नवंबर 27, 2013

हम दोनों थोड़े खोये-खोये से हैं..

कितना अच्छा होता न कि मैं यहाँ लिख रहा होता और बिलकुल इसी वक़्त तुम्हारी आँखों के सामने खुली किताब में वह दिखते जाते। एक-एक शब्द मेरी लिखाई में वहाँ छपता जाता। स्याही अभी सूखी भी न होती। इतनी तेज़ गति से वह तुम तक पहुँचते जाते। तुम उन्हे छूती तो लगता गाल छू रही हो। बड़े आहिस्ते से। वहीं तुम्हारा हाथ पकड़ लेता। कुछ देर छोड़ता नहीं। तुम कुछ कहती नहीं। बस उस स्पर्श को हृदय में सँजोती रहती। और वहीं पास होती मेरी आवाज़। वह सारे शब्द उन्ही अहसासों से भरते जैसे उन्हे लिखते हुए महसूस करते गुज़रते रहे हैं। फ़िर जैसे तुम होती जाती, वैसे ही इधर मैं भी होता जाता। जानने से भी पहले हम ऐसे होते गए हैं। 

प्यार ऐसे ही एक दूसरे के दिल की तरह होते जाना है। एक दिल में दूसरे दिल का घुलते जाना। खोये-खोये से रहते हुए भी पास रहना। इतने पास कि धड़कन भी सुनाई दे जाये। वहीं पास धीमी-सी भीनी-सी गंध होती। जो तैर जाती। कान के पास से जैसे हवा तैर जाती है कभी-कभी। कभी लगता के अभी कोई छू के गुज़रा है। छू के गुज़रना उन एहसासों से। बार-बार।

यह दूरी रोज़ ऐसे ही रचती रही है। इंतज़ार के उन पलों में जितना अकेला होता जाता हूँ, उतना ही तुम पास चली आती हो। जैसे अभी एक पल बाद जब आँखें खुलेगी, पास तुम होगी। पता नहीं कितनी दिन में ऐसा कितनी बार करता हूँ। तुम्हें बिन बताए। बिन कहे। देखता रहता हूँ तुम्हारा चुप-सा होते जाना। कुछ न कहना। इन पंक्तियों की तरह इंतज़ार करते रहना। अनमने से उठना। बैठ जाना। जैसे उस तस्वीर में जो छत पर खींची थी। यहाँ आने से पहले। तुम्हें साथ लिए नहीं चल रहे थे। बस तस्वीर जा रही थी। तुम कोहनी घुटने पर रखे, हाथ को गालों के पास लाकर बैठी हुई हो। उदास। खोयी हुई। कहीं और देखती-सी। इतनी उदास तुम्हें कभी नहीं देखा। वह अकेले हो जाने की हद तक अंदर जाकर धँस जाता है। लगातार तोड़ता है। पर इसे याद नहीं रखता।

याद रखता हूँ वह तस्वीर जिसमे हम अगल-बगल हैं। तालाब किनारे। वहाँ कछुए हैं। हम उनका इंतज़ार कर रहे हैं। इस बहाने भी साथ हैं। वह बाहर निकलेंगे, तो दिखेंगे। गर्मी का सूरज है। हवा चल रही है। तुम्हारा दुपट्टा उड़ रहा है। तुम उसे संभाल रही हो। और अचानक वह फ़ोटो खिंच जाती है। उसे संभालते वक़्त का चेहरा वह क्षण बार-बार खींचे लेते हैं। के कैसे इतनी जल्दी दिन उड़ गए। यहाँ से लेकर तो बहुत गया था। पर जल्दी से उड़ते गए। उन्हे थोड़ा और रोक लेना था। मिलकर। मिलकर कुछ और रातें साथ छत पर बैठते। उन सुनसान-सी चुप-सी उपस्थिति में गुम से होते एक दूसरे को देखते रहते। देखते रहते उन रातों का और रात होते रहना। 

कुछ हज़ार ख़्वाहिशें हैं। दम निकालती। उन्ही में हमदोनों कैसे-कैसे होते जा रहे हैं। एक ही तरह। एक ही इंतज़ार। वस्ल की राहत। इसी इंतज़ार में खोये-खोये से। बेतरतीब। बेपरवाह। उकताए से। सिलवटों जैसे। किसी को समझ नहीं आ रहे। बस ऐसे हो गए हैं। उलझे-उलझे से। अबूझ। पहेली की तरह। जिनके जवाब हम दोनों हैं। हम एक-दूसरे की तरफ़ खिंचते जा रहे हैं। बड़ी आहिस्ते-आहिस्ते। डोर से बंधे। उसकी झंकार सुनते-सुनते जा रहे हैं उन दिनों की तरफ़। जहाँ दोनों साथ होंगे। साथ होंगी अनगिन यादों बातों सपनों की पोटली। पोटलियों की तहें। तुम आ जाओ। तब देखें और क्या-क्या है उनमे ख़र्च करने लायक। 

परसो शाम आवाज़ और उदास कर गई। अंदर तक खाली होता गया। के तुम आओ तो भर लूँ अपने आप को। इस अकेलेपन में हम साथ हैं। पर साथ नहीं हैं। यह उदासी स्थायी भाव नहीं है। पर है। पता है जल्द दिन ऐसे नहीं रहेंगे। यह रातें करवटों की तरफ़ सिलवटों को बुनती रहेंगी। सुबहें उबासी की तरह नहीं खुलेंगी। लेकिन इन दिनों की होती शामें कुछ अजीब सी हैं। जब अँधेरा जल्दी होकर अपने अंदर किए लेता है, तब यह एहसास सबसे जादा दिल में घूमता कचोटता है। पास क्यों नहीं हैं। उस अँधेरे में उभरती छवियाँ जितना बुनती नहीं, उससे जादा, उस ताने बाने की सीवनों को बड़ी बेदर्दी से तोड़ती हैं। दर्द होता है। उसे सहन करना आसान नहीं। नहीं कर पाते। तब बुनते हैं सपनों की किश्त। यही तो हैं जो हरबार बचा लेते हैं। दोनों तरफ़ से उन अनकहे ख़्वाबों की ख़ुशबू दोनों को साथ महकाती रहती है। हम साथ होंगे। साथ होंगे यह सारे सपने। बोले अबोले। कहे अनकहे। उन्हे हर शाम दोहराते हुए। हर रात देखते हुए।

नवंबर 24, 2013

दीक्षा: दैहिक शुचिता का स्त्री पाठ

हमारे समाज में लड़की ‘बनकर’ रहना इतना आसान नहीं। बनकर रहने में जो ध्वनि छिपी है वह चुनी नहीं जा सकती। वह इसी समाज द्वारा ‘प्रदत’ है। इसमे किसी भी तरह का विचलन स्वीकार्य नहीं। चूंकि समाज का आधार यही बनी बनाई भूमिकाएँ हैं इसलिए इन्हे कोई तोड़ने की कोशिश भी नहीं करता। सच यह समाज हमने कभी स्त्रियॉं के लिए बनाया ही नहीं। कभी उनके लिए ‘स्पेस’ नहीं रचा। यह रचना या उनके लिए बनाना पुरुष की तरफ़ से दी जा रही सहूलियत-सलाहियत की तरह ही है। जिसमे कुछ उसके अधिकार क्षेत्र में है और उस बाड़े के भीतर की कुछ जगह में इन स्त्रियों को समा जाना है। यहाँ उसकी उपस्थिती हमेशा शोषित की ही रही। वह किसी निर्णय को ख़ुद से नहीं ले पाती।

अभी पीछे बीती दिवाली अचानक डीडी भारती पर जा ठहरे। देखा यू. आर. अनंतमूर्ति की कहानी ‘घटश्राद्ध’ पर बनी फ़िल्म ‘दीक्षा’ आ रही है। फ़िल्म वहाँ तक पहुँच चुकी है जहाँ गुरुकुल के आचार्य अपनी बेटी को कुछ दिनों के लिए आश्रम की ज़िम्मेदारी सौंप बाहर जा चुके हैं। वह अकेली ही सारी व्यवस्थाएं संभाल रही है। सहायक कथा में उसका प्रेम प्रसंग वहीं गाँव में रहने पढ़ाने वाले मास्टर के साथ आकार ले रहा है। एक दिन पता चलता है के उसे गर्भ ठहर गया है। इस बात को अब छिपा रखना है कि वह गर्भवती है। चूंकि वह विधवा है इसलिए यह निषेध क्षेत्र में उसकी कमज़ोर-सी सेंध है। जब वहीं गुरुकुल में पढ़ने वाले शिष्यों को इस बात की भनक लगती है तो वे अवज्ञा के साथ-साथ उस लड़की का बहिष्कार तक करने लगते हैं। यह बहिष्कार एक स्त्री के पदस्खला हो जाने के बाद शुरू होता है। वे ख़ुद को पुरुषों की भूमिका में तब्दील कर लेते हैं जहाँ दैहिक सुचिता नैतिकता स्थापित करना उनके अधिकार क्षेत्र में स्वतः आता है। फ़िर वह पुरुष जिससे गर्भ ठहरा है उसके हिस्से यह अपमान कितना आता है, सिरे से गायब है। मास्टर क्यों बच गया या कहानी में वह अंश हैं के नहीं यह मूल पाठ को पढ़ने के बाद ही पता चल पाएगा। पर वह पुरुष है इसलिए ऐसे किसी भी कथित ‘लांछन’ से वह बच निकलेगा। उसका कुछ बिगड़ेगा भी नहीं। फ़िल्म आगे बताती है वह मास्टर गाँव छोड़ भाग चुका है। यह भाग कर जाना भी स्त्री के हिस्से नहीं आता। जिससे वह प्रेम करती थी उसका साथ मात्र देह प्राप्त कर अचानक गायब हो जाता है।

परंतु इस कहानी में वह किसी आलंब की इच्छा नहीं करती। वह कहती है के वह इस बच्चे को जन्म देगी। उसे विश्वास है के जिसके साथ उसने प्रेम किया है वह कोई न कोई रास्ता ज़रूर निकाल लेगा। वह गर्भ में पल रहे बच्चे की धड़कन को महसूस कर रही है। पल-पल उसी बंद कमरे में आने वाले सपनों को बुन रही है, जिन्हे बुनने का अधिकार उसके विधवा होते ही छीन लिया गया है। यह स्त्री द्वारा अपेक्षित व्यवहार नहीं है। उसे ऐसी किसी कामना से बचना चाहिए। पर वह बचती नहीं है। कि वैधव्य में वह किसी पर पुरुष द्वारा गर्भ धारण करे। वह मास्टर कुछ देर के लिए उसके जीवन में आशा की किरण की तरह आते हैं पर वह जादा दूर तक नहीं बढ़ पाते। उनका निर्णय है लड़की गर्भ गिरा दे। कितना आसान होता है पुरुषों का यह निर्णय लेना। 

