अक्तूबर 31, 2013

मेरा बस पुतला बचा रह गया हो जैसे..

जबरदस्ती लिखने बैठ गया हूँ। मन बिलकुल भी नहीं हो रहा। फिर भी। आसमान में बादल हैं। शाम ख़ूब हवा चल रही थी। पता नहीं किस दिशा से आती जाती रही। बार-बार फ़ोन लेकर कमरे में आता। फ़िर थोड़ी देर में बाहर निकलता। लगता आवाज़ कट रही है। ठीक से सुनायी नहीं दे रही। फ़िर बाहर रखी कुर्सी पर बैठ बात करने की आदत वहीं खींचे ले जाती। हवा के बावजूद वहीं बैठने का मन किए जाता। कल कह तो दिया था पर अभी तक स्वेटर निकाला नहीं था। तीन छींके लगातार आयीं। नाक बंद नहीं है फ़िर भी। 

मन को पता नहीं क्या होता गया है। गुमसुम सा है। खोया-खोया सा। लिखने से भी कुछ ख़ास बदल नहीं रहा। बल्कि इसे ही टालता रहा हूँ। बिलकुल भी जी नहीं करता। कुछ मौसम की गड़बड़ है। कुछ दिल का मामला है। मन कहीं लगाए नहीं लग रहा। बार बार लौटे आता हूँ। एक ही तरहों से इस ऊब को ढकता थक गया हूँ जैसे। फ़िर भी बार-बार।

उस रात आलोक से मिलकर जब लौट रहा था, रास्ते में ठंड मिली। थोड़ी साथ हो गयी। कुछ वहीं रह गयी। अंदर कुछ नहीं था सिवाये बनियान के। लगा रातें इतनी भी गरम नहीं रह गयी हैं। उनमे गला थोड़ा ख़ुश्क होता रहता है। प्यास भी उसी के इर्द गिर्द घूमती-सी रहती है। उसके लगने पर पीने का मन नहीं होता। फ़िर इसका स्वाद भी इन दिनों में बिलकुल पीछे के मौसम की तरह नहीं रहता। बदल जाता है। छूने में भी वह वैसे नहीं रहता। ख़ैर। मेट्रो स्टेशन से निकला ही था, लगा जैसे सड़क पर यही ठंड उदासी की तरह पसरी हो। कहीं से दो कुत्ते साथ चलने की गरज से निकल पड़े। पर मेरे साथ सड़क पार न कर सकने के कारण उसी किनारे रह गए। कहीं से किसी फ़ूल की गंध आती नहीं लग रही थी। बस मन थोड़ा खाली-खाली सा लग रहा था। लगा कुछ है जो छूटे जा रहा है। उसे पकड़ नहीं पा रहा। समझ आ रहा था। पर अब इंतज़ार कल का करना था। बिन बताए। बिन बोले।

दिल्ली में ठंड ऐसे ही उतरती है। हर साल। उसकी याद भी धुंधली नही होती के दूसरी छवियाँ अंदर तक भर देती हैं। यह थोड़ा 'ग्रे वैदर' है। मन बिलकुल भी नहीं होता। कुछ भी करने के लिए कई कई बार तय्यार करने के बावजूद हार हार जाता। धूप कमज़ोर हुई है। अँधेरा जल्दी हो जाता है। उसके साथ मन भी डूबता रहता है और दिल भी। कुछ भी नहीं कर पा रहा। सोचने और मुंगेरी लाल के सपने देखने से कुछ होना होता हो कबका हो जाता। हुआ नहीं है इसलिए सपने देखना जारी है। और लगातार सोना भी। सोते रहने से वक़्त चलता नहीं भागने लगता है। इसलिए दिन में पता नहीं ऐसा कितनी-कितनी बार करते रहने की कोशिश किए रहता हूँ। पर नींद हरबार तो आती नहीं। न ही उलटते-पुलटते कहीं तक पहुँचता। रात अचानक नींद टूटती है। कहती है जाग जाओ। कितनी बेरुख़ी से वह चल देती है। उसे नहीं पता कि उन उनींदी आँखों की किरकिरी कितनी चुभती रही है।

इन अँधेरी शामों में अकेला नहीं होता। पर लगता है ऐसा ही हूँ। लगातार एक कोने में बैठा। गिनता रहता हूँ बेतरतीब दिन। करने को कुछ ख़ास नहीं होता। कुछ ख़ास करता भी नहीं। बार-बार अपने तक आता हूँ और तुम तक लौट जाता हूँ। इसके अलावा कुछ नहीं। कितने खराब दिन हैं न! कुछ भी करने का मन नहीं होता। बिलकुल खाली-खाली से। अनमने से होते रहने वाले। लगातार अबूझ होते जाना। बिलकुल भी ठीक नहीं है। पर कुछ न कर सकने में ऐसे होते रहते के बीच। मनमर्जियों के बिलकुल उलट। एक भी पल सीधे नहीं। सब के सब जिम्नास्टिक किए रहते हैं। उल्टे पुल्टे। आड़े तिरछे। अरेबा परेबा के जैसे।

इधर कविताओं की तरफ़ लौटा हूँ। असद ज़ैदी की छोटी-छोटी बातों पर कही कवितायें खींचे रहती हैं। कितनी बारीकी से ज़िन्दगी को जीने की कोशिश की तरह। साँसों से डोर बाँधते। उनकी आँखें क्या कुछ देखती चलती हैं। कहती चलती हैं। फ़िर विनोद कुमार शुक्ल हैं। उनके छोटे-छोटे वाक्यों में झरने की तरह बहती भाषा निर्मल वर्मा की तरफ़ ले जाती हैं। उसका रूमान अंदर तक घुलता रहा है। ख़ुद अभी लिखने की कोशिश में नहीं हूँ। बस देख रहा हूँ। देखते कैसे हैं। लिख फ़िर कभी लेंगे। कविता को 'एस्केप रूट' की तरह लेना नहीं चाहता। इसलिए बच रहा हूँ। फ़िर ढूँढ भी तो रहा हूँ कोई ऐसी किताब जो दिल से कही हो। जो थोड़ा सुकून दे। यहाँ कुछ देर बैठे रहना चाहता हूँ। अपने अंदर के खालीपन को भर लेना चाहता हूँ। उस खोखलेपन में यहाँ तक चला आया हूँ..

अक्तूबर 27, 2013

सारे रंग कहीं उड़ गए हैं

सारे रंग उड़ गए हैं। सब सफ़ेद रंग बन गए हैं। बिन लकीर के। बिन किसी छाया के। किसी पेड़ में कोई हरियाली नहीं। किसी आसमान में कोई नीलापन नहीं। चाँद भी नीली रोशनी सा नहीं। या उन सभी को एक प्लेट में घोलकर अपने ‘ब्लॉग’ की दीवार पर चिपका लिया है। पता नहीं। पर सच में अभी वह कहीं नहीं दिख रहे। यह उदासी का रंग है। यह दुख का रंग है। इसे देख दर्द होता है। पीठ से लेकर पसलियों तक। पोर पोर उँगलियों से बालों के भीतर। हल्दी का पीलापन थोड़ा स्थगित है। मेंहदी की सुर्ख़ लाली थोड़े दिन और रुककर। दिमाग में कर्फ़्यू लग गया हो जैसे। कहीं से कोई आवाज़ न आ रही हो जैसे। अजीब तरह की बेचैनी घेरे रही है। किसी सवाल का कोई जवाब नहीं। बस सवाल हैं। ढेर ढेर। झउआ भर-भर।

 सूरज भी नहीं निकल रहा न इसलिए थोड़ा और सुस्त हूँ!!

मन नहीं कर रहा लिखने का। कम से कम तो यहाँ बिलकुल नहीं। डायरी के पन्नों को पलटते वक़्त पता तो चलता है मन कैसा कैसा होता गया था। हाथ की लिखाई ऐसी ही होती है। बराबर महसूस होती रहती है। सिर्फ़ कलाई या उँगलियाँ ही नहीं दिल भी वहाँ धड़क रहा होता है। उस नीली स्याही से लिखी एक ही पंक्ति खींचे लेती है। उसकी रंगत बताती चलती है बराबर। कहाँ शब्द गहरे हैं। कहाँ स्याही फ़ीकी पड़ने पर भी दोबारा स्याही नहीं भर रहा हूँ। वहाँ नीचे लिखे वक़्त से वहीं पहुँच जाता हूँ।

कई दिनों से इन दोनों लिखे में अंतर देख रहा था। तब वहीं कहीं लिखा भी था। इसमे उतना अपनापन उतर ही नहीं पाता। इसमे सिर्फ़ मेरे शब्द झलकते हैं। मेरे बीते कल में उलझी रही बाते हैं, कहीं पीछे गली में रह गयी यादें हैं, कई छूटे अधूरे सपने हैं, कोई तस्वीर है पर मैं कहाँ हूँ। मेरी छाप थोड़ी कमज़ोर है। मेरे ‘इंप्रेशन’ कुछ कम हैं। यह उस अपनेपन का कुछ कम होना है। जो पन्नों की तरफ़ लगातार खींचता रहा है। बुलाता है। बिठा लेता है। कुछ कहता नहीं है। बस सुनता रहता है।

फ़िर लगता है यहाँ कहने को कुछ ख़ास है भी नहीं। बस अपने को दोहराए रहता हूँ। खुद से खेल रहा होता हूँ जैसे। कभी ऐसे कभी वैसे एक ही तरहों की बातों को रपटाए रहा हूँ। यहाँ एक पन्ने आधे पन्ने बाद स्याही भरने का झंझट नहीं है। उस रुमाल से निब नहीं पोंछनी पड़ती। हाथ पर किसी भी तरह नीलापन नहीं रहता। बिलकुल साफ़। फ़िर भी मन नहीं होता। यहाँ लिखना यांत्रिक होते जाना है। ऐसा लगता है यहाँ मेरी स्मृतियाँ में अजीब किस्म का बनावटीपन जादा उभरा है। वह अनुभव सहज नहीं रह पाते। उन्हे असहज करता फ़िर यहाँ लाता भी नहीं हूँ। जहाँ उन्हे लिखे जाना है वहीं लिखता हूँ। पन्नों पर।

मेरे यहाँ ‘डायरी’ मोटी-मोटी जिल्दों का नाम नहीं है वह ‘स्टेट ऑफ़ माइंड’ है। ‘स्टायल’ है। ‘शैली’ है।

अभी डायरी पलटते पंद्रह अक्टूबर का लिखा सामने से गुज़रा। लिखा है, ‘वहाँ ऐसे एक हाथ माथे पर रख नहीं लिख सकता। हाथ की स्थिति भी आँखों की तरह वही नहीं रहती। इस अंतर को बारीकी से पढ़ रहा हूँ। के यह अंतर वाली रेखा महीन है या कैसी है। जब जान जाऊंगा तब बताऊंगा। अभी यहाँ आने के बहाने दूसरे हैं वहाँ जाने के दूसरे। बस यही दिख रहा है’।

