दिसंबर 28, 2013

केजरीवाल की दिल्ली 'एक' का छोटा-सा नरेटिव

अब जबकि दिल्ली को कुछ ही देर में ‘मुख्यमंत्री’ मिलने वाला है इन सब बातों का कोई अर्थ नहीं, ऐसा नहीं है। यहाँ नीचे जो कुछ भी आने वाला है, वह कम-से-कम एक ‘नरेटिव’ की तरह काम हो करेगा ही। एक उत्तर पाठ। 

बात हमारे एमए के दिनों की है। हमारी ‘फ़ैकल्टी’ हमारे ही डिपार्टमेंट के एक प्राध्यापक दिल्ली विधानसभा चुनावों में खड़े हो रहे थे। उनकी रणनीतियाँ क्या थीं? कभी उन्होने हमलोगों से साझा नहीं की। पर विचारधारात्मक रूप से उनका आग्रह वामपंथी रुझानों की तरफ़ स्पष्ट था। उनके आगे-पीछे आभामंडल बनाए छात्रों ने कैसा प्रचार किया पता नहीं। वह चुनाव हार गए। शायद ज़मानत भी ज़ब्त हो गयी थी। इन दिनों किन्ही सीमित प्रसार वाली पत्रिकाओं में लिखते-पढ़ते रहे हैं।

दूसरी तरफ़ इसी विश्वविद्यालय के हरीश खन्ना हैं। रजनी अब्बी को हराकर तीमारपुर से विधानसभा में जा रहे हैं। इनके बारे में यह भी नहीं जानता यह किस विषय से हैं। साथ में कमल की एक फोटो देखी है। पता नहीं क्या पढ़ाते होंगे उसे। शायद राजनीति विज्ञान से होंगे। वैचारिक रूप से कहाँ ‘स्थित’ हैं। पता नहीं। क्या हमारे उस हारे मास्टर ने बधाई दी होगी। यह भी पता नहीं। बहरहाल।

सच कहूँ तो चार दिसंबर के पहले वाली रात तक तय नहीं कर पाया था। कल किस बटन पर उँगली रखनी है। पता नहीं मेरे जैसे कितने होंगे जो उस रात या उससे पहले इस स्थिति से गुजरे होंगे। नेहा फ़ेसबुक पर लिखती है, वह भी नहीं सोच पा रही। हम ‘दिल्ली एक’ से थे। हमारे यहाँ शीला दीक्षित के विरुद्ध ख़ुद केजरीवाल खड़े थे। अब पिछली बार की तरह यह बहाना नहीं हो सकता था के विकल्प नहीं है। यह ख़ुद को विकल्प के रूप में स्थापित करना है। दो हज़ार आठ में भी यही स्थिति थी। तब भी वोट दोनों मुख्य प्रतिद्वंदियों को न देकर दिल्ली की पहली महिला ऑटो चालक सुनीता को दिया था। उसे जीतना नहीं था। फ़िर भी उसे ही दिया।

सोच रहा था हमारे यहाँ से अरविंद खड़े हैं। हम किसी ऐसे को तो अपनी जगह से भेज ही सकते हैं, जो उन सरकारी इमारतों में जाकर हमारे हिस्से के सवाल मजबूती से उठा सके। मतलब यह भी के अरविंद यह विश्वास करवाने में कामयाब रहे के उन्हे वोट दिया जा सकता है। वह इस लायक हैं। ‘डिज़र्व’ करते हैं। जबकि कभी इस पार्टी के बनने या उन्हे मैगसेसे पुरस्कार मिलने के बाद बात नहीं की। बस यह जानते थे कि वह ‘परिवर्तन’ का संचालन करते हैं। एक संस्था है ‘कबीर’, उससे जुड़े हैं और ‘सूचना के अधिकार’ के लिए लड़ रहे हैं। मुकेश की सूचना के अधिकार वाली बुकलेट भी कहीं पड़ी होगी। तो बस इसबार का वोट मज़बूत विपक्ष के लिए दिया। जो अब तक बाहर करते रहे थे, उसे अंदर करने के मौके जैसा। यह उस मुखर विरोध को संस्थानिक वैधता देने जैसा भी होगा। विरोध के उलट रचनात्मक कार्य जैसा। जब वह कुछ करने लायक होंगे। फ़िर कुछ जवाब ख़ुद को भी देने पड़ते हैं। यह पहला जवाब था।

फ़िर जिस दिन दिल्ली में मतदान था लगने लगा अरविंद जीत रहे हैं। हमारा ‘एस्टिमेट’ पाँच-सात हज़ार वोटों के मार्जिन का था। स्कूल में जब छोटे-छोटे बच्चे कहते फ़िर रहे थे, ‘इस बार झाड़ू चलेगी’ तब भी मन नहीं मानता था। तब अपने आप को समझा लेता कि इसबार विधानसभा त्रिशंकु होने जा रही है। उसमें ‘आप’ के हिस्से जादा से जादा पंद्रह-सोलह सीटें आ जाएंगी। पर सरकार नहीं बन पाएगी। पता नहीं उस दिन बड़ी क्लासों के लड़कों का काँग्रेस पार्टी वालों की पदयात्रा में मचाये शोर को अनसुना कर दिया। वहाँ चारदीवारी के पास खड़े बच्चे ज़ोर ज़ोर से चिल्ला रहे थे, ‘झाड़ू झाड़ू झाड़ू..!!’

इस बीच एक कमज़ोर-सा स्टिंग ऑपरेशन भी बरसाती मेंढक की तरह टर्राता फुदक रहा था। पर वे लोग नहीं समझ सके जिन्होने ठान ली है वह अब उन्हे छोड़ेंगे नहीं। शाज़िया तीन सौ छब्बीस वोटों से हारी हैं। आरके पुरम वाले मतदाता पर ही इसका असर पड़ा अभी शोध से इसे साबित करना बाकी है। जिन्होने वोट दिया तो क्यों और जिन्होने नहीं दिया तो क्यों नहीं?

दोनों बड़ी पार्टियाँ जिस हक़ीक़त को जानबूझकर स्वीकार नहीं कर रही थी, वही इनके चुनाव जीतने पर बधाई दे रही थीं। आज केजरीवाल अपने कौशांबी वाले घर से वैशाली मेट्रो स्टेशन आएंगे। वहाँ से मेट्रो पकड़ बाराखम्बा उतरेंगे। कभी कोई सोच भी नहीं सकता था। उनका मुख्यमंत्री उन्ही की तरह सफ़र करते हुए अपने शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होने जा रहा है। यह कोई छोटा-मोटा परिवर्तन नहीं है। बस उसकी शुरुवात है। यह दिल्ली जितनी उम्मीदों से तुम्हारी तरफ़ देख रही है उस पर ऐसे ही खरे उतरते रहना। भले अभी तक उन पचास पन्नों से नहीं गुज़रा जिसे तुमने मेनेफ़ेस्टो कह कर छपवाया है। दिल्ली को समझने के लिए वह एक और दस्तावेज़ है। योगेन्द्र यादव की मेहनत दिखती है। कहने को तो और भी बातें हैं। होती रहेंगी।

अभी बस अब इंतज़ार कर रह हूँ कब सत्ताधारी ‘आप’ पार्टी जंतरमंतर पर दिल्ली में बिजली देने वाली इजारेदार कंपनियों की बढ़ी हुई दरों को कम करने के लिए अनशन शुरू करेगी। पर यह भी कहता चलूँ के भले हम मंदिर मार्ग पर रहते हों पर आज रामलीला मैदान पर मुझे न ढूँढना। न जंतर मंतर पर कभी आने वाला हूँ। मुझे यहीं रहने तो। तब मन किया तो देखेंगे। अभी नहीं। और रवीश मान क्यों नहीं लेते कि हमारे हिस्से की कुछ उम्मीदें तो आप भी कर रहे हैं।

{अभी दुबई से ख़बर आ रही है फ़ारुख़ शेख़ नहीं रहे। बीती रात ह्रदयगति रुक जाने के कारण उनका निधन हो गया। दीप्ति नवल का जोड़ीदार चला गया। चश्मे बद्दूर की दिल्ली। अब कौन तालकटोरा गार्डन में दिखेगा। }