गर्भ गिरा देने के लिए कहने वाला पुरुष उस पीड़ा को नहीं समझ सकता जो वह अजन्मे बच्चे की माता महसूस करेगी। यह उस पुरुष का कमज़ोर निर्णय है जो कहीं न कहीं उसी समाज के दायरे में वापस चला गया है। उसने भी मान लिया है कि यह अनुचित है के एक विधवा किसी बच्चे को जन्म दे। एक शाम वह लड़की को कहता है के गर्भपात के लिए उन्हे शूद्रों की बस्ती में जाना होगा। नियत दिन वह वहीं आ जाये। मास्टर उसकी वहीं प्रतीक्षा करेगा। वह इतना डरपोक है के शोर मचने पर एकदम वहाँ से भागना ही उचित समझता है। इधर यह ‘ब्राह्मण’ होने की त्रासदी भी है। कि आपको उन आदर्शों को बचाए रखना है, जिन पर समाज को चलना है। उससे विचलन किसी भी कीमत पर स्वीकार्य नहीं होगा। क्योंकि नियामक होने के बावजूद ख़ुद ऐसा करने से यह समाज क्षण में धूल-धूसरित हो सकता है। यह स्वयं को शुद्ध बनाए रखने का आग्रह है। शुद्धता रक्त से ही प्राप्त की जा सकती है। इसलिए स्त्रियों द्वारा ऐसे प्रकरणों के लिए उचित दंड दिया जाना चाहिए। यह योनि की सुरक्षा की चिंता है। उसपर एकाधिकार का पाठ है।

पर यह कहानी उस स्त्री के पक्ष में मज़बूती से खड़ी है। के धर्म-समाज-पुरुष सब स्त्री को अपने मुताबिक ढालते रहे हैं। इस प्रक्रिया में वह इतने अमानुषिक होते गए हैं जहाँ उन्होने स्त्री को स्त्री नहीं रहने दिया। उसकी इच्छाओं का अधिकारों का कोई मूल्य नहीं। वह यहाँ उपभोग की वस्तु से जादा कुछ नहीं है। उसकी हैसियत हमारे बीच मात्र शोषित की है। प्रताड़ित की है। यह कहानी उसके दुख की है शोक की है। उसके हिस्से केवल कष्ट पीड़ा यातनाएँ उपेक्षा है। जहाँ साँस भी पूछ के लेनी पड़ती है। फ़िल्म आगे भी बहुत कुछ लिए हुए है। ख़त्म नहीं हुई है। पिता के वापस आने के बात जीवित लड़की के श्राद्ध तक। एक पुरुष पिता की भूमिका में वह, अपनी लड़की जो कि स्त्री भी है, उसका त्याग कर देता है ताकि वह समाज में सिर उठा कर चल सकें। कोई उसपर अपनी लड़की का पक्ष लेने का आरोप न लगाए। वे निष्पक्ष हैं। तटस्थ नहीं। यह उनकी व्याख्या है। जहाँ उनकी पुत्री के लिए भी जगह नहीं।

लेकिन उस वाले हिस्से को अभी छू नहीं रहा। आगे।

फ़िर बातें अभी भी बहुत हैं जो लगातार दिमाग में चल रही हैं। बेतरतीब। पर रात जादा हो गयी है। और ठंड भी। पैर में मोज़े के बाद भी वह गल रहे हैं। डेढ़ बजने वाला है। खिड़की खुली हुई है। हवा अभी नहीं है। एक और फ़िल्म याद आ रही है। दीप्ति नवल की। उसके बारे में भी कहने का मन था पर अभी नहीं। इस फ़िल्म के बारे में और ख़ुद दीप्ति की रेंज पर कम ही बात हुई है। उन्हे हमेशा शबाना आज़मी से कमतर मानने का आग्रह खटकता है। अभी नहीं, जल्द..

{दीप्ति की फ़िल्म, 'मैं ज़िंदा हूँ ' का संदर्भ..इसकी अगली कड़ी, जो जोड़ सकें उनके लिए.. }

नवंबर 22, 2013

स्त्री तुम केवल देह नहीं हो

कभी-कभी लगता है हम अपने आप को दोहरा रहे होते हैं। बार-बार वैसी ही बातें। उन्ही तरीकों से अपने को कहते हुए। जैसे कल। रात लिखने के दरमियान बराबर लगता रहा क्या कर रहा हूँ। जो मन में चल रहा है उसे कह क्यों नहीं पा रहा। अगर वह आ भी रहा है तो कितना। कैसे। क्या उसे ऐसे ही आना था। क्या है जो उन शब्दों के पीछे छिप गया होगा। किसे जानबूझकर नहीं कहा होगा। यह सिर्फ़ ख़ुद को बचाए रखने की चालाकियाँ हैं। जिन्हे लिखने वाले बख़ूबी जानते हैं। उन्हे पता है वह क्या कर रहे हैं। कौन से हिज़्जे कैसे बुने हैं और उनमे क्या नहीं कहते हुए भी कह दिया है। किसे कितना कहते नहीं कहा। अगर ऐसा न हो तो इसके बिना लिखना जीने की तरह नहीं लगता। सारा कुछ कहना भी कौन चाहता है। कभी हमसे भी तो आमने सामने की मुलाक़ात करो। पूछो तो क्या बात है। पर नहीं ऐसे कभी कोई नहीं मिलता।

हम बातों से बचते क्यों हैं। उन्हे कह क्यों नहीं देते। उनका कहा जाना हमें किसी अनिश्चय में क्यों डालता रहा है। हम कभी मौके ही नहीं बनाते। कभी कहने की सुनते ही नहीं। 

बड़े दिनों से सोच रहा हूँ। के कह दूंगा । कहना पूछने की तरह है। क्योंकि इसके कई सारे जवाब आज तक टकराए और लगातार टकराते रहे हैं। यह ‘आदिम इच्छा’ है जो हमें कभी कभी ‘ख़ालिस मर्द’ बनाती है। ‘मर्द’ लिखना ही ‘पुरुषसत्तात्मक विन्यास’ को पकड़ लेना है। मर्द को दर्द नहीं होता। वह अपना लिंग लिए घूमता रहता है। वह ढका रहता है। पर तना रहता है। यह किसी भी स्त्री को मात्र देह मान उसे भोगने की इच्छा है। अगर इसे ही बड़े ढके-ढके स्वर में पूछा जाता, तो शायद, वह कुछ इस तरह होता, के ‘पुरुषों का स्त्रियॉं के प्रति आकर्षित होने का कारण क्या है’? कारण बहुवचन में नहीं हैं। इसलिए उत्तर भी इस वचन में नहीं हो सकते। ऐसा पूछना ही बौद्धिक चालाकी है। आपको कोई मौका न देना है। शुरू से ही एक ही उत्तर की अपेक्षा। कहीं से भी दायें बाएँ न होने की गुंजाइश। यही अंदर उस पुरुष को खोजना है, जो उनकी पूर्वधारणा में ‘ख़ालिस’ है।

यह उत्तर आधुनिक विमर्श ही है जो इतना ‘स्पेस’ दे रहा है। उसी को खोल बनाकर यह सवाल ख़ुद से पूछता हूँ। इसे ‘टेक्स्ट’ की तरह पढ़ रहा हूँ। के इस सवाल का मेरे पास क्या जवाब है? कोई जवाब है भी या वह बनने की प्रक्रिया में है। वह जैसा है, उसे वैसा ही कह भी पाऊँगा। इतना साहस मेरे अंदर किस हद तक है। कई सवालों के जवाब कभी कभी ख़ुद को देने पड़ते हैं। जितना ईमानदार ख़ुद से कोई हो सकता है उतना शायद ही किसी से हो पाये। इसलिए जब कभी भी यह द्वंद्व की स्थिति मेरे सामने आती है तो इसका एक ही जवाब मेरे हिस्से पड़ता है। बार-बार। शायद यह पढ़-लिख जाने के चलते है या फ़िर मेरे ऐसे होते जाने का कोई कारण अभी पास नहीं देख पाता। एक परत लगातार हम ओढ़े रहते है, चादर की तरह।

के मेरे यहाँ आकर्षण कभी देह को लेकर नहीं हुआ। सच में। कभी ख़ुद से झूठ नहीं बोलता। पता नहीं ऐसा कब से हूँ। शायद जब से किसी लड़की को देख अनदिखी हरारत से भर जाने की शुरुवात हुई हो, तब से..पता है मैं क्या चाहता था? किसी लड़की का साथ। साथ सिर्फ़ हमबिस्तर होने तक नहीं, ज़िन्दगी भर तक। ऐसा नहीं है के मेरे यहाँ प्रेम ‘अशरीरी’ ही रहा, पर वह दिखता ही ऐसा है। उसे दूसरों ने ऐसे ही पाया। छूने न छूने के द्वंद्व कभी दिलो दिमाग में नहीं चले। शायद एकांत के अभाव में उन अनहुई मुलाकातों के बाद यह विचार मेरे पास आया हो..पर कभी ऐसा सोचा नहीं। यह शायद मेरी ख़ुद से ख़ुद की नैतिकता है। यह कुछ कुछ लिजलिजा सा भी है। कमज़ोर-सा। तोड़ता-सा। मैं इंतज़ार कर रहा था किसी ऐसे का जो करीब हो। जो मेरी बात सुने। हम दोनों आने वाले कल को बड़े आहिस्ते से एक-दूसरे में बुनते रहें। कहीं कोई धागा न चिटक जाये, इतनी सावधानी के साथ। चुपके से एक-दूसरे को जानते हुए। एक-दूसरे के हिस्सों को अपने में शामिल करते जाएँ। जितना अपने में हम हों उतने ही वह साथ चलने वाला। किसी भी राज़दारी के लिए वहाँ कोई जगह नहीं। बस हों ढेर-ढेर अनगिन सपने।

कभी कहता नहीं। पर अब कह दूँ। के किसी ज़माने यह देह बीच में आ गयी थी। कई साल हुए। उसे याद करने का मन भी नहीं करता। बस हवाला दिये देता हूँ। कोई नाम नहीं है। बस एक ख़याल। शायद सपना छिपा रहा हूँ। एक दिन अचानक ऐसे ही मन में आया। जिस लड़की की तरफ़ में खिंचा चला जा रहा हूँ उसके लिए सच में प्रेम करता हूँ भी या ऐसे ही। यह कितना जैविक है और कितना शारीरिक। कहीं मैं भी उन्ही लड़कों की तरह उसके साथ कुछ दैहिक क्रियाओं के बाद अलग हो जाने वाला हूँ। पता नहीं इस बात ने मुझे कैसे गढ़ा। शायद अजीब तरह की ग्रंथि से भर दिया। यह ऐसे लड़के की तरह बड़े होना था जिसकी पढ़ाई लड़कों वाले स्कूल में हुई थी। वह उन अहसासों से भाग लेना था। जो किसी लड़की के लिए महसूस होना उतना ही स्वाभाविक था जितना कि सांस लेना। पर समझ नहीं सका। एक झटके से लड़कियों के लिए किन विचारों से भर गया था। क्या यह उन अजनबी स्पंदनों का निषेध था। ख़ुद को खोह में समेट लेना। जिसने मुझे सहज नहीं रहने दिया। मैं लगातार बचने लगा। लगता कहीं इस या उस लड़की की तरफ़ जो महसूस कर रहा हूँ, वह उसकी देह का आकर्षण तो नहीं। जहाँ पहुँचकर प्रेम अपने आप मर जाएगा।..