पता नहीं अभी कल ही.. नहीं नहीं परसो.. संजीव सर से बात करते-करते कह रहा था कि इधर कई महीनों से सोच रहा हूँ के ‘हंस’ और ‘कथादेश’ को ख़रीदना बंद कर दूँ। जब किसी भी वाक्य पर क्षण भर भी नहीं ठहरता। कोई वैचारिक प्रक्रिया शुरू नहीं होती। कहीं विचलन महसूस नहीं होता तब इन्हे क्यों ढोया जाये। यह विचार वाला नुक्ता अब किसी रूमान से नहीं भरता। उल्टे इनसे कोफ़्त बढ़ी है। इस पर ख़ूब लिखने का मन है। कभी मौका लगे इसे निपटा लेंगे।अभी नहीं। 

क्षेपक की तरह पिछला और यह वाला पैरा इसलिए भी लिख रहा हूँ कि लगता रहा है कि इन एक जैसी स्थितियों से निकालने के लिए थोड़ा अपनी तरह से इसे मोड़ने का सही वक़्त है। विरोधाभासी बातें हैं पर व्यक्तित्व ऐसे ही छोटे-बड़े विरोधाभासों से बना है। जो नहीं मानते वह ‘लघुमानव’ नहीं होना चाहते। वे आदर्श बने रहें। किसी किताब में छप युवाओं का आवाहन करें। हम तो भई ऐसे ही हैं। थोड़ी टूटफूट तो लगातार चलती रहती है। उसे नहीं कहेंगे तो बचे कैसे रहेंगे। अपना तरीका यही है।

फ़िर ये जो हाथ से लिखना है और जो यहाँ बैठे टाइप करना है दोनों में अंतर बना रहेगा। यह अंतर बनाए रखना चाहता हूँ। ख़ुद के लिए। दोनों जगहों पर एक ही अनुभूति का होना इस ‘सभ्यता का संकट’ है। दोनों जगह लिखना एक ही अनुभव नहीं है। जो यह नहीं समझ रहे उन्हे समझना होगा। यह उस विविधता को भी बचाए रखेगा जबकि यह आग्रह, उसे समाप्त करना चाहता है, जो एकसमान अनुभवों को इकट्ठा कर टैबलेट बांटने की तरह होता गया है।

तभी लिखना बचा रहेगा। डायरी लिखना तभी बचा रहेगा। तभी कलम बची रहेगी। तभी स्याही बची रहेगी।

अक्तूबर 22, 2013

बुख़ार में इससे ख़राब और नहीं लिख सकता..

जबसे पिछली पोस्ट लिखी है नींद गायब है। उसका ऐसे गायब हो जाना समझ नहीं आ रहा। कहाँ चली गयी। पता नहीं। वह पास नहीं है। ये पता है। रात करीब साढ़े दस हो रहे होंगे जब लैपटॉप बंद किया। ऊपर आया। सीढ़ियों पर अँधेरा था। रोज़ की तरह। उन पर चप्पलों की आवाज़ आ रही थीं। रोज़ की तरह। अब उस चारदीवारी वाले कमरे में बस चादर झाड़ लेट जाना था। और सुबह उठ जाना था।

पर जिसका होना सबसे ज़रूरी था वही गायब। नदारद। 

इधर दिल भी मन की तरह होता गया है। मनमौजी। आउट ऑफ़ ऑर्डर। पॉइंट ऑफ़ स्टेट से बाहर। बेतरह। लगातार। सीढ़ियों पर चप्पल की आवाज़ अब दिमाग में बज रही थी। अभी भी वह कुछ कम नहीं हुई है। 

क्या सोच रहा हूँ। ठीक-ठीक पता नहीं। शायद कहीं अटक गया। किसी दिन किसी बीती शाम के पास। जब छुटपन के दिन रहे होंगे। सोचता रहा जैसा अभी लिख डाला है वैसा बिलकुल भी नहीं लिखना चाहता था। अभी पापा ने छुआ तो कहा बुखार तो नहीं है। उससे पहले मम्मी बोल चुकी थीं के दोपहर भसीन से दवाई क्यों नहीं ले ली। अभी भी आँखें किरकिरा रही हैं। सिर भारी लग रहा है। कल आइस कैंडी भी खा ली थी न! वो भी अपना काम कर रही होगी। गले के आस पास।

लगतार दिमाग घूम रहा था। अभी भी घूम रहा है। कहीं थिर नहीं है। मच्छर की तरह भिनभिना रहा है।

राकेश दिल्ली आ रहा है। अभी किसी को नहीं बताया है। कुछ स्थगित मुलाकातों की किश्त इस बार चुकाएंगे। कई-कई महीनों बाद। रुकी-सी बातें। वहीं ठहरी-सी। स्टिल। मोशन। साथ सपनों की पोटली होगी। यादें होंगी। भाई अभी भी वहीं है। बस ब्लॉक बदल लिया है। पर वहाँ जाने का मन नहीं है। उसे ही चाँदनी चौक बुला लेंगे। सीसीडी पर बैठे इंतज़ार करते रहेंगे। या घर पर कोई लंबी बैठक। या किसी और जगह। अभी सोचा नहीं है। उसकी भी तो कुछ प्लानिंग होगी। देखते हैं। क्या होता है। 

पता नहीं कितनी बातें फ़ोन पर कहते-कहते रुक जाता हूँ। कह नहीं पाता। उधर से वह भी रहता है। और कभी वह भी रुक जाता है। सब अपनी पारिस्थितिकी में 'फ़िट' हो जाना चाहते हैं। वह भी कोशिश कर रहा है। सपनों की बकाया किश्तों के साथ। फ़िर जो नहीं कहा है उसे कहने का फॉर्मेट भी बनाना होगा। जो उसी तरह आ पाएँ जैसी वह हैं। उनका वैसा होना मुश्किल है, पर..

फ़िर बीच में इधर कई महीनों बाद साथ फ़िल्म देखी। अभिषेक पर। बिन सिर पैर। अक्षय कुमार की 'बॉस'। कुछ बिन्दु हैं जिनपर वहाँ से निकलते वक़्त लिखने का मन बनाया था। अभी भी दिमाग में टंगी हैं। कभी मौका लगे डाक भेजता हूँ। कुछ दिन रुककर।

आज सुबह तड़के तीन बजे बाहर छत पर एक चक्कर लगा कर अंदर आया। बनियान में था। इसलिए लगता है ठंड ने पकड़ लिया। नहाने के बाद से शरीर कुछ टूटा टूटा सा लगता रहा। पर छुट्टी नहीं की। सीढ़ियाँ चढ़ते उतरते सबसे जादा ऐसा लगता रहा के थक गया हूँ। फ़िर इधर दोपहर दो दिनों से सो भी नहीं रहा। शायद इसलिए भी थकान इकट्ठी होती-होती इतनी बढ़ गयी। अभी जीभ का स्वाद नहीं गया है यही ख़ैर है। फ़िर भी रात का खाना नहीं खाया। टाल गया। कभी ऐसा भी करने का मन होता रहा है।

ऐसा नहीं है के खुशियाँ बोरा भर कहीं से चल पड़ती हैं। वह यहीं कहीं आस पास छिपी रहती हैं। बस नज़र चाहिए। वही आँख ज़रा इधर बिगड़ गयी लगता है। देख नहीं पाता। उनका होना मिर्च के कट्टों की तरह किसी खारी बावली से नहीं आने वाला। न कोई 'फ्लिपकार्ट' से होम डिलिवरी करने वाला है। यहाँ तक कि 'टाटा 407' भी कभी उसे ढोते नहीं दिखे। आज़ादपुर तो दूर की बात है।

आज बाज़ार में सिंगाड़े दिखे तो खरीदने का मन हुआ। पर खरीदे नहीं। कभी आगे के लिए बचा रखे हैं। 

अक्तूबर 20, 2013

रातरानी सिंगाड़े खिड़की और स्वाद के बीच बचपन की याद

इधर मौसम ठंडा हुआ है। खिड़की से आती हवा अपने साथ उसकी गंध भी लेते आई है। वह दिखने में किसी भी रंग की हो पर महसूस हो रही है। शामें सुबह की तरह सर्द हैं। पीछे रिज से होते हुए वह सबसे पहले हम तक पहुँच जाती है। सूरज भी थोड़ा सुस्त सा नज़र आता है। शाम उस कुर्सी पर बैठते अब पैर ठंडे हो जाते हैं। बानियान से काम नहीं चलता। शर्ट पहनने लगा हूँ। हरारत सुर्ख़ नहीं है न फिरोज़ी है। वह बस है। मौसम के साथ दोपहर की नींद भी देह तोड़ती है। यह धीर शांत जैसी अवस्था नहीं कुछ और है। यह समाधि भी नहीं है। पर रोज़ सोने का मन होता है। सो जाता हूँ।

शाम पानी भरते अँधेरा छाने लगा है। और उसके साथ पेड़ के नीचे लगे नल से आते पानी का रंग दिखाई देना बंद होता गया है। वहाँ कोई बल्ब नहीं है। बस हल्की-सी रोशनी में सब देख लेना है। आवाज़ से पता चलता रहा है कितना भर गया। सावनी के फूल कई दिन बीते यहाँ से चले गए। मेट्रो स्टेशन के पास बचे हैं कुछ। यहाँ अगले साल आएंगे। अब रातरानी की बारी है। उस शाम लवकेश दरीबे की उस इत्र वाली दुकान पर बोला इसे ही ‘पारिजात’ कहते हैं। हम बचपन से रातरानी कहते आए हैं।

डीटीइए स्कूल की चारदीवारी के बगल से गुज़रते इसी रातरानी की ख़ुशबू खींचे ले जाती है। यह भीनी-भीनी गंध गंध न रहकर बचपन में तब्दील होती गयी। जब भी पास से गुज़रते इसे भूले रहते। वह बार बार बताती वह यहीं कहीं है। बस छिपी रही है। उसे रोज़ ऐसे ही खोजते-खोजते उस तक पहुँचते रहे। कभी नहीं जाता तो बुलाती है। उसकी याद। उसकी गंध। 

वीसीपी की कविता है शायद। बचपन सबसे तेज़ गति से उड़ जाने वाली तितली है। उसी को पकड़े रहने की ज़िद बैठने नहीं देती। भागे-भागे रहते हैं। बेचैनी बेचैन करे रहती है। और कुछ नहीं तो थोड़ा खिड़की पार उतर आने का मन होता है। पर उतर नहीं पाता। वहीं बैठे-बैठे इस खिड़की के छिन जाने की बात पर उदास होता रहा हूँ। कुछ भी करके वापस नहीं जा सकते हम सब। वहीं अटकी-सी शामें ठंडी होती जाएंगी। फ़िर ऐसे ही हरबार। के अब वैसे ही दृश्य अब कहीं नहीं हैं। किसी किताब में भी नहीं। 