दिसंबर 27, 2013

बीना की कहानी: मैं ज़िंदा हूँ

साल के आखिरी दिन। कितनी ही तरहों से अपनी तरफ़ खींचते हैं। समेटने जैसे भाव से भरे हुए। पैर में मोजें हैं, फिर भी पैर ठंडे हैं। रात रज़ाई लगता है भीगी हुई है। पैर सिकोड़े वहीं नींद का इंतज़ार करते करते लुढ़क जाते हैं। कल सुबह ही निकालना है इसलिए मेज़ पर हूँ। के कुछ-कुछ लिखता चलूँ। वरना ये दिल्ली की ठंड तो किसी लायक नहीं छोड़ेगी। अभी सोलह दिसंबर मिहिर ने ‘फ़ेसबुक’ पर बताया के रात ग्यारह बजे परेश कामदार की फ़िल्म ‘खरगोश’ आने वाली है। प्रियंवद की कहानी पर आधारित। मन में बिठा लिया था इसे बिन देखे तो सोएँगे नहीं। पर शायद जादा थका हुआ था। मोबाइल पर ‘रिमाइन्डर’ भी लगा लिया था। फ़िर भी सो गया। बात दिमाग से उतर गयी लगता।

पर नहीं उतरी इन ठंडीयों की शुरुवाती रात जब ऐसे ही अचानक डीडी भारती पर दीप्ति नवल की एक फ़िल्म आ रही थी। ‘दीक्षा’ पर बात करते हुए यहीं तो ख़त्म किया था कि जल्द इसपर बात करेंगे। पर दिन बीतते गए बात रह गयी। फ़िर तब से यह बात भी दिमाग में घूमती रही कि पता नहीं क्यों शबाना आज़मी, स्मिता पाटील की तरह दीप्ति नवल को वैसी सशक्त अभिनेत्री नहीं माना जाता। अभी भी इसका कोई जवाब मेरे पास नहीं है। फ़िलहाल अभी कोई बहाना नहीं। बात सीधे ‘कथ्य’ पर।

फ़िल्म में आलोक नाथ ऐसे युवक की भूमिका में हैं जो अभी शादी करने को तय्यार नहीं है। उम्र के लिहाज से परिवार वाले जिस लड़की को चुनते हैं, वह कैसी है, यह भी कुछ ख़ास नहीं जानते। लड़की को जानने के कितने अवसर मिले यह प्रश्न ही नहीं उठता। लड़के के विरोध के बावजूद शादी करा दी जाती है। दोनों अब पति पत्नी हैं। लड़की की तरफ़ से भी ऐसी कोई असहमति हो दिखाई नहीं देती। दिखाई देना उसके चरित्र पर संदेह की तरह है। इसलिए भी इसके लिए कोई जगह नहीं है। पर उसे लग जाता है जिसके साथ उसका विवाह हुआ है, वह उसे पत्नी के रूप में स्वीकार नहीं कर रहा। वह कहता है कि वह उसे प्रेम नहीं कर सकता। पत्नी नहीं मान सकता। उसके कुछ सपने हैं। जो अभी पूरे नहीं हुए हैं। उन्ही के लिए उसे जीना है। 

स्थितियाँ तब और जटिल हो जाती हैं जब घर को चलाने वाला एकमात्र ‘जीविकोपार्जक’ लड़का एक रात बिन बताए घर से चला जाता है। यह किस श्रेणी का ‘पलायन’ है इसपर कुछ नहीं कहा जा सकता। किन्ही भूमिगत क्रांतिकारी गतिविधियों में उसकी संलिप्तता प्रकट नहीं होती। इसलिए इस तरह उसका जाना शादी के निर्णय की एक प्रतिक्रिया के रूप में ही स्पष्ट होता है। अब उन सदस्यों के सम्मुख घर गृहस्थी चलाने का आर्थिक संकट है। ‘अर्थ’ के बिना कुछ संभव नहीं। इस आपातकाल में बूढ़े सास-ससुर बीना को किसी तरह नौकरी करने के लिए राज़ी कर लेते हैं। इस तरह वह किसी दफ़्तर में मुलाज़िम हो जाती है।

नौकरी का मतलब सिर्फ़ महीने की तयशुदा तनख़्वाह ही नहीं है। यह एक स्त्री को कई सारी स्वतन्त्रताओं के पास लाने, उन्हे उपभोग करने का एक अवसर है। उसे बाहर निकलकर सारे निर्णय ख़ुद लेने हैं। जो निर्णय, जो क्रियाकलाप पुरुषों के संदर्भ में स्वाभाविक व नैसर्गिक प्रतीत होते हैं, वही स्त्री के संदर्भ में, कितना असहज करते हैं; इस फ़िल्म में कई-बार सतह पर दिखाई देता है। पुरुषों के अपने कार्यक्षेत्र में काम करने वाली महिला सहकर्मियों से मित्रता को कोई भी किसी भी तरह से आपत्तिजनक नहीं मानता। लेकिन समानांतर चलने वाली धारा लड़कियों के लिए किसी ऐसे प्रसंग में किसी भी तरह सम्मिलित होना शोभनीय नहीं। ऐसा दीप्ति के साथ भी हो सकता था। अगर उसका पति इस कथानक में उपस्थित होता। क्योंकि वह वहाँ इन क्षणों में माजूद नहीं है इसलिए पैसा कमाकर घर चलाने वाली बहू पर बूढ़े दंपत्ति कोई पाबंदी नहीं लगाते। न कभी कोई सवाल ही पूछते हैं। सवाल पूछना उन नियमित पैसों का निषेध है। उस स्त्री का चारित्रिक हनन है। वह तो अब इसे ही अपना कमाने वाला बेटा मान चुके थे।

ध्यान देने लायक शब्द है ‘बेटा’। बेटा मतलब नौकरी करके पैसा कमाने वाला। और पैसा मतलब निर्णय लेने की स्वतन्त्रता। अब चूँकि बीना इस भूमिका में हैं इसलिए कथानक उन्हे थोड़ी आज़ादी भी देता है। वह उसी दफ़्तर में काम करने वाले एक पुरुष की तरफ़ आकर्षित होती जाती हैं। उससे प्रेम करने लगती हैं। यह अपने अधूरेपन को भर लेने का निर्णय भी है। 

कहानी अब जटिल और असहज होना शुरू होती है। इसके दो क्लाइमैक्स हैं। उनमे से पहला यह कि उसके सास ससुर के कथनानुसार ही वह पंकज कपूर की तरफ़ जाती हैं। और वही शादी करने के लिए दबाव भी बनाते हैं। सिर्फ़ इतना ही नहीं वह यह भी कहते हैं के शादी के बाद दोनों उन्ही के घर में रहें। उनकी बहू के इस नए पति के रूप में उन्हे अपना लौट आया बेटा ही लगता है। और इसी तरह बहू के साथ उसके पति की आमदनी भी पुराने दिनों की तरह बे-नागा बनी रहेगी। उनके लिए अपनी बहू की शादी करवाने का निर्णय आर्थिक निर्णय है। वह किसी भी कीमत पर नहीं चाहते थे कि शादी के बाद उनके घर की इज्ज़त किसी दूसरे घर चली जाये। उसे उन्ही के घर पर बने रहना होगा। सब कितना क्रांतिकारी फ़ील दे रहा है न! हम उस यथा-स्थितिवादी ढाँचे कितनी तरहों से तोड़ रहे हैं। किस तरह से यह उत्तर आधुनिक हो जाने की हद तक अपने को मोड़ते रहे हैं। कि अचानक दूसरा क्लाइमैक्स घटित होता है।

जिस रात के बाद आने वाली सुबह दोनों की शादी होने वाली है, अचानक उसी रात बीना का ‘विधिसम्मत’ पति वापस लौट आता है। यह लौटना, उन्ही बने बनाए साँचों में वापस जाना है। बीना के लिए यह कैसी स्थिति है? इसे ‘त्रिशंकु’ कहना उस औरत की मनः स्थिति को कम करके आँकना है। जिन तरहों से वह अपने नए कल के सपनों को बुन रही थी, अचानक वहाँ, उसका बीता कल उपस्थित होकर, उन संभावनाओं को तत्काल स्थगित कर देने के आग्रह के साथ सामने आता है। जिस पति ने उसे अपनी पत्नी नहीं माना, उसके लिए उसे अपने निर्णय से पीछे हटने के लिए कहा जाने लगता है। सास-ससुर के उनके बेटे के वापस आ जाने के बाद का व्यवहार उन्ही खोहों में लौटा ले जाता है। जहाँ अब उनकी बहू उनके बेटे के लिए ही है। उसकी कोई इच्छा अब स्वीकार्य नहीं। वह अपने उस रात ख़ुद को कमरे में बंद इस सारे सवालों के जवाब माँगती है। बंद दरवाजे के पीछे से आते जवाब उसे इस चारदीवारी में कैद रखना चाहते हैं। पर ऐसा करके वह अपने पति को अपनी देह छूने के नैसर्गिक अधिकार को न देकर उसके अहं को चोट पहुँचाती है। यह मर्मांतक प्रहार पुरुष सहन नहीं कर पाता। पति तो बिलकुल नहीं। यह उसे रौंदने से मना कर देना है।