राकेश आज इस पढ़ते हुए इसी तरह कहेगा, ‘तुम हमेशा से अतिवादी ही रहे’! कभी खुले नहीं। तुमने जितना प्रेम नहीं किया उससे जादा उस पर विचार किया। किसी लड़की से बात करना उससे दैहिक प्रस्ताव करना थोड़े है। बात दोस्त समझकर ही हो सकती है। यही सबसे बड़ी गलती रही के यह कभी नहीं सोच पाया। जो मुझमे उस आत्मविश्वास को लगातार कम करती रही जिसके बल किसी लड़की से बात भी करता। उन बातों के दरमियान बड़ा सचेत रहता के कहीं उसकी देह, कहीं खींच न ले। इसने जितना बनाया नहीं उससे जादा बिगाड़ा। मैं किसी लड़की से बात करने लायक ही नहीं रहा। अपने में ही उलझा उलझा सा। किन्ही उधेड़ बुनों में अरझा सा। इससे निकलते निकलते आज यहाँ पहुँचा हूँ जहाँ मेरे हिस्से दो-तीन ऐसी दोस्त हैं जिनसे कुछ भी कह सकता हूँ। बोल सकता हूँ। सीमाओं के अंदर सीमाओं के बाहर।

पता नहीं शाम क्या लिखने बैठा था क्या लिखता चला गया। फ़िर तो जो जैसा आता गया उसे रोका नहीं। रोकना चाहिए भी नहीं। किसी का डर होता तो कभी एक पंक्ति भी नहीं लिख पाता। जो कह दिया है उसे संपादित करने का मन भी नहीं है। जो जैसा आया वैसा ही रहने दिया है। बस अभी जा रहा हूँ। पानी भरना है। साढ़े पाँच हो रहे हैं। जो सोचकर लिखने बैठा था उसे फ़िर कभी।

नवंबर 21, 2013

हमारी उमर लगातार हमें तोड़ रही है

हमें ऐसा क्यों लगता है के हम गलत जगह पर हैं। क्यों लगता रहा है हम जिस क़ाबिल हैं वहाँ कभी पहुँच ही नहीं पाये। जैसे अभी। 'अभी' काल विशेष में होना है। जहाँ हमारी बढ़ती उमर लगातार हमें तोड़ रही होती है। हम जहाँ हैं वहाँ से कई साल पहले हमें नौकरी वाला हो जाना चाहिए था। लेकिन नहीं हैं। अब हमें बहाने चाहिए। अपने 'फ़ेलियर' को 'जस्टिफ़ाय' करने के लिए। ख़ुद को टूटने से बचाने के लिए। कहीं हम पीछे छूट से गए हैं। पीछे रह गए हैं। अपने आस पास को देखते रहने के कारण अजीब सी कुंठा से भर गए हैं। ख़ुद की क़ाबिलियत पर शक करने लगने की हद तक। उस हद तक जहाँ हम अपने दिनों को पैसों में तब्दील नहीं कर पाते। पर हमारी बेरोज़गारी हमें ऐसे ही बनाती जाती है। यहाँ लिखने भर से पेट नहीं भरने वाला। कोई एक कौर रोटी के लिए भी नहीं पूछेगा। यह इन सारे दिनों का गायब हो जाना है। इनके होने का कोई मतलब ही न हो। जैसे हमारे होने का कोई मतलब नहीं है। पता है यह दुख की पंक्तियाँ हैं। पर यह भी हमारी तरह कमज़ोर हैं।

पता नहीं इन दिल्ली के चुनावों में नौकरी किन-किन पार्टियों के घोषणापत्रों छप सकेगी। उसे जगह मिल भी पाएगी या नहीं। इन फ़ालतू के सवालों से वे लोग अपने आप को चिंतित नहीं करते होंगे। जब हमारी अर्थव्यवस्था का चरित्र पूंजीवादी होता जा रहा है तब हम इन सत्ता प्रतिष्ठानों से किसी भी तरह की उम्मीद कर भी सकते हैं, कह नहीं सकता। यह उनका एजेंडा ही नहीं है। ऐसा होना प्रतिगामी होते जाना है या संशोधनवादी होते जाना। यह विचलन है या एक इच्छा। किसी भी तरह से उस तंत्र में घुसपैठ करने की आतुरता को ऐसे ही किसी पद से विश्लेषित किया जाता रहेगा। हासिल सिर्फ़ विश्लेषण होगा। नौकरी नहीं। 

हम वही लोग तो हैं जो अपनी ज़िन्दगी के उन चमकते सालों में लगातार 'मिसफिट' होते रहने के लिए ख़ुद को तय्यार करते करते रहे जबकि हमारे साथी 'करियरिस्ट' होकर नौकरी वाले। हम विचारों के तहख़ानों में ख़ुद को बंद कर दुनिया को देखते रहे। हमने ख़ुद ही इसे बाँट लिया। और मान लिया के यह दुनिया हमारे लिए नहीं है। हमारे लिए तब होगी जब हम ख़ुद इसे अपने लिए बनाएँगे। इसे अपनी मर्ज़ी से उस तरह बनाएँगे जैसा हमें लगता कि उसे हो जाना चाहिए। इसमे काम करने की गुंजाइश लगातार बनती रही है। स्थितियाँ और विकट होती गयी हैं। नव-साम्राज्यवादी अधिनायकवादी सत्ता का वर्चस्व जितना कठोर होकर जनवादी विमर्शों मूल्यों को पीछे धकेल रहा है वहाँ हम लोगों को हमेशा उसके प्रतिरोध के लिए तय्यार करते रहना चाहिए। उनके औजारों के बरक्स हमें अपने विश्लेषण को और पैना कर उन अमानुषिक प्रक्रियाओं को उघाड़ फेंकना है। यह विचारों से अपनी बात को कहना है। 

ऐसा नहीं है के आज इनकी ज़रूरत नहीं है या समय कुछ बदलकर सकारात्मक हुआ है। यह विचलन ही कहलाएगा। के हम अपने इस प्रस्थान बिन्दु से थोड़ा पीछे खिसक कर दो कदम पीछे हुए हैं। ताकि लंबी छलांग लगा सकें। हम समझ नहीं पाये थे के किन वैचारिक प्रक्रियाओं के तहत हम इन विचारों तक पहुंचे? यह विचार हमें किसी सहज विमर्श के चलते नहीं मिले थे। यह बने बनाए खाँचे थे जिनमे हमने खुद को जमाना शुरू किया। उन साँचों को परखने का वक़्त नहीं था। उस वक़्त बस वह थे। उनका रोमान था। अगर आज यह हमें हमारी सबसे बड़ी गलती लग रही है। और हम अपने कल को न बदल पाने की कसक लिए घूम रहे हैं तो इसकी सबसे बड़ी ज़िम्मेदारी उन लोगों पर आती है जो हम तक इन विचारों को लेकर आए। वे सुविधा सम्पन्न लोग थे। जिनका पीछा किसी भी हालत में आगे आने वाले सालों में कोई आर्थिक सवाल नहीं करने वाले थे। हम जिन परिवारों से आए थे उनमे हमें इसलिए पढ़ाया लिखाया जारहा था के कल हम एक अदद नौकरी वाले हो जाएँगे। पर हमें नहीं पता था के यह विचार मिलकर हममे ऊब की तरह भरते जा रहे हैं जिसके बाद हम इस दुनिया को एक अलग तरह से समझ तो पाएंगे पर किसी क़ाबिल नहीं रह पाएंगे।

हम सब इन विचारों के रूमान में इसलिए भी फँसते जाते हैं क्योंकि हमें अपने अस्तित्व को साबित करना सबसे ज़रूरी लगता है। लगता है हम भी अगर सभी की तरह होते गए तब हमारी पहचान कैसे विशिष्ट रह पाएगी। यह भीड़ में अलग दिखने का आग्रह है। आग्रह है अपने जैसों से अलग दिखने का। यह जाति धर्म जैसी संज्ञाओं के विपरीत ख़ुद को स्थापित करना है। जहाँ विचारधारा  उन सबको एक जैसा बना रही होती है। पर यह समरूपता उसे खलती नहीं है बल्कि वह सोचता है वह इसी के लिए तो चला था। यह भी एक तरह का समूह बनता है, जिसमे रहने के लाभ किसी न किसी रूप में उन्हे मिलते रहते हैं। उनके विरोध में उनके पक्ष में एक बना बनाया संगठन काम करता रहता है। यह सलाहियत उनके लिए बराबर बनी रहती है। हम जिस दिल्ली विश्व विद्यालय में पढ़ रहे थे वहाँ विचारधारा के रूप में सबसे जादा फ़ैशन में 'वामपंथ' अभी भी अपना काम कर रहा है। साहित्य अपने आप में 'जन' के बिना एक कदम भी नहीं चल पाता। जिसे अपनी प्रामाणिकता सत्यापित करनी होती है वही इसका कुर्ता पहन निकाल पड़ता है। वरना कम से कम उस समय कोई भी निर्मल वर्मा, विनोद कुमार शुक्ल नहीं होना चाहता। सब पाश की कविता पढ़ते हैं। मुक्तिबोध की तरह अग्रसेन की बावड़ी में ब्रह्म राक्षस को ढूँढते पाये जाते हैं। निराला हो जान चाहते हैं।

हो सकता है विचार का आग्रह किन्ही वैचारिक पाठकों को हताश निराशावादी युवक का प्रलाप लगे व वे इसे व्यक्तिवादी इच्छाओं का अश्लील एकालाप कह सीधे सिरे से ख़ारिज कर आगे बढ़ जाएँ। पर यह किसी भी तरह का पलायन नहीं है। सवाल उठाने अपनी आलोचना करना हमने भी उन्ही विचारों के पास से सीखा है, जिसका झण्डा आप बुलंद किए हुये हैं। अगर नहीं सुन सकते तो यह संवाद को नकारने के सिवा कुछ नहीं कह सकते। व्यवस्था बदलने के आग्रह में वह स्वयं कितने निरंकुश होते गए हैं, यह उन्हे दिखना होगा। किसी प्रति विचार को बिन विचारे नकार देना उनकी ख़राब आदत है। सपने सिर्फ़ उन्होने ही नहीं देखे, हमारी आँखों ने भी देखें हैं। अगर कह रहा हूँ के मुझे भी नौकरी चाहिए तब क्या यह माँग बिन सुने अनदेखी करने लायक है? यह पुराना सवाल मुझे किससे पूछना चाहिए? कितने साल और इंतज़ार करने के बाद मेरे हिस्से की तनख़्वाह मुझे मिलेगी? मेरे कुंद होते कौशलों की भरपाई कैसे होगी? इतने सुनहरे साल जो आँखों के सामने बीत रहे हैं उनकी कीमत कितनी ज़िंदगियाँ चुकाएंगी? पता है इन सारे सवालिया निशानों को सिरे से खत्म होने में और कितने साल लगने वाले हैं यह कोई नहीं बता सकता। कोई नहीं। बस यह ऐसे ही बने रहेंगे।

{ऐसे ही कभी कभी मन उदास हो जाता है: ये कोई बहुत अच्छ दिन नहीं हैं } ; 

नवंबर 20, 2013

दो चार रह गयी गैर-ज़रूरी बातें..