इधर मौसम की पहचान अब बदली है। वह हमारे बचपन की छवियों की तरह अनबदला नहीं रह पाया। तेज़ी से भाग हमसे भी बड़ा हो गया। कभी-कभी उन रामलीलाओं की याद आती जाती हैं। वह हमारा मौसम थीं। सामने मदर डेरी वाले पार्क में सड़कपार कोई रामलीला कमेटी हारमोनियम पर ताबड़तोड़ उँगलियों से निकली बेतरतीब आवाज़ों से अपने शुरू हो जाने की ख़बर हम तक पहुंचाती। तब हम घरों से निकल छोटे-छोटे से शालों में ख़ुद को लपेटे उन सीत गिराती रातों में वहीं बैठे गरम-गरम मूँगफलियाँ खाते। उन छिलकों से अपने आसपास को भर देते। तब इसे कोई कूड़ा कह डाँटता नहीं था। कभी भुट्टे पर तीखे मसाले के बाद सीसी करते उसे खाने को कोशिश अब कितने ही साल हो गए इस मौसम में नहीं हुई। न अब वह ठंड कभी मिली न वैसा स्वाद ही कभी जीभ से उतरता दिल तक गया। उतरते तो हम गए हैं। अपने बचपन की सीढ़ियाँ। 

अभी दो दिन बाद करवाचौथ है। हमारे घर में यह सिंगाड़े आने की ख़बर की तरह ही आता। तब इतने नारीवादी कहाने वाले विचारों से दूर-दूर तक कोई भेंट मुलाक़ात न थी। हमारे लिए यह कोई ऐसा दिन था जब चाँद जानबूझकर देर करता। हरबार अख़बार में लिखे वक़्त पर आने से रहा। पर अब पता नहीं कैसे सारे स्वाद वह नहीं रहे। सिंगाड़े का स्वाद भी बदल गया। खीरे में ककड़ी उतर आई हो जैसे। उसे खाने का मन पीछे की तरफ़ लगाई एक छलांग की तरह ही अब बचा है। थोड़े उन दिनों की याद में खोये से पल इस निर्मम हो गयी दुनिया में हमारे हिस्से की सबसे कोमलतम स्मृतियों के बचे रहने की तरह है। भले हम वह नहीं रह गए। पर उन्हे वैसा ही रहने देने की कोशिश इस तरफ़ लाती रही है।

पता है वहीं कहीं फँसे रहना इस वर्तमान को ठीक से जीने नहीं देगा। पर नमालुम इन दिनों की तरफ़ खिंचा चला गया। लगातार। बेपरवाह। बेतहाशा। शायद अपने को वहीं बचाए रखा है। इस टूटफूट से लगातार जूझता अभी भी कभी-कभी वहीं पहुँच जाता हूँ। तब इन दिनों से भी ठंडी सुबहों को जल्दी उठ पार्क में गिरे रातरानी के फूलों को बटोर लेने की हसरत से भरे होते थे। उन्हे हाथों में भर सूँघते। और रात की ख़ुशबू से मिलाते। शायद पता लगाते किस फूल की गंध कल हमारे आसपास घूम रही होगी। वही हसरत उस पेड़ के जाने के साथ हमारे अंदर से कहीं चली गयी। उसी के वापस आने के इंतज़ार में इस खिसक गयी ठंड को कोस रहा हूँ।

अक्तूबर 18, 2013

दिल्ली का आख़िरी कऊआ

'अब उड़ने में मज़ा नहीं आ रहा..!!'
आहिस्ते से कान में बोल कऊआ दूर गर्दन झुका बैठ गया
थोड़ा सुस्त लग रहा था
बीमार नहीं था पर सुस्त था

पहले कभी उसे ऐसे नहीं देखा था, आज देख रहा था

फ़िर बोला 'क्या करूँ दोस्त सब ख़त्म हो रहा है
मैं तो बस कुछ दिन और रहूँगा फ़िर चला जाऊंगा
कभी वापस आने का मन भी नहीं करता
न शहर छोड़ने पर रोने का..'

उसकी आँख गीली थी या नहीं, नहीं देख पाया
बस, एकटक घूरता रहा उसकी आवाज़
भर्राये गले-सा वह चुप रह जाता
कुछ कहता नहीं, बस देखता रहता

उसने बहुत-सी बातें मुझ से की
जितनी याद रहीं उनमे से एक यह थी के
उसके शरीर में यहाँ की हवा ने जंग लगा दी है
किसी कंपनी का पेंट किसी कंपनी का सीमेंट उन्हे बचा नहीं पाया
जबकि अपने सुबह के नाश्ते में बे-नागा वह इन्हे लेता रहा था

सबसे जादा दुख उसे अपने पंखों का था
जिससे थोड़ा ऊँचा उड़ने में ही वह थक जाता है
रीवाइटल की गोली भी कुछ काम करती नहीं लग रही

कहता था
सलमान की उस होर्डिंग पर जाकर हग देगा जो ओबेरॉय होटल के पास लगी हुई है
और भी कई जगह जाकर ऐसा करने की उसकी योजना थी
जिन-जिन में उसे कऊ आ नहीं रहने दिया था
शर्तिया उसने गालिब को चाँदनी चौक में पढ़ लिया होगा
वरना कऊए का कऊआ न रहना कोई बड़ी बात नहीं मानी जाती
न कोई उसकी बिरादरी में ऐसा सोचता होगा
हम कभी-कभी ख़ुद इतना नहीं सोच पाते वह तो कऊ आ है

बीच में सोचने लगा अगर कोई इंसान भी ऐसा करने की ठान ले तो उसे लोग पागल कहेंगे
क्या काऊओं को कोई पागल कह सकता है

ख़ैर,
वह बिलकुल जल्दी में था, अरबरा गया था, उसे जाना था अभी
इसलिए जो-जो वह तेज़ी से कहता गया वह मुझ तक उसकी कांय-कांय बनकर पहुँचा

और न उस दिन के बाद से किसी कऊए को मैंने देखा
बस उसकी थकान के लिए जो टैब्लेट खरीदी थीं उनका क्या करूँ यही सोचता रहा
पता नहीं वह उड़ भी पाया होगा के नहीं
बस खटके की तरह रात अचानक उठ जाता हूँ
और दिख जाती है उस शाम सड़क पार करते काऊए की लाश।

सच उसके पंखों में जंग लगा हुआ था और पेट से अंतड़ियाँ नहीं गोलियाँ निकल रही थीं।

अक्तूबर 16, 2013

अकेलापन कहीं बाहर नहीं था अंदर था

पता नहीं आलोक मेरे अंदर किस अकेलेपन की बात कर रहा है। उसने इसे कैसे मेरे अंदर देखा होगा। क्या ख़ाका उसके दिमाग में घूम रहा है। किन बिन्दुओं पर ठहर गया होगा। फ़ोन पर पूछा भी तो कहा यहाँ नहीं। कभी लिखुंगा। पीछे कहीं पढ़ रहा था शहर और ऊब पर। ऊबते शहर में ऊबते हम। यह पता नहीं कैसा है। सोचने लगा उन्हे कैसे पता यह शहरी निर्मिति है। इसके बिना शहर का कोई अस्तित्व हो नहीं सकता। यह ऊब के बिना रह नहीं सकता। इस तरह यह सह-उत्पाद नहीं यहाँ रहने की कीमत है। फ़िर मन में आया के देखता चलूँ अपना शहर कैसे बना है। उसमें ख़ुद कहाँ स्थित हूँ। हूँ भी या यह ऐसे ही कोई काल्पनिक मनःस्थिति है। है भी या नहीं।

दिल्ली। अपना शहर। बचपन से लेकर आज तक। बीच में बहुत से साल हैं। कई-कई बोरे भर-भर यादें हैं। यहाँ ढलती शामें उदास रातें और कितने तरह के किस्से। पहले कहीं लिखा था शहर कहीं बाहर नहीं हमारे अंदर होता है। धड़कनों के साथ धड़कता। दिल के पास। मुलायम एहसासों के साथ। वहाँ कुछ देर बैठना थकाता नहीं। ऊर्जा से भर देता है। यादों के दरीचे खोल देता है। याद वही है जो रह जाए। और रहते अच्छे दिन हैं। रहती उनकी गंध है। उनमे हम हैं। हमारी बातें हैं। यादें हैं।

अगर यह शहर मुझे अकेला कर रहा है बराबर तोड़ रहा है। उसमें कहीं कुछ भी मिलता-जुड़ता नहीं दिख रहा तो यह अंदर से बाहर और बाहर से अंदर घटित होती उन सारी प्रक्रियाओं को एक-एककर एक साथ देखने का आग्रह साथ लिए है जो साफ़-साफ़ सतह पर नहीं हैं। कहीं छिपी हुई हैं। उनकी तरफ़ अब जाना होगा। देखना होगा। बारीक निगाह से। आहिस्ते से।

ऐसे में अगर फ़िर पीछे मुड़कर देखूँ जहाँ आलोक मुझसे पहली बार मिला वह कोई चार साल पहले का अनाम भूला हुआ सा दिन है। उसकी कोई याद कहीं भी लिखी नहीं गयी। उसे बस ऐसे ही रहने दिया। अनलिखी तारीख़ की तरह। यही वह समय है जब राकेश से भी पहले पहल मुलाक़ात हुई। हम सब एक ही कोर्स में साथ थे। वह बाद में मेरे अकेलेपन से निकल आने का साल बना। ‘पोस्ट रोमेंटिक ट्रॉमा’ से बाहर आने का साल। इस पर तो न-मालुम कितने-कितने पन्ने भर-भर दिये। इसे याद करने का मन भी नहीं करता। लिखने का मन नहीं होता। इसलिए नहीं। कुछ नहीं।

इस विषयांतर प्रसंग से वापस अपने शहर पर लौटूँ तो पता नहीं इस शहर को लेकर तब कैसा सोचता रहा था। ठीक-ठीक याद नहीं। कि कभी ऐसे सोचा भी है या क्या। वह कैसे और कितना मेरे अंदर धड़कता रहा था इसे कभी ऐसे नहीं देखा।

