नहीं है ‘शिक्षक दिवस’ ही तो है। सबसे बेचारगी भरा पेशा। कोई पूछे और बोल दो क्या बनोगे- मास्टर..!! थूक जीभ से होता हुआ गले तक आता है और आती है हिकारत। वहीं कहीं किसी फंसी हुई फेंच हो जैसे। फिचकुर भी हो जाए तो कोई आश्चर्य नहीं। 

सच कहूँ तो दिन बीतता जा रहा था और अंदर ही अंदर कहीं डूबता जा रहा था। फ़ेसबुक पर कई-कई बातें हो रही थी। मैंने किसी भी तरह से ख़ुद को किसी के सवाल जवाब के लिए तय्यार नहीं किया।

उनके सवाल भारी भरकम अपेक्षाओं से भरे हुए थे। कहीं भी किसी भी विचलन के लिए कोई गुंजाइश नहीं रख छोड़ी थी। मन में सवाल आया के जो भी यह सब पूछे जा रहे हैं, बघार रहे हैं उनके सवाल मूलतः किस शिक्षक से हैं? उनकी परिभाषा औपनिवेशिक सत्ता के बाद अस्तित्व में आए कमज़ोर से स्कूली मास्टर के ही है तो क्यों हैं? इसका छटांक भी विश्वविद्यालय के मुटाते किसी भी प्रोफ़ेसर से क्यों नहीं है। ज़िम्मेदारी को इस रूप में बताने वाले, यह सब पूछने वाले इस उत्तरदायित्व को वहन करने में असमर्थ क्यों हैं या यह उनकी कम हिम्मत का नतीजा है, जो उन्हे किसी भी कटघरे में खड़ा करने का बूता नहीं रखता। निजी विद्यालयों के शिक्षक किस तरह से इन सारे सवालों संदेहों संशयों जिज्ञासाओं से परे मान लिए गए हैं। उनकी तरफ़ उंगली उठाने से पहले ही वह टूट क्यों जाती है। क्या उनके हिस्से राष्ट्र का यह हिस्सा नहीं पड़ता।

इन सवाल पूछने वालों के साथ दिक्कत है भी है कि यह लोग आज भी किन्ही पीछे बन गए आदर्शों में पड़े बजबजाना चाहते हैं। एक स्कूली मास्टर, जिसकी औकात बात-बात पर बना बनाया अपरिवर्तनीय ढाँचा बताता रहा है; उसकी आँखों को यह किसी राष्ट्र के निर्माण का सपना देखने को अभी भी मजबूर करते रहना चाहते हैं। यह एक तरह से अतीतोन्मुखी होते जाना है। यह सब उससे अपेक्षा तो ख़ूब रखते हैं पर कभी ऐसे मौके भी तो आने चाहिए जब यही सवाल पूछने वाले इन रिरियाते अध्यापकों के पीछे खड़े नज़र आयें। चलिये एक क्षण के लिए यह भी मान लेते हैं कि इन लोगों कि आदत ही सवालिया निशान खड़ा करने की है। तब दूसरे हिस्से के सवाल कहाँ हैं जो उन्हे सत्ता से पूछने हैं। वह क्यों एक एककर अपने कदम इस ‘विशालकाय तंत्र’ से पीछे खींचती जा रही है। इसने कभी इसकी गिरती साख को बचाने के लिए क्या किया। अगर वह इसके प्रति गंभीर नहीं है तो उन्हे यह साफ़-साफ़ दिखना चाहिए कि वह इसकी विश्वसनीयता को इतना संदिग्ध बना देना चाहती है कि सिरे से वह इस पूरी व्यवस्था को निजी उपक्रम बना अपनी सारी जिम्मेदारियों से मुक्त होना चाहती है।

अभी जब आलोक ने इसी दिन को लेकर आज जो पोस्ट बनाई तभी से अपनी यादों में खो गया के यह दिन मेरे हिस्से कभी आया ही नहीं। हमारे हिस्से उनके फ़ोन कॉल नहीं हैं। न किसी भी तरह की शुभकामनायें उस दिन हमारा इंतज़ार कर रही थीं। वह उनके लिए सिर्फ़ सिविल ड्रेस में पुराना किला का दरवाज़ा आसानी से लाँघ जाने का दिन भर है। मेरे हिस्से अपने छात्रों से किसी भी तरह की अपेक्षा नहीं जुड़ी हुई है। बस इतना ही सोच पाता हूँ के जिस भाषा को विषय के रूप में पढ़ा रहा हूँ उसमे खुद को अभिव्यक्त करने में कभी भी हिचकिचाएँ नहीं। इस भाषा में सोचने समझने की क़ाबिलियत बढ़े। और कुछ नहीं। शायद यह भी मैं जादा सोच रहा हूँ।  वैसे भी वास्तविकता वस्तुनिष्ठ नहीं व्यक्तिनिष्ठ होती है। जो शीला दीक्षित के लिए दिल्ली मेट्रो में विकास का एक पैमाना है वही कक्षा बारह का निन्यानवे दशमलव चार प्रतिशत परीक्षा परिणाम यहाँ किसी भी शिक्षक के लिए किसी भी तरह की उपलब्धि नहीं है। उन्हे पता है हम एक बहुत बड़ी ‘सरकारी आँकड़ा सुधार योजना’ के तहत अपने ‘डेटा’ को ‘मैंटेन’ कर रहे हैं बस। हमें भी अपने ऊपर लिए क़र्ज़े की सही कीमत लगानी है। हमने शिक्षा में यथास्थितिवादी मॉडल को अपना लिया है। जो जहाँ है, वहीं बना रहे। उसका वहाँ से तनिक भी खिसकना कई-कई प्रत्याशाओं को पानी पिला सकता है।

हो सकता है यह सब लिखा किन्ही विद्वानों को अवसाद व निराशा से ग्रस्त व्यक्ति के विचार लगें जो किसी भी सकरात्मक सम्भावना को मानने से इंकार कर रहा है। बराबर हिज्जे जटिल होते गए होंगे। वाक्य संरचना इतनी सरल नहीं रह गयी होगी। उन्हे बार बार समझने के लिए पिछले वाक्य पर जाना पड़ा होगा। पर क्या करूँ तभी यह सब लिखना टालता रहा पर आज रहा नहीं गया। अभी ‘लॉगआउट’ ही हुआ था के उसके ‘होमपेज’ पर एक विदेशी कंपनी के विज्ञापन को देख ठिठक गया। सरकारी गाड़ी से आई महिला अध्यापिका विदेशी कंपनी के वीज़ा डैबिट कार्ड से इसी शिक्षा को उन सारी सखियों को यह बतला रही है के वे पढ़ लिख जाएंगी तो सखी सारे खाली कुएं भर जाएंगे। कैसे भरेंगे वह इसका 'स्वदेश' नुमा जवाब नहीं देती पर शिक्षा के जिम्मे एक और सपना लद जाता है। और मेरे कंधे थोड़े और झुक जाते हैं।

