दिसंबर 29, 2014

आखिरी पोस्ट: अलविदा ब्लॉग..

साल ख़त्म होते-होते फ़िर लगने लगा इस नाम के साथ बस यहीं तक  यह मेरे हारे हुए दिनों का नाम है। जैसे बिन बताए एक दिन अचानक इसे शुरू किया था, आज अचानक बंद कर रहा हूँ। इस भाववाचक संज्ञा से निकली ध्वनियाँ मेरे व्यक्तित्व पर इस कदर छा गयी हैं, जिनसे अब निकलना चाहता हूँ। कैसे भी करके इससे दूर चले जाना है। इतनी दूर कि इसकी परछाईं भी धुँधली दिखने लगे। आँख दुखने पर भी दिखाई न दे। किसी भी तरह इसपर लौट न सकूँ..

चाहते न चाहते इसकी अपनी सीमाएँ हैं, जिनके बीच यह बनता-बिगड़ता रहा यह ख़ुद को बिना किसी खाँचे गढ़ते रहने की तरह था। कुछ-कुछ मेरे अवचेतन के खुले पन्नों की किताब की तरह। कितना छटपटाता रहा इससे छूट जाने के लिए.. यह मेरी व्यक्तिगत सीमाओं और मेरे मन से कितना बाहर जाता रहा, कभी महसूस नहीं कर पाया। बस अंदर ही अंदर लगता वही लिखुंगा जो मन करेगा। तभी लिखुंगा जब मन करेगा। कभी-कभी यह भी लगता, मुझसे बड़ा नाम इस ब्लॉग का नाम है। मेरा मन इसके नीचे कहीं दब गया है।

हमेशा इस जगह को निजी बना लेने को लेकर सचेत रहा। पर मेरे सोचने से भी क्या होने वाला था ? इन सालों में जैसा होता गया, यह उसी तरह के बेरंग रंगों में रंगता गया। मैं ढूँढ़ता रहा अपनी तरह के लोग। कुछ ऐसे जिनमें कुछ-कुछ छूटा रह जाता। फ़िर कभी मिलते, फ़िर कुछ छूट जाते कुछ छूटने, कुछ मिलने में ज़िन्दगी कुछ-कुछ चलती रहती।

असल में कोई मिलना नहीं था। पर कोई नहीं मिला, ऐसा नहीं है। यहाँ लिखने के दिन शुरू ही हुए थे, तब जनसत्ता में कभी-कभी उदय प्रकाश अपने ब्लॉग के साथ मिल जाते। चन्दन पाण्डे रिवॉल्वर लिख चुके थे, भूलना लिखने की तय्यारी में थे। हम भी कभी जनसत्ता के पन्नों होंगे, कभी सोचा न था। सत्रह फरवरी दो हज़ार ग्यारह, यही तारीख़ थी जब मेरी पहली पोस्ट आई। तब ब्लॉग था ही कितना पुराना? लिखते हुए तीन महीने हुए थे और कुल पंद्रह पोस्ट थीं। मैंने सिर्फ़ एक ईमेल भेजा था।

आज तक नहीं पता, उस मेल को वहाँ दफ़्तर में किसने देखा होगा? पता नहीं उन्होने क्या सोचकर वह पोस्ट वहाँ लगाई होगी? आज तक वे मेरे लिए अनाम हैं। उन्हे जान नहीं पाया। शायद उनकी ताकत ऐसे ही सामने न आने में है।

पता नहीं वह कैसे क्षण थे? उन क्षणों को लिखते याद करते मेरी आँखें धुँधलाती जा रही हैं। मैं चीख़ चीख़कर चिल्लाना चाहता था। कहीं छिपकर थोड़ी देर रोना चाहता था। चेहरे पर उन आँसुओं की बनी लकीरों को आईने में देखना चाहता था। उस दिन लगा बिन किसी को जाने, मैं भी वहाँ हो सकता था। यह जो एहसास था, उसे आज तक अपने अंदर महसूस करता रहा हूँ।

अगर जनसत्ता का यह कॉलम न होता, तो शायद उन हताश परेशान दिनों में कब का पीछे छूट जाता। कहीं गुम हो जाता। चुप हो जाता। वहाँ बने रहना पीछे आँगन में ठंडे दिनों में लहलहाते सरसो के बीच उकड़ू गर्दन छिपाये बैठे रहने की तरह है।