पता नहीं वह कैसे अजनबी से भाव रहे होंगे जब अकेले घूमना अकेले नहीं लगता था। कोई साथ न हो फ़िर भी नहीं। कॉलेज से मेट्रो स्टेशन इतनी दूर तो था ही कि उसे सामान्य अर्थों में पैदल दूरी नहीं कहा जा सकता। पर फ़िर भी मौका लगे गाहे बगाहे कई एकल पदयात्राएं होती रही थीं। अकेले रहना अकेले रहना नहीं था। वह मुझे पूरा कर रहा था। मुझे, मेरे जितना, समझने के लिए, किसी को भी उस सब बातों से गुजरना पड़ता जिन सबसे गुज़रकर मैं वहाँ पहुँचा था। इतने भागते दौड़ते शहर में इतना एकांत और अवसर किसी के पास नहीं होता। किसे क्या गरज़ पड़ी है के उन बने बनाए ढर्रों से बाहर निकल मेरे ऐसे होने को समझे। यह शायद मैंने ख़ुद को समझा लिया था। इसीलिए किसी से किसी प्रकार की अपेक्षा रखने का कोई मतलब नहीं था। ख़ुद समझदार हो गया था। हो रहा था। 

ऐसे दिखने में भले अकेला एकांत में रहने वाला बना रहा पर ऐसा था नहीं। यह सतह पर था। भीतर कतई नहीं। दोस्त मुझे भी अच्छे लगते हैं। उनके साथ वक़्त बिताना किसी जगह पर घूमने से जादा पसंद है। बातें मैं भी कर सकता हूँ। बातों से निकलती बात अमलतास का पेड़ हो सकती हैं। हम घंटों बहस में उलझे रह सकते हैं। घड़ी वहीं रुकी रह सकती है। जो इस दरमियान पास आए वह अभी भी साथ हैं। मुलाकातें हैं। रंज-ओ-गम हैं। गिले हैं। शिकवे हैं। कई-कई बातें अभी भी अन चुकी किश्तों की तरह बकाया हैं। भले सालों उनसे बात न हो पर कई कोने उनके लिए भी बचाए रखे हैं।

ऐसे में इस शहर को देखता हूँ। वह याद नहीं आता। यह अकेलापन जितना इस शहर का बनाया दिखता रहा वह थियरी यहाँ आकार फ़ेल हो जाती है। उसके खाँचे में फ़िट नहीं बैठता। यह शहर के स्थगित होते जाने के साल थे। उसे बिन बताए गुज़र जाने के साल। उस संत्रास ऊब अकेलेपन को मैंने अपने लिए गढ़ा। अपने लिए ख़ुद में अपनी जगह बनाई। किसी और को दाख़िल नहीं होने दिया। कोशिशें थीं। फ़िर भी नहीं। उस अकेलेपन में जैसे मज़ा आता रहा। बहोत बेकार से सालों के बाद ऐसा वक़्त आया जब उस खोल से बाहर आने के इतने सारे मौके एक साथ आए। उन दरीचों से पहली बार साँस लेने बाहर निकला। लगा दम नहीं घुट रहा। तब से बाहर बने रहने की कोशिश में हूँ।

पता नहीं और कितनी ही साथ-साथ घूमने लगी हैं पर सोचता हूँ कुछ तुम्हारे लिए भी छोड़ दूँ। वरना कहोगे  गैर जमानती वारंट से बचने के लिए पहले ही ‘हलफ़नामा’ दायर किए दे रहा हूँ। इंतज़ार में हूँ कब तुम लिखते हो। भूल मत जाना।

अक्तूबर 15, 2013

ये कोई बहुत अच्छ दिन नहीं हैं

ये कोई बहुत अच्छ दिन नहीं हैं। बस बराबर इनसे बचने की कोशिश में घुलता जा रहा हूँ जैसे। आँखों के सामने बीतते दिन अंदर-ही-अंदर पता नहीं क्या करे जा रहे हैं। कहीं मन न लगना इसकी पहली निशानदेही थी। कई-कई महीनों पहले। अनमने रहने का मन नहीं करता। फ़िरभी इसी में बने हुए हैं। लगातार बेतरतीब। खाली-से। इन दो शब्दों के आगे चुक-सा जाता हूँ। इस दुनिया में कहाँ खड़ा हूँ। पता नहीं। बात भीड़ में पहचान की नहीं है। पहचान में पहचाने जाने की है। उमर के जिस तरफ़ खड़े यह सब देखते आ रहे हैं वहाँ और कितने दिन बिन नौकरी के रह सकते हैं कह नहीं सकते। रोज़ उबासी लेती सुबहों को उन्ही उदास होते जाते सपनों के साथ ढोते रहने का मन नहीं होता। उनकी नीम बेहोशी में हम कहीं नहीं हैं। बस खाली होते जा रहे हैं। अंदर-ही-अंदर बुनावट बिगड़ती जा रही है। अपने को भी कभी चीन्ह नहीं पाते। पहचान कमज़ोर होती जाती है। सब सामने होते हुए भी नहीं देख पाते। 

ऐसे में नए सपनों की किश्त कैसे बाँध लें। वही पीछे वाले बोझ बनते जा रहे हैं। पीठ पर रखी रुई का बोझ बढ़ने लगा है। वह भीग रही है। वैसे भी उनके इकट्ठे होते जाने से वह सच होने से रहे। वह इस सच के आगे चकनाचूर न हो जाएँ इसलिए कभी-कभी लिखने से भी बचने लगा हूँ। बचने लगा हूँ सामना करने से। कुछ भी सोचने का मन नहीं करता। बस खाली बैठे वक़्त काटते रहें के दिन हैं। कुछ करने के लिए नहीं हो जैसे। वहीं आज से जादा कल की बीती यादें खींचती हैं। घेरे रहती हैं। यह ‘एस्केप रूट’ जैसा है। पर अपना काम कर जाता है। अपने आज से भाग कहीं पीछे छिप जाता हूँ। उसकी ओट में चुपके से देखता रहता हूँ। इधर कबूतर बन गया हूँ। कहीं से किसी बिल्ली को इन सपनों पर आने नहीं देता। ख़ुद पर झपटने नहीं देता। 

कभी मन करता है, किसी ऐसी नींद में चला जाऊँ। जहाँ से उठूँ तो सब सपने सच हो कर सामने इंतज़ार में खड़े हों। भले पहुँचने में थोड़ी देर मेरी तरफ़ से ही हो जाये। पर वह मेरे इंतेज़ार में निमियक तरे बैठे रहें। वह उस कगार तक पहुँच जाएँ जहाँ छोटी-सी रात के बाद वह सब सच हो जाएँ। पर ऐसी नींद आती नहीं। मैं सोता नहीं। रात कितनी बार टूटती है कोई हिसाब नहीं। कहीं लिख नहीं लेता। वह धोखे से टूटती है। फ़िर भी उसे बताता नहीं हूँ। के उठ गया हूँ। लेटे-लेटे उसके इंतज़ार में सुबह कब होती है पता नहीं चलता। वह रोज़ रात ऐसा ही करने लगी है। इधर कुछ जादा ही। उसे समझना होगा। कुछ बहाने बनाकर मानना होगा। 

जितना मासूम हो सके उतना मासूम होकर ख़ुद को बिखरने से बचाए रहता हूँ। लेटे रहने का मन किए रहता है। लेटना ख़ुद को बचाना है। कुछ नहीं सोचता। सोचना बिखरना है। टूटना है। पर कितनी बार ऐसे हो सका हूँ। हरबार यह कोशिश कुछ कम रह जाती। दिन में कितने ही पल ऐसे बीतते हैं जब टूटकर बिखर-बिखर जाता हूँ। समेटने में हर बार कुछ-कुछ रह जाता। कुछ टुकड़े चुभ जाते हैं। दर्द होता है। इन बिखरने समेटने में दिन शामों में शामें उदास रातों में बदलती जा रही हैं। कुछ न कर सकने का भाव अंदर तक सिहरन की तरह दौड़ने लगता है। यह लगातार कमज़ोर होते जाना है। उसमें कहीं साबुत बचे रहने की कोई गुंजाइश नहीं रहती।

सब इतना निर्मम लगता है जिसे कह पाने में कर बार लौट उसी भाषा में अपने को आरामदायक जगह पर नहीं पाता। भाषा को लेकर लगने लगा है वह जितना बताती नहीं उससे जादा छिपा जाती है। वह ‘कंफ़र्ट ज़ोन’ की तरह है पर कमज़ोर परदे की तरह होती गयी है। जिसे कई बार उघाड़ने का मन किए रहता है। कभी कचोट भी होती है के जैसा अंदर तक होता गया हूँ, उसे कह क्यों नहीं पा रहा। जैसा मन में लगता रहा है, उसे किन शब्दों में ढाल हूबहू बाद वाले दिनों के लिए रख लूँ। यह बदलकर रख लेने की ज़िद भी हो सकती है जहाँ से बार-बार अपनी तफ़तीश चलती रहे। सच में इसी तरह, इसी ढर्रे से बात कहना किसी ऊब पैदा करने वाली भाषा की कमज़ोर संरचना लगता है जिसे ढोता रहा हूँ। चाह कर भी इसे बदल नहीं पा रहा। फ़िर कोशिश करनी होगी। दोबारा। बार-बार। 

फ़िर इधर जितना संवेदनशील होता गया हूँ उसे ‘हायपर सेंसिटिव’ ही कहेंगे। लगातार ख़ुद को कहीं किसी गलत जगह फँसा देखकर कचोट लगातार घेरे रहती है। फ़िर ढूँढता हूँ कोई खाली जगह। जहाँ जाकर थोड़ी देर उदास रह सकूँ। कोई चहरे पर आते जाते भाव न पढ़ सके। उन पलकों में रह गयी बूँदों को किंही भाषिक अनुवादों के सहारे समझ न सके। बोले जाने लायक कोई भी शब्द उन सबको यहाँ कह नहीं पा रहा। बस भागे जा रहा हूँ। अपने आप से। दौड़ कहाँ ख़त्म हो रही है, पता नहीं। यह पैदल चलने से भी धीरे चलना है। इतना सब करके, तरह तरह से इन भारी-भारी दिनों में अपने को समेट कुछ-कुछ बचाए रहना चाहता हूँ। बस इतनी छोटी सी तमन्ना को दिल में लिए लिए डोल रहा हूँ। घसिट रहा हूँ। भाग रहा हूँ। पता नहीं कैसे। 

कभी डायरी में लिखा था इधर नौकरी को तीतर-बटेर की तरह इस्तेमाल करने लगा हूँ। सच में। लगने लगा है। सच में यह कोई बहुत अच्छे दिन नहीं हैं। उन्हे मुहावरा बनने से पहले जग जाना है। उठ जाना है। सपनों से निकलकर लौट आना है।

{बीती डायरी का एक पन्ना:  कल आएगा साथ नौकरी लाएगा ,
फ़िर आगे के दो-तीन पन्ने और.. हमारी उमर लगातार हमें तोड़ रही है, नवंबर नौ एक रुकी हुई शाम }

अक्तूबर 12, 2013

इस तरह उदासी..