सितंबर 14, 2013

हिन्दी दिवस के बहाने कुछ फुटकर विचार

सुबह से समझने की कोशिश में हूँ के आज के दिन में ऐसा क्या है कि पिल पड़ूँ। अगर बचपन से ‘हिन्दी’ ही बोल रहा हूँ तो क्या मुझे इस ‘भाषा’ से प्रेम भी करना होगा। कुछ हद तक करता भी होऊंगा। भले यह चुनना मेरी इच्छा से नहीं था। यह उस परिवेश की स्वाभाविक गति थी, जिसके इर्दगिर्द इसने मुझे गढ़ा। सवाल यह है कि अगर इस ‘भाषा’ को संस्थागत रूप में न पढ़ता, तब क्या, मेरे हिस्से यह सवाल होते भी। जिस हिन्दी में सोच रहा हूँ, लिख रहा हूँ या किताबें पढ़ रहा हूँ उस ‘हिन्दी’ के लिए मुझे ख़ुद को कैसा कर लेना चाहिए।

यहीं वह बारीक रेखा है जहाँ उदय प्रकाश ख़ुद को हिन्दी का लेखक मानने से इंकार कर देते हैं। पर इसका अंतर समझे बिना मैं ऐसा नहीं कर सकता।

थोड़ा पीछे से देखता हूँ तो नज़र आते हैं फोर्ट विलियम कॉलेज के लालू लाल, सदलमिश्र से लेकर नागरी प्रचारणी सभा और रामचंद्र शुक्ल। वे जिस भाषा को स्थापित करने में लगे थे, ‘नयी चाल में ढला’ हुआ मान, ऐसी ही रेखा को बना रहे थे, उसे इन लोगों ने ‘किताब’ की शक्ल दी।

कैफ़ी आज़मी इसी किताब को पढ़ने के लिए अस्सी के दशक में एक गाना बनाते हैं। मेहनत करने वाला भी पढ़ना लिखना सीखे। मतलब यह एक अर्जित किया जाने वाला कौशल है, जिसे सयास खुद से जोड़ना पड़ता हैं। इससे उन्हे जोड़ेगा एक तंत्र। प्रौढ़ साक्षारता। पढ़ना लिखना सीखना साक्षारता की एक परिभाषा में उन्हे अटाएगा। कि इतनी उम्र हो जाने पर भी इस जातिगत समाज ने उन लोगों को कभी भी उस चौहद्दी के अंदर नहीं आने दिया। अब सरकार उन्हे अवसर दे रही है। कितना अजीब है न जो लोग बोल लेते हैं उन्हे लिखना सीखना पड़ता है। इसका मतलब यह भी है के जिसने भी लिपि की खोज की होगी वह समाज किनही दूसरे समाजों पर अपना वर्चस्व स्थापित करना चाहता होगा। वर्चस्व इस रूप में कि लिखित रूप में वह अपने लिए कुछ सलाहियत सहेज कर रख लेना चाहता है जिनपर सिर्फ़ उसका अधिकार हो। बोले हुए शब्द तो सबके लिए उतने ही सार्वजनिक हैं, जितनी निजी वह किताबें।

बहरहाल वही भाषा ‘सत्ता विमर्श’ की बासी बातों से पंक्तियाँ नहीं भरना चाहता। बस जितनी भी समझ इन बीतते सालों में बनी है वह यह कि लिपि भाषा का लिखित रूप भले हो पर इसने कई सारी आवाज़ों को अपने भीतर से बेदख़ल किया है। वह भले ही पुरातात्विक महत्व की तरह अपना स्थान बनाने में सफल हुई हो पर कहीं न कहीं बराबर दया पवार की कविता शहर  खींचे लेती हैं, भले उनकी अभिधा की लक्षणा व्यंजना आगे तक जा रही हो पर इस दिन के लिए भी इन पंक्तियों के कई-कई तर्जुमे हो सकते हैं, कई-कई पाठ निकल सकते हैं:

एक दिन किसी ने बीसवीं सदी के एक शहर को खोदा और अवलोकन किया
एक दिलचस्प शिलालेख विवरण इस प्रकार था:
"यह पानी का नलका सभी जातियों और धर्मों के लिए खुला है".
इसका क्या मतलब रहा होगा:
यही न कि यह समाज बँटा हुआ था?
उनमें से कुछ की स्थिति ऊँची थी और बाकी की नीची?
ठीक है, फिर तो यह शहर दफ़न होने लायक ही था-
तो फिर लोग इसे मशीन युग क्यों कहते हैं?
यह तो बीसवीं सदी का 'पाषण युग' प्रतीत होता है.

भाषा के जिस रूप को वह ‘हिन्दी’ कह रहे हैं और जिन रूपों को हम ‘हिन्दी’ कह रहे हैं उनमे भी मूलभूत अंतर बराबर बना बना है। बिलकुल वैसा ही जैसा ‘मौखिक’ और ‘लिखित’ में है। जैसा ‘बोली’ और ‘भाषा’ में है। सत्ता जिस भाषा को लेकर पखवाड़े आयोजित करती रही है, शिक्षण संस्थान जिस हिन्दी को लेकर इतने मुग्धाभाव से हिन्दी दिवस मनाती है; वहाँ किसे हिन्दी कहा जा रहा है यह रेखांकित करना चाहिए। क्या उनमे ऐसे दरीचे हैं जो बोली विशेष के शब्दों को अपने अंदर समाहित करते हैं। साँस लेने की जगह भी है। नहीं है।