अब इस जगह पहुँचकर उसे क्या करना चाहिए, से जादा महत्वपूर्ण पुरुष की भूमिका है, जो उसके पति के रूप में यह जान लेना चाहता है, के उसके अपने पुरुष सहकर्मी के साथ किस सीमा तक सम्बन्ध थे? वह सीधे-सीधे यह जानना चाहता है कि दोनों के बीच दैहिक सम्बन्ध तो नहीं हैं। यह उस योनि की शास्त्रीय घेराबंदी का एक और अध्याय था। जहाँ उसके पति के आते ही घर से बाहर आने के सारे मौके ‘पदस्खलित स्त्री’ के लिए बंद कर दिये जाते हैं। उन बंद कमरों से आती चीख़ों में उसके पति के बलात शारीरिक सम्बन्ध बनाने की पीड़ा चित्कार कर रही थी। एक स्त्री अपनी इच्छा के विरुद्ध अपनी देह के लिए लड़ रही है। यह उसकी इच्छाओं का निषेध है। यह किस भी स्वतंत्र कल्पना की मनाही है। उसे अब सोचना भी बंद कर देना होगा। समाज उससे यही चाहता है।

{जो पिछली कड़ी तक नहीं पहुँच पाये, उनके लिए, दीक्षा : दैहिक शुचिता का स्त्री पाठ }

दिसंबर 26, 2013

बीती रात बकाया बातों की किश्त

रात। ऊपर आया। लेटने के साथ नींद को नहीं आना था। नहीं आई। पता नहीं बेतरह क्या-क्या सोचता रहा। सोचता रहा क्या-क्या बाकी रह गया। जिन्हे लिख लेना था। पर नहीं लिखा। पीछे एक और रात इसी इंतेज़ार में जागता रहा। फ़िर ख़्याल आया। लिख ही क्यों रहे हैं? लिखना इतना ज़रूरी काम कैसे है? इसके बिना क्या हो जाएगा? इस बात को कभी नहीं लिखा के हर सालगिरह पर इस बात पर पहुँचता के पाँच साल बाद लिखना बंद कर देंगे। सबसे जादा इसबार महसूस किया। तब भी लिखा नहीं। पाँच साल ही क्यों? पता नहीं। पर गिनती यहाँ आकर रोक देने का मन है। तीन साल हो चुके हैं। ऐसा नहीं है फ़िर मन किया तो इसे बदल नहीं सकेंगे। पर अभी इसी के पास हैं।

वहीं देखते हैं तो ‘ब्लॉगिंग’ के शुरुवाती दिन याद आते हैं। कैसे इन सालों में लगातार यहाँ रहने की ज़िद इधर रोके रही है। वरना लगता है कुछ ख़ास कहने को है नहीं। कुछ बेचैनी है। जो अभी बेचैन करे रहती है। कुछ उधेड़बुन लगातार चलती रहती है। दिमाग में। रवीश लिखते है ‘कहने का मन होता है’। जब तक मन है तब तक कहते रहेंगे। अभी ज़िद से काम चल रहा है। जैसा कहीं नहीं पढ़ते, वैसा लिखने का मन है। मौसम से बेख़बर रहने का मन नहीं है अभी। कुछ असहमतियाँ हैं, जिन्हे बहीखाते में दर्ज़ करते चल रहे हैं। जब असहमत नहीं रहेंगे, नहीं लिखेंगे। नहीं कहेंगे। एकसाथ कितनी ही बातें चल रही हैं। अस्पष्ट, व्याघातक, अंतर्विरोधी। अतार्किक वक्तव्य की तरह। पर क्या करें। यही सब तो हैं जिनसे बने हैं। इन्हे कैसे न मानें। कैसे न कहें।

जब कभी नहीं लिखता तो पोस्टों के साथ अपनी लगाई तस्वीरों को देखने का मन करता है। कितने ही फ़िल्टर लगाए हैं। अपने ऊपर। कितनी ही तहों में जाकर उन्हे ढूँढा हो जैसे। सच कहूँ, अगर तब अपन अनुराग के ‘सबद’ पर न पहुँचते, तो शायद अपने उन दिनों में उस तरह अमूर्त, अस्पष्ट, अनेकार्थी छवियों को लगाने के आग्रह से नहीं भर जाता। इसने उन बेतरह बेतरतीब फ़ोटो में से किसी एक को ढूँढने का धैर्य दिया। उस तरह भी ख़ुद को खोजता। ख़ुद को भरता। अपनी पंक्तियों की तरह एक-एक शब्द को कह लेने वाले रंगों में उन अर्थों को भर देने की कोशिश करने लगा। कोशिश होती कि जो नहीं कह सका वह छवियाँ कह दें। बिन बताए। बिन छुपाए। 

पता है मन किस तरफ़ ढकेल रहा है? एक नाम भर आजाने से सैकड़ों नाम मन नें तैर गए। प्रवीण पाण्डे ने एक पोस्ट लिखी है। कल पच्चीस दिसम्बर को ‘नौ दो ग्यारह’ को बने दस साल हो गए। मन वही दोहराने लगा है। मन कर रहा है उसी पर बात करने लगूँ। अभी नवम्बर में लिखी पोस्ट की तरफ़ जाकर ‘ब्लॉगिंग’ पर लिखने के लिए नीचे से ‘लैपटॉप’ नहीं उठा लाया। ख़ाका बन रहा है। कई सारी चीज़ें है। पर अभी नहीं। अभी मन नहीं है। थोड़ा रुक कर। सबको थोड़ा और तरतीब से लगाना बाकी है अभी। इसलिए। 

रात मन में कई बार पापा की बात घूमती रही। पापा पूछते हैं, अब जनसत्ता में क्यों नहीं आते? उन्हे कुछ नहीं कह पाता। कोई जवाब नहीं है। वहाँ क्यों आता था? यह भी समझ नहीं पाता। अभी आख़िरी बार जून में तो आया था। पर आज से तीन साल पहले इस अख़बार में छप जाना किसी भी तरह से कम बात नहीं थी। हमें जानता कौन था? पर हम भी वहाँ हो सकते हैं। यही उस जगह की ताक़त थी, जिसने हमें बनाए रखा। एक अर्थ में सबसे बड़ी बात थी, बिन लाग-लपेट उन पन्नों पर होना। यह उस मिथक को भी तोड़ने जैसा था कि अख़बारों में छपने के लिए ‘किन्ही’ ‘और तरहों’ के ‘कौशलों’ की ज़रूरत होती है।

इसी महीने की छह और बारह दिसम्बर ‘हिंदुस्तान’ में था। वहाँ के ‘साइबर संसार’ में। ऐसे ही अगर ‘मोहन राकेश की डायरी’ वाली पोस्ट पर बी.एस.पाबला न बताते, तो कभी पता ही नहीं चलता के राजस्थान जयपुर से कोई ‘लोकदशा’ नाम का कोई अख़बार भी निकलता है। कैसा अख़बार है। पता नहीं। पर अगस्त में दोबार वहाँ के पन्नों पर दो पोस्ट। न जाने कैसे ‘शाजहानाबाद’ वहाँ ‘जहानाबाद’ छापकर आया। ऐसे में अगर कोई जहानाबाद में ‘कमला मार्किट’ ढूँढता रहे और वह न मिले तब? फ़िर यह पता न चल पाना थोड़ा खलता है। इन चारों बार सीधे पता नहीं चला। इसलिए भी दायीं तरफ़ लिख भी दिया है कि लेटर बॉक्स में ख़त तो डाल ही सकते हैं के पता चलता रहे, कि कहाँ-कहाँ हम पहुँच रहे हैं। दिल्ली में रहते हैं तो क्या? ‘कॉपी-लेफ़्ट’ नहीं है।

{पिछली रात का पन्ना, जो कहने को होता हूँ..}

दिसंबर 25, 2013

जो कहने को होता हूँ..

ऐसा नहीं है के इन बिन लिखे दिनों में मन नहीं किया। साल ख़त्म होते-होते कई सारी बातें हैं जिन्हे कहने का मन है। मन है उन अधूरी पोस्टों पर काम करने का। पीछे किए वादों पर लौट जाने का। कतरनों को जोड़ पूरे दिन बनाने का। इत्मीनान से रुककर सबकुछ कह लेना चाहता हूँ। जो पास हैं जो दूर हैं उन सबके कानों तक पहुँचने का कोशिश करना चाहता हूँ। कहने को हूँ..पर..