जब तुम अपनी आवाज़ में अपनी उदासी छिपा रही होती हो
मैं बिलकुल वहीं उसी आवाज़ में कहीं बैठा उदास हो रहा होता हूँ।

इस तरह हम दोनों लगभग एक साथ उदास होने लगते हैं।

इस उदास होने को हम किसी काम की तरह करते
हम दोनों इसी की बात करते
कि उदास होने से पहले और उदास हो जाने के बाद हम क्या-क्या करेंगे।

बात उदासी से शुरू होकर उदासी तक जाती
कोई ऐसी बात नहीं थी जिसमे हम इसे ढूँढ नहीं लेते थे
एक दूसरे पर नाराज़ भी होते कि इस उदासी के मिलने की बात पहले नहीं बताई
कई झगड़े इसी उदासी पर होते और हम एक बार फ़िर उदास हो जाते।

जब कई दिन बीते उदास नहीं हो पाते इसे कहीं से भी ले आते
और फ़िर उदास हो आते।

उदासी हम दोनों का स्थायी भाव होती गयी
हम दोनों स्थायी उदास होते गए
इस अदला-बदली के बावजूद हम दोनों उदास थे।

जैसे अभी उदास हैं
के उदासी के अलावा कोई और शब्द नहीं मिला जिस पर उदास हो सकें।

अक्तूबर 11, 2013

उस रात हम कहीं खो गए थे

धीरे-धीरे अँधेरा बढ़ रहा है। ठंड भी नीचे उतर आई है। सूरज ढले कई पहर बीत गए हो जैसे। या ऐसी कोई चीज़ उस जगह ने कभी देखी ही नहीं है। पता नहीं यह क्या था। बस अँधेरे की तरह दिख रहा है। हमें जल्द ही वहाँ से चल पड़ना होगा। ताकि आगे कोई होटल मिल सके। पर दिक्कत है अभी तक पीछे छूटी रह गयी ‘इनोवा’। उसकी कोई खोज खबर नहीं। आखिरी बात हुए चार घंटे होने जा रहे थे और अभी तक वह हमसे मिल नहीं पाये। इधर एक एककर मोबाइल बैटरी भी ‘डिस्चार्ज़’ होती जा रही थीं। बिलकुल हमारी तरह। ठंड में वैसे ही उनकी ‘लाइफ’ कम रहती है। बार-बार आते-जाते सिग्नल पकड़ने में जादा ख़त्म हो रही है। हमें आगे केयलोंग तक जाना है। स्पीति घाटी।

रास्ता अँधेरे में इतना आसान नहीं होता। इसलिए थोड़ी ही देर में यह तय कर लेना था के आगे चल पड़ें या यहाँ और कितनी देर रुके रहेंगे। ठंड बढ़ चुकी थी। हम सब बस में बैठे इंतज़ार कर रहे हैं। इस इंतज़ार ने जैसे धीरे-धीरे हमारे सारे दृश्यों को अँधेरे में छिपा लिया। शायद उसने ऐसा करके अच्छा ही किया। जो हमारी याद में जैसा रह गया उसने उसे वैसे ही रहने दिया। बिन छेड़े हम दीवान को भरते रहे। हमारी बस अभी भी सड़क किनारे खड़ी है। सड़क अभी भी खाली है। न कोई आ रहा है। न कोई जा रहा है। नदी भी अभी बह रही है। उसमे पड़े पत्थरों से टकराते पानी की आवाज़ भी लगातार आ रही है। यह शाम हमारे सामने बदली। हम तब से वहीं हैं। यह डर नहीं है पर ऐसा ही कुछ है। यह उस वक़्त आहिस्ते से हमारी बस में भी था। हम सब शांत हैं। बात हो भी रही है पर धीरे-धीरे। आहिस्ते से। हम बस अब चल लेना चाहते हैं। यह रुके रहना अब जच नहीं रहा। यह ऊब के आसपास घिरता सा है। ऊर्जा का स्तर भी अब सुबह वाला नहीं रह गया। चुपके से थके धीरे धीरे हम छोटी-छोटी नींदों में चले गए। नींद सारे दिन को तरतीब से लगा लेगी।

उस घुप्प अँधेरे में सब और रुके रहना नहीं चाहते। जितनी जल्दी हो सके यहाँ से चल पड़ें। पर कब। पता नहीं। कहीं दूर से एक रौशनी हमारी तरफ़ आती दिखती। वह हमारी तरफ़ आती जाती। लगता वह हम तक आकार रुक गयी है। पर नहीं। पता नहीं हमारी गाड़ी कहाँ से चली है। कहाँ मिलेगी। यह हम सबका इस किस्म का पहला इंतज़ार बन रहा था। हर रोशनी हम तक आती लगती। पर आती नहीं। काफ़ी देर बाद किसी कार के हॉर्न से हम जागे। इस दरमियान जो आठ दस संगी नीचे खड़े इस इंतज़ार को कम करने की गरज से खड़े थे अब भारी पैरों से ऊपर चढ़ रहे हैं। आते ही आकर अपनी सीटों पर धँस गए। पता नहीं उनका इंतज़ार हमारे इंतज़ार से कैसे अलग था।

थोड़ी देर बाद बस घरघरा कर चल पड़ी। केयलोंग। जादा दूर नहीं है। यही हम सब भी सोच रहे हैं। पर उस आँख में चुभती हैडलाइट में रास्ता ढूँढने का मन नहीं है। मन कहीं रुक गया है। कहीं पीछे बीते दो दिनों में। उन शामों में। उनकी जमा हो गयी यादों में। इनोवा आगे-आगे थी। हम पीछे-पीछे थे। जेस्पा में कभी ठहरे होटल की ख़ोज जारी है। वह कहीं खिसक गया है। पता नहीं। पर वह मिल नहीं रहा है। जहाँ उसे होना था वहाँ नहीं है। पता नहीं कहाँ है। बस सड़क है। रोशनी है। चुप्पी है। और तीस सिटर बस है। हम आकुल व्याकुल नहीं हो रहे हैं। ऐसा होने के लिए जितनी जानकारी होनी चाहिए वह हमारे पास उस अनुपात में नहीं है। हम बस बैठे रह सकते हैं। बस बैठे हुए हैं। बार-बार घड़ी देखने से तो वहाँ पहुँचने से रहे। इसलिए एक सीमा पर वह भी देखना बंद। हमें एहसास नहीं था के हम खो गए हैं। अँधेरे में गुम हो गए हैं। सड़क जैसे जिधर मुड़ रही है उसी दिशा में हम भी लगातार होते जा रहे हैं। उस अंतहीन सफ़र वाली सड़क पर भागते जा रहे हैं।

थोड़ी देर बाद लगा हमारी दिशा बदल गयी है। अब हम उल्टी तरफ़ भागे जा रहे हैं। मतलब जिस तरफ़ नहीं जाना था उस तरफ़ काफ़ी आगे तक आ गए थे। अब लौट रहे हैं। इस पर हमें खीजना नहीं था। हम नहीं खीजे। बस बैठे रहे। बैठे रहे। सड़क के किनारे रिहाइश थी नहीं। वह थीं भी तो बहुत छोटी-छोटी। जहाँ भी कहीं बल्ब जलते दिखते हम और सुस्त हो जाते। कि चलो अब पहुँच गए। यह पहुँचना कई घंटों से स्थगित सा था। हम सब कहीं भी पहुँचना चाहते थे। पर पहुँच नहीं पा रहे थे। बीच में कहीं फँसे से रह गए हैं। वह स्थिति कैसी होगी जब हम कह सकेंगे हम पहुँच गए। किसी को नहीं पता। ऐसे में धीरे-धीरे थकान अब नींद में नहीं ‘होम सिकनेस’ में बदलती रही।

यह कल की रात है। दस अक्टूबर। दो हज़ार नौ। स्पीति घाटी, होटल ‘ताशी-द-लेक’ पहुँचने से पहले। अभी अगली सुबह आएगी। हम बारालाचा ला छूकर आएंगे।

पिछली रातें: मनाली की पहली रात कुछ देर से हुई थोड़ा रुक कर आई/ बस थोड़ी देर वहीं थम सा जाना चाहता हूँ/                              रोहतांग-केलोंग-बारलाचा ला से वापस/ सपनों की डाड़ के सहारे कुछ देर सुस्ताते मील के पत्थर

अक्तूबर 10, 2013

बस थोड़ी देर वहीं थम सा जाना चाहता हूँ

नींद आ रही है पर लेटुंगा नहीं। क्योंकि पता है लेटने पर भी वह आने वाली नहीं है। इधर वह ऐसे ही परेशान करने लगी है। करवट-करवट बस उबासी आती है नींद नहीं। और फ़िर जब यादें खुली आँखों से आस पास तैर रही हों तो सोने की क्या ज़रूरत। ऐसे ही कल हम मनाली थे। माल रोड घूम रहे थे। नाप रहे थे। आज सुबह हमें रोहतांग के लिए निकलना था। तड़के। सुबह ठंड थी और कमरे के बाहर खिड़की की दूसरी तरफ़ खड़ी अंदर आने की कोशिश में थी। अंदर नहीं आई। वहीं खड़ी रही। बाहर। हमें चेक आउट करना है। मतलब वापस होटल नहीं लौटना। रोहतांग से आगे। नीचे उतरना है। पर अभी थोड़ा वक़्त है। नाश्ते के बाद निकलेंगे। जल्द। 

रोहतांग सबसे ऊँचा दर्रा। दुनिया की सबसे ऊँचाई पर चलती सड़क। मेग्नेटिक हिल। पैरा ग्लाइडिंग। यह सब तबतक दिमाग में नहीं घुसे थे। हम सबके लिए वह घूमने लायक जगह ही थी। वही बनी रही। बस थोड़ी दूर थी। कुछ घंटो बाद हम वहाँ होंगे और कुछ नहीं। नाश्ते में आलू के पराठो के साथ दही थी। सारा दिन बस में गुज़ारना है इसलिए भूख कम ही लगी।

हम वहाँ जा रहे थे जहाँ पहले कभी नहीं गए थे। उस ऊँचाई को छूने। उसके बीच से गुजरने। डर के पास से नहीं रोमांच के साथ। वहाँ पहाड़ से आती हवा में ठंडक उसी बर्फ़ की थी जो वहाँ पिछले मौसम गिरी होगी। हमारी त्वचा को छूती। अंदर तक सिहरन से भर देने वाला एहसास। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ। अब होने जा रहा था। उस पर गिरती रोशनी अपने रंग बिखेर हमें बुलाती सी रही। वहाँ बादलों के बीचों बीच परछाई से हम कहीं खो गए। पता नहीं हम मणि कितने बजे के लगभग पहुँचे। पर सूरज बिलकुल सिर से होते हुए थोड़ा नीचे खिसक चुका था। और हम इतनी ऊँचाई पर थे जहाँ भुट्टे को आसानी से उस सुर्ख़ रोशनी से टकराकर आते एहसास के साथ खा सकते थे। उस ऊँचाई को महसूस कर सकते थे।