फ़िर यह कैसे मान लूँ कि वह फ़िल्मों की, उसमे बजते गानों की, टीवी पर प्रसारित विज्ञापनों की, समाचार पत्रों की भाषा के लिए भी यही दिन है। जो इसे जोड़कर चौदह सितम्बर को देख रहे हैं पता नहीं किस दृष्टिदोष से ग्रस्त हैं। उन्हे बस यह छोटी सी बात समझनी चाहिए कि इस हिन्दी के बुनियादी ढाँचे को बदलने के पीछे जितने कारगर विभिन्न संस्कृतियों के बीच के अंतरावलंबन परिवर्तन हैं, उससे कहीं जादा आर्थिक हैं। बस इस बीच हुआ यह है कि यह हिन्दी उस अँग्रेजी की तरह इस समाज में निर्णायक रेखा नहीं बन सकी है जिसके नहीं आने से आपकी आर्थिक और सामाजिक गतिशीलता पर कुछ फ़र्क पड़ने वाला।

और जहाँ से शुरू हुआ था वहीं वापस आऊँ तो कई सवाल भी भी वहीं हैं। पर फ़िर यही सोचता हूँ कि अपना दिन भी यहीं है, रात भी यहीं है। अपना रोज़ाना इसी में गुज़रता है। किसी मानक को अपना मानक नहीं बनाते। जीतने भी शुद्धतावादी है वह इसे संक्रमण से बचाने की ज़िम्मेदारी कमरों में बैठें निभाएँ। क्रीओल और पिजन की प्रमेय सुलझाएँ। हमारी भाषा न मर रही है, न हम मरने देंगे। कम से कम जब तक जबकि हम इसे बोलते रहेंगे। इसमे लिखते रहेंगे।

सितंबर 08, 2013

सुबह की धीमी सी कमज़ोर सी शुरवात..

इतवार। सुबह के आठ बज रहे हैं। अभी नहाया नहीं हूँ। बस उठे एक घंटे से कुछ जायदा हो गए हैं। पता नहीं क्यों यह दिन और दिनों से काफ़ी बड़ा लगता रहा है। जबसे सुबह होती है पता नहीं क्या-क्या करने के इरादे बनते बिगड़ते रहते हैं। शाम ढलते उनमे से कितनों को किनारे कर पाता हूँ, वह अलग बात है। पर करने से पहले सोचना पहली सीढ़ी है। तो इस सीढ़ी पर चढ़ते ही लगा दिमाग भिड़ाने। पर रुक गया। दिमाग ठीक से काम नहीं कर पा रहा। थोड़ी देर रुक देख लेना चाहता हूँ क्या गड़बड़ है।

गड़बड़ आज की गरम सुबह में है जो इसे ठंडा नहीं रहने दे रही। कल शाम भी इसी तरह परेशान करती रही। हवा पेड़ों के ऊपर से भी नहीं गुज़री। आसमान में बादल रुके-रुके ताकते रहे। कि अब तो हम भी चल पड़ें। पर नहीं। वहाँ कोई डोर नहीं थी जो उन्हे कहीं खींचे ले जाये।

अभी बीते परसो फ़िर एक दोस्त ने कहा दिल्ली का दाना-पानी दिसम्बर तक। उसके बाद अपने घर। वापस। थोड़ा और अकेला होते जाने में ठहरा सा मैं कुछ भी करने की स्थिति में नहीं हूँ। बस थोड़ा उन दिनों को याद कर लूँगा जब साथ बैठे बातों के बाद जाने का वक़्त होता था। कभी किसी किताब पर रुके से अज्ञेय और मुक्तिबोध पर बघारते। ‘शेखर: एक जीवनी’ की कितनी ही बार तुमने बात कही। पचौरी की भाषा जितनी उलझी सी है उससे कहीं अधिक उनके विचार हैं। घबराओ मत तुम्हारा नाम नहीं लिखने वाला। बस उन मुलाकातों की किश्त पर कभी लिखने की भूमिका ज़रूर बना रहा हूँ। और लिखा भी तो ‘एफ़बी इनबॉक्स’ में शेयर करूंगा। ‘वॉल’ पर नहीं।

पता नहीं हर प्रवासी के लिए अपने मूलस्थान को छोड़ कहीं भी जाना, सपनों की जगह पर पहुँच जाने जैसा ही लगता होगा। कि यहाँ के दिन कुछ अलग हैं। कुछ है जो इंतज़ार कर रहा है। हम भी हो-न-हो एक दिन वहाँ पहुँच ही जाएंगे। तब उस पेड़ की छाव में धूप से बचते डीटीसी की बस का इंतज़ार खलेगा नहीं। यहाँ हर छह महीने में कमरे का किराया निकल आया करेगा। अब सब्जी दोनों वक़्त बना ली जाएगी। दाल भी अब बन ही जाया करेगी। फ़िर इस मकान को छोड़ देंगे। पानी नहीं आता। मकान मालिक जादा चिकचिक करता है। दो दोस्त रात क्या रुक जाएँ तो आफ़त। अब और नहीं।

पर सब ठहर जाएंगे। रुक जाएंगे। इन सबको देखने वाली आँखें यहाँ से जा रही हैं।

बराबर यही सोचे जा रहा हूँ के इस तरह क्या एक एककर सभी जाते जाएंगे। उनके सपने क्या इतने कमज़ोर थे या इस शहर में उन्हे पूरा करने का दम नहीं था। जैसे ही वह अपने घर पहुँचेंगे, उन्हे घेर लेंगे यहाँ बिताए दिन। उनमे फ़िर से जान भरने की उमर अब थोड़ी पीछे जाकर थम नहीं जाएगी। वह रुक भी जाएँ तब भी नहीं। शायद उनकी भी कोई उमर होती होगी। या कि वह हम ही होते हैं जो दिन-पर-दिन बड़े होते जाते हैं और हमारे हिस्से की मोहलत कम होती जाती है।

इन सबके बीच एक मैं हूँ जो लगातार उनके यहाँ से जाने को बस देखता रहा हूँ। आज मैं कहाँ खड़ा हूँ। एक अदद नौकरी के इंतज़ार में। इस जगह आती जाती खुराफ़ातों को उतारते। क्या कर रहा हूँ कभी समझ नहीं पाता। जैसे कल दोपहर सोचता रहा के क्या करूँ कि वक़्त उड़ जाये। कहीं किसी काम में मन सा नहीं लग रहा था। एक पल लेटता लगता दूसरे क्षण उठ बैठता। डायरी भी रोक नहीं पायी। एक डेढ़ लाइन लिखने के बाद कमरे से बाहर निकाल गया। लाइट थी नहीं। पंखा चल नहीं रहा था। सोचा ‘लैपटॉप’ में जितनी बैटरी है उससे एक फिल्म तो खत्म हो ही जाएगी। पर दस मिनट बाद ‘वीएलसी प्लेयर’ ने साथ छोड़ दिया। मतलब पूरी शाम का कबाड़ा। ज़ुबिन मेहता वहाँ शालीमार बाग में ‘कश्मीर कंसर्ट’ कर रहे हैं और हम यहाँ बैठे बस बैठे ही हैं। कुछ कर नहीं रहे हैं।