पर इन रुके दिनों में फ़िर वहीं पहुँच गया। लगा अंदर-ही-अंदर लगता कुछ छूट रहा है। उसके पास हूँ। पर पकड़ में नहीं आ रहा। ख़ुद से कहीं दूर। इधर जब भी लिखना शुरू करता, लगता अक्षर भाग रहे हैं। साथ नहीं हैं। वह थिर नहीं हैं। उन्हे पकड़ता नहीं। बस देखता रहता। कैसी-कैसी आकृतियों में बदलते जा रहे हैं। कैसे बिम्ब उभरकर रह जाते हैं। कहने को होता, पर कह नहीं पाता। लगता लिख ही नहीं पाऊँगा।

यह समझ नहीं आता कि अक्सर ऐसा क्यों होता है जब डायरी पर नहीं लिख रहा होता बिलकुल उन्ही दिनों के आसपास यहाँ से भी गायब रहने लगता हूँ। इन दस ग्यारह दिनों में उन पन्नों पर देर तक नहीं रुका। यहाँ मन भी किया। दो चार ‘ड्राफ़्ट’ अभी भी ‘डेस्कटॉप’ पर पड़े हैं। पर अधूरे हैं। कब, किन क्षणों, मानोभावों में उन्हे ख़त्म किए बगैर रहने दिया, पता नहीं। बस लगता रहता जिन पलों में लिख सकता था, बिलकुल अभी गुज़र गया। मन उचट जाता। खाली-खाली सा। अनमना नहीं। फ़िर भी नहीं लौटता।

इसके पीछे लगता है भावातिरेकों को हू-ब-हू उतार लेने की ज़िद काम करती रही। उस वक़्त जैसा लग रहा है, उसे वैसे न कह पाने की वजह से नहीं लिखता। ‘लिपि’ के शब्द थोड़े कमज़ोर लगते। लगा आवाज़ अपनी गतिकी में अलग तरह से इन्हे कह सकती है। शब्द उन भावों से कुछ दूरी पर हैं। लगता आवाज़ थोड़ा पास होगी। वहाँ होते उतार चढ़ाव उन्हे पकड़ लेंगे। कुछ दिन उन रातों को हाथ में मोबाइल लिए उसके ‘वॉइस रिकॉर्डर’ पर अपनी आवाज़ सहेजता रहा। जो जैसा महसूस हो रहा है, उसे उसी तरह कहते रहने में लिखने में लगने वाले वक़्त से जादा गति है। शब्द वैसा चित्र नहीं खींच सकते, जैसे आवाज़ ध्वनि बिम्बों को रचती है। अँधेरे से होकर गुज़रने वाली आवाज़ का जादू खींच रहा था। तब लगता ऐसा ही तो लिखना था। 

ऐसा पहली बार नहीं कि अपनी ‘भाषिक योग्यता’ को लेकर इस तरह सोच रहा हूँ। इस माध्यम में आने से पहले भी कई-कई बार लगता अपने यहाँ शब्द, वाक्य, अक्षर, उनका रूप, उनका विन्यास, अपने आप को कह नहीं पा रहा। वह जैसे आना चाहते हैं, उन्हे कोई रोक रहा है। उन्हे जैसा कहना चाहता हूँ, जिस सघनता से कहने का मन होता है, जिस तरह से चीज़ें अंदर ही अंदर उमड़ती घुमड़ती रहती हैं; उन्हे वैसे ही कह पाने में असमर्थ हूँ। यह मेरी ही कमज़ोरी है कि उनमे यह महसूस कर रहा हूँ।

फ़िर यह भी लगता है इतने दिन रुककर लय में वापस आने में थोड़ा वक़्त लगता है। भले अभी पटरी पर नहीं हैं। एक दिन आ जाएँगे। थोड़े जादा पहर लेकर बैठूँगा सब ठीक हो जाएगा। यह ठहराव ठहरेगा नहीं। ऐसा भी नहीं है के इसे ‘जॉर्ज ऑरवेल’ की तरह ‘रायटरस् ब्लॉक’ कहकर उपन्यास लिखने का मन हो रहा हो। यह इस बीतते साल में कम पढ़ने का नतीजा है। ऐसा नहीं है के दूसरों का लिखा पढ़ने के बाद उनकी तरह लिखने बैठ जाऊँगा। या येकि उनके शब्दों को उठा उठाकर अपनी जेबें भर लूँगा। यह पढ़ना उन शब्दों शैलियों विन्यासों संरचनाओं से गुज़रने की तरह है। अंदाज़ लगाना है के कोई कैसे लिखता होगा। किन किन तरहों से अपनी बात कह सकता है। उन क्षणों में वह कैसा नहीं होते जाना है। कैसे भाषा बरतकर चलने के बाद वह अभीष्ट आकार में बदलती जाएगी। पढ़ना इस तरह से भी होता है। एक लिखने वाला दूसरे लिखने वाले से ऐसे भी मिलता है। उन सारे ब्योरों से उसके साथ उसकी उंगली पकड़कर चलता है। इससे पहचान मज़बूत होती है। और मज़बूत होती है भाषा।

ऐसा सोचते-सोचते उस बंद अलमारी से कई बिन पढ़ी किताबें अभी भी बाहर आजाने का इंतज़ार कर रही हैं। देखते हैं इन ठंडी दुपहरों शामों में रज़ाई में उनके साथ बैठने का मौका कब लगता है। और यह भी के इस आख़िरी हफ़्ते में कितनी बकाया बातें कह पाता हूँ..

{थोड़ी बहुत जो कह सका..}

दिसंबर 14, 2013

अच्छा तो तुम्हारे बारे में कह रहा हूँ

जैसे अभी लिखने वाला हूँ कि मुझे नहीं पता के ‘रक़ीब’ का मतलब क्या है। पहली बार सुना। इतनी पास से। सोच रहा था इसके बाद रुक क्यों गया। लाया तो था के बहुत कुछ है, जो कह दूंगा। पर ठहर क्यों गया? कभी-कभी कुछ देर पहले तक मन होता है। फ़िर अचानक वहाँ से हट कहीं और चल जाता है। जैसे अभी। मन बिलकुल भी नहीं है के यहाँ फ़ालतू में बैठे वक़्त बर्बाद करता रहूँ। कितने और भी काम हैं, जो किए जा सकते हैं। जैसे अभी अपनी ही पोस्ट पढ़ने की कोशिश कर रहा था। लगा किसी भी तरह के विराम-चिन्हों को न लगाने के कारण कितनी दिक्कत होती है। पढ़ना कितना मुश्किल हो जाता है। कहाँ कितना कहना है। कहाँ बोलते बोलते रुक जाना है। पता ही नहीं चलता। वह अगले साल के लिए ड्राफ़्ट की है। लगता है कुछ और मरम्मत की ज़रुरत है।

तुमने कह तो दिया। पर इसके पीछे क्या सोच रहे होगे। नहीं पूछा। पूछने का मन नहीं था। एक तो बार-बार उन्ही नामों के हवाले अब कहीं से भी अंदर तक महसूस नहीं होते। उतनी तरहों से उन सबसे गुज़रने का एहसास अब छू भी नहीं पाता। यह कोई ‘स्थितिप्रज्ञ’ होते जाने की तरह नहीं है। पर सच, यह अब कहीं नहीं है। यह वहाँ ठहरने से इंकार कर देना है। इंकार इस अर्थ में कि वहाँ रुके रहने के लिए अब सोचने का वक़्त नहीं है। जब था, तब भी नहीं रुक सके। वह वहाँ से भाग लेने की तरह सामने आया।

यह जितना अमूर्त लग रहा है, उतना ‘एबसर्ड’ है नहीं। क्योंकि उसे तब जीते रहने को अभिशप्त हमारे पास सिर्फ़ अकेले हम थे। इन विस्तारों में जाने को अब दिल नहीं करता। और जब कोई कुरेदने की हद तक वहाँ घुसने लगता है तब टीस नहीं उठती। लगता है वह इतनी पास नहीं रहा। वह समझ नहीं रहा। बस कहे जा रहा है। बिन यह जाने कि उसके बोले जाने से कई साल पहले, वह व्यक्ति, उन जगहों से अपने ठीहे उठा चुका था। वह वहाँ अब नहीं पाया जाता। अगर वह उसे आज भी वहीं दिख पड़ता है, तब यह, उनके बीच, किसी टूटे तार की तरह है। उसकी मरम्मत करना बाकी है। आपस की समझदारी में वह पीछे छूटता गया है।

यहाँ किसी के नाम देने की ज़रूरत नहीं है। जिससे बात कर रहा हूँ, उसे पता है। इस अर्ध-विराम की तरह वह भी जानता है कि वह रुक तो गया, पर उस अंतराल के बाद, वहाँ से चला नहीं। चलने की तय्यारी में वह कभी नहीं चलना चाहता। रुके रहना चाहता है। वह तब तक रुके रहना चाहता है जबतक कि वह चाहे। वह अपने पूर्वाग्रहों में इतना जटिल होता गया है के किसी तरफ़ वह नहीं खिसकता। खिसकना विचलन है। उनके संवाद की सम्भावना में लगते पैबंद की तरह। उसे पैबंद पसंद नहीं। 