 1.
मन रुका नहीं। थोड़ी देर में ही बाहर निकला। थोड़ा चल भी लेना चाहिए। शाम ढले दुनिया थोड़ा बदलती भी है। पूरे रास्ते सोचता रहा काफी कुछ रहने दिया या छूटता गया। उसे चाहकर भी कह न पाया। सब कुछ कहना वैसे भी कहाँ अभीष्ट है? कौन चाहता है सब कह दिया जाये। पर अभी बैठा हूँ तो दिमाग भागे जा रहा है। ठहर नहीं रहा। कई सारी बातें टकरा रही हैं। 

चीज़ें वही नहीं रह जाती। लगातार बदलती जाती हैं। सब बदल रहे हैं। पल-पल। डीटीइए स्कूल की दीवार के बगल से गुज़रते वक़्त उस जगह से रात रानी की गंध गायब है। पता नहीं जुखाम नहीं है। नाक भी ठीक है, फ़िर भी वह वहाँ क्यों नहीं थी। इतनी जल्दी तो जाती नहीं थी। इस बार क्या हुआ? ठंड तो अभी और बढ़ेगी। उसके बिन कुछ कम सी शाम लगती है। पर वो मेट्रो स्टेशन के पास सावनी के दो चार फ़ूल धुए से जूझते अभी भी वहाँ लगे हैं। इस साल के अगले साल में बदल जाने से वह भी चले जाएँगे। उनका ऐसे बने रहना अंदर तक भर जाना है। 

पता नहीं इतवार माली को क्या सूझी उसने फ़िरंगी पानी की सबसे मोटी डाँड काट डाली। अभी तो उसपर फ़ूल आते। इतराते। ख़ुद बुलाते। कहते देख लो। हम फ़िर आ गए। इस बार तुम उसे दे ही देना। हमारी ख़ुशबू के साथ। किताब में रख कर नहीं बिलकुल ताज़े। सुगंध के साथ। 

2.
पता है अभी भी बच रहा हूँ। जो कहने के लिए आया हूँ, उसे कह नहीं रहा। टाल रहा हूँ। सोचता हूँ जब सीधे उसे नहीं कही तब यहाँ लिखने का कोई मतलब नहीं। पर दूसरे पल मन करता है कह दूँ। शादी के कुछ ही दिन बाद वह पत्नी संग दिल्ली लौट आया। ऐसे ही एक रात दोनों नीचे रात के खाने के बाद वाली सैर कर रहे थे। मैं गेट की तरफ़ से आ रहा था। मुझे देख थोड़ा शरमाया या असहज हुआ। पर सामने था इसलिए बात करना ज़रूरी लगा। ज़रूरी लगा कुछ कहना। सिर्फ़ कहने के लिए कहना। पता है उस बचपन के साझीदार उस दोस्त ने उस रात क्या कहा? वह कहता है, यह शचीन्द्र है। हमारे पड़ोसी। मैं भी कुछ बोला। कुछ और पूछना चाहा। पर चुप रहा। 

यह हमारी पहली और आखिरी औपचारिक मुलाक़ात थी जिसमे वे दोनों साथ थे। अकेले कभी न उसने देख रुकना मुनासिब समझा। न कभी मैंने ज़रूरत समझी। हम कुछ दूजे क़िस्म के पड़ोसी हैं। बात कम करता करते हैं। पहले माले वाले दूसरे माले के पड़ोसी के ऐसे ही पड़ोसी हो सकते हैं। यह शहर ही कुछ ऐसा है। दोस्तों के पड़ोसी हो जाने वाली बात पता नहीं क्यों दिल में कहीं धँस-सी गयी। मैं किसी ऐसी 'संज्ञा' में तब्दील हो चुका था जहाँ मेरी पुरानी पहचान मिटायी जा चुकी थी। मैं मैं नहीं रह गया था। कुछ और होता गया। 

यह कोई अचानक घट गयी परिघटना तो बिलकुल भी नहीं होगी। बस अचानक हमारे सामने आ गयी होगी। हम इससे बच रहे होंगे। के उघड न जाये। कहीं से कोई फाँक दिख न जाये। हम समान रूप से अपनी बढ़ती समझदारियों में दूर होते गए होंगे। जहाँ किसी के पीछे छूट जाने का एहसास भी नहीं होता। बस हम छूटते जाते हैं। बिन बताए। बिन बोले। आँखों के सामने।

3.
आज पूरा दिन सोचता रहा वह जीशान वाला पुर्ज़ा स्कूल मैगज़ीन के लिए देना ठीक रहेगा के नहीं। खन्ना ने कहा के हमें भी कुछ देना है। तभी से अटक गया हूँ। क्या दूँ? अजय से पूछा। पर बात अटक गयी नाम पर। वह छोटा सा बच्चा इसके छप जाने पर कैसा महसूस करेगा। सारे विद्यालय के सामने उसकी क्या छवि जाएगी। वह कैसा-कैसा सा होकर अपने को छिपा लेना चाहेगा। कहीं गुम सा उन सबकी आँखों में खो जाएगा। इसके आने के बाद वह और गुमसुम न हो जाये। और अंदर तक इतना सिकुड़ जाये के कभी बाहर निकालने की सोचे भी न।

नहीं। यह ठीक नहीं है। यह मेरी और उसकी बात है। हमारे बीच की। यहाँ चलता है। वह इसे नहीं पढ़ेगा। स्कूल वाले यहाँ तक नहीं पहुँच पाएंगे। उसकी पहचान उसके नाम की तरह ही छिपी रहेगी। उससे कोई नहीं पूछेगा। किसी सवाल का जवाब नहीं देना होगा। पर उस पत्रिका में आने के बाद उसके ऐसे उसे सबके सामने लाने में खतरे हैं। सोच लिया यह नहीं दूंगा।

4.
स्वाति हॉस्टल के बगल बारात घर में आज शादी है। अभी पिछले हफ़्ते हिन्दू महासभा भवन में एक शादी थी। आज लौटते वक़्त ध्यान दिया तो उस रात के वही दो लड़के नकली भाले लिए उसी पोशाक में नीचे दरवाज़े पर खड़े हैं। टेंट भी वही है। सजावट भी। यह शायद उनका परमानेंट जुगाड़ है। जैसे शुक्रवार बिरला मन्दिर के उस लॉंन की तरफ़ जाते रास्ते पर बिलकुल वैसी ही सजावट थी जैसी की आज। कभी इसी पार्क में राम किंकर हफ़्ता दस दिन रामकथा कहते थे। शायद नवरात्रों के आसपास। हम छोटे-छोटे हुआ करते थे। फ़िर सुनने में आया है के इस उत्तर आधुनिक 'प्रेम' ने इस वाटिका के हिस्सों पर प्रवेश निषेध के बैरिकेड लगवा दिये हैं। कैमरों में प्रेमी युगलों का अभद्र शारीरिक व्यवहार गाहे-बगाहे नीचे दफ़्तर में लगे एलसीडी पर दिखने लगा था। अब ऊपर उस दक्षिण शैली में बने स्थापत्य की तरफ़ हम चाहकर भी नहीं जा सकते। गुफाएँ तो जमाना हुआ ताला बंद की जा चुकी थीं। 

बहरहाल।    

इधर मोहर्रम या उसके पहले पड़ी ईद से हमारी तरफ़ नमाज़ की अज़ान सुनाई देने लगी है। सुनाई देना इसलिए भी थोड़ा विस्मित करता है कि यह कैसे संभव हुआ के 'दिल्ली एक' में कोई मस्जिद कहीं से चल कर आगई हो। याद करता हूँ तो आस पास एक मस्जिद मिंटो रोड चौराहे पर दिखती है। जिसके मीनार रातों रात खड़े किए थे। हमारे ग्रेजुएशन के सालों तक वहाँ चारों तरफ़ मीनार नहीं थी। एक रात वह अचानक उग आई थीं। उसके स्पीकर की आवाज़ कुछ जादा दूर तक नहीं आ रही क्या? 

फ़िर ध्यान आया रेल्वे स्टेशन पर लाइन बदलते इंजनों की सीटियों की आवाज़ें भी इस मौसम में ख़ूब सुनाई दे रही हैं। क्या बात है। कहीं मौसम के साथ आती हवाएँ पूरब से आ रही हैं इसलिए। आ तो चुनाव भी रहे हैं।

नवंबर 19, 2013

दिल, दिल्ली की ठंड, शादी और सपना

दिन पता नहीं कैसे बीतते जा रहे हैं। करने को कुछ है ही नहीं जैसे। खाली से। ठंडे से। दिन अब छोटे होने लगे हैं। तीन बजने के साथ जैसे गायब से। उबासी नींद के साथ बुलाती है। पर नाम नहीं करता। रज़ाई ठंड से भी ठंडी कमरे में पड़ी रहती है। पैर भी ठंडे रहने लगे हैं। फ़िर नीचे साढ़े पाँच पानी भरते-भरते अँधेरा हो जाता है। अभी सवा छह भी ठीक से नहीं बजे हैं पर घुप्प अँधेरा छा गया। खिड़की के बाहर की दुनिया बस इस कमरे तक सिमट गयी है। सामने छत पर एक बल्ब जलता भी है तो कुछ देर बाद बंद हो जाता है। सड़क पर गुज़रती गाड़ियों का शोर इतना परेशान नहीं करता।

परेशान करता है इतने इतने दिन बाद भी कुछ न लिखना। दिमाग चलना बंद कर देता है। सोचता रहता हूँ तब लिखा जा सकता था, पर नहीं लिखा। चलो फ़िर लिख लेंगे। पर एक बार जो टला वह कभी लौट कर नहीं आता। कितना कुछ इकट्ठा हो जाता है फ़िर भी नहीं कहता। कहता हूँ तब जब खाली हो जाता हूँ। कहने को कुछ ख़ास नहीं होता। जैसे के अब।

इन सारी बातों के दरमियान दिमाग में यही चल रहा है के अभी कमरे से बाहर निकलूँ और थोड़ा घूम आऊँ। मन थोड़ी देर अकेले में बिताने को हो रहा है। जहाँ फ़िर से तरतीब से तुमसे कही सारी बातों को लगा सकूँ। के जब उन्हे डायरी में कहने को होऊँ तब वह सलीके से करीने से आती जाएँ। उनको कहीं ढूँढना न पड़े। कहीं किसी कोने में छिप न जाएँ। वह वैसी की वैसी बनी रहें। बिलकुल पास। अनछुये एहसास की तरह। घास पर चुपके से पड़ी ओस की बूँद की तरह। आहिस्ते से पैरों के बिन आवाज़ बगल में आ जाने के जैसे।

दिल्ली की ठंडीयों के साथ शादियों का मौसम भी आ गया है। उन न्योतों में कई कार्ड अपनी उमर में छोटे उन संगियों के भी हैं जिनके संग बचपन की कोई याद कभी बनी हो न बनी हों; पर उनके हवाले हमारे घर आए उनके माता-पिताओं की बातचीत में लगातार आते रहे। हम उन्हे ऐसे ही सुनते रहे। कभी उनसे मिले नहीं। मौके कभी आए भी नहीं। बस धुंधले से चहरे याद रह गये। उन्हे वैसे ही रहने दिया। ऐसा नहीं हैं के सिर्फ़ हम ही बड़े हो रहे थे। वह भी हमें अनदिखे उतने ही बड़े होते रहे। साथ-साथ। आज उनकी शादी के कार्ड आए हैं। देखकर अजीब सा भाव गुज़र जाता है। लगता है सब इतने बड़े हो गए। शादी होने वाली है। हमें पता भी नहीं चला। कभी बात भी नहीं हुई।