पर आज मन कर रहा है, यहाँ से कहीं भाग जाऊँ।  कहीं किसी नए नाम से, नयी जगह पहुँच जाऊँ। मन करता है, महाबीर भाटी की तरह ट्रक चलाते-चलाते, किसी सुनसान जगह पर अपना घर बनाऊँ। इस चारदीवारी में जब-जब मैंने कुछ और लिखना चाहा, वह इसके बने बनाए ढाँचे में अपने आप ढलता गया।  यह इसकी सबसे बड़ी सीमा बनती गयी, जिसे चाहते हुए भी तोड़ नहीं पाया। इन बीते सालों में सारी स्थापित संरचनाओं को लगातार तोड़ता रहा इसलिए आज इस संरचना को भी तोड़ रहा हूँ। जा रहा हूँ।

सोचता हूँ, जब हम कहीं के लिए  चले नहीं थे, हमें कहीं पहुँचना नहीं था; तब इसे बंद करने में किसी भी तरह सोचना बेकार है। शायद इसी किसी अनाम मुकाम पर पहुँचकर इसे रुक जाना था। जो किसी परिभाषा में अटता न हो। जिसे कोई किसी भी तरह से बंद करने लायक स्थिति न कहता हो, वहीं आकर रुक जाना, किसी को असहज स्थिति नहीं लगनी चाहिए। यहाँ रुके रहने ख़ुद को दोहराए जाते रहने पर यह कोई कल्ट ब्लॉग नहीं बनने वाला। अंदर से कहीं लगता है, जाने का यह सबसे सही वक़्त है।

फ़िर हम कौन-सा बहुत बड़ा मकसद लेकर चले थे कि कहीं पीछे छूट जाएँगे? यहाँ अब ठहरने का मन  नहीं है, तो नहीं है..यहाँ और नहीं ठहरे रहना चाहता सागर, इसतरह मैं जा रहा हूँ। अपनी पाँच साल वाली मोहोलत भी पूरी नहीं कर पाया। बस इसका आख़िरी सपना एक किताब का था, वह अभी भी यहीं कहीं किसी पन्ने के नीचे दबा रह गया होगा। उसे ढूँढ़कर बचाए रखना है। 

पर सवाल है, क्या इसे बंद कर नए पते पर जा रहा हूँ? अभी नहीं पता। अभी कोई नाम नहीं ढूँढ़ा है। कोई टैगलाइन नहीं है। नए पते पर जा भी रहा हूँ या नहीं, यह भी नहीं पता। आगे क्या करूँगा? नहीं जानता। अभी भी पता नहीं कितनी पोस्टें ड्राफ़्ट में रखी हुई हैं। उन्हे कभी पूरा ही नहीं कर पाया। पता नहीं कितने दिन, महीने, साल इस नाम से छूटने में लग जाएँ? लेकिन मुझे पता है, इस न्यू मीडिया के पावर स्ट्रक्चर में मैं कहीं नहीं ठहरता। मेरी कोई पहचान नहीं है। मुझे जानते ही कितने लोग हैं? लोग यहाँ उन्हे ही जान रहे हैं, जिन्हे वह पहले से जानते हैं। यही इस माध्यम की सबसे बड़ी कमज़ोरी है। जिससे पार पाना इतना आसान नहीं।

इतना होने पर भी हो सकता है, कहीं और लिखने लगूँ, तब उसमें और इसमें कोई अंतर ही न दिख पाये। पर अब इस जगह की घुटन से और घुटना नहीं चाहता। थकने लगा हूँ साँसें भारी हो जाती हैं। चला नहीं जाता अब ख़ुद से और हारना नहीं चाहता

हो सकता है, जितनी बातें सोचकर चला था, उतनी कह नहीं पाया।  जिस तरह उन्हे कहा जाना चाहिए था, वह वैसी नहीं उतर पायीं होंउन सबको कहते हुए कुछ छूटी रह गयी होंगीपर अभी के लिए बस अलविदा। मिलेंगे कहीं किसी मोड़ पर..!!