क्या लिखे जा रहा हूँ, नहीं समझना चाहता। बस लिखे दे रहा हूँ। कि इन हिज्जों को कभी मौका लगे देख लेंगे। अभी बस कह लेते हैं। कह लेना ज़रूरी है। ऐसे दिमाग को खाली कर पलटुंगा, तो सब करिने से लगा होगा। कहीं कोई अव्यवस्था नहीं होगी। वह जान चुका होगा के वह कहाँ छूटा रह गया। उसे अभी कितनी दूर और चलकर आना है। यह उसकी ज़िद है। नहीं चलने की। नहीं जानने की। जबकि कहता रहा हूँ तुम्हें वहाँ से हटना होगा। फ़िर भी वह वहाँ से हिलने को तय्यार नहीं है। उसे लगता है मुझे समझने के सारे औज़ार उसके पास पहले से हैं। यही उसका ‘राईटरस् ब्लॉक’ है। मुझे ‘प्लॉट’ तो समझा, पर कभी अपने मुताबिक़ ‘स्क्रिप्ट’ नहीं लिख सका। उसने कभी कोशिश ही नहीं की। सिर्फ़ नेताओं की तरह दावे किए। उन्हे कभी पूरा नहीं किया।

यही तो है जो हमें रोके रहता है। मैं उसे इसी तरह लेता हूँ। के इस तरह से वह कभी आगे नहीं बढ़ना चाहता। न मैं कहीं से टरने वाला हूँ। उसे लेकर जो आग्रह हैं, वह भले पूर्वाग्रह बन गए हों। पर उनसे अब पलट नहीं सकता। वहाँ से कहीं जा नहीं सकता। तभी तो लगता है वह मूलतः ‘पुरुष’ ही है। किसी विचार ने उसपर कोई काम नहीं किया है। वह अपने निर्णय ले चुका है। उन्हे भी कभी नहीं कहता। पर पता है, उसको लेकर वह क्या सोचता होगा। उसका ऐसे सोचना ही उसे ऐसा बनाता है। आवारा सोच का। ख़ालिस। बारह आने का। किसी को लगे कि यह सब उसके लिए कह गया हूँ तो मुझे भी बता देना। मुझे भी पता चल जाएगा वह कौन है जिससे इन बीतते सालों में इतनी सारी बातें ‘रिलेट’ होती गयी हैं। बताना ज़रूर। क्योंकि लिखते वक़्त वह कौन है नहीं जानता..

दिसंबर 13, 2013

सबसे ज़रूरी है इस रंग के मिथक का टूटना

कई दिनों से राकेश की बात घूम रही है। के हम लड़कों में गोरे रंग के प्रति इतनी तरह से पूर्वाग्रह पैठ बना चुके होते हैं कि हम लड़कियों में वही ढूँढते रहते हैं। बात किनसे करनी है, कैसी करनी है, कितनी करनी है। सब सवाल इसी रंग से निर्धारित होते जाते हैं। हम उसी लड़की को अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार करना चाहते है जो ‘गोरी’ हो। अगर यह लड़कों के मामले में चयन की सुविधा का प्रश्न है तब साँवली लड़कियों के चुने जाने की उतनी ही कम सम्भावना रहती है। प्रेम का प्रस्थान बिन्दु त्वचा का विशेष रंग ही होता है। कि अगर कल शादी की नौबत आ भी जाये तब वह अपने घर में कह सकें। गोरी लड़की है। चेहरा मोहरा भी ‘टिंच माल’ की तरह है। पूरे मोहल्ले में ऐसी शहराती लड़की मिल जाये तो नाम बदल लेंगे। अब हम शादी करेंगे, तो इसी से।

यह अपने आप में शोध का विषय है के टीवी में विज्ञापित गोरे होने वाली ‘क्रीम’ लगाने वाली कितनी लड़कियों के प्रेम प्रसंग चल रहे हैं। कितनों के साँवले होने के कारण नहीं चल पाये। इसे शिष्ट भाषा में पूछे तब यह कि लड़के उनकी तरफ़ कब आकर्षित हुए? उस क्रीम को लगाए जाने के पहले या उक्त क्रीम के प्रयोग के बाद? इसी समानुपात में यही प्रशनावली साँवले लड़कों से भी पूछे जाने लायक है। कि वह खुद को कब जादा लड़कियों से घिरा पाने लगे। कब लड़कियाँ आस-पास भिनभिनाने लगीं।

यह ‘रंगभेद’ उन लड़कों को किन तरह के भावों से भर देता होगा जिन्होने साँवली लड़की चुनी। या वह इतना पढ़-लिखने के बाद इस सर्वमान्य सिद्धांत से खिसक उन लड़कियों की तरफ़ आकर्षित हुए। चलो कैसे भी हो गए। पर अब क्या? मौका था किसी गोरी चिट्टी के प्यार में पड़ते। वह भी हाथ से गया। मिली भी तो यह। अब वह कैसे अपने घरों में किस मुँह से शादी की बात चलाएँगे। उस लड़की की तस्वीर कैसे डाक से, फ़ैक्स से, ईमेल से भेज पाएंगे। ‘फोटोशॉप’ का उपयोग किया तब क्या गारंटी है कि उनकी प्रेमिका में ‘ऐश्वर्या राय’ की तरह अपनी त्वचा के रंग के प्रति वही विचार प्रवाहित नहीं होगा। परिवार वाले तुरंत कह देंगे ‘यही करिया रंग वाली मिली रही। जब आपन मन की किए थे, तब कउनो दूसर नाय देख सकत रहे..?’ बुआ तुरंत अम्मा की बात दोहरा भाभी की तरफ़ हो जाएंगी कि ‘सब लड़कियां मर गयी रहीं का। कउनो गोरहर लड़की नाय धुढ़ सकत रहे..?’

हो सकता है आने वाले समय में कोई इस क्षेत्र में नयी-नयी कूदी क्रीम उत्पादक कंपनी अपने सर्वेक्षण में उन बलात्कार पीड़ित स्त्रियों के रंग के आधार पर इस निष्कर्ष पर पहुँच जाये कि उनकी क्रीम फ़ेयरनेस क्रीम नहीं ‘डार्कनेस क्रीम’ है। जिसे लगाकर आप किसी भी तरह के यौन शोषण से बच सकती हैं। जिसके साथ उसका यह दावा भी काम कर रहा होगा कि उनका यह सर्वे इसलिए भी प्रामाणिक है क्योंकि ‘अमुक टुडे’ के साथ हुए सेक्स सर्वे के आँकड़ों का प्रयोग कर वह इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि पुरुषों ने विकल्प देने के बाद गोरी महिलाओं के साथ यौन संबंध बनाने को प्राथमिकता देने की बात स्वीकारी है। इसके साथ उनका तीसरा पायलट प्रोजेक्ट ‘सेक्सकर्मियों’ के बीच सफ़ल रहा है। जिनमे इनकी क्रीम लगाने के बाद उन प्रयोगकर्ताओं की आमदनी में गिरावट दर्ज़ की गयी है। पुरुष साँवली महिलाओं की तरफ़ आकर्षित ही नहीं हुए। इसलिए भी इसे खरीदा जा सकता है।

भले आज हम इसे स्त्री विरोधी वक्तव्य कहकर ख़ारिज करने पर तुल जाएँ, पर यह उतना ही सच है जितना कि उन विज्ञापनों का झूठ। यह इन प्रेम सम्बन्धों से लेकर विवाह से पहले लड़कियों की परेड से लेकर न-मालुम कहाँ तक अपनी पैठ बना चुका है। ख़ून में साँसों की तरह घुल चुका है। हमें अपनी लड़ाई लड़नी है। सबसे पहले सबसे ज़रूरी है इस रंग के मिथक का टूटना।

दिसंबर 09, 2013

ढूँढे जाने लायक बनने की लड़ाई

सड़क। उसका किनारा। किसी सागर से कम उथला नहीं। बस दिखाई नहीं देता। बस कभी-कभी महसूस होता है। जैसे इन शामों को। जब ठंड थोड़ी बढ़ रही होती है। सूरज कहीं दिख नहीं रहा होता। अँधेरा उन रौशनियों के गायब हो जाने के इंतज़ार में कहीं किसी कोने में घात लगाये बैठा रहता है। दिल्ली का मौसम अभी इतना ठंडा नहीं हुआ है। यह मौसम की वर्गीय व्याख्या है। मेरे हिस्से का सच। पर चलते चलते जब कुछ दिख जाता है तब वहीं रुक उसे महसूस करने को जी चाहता है। पता नहीं इन दिनों की शामों में ऐसा क्या है जो अकेले रहने की तरफ़ ढेकेले देता है। जिसके पास होने को मन करता है वह अभी नहीं है, शायद इसलिए। पर उन बीतते क्षणों में आती जाती साँसें लगातार एकांत को रचती रहती हैं। बिलकुल अकेली। उसमे कुछ कहने का मन नहीं होता। बस चुपचाप धीरे-धीरे बढ़ते रहो। जैसे चल कर कहीं नहीं जाना। कहीं नहीं पहुँचना। बस कहीं ख़ुद को लेकर गुम हो जाना।