इसे ऐसे कभी नहीं लिखना चाहता था। पर अब बात आ गयी है तो कहता चलूँ। थोड़ा दिल तोड़ देने वाली बात है। इसलिए कभी सतह पर आने नहीं दिया। पर ख़ैर। अब यह पता नहीं कैसा है कि जिनके संग बचपन बीता, खट्टी मीठी यादों के ढेर-ढेर पुलिंदे अब भी खुल-खुल जाते हैं, उन्ही में से दो दोस्तों की शादियाँ इस बीते मई थी। दोनों दिल्ली के बाहर। एक ही हफ़्ते के भीतर। पहली सीहोर, मध्य प्रदेश में, दूसरी लखनऊ। जाना किसमे है यह बड़े दिनों तक तय नहीं कर पाया। तय करने के लिए शायद कुछ ज़िंदा साझेदारियों की ज़रूरत पड़ती है। कुछ ऐसा जो अभी भी जोड़े रहे। उस बंधन को जो बचपन से इस उमर तक आए। जब हम अपने हमसफ़र के साथ होने जा रहे हैं, तब तक। जिसके साथ ज़िन्दगी बिताने की शुरुवात कर रहे हों। पर नहीं। उसने कभी ऐसा महसूस नहीं किया। कभी नहीं कहा। के चल मैं जा रहा हूँ, तुम भी पीछे से आना ज़रूर। कुछ था, जो उस दिन टूट गया। ऐसा नहीं था के जाते वक़्त सामने नहीं पड़ा था। उसकी मुश्किल आसान कर दी थी। वहीं नीचे तब पानी भर रहा था। पर नहीं। उसे तब भी कुछ नहीं कहना था। नहीं कहा। नहीं बुलाया। बस पहिये लगे बैग को घसीटता हुआ चला गया।

पर पता नहीं कैसा हूँ। उसके पापा के दिये कार्ड के बाद ट्रेन में सीटें देख रहा था। देख रहा था सीहोर भोपाल से पास पड़ेगा या होशंगाबाद से। बस से कितने घण्टे लगेंगे। खाली कोई नहीं थी। सब वेटिंग लिस्ट। न नयी दिल्ली से न निज़ामुद्दीन से। पर बड़ा कमज़ोर सा विचार था। फ़िर तो ऐसे मन हटा के चलो हटाओ। है बचपन का दोस्त तो क्या? नहीं जा रहे। जिसने बुलाया उसकी शादी में गए। लखनऊ।

यह शादियाँ ऐसे ही कर जाती हैं। इतवार आशीष की शादी की तस्वीरें कुछ नए तरह से मुझे बुनती लगीं। उनमे कहीं-कहीं आगे आने वाली भूमिकाओं को देख भर लेने का रूमान खींचे ले रहा है। उनसे बचना आसान नहीं। पता नहीं तब से क्या सब सोच लेना चाहता हूँ। उन्हे कह पाने की अपनी सीमाएं हैं। जिन्हे यहाँ कहने से पहले फ़िर से गुज़र जाने का मन होता है। के चुपके से तुम्हें देखता रहूँ। तुम्हें सब कह दूँ जो अंदर ही अंदर उन साझे दिनों की याद के बाद हममे जुड़ते गए। जुड़ गए हैं हमारे दिन और रात। शाम और सपने। करवट और नींद। और वह सब भी जो कटहल के अचार आम के गलके से तुम कहती गयी थी। जो कहते हुए भी नहीं कहती। मैं नहीं कहता। अचानक चुप्पी सी लगा कहीं किसी चाँदनी रात में कॉफी मग लिए छत तक पहुँच जाता हूँ। के इस मुलाकात के बाद कहूँगा अपने हिस्से का सपना..

{आगे की बातें..}

नवंबर 14, 2013

बिन यादों बिन सपनों वाला दिल

जीशान। उसका नाम जीशान है। कभी नाम का मतलब नहीं पूछा। शायद उसे मालुम भी न हो। क्लास में पढ़ने वाले और भी बच्चे हैं पर पता नहीं क्यों इस पर आकर ठहर जाता हूँ। शक्ल से बिलकुल मासूम सा। पढ़ने से जी न चुराने वाला। रोज़ स्कूल आता। पर सितम्बर के बाद इसका आना एकदम से कम हो गया। और पता नहीं क्यों उसका चेहरा उदास लगने लगा। कुछ-कुछ खोया-खोया सा। पढ़ रहा होता तो देखता उसकी आँखें कुछ ढूँढ रही हैं। वह वहाँ नहीं होता। उसका वहाँ होना वहाँ नहीं होने लगा। उसने बोलना लगभग बंद कर दिया। अपने आप में गुमसुम सा। बिलकुल चुप। शांत। अकेला। बातों को न कहने वाला। अंदर ही अंदर सब ऐसे चलता जो उसे परेशान करता लगता। लगता मेरी पकड़ से दूर जा रहा है।

कई बार बहाने से पूछा। उसके दोस्तों से जानना चाहा। पर कुछ नहीं। हरबार कह देता सर कुछ भी तो नहीं है। फ़िर पूछता तो कोई ऐसा ही गोलमोल जवाब देता के आगे कुछ कहना ठीक नहीं लगता। हरबार लगता कुछ छिपा रहा है। बताने का मन नहीं है। 

फ़िर सोचा किसी बच्चे से लड़ लिया होगा। ठीक हो जाएगा। पर नहीं। बात इतनी ही होती तो ठीक रहता। इस बहाने दोस्ती मज़बूत होती। बात बनती। पर समझ नहीं आया कि इतने छोटे बच्चे इतने समझदार कैसे हो जाते हैं। वह अपने आप ही अपने स्तर पर उन्हे संभाल लेना चाहते हैं। जीशान मुझे नहीं बताना चाहता था। नहीं बताया। पर लगातार सोचता रहा क्या है जो इसे ऐसे अकेला करते जा रहा है। किसी से घुलमिल क्यों नहीं रहा। किसी से कुछ कहता क्यों नहीं। चुप क्यों रहता है। बोलने में ऐसा क्या बोल जाएगा जो हम समझ नहीं सकेंगे। एक सुबह ऐसे ही रजिस्टर देख रह था। फ़ौरी निगाह इसके नाम पर जाकर थम गई। हफ़्ते में दो बार ही स्कूल आया। जिसमें से एकबार आधे दिन बाद ही भाग गया। यह ऐसे स्कूल छोड़कर जाने वाला बच्चा तो नहीं है। अगर कोई बात थी, तबियत ख़राब थी तो कहकर जाना था। पर कुछ नहीं। वह चला गया। बिन बताए।

अगली सुबह वह फ़िर नहीं आया। लगा मामला कुछ गड़बड़ है। कुछ हो तो नहीं गया। बच्चों से पूछा। पहले तो कोई नहीं बोला। थोड़ी देर बाद नोमान खड़ा हुआ। बोला, ‘वो तो अपने अब्बा के साथ फलों की रेहड़ी लगता है, पता नहीं अब आएगा के नहीं’!

कितनी आसानी से वह कह गया। अगर इतना ही आसान इसे सुन लेना होता तो कितना अच्छा होता। पता नहीं इस तस्वीर को जब भी देखता हूँ तो लगता है अभी कुछ कहेगा। कहेगा उसे स्कूल आना है। उसे भी पढ़ना है। खेलना है। झगड़ना है। ख़ूब-ख़ूब बातें करनी हैं। किताबों के पन्ने पलटने हैं। सोचता हूँ कभी मन करे तो थोड़ा रो दे। दिल हल्का हो जाएगा। जब भी देखता हूँ तो उसकी आँखें खींच लेती हैं। लगने लगता है कितनी मुश्किल से वह वहाँ आया होगा। कैसे उसके घर वाले रोज़ भेजने से पहले सोचते होंगे। उसका वहाँ रुके रहना आगे आने वाले दिनों में और विकट होता जाएगा। उम्र जैसे-जैसे बढ़ेगी वह ख़ुद उन लाद दी गयी जिम्मेदारियों को उठाना चाहेगा। फ़िर एक दिन ऐसा आएगा, वह कभी स्कूल नहीं आ पाएगा। मन होगा फ़िर भी नहीं।

उसके हिस्से कौन-कौन से सपने हैं। कोई नहीं कह सकता। उन्हे वह सच भी करना चाहता होगा, पता नहीं। चाहकर भी नहीं कर पाता होगा। कितनी छटपटाहट लिए वह दूसरे बच्चों को देखता होगा। वह कभी टीवी पर किसी विज्ञापन में नहीं आने वाला। उसके हिस्से का बचपन ऐसा ही है। निर्मम कठोर संताप से भरा हुआ। किसी त्रासदी की तरह। यह सपनों की दुनिया में आने से पहले ही उनका चकनाचूर हो जाना है। बचपन के दिन अभी से कहीं उड़ से गए। यह सारे रंगों का बेरंग हो जाना है। आवाज़ों का एकदम से चुप हो उसके शोक में बदल जाना है। बच्चे शोर नहीं मचाते तो अजीब लगता है। वह भी शोर नहीं मचाता। चुप-चुप रहता है। किसी दोस्त से कुछ नहीं कहता। उमर से जादा बड़ा हो गया है। कुछ इसे जादा समझदार होना कहेंगे पर उसका ऐसे होते जाना कचोटता है। यह बचपन से बचपन के दिनों का गायब हो जाना है। यह ऐसे गुमशुदगी के दिन नहीं हैं। उनमे डूब जाने के मौके हैं।

स्कूल की दुनिया सपनों को सच न भी करती हो पर यह बचपन को साँस लेने का मौका ज़रूर देती है। वह पढ़ लिखकर भले कोई नौकरी न करे पर यह दिन उसके दिन हैं। दिन कभी रात की तरफ़ वापस नहीं लौटते। यहाँ लौटना नहीं है। कोई रिवाईंड  का बटन नहीं है। जो जीना है जैसे जीना है वह यही है। अब बीते तो कभी वापस नहीं आएंगे। यह दोस्तियाँ फ़िर कभी नहीं मिलने वाली। इनकी नोकझोंक लौटकर उससे कुछ नहीं पूछेंगी। कभी कोई खट्टी-सी याद भी उसके दिल से नहीं गुज़रेगी। दिल बिलकुल खाली याद के कैसे धड़कता होगा पता नहीं। कभी उससे पूछूंगा। शायद कभी नहीं।

अभी भी तस्वीर में उसे देख रहा हूँ। कहीं खो गया है। इसे वापस लाना है। कैसे। पता नहीं। पर लाऊँगा ज़रूर।

नवंबर 11, 2013

नवंबर नौ एक रुकी हुई शाम

हम लोग इंतज़ार कर रहे थे शायद ऐसे ही किसी दिन का । ऐसी ही मुलाक़ात का। राकेश इस बार दस दिन लिए दिल्ली आया। दिवाली के दो दिन पहले। पर बे-तक्कलुफ़ होकर उस इत्मीनान से अपने-अपने हिस्से कभी खोल ही नहीं पाये। एक दूसरे से कुछ कह नहीं पाये थे। तय हुआ सब इस शनिवार इकट्ठे हो राकेश के यहीं चले चलें। वहीं बैठेंगे। फुसरत होगी। वक़्त होगा। मौका होगा। तब धीरे-धीरे अपने अंदर उमड़ती-घुमड़ती बातें कह एक दूसरे से कह लेंगे। सुन लेंगे। कुछ बोलेंगे। कुछ नहीं कहने का मन हो तो ख़ुद को वहीं तय्यार कर लेंगे। जो है उसे वैसा ही कहेंगे। बे-लाग लपेट। 

बीच में दो बार मिले तो पर मन से बैठ बात नहीं हो पाई। कुछ था जो लगता रहा रह गया है। इतने दिनों में काफ़ी कुछ कहने के लिए हम सब इकट्ठा करते रहे। उसे जब तफ़सील से सामने रखते उससे पहले जाने कहाँ देने वाले थे।