इस ऑडिओ में आवाज़ मेरी नहीं है, पर इसे कहने वाला मैं ही हूँ। वैसे बहरूपिये तो हम शुरू से हैं। कभी नहीं बताया हम कौन हैं?


हो सकता है, महीनों किसी नए पते के साथ वापस न लौटूँ। या इसकी भी संभावना है कि कल ही यहाँ उस नए घर का पता इसी जगह लिंक लगाकर छोड़ जाऊँ। पता नहीं मन में क्या-क्या एकसाथ चल रहा है। फ़िलहाल इतना ही कि तीन पोस्टों को बैकडेट में यहाँ ज़रूर लगाऊँगा। उनका होना मेरे न होने जितना ज़रूरी है। फ़िर उनके बिना मन भी तो नहीं मानेगा न। 

(अट्ठाईस दिसंबर, रात दो बजे के बाद नींद और ठंड के बीच उबासी लेते, पैरों में मोज़े पहनते हुए..)

दिसंबर 19, 2014

चुप घर..

वह इतनी छोटी जगह थी, जिसे कमरा कहना, किसी कमरे की चार दिवारी को तोड़कर फ़िर से कमरा बनाने की तरह होता। ऊपर पक्की छत नहीं थी। ऐबस्टस की टीन थी। बरसात में वह बूंदों के साथ कई धुनें एकसाथ गुनगुना रही होतीं। गर्मियों में इतनी गर्म कि उसके नीचे बैठे रहना मुफ़्त में स्टीमबाथ का अनुभव देता। सिर के ऊपर लगा छोटा पंखा पिछले कितने मौसमों से बंद पड़ा था, किसी को याद नहीं था। सीएफ़एल का बल्ब फ्यूज़ होकर उस ख़राब होल्डर में अभी भी लगा हुआ था। उसे कौन बदलने की सरदर्दी ले (?) यही सोच उसे वैसे ही रहने दिया। कमरे में रौशनी की ज़िम्मेदारी एक चालीस वॉट की ट्यूबलाइट थी, जो कई महीनों से लगातार हर रात जल उठती।

उसकी रौशनी जितनी चार दिवारी के अंदर रहती, उससे कहीं जादा रौशनदान से निकलकर बाहर आँगन में फैल जाती। इसके हर रात ढबरी की तरह जलने के बाद कमरा और साफ़-साफ़ दिखाई देने लगता। दिवार से चिपकी एक लोहे की अलमारी थी, जिसके ताखे किसी लाइब्रेरी की शीशे वाली अलमारी की याद दिलाते रहते। उसके बगल एक बक्सा था। बक्सा साल खाड़ में एकबार खुलने वाली अटैची की तरह था। असल अटैची कहाँ थी (?) किसी को कुछ पता न था। बक्से के अंदर क्या था (?) यह भी किसी को न पता था। लकड़ी में अभी एक दीमक भी नहीं लगी थी। घर में दीमक कहीं लगती नहीं थी। घर में दीमक लगने के लिए कुछ नहीं था।

दिवारों पर छिपकलियों का राज था। वह पुरखों की तरह उखड़ रहे पलस्तर के साथ पिछले कई सालों से लगातार वहीं बनी हुई थी। एक-दूसरे से चिपकी हुई थी। दोनों को एकदूसरे के कोई शिकायत नहीं थी।

घर दूर से काफ़ी शांत दिखाई देता। पास जाने पर भी उतना ही शांत मिलता। कोई आवाज़ बाहर नहीं जाती। उसी तरह बाहर से भी कोई आवाज़ अंदर नहीं आती। न शाम कोई हाथ सब्जियों से भरा थैला लिए लौटता। घर बिलकुल ऐसा लगता जैसे इस दुनिया में होते हुए भी इस दुनिया में नहीं था। न दिन में कोई बाहर निकलता। आसपास भी इस घर के बारे में कोई नहीं जानता। यह उसका असहयोग आंदोलन नहीं था। वह अपने आप में एक स्वतंत्र गणतन्त्र था।

इस तरह वह घर, एक चुप घर था। एक दिन यह चुप घर मेरे सपनों की दुनिया में कहीं खो गया।