पर अभी तो पूरा दिन है कई कई बातें सोच रखी हैं। कई सारी पोस्टों को एक साथ लिखने का मन है। उस डायरी के बाकी बारह पन्नों को एक दम से भर डालूँगा। थोड़ा सो भी जाऊँ तब भी शाम एक और जगह टहलकर आ सकता हूँ। नहीं चाहता कि इस दिन का स्वाद भी ‘न्यूट्रालाइट’ के मक्खन की तरह हो जाये। अभी भी बहुत कुछ है जो दोपहर में लिखने के लिए बचा लिया है। अभी जा रहा हूँ कपड़े धोने। साबुन लगाए काफी देर हो गयी। पता नहीं चला न। कब बीच में उठकर चला गया था। यही है मेरे हिस्से का जादू।

सितंबर 06, 2013

सीधे जंकयार्ड से

छब्बीस अगस्त छह बजकर ग्यारह मिनट, साल मालूम नहीं 

कभी-कभी सब कुछ इतना साफ़ दिखाई नहीं देता। तभी लिखने से बचता रहा हूँ। कि कहीं कह न दूँ के तुम्हारा मन हो तब भी मुझसे बात न करना। नहीं कर पाऊँगा। लेकिन लिख देता हूँ और सोचने लग जाता हूँ, अपने ऐसे होते जाने को। जो भी यहाँ तक पहुँचेंगे सब जानना चाहेंगे किसकी बात कर रहा हूँ। तो दोस्तों कह दूँ इधर लगता है सपने में जी रहा हूँ। ख़ुद नहीं कह सकता क्या असली है क्या नकली। बस दो बंद आँखें हैं और एक जोड़ी कान। जो है वह बस इसी के इर्दगिर्द बुन रहा हूँ।

इतना कहने के बाद भी किसी को यह अधिकार नहीं दे रहा हूँ, के मुझसे पूछे, क्या बात है। जो बात है बस है। आगे कुछ नहीं।

हम इतने ‘स्टीरियोटाइप’ जीते हैं कि इसे किसी वियोग की स्थिति से जनित मान अनुमानों की प्रत्याशाओं में अपने को ले जाएँगे। और गढ़ लेंगे, एक तस्वीर। जिसमें एक मैं हूँ और एक तुम हो। ‘घनानन्द’ इस मामले में क्लासिक हैं। उनके जैसे बनने का शौक़ न चर्राया है न हमारी तशरीफ़ में इतना दम ही है। इसलिए इस विचार को आगे नहीं ले जा रहे।

दो सितम्बर, पाँच बजकर इक्यावन मिनट, फिर साल पता नहीं

यहाँ एक पल ठहर ख़ुद अपनी तरफ़ देखता हूँ, तो सोचने लग जाता हूँ उन दिनों मैं कैसा होता रहा था। एक लड़की थी जिसके कारण मेरे एमए में कम नंबर आए थे। ख़ुद उसका अब कहीं नहीं होना अंदर से किसी भी तरह से हरारत से नहीं भरता। तब के दिनों में हम ‘किशोरवय’ क्रियाकलाप में वक़्त बिता रहे थे। दोस्तों की जमात टूट-फूट के दौर से गुज़र रही थी। उन साझेदारियों ने तब साथ छोड़ा जब उमर के उस पायदान पर हम सबकी एक अदद प्रेम कहानियों ने हमारे दिलों में बेलें उगाना शुरू कर दिया था।

बहरहाल। हमारे लिए एक ही गम था, मोहब्बत। और एक ही राहत थी, वस्ल की राहत। मोहब्बत सिर्फ़ लड़की से नहीं थी अपनी पढ़ाई से भी थी। थोड़ा ‘करियरिस्ट’ होकर न भी सोचूँ तब भी लगता था हम इतने भी लदधड़ नहीं थे जो डेढ़ पेरसेंट से चूक गए। लड़की तो चलो ख़ैर सगाई के बाद अपने घर चली ही जाएगी। पर आज तक हम वहीं के वहीं रह गए। ढाक के तीन पात। किसी नतीजे के इंतज़ार में। ढपोरशंख।

इस फालतू सी लगती फुटेज खाने का मन इसलिए भी कर रहा है क्योंकि इस बैक्ग्राउण्ड सिचुएशन में मैं ख़ुद को ‘सिचुएट’ कर रहा हूँ। के आगे संदर्भों का संदर्भ समझने में दिक्कत न हो। वैसे भी आलतू फ़ालतू कामों में इधर मन सा लागने लगा है।

तो एक शाम कश्मीरी गेट मेट्रो स्टेशन पर अपने दिल पर बीतती अकेले इंतज़ार करती इस कहानी के बाद जिस तरह से उसने  मुझे उबारा। जिसने ख़ूब ख़ूब सपने देखे। उनके लिए वह रात रात जागा।

सितंबर 03, 2013

राकेश: जो सपनों में कहीं खो गया है

क्या जब हम सबसे जायदा कमजोर होते है तभी अपनी ज़िंदगी के सबसे खूबसूरत सपने देखते हैं, उन्हे बुन रहे होते हैं। उनके हसीन होने के दिनों का इंतज़ार कर रहे होते हैं। बड़ी आहिस्ता से उन्हे गढ़ने में हम किसी भी तरह कोताही नहीं बरतते। हम लगातार उन सपनों को साँसों की तरह अपना हिस्सा बनाते हैं। और तभी कहीं अंदर सबसे जादा टूट भी रहे होते हैं। जब एक-एक कर वह हमारे हाथों से फिसलते से जान पड़ते हैं। सपने बिखरते नहीं हम बिखरते हैं। उनके टूटने से कई घड़ियों पहले हम खुद को तय्यार करने की कोशिश करते हैं। पहली बार राकेश इन्ही उलझनों के बीचों बीच कहीं अटका सा फँसा सा मिला।