जो गुम हैं। कभी-कभी दिख जाते हैं। इनकी गुमशुदगी कहीं नहीं दर्ज़ है। इन्हे कोई नहीं ढूँढ रहा। कोई नहीं चाहता कि इन्हे पहचान लिया जाये। इनका चीन्हे जाना ख़तरनाक है। फ़िर भी वह ऐसे ही मिलते रहे हैं। रोज़। बेनागा। कहीं न कहीं। आसपास। हमारी आपस में कोई पहचान नहीं है। फ़िर भी जान जाता हूँ। वही हैं। वह इस बार छोटे-छोटे बच्चों हैं। लाल रंग की पोशाक में। किसी टेंट हाउस के उस रात के दिहाड़ी। वह शनिवार रात उस रेड लाइट पर, किसी अनाम शादी में लट्टुओं के गमले उठाए, अभी कुछ देर बाद, बारात के साथ अपने भारी हो गए पैरों के साथ घसिट रहे होंगे। कोई नहीं पूछेगा इन्होने आखिरी बार कब ख़ाना खाया। इन्हे ठण्ड तो नहीं लग रही। वह दूल्हा जो घोड़ी पर बैठा नज़रे नीची नहीं कर रहा। जिसकी गर्दन में अपनी होने वाली पत्नी की तरह कमर में कोई बल नहीं पड़ रहा। वह अधीर-सा घोड़ी को भगाने के मंसूबे बना रहा है। पर वह ऐसा कर नहीं पाएगा। बिलकुल ऐसी ही स्थिति तब आएगी जब रात ढले यह सब पैसा मांगने जाएंगे और उसका हाथ बटुए पर नहीं जा सकेगा। हाथ कहीं रुक जाएगा। 

कहीं न कहीं तो यह सब भी रहते ही होंगे। इनका भी कहीं घर होगा। जो अभी उन बिजली वाले गमलों के सभी बल्बों के जल जाने की ‘टेस्टिंग’ कर रहे हैं। इन्हे ठण्ड लग रही है। और अभी उस बंद पड़ी ‘एनडीएमसी’ की दुकान के आगे कहीं से ढूँढ लाये बड़े से रबड़ के टुकड़े को जला चुके हैं। उसका धुआँ इनके सपनों की तरह जादा ऊपर तक नहीं जा पा रहा। ऊपर से गिरती सीत में वह पहली मंज़िल तक पहुँच थक गया है। उसकी कालिख उन सपनों के कभी न पूरे होने की कहानी कह रही है। कहानी कभी ख़त्म नहीं होगी। कभी शुरू नहीं होगी। वह ऐसे ही रुकी रहेगी। उन गाड़ी वालों की गालियाँ सुनती रहेंगी जो इन्हे पछाड़ आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं। इनकी तरह रुक गए हैं। रुकना किसी को भी पसंद नहीं। पता नहीं यह सब कैसे रुकी हुई ज़िंदगी से चिपके उसे जीते रहे हैं?

कितना मुश्किल होता होगा ऐसी जगह साँस लेना। जिसे घर भी नहीं कह सकते। पर वहीं रहने को अभिशप्त हैं। इनसे मुलाक़ात आज अचानक हुई पर रोज़ उस 'सबवे' से गुज़रते हुए उस स्त्री का पति कहीं नहीं दिखता। न उसके माथे पर ही कोई ऐसा चिन्ह है जिससे उसके होने के भौतिक प्रमाण मिल सकें। शायद वह उसके दिल में ज़िंदा है। उसने तीन पहियों वाली हाथ गाड़ी अभी भी छोड़ी नहीं है। रखे हुई है। पिछली ठंड तक इसे चलाने वाला भी था। आज उसकी दो लड़कियाँ औए एक लड़का उसे घेरे रहते हैं। घेरे रहते हैं उस तीन ईंट वाले चूल्हे को भी। जिससे उठता धुआँ इनके पेट की आग को शांत करेगा। खाने में वह क्या बनती होगी इससे ज़रूरी है रोज़ सुबह उठकर अपने ज़िंदा होने का सबूत देना। एक-एक सेफ़्टी पिन उन चादरों की दीवार को बाँधे हुए है। कहीं से उघड न जाये। उघड़ना उसकी गरीबी हमारी सत्ता की एक व्याख्या भर नहीं उसकी सबसे बड़ी आलोचना है। यह प्रतीक नहीं उसका जीवित बिम्ब है। जिसे कोई समझना नहीं चाहता। कोई नहीं देखना चाहता। बड़ी होती लड़कियाँ कहाँ जाएंगी। लड़का क्या करने लग जाएगा कोई नहीं कह सकता। ख़ुद उस माँ को इन्हे बड़ा करने की क्या कीमत देनी होगी वह अभी भी क्या दे रही है पता नहीं।

कम से कम वह माँ यह तो नहीं चाहती होगी कि उसका बेटा बूढ़ा होकर किसी बड़े शहर में कहीं रेहड़ी लगाकर बेनामी सी ज़िन्दगी जी रहा हो। जिसके जीने-मरने से किसी को कोई फ़र्क नहीं पड़ता। अगर यह सब ज़िंदा रहे तब यह बूढ़े होने की त्रासदी का निषेध नहीं कर पाएंगे। लड़के की माँ रोज़ उस बूढ़े को देखती है। वहीं उसके चादरों वाले घर के पास। जो रोज़ वहीं खड़ा रहता है। कहाँ से आता है कहाँ जाता है पता नहीं। एक दिन वह कहीं चला जाएगा। गायब हो जाएगा। उसे कोई ढूँढेगा भी नहीं। ढूँढने के औज़ार इन्हे कहीं नहीं देख पाएंगे। यह इस दुनिया में ढूँढे जाने लायक बनने की लड़ाई है। जो यह सब हार चुके हैं।

दिसंबर 07, 2013

मोहन राकेश की डायरी पढ़ते हुए

कुछ ऐसी जगहें होती हैं जहाँ हम ख़ुद होते हैं। अपने आप में बिलकुल नंगे। बिलकुल अकेले। बेपरदा। बेपरवाह। लिखने के पहले, लिखने के बाद, हम कुछ-कुछ बदल रहे होते हैं। शायद ख़ुद को। अपनी लिखी उन बातों को। जो चाहकर भी किसी से नहीं कह पाये। कहते-कहते रुक से गए। रुक गए उन्हे सबकी नज़रों में लाने से पहले। या उसे अपने लिए ही बगलों में छिपाते रहे। कि कोई देख न ले। पहचान न ले। यह जान पहचान ख़तरनाक है। इसलिए उनसे हम उन निपट खाली अकेले क्षणों में उनसे गुजरते रहते हैं। अपने सबसे करीब से देखते पूछते हैं। उन्हे ऐसे ही जीने की ज़िद के साथ। यह हलफनामे हैं। आप-कबूलियाँ हैं। यह हमारी सांसें हैं। हमारी ज़िन्दगी का अहम हिस्सा है।

डायरी के पन्ने ही हैं जो हमें झेलते हैं। हमारी हर बात अपने तक छिपाये रखते हैं। किसी से कहने नहीं जाते। चुपचाप सब सहन करते जाते हैं। इन अबोली मुलाकातों में कभी ख़ुद कुछ नहीं कहते। सिर्फ़ सुनते जाते हैं। उन कही बातों को जज़्ब करते रहते हैं। यह कहने की ज़िद है, पर सिर्फ़ ख़ुद से। इसके अलावे यह बयान कहीं और नहीं हो सकती। दिल के बाहर इनकी यही जगह है। यहाँ हमें कोई देख नहीं रहा। हमारे सिवा। यही ख़ुद से ख़ुद की ईमानदारी है। साहस है।

कई सालों बाद, पिछले हफ़्ते ‘मोहन राकेश की डायरी’ हाथ लगी। न जाने कब से इसे पढ़ने की ख़्वाहिश दिल में थी। सोचता था कहीं एकबार फ़िर दिख जाये। फ़िर जाने नहीं दूंगा। एक लेखक अपनी ज़िन्दगी लिख रहा है। जो सिर्फ़ उसने जी। बिन कहे। बिन बताए। किसी से कह सकने की हद तक। अपने अकेलेपन को भर लेने की तरह। कभी तो कोई समझ पाएगा उसे। वह था। पर कितना अकेला था। कोई पास नहीं था उसके, जिससे वह कह सके। कहना सिर्फ़ साथ होना नहीं है। एक साझेदारी है। उन्हे कोई साझेदार नहीं मिला। वह सिर्फ़ लिखते रहे। बार-बार उन्हे लगता, नहीं लिख रहा हूँ। पर एकबार वह फ़िर लौटते। यह डायरी उन्नीस सालों के दरमियान कई बार टूटती है। फ़िर जुड़ती है। न लिख पाने की टीस बार-बार मवाद की तरह यहाँ हर पन्ने पर मौजूद है। दर्द है। पीड़ा है। अकेली बीतते दिनों शामों रातों की खामोश आवाज़ें हैं। दीवारों से लौट वह बराबर वापस आती रहीं। उन्हे सुनने वाला कोई नहीं है।