स्टैंड पर पहुँचा ही था बस आ गयी। पंद्रह रुपये की टिकट। अरुण आशीष दोनों मेट्रो में संग थे। उमेश के बारे में अरुण से पूछा तब कुछ नहीं बोला। पर अच्छा हुआ, वह भी था। एमपी मॉल के पास। धूप आज निकली थी। पर सूरज बादलों के कभी पीछे कभी आगे होता रहा। ठंड थी। गोद में बिहू लिए वहीं राकेश मिला। वे तीनों साढ़े बारह के बाद आए। इस बार भी राकेश बिहू के लिए चॉकलेट लेना भूल गया। हम सब नीचे से फ़िर ऊपर आकर बैठ गए। कहीं हिले नहीं। मन पता नहीं क्या-क्या सोच वहाँ गया। क्या-क्या बाँधना भूल गया याद नहीं। पर लंबे इंतज़ार बाद हमारी बैठक लग रही थी। फ़िर एक बार शुरू हुए तो बस पता नहीं कहाँ कहाँ से होते हुए गुज़रते रहे। शुरू हुए आज के बोझिल से उकताए से बे-नौकरी वाले दिनों से।

इतनी उमर हो जाने के बाद भी एक अदद नौकरी का ना होना सबसे जादा तोड़ता है। जितना वह बाहर से नहीं देखता उतनी ही बारीकी से वह अंदर का रेशा-रेशा उधेड़ रहा होता है। हमे पता है, हम वहाँ नहीं होना चाहते। पर वहीं हैं। कहीं भाग नहीं सकते। कहीं जा नहीं सकते। स्थितियाँ लगातार विकट होती जा रही हैं। पर हम कुछ नहीं कर पा रहे। बस उन पुरानी बीती इमारतों को देख खीज से जाते हैं। उनका वहाँ होना किसी भी बहाने से अंदर उल्लास आह्लाद आनंद से नहीं भरता।

उनका होना हमें याद दिलाता रहा है हमारे बर्बाद होने के दिन। वह दिन जब हम किसी को कुछ नहीं समझ रहे थे। बस एक धुन थी। हम हैं। बस हम ही हैं। और कोई नहीं। नौकरी के प्रति घृणा जैसे भाव लिए विचारों को शिद्दत से महसूस करते रहे। ‘करियरिस्ट’ हो जाना गाली की तरह लगना। यह कुछ अलग हो जाना है। कुछ अलग करना है। इसने हमें खांचे-साँचे दिये। पर इसकी जकड़न सबसे जादा आज अंदर सीलन की तरह लगती है। ‘एस्टब्लीश्मेंट’ को हर तरह से तोड़ते रहने ने जैसे हमें गढ़ा उसने हमें इस दुनिया के लिए ‘मिसफिट’ साबित किया। आज हम उसी दुनिया में एक नौकरी के लिए इतना जूझ रहे हैं। इसका कारण वही लोग हैं जो इस ‘विचारधारा’ को औज़ार की तरह इस्तेमाल कर हमें बनाते-बिगाड़ते रहे। इस रूप में वह ‘ओवर-स्मार्ट’ थे। उनके पास विकल्प थे। यह विकल्प होना उनकी जुगाली करते रहने की खाद की तरह है जहाँ से यह लगातार ताकत पाते रहे हैं। एक बात यह भी निकली के इसमे ‘जेआरएफ़’ की भूमिका को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। वे इस तरह के ‘एलीट’ थे जो कुछ भी किसी भी तरह रह सकते थे। उन्ही लोगों के जादा ‘फॉलोवर्स’ बने जो कहीं से पैसा पाने लगे और आगे चलकर उनकी नौकरियाँ हुईं। और बहुत सारे जो इसे ‘अफोर्ड’ नहीं कर सके वह वहाँ की मुंडेरों से उड़ रीवा या दिल्ली के स्कूलों में मास्टर बन उस तंत्र से बाहर धकेल दिये गए। आज भी हम ही हैं। पर अकेले हैं। पैसों की कंगाली ऐसे ही बुनती है।

यह विचार की ‘विचारधारात्मक’ भूमिका है। जिसने हममें नकार का भाव तो भरा पर हमारी दृष्टि को भी उतना ही सीमित संकुचित किया। यह ऐनक की तरह हमारी नाक पर चढ़ गया। हम देख ही नहीं सके के हम कहाँ हैं। अपने साथ क्या कर रहे हैं। फ़िर मसला जितना एक-रेखीय दिखता है उसे समझना उतना ही जटिल है और सबसे पीड़ादायक इस सबके साथ जीना। 

बातें इतनी बोझिल नहीं थीं। पर थीं यही। हम सब मिलकर इस बात तक पहुँचे जहाँ मानविकी विषय हम सबको एक तरफ़ धकेल रहे होते हैं। बातों-बातों में यह भी के साहित्य में ‘वामपंथी’ होना अपनी वैधता को सत्यापित करने जैसा है। और अधिकतर लोगों ने इसी ‘फ़ैशन’ के तहत इसे ओढ़े रखा है। यह ‘फैब इंडिया’ का कुर्ता पहनने की तर्ज़ पर अपना काम करते हैं। वरना सब अपने मूल चरित्र में कितने सामंती और बुर्जुआ हैं यह उनसे अधिक और कोई नहीं जानता।

कभी-कभी लगता है जब हम बाहर के हो जाते हैं तब चीजों को जादा अच्छी तरह से देख समझ पाते हैं। वहीं हम लोग कर भी करते रहे। एक-एक कर अपने आज के कल के चीथड़े उधेड़ते रहे। एक एककर उन बारीक सीवनों को अपने भोथरे नाखूनों से खींच रहे थे, जिन्होने हमें बुना। आज तक हमें बनाए रखा। उनकी उपादेयता इतनी ही भर थी के हमें हम जैसा बनाए रखा जा सके। हम प्यार भी कर रहे थे तो उसका वर्ग चरित्र पहले निश्चित कर आगे बढ़ते। राकेश और अरुण उस दिन नई सड़क पर पूछे गए सवाल का जवाब देते रहे। सुंदर क्या है? हम किसी भी लड़की की तरफ़ आकर्षित होते हैं तबकौन-सी चीज़  काम कर रही होती हैं? हम किन मानकों को गढ़ अपने मन को तय्यार करते हैं? क्यों उसके पीछे हमारी आँखें भागने लगती हैं। पता नहीं इसका कोई और जवाब हो भी सकता है या नहीं। यहीं शादी के सवाल भी टकराए। जो ‘टु बी ग्रांटिड’ है वह ऐसा ही क्यो होता गया है। इसमे ऐसा क्या है जो ऊब पैदा करता है। यह कई सारे सामाजिक सवालों का बड़ा नैतिक सा जवाब है। पर इसमे रहते हुए घुटन क्यों महसूस करने लगते हैं। अगर इसके समानांतर स्त्री भी वही करने लगे जैसा पुरुष करते हैं तब?

जवाब स्त्री ने ही दिया। राकेश की सहचरी ने। भाभी लिख नहीं रहा क्योंकि बोल नहीं पाता। और नाम लिखना थोड़ा अजीब सा किए जा रहा है। वे कहती हैं प्रेम जितना दुतरफ़ा है शादी के बाद वह कई और दिशाओं में लगातार खुलता है। उसे इतनी सारी जिम्मेदारियाँ एक साथ उठानी पड़ती हैं के उसके हिस्से का वक़्त भी कम पड़ जाता है जहाँ वह ख़ुद के लिए कुछ क्षण निकाल ले। यहाँ उसकी कुछ अपेक्षाएँ हैं। वह अगर अपने पूर्व प्रेमी जो कि अब उसक पति भी है से थोड़ी देर के लिए साथ माँग रही है तो उस पति को क्या करना चाहिए? यह सवाल की तरह बीच में आया। जिसका जवाब आशीष दे रहा था। अरुण कुछ भी कहे पर वह भी कुछ ऐसा ही सोचता होगा। जिससे पूछा जा रहा था वह भी कुछ बोला। पर उसका जवाब पारित नहीं हुआ। उन दोनों के बीच यह जीवंत सवाल उनके रिश्तों की तरह है। भले यह सवाल जवाब उन्हे कैसे भी लगते रहे हों पर यही उसकी मजबूती का सबसे बड़ा आधार बना हुआ है। यह एक तरह की पारदर्शिता है जिससे कई दंपति बचे ही रहना चाहते हैं।

इन सारी बातचीत में वह सबसे चुप। एक कोने में बैठा सब सुनता रहा। कुछ-कुछ वह भी जोड़ता। पर अंदर ही अंदर काफ़ी कुछ उसके भी चलता रहा होगा। उसके पास भी कुछ सवाल रहे होंगे। थे भी। उसमे पूछे भी। अपनी कही भी। कुछ के जवाब मिले। पर उनके लिए यह जगह नहीं है। जब पूरे-पूरे जवाब मिल जाएँगे तब। उससे पूछकर। इतना तो कर ही सकता हूँ।

राकेश जितना विचारों में व्यवस्थित लगता है उतना उनको लेकर जीने में वह उतना ही अव्यवस्थित जान पड़ता है। शायद एक हद तक हम सब ऐसे ही होते होंगे। पर इस तरह होने से वह बचना चाहता है। जैसे हम। वह सुलझा हुआ है पर लगता है दूसरों के लिए जादा। फिर वही वाक्य संरचना दोहराकह रहा हूँ हम जैसे ही अपने से बाहर निकलते हैं थोड़ा सहज महसूसते हैं। के चलो यह बात हमारे लिए नहीं है। वरना हम ख़ुद कितनी तरहों से फँसे हैं हमें ही पता है। पर वैवाहिक सम्बन्धों पर जितनी संजीदगी से वह एक एक बात स्वीकारता चला जाता है ऐसा करने की हिम्मत सबमे नहीं होती। यही उसे राकेश बनती है।

इस पूरी बातचीत में आशीष दूसरा पिता था। घर के अपने अनुभवों का ख़ूब इस्तेमाल करते हुए हम सब देख रहे थे। कुछ घंटों की दोस्ती में बिहू उसे जाता देख रोने लगा। हम सबको अब चलना था साढ़े आठ बज रहे थे। ठंड का मौसम है। अँधेरा कुछ जादा घना लगता है। सीढ़ियाँ उतरते बिहू की मम्मी बोलीं अभी दोस्ती है रिश्तेदारी नहीं है। पता नहीं वह कितना मतलब समझा होगा। फ़िर भी उसका रोना बंद नहीं हुआ। रोता रहा। हम नीचे उतरते उसकी आवाज़ में फ़िर से ऊपर नहीं आ सकते थे। जाना था।

पर चुपके से उस शाम की रिकॉर्डिंग अपने साथ लिए आया हूँ। एक दस मिनट की है और एक आधे घंटे से कुछ जादा की। यहाँ अभी दस मिनट वाली। यह मेरी पहली पोस्ट भी है जो पॉडकास्ट के साथ जा रही है। और वह कहानी बाद में कि कैसे बस स्टैंड से उन तीनों को विदा कर मैं राकेश के साथ वापस चल पड़ा। शायद बहुत कुछ था जो अभी भी कहना सुनना बचा रह गया था.. पर पहले तुम सुन लो। जब तुम कहोगे तब यहाँ ‘पब्लिक स्फेयर’ में उसे लाएँगे..इसलिए बाकीयों के हिस्से थोड़ा और इंतज़ार..

यह पिछली शाम है, लिंक दिये दे रहा हूँ ऐसी ही पिछले साल की पिछली शाम  और यह रही रिकॉर्डिंग..

नवंबर 08, 2013

उनके हिस्से का बहराइच..