{ दूसरा चुप घर ..}

दिसंबर 18, 2014

मोहल्ले की लड़कियाँ

आज दरी पर नई चादर बिछी हुई है। सुबह से ही घर से गेंदे के फूलों की ख़ुशबू आ रही थी। यह किसी बाहर से आने वाले मेहमान के लिए नहीं है। आज शादी के बाद गाँव से पहली बार बड़े लड़के की बहू आ रही है। लड़का अभी पिछले हफ़्ते लौटा है। नौकरी अभी नहीं है। सालभर में हो जाएगी। ऐसा घर में सब सोचते हैं। पढ़ने में मन भी लगाता है। ऐसे ही पढ़ता रहा तब पक्का हो जाएगी। ऐसा आस-पड़ोस वालों को लगता। जबसे वह गाँव से लौटा है तब से उसके दोस्त छेड़ रहे हैं। भाभी को अभी तक कुछ दिया कि नहीं? क्या दे रहा है? उसका दिमाग इन सब चीज़ों में शुरू से नहीं रहा। अगर रहा होता तो शादी से पहले पड़ोस में क्या कम लड़कियाँ थीं, जो अकेली रात में छतों पर इसे बुलाती। वह अपने मन का मालिक था। कभी जाता। कभी नहीं जाता।

वह जब-जब मोबाइल में थ्री जी डेटा कार्ड री-चार्ज करवाता, तब-तब उसे लड़कियों के पास जाने की ज़रूरत महसूस होती। वह उन्हे छूना चाहता। वह साँसें रोके रहता। बहुत पास से, उन्हे बिन पलक झपके देख लेने की इच्छा उसके पेट के निचले हिस्से में महसूस होने लगती। वह जादा देर इस कशिश को अपने अंदर की रगों में दौड़ने नहीं देता। वह कोशिश करता खाना खाने से पहले ही जल्दी से विनोद मेडिकल का एक चक्कर लगाकर लौट आए। फ़िर इतमीनान से बल्ब की रौशनी में एक-एक का चेहरा याद करता जाता।

पर वह अकेला ऐसा महसूस नहीं करता। उसके साथ वह लड़कीयाँ भी करतीं, जिनके मोबाइल में वह टॉकटाइम डलवाता। कभी वह हफ़्ते की लॉटरी एकसाथ निकालता। कब किस लड़की का नंबर आएगा(?) यह सब पर्ची का खेल होता। जिसकी पर्ची निकलती पूरी रात सिर्फ़ और सिर्फ़ उसी लड़की के सपनों में साथ रहता। कभी जो पहले बोल देती, उसके वादों को कभी नहीं तोड़ता।

कितनी कोशिशें की सबने मिलकर। क्या-क्या नहीं किया सबने(?) सब दहेज़ इकट्ठा होजाने तक लड़कियों को रोके रहना चाहते। पर हासिल कुछ नहीं हुआ। मेडिकल स्टोर एक रात बंद हो जाने से उसका कुछ बिगड़ने नहीं वाला। कितनी बार तो कह कर देख लिया। कितना झगड़ते सब उससे। वह अब बिना पूछे किसी नंबर पर रीचार्ज करने लगा था। दोबार चौराहे वाले अखाड़े से पहलवान भेजे। वह भी सब ऐसे ही निकले। उसे कुछ नहीं कहते। उल्टे उनसे जादा रुपये कमाकर पहलवान दंगल करने लौट जाते। 

लेकिन आज रात सब बदलने वाला था। ऐसा उन सारे मोहल्ले वालों को लगता। जिन्होने अपनी लड़कियों को बचाने के लिए उसकी इस जनवरी शादी करवा दी थी। सबके मन में अजीब-सी धुकधुकी थी। सब सोचते रहे थे, देखो अब क्या होता है?