वहीं एक मंदिर है। मंदिर में छोटे-छोटे बौद्ध भिक्षु बैठे हैं और 'जेके सीमेंट' वाले शायद किसी ऍड की शूटिंग कर रहे हैं। हमारे आने से थोड़ी देर के लिए वह रुक गए। कईयों के कैमरों से फोटो उतारे जाने लगे। बाद में एक दो तस्वीरों में कहीं-कहीं मैं भी बैठा देखा पाया गया। पर आज तक वह ऍड टीवी पर टेलिकास्ट हुआ हो ऐसा जान नहीं पड़ता। उसी मंदिर के पीछे जमीन नहीं है। जमीन काफ़ी नीचे है। उस खाई जैसे दिखने वाले दृश्य में ऊपर किसी पहाड़ से पैराशूट बांधे कई-कई जम्पर दिखाई दिये। पैरा-ग्लायडिंग की तरह। हम काफ़ी देर उनको तक देखते रहे। कैसे हवा के संग वह उड़ते रहे। उनके पंख नहीं हैं पर वह अभी हवा में हैं। हम वहाँ जाने वाले हैं हमें नहीं पता। क्या वहीं हमें भी जाना है। पता नहीं। हम भी कूदेंगे तो डर लगेगा कि नहीं। हवा कितनी देर तक संभाले रहेगी। पता नहीं ऐसा क्या-क्या उन क्षणों में अंदर तक समाता गया।

ऐसे ही कई सारे दृश्य कभी कभी गाहे-बगाहे आँखों के सामने से गुज़रते रहते हैं। एक में हम रोहतांग से नीचे उतर आए हैं। और सड़क की हालत भी काफ़ी दुरुस्त लग रही है। वहीं कोक्सर में हम दोपहर के खाने के लिए रुक गए हैं। एक नदी है। सड़क किनारे। एक सड़क है। नदी किनारे। ऐसे में वह दोनों एक दूसरे के किनारे-किनारे अगल-बगल हैं। बस खड़ी है। दूर-दूर तक कहीं कोई नहीं है। सिर्फ़ हम हैं। जहाँ तक नज़रें जाती हैं वापस लौट हम तक ही आती। उसके साथ कोई और नहीं आता। उस सामूहिक एकांत में हम अपने अपने हिस्से ढूँढ रहे थे। उन्हे इतनी-इतनी बार देख लेना चाहते थे के आसानी से उन्हे पहचान सकें। यह पहचान अगली बार लौटने पर काम आएगी। शायद हम सब ऐसा ही सोच बिन बोले वहाँ रुक से गए। इसे ठिठकना नहीं कहेंगे। यह ठहरना है। उन स्मृति कोशों को भर लेना है जो खाली रह गए हैं। इन जगहों से। इनकी बुनावट बनावटों से। वहाँ थोड़ी देर बैठ इनसे बातें कर लेने जैसा। कुछ उनकी सुन लेने जैसा।

वहीं पहाड़ के बीच में बची रह गयी जगह पर एक चाय की दुकान है। हम पीछे रह गयी इनोवा के इंतज़ार में बड़ी देर से बैठे हैं। मैगी के कटोरे आगे घूम रहे हैं। चाय के कप एक हाथ से दूसरे हाथ में जा रहे हैं। हम ऐसी जगह हैं जहाँ फ़िर कब होंगे किसी को नहीं पता। उन बीतते क्षणों में आज भी हम अटके से हैं। वहीं कहीं बैठे मज़ाक में अपने किस्से को ढूँढते से। मुस्कुराहटें एक दूसरे के होंठों से गुजरती हमारे गालों तक भी आई होंगी। हम भी थोड़े शरमाये होंगे। थोड़े खिलखिलाए होंगे। थोड़े खीज कर वहीं धँसते जा रहे होंगे। पर बात कहीं अटकी नहीं होगी। वह चलती रही है। चलती रहेगी।

आगे बस थोड़ी देर वहीं थम सा जाना चाहता हूँ। थोड़ा वहीं एक बार फ़िर अपने को छू आना चाहता हूँ।

पीछे के पन्ने:  मनाली की पहली रात कुछ देर से हुई थोड़ा रुक कर आई / रोहतांग-केलोंग-बारलाचा ला से वापस /
                    सपनों की डाड़ के सहारे कुछ देर सुस्ताते मील के पत्थर

अक्तूबर 09, 2013

मनाली की पहली रात कुछ देर से हुई थोड़ा रुक कर आई

जगहें वही रहती हैं उनके किरदार बदल जाते हैं। हमारा कॉलेज उसी जगह था जहाँ बीते तीन महीने से उसे देखते आ रहे थे। कहीं से भी थोड़ा भी अलग नहीं लग रहा था। पर कुछ उस दिन में ही था जो उसे अंदर ही अंदर बदल रहा था। शाम धीरे धीरे वहाँ उतर रही थी। जैसे उस जगह पहले कभी उतरते नहीं देखी थी। चुपके से आहिस्ते से वह वहाँ बिखरती रही। यहाँ से वहाँ तक। वहाँ से यहाँ तक। हम इसे देखते तो रोज़ आ रहे थे पर यह दिन और इस दिन की यह शाम कुछ अजीब सी थी। सब कुछ जाना पहचाना था भी और बहुत कुछ बिलकुल नया सा भी। अगले चार दिन हम दिल्ली में नहीं रहेंगे। अभी बस आई नहीं है। अंदर ही अंदर अकुलाहट भर गयी है। इंतज़ार है।

थोड़ी देर में अँधेरा होने से पहले हम यहाँ से चल पड़ेंगे। हम सबकी एक दूसरे से जान पहचान जादा पुरानी नहीं है। मेरे तो उससे भी कम। पर नहीं। हम सब साथ जा रहे हैं। पहाड़ों को देखने का रोमांच कुछ अलग ही होता है। बरफ़ से ढके बादलों के बीचों बीच। सड़क। सड़क किनारे अंतहीन गहराई। हम डर नहीं रहे थे। कुछ सोच भी नहीं रहे थे। जो नहीं देखा उसे देखने जा रहे थे। बसें कभी डराती नहीं हैं। हमारा बचपन शुरू से इनके इर्दगिर्द घूमता सा रहा। इसलिए भी नहीं सोच रहा था रात कैसे कटेगी। सफ़र कैसा रहेगा। बस खिड़की किनारे वाली सीट पर बैठ उस रात एकटक बाहर देखता रहा। कैसे अँधेरा रात बनकर मेरे अंदर बार-बार आता। बार-बार पलकों को अपने साथ ले जाना चाहता। पर नहीं। उसे आने नहीं दिया। और सिर्फ़ मैं ही नहीं हम सब अपने अपने हिस्सों में खोये-खोये से थे। कोई कम कोई जादा।

इस वक़्त जब लिख रहा हूँ दोपहर के तीन बज रहे हैं और हम मनाली पहुँच चुके हैं। शायद खाना खाने के लिए अपने अपने कमरों से आकर नीचे डायनिंग हाल में बैठे हैं। ऊपर कमरों की खिड़कियाँ बड़ी-बड़ी हैं। तब भी उनमे बाहर खड़े ताड़ के पेड़ समा नहीं पा रहे हैं। वह न जाने कब से खड़े हैं। जैसे किसी के इंतज़ार में। उधर हम लेटे-लेटे अपनी रात की थकान के आस पास घूम रहे हैं। वह धीरे-धीरे चढ़ रही है। नदी पहाड़ सड़क सब कुछ हमारे लिए अब पहले जैसा नहीं रह गया है। वह हमेशा के लिए बदल गया है। इस नयी जगह का अपना सुरूर काम करता लग रहा था। हम ताज़ा थे। बिलकुल तरो ताज़ा। चेहरे आसानी से उन्हे छिपा ले रहे थे। आँखें अलग चमक रहीं थी। फेफड़े पहाड़ों पर आकर दुगनी साँस भरे ले रहे थे। मौसम ठंडा था पर धूप भी खिली-खिली सी थी। नए मेहमानों को देख रही थी। नए मेहमान उसे देख रहे थे।

अब तक हम अच्छी तरह से समझ चुके थे मनाली पहाड़ पर है पहाड़ पर बरफ़ है। और यह ऊँचे-ऊँचे पेड़ों के साये में बैठा ऊँघता शहर तो कतई नहीं है। सैलानी ऐसे ही आते जाते रहे हैं और एक से अनुभवों के बावजूद वह सबके दिलों में कई कई सालों तक ऐसे ही ज़िंदा रह जाएँगे। जब दिन बीत जाते हैं तब बचती हैं उनकी छवियाँ। उन छवियों में शब्द नहीं होते कोई ध्वनि नहीं होती। वह दिमाग नहीं दिल का हिस्सा होता है। कोमल सा। नाज़ुक सा। किसी छेड़छाड़ के लिए कभी तय्यार नहीं। ऐसा ही इन चार सालों में हमारे दिलों साथ होता गया होगा। खाना खाने के बाद लगभग पाँच बजे हम हिडिंबा मंदिर की तरफ़ निकलने को हुए। मंदिर कभी भी घूमने के अलावा किसी काम नहीं आए। इसलिए जाने में कोई धार्मिक दिक्कत नहीं आई। कोई चार सौ साल पुराना लकड़ी का मंदिर है, वही लकड़ी देखने चल पड़े।

लौटते लौटते अँधेरा होना ही था। हो गया। हम पैदल पुराने मनाली होते हुए माल रोड पहुँचे। रंग बिरंगे लट्टू जगमगा रहे थे। लोग भी वैसे रंग बिरंगे कपड़ों में जगमगाते इतना घूम लेना चाहते थे के उनकी यादों के धुँधला हो जाने पर भी उनकी यादों का रंग बचा रहे। बाज़ारों का अपना चरित्र कुछ नहीं होता बस कुछ चीज़ें अदल बदल जाती हैं। उनको हमेशा बिकने वाला बने रहना पड़ता है। लगातार जेब टटोलने वाला। उसे खाली कर लेने वाला। हम भी कई टुकड़ों में अलग अलग सड़क नापने लगे। अपने हिस्से के रंग स्वाद ठंड को इकट्ठा कर यहाँ से समेट ले जाने के लिए। झोला भर भर। हमारी इनफेंट्री कम से कम इतने चक्कर तो लगा ही चुकी थी के शर्तिया कह सकें कि इस सड़क पर अखरोट की यादगार लकड़ी के छल्लों और ऐसे ही छल्लों पर लिखने वाले कुल चार लड़के हैं। बस अड्डा कितने कदमों पर है। हमारा होटल कितने मिनट की दूरी पर है।

यह मनाली में हमारी पहली रात थी। कुछ देर से हुई। थोड़ा रुक कर आई। अभी के लिए इतना ही। बकाया एक दो दिन में।

अक्तूबर 07, 2013

डायरी का उदास सा पन्ना..