बहराइच कभी-कभी जनसत्ता में नज़र आ जाता है। अधिकतर वहाँ संजीव श्रीवास्तव होते हैं। और ख़बरों में सागौन की लकड़ी की तस्करी से लेकर दुधवा नेशनल पार्क। कभी घाघरा नदी की बाढ़ भी बनी रहती है। कमाल खान भी इकौना जाकर रिपोर्टिंग कर आए हैं। उन्होने ही बताया था कि यहाँ से दो बार विधायक रहे भगौती परसाद जिला अस्पताल में मौत से लड़ते हुए हार गए। पर इधर हमारा बहराइच ख़बरों में कुछ जादा ही बना हुआ है। अभी जब लैपटॉप ऊपर ला रहा था तब भी इसकी ख़बर चल रही थी। आज वहाँ एक धीर-अधीर बड़े से नेता की बड़ी-सी रैली थी।

यह एक तरह की दावेदारी है। जिस पर अभी कोई और दावा नहीं कर रहा है। अभयकुमार दुबे कल टीवी पर कह रहे थे, यह ऐसी दौड़ है जिसमें उन्होने बहुत पहले से अकेले दौड़ना शुरू कर दिया है और दूर-दूर तक कोई प्रतियोगी अभी तय्यार नहीं है। जो हो सकते हैं उनकी रणनीतियाँ आगे आने वाले दिनों में स्पष्ट होंगी। बहरहाल।

हम दिल्ली में बैठे इंतज़ार में थे के यहाँ से चलने वाले चैनल हमारे बहराइच को कैसे दिखाते है। वहाँ के लोग वैसे ही दिखते हैं न जैसे आजतक हम देखते रहे हैं। यह पता नहीं कैसा भाव था जो अंदर ही अंदर बस खींच रहा था। यह भी सोचता रहा यहाँ से कौन-कौन लोग वहाँ के लिए निकले होंगे। वह उस जगह को जानते भी होंगे या ऐसे ही ‘आउटिंग’ के इरादे से चल पड़े। थोड़ी बहुत पड़ताल तो की ही होगी। कहाँ जा रहे हैं। कि वक़्त रहा तो क्या-क्या घूमेंगे। इस सबके दरमियान लगातार भूले हुए था के रैली ‘कवर’ करने आए लोगों को जगह से कोई ख़ास वास्ता नहीं होता। उनके लिए ज़रूरी है ‘कवरेज’। कैमरा पोजीशन।

वे लोग कोई डॉक्यूमेंटरी तो बनाने गए नहीं हैं। उन्हे वहाँ के घंटाघर, छावनी चौराहे, निगम पान भंडार, आनंद होटल से क्या मतलब। वहाँ का रेलवे स्टेशन भी सीधे दिल्ली को नहीं जोड़ता। एक तरफ़ मैलानी रुपईडीहा है तो दूसरी तरफ़ गोण्डा। पता नहीं उन्हे पता है या नहीं के यहीं पास में श्रावस्ती भी है। ज़रा सहट-महट ही घूम आयें। गौतम बुद्ध ने कई चौमासे यहाँ बिताए थे। दरगाह मेला भी तो नवंबर में नहीं होता। जेठ में था, खत्म हो गया। प्रेमचन्द भी कुल तीन महीने ‘महराज सिंह इंटर कॉलेज’ में रहे थे। उसे ही ‘शूट’ कर लें। थक गए हों तो छावनी के ‘लोटस’ जाकर दिल्ली वाला खाना भी खा सकते थे। और मन कर देता तो कचहरी रोड के हरीश की लस्सी पी लेते, तो सालों याद रखते, कि कहीं लस्सी पी थी।

पर कैमरा कहाँ तक पैन होता? यहाँ पटना या गोरखपुर की तरह शहर के बीचों बीच किसी गाँधी के नाम पर इतना बड़ा मैदान नहीं है। पता नहीं जब राहुल गाँधी यहाँ आए थे तब उन्होने इसपर शोक जताया था के नहीं। उन्हे तो यह भी याद नहीं आया होगा के जिन दादी की हत्या का ज़िक्र किए फ़िर रहे हैं वह गिलौला भी होती आयीं थी। फ़िर भी ट्रेन वहाँ नहीं पहुँची। न टण्डन जी ने वहाँ से बायपास ही निकलने दिया। क्या यहीं का पानी पीकर उनका पेट ख़राब हुआ था जिसके बारे में वे पीछे कह रहे थे।

ख़ैर, जिस सड़क किनारे बड़े से मैदान में यह जमावड़ा सशर्त होना तय हुआ उसपर आगे चलते-चलते हम नानपारा पहुँचेंगे। नानपारा हमारी चाची का मयका है। और बहुत पुरानी-सी याद में वहाँ एक राजा का बड़ा-सा महलनुमा घर है। जिसमे कई छोटे-बड़े पक्के तालाब हैं। नीले रंग की आभा में हरी हरी काई अभी भी कई बार दिख जाती है।  उन्ही में से एक की तरफ़ उँगली बढ़ाते हुए बीना के मामा कहते हैं, यहाँ पान भी उगाया जाता है। हम तब बहुत छोटे छोटे थे। नहीं पता था के पान वहाँ की मंडी में कलकत्ते से बड़े सलाहियत से आता है। के सूखने न पाये। कैसे बड़े-बड़े झऊओं में उन्हे तरतीब से रखे रहते हैं। फ़िर वहीं से नेपालगंज गए। वहाँ से काला राजमा लाये थे। पता नहीं उनका स्वाद कैसा था। पर खड्खड़े की आवाज़ अभी भी बुला लेती है।

आजकल वहाँ से एक नाम कईबार ‘हंस’ में दिख जाता है। आज ‘नया पथ’ में ‘हुस्न तबस्सुम निहाँ’ की एक कहानी आई है। ‘स्वप्निल कैनवास के धुंधले धुंधले रंग’। वहीं नीचे उनका नंबर भी है। पर कभी मिलाया नहीं। हिन्दी समय पर उनकी कुछ और कहानियाँ दिखी। अभी पढ़ी नहीं है। कभी मन में ख़याल आता है इन कहानियों में उनका बहराइच कैसे धड़कता होगा। एकबार स्वराज प्रकाशन से प्रकाशित ‘नीले पंखों वाली लड़की’ इसलिए उठा लिया था के उसमे अपने हिस्से का बहराइच देख सकूँ। एक दो कहानियों पर कभी कुछ लिखा भी था। शायद ‘कथादेश’ में कोई कहानी थी उसपर। कभी मौका बनाऊंगा सिरे से उनसे गुज़रते जाने का मन है। वह वैसा तो बिलकुल नहीं होगा जैसे यह भगवा आँखें देखती हैं। वह इसे बाँटती नहीं होंगी।

इतना सब होने पर भी जब वहाँ यह रैली घटित हो रही थी, तब छत पर सो रहा था। खाना खाने के बाद इन ठंडे दिनों की नींद की बात ही कुछ और है। अभी लिखने से पहले ‘यू-ट्यूब’ पर इस रैली का विडियो देख रहा था कोई दो घण्टे की स्ट्रीमिंग है। सफ़ेदे के पेड़ों के बीच। सूरज वहाँ भी नहीं निकला है। औरतें पैर ऊपर कर कुर्सियों पर बैठी हैं। पुरुषों के किन्ही हाथों में फूल वाले झण्डे है। पर कौन इतना वक़्त ज़ाया करे। किसे गरज़ पड़ी है कि देखे वह मेरे बहराइच को कितना जानते हैं। जो राजा सुहेल देव के बरक्स महमूद सालार की दरगाह को रखे उसे सुनकर भी क्या हो जाने वाला है। कुछ नहीं।

बस अभी दोपहर में पढ़ी असद ज़ैदी की कविता घूम रही है। ‘आम चुनाव। उसकी अंतिम पंक्तियाँ हैं: ऐ भली औरतो ऐ सुखी औरतो/ तुम जहां भी हो/ अगर वोट/ डालने निकल ही पड़ी हो/ तो कहीं भूल के भी न लगा देना/ उस फूल पर निशान।

नवंबर 04, 2013

ब्लॉगिंग पर छोटा सा फुटनोट

एकबहुत पुरानी याद है। कोई साल खत्म हो रहा था। उसी की किसी ठंडी सी शाम नीचे पार्क के पास वाली सीढ़ियों पर पवन से पूछा था,यह ‘ब्लॉग’क्या है? उस साल यह ‘वर्ड ऑफ़ द इयर’ घोषित हुआ था। और मेरी ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी मुझे नहीं बता पायी थी। सच तब हमारे घर में कंप्यूटर नहीं था। यह भी नहीं जानता था इसे खोलते बंद कैसे करते हैं। लगता है अभी की तो बात है। बहरहाल।

तकनीकी रूप से अभी जिस जगह पर लिख रहा हूँ उसे ‘ब्लॉग’ कहते हैं। जब जैसा मन किया। कोई खयाल आया। किसी विचार से टकरा गया। कोई खट्टी-सी याद जीभ के नीचे होते हुए दिल तक गुज़र गयी। कभी कोई मीठी से दिन की उदासी घेरे रही। कभी तुम्हें धड़कते दिल की धड़कन कहते-कहते कुछ लिखता रहा। पर कभी यह नहीं सोचा कि इस उत्तर आधुनिक माध्यम की ‘शास्त्रीयता’ में यह फ़िट होता भी है या नहीं। ऐसे सवाल मूलतः हाशिये पर धकेले जाने की गरज से पूछे जाते हैं। जो पूछ रहे हैं क्यों पूछ रहे हैं देखे जाने लायक सवाल है। हम इसे अपनी मर्ज़ी से मोड़ते गाँठते बुनते सिवन उधेड़ते रहे पर इन सब प्रक्रियाओं को एक साथ कुछ कहा भी जाये, वाला आग्रह कभी पास नहीं फटका।

यह स्पेस नितांत निजी किस्म की बैठक बना रहा। हम किसी को बुलाने नहीं गए। जिसका मन हुआ वो आया। जिसका दिल नहीं किया वह रुका भी नहीं। यहाँ उसकी स्वतन्त्रता भी उतनी ही ज़रूरी है जितनी हमारी। घसीट-घसीट कर लाने वाली आदत कभी रही नहीं। कान पकड़-पकड़ दिखाना अपना काम नहीं। शुरू से ही एक अनकही समझ काम करती रही के जिस भाषा में काम कर रहे हैं उसकी अपनी ‘गतिकी’ है और उस ‘गत्यात्मकता’ में हमारी कोई जगह नहीं है। हम बाहर के लोग हैं। हम अजनबी हैं। अजनबी ही रहेंगे। यह द्वीप जैसे होते जाने की तरह दिखता ज़रूर है। पर है नहीं।

सुनने में आ रहा है यह ब्लॉगिंग का दसवाँ साल है। दस साल पहले किसी ने कहीं ब्लॉग बनाया होगा। उस पर कोई पोस्ट लिखी होगी। इस वाक्य को संयोग की तरह लेना चाहिए या इसके एक-एक पद को विखंडित कर विश्लेषित किए जाने की ज़रूरत है। ज़रूरत इसरूप में कि किन ‘पहचानो’ किन ‘अस्मिताओं’ को उसने सबसे पहले अपने अंदर अपने यहाँ जगह दी। वे कौन लोग थे जो यहाँ ‘सबसे पहले’ की तर्ज़ पर यहाँ उपस्थित हुए। वे किन विशेष परिस्थितियों से निकल यहाँ पर आए थे। इन सबको जोड़कर जो सबसे सरल सवाल बनता है वह यह के, ‘वे सब कौन थे’?