दिसंबर 17, 2014

कमरे में सिर्फ़ कमरा था

कमरे में सिर्फ़ कमरा था। वह न खाली था। न भरा था। वह कुछ-कुछ खाली था, कुछ-कुछ भरा था।

इस कुछ खाली, कुछ भरे कमरे में वह बालदार लड़का, कुछ कम ख़ूबसूरत लड़की के पास बैठा रहा। वह कुछ कमसूरत लड़की बालदार लड़के के पास बैठी रही। लड़के ने चुपके से अपने मन से कहा। तुम इतनी भी ख़ूबसूरत नहीं हो। लड़की ने चुपके से अपने मन से कहा। तुम इतने भी बालदार नहीं हो। दोनों के मनों ने सुनकर अनसुना कर दिया। वह वैसे ही सामने देखती रही। वह वैसे ही सामने देखता रहा।

दोनों एक-दूसरे के अगल-बगल बैठे रहे। वह उसे देख नहीं रहा था। वह उसे देख नहीं रही थी। इसतरह दोनों को लगता दोनों एक-दूसरे को न देख पाने का नाटक बहुत अच्छे से कर रहे थे। दोनों बेवकूफ़ थे। गलती उनकी नहीं उन दोनों के लड़का-लड़की होने में थी।

लड़का बार-बार उसके पैरों की तरफ़ देखता। देखता किसी घिस चुकी चप्पल में मोज़ों को पहने हुए उसके पैर। बार-बार उसकी नज़र सलवार पर चाँदी की पायलों के घुंघरुओं में कहीं अरझ जाती। लड़की बार-बार उसके पैरों की तरफ़ देखती। देखती किसी घिस चुकी चप्पल में मोज़ों को पहने हुए उसके पैर। बार-बार उसकी नज़र पजामे पर चाँदी की पायलों के घुंघरुओं में कहीं अरझ जाती।

लड़के ने कुछ देर लड़की के बारे में कुछ सोचा। लड़की ने कुछ देर लड़के के बारे में कुछ सोचा। कुछ देर बाद दोनों ने कुछ तय कर किया। लड़का कमरे के साथ वहीं रुक गया। लड़की भी कमरे के साथ वहीं रुक गयी।

अब उन्हे असली नाटक शुरू करना था। दोनों को एक-दूसरे को देखते हुए भी नहीं देखना था।

{नोट: तस्वीर बड़ी करने पर कमरे के अंदर कई कमरे और दिखाई देंगे। कदरदान ऐसा करके लड़का-लड़की दोनों को पास से देखें.}

दिसंबर 10, 2014

वह बिज़ी थी..

दोनों ने चार महीने पहले इस दफ़्तर में ‘एमटीएस’ की हैसियत से आना शुरू किया था। लड़का दसवीं पास था, लड़की बारहवीं फ़ेल। यह दो अक्टूबर के दो-तीन हफ़्ते बीत जाने बाद की पहली शाम नहीं थी, जब इन दोनों को पाँच बजे के बाद भी रुकना पड़ रहा था। रुकने के लिए सिर्फ़ लड़की को कहा जाता। पर लड़का भी रुक जाता। दोनों साथ-साथ जाते। साथ इसलिए भी जाते क्योंकि दोनों सीताराम बाज़ार से थे। दोनों सोचते आईटीओ से घर है ही कितनी दूर। लड़का तुर्कमान गेट से मुड़ जाता, लड़की सीधी मोहल्ले में गुम हो जाती।

दोनों दफ़्तर के इस प्रायोजित एकांत का आधुनिक उपयोग सिर्फ़ घर पर करते, उसे यहाँ छेड़ते भी न थे। छेड़ने का मन होता, तो भी उन नेगी अंकल के पाँच-पाँच मिनट पर लौट आने की आदत को कैसे बदलते। बदलना मुश्किल था और लड़के की शक्ल इतनी चालू नहीं थी। लड़की भी दिखने में उतनी ही शरीफ़ लगती। दोनों लड़का-लड़की होते हुए भी लड़का-लड़की जैसे नहीं दिखते। ऊपर से लड़का थोड़ा कम पढ़ा लिखा था। उसने किताबों को पढ़ना सात साल पहले छोड़ दिया था। और लड़की को किताबी बातें बचपन से ही नापसंद थी।

यहाँ आने से पहले ही मुँहफट्ट होना लड़कों की निशानी बन चुकी थी। इसलिए अंदर से चाहे कितना भी रोमेंटिक हो रहा होता, दिल में कसक कितनी भी उठती बैठती रहती वह एक ख़राब हो चुकी ट्यूबलाइट के चुंधियाते उजाले में ऐसे ही थोड़ा तेज़ बोलता।

“अरे तुझे तो ठीक से दिखाई भी नहीं देता, मेज़ के नीचे देख कितनी धूल पड़ी है..
कब साफ़ करेगी इसे, कब चलेंगे हम..??”