इन सपनीली-सी लगती पंक्तियों की तरह ही राकेश है। माने, तुम हो। बड़े दिनों से टाल रहा था लिखना। कई मर्तबा पूछने के बाद भी, फोन रख लिखता नहीं था। राकेश से पहली मुलाक़ात कब हुई कोई तारीख़ याद नहीं। बस एक दिन हो गयी। एक ही सेक्शन में होने ने इसे कई-कई बार होने के कई-कई मौके दिये। तब हमारे लिए एक ही गम था, मोहब्बत। और एक ही राहत थी, वस्ल की राहत।

डूबे-डूबे बुझे-बुझे से दिनों से दोस्ती। उमर का दूसरा नाम शायद अपने आस पास बनते दबाव भी हैं। जिन्हे चुनते तो हम ही हैं पर वह कभी हमारे मन मुताबिक आकार लेते दिखते नहीं। उस वक़्त हम एक गंभीर मुद्रा ओढ़ लेना चाहते हैं। कि उसका कोई नतीजा हमारी तरफ़ तो निकलेगा। पर एक लड़का जो दिल्ली रहते किसी ऊँचे आले दर्ज़े की नौकरी के लिए कुछ साल और माँग रहा था, उसे वह मोहलत नहीं मिलती। धीरे-धीरे उसके हिस्से के सपने फिसलते से लगते हैं। उनका लगना अंदर तक तोड़ देना है।

वह टूट रहा था। पर जुड़ भी रहा था। एक और स्थगित सपने ने उसे जीने का एक और मौका दिया। बहुत पुराना। लगभग उसी पहले वाले सपने के साथ का। पर उसमे वह अकेला नहीं था। वह दो थे। यह सवाल इससे बिलकुल जुदा है कि क्या सपनों की भी कोई उम्र होती है, उनकी भी कोई मृत्यु तिथि तय होती है। यह नियतिवादी हो जाना नहीं है। पर महत्वपूर्ण है कि सपने वक़्त के साथ-साथ अपना मूल्य खो रहे होते हैं। बिलकुल हमारी आँखों के सामने। इतनी पास होने के बावजूद हम कुछ करने की स्थिति में नहीं होते। हम उनका घटित होना स्वीकारने लगते हैं। अब दिक्कत है के वह सपना नहीं सच है।

कभी-कभी लगता है हम तुम जैसे कई लड़कों को इधर वामपंथी विचारधारा के टक्साल में इस्पात बनाने के लिए चुन लिया गया था। कुछ हम अपने अस्तित्व को बृहतर संदर्भों में तलाशते वहाँ जा पहुँचते हैं तो उन्हे भी उस युवावस्था का नकार अभीष्ट होता है। बनी बनाई किसी भी संरचना के प्रति अस्वीकार का आकर्षण खींचे लेता है। मुट्ठी भींचने से लेकर गले की नस उभर आने तक वाली गर्मी में बस चलते जाना। फ़िर लगता है इसने हमें ‘एडजस्ट’ होने में किसी भी तरह से मदद नहीं की। ख़ुद ऐसा सोचना उसी प्रचलित विमर्श का हिस्सा है, अवसरवादी हो जाना है। जहाँ आप अपने आने वाले दिनों में ‘आर्ट्स फ़ैकल्टि’ में पाये जाने वाले ‘मिश्रा जी’ होना नहीं स्वीकारते। यह उन विचारों से विचलन की तरह देखा जाता है।

तुम उधर रीवा के बोर्डिंग स्कूल में एक ऐसा स्पेस बनाए बचाए रखने की जद्दोजहद में लगातार लगे हुए हो जिसमे कोई किसी भी ‘काउंटर थॉट’ के लिए तय्यार नहीं है। उसके कम होने से हम भी नहीं रहेंगे। पता नहीं यह कैसा होते जाना है। हम शायद ऐसे ही अपने होने को मानते हैं। कभी लगता है तुम्हारे अंदर इतना नाज़ुक दिल रहता है जो तुम्हें तुम बनाए रखता है। जब भी मन होता है पन्ने पलट इस कविता को दोहरा लेता हूँ। पता नहीं ऐसी कितनी पंक्तियाँ तुमने अपनी डायरी में कभी-कभी लिखी होंगी, जो हमें कभी दिखी नहीं : 

दस बाय बारह का कमरा है
आज की ज़िन्दगी जहाँ बसी है,
एक समूची दुनिया अपने औज़ारों के साथ। 
बिखरी किताबें, फैले कपड़े, 
टूटी कुर्सी, अधमजे बर्तन 
इन सबके बीच बैठा 
एक आदमी खोजता है, ज़िन्दगी की गलियाँ।

अपनी ताकत को बटोरते, अधमरे पेट के साथ, 
वह नहीं जायेगा गाँव, 
नहीं ताकेगा आकाश, 
जहाँ तारों की गिनती मुश्किल, 
नहीं दौड़ेगा उन पगडंडियों में, जो ख़त्म नहीं होती थी। 
वह यहीं रहेगा दस बाय बारह के कमरे में, 
चार लीटर पानी और पाँच किलो आटे के साथ 

क्योंकि बड़े बनने का रास्ता 
अब नदियों के किनारे से नहीं, 
नालियों के ऊपर से जाता है। 
और गाँव में तो फ़िर सूखे की उम्मीद है।

तुम्हारा इतना बेतरतीब हो जाना कभी-कभी खटकता है। जैसे एक दोपहर तुम्हें पता था दिल्ली से आगे आने वाले कई दिनों के लिए जा रहे हो। पर बिन बताए तुम अपने को समेटते यहाँ से चल दिये। शायद उन अनदेखे दिनों के लिए ख़ुद को तय्यार कर रहे होगे। किन्ही यादों को बटोर रहे होगे। चुन रहे होगे। किनको ले चलूँ। किन्हे यहीं दोबारा आकार बुन लूँगा। कई मोड़ यहीं रहने दिये। कई बिन ख़तम हुई बातें अभी भी वहीं अटकी पड़ी हैं। कई इन बीतते सालों में लगातार जुड़ती रही हैं।

तब जब ख़ुद को निपट अकेला महसूसता रहता हूँ तब लगता है तुम्हें दिल्ली होना चाहिए था। फ़ोन पर चाह कर भी अपने दिल की बात नहीं कह पाता। तुम कहाँ तक मुझे निकालोगे। तुम्हारी समझदारी के आगे हम कहीं भी नहीं ठहरते। जहाँ हम उन्हें बस सोचते रहे वहीँ तुम उन्हें जीते रहे। यह थियरी प्रैक्टिकल जैसी किसी फाँक की तरह बराबर दिखता रहा। उन सबमे ‘कथार्सिस’ जैसी परिघटना में अब तुम नहीं हो। पर अगले क्षण सोचता हूँ जो हमें हमारी उलझनों द्वन्द्वों से इतनी आसानी से निकाल लाता है, ख़ुद क्यों नहीं अपने साथ भी ऐसा करता। कभी इतने निराश होकर बात करते हो के पूछो मत।