आहिस्ते से पन्ने खोल कभी शाम ढले पन्ने पढ़ने लग जाता हूँ। कहीं से भी शुरू कर देने की आदत। यह बेतरतीब होना नहीं है। फ़िर भी ऐसे ही कहीं रुक जाता हूँ। ठहर सोचने लगता हूँ। वह खालीपन कितना तोड़ रहा था। कोई भी इतनी पास नहीं था। जिसे कह सकें। किसी के इंतज़ार में वह कितनी कितनी देर तक वहीं ठहरे रह सकते थे। बिन हिले। बिन कहे। कैसा होते जाना है अकेले रहना। ख़ुद अपनी तरफ़ लौटता हूँ तो लगता है यह सब लिखा ‘डायरी’ में नहीं समाता। रोजनमचा की तरह लिखना आसान नहीं। बराबर लिखते जाना। मन हो न हो। उन पन्नों पर बस दिमागी बयान हैं। उन क्षणों की झुंझलाहटें हैं जो लगातार सोखती रही हैं।

इसे ऐसे भी तो कह सकते हैं कि उस हद तक नियमित नहीं बन पाता। रोज़ कहीं आने की आदत नहीं बन पाती। जितना कि वे सब जो डायरी की छपी तारीखों में ख़ुद को लिखते रहे हैं। शायद कभी उन तारीखों वाले खाँचे में नहीं बैठा पाया इसलिए उन साल वाले पन्नों पर नहीं लिखता। ख़ुद अपनी तफ़तीश करना कष्टकर है। उन दिनों के हवालों को बयानों में तब्दील करना इतना आसान नहीं। बहुत मुश्किल होता है उन खाली छूट गए पन्नों का बोझ। दिल नहीं उठा सकता। कभी मन नहीं होता तो कई-कई दिन नहीं आता। आना पीछे छूटते रहना है। कहीं पीछे छूटना नहीं चाहता। इसलिए भी उन्हे खरीद कभी तारीख़ दर तारीख़ लिखने की पैमाइश नहीं की। यह नोटबुक ही चलती रहे। इसमे ही बराबर लिखता रहूँ, यही सोच अपने को मना लेता हूँ। कि कुछ तो लिखना चल ही रहा है।

अभी तक कुछ जादा नहीं पढ़ पाया। यह पढ़ना नहीं उन भावों उन क्षणों से गुज़रना है। महसूस करना है उन शब्दों के पीछे का एहसास। उन घड़ियों का भारीपन। के कैसे होते गए होंगे हाथ। दिल कितना रोया होगा। कितना हल्का हुआ होगा मन। ऐसा ही क्यों लिखा उन्होने। कोई और ज़िंदगी नहीं हो सकती थी उनके हिस्से? एक रात पढ़ते-पढ़ते जहाँ पहुँचा वहाँ एक जून उन्नीस सौ सत्तावन की एक एंट्री है। वह अभी दिल्ली नहीं आए हैं। जालंधर ही हैं। कॉलेज की उबाऊ ज़िन्दगी से भाग लेने का मन है। माँ साथ ही रह रही हैं। पैरों में दर्द बना रहता है। कभी उनसे ही झगड़ लेते हैं। नौकरी छोड़ने का मन बना रहे हैं। बीयर पीकर सुबहें सरदर्द के साथ शुरू होती हैं। इन्हे फ़िर न छूने की कसमें शाम होते-होते कई बार टूटती रही हैं। ख़ूब घूमते हैं। पैदल रिक्शे पर। ऐसे ही एक शाम बक्शी से बात हो रही थी। उसने कोई किस्सा सुनाया है। जिसमे वह अपने लिए किसी ‘द वूमेन’ कह सकने वाली किसी दिल्ली की लड़की की बात कर रहा है। किस्सा मुख्तसिर यह हुआ के उसने पुरखों की परम्परा के अनुरूप आर्थिक सुरक्षा के अभाव में किसी और लड़के से शादी कर ली। पाल अक्सर इसी ‘द वुमन’ के मसले पर भाषण दिया करता था। मोहन राकेश लिखते हैं:

मैं उससे कह रहा था कि ऐसे वातावरण में मुझे किसी के अभाव का बहुत अनुभव होता है। पुरुष-पुरुष में बहुत घनिष्ठता हो जाती है लेकिन वास्तविक घनिष्ठता एक पुरुष और एक स्त्री में ही संभव है क्योंकि इमोशन की सही परिणति शारीरिक उपलब्धि में ही जाकर होती है। The climax of true intimacy is the complete merger of two bodies. Intimacy is incomplete without that merger and the merger is incomplete without that intimacy. इसलिए पुरुष को स्त्री का सहचर्य मात्र ही नहीं चाहिए- हर पुरुष को एक विशेष स्त्री का सहचर्य ही वास्तविक सुख दे सकता है। It is a question not of a woman but the woman.

यह ‘आधे अधूरे’ लिखने वाले मोहन राकेश की डायरी है। यह उनकी साँसों की कहानी है, जो यहाँ दर्ज है। अनीता राकेश बारह साल रुकी रहीं के सही वक़्त आ जाने पर इसे छपवाएंगी। दोस्त तुम्हें यह डायरी ज़रूर पढ़नी चाहिए। चाहकर भी तुम्हारा नाम नहीं दे रहा। एकबार लिख कर मिटा चुका हूँ। शायद इसके बाद ख़ुद को दोबारा जानने की शुरुवात फ़िर हो सके। तुम्हें ऐसे नहीं होना। यह उन दिनों में ताक़त देती है जहाँ हम सबसे जादा अकेले होते हैं। पता है तुम ख़ुद से बाहर आओगे एक दिन। उस दिन तुम अकेले नहीं रहोगे। और जहाँ तक पेज नंबर उनसठ पर लिखी इस बात है, आगे फ़िर कभी। अभी तो काफ़ी कुछ पढ़ने को बचा है। फ़िर अभी लिखना भी नहीं चाहता कि अपने ऊपर इस विचार का कैसा प्रभाव पड़ा। पड़ा भी या नहीं। यहाँ इसकी अपनी व्याख्या करना अभी बाकी है। और समानुपातिक रूप में वहाँ पहुँचना भी जहाँ स्त्री पुरुष के लिए ऐसा कहे तब इसके क्या मानी हो सकते हैं। अभी जा रहा हूँ। बस इतना कहते हुए के इतनी ईमानदारी से लिखने की कोशिश ख़ुद भी लगातार होती रहे। बस।



{आज देवेश ने फ़ोन कर बताया के कल हिंदुस्तान में यह पन्ना आया है। क्लिक करके वहाँ पहुँच सकते हैं। पेज नम्बर दस। साइबर संसार।  शीर्षक  ‘डायरी के पन्ने’। तारीख बारह दिसम्बर। }

दिसंबर 02, 2013

लड़की होना पर लड़की जैसी दिखाई मत देना

इस जगह जहाँ हम हैं वह कैसी है। इसे ऐसे पूछना चाहिए के यह हमारे लिए कैसी है? जगह या तो हमें ‘स्पेस’ देती है या नहीं देती। यह देना न देना गुणात्मक रूप से कैसा है? किन भूमिकाओं को वह बल दे रहा है। जब यह संचार माध्यम में हो, तब इसका जवाब इतना एकरेखीय नहीं हो सकता। इसके आयाम और गतिकी लगातार हमें गढ़ रहे होते हैं। इस वर्तमान तंत्र में यह ‘माध्यम’ मूलतः यथा स्थितिवादी ही बने रहते हैं। जैसे अगर यह देखा-जाँचा जाये कि हमारे ‘पुरुष’ होने में इनकी क्या भूमिका है? ‘लड़का’ होना कितनी सुविधाओं से भर जाना है। यह इसी अनुपात में समाज में आरामदायक स्थिति में पाये जाना है। कितनी ही सहुलियते बिन माँगे मिलती रहती हैं। यह बड़ी बारीकी से अपना पुनरुत्पादन करता रहता है। हमारे बीच जगह बनाए रहता है। इस सामाजिक ढाँचे ने ख़ुद को बचाए रखने की यही युक्ति अपनाई है।