शायद हिन्दी पट्टी के वे अप्रवासी जो इस देश में रह पाने का आर्थिक घाटा सह पाने की स्थिति में नहीं थे। और रोज़गार की गरज से यहाँ से छिटक कर किन्ही किन्ही देशों में पाये जाने लगे थे। यह गरज उनकी अभि- क्षमताएं भी कही जा सकती हैं। इस तरह पिछले तीनों वाक्य किसी भी तरह से अपमानसूचक वाक्य की संरचना को प्राप्त न हो जाये इसलिए खुदही इन्हे ‘अर्थशास्त्रीय दृष्टि’ से पढ़ने की माँग किए देता हूँ। यह जितना ‘ग्लोबल’ होना है उतना ही ‘लोकल’ भी। जितना देश के अंदर है उतना ही देश के बाहर। सब अपनी-अपनी जगहों के साथ वहाँ से निकले। दिल में बसाये। एक कोने में ज़िंदा रखे। हिन्दी तब जादा अपनी लगती है जब हम इसे अपनों के बीच नहीं बोल पाते। या उन लोगों के साथ इस्तेमाल नहीं कर पाते जिनके बीच अब वे रहते होंगे। इस तरह यह भाषा इन्हे खींच रही होगी। इसे अब भाषा के प्रति प्रेम कहें या अस्तित्वमूलक ‘टैक्स्ट’।

यह चयन का मसला कभी भी नहीं रहा। यह अपने आप से जुड़ना था। उन कस्बे गाँवों शहरों की गलियों ढाबलियों गुमटियों दुकानों छज्जों की याद में कुछ देर बैठ लेना था। किसी बीते कल में अरझे रहना था। बचपन की पतंग उँगलियों में फंसे कंचों की आवाज़ को फ़िरसे सुन लेना था। शुरुवाती दिन किसी भी तरह से आसान तो बिलकुल नहीं रहे होंगे। एक ऐसे तंत्र में जिसकी नियामक भाषा अँग्रेजी हो वहाँ हिन्दी में लिख लेना अपने आप में चुनौतीपूर्ण रहा होगा। यह आज ‘यूनिकोड’ पर जितना सहज लगता है तब उतना ही उलझा देने वाला सवाल रहा होगा। कितने ही तकनीक के जानकार इसे सुलझाने में लगे होंगे।

ख़ुद को इन बीतते सालों में कोई नियमित पाठक नहीं कह सकता। जिनका लिखा यहाँ अच्छा लगता रहा है, उनके ठिकानों पर जितना भी यहाँ घूमा फिरा हूँ, उस लिहाज से एक ठीक-ठाक समझ तो बनी ही होगी। इसी पर अभी जब उस शाम आलोक से बात कर रहा था तब से एक ख़ाका दिमाग में घूम रहा है। सोचा था एक ही पोस्ट बनाऊँगा पर लगता नहीं के यहाँ उसकी गुंजाइश है। इसलिए इसे उसकी पूर्वपीठिका कह कर काम चला रहा हूँ। उसमे पूर्वाग्रह होंगे पक्षधरता होगी कुछ निजी टिप्पणियाँ होंगी कुछ छेड़ होगी। जो जैसा लगता रहा है उसे वैसा ही लिख लेने की कोशिश करूंगा। हो सकता है जिनके नाम वहाँ होंगे उन्हे अच्छा न लगे। किन्ही को किसी पर तंज़ कसने का बहाना लगे याकि कभी उन्हे पता ही न चले। कि कौन उनके बारे में क्या कह रहा है। पर संवाद होने के लिए ज़रूरी है, बात हो। यह बात बिलकुल निजी क़िस्म की होगी। पर अभी नहीं। आगे। जल्द।

और यह अंतिम अनुच्छेद किसी भी तरह से उस पोस्ट का हलफ़नामा न माना जाए।

नवंबर 03, 2013

बीच-बीच में थोड़ा बहुत पढ़ते हुए

उस दोपहर राजेश जोशी की एक कविता का नाम यादकर लौटा। घर पहुँच उसे खूब ढूँढा। नहीं मिली। कविता में एक ‘प्लेटफॉर्म’ की बात थी। बात क्या थी याद नहीं। पर उसे दोबारा पढ़ लेने का मन था। जहाँ-जहाँ मिल सकती थी, देखा। नहीं मिली। दिल थोड़ा बैठ गया। मन मान नहीं रहा था। बड़ी देर तक बैठा रहा, क्या किया पता नहीं। बस अपने मन में ऐसे ही किसी सुनसान से ‘प्लेटफॉर्म’ को सपनों में बराबर खोजता रहा हूँ। अभी तक वह कहीं नहीं मिला है। बस उस अनछूए से एहसास की तरह बचाए रखा है। वहाँ खाली बेंच को दूर से ऐसे ही देखता रहा हूँ।

फ़िर काफ़ी दिनों से कुछ अच्छा पढ़ा नहीं था। उस बार असगर वजाहत का नया कहानी संग्रह ‘डेमोक्रेसिया’ दिखा। ले आया। कुछ उम्मीदें थी। मन था। किताब शुरू की भूमिका से। लेखक क्या कह रहा है? अख़बार होती दुनिया में कहानी लिखना मुश्किल होता गया है। ख़ुद को भी अख़बार जैसा लिखने से लगातार बचाना है। उसी के बीच कहीं कुछ कहा जाएगा तो ज़रूरी नहीं कि वह बचा रहे। ब्योरे उसे दबा ले जाएँगे। यह समकालीन तथ्यों के बीच से अपने को बरत ले जाना है।

वहाँ एक कहानी थी ‘दिल की बात’। शुरू इसी अख़बार से होती है। इसी की सुर्खियों के साथ। बाढ़ आई। लोग मर रहे हैं। जगहें डूबती गईं। सरकार ने कई हज़ार करोड़ के राहत पैकेज़ की घोषणा की। कहानी का पात्र इसे उलटबाँसी की तरह पढ़ता है। लोगों ने सरकार के लिए करोड़ों रुपयों की राहत घोषित की। संकट यहीं से शुरू होता है। आप सत्ता के साथ नहीं हैं। उसके सच को नहीं मान रहे हैं तब आपका जीना मुश्किल है। आपको जीने नहीं दिया जाएगा। लगातार प्रताड़ित किए जाते रहेंगे। एक दिन ऐसा आएगा जब आपका अस्तित्व ही नहीं रहेगा। यहाँ से गायब कर दिये जाएँगे। कहीं कोई आवाज़ नहीं आएगी।

इसे उन सारी आवाज़ों के साथ जोड़कर भी पढ़ा जा सकता है जिनके नाम उन अख़बारों में कहीं नहीं चमकते। वे विरोध में हैं। उनके साथ नहीं हैं। इसलिए स्याही सूख जाती है। लोग नाम भी नहीं लेते। डर जाते हैं। यह छींकना नहीं, उसका निषेध है।

अरुण प्रकाश का कहानी संग्रह है ‘स्वप्न घर’। पहली बार उन्हे पढ़ रहा था। कभी ‘बया’ में इनका लिखा बचपन का संस्मरण दिखा था। शायद इन्हे पढ़ने के दौरान ख़ुद परेशान सा था इसलिए दुख जादा तोड़ रहा था। इनकी कहानियाँ दुख की कहानियाँ हैं। जब हम ऐसी पंक्तियाँ पढ़ रहे होते हैं तो अंदर तक टूट रहे होते हैं। सारे पात्र बड़े आम से हैं। पास के। लगा यह ताकत नहीं दे रहे, उसे अंदर से खींचे ले रही हैं। इस दुनिया को और कठोर निर्मम स्थल की तरह दिखाती चलती हैं। ‘अच्छी लड़की’ से लेकर ‘जल प्रांतर’ तक सब। यह उनका भोगा हुआ शोक है। यह उनका सामूहिक गान है। विरुदावली है। 

इधर अब जबकि नेता इतिहास को अपनी तरहों से कई परतों में मोड़ रहे हैं। उसमे से कई हिस्सों को जानबूझकर छुपा ले जा रहे हैं वहाँ अरुण प्रकाश की कहानी ‘भैया एक्सप्रेस’ याद आती है। भाई पंजाब में कहीं किसी बड़े किसान के यहाँ मुलाज़िम है। वहाँ से हर महीने मनीऑर्डर करता है। गाँव में उसकी माँ इन्ही पैसों से अपने सपनों को सींच रही है। बहू का गउना करा लाएगी तो उसका भी कुछ काम बंट जाएगा। घर थोड़ा और भरा भरा लगने लगेगा। दुख आसानी से कट जाएगा ज़िंदगी की तरह। पर अचानक भाई की चिट्ठी आना बंद हो जाती है। भाई कहीं गुम हो गया है। कहाँ गुम हुआ है पता नहीं। माँ कुछ रुपयों का जुगाड़ कर छोटे को वहाँ भेजती है जहाँ बड़कउ काम करने गया था। कहानी में धीरे धीरे खुलती है। एक-एक कर जब वह बताती है तब उस विद्रुप में माँ का चेहरा झिलमिला जाता है। भाभी जो अभी अपने मयके है उसकी हालत सोच रुलायी छूटने लगती है। कैसे इतने बड़े सच को पोटली बनाए वह पंजाब से लौटेगा। कैसे कहेगा उसका भाई अब कहीं नहीं है। मर गया। सारे सपने मर गए। वह सब मर गए। यह मरना दूर गाँवों के मरने जैसा है। दिखता नहीं। पर वह मरते ज़रूर हैं। 

कथानक कहीं भी नहीं कहता यह किस कालखंड की कहानी है। उसे कोई नकली ब्योरे की तरह अपने आपको नहीं कहना है। उसे नहीं कहना है के कर्फ़्यू क्यों लग रहा है। सड़कें क्यों वीरान हैं। क्यों दंगाई एक धर्म-विशेष के लोगों को चीन्ह उन्हे मौत के घाट उतार रहे हैं। पर इसी अपहचानी पहचान में रामदेव का भाई विशुनदेव भी मार दिया गया है। उसकी तरह कईयों को सिर्फ़ मारने के लिए मार दिया गया। दिल्ली की सड़कें भी पंजाब की सड़कों की तरह डरा रही हैं। यह सच को छिपाना नहीं है। उसे उघाड़ देना है। यह निर्मम होते जाना है। बताना है यही सच है जिसे तुम छिपा रहे हो। इस छिपे को ही बार-बार पढ़ना है। 

और उस नेता विशेष को तो यह कहानी ज़रूर पढ़नी चाहिए जिसने लगता है हमारे देश का इतिहास कभी नहीं पढ़ा ही नहीं है पर इधर की चुनावी रैलियों में बड़े भावुक ढंग से यह कहता पाया जा रहा है कि इन्होने मेरी दादी को मारा। मेरे पिता को मारा। एक दिन मुझे मार देंगे। सिर्फ़ इतना कह भर देने से हमारी कमज़ोर याद्दाश्त सब तरहों से उन सत्यों को भूल जाने के लिए कह देगी। इतना आसान तो नहीं लगता। हम उसे बराबर याद करते रहेंगे। याद दिलाते रहेंगे।

यह समय किसी भी तरह से न तो अति-राष्ट्रवादी हो जाने का है न ही भावुक होकर कुछ भूल जाने का।

आवाज़ें..

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