ज़िन्दगी जैसे बड़े, भारी- भरकम शब्द को हम बस थोड़ा-थोड़ा जीने की कोशिश करते रहें, यही काफी है। उसके बनते ढर्रों में ऊब तो है पर चोर दरवाज़े भी हमी को ढूँढ निकालने होंगे। नया किसी पुराने को अपदस्थ करके ही आएगा, ऐसा सोचना पता नहीं खुद को कैसा कर लेना है। इसका कोई बना बनाया पैटर्न नहीं है। सबके अपने तरीके हैं। पता है तुम लगातार खोज भी रहे होगे। एक दिन या एक शाम या एक रात सपने में वह टकरा ही जाएगा। परेशान न हो। उसने हमारे हिस्से को अपने वजन से ढक लिया है तो क्या। उसे भी उठा लेंगे।

आगे की फ़िर कभी। जब तुम दिल्ली आओ तब। अभी तो बस इतना ही कहना चाहता हूँ के कभी लगता है तुम इतना कम क्यों लिखते हो। हम भी लगातार तुम्हारा लिखा पढ़ना चाहते हैं। तुम्हारे पास जो भाषा है उसके तो कायल हैं। उन ‘टूल्स’ को ‘पब्लिक स्फेयर’ में आने का मौका तो दो। लो चलो तुम भी क्या याद करोगे, तुम्हारा लिखा तुम्ही को पढ़ा रहा हूँ:

शादी के तीन साल। नौकरी के दो साल। सब रोजगार के बाद शादी करते हैं। शायद शादी को भार समझते हैं। हमने शादी की। रोजगारी -बेरोजगारी से इसका कोई सम्बन्ध नहीं समझा। क्यों की हमारे लिए शादी प्यार का ही उत्सव है।
कुछ पहले प्यार फिर नौकरी तब शादी। नौकरी नहीं हुई तो प्यारे -प्यारी नौकरी वाले के पास उड़ जाते हैं। इसमे माँ -बाप भी मदद करते हैं। कुछ रोजगार विहीन होकर अभी शादी विहीन बैठे हैं। कुछ पीएचडी भी हो गए हैं, साहित्यिक और फ़िल्मी लिक्खाड़ भी हो गए हैं, इस दौरान वो कई बार प्रेमी भी बने होंगे, अब सामजिक ठेकेदार बन गए हैं, कई सरकारी गैर-सरकारी नियमों के अनुसार 'ओवरऐज'  हो गए हैं , पर शादी के लिये नहीं। पूछा  सर अब क्या करोगे ? बस यार नौकरी लग जाये शादी कर लेंगे !

मेरी दोस्त हमें जब प्रेम हुआ तब रोजगार नहीं था न ही रोजगार का हिसाब -किताब रखने वाला समाज। हमारे लिए शादी प्रेम के उत्सव का सामाजिक रूप है। दोनों के दिल में पल रहे शुभ और सुन्दर भावों की सामजिक अभिव्यक्ति थी। मेरी दोस्त हमारे लिए शादी प्रेम का बंधन नहीं। एक पल के वादे का सघनतम रूप है।  जीवन संघर्ष में एक कोमल एहसास है। नैराश्य में टिमटिमाती एक लौ है। दुनिया को सुन्दर बनाने का एक प्रयास है। एक साथ दुनिया को प्यार करने की सीख है।

आओ मेरी दोस्त शादी और जन्मदिन की ख़ुशी में कैंडल जलाएं.. रोशनी फैलाएं..!!

पता नहीं क्या सब कह गया। कहना भी चाहिए था या नहीं, पता नहीं। बस लिख दिया है। तस्वीर वही ‘बुक फेयर’ वाली लगाए दे रहा हूँ। इस बार तो तुम आते-आते रह गए। तारीख शायद दो साल पहले की है। अभी ढूंढा तो पता लगी तारीख़ है तीस दिसम्बर, दो हज़ार दस। उस दिन बरसात भी थी। ठंड तो थी ही। जैकेट पहन रखी है तुमने।

सितंबर 02, 2013

एक दूसरे की साँस में घुलते हुए

कभी-कभी सोचता हूँ तुम्हारे बारे में लिखूँ। तुम्हें बिन बिताए। सूरज अभी ढला नहीं है। ढल रहा है। जैसे-जैसे अँधेरा होगा मैं तुम्हारे पास आता जाऊंगा। इस उजाले में आँखें इधर-उधर चली जाती हैं पर अँधेरा बना ही इसलिए है। के तुम्हें देख पाऊँ। चुपके से नहीं, सबके सामने से। कि वहाँ मैं हूँ। तुम हो। हमारी बातें हैं। मुलाकातें हैं। पर अगले ही किसी पल लगता है हम कैसे-कैसे होते जा रहे हैं। इस तरह दिनों का शामों में और शामों का रातों में तब्दील होते जाना बिलकुल भी जँचता नहीं। पर क्या करूँ। बस सोचता रहता हूँ।

सोचता रहता हूँ ऐसा क्या लिख दूँ के तुम मेरे सामने आ जाओ। कोई ऐसा जादू भी होता होगा। धीरे-धीरे सीख रहा हूँ। जिस दिन नींद नहीं आती उस दिन लगता है कहीं तुम मुझमे कुछ कम रह गयी होगी। इस तरह एक शाम होगी। ढबरी के उजाले में तुम्हारा झिलमिलाता चेहरा देख भर लेने को यहाँ से चल पडूँगा। फ़िर कोई नहीं रोक पायेगा। मैं भी नहीं। तुम भी नहीं।