“दिख नहीं रहा, कर तो रही हूँ, जैसे-तैसे.. तूने मेरी कमर कामलायक कहाँ छोड़ी है..
आज मूव लेते चलना..”

“हाँ हाँ चल-चल.. बड़ी आई बताने वाली। काम कर अपना..काम..
चल अब जल्दी हाथ चला, वरना आज फ़िर नौ बज जाएंगे..फ़िर तू मुझे बोलेगी..”

“क्या बोलुंगी बता.. बता..बता तो ??
लेट तो तू करता है.. रोज़.. घर वाले रोज़ पूछते हैं, तुझे क्या पता कैसे-कैसे बहाने बनती हूँ..”

इतना कहकर वह उसी मंथर गति से ज़मीन पर पोंचा लगती रही, जैसे उसने उन सुनी हुई बातों को अपने पोंचे, धूल, फ़िनाईल, फ़र्श सबमें मिलकर भुला दिया हो। वह कुछ नहीं बोली। इसपर लड़का थोड़ा झल्ला रहा था। पर चुप था। उसका चेहरा तमतमाने से पहले की स्थितियों को प्रकट कर रहा था, पर अँधेरा कुछ जादा था। उजाला शाम सूरज ढलने से कुछ और कम हो गया था, इसलिए कुछ साफ़ साफ़ नहीं दिख रहा था। वह फ़िर थोड़ी देर बोलने की सोचता लेकिन चुप रह जाता। इधर-उधर देखने लगता।

वैसे वह हरबार दरवाज़े की तरफ़ देखता। और रुक जाता। हरबार वहाँ कोई परछाई होती और जल रहे पीले बल्ब की रौशनी। फ़िर बड़ी देर बाद, उसने मेज़ के नीचे खाली जगह में ख़ुद को समेटकर, लड़की के चेहरे के पास उसकी आँखों में आँखें डालकर कहा।

“अगर तू रोज़ इतना लेट करेगी तो रहने दे फ़िर,
..मैं कोई और देख लूँगा..!!”

लड़की कुछ नहीं बोली। वह अभी भी फूलझाड़ू लिए गीले कपड़े से फ़र्श चमका रही थी। वह बिज़ी थी।

दिसंबर 09, 2014

स्वच्छ भारत अभियान की बात

अब जबकि झाड़ू उठाए नेता, मंत्री, संतरी अख़बारों में छपने के लिए इतने लालायित नहीं दिख रहे, ख़ुद कूड़ा फैलाकर मजमा जुटाने की जद्दोजहद अब ठंडी पड़ गयी है, जनता यू-ट्यूब पर प्रधान सेवक के सफ़ाई वीडियो का इंतज़ार करते-करते थक चुकी है, मन की बात  सुनने के लिए रेडियो खरीद कर अघा चुकी है, डीएवीपी के हर विज्ञापन के साथ गाँधी चश्मा छप रहा है, स्वच्छता सप्ताह हिन्दी पखवाड़े की औपचारिकता के साथ सम्पन्न हो चुका है,सबटीवी पर तारक मेहता का उल्टा चश्मा के सभी सदस्य जब हमें सफ़ाई का महत्व बता चुके हैं,एनडीटीवी पर अमिताभ बच्चन गंदगी से हर बीस सेकंड में एक बच्चे की मौत की भयावयता रोज़ बता रहे हैं, बालदिवस बाल स्वच्छता अभियान में तब्दील हो चुका है, मंत्रालयों में छब्बीस जनवरी की परेड में अमेरिकी राष्ट्राध्यक्ष बराक ओबामा के सामने अपनी झाँकी में इस अभियान को हथियाने की होड़ मची हुई हो, पूरा देश इस अभियान के धुआँधार विज्ञापनों, विज्ञप्तियों से अटा पड़ा हो, तब हमारा भी कुछ कर्तव्य बनता है कि कान पर जूं को रेंगने दिया जाये। हम थोड़ा पिछड़ भी गए