इसी टेलीविज़न पर इधर एक विज्ञापन तैर रहा है। उसमें रणबीर कपूर हैं और शायद ‘रॉकस्टार’ फ़ेम वही हीरोइन। नर्गिस फाखरी। लड़की खड़ी है। इंतज़ार कर रही है। लड़का देर से आता है। वह अकेली क्यों नहीं चली गयी यह अलग पूछे जाने लायक सवाल है। पर अभी नहीं। नीचे। वह पीछे बैठे-बैठे सवाल करती जा रही है। ‘लुक आय एम नॉट कमफ़र्टेबल’। लड़का कहता है, इतना आरामदायक तो है। लड़की बात दोनों के भविष्य की कर रही है पर रणबीर की हर बात उस ‘हीरो मायस्टरो’ से आगे जा ही नहीं रही। पीछे बैठी लड़की फ़िर पूछती है, ऐसा कब तक चलेगा? लड़का फ़िर कहता है, दूर तक। वह फ़ंकी टाइप कपड़ों में है। उसकी शर्ट ऐसी है जैसे किसी ज़माने में बर्फ़ी के डिब्बे पर चढ़ा कागज़ का कवर। नीचे उतर वह घुटने तक ऊपर चढ़ी जीन्स नीचे उतार रहा है। और वह कहती है, कभी तो ‘सीरिअस’ हो जाओ। लड़का चश्मा उतार एक क़दम पास आकार आँखों में आँखें डाल अचानक कहता है, ‘मैरी मी..’!! यू आर नॉट सीरिअस। लड़की कहती है और लड़का लड़की का हाथ पकड़ता है। फ़िर दोनों अंदर की तरफ़ चल पड़ते हैं।

देखने-सुनने में यह दृश्य संवाद बड़े सरल सहज लगें पर गहराई में यह उतने ही पुरुष-सत्तात्मक चरित्र लिए हुए है। जहाँ रणबीर कपूर वापस पीछे आते हैं और उनकी ही आवाज़ का वॉइस ओवर कहता है, ‘बॉय्ज़ की लाइफ और मायस्टरो की राइड ईज़ी है’। ‘सच आ बॉय थिंग’। अब यहाँ विखंडित न भी करें तो यह दिख ही रहा है के कैसे उस विज्ञापन को गढ़ा गया है। जहाँ लड़की अपने अनिश्चित भविष्य को लेकर चिंतित है। बार-बार सवालों से किसी जवाब पर पहुँचना चाहती है। एक तरह से यह पुरुष की इच्छा पर आश्रित होने की तरह लगने लगती है। स्वयं उसकी इच्छा जैसे उसके लिए कुछ मायने ही न रखती हों। यह हमारे समाज का एक ‘पाठ’ है जहाँ लड़कियों के लिए किसी बंधन की ज़रूरत उन्हे महसूस होती है और उनके समानान्तर लड़के जादा स्वतंत्र रहते हैं। स्त्री अपने लिए जगह बना ही नहीं पा रही। प्रियंका चोपड़ा की ‘स्कूटी’ इसका मुक़ाबला नहीं कर पाएगी। यह पुरुषों का पुरुषों द्वारा संचालित सामाजिक ढाँचा है। यहाँ उनकी पैकेजिंग कुछ अलग हाथों से होती है। शर्तिया यह हाथ पुरुषों के हैं। दिमाग तो हैं ही। 

इससे अलग वास्तविक दुनिया कितनी विद्रुप है, वह यहाँ नहीं दिखती। यथार्थ जितना कठोर है उसकी सघनता हमें कभी भी महसूस नहीं होती। यहाँ लड़कियाँ सच में जैसी हैं, वैसी इन माध्यमों में कभी नहीं आ पाती। वह कैसे अपना रोज़ाना गढ़ रही हैं। कितना कुछ उन्हे अकेले करना है। कितना वह करती हैं। यह नज़र कभी इन घटनाओं को अपने ‘उत्पाद’ के रूप में नहीं देखती। देखना चाहती भी नहीं। यह उसका अभीष्ट नहीं है। उस नज़र को इस पूंजीवादी तंत्र में यथास्थिति को बनाए रखना है। और प्रकारांतर से उन्हे मज़बूत करना। यह नियंत्रण और इस आवारा पूँजी का अपना पाठ है। जिसका नियंत्रण स्त्रियों के हाथों में नहीं है।

अभी उस दोपहर लौट रहा था। मेट्रो स्टेशन से गोल मार्केट की तरफ़। सामने से दसवीं ग्यारहवीं में पढ़ने वाली एक लड़की आ रही है। उसकी पहचान उसके स्कूली कपड़े थे। जर्सी स्कर्ट पहने थके कदमों से वह चल रही है। वह अकेली है। लड़के बड़ी देर से उसके अपने पास से गुज़रने का इंतज़ार कर रहे हैं। इस दरमियान मैं भी इतनी पास आ चुका था के उनके बीच होते संवाद को सुन सकूँ। उन दो में से एक लड़का बोला। ‘इधर देखती तो जा..आई लव यू बोल दूँगा..’!! लड़की कुछ नहीं बोलती। गर्दन झुकाये उनके पास से चुपचाप गुज़र जाना चाहती है। वह गुज़र जाती है। वह मेरे पास से भी गुज़री। बिन पलटे। बिन कुछ कहे। बिन कुछ बोले। उसका सपाट चेहरा देख लगा यह पहली बार नहीं है। ऐसा कई बार हो चुका है। होता रहा है। लड़की का अकेले होना उसे छेड़े जाने लायक बनाता रहा है।

जब कुछ दूर निकाल आया तब पीछे मुड़ा। थोड़ी देर रुक गया। एक नज़र उन लड़कों को देखता रहा। अब किसी भी तरह से पिटे जाने का ख़तरा भी नहीं है। वह अभी भी वहीं खड़े हैं। किसी और के ऐसे ही इंतज़ार में। वह ऐसे ही बोलते रहेंगे। वह ऐसे ही सुनती रहेंगी। सोचने लगा के उस लड़की को रोक पूछा क्यों नहीं। कि वह इन लड़कों को जानती है या नहीं। अगर नहीं जानती तब पुलिस में रिपोर्ट कर इनकी शिकायत क्यों नहीं कर देती। इन्हे ऐसे ही समझाया जा सकता है। पर दूसरे ही क्षण लगने लगता है कितना खोखला है यह विचार। पैबंद लगता। डैमेज कंट्रोल की तरह। अपने आप को बचाता। कि सब वैसे नहीं होते। मैं वैसा नहीं हूँ। वैसे भी मैं तुमसे उमर में कितना बड़ा हूँ। तुम्हें छेड़ूँ ऐसा भी नहीं हूँ। डरो मत। अपने अंदर साहस भरो। कह दो जो नहीं कह रही हो। उसे बता दो तुम भी बोल सकती हो। गाली दे सकती हो। यह चुपचाप गुज़र जाना प्रतीकार नहीं है। उन्हे बता दो तुम अब चुप नहीं रहोगी। बिलकुल नहीं।

और बीती शाम पहाड़गंज की किसी गली से गुज़रते एक लड़की पूरे मुँह को ढके किसी अनाम से होटल से निकली। पीछे दो लड़के जो अटेंडेंट लग रहे थे, उसका ऐसे जाना विस्मित होकर देखते रहे। साथ जो दोस्त था बोला 'कॉल गर्ल' है। यहाँ तो यह सब बिलकुल आम है। पर दिल में उसकी नीची निगाहें धँस गईं कि उस छिपा लिए गए चेहरे के बाद भी वह किसी से आँख नहीं मिला रही है। उसे अभी भी डर है। डर है कोई देख लेगा। और सबसे ख़तरनाक है इस बात का आम होना। वह जो इसके साथ कमरे में था थोड़ी देर बाद बिन मुँह ढके वहाँ से निकलेगा। उसे कुछ भी छिपाने की ज़रूरत महसूस नहीं होगी। तब भी यह आँखें उसे ऐसे देखेंगी। नहीं। उसे डर क्यों नहीं है। वह उस चली गयी देह का खरीदार है। फिर भी नहीं। उसे कोई फ़र्क नहीं पड़ रहा। यही जवाब है। इन सब सवालों का।

अभी कहीं से कभी ऋतुराज की पढ़ी कविता की पंक्तियाँ याद आ रही हैं: ‘माँ ने कहा लड़की होना / पर लड़की जैसी दिखाई मत देना’। यही पंक्ति लिख क्यों ख़त्म कर रहा हूँ, पता नहीं..

{इस पोस्ट का एक छोटा हिस्सा 'हिंदुस्तान'के ब्लॉग कोने 'साइबर संसार' में छह दिसम्बर को 'साहस बटोरकर देखिये' शीर्षक के साथ प्रकाशित हुआ। वहाँ पढ़ने के लिए इसपर चटकाएँ। }

आवाज़ें..

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