एक बारगी बस ऐसे ही कालीबाड़ी से आगे बढ़ता हुआ तालकटोरा जा पहुँचा। बागीचे के किनारे से धीरे-धीरे हम दोनों सीढ़ियाँ चढ़ते जा रहे हैं। एक दूसरे को कनअखियों से ऐसे देख रहे थे जैसे पहली मुलाक़ात हो। थोड़ी झिझक है। थोड़ी हया है। थोड़ी शरारत है। हाथ इस वक़्त कहाँ होने चाहिए यह सवाल पहली बार उठा था इसलिए अपनी जगह बना रहा। वरना हाथ को हाथ में हाथ रखे या कंधे..नहीं नहीं कंधे पर नहीं। हथेलियों की छुअन दोबारा महसूसने का मन कर रहा था। फ़िर भी इस सवाल को जवाब में बदलता नहीं हूँ। उसे जेब के आस-पास बनाए रखता हूँ। ऐसे कि मोटर बाइक की चाभी रख रहा हूँ। या जेब में उसे ढूँढ रहा हूँ। इस सबके बीच हम करिने से आहिस्ते से बिन शोर किए बिलकुल उसी जगह पर आकर बैठ गए हैं, जहाँ कभी एक ओर दीप्ति नवल बैठी थीं; पर अभी वहाँ तुम हो। और दूसरी तरफ फ़ाहरुख शेख़ नहीं बैठे; मैं बैठा हूँ। फिर वही वैटर आता है और थोड़ी देर बाद हम बिलकुल वही ट्रूटी फ्रूटी खा रहे हैं।

यह सब लिखते-लिखते पता नहीं कहाँ पहुँच गया हूँ। शायद वहीं जहाँ आते हुए हमारी बस खराब हो गयी है और हम सब सड़क किनारे उसके ख़राब हो गए ‘क्लच प्लेट’ के ठीक होने के इंतज़ार में धूप से बचते हुए पेड़ की छाया में जा समाये हैं। फ़िर जेब से एकबार फ़िर मोबाइल निकालता हूँ और तुम्हें कहता हूँ। तुम वक़्त पर ही वहाँ मिलना, मैं कैसे भी करके पहुँच जाऊँगा। पता नहीं आज सोचता हूँ तो अंदर से भर आता हूँ। तुमसे वह जगह तीन घण्टे की दूरी पर थी और हमारी तय मुलाक़ात उससे कुछ ही देर पहले शुरू होने को थी। बाज़ार में हम कहीं बैठे नहीं थे। बस चलते रहे। एक नहीं कई-कई दुकाने। रंग मिल ही नहीं रहे थे। हरे रंग की चूड़ियाँ पक्के ताल के पास कहीं भी नहीं मिलीं। उन पीले धानी रंग के कंगनों पर अचानक नज़र पड़ गई, फ़िर जाने कैसे देते। अमीनाबाद के गड़बड़झाला बाज़ार से तो यह बहराइच की दुकान निकली।

उस दिन की हर याद को बार-बार पीछे जाकर देख लेना चाहता हूँ। पूरा दिन। कैसे बहाना बनाकर वहाँ से भाग निकला था। दोस्त कह रहे थे भूलभुलैया देखकर चले जाना। थोड़ा हमारे साथ भी लखनऊ घूम लेते। पर कहा फ़िर कभी। आज नहीं। सोचता हूँ अगर रुक जाता तो उन यादों में यह दिन न जुड़ पाता। कैसे वो सूट की नयी दुकान का पहला सूट हमने खरीदा। अच्छा हुआ के तुम्हारी सहेली घर पर नहीं थी। तुम कैसे उस दुकान वाले से मेरी शर्ट के लिए जिरह कर रही थी। फ़िर पता नहीं कहाँ से तुम्हारे बड़े पापा ‘क्वालिटी चाट कॉर्नर’ के पास दिख गए। चलो होता है कभी-कभी। उन्होंने बाद में कुछ कहा तो नहीं।

पता है यहाँ कई ऐसी बातें हैं जिनमे तुम भी नहीं हो। सच कहूँ तो उनमे मैं भी नहीं हूँ। हम दोनों नहीं हैं। पर पूछना मत कि फ़िर ऐसे क्यों लिख रहे हो। बस तुम्हारे पास न होने को इधर ऐसे ही भर रहा होता हूँ। दिन जैसे-जैसे बीत रहे हैं उनमे हम दोनों का पास न होना किसी ढलते सूरज के साथ उदास किए देता है। उसी से ख़ुद को बचाए रखता हूँ। इस बहाने तुम झूठ ही थोड़ी देर तो सही मेरे साथ रहती हो। वहाँ लगातार एक दूसरे को बेतहाशा हर साँस में महसूस करना है। छू नही पाते तो क्या इस तरह हम एक दूसरे को एक दूसरे में बचाए रहते हैं।

जब-जब अकेला महसूस करता हूँ अपने सपनों के पिटारे को खोल हम दोनों को उड़ने देता हूँ। साथ उड़ना साथ चलने से कहीं रूमानी है। वहाँ कोई नहीं देखता कितनी देर तक हम साथ थे। इस बहाने उड़ तुम्हें देख भी लेता हूँ कि कैसे हफ़्ता हफ़्ता बात न कर अपने को कैसा कर रही होती हो। तुम भी इसकी किश्त भरने लगो, अभी आज ही रात सपने में तुम्हारे कान में बता दूंगा। फ़िर दोनों मिला करेंगे। चुपके से। अँधेरा हो जाने के बाद। आसमान में, कहीं ऊँचे से देखते हुए। एक दूसरे की साँस में घुलते हुए।

तुम आ रही हो न आज..!! वहीँ मिलेंगे। आम के पेड़ पर। सबसे ऊँची डाल पर।

सितंबर 01, 2013

दो सपनों की खराब सी भूमिका..

हम सबके अपने ‘कंफ़र्ट ज़ोन’ होते हैं, जिनसे निकालना तो दूर उनके बारे में ऐसा सोचना भी नहीं हो पाता। कभी-कभी उस कमरे से निकालने का मन नहीं करता, जिसमे बैठ किसी की गोद में बैठे रहने का एहसास होता है। भले उसे ‘ऊपर वाला कमरा’ कहता आया हूँ; पर बार-बार वहीं खिंचा चला जाता हूँ। इन बीते दिनों के बीतते जाने में जब कहीं नहीं लिख रहा था, बस सोचे जा रहा था के लिखना चाहिए, तब वहीं घंटों बैठा रहता। नींद आ जाये, थोड़ी देर सो जाऊँ, तब शायद दिमाग चलने लगे इसलिए खराब-खराब किताबें पढ़ने से अच्छा था कि खराब फिल्में ही देख लूँ। कुछ देखी भी। पर उनकी बात आज नहीं। मन नहीं है। तबीयत कुछ और कह लेना चाहती है।