पता नहीं कैसे अजीब से दिन हैं। बिलकुल ठहरे से। उदास से। बेतरतीब। कहीं कोई मुस्काता बहाना भी नहीं। इतना लिखकर मन कर रहा है लैपटाप बंद कर थोड़ी देर सो जाऊँ। मन खाली-खाली सा है। पता नहीं यह कैसा भाव है। कैसा करता जा रहा है। शनिवार से भूख कम हो गयी है। खाने का मन नहीं करता। इस लाइन को लिखने के बाद रुक गया। सोचने लगा। ऐसा क्या है, जो ऐसे होते जाने का कारण है। एक-एक कर मेरे वो सारे बहाने जिनसे थोड़ी देर के लिए ही सही मन थोड़ा बहल जाता था, सब चुक से गए हैं। मुझे छोड़ मुझसे अलग खड़े देख रहे हैं। उनका ऐसा होना बिलकुल भी मन मुताबिक नहीं है। बिलकुल भी नहीं। कभी नहीं।

घूमता हूँ तो मन बाहर नहीं अंदर ही चक्कर लगा रहा होता है। लिखने से लगातार बचता रहता हूँ। डायरी चुप पड़ी रहती है। ख़ुद को समझा नहीं पाता। क्या लिख दूँ। मेरे पास एक कमज़ोर सी भाषा है जो कह भी नहीं पाती के कैसा महसूस कर रहा हूँ। जैसे दोहरा कर वहीं घूमता रहा हूँ। उसके पास एक भी शब्द लेजाता मालूम नहीं पड़ता। गाने भी कहीं नहीं लेजा पाते। उनके बोल बस बोल रह जाते हैं। कहीं दिल में उतरते नहीं लगते। बेमानी से। अंदर तक उदासी को और उतारने देते हैं।

अभी लेटा तो लगा नींद नहीं आएगी। तीन दिन से इसी के इर्दगिर्द होता गया हूँ। बस लेटा रहता हूँ। मन घूमता सा रहता है। दिल डूबा-डूबा सा है। खामोश सा। चुप सा। कुछ नहीं बता रहा। बस बैठ गया है। ऐसे दिन किसे पसंद होंगे। किसी को नहीं। मुझे भी नहीं। एक बार तुमने कहा था न जब बात नहीं होती तब ऐसे ही सब होता रहता है। उलझन भरा। परेशान करने वाला। जहाँ हम कुछ नहीं कर रहे होते हैं। बस जो बीत रहा होता है उसमें हम होते हुए भी नहीं होते। नहीं होते हुए भी होते हैं। तुम्हारी आवाज़ सुन लेने के आसपास। डूबते उतरते से दिन वैसे ही ढलती शाम में बढ़ते अँधेरे के साथ उतरते। थोड़े चुप से। थोड़े छिपे से। थोड़े गुम से।

चेहरे से किसी को पता नहीं लगने देता कैसा होता जा रहा हूँ। अंदर की उधेड़बुन सतह पर आने नहीं देता। अनमना सा होते हुए भी कल दोस्तों संग घूमता सा रहा। फ़ोटो खिंचवाने का मन नहीं था। वहाँ चेहरा गुमसुम सा है। पर पकड़ा नहीं गया। बढ़ी दाढ़ी ने अपने अंदर छिपा सा लिया। इतना कम चलने पर थकता नहीं हूँ पर कल पैर दर्द करने लगे। मन बिलकुल भाग रहा था। कहीं एक टक रुकने को तय्यार नहीं था। अजीब सी बेचैनी एक दायरे में जकड़े हुई थी। अभी भी उससे निकला नहीं हूँ। घुट रहा हूँ। रात थका चूर सा जब बिस्तर पर आया तो भी नींद आने को नहीं हुई। ठिठकी खड़ी रही।

इधर लगा इस तरह अपने अंदर पैदा हो गयी बातों भावों ऊबो सिलवटों कतरनों को कह नहीं पा रहा। लिखने को होता हूँ पर नहीं। वह उतर ही नहीं पाते। बड़े आहिस्ते से एक और ब्लॉग बनाया। रफ़ ड्राफ़्ट। बस चुपके से राकेश और संजीव सर को बताया। और किसी को नहीं। कहीं शेयर करने का मन नहीं हुआ। अपनी भाषा की गहराई में उतर कहीं और चले जाने की तयारी की तरह वहाँ बैठ गया। चुप गुमसुम। पता नहीं जब तुम्हें वहाँ जाने से मना किया तभी से अजीब सा होता गया। उस रात डेढ़ घंटे बैठा रहा। और तब पहली पंक्ति लिखी गयी। कागज़ पर नहीं। सीधे ड्राफ़्ट पर।

जब तुम अपनी आवाज़ में अपनी उदासी छिपा रही होती हो मैं बिलकुल वहीं उसी आवाज़ में कहीं बैठा उदास हो रहा होता हूँ। पता नहीं उसे आगे नहीं बढ़ा पाया था। आँखें धुँधली हो गयी थीं। कुछ साफ़ नहीं दिख रहा था। बेमन सा होता गया। बस वहीं रहने दिया। स्थायी उदासी की तरह। जैसे अभी इस पिछली लाइन के बीतते अंदर आँसू पलकों के आसपास आकार थम से गए हैं। पास पास। बिलकुल अगल बगल।

जब-जब दिन बीते तुम्हारी आवाज़ नहीं सुन पाता तब-तब अंदर से ऐसे ही होता आता हूँ। तुमसे कह रहा हूँ। किसी और से न कहना। बस आगे लिखने का मन नहीं है। कमरे में उमस बढ़ गयी है। साँस भी रुक रुक कर आ रही है। तुम्हारे वहाँ मौसम कैसा है। वहाँ शामें ठंडी हो गयी हैं..

अक्तूबर 04, 2013

खाली प्लेटफ़ॉर्म की ऊब


किसी खाली सुनसान स्टेशन के ‘प्लेटफ़ॉर्म’ की तरह
उस अकेलेपन में इंतज़ार कर देखना चाहता हूँ
कैसा हो जाता होगा वह जब कोई नहीं होता होगा

कोई एक आवाज़ भी नहीं
कहीं कोई दिख नहीं पड़ता होगा
बस होती होगी अंदर तक उतरती खामोशी

दूर तक घुप्प अँधेरे सा इंतज़ार करता ऊँघता ऊबता
कि इस अँधेरे में सरसराती मालगाड़ी जब कानपुर सेंट्रल से चल पड़ेगी
तब कहीं उसके बयालीस घंटे बाद यहाँ पहली हलचल होगी
हफ़्ते में आने वाली एक ही गाड़ी। पहली और आखिरी।

वरना उस सोते स्टेशन मास्टर के पास इतना वक़्त कहाँ था
कि उन खाली पड़े मालगोदामों में किराये पर रखे पौने सात लोगों पर रखी एक स्त्री के साथ संभोग करता
और उसके होने वाले बच्चे से इस अकेलेपन को कम करने की सोचता

ऐसा करने से पहले पहली बार जब यह विचार उसके मन में आया
तब चुपके से उसने प्लेटफ़ॉर्म से पूछा था
वह भी मान गया था उसने भी हाँ भर दी थी।
वह भी अकेला रहते-रहते थक गया था।

अब नहीं सही जाती थी
गार्ड के खंखारते गले से निकलते बलगम की जमीन पर धप्प से गिरने की आवाज़
नहीं सुनना चाहता था उस लोकोमोटिव ड्राइवर की गलियाँ
उन जबर्दस्ती उठा लायी गयी लड़कियों की चीख़
उन्हे कराहते हुए छोड़ भाग जाते लड़कों के कदमों की आवाज़

उन्होने कभी ख़ून को वहाँ से निकलते नहीं देखा
वह डर जाते हैं वह भाग जाते हैं
पर वह नहीं डरेगा वह नहीं भागेगा
वह बस उस नए जन्मे बच्चे के साथ खेलेगा।

अक्तूबर 02, 2013

बस इंतज़ार सा कुछ..

सुबह से कुछ लिख लेना चाहता हूँ। कुछ बेचैन सा। बार-बार आता हूँ चला जाता हूँ। लिख नहीं पाता। समझ नहीं पाता क्या लिख लेना है। क्या है जो छूटे जा रहा है। जिसे लिखे बिना थोड़ा डिस्टर्ब सा हूँ। ऐसा नहीं है के मौसम गरम है। इधर आसमान में बादल हैं। ठंडी हवा चल रही है। दिमाग भी तभी थोड़ा-थोड़ा वैसा है। पर फिर भी अंदर जो चल रहा है उसे कह नहीं पा रहा। थोड़ा परेशान है। कल सारा दिन डायरी लिए बैठा रहा। कभी कुछ होता लिख लेता। फ़िर रख देता। थोड़ी देर बाद फ़िर उठाता। दो चार लाइन लिखता। रख देता। ऐसा पूरे दिन चलता रहा। शाम ढलती रही। थोड़ी देर बादलों को देखता रहा। आसमान में खोये से घूम रहे थे। अकेले से। बिलकुल अकेले। रात यह सोच कर सोया था के सुबह चार बजे तड़के उठ इस अफ़रातफ़री को लिख लूँगा। पर नहीं। छुट्टी थी न। नहीं उठ पाया। नही लिख पाया। पर अफ़रातफ़री अभी वहीं है। मेरे इंतज़ार में।

इस वजह से भी दिमाग अपनी जगह नहीं है। कल जब तुमसे आधी अधूरी बात के बाद फ़ोन रखा तब मन किया किसी दोस्त को फ़ोन कर लेता हूँ। पर बड़ी देर तक किसी नाम पर रुका नहीं गया। उदास होकर बैठने से अच्छा था इस कमरे से निकल कहीं पैदल घूम आऊँ। दिमाग ठिकाने लग जाएगा तब तक। वहाँ अकेले नहीं होऊंगा। जब अकेले बैठे रहो तब न जाने क्या-क्या इसमे चलता रहता। दिल भारी सा हो कहीं रुक सा जाता। कहता ठहर जाओ। पर वहाँ तक हो आया ठीक किया। पर फ़ोन रखते वक़्त तुम्हारी आवाज़ कुछ तो अलग थी। गला सूख रहा था वाला बहाना नहीं चलेगा। कुछ तो बात थी। पता नहीं क्या। 

ऐसे में जहाँ हम होते हैं वहाँ से भाग लेना चाहते हैं। उसे हम जी नहीं रहे होते। काट रहे होते हैं। उनका ऐसा होना मन मुताबिक नहीं लगता। पर वह ऐसा ही होता है। ऐसा ही करता चलता है। यह ऊब बाहर से अंदर नहीं आई है। बल्कि अंदर से बाहर की तरफ़ गयी है। जब हम ऐसे हो रहे होते हैं तब इन्ही के बीच की यादें साथ होती हैं। टूटने से लगातार बचाती। उन्हे हम सपनों की तरह बचाए रहते हैं। उन्ही के इंतज़ार में जीने लगते हैं। कि कुछ है जो स्थगित सा है। पर अपना है। उसके आ जाने पर हम पूरे हो जाएँगे।

बस इंतज़ार ही तो कर रहे हैं। और इधर यह दुनिया की सबसे खराब चीज़ लग रहा है। यह अंदर ही अंदर इकहरा बना रहा है इस ख़तरे के बावजूद कुछ और करने को नहीं रह गया हो जैसे।

लगता है बहुत कुछ और भी करना है पर कर नहीं पाता। बस अनमना-सा बेमन सा बोझिल होता रहा हूँ। इस भाषा के शब्द कभी-कभी वह सब कब भी नहीं पाते जैसा अंदर से होता जाता हूँ। जैसे रात बिस्तर पर किन ख़यालों के साथ तुम्हें ले आया था। हाथ में हाथ लिए हम ट्रेन का इंतज़ार कर रहे हैं। उसे आने में अभी वक़्त है। इस दरमियान हम अपने पुराने दिनों की तरफ़ हो चले हैं। कैसी शामों में यह इंतज़ार बिलकुल खाली सा निपट अकेला करता जाता था। अब तुम साथ हो। पता था आँख खोलते ही तुम वापस चली जाओगी इसलिए इसी के साथ कहीं खो गया। तुम्हें साथ लेकर। हाथ और मज़बूती से पकड़ लिया था।

अभी भी बस सोचे जा रहा हूँ। कर कुछ नहीं पा रहा। शायद इसे बहाना बना ओढ़ लिया हो। पर तुम उघाड़ मत देना। ऐसे ही रहने दो। ख़ुद को इसी में बचाए रहता हूँ। म्यूजिक प्लेयर पर बेतहाशा गाने बजे जा रहे हैं पर दिल तक कोई नहीं पहुँच पा रहा। कोई है जो उन्हे रोक रहा है। आवाज़ धीमी कर दी है। कान में लगने लगी थी। बाहर से आती आवाज़ें भी बढ़ गयी हैं। जादा देर और अकेला नहीं बैठ सकता। यहाँ से उठना होगा। जहाँ चुपके से तुमसे बात कर सकूँ। कि जहाँ सिर्फ़ तुम मेरी, मैं तुम्हारी बात सुन सकूँ। इसलिए कई बातें जो लगातार चलती रहीं हैं उन्हे आगे कभी कहेंगे।

बस अभी लगता है कुछ सोचने समझने के काबिल नहीं रह गया। कभी लगता भी है के अपने आस पास को लेकर उदासीन सा होता जा रहा हूँ। उन डिटेल्स को पकड़ नहीं पा रहा। एक अजीब तरह की उलझन घेरे रहती है। ठहरा सा ठिठका सा रह गया हूँ। किसी आ जाने वाले खटके के इंतज़ार में। कभी कई सारे काम एक साथ कर लेने का मन हो जाता है। पर कर कुछ भी नहीं पाता। अपने अंदर सिमटता सा कछुआ होता जा रहा हूँ। जो समुद्र के किनारे किसी बड़ी लहर के आने के इंतज़ार में है। तभी अपने हाथ पांव खोल उसमे समा जाएगा। अपनी मंज़िल की तरफ़। लग रहा है लहर आ रही है। कोई खटका आने ही वाला है। जल्द। बहुत पास। उस क़दम के पास। 

अक्तूबर 01, 2013

जो विज्ञापन बेच रहे हैं: जो विज्ञापन देख रहे हैं

हमारे घर में मिट्टी का घड़ा इसलिए नहीं है के हम अतीतजीवी हैं और हमने घर में जगह न होने को बहाने की तरह ओढ़ लिया है। यह विशुद्ध हमारे चयन और इच्छा का निजी मामला है। इसमे किसी भी तरह के हस्तक्षेप को स्वीकार नहीं करेंगे। फ़िर ऐसा भी नहीं है कि हम जहाँ भी जाते हैं घड़े का पानी ही पीते हैं और जहाँ इसका पानी नहीं होता वहाँ से प्यासे ही चल देते हैं। पर इधर ‘हार्पिक’ वाले टीवी पर समझाते फ़िर रहे हैं कि घड़ा पुराने होने की निशानी है और जैसे शौचालय धोने के तरीके नए आधुनिक हो गए हैं इसी तर्ज़ पर हमें इसका त्याग कर देना चाहिए।

ऐसा नहीं है कि वे अब फ़्रिज बनाने लगे हैं और अभी किस बड़ी कंपनी का अधिग्रहण करने की सोच रहे हैं। न ही किसी रूप में महिलाओं के जिम्मे ‘लैट्रिन’ धोने के एकाधिकार को चुनौती दे रहे हैं। वह उन्ही रूढ भूमिकाओं को पोषित कर रहे हैं जहाँ सफ़ाई का जिम्मा स्त्रियों के अधिकार क्षेत्र में बना हुआ है।

उनके अभी तक के विज्ञापनों में पुरुष के जिम्मे यह काम नहीं आया है। पर उलटबाँसी में हमसे कह गए घड़ा अब ‘ओल्ड फ़ैशन’ है जितना जल्दी हो सके इसे छोड़ हो। मतलब ‘लैट्रिन’ तो नयी ‘लेटेस्ट टेक्निक’ से धो रहे हैं पर पानी अभी भी उसी कुम्हार के हाथों से बने घड़े से पी रहे हैं। यह बात उन्हे जँचती नहीं है। उन्हे यह ‘विरूद्धों का सामंजस्य’ जैसा कुछ लग रहा होगा। जिसमे संगति नहीं है। मामला गड़बड़ है। तारतम्यता नहीं है। पर हम अपना घड़ा बाहर फेंकने नहीं जा रहे। बस ठंड वाले दिनों में उसे सहेज कर रख लेंगे। उनके कहे चलते तो कबके क्या के क्या हुए जाते। खुद समझ नहीं पाते।  

ऐसे ही इस मौसम में एक विज्ञापन अक्सर हवा में तैरता दिख जाता है। एक पत्नी अपने नेता पति के व्यस्त हो जाने वाले दिनों से पहले सुबह-सुबह उसके लिए चाय बना रही है। और कहती जा रही है के अब तो आप बहुत बिज़ी रहेंगे मंत्री जी। पर हम औरतों को भूल मत जाइएगा। हम आबादी का उनचास प्रतिशत है। महिलाओं के वोट किसी को बन भी सकते हैं तो किसी को गिरा भी सकते हैं। यह 'ध्यानाकर्षण प्रस्ताव' सतह पर तो एक अर्थ में यह ‘टाटा टी’ के इस सिरीज़ के पुराने विज्ञापनों की अगली कड़ी में जगाने जैसा ही लगता है। पर इसकी कई ध्वनियाँ और भी हैं।

दिक्कत इसमे यह है के यह देश की चाय बेचते-बेचते यहाँ के नागरिकों का अवमूल्यन सिर्फ़ एक वोट में कर देता है। एक वोट भर की हैसियत के आगे कुछ नहीं। यह इस विज्ञापन को समस्याग्रस्त नहीं बना रहा है बल्कि उन्ही पूंजीवादी व्यवस्थाओं के पोषक की तरफ़ डटा खड़ा हो गया है। कि जनता को सिर्फ़ और सिर्फ़ मतदान तक सीमित कर उसे उसके सभी अधिकारों से अपदस्थ कर अपने मन मुताबिक व्यवस्थाओं को संचालित करते रहने में उन्हे कोई परेशानी नहीं आएगी। यह पूँजी का अपना शिकंजा है जिसे लोकतन्त्र का केवल खोखला ढाँचा भर चाहिए। वह जनता के अविश्वास, सार्वजनिक संस्थाओं के प्रति निराशा और  राजनीति के प्रति वितृष्णा से उपजी ऊब को सिर्फ़ वोट में तब्दील कर लेना चाहती है।

यह ऐसे अन गिन सपनों के साथ लगातार आते ही रहते हैं। इस वाले को बहुत पहले लिख लेना चाहता था। पर देर आए दुरुस्त आए। इसमें रेगिस्तान है। थोड़ी हरियाली है। बीच में सड़क है। सड़क पर जीप भागी जारही थी कि राज्य सरकार की यह गाड़ी रुक जाती है। एक महिला, जिसे वह ‘ड्राइवर’, ‘मैडम’ बोल रहा है, बता रहा है कि वह सिर पर मटकी रखे औरतें पानी लेने जा रही हैं। दिखाई साफ़-साफ़ दे रहा है और उसका ऐसे बताना कुछ खटकता भी है। पर ख़ैर। अगला दृश्य उस ड्राइवर को बड़े बाबू के रूप में स्थापित करता है और वह मास्टरनी जोधपुर, खेजरली के ‘राजकीय बालिका विद्यालय’ के बोर्ड को देखती हुई पूछती हैं लड़कियाँ कहाँ हैं। दर्शक थोड़ी देर शाहरुख़ की ‘स्वदेश’ याद कर ले इसका भी अवकाश नहीं। बड़े बाबू फ़िर वही ‘स्क्रिपटेड डायलॉग’ मारते हैं। लड़कियाँ कहाँ मैडम उन्हे तो पानी लेने के लिए दो-तीन कोस जाना पड़ता है। पर अगले सीन में ‘स्वदेश’ होने का भ्रम भी टूट जाता है और वह मास्टरनी अपने ‘वीज़ा’ डैबिट कार्ड का उपयोग कर कहती हैं वह दूर की चीज़ें पास ला रही हैं। और पीछे बजते ‘बैक्ग्राउण्ड स्कोर’ में एक स्त्री स्वर उभरता गाता है पढ़ लिख जाएगी तो सखी खाली कुआँ भर जाएगा।
 
यह होगा कैसे से पहले जो सवाल की तरह दिमाग में कूदने लगता है वह यह कि एक इज़ारेदार कंपनी की जो संगति यहाँ दिख रही है उसे क्या अपनी मौन स्वीकृति की तरह माने या कभी पूछ भी लिया करें। कि कहीं यह निजी का बढ़ता सार्वजनिक दायरा तो नहीं हैं। यहाँ निजी किसी भी स्तर पर सार्वजनिक व्यवस्था पर विश्वास नहीं कर रहा। यह उसका निजी फैसला है। फ़िर हमारे सरकारी अध्यापक इतने स्वतंत्र कब हुए। मालूम नहीं पड़ा।

आवाज़ें..

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