पहली बार है जब दोस्तों के कहने पर दिल्ली में रहते हुए ‘बुक फ़ेयर’ नहीं गया। पहले से सोच लिया था नहीं जाऊंगा। राकेश आता तब सोचता के चलते हैं। पर नहीं। उसके स्कूल ने छुट्टी नहीं दी होगी और न उसने इन इकहरे मेलों में बीते पुराने दिनों में लौटने की सोची होगी। कभी लगता है हम कभी पढ़ कर कभी लिख कर क्या इस ज़िन्दगी से भागने के चोर दरवाज़े तो नहीं ढूंढने लगते। शायद कई बार ऐसा जानबूझकर भी करते होंगे। कभी ‘हॉबी’ के नाम पर। क्योंकि हमे पता है उसे जीना उन छपे रिसालों से जायदा मुश्किल है।

बहरहाल अभी किसी भी टाइप से कोई फ़िलॉसफ़ि झाड़ने का मन नहीं है। ज़िन्दगी का अपना ढर्रा बनते-बनते बनता है। वक़्त लगता है। और जब वह मुकम्मल बन जाता है, तब उसे ‘बोर’ हो जाने की हद तक झेलते झेलते हम खुद शीशे में अपना ही चहरा पहचाने की कोशिश में लगे, पागल लगने लगते हैं। अगर इस लाइन को ‘किस्सा कोताह’ वाले राजेश जोशी पढ़ लें तो एकबारगी नाराज़ हो जाएँ। पर वो किस्सा भी अभी नहीं। फिर कभी फुर्सत से।

अभी तो कल परसो रात देखे सपने को दिखाना चाहता हूँ। कि कई महीनों बाद लगातार दो रातों से सपने देख रहा हूँ। अभी एक रात पहले वाला। पता नहीं ‘बॉम्बे टॉकीज’ में ज़ोया अख़्तर कि फिल्म ‘शीला की जवानी ’ का साइड इफ़ेक्ट है या कुछ और के मेरे सपने में कोयले की मालगाड़ी दिखायी दी। और दिखाई दिये सोनाक्षी के पिता। कालीचरन। बिलकुल उसी उम्र के शत्रुघन सिन्हा। पर तकनीक के लिहाज से भारतीय रेल ने तरक्की कर ली है और जिन पटरियों पर रेल दौड़े जा रही है वह बिजली से चलने वाला ट्रैक है। और वहाँ जो कालिख मुँह पर दिख रही है वह इंजन के गले से उगलते धुएँ से नहीं उस काले रंग के कोयले से हुए हैं। इन सबमे पता नहीं मैं कहाँ हूँ। शायद बहुत दूर। मेरा ‘वेंटेज पॉइंट’ किसी को दिख नहीं रहा। खुद मुझे भी। बस बार-बार यही री-टेक कि शत्रुघन उस कोयलागाड़ी पर चढ़ना चाहते हैं पर बार-बार उन्हे कोई रोक रहा है। पता नहीं इतना लेटेस्ट सपना है फ़िर भी इस चढ़ंतु ने ‘बेशरम’ का ट्रैलर नहीं देखा शायद। वरना एक हाथ पर पैर पड़ने से पहले ही वह हाथ वहाँ से उठा लेते और अपना बैलेंस बनाये रखते।

ख़ैर, सपना इन सबके बीच कहाँ खत्म हुआ कुछ याद नहीं। बस घड़ी देखी तो उसमे तीन बजने में अभी एक मिनट बाकी था।

दूसरा इस तड़के आज की सुबह का ही है। थोड़ा रोमेंटिक लग सकता है। इसकी ज़िम्मेदारी हमारी नहीं है। थोड़ा ‘जब वी मेट’ से कॉपी भी। यहाँ जो लड़की मेरे साथ है उसका नाम नहीं दे सकता। इसलिए नहीं दे रहा। वैसे खुद अपना कौन सा दिये दे रहा हूँ। पर इत्तेफाक से यह भी शुरू ‘रेल्वे स्टेशन’ से होता है। पता नहीं तुम इंदौर जा रही थी या सीहोर या कहीं भोपाल के आसपास। हम सब भी उसी दिन उसी रेलगाड़ी से वहीं जा रहे हैं। पर पता नहीं क्यों मैं सबको छोड़ तुम्हारे संग बैठ जाता हूँ। हमारी टिकट कंफ़र्म है या क्या है याद नहीं। हम दोनों पार्सल वाले डिब्बे में उसका बंद दरवाज़ा खोलकर बाहर पैर लटकाकर बैठे हुए हैं। अभी ट्रेन चलने में थोड़ी देर है। बिलकुल उसी क्षण पता नहीं मेरे मन में क्या आता है मैं अपने एयरटेल मोबाइल में इंटरनेट डेटा रिचार्ज करवाने उतर जाता हूँ। पीछे-पीछे तुम भी।

हम दोनों प्लेटफॉर्म से प्लेटफॉर्म छाने जा रहे हैं पर बत्तीस रुपये वाला रिचार्ज कहीं नहीं मिल रहा। तभी हमारी ट्रेन कब चल पड़ी, पता नहीं। मैं शाहरुख़ नहीं था वरना ‘दिल वाले दुल्हनिया ले जाएँगे’ वाला सीन तो दोहरा ही लेते। मेरी समझ में यह भी नहीं आ रहा है के मैं भाई को जेब में रखा फोन निकाल बता क्यों नहीं दे रहा कि ट्रेन दिल्ली में ही छूट गयी है। कहाँ मिलेंगे। कौन सी ट्रेन से पीछे आ रहे हैं। पता नहीं।

वैसे सपने कभी लिखता नहीं यहाँ पर। पर क्या करूँ। बीते दिनों यही सबसे अच्छी बात मेरे साथ घटी है कि सपने वापस आ रहे हैं। वरना नींद की तो ख़बर ही क्या। कई-कई किश्तों में टूट ती रही थी। इन्हे देखा तो पुराने दिन याद आगए। पर डायरी में लिखे उन पन्नों को यहाँ नहीं लिखुंगा। वह इससे कहीं जायदा खतरनाक हैं। उनको यहाँ होना नहीं चाहिए। जब ‘चाहिए’ कह दिया तो मतलब मेरी मुझसे यह अपेक्षा ही नहीं है। कि हाँड़-माँस का जितना भी हूँ जैसा भी दिखता हूँ उसे उस ‘वर्जित प्रदेश’ की खाद बना दूँ। उसे तोड़ूँगा नहीं। जब कभी इस तर्क को हरा दूँगा, तब शायद कुछ हो..

आवाज़ें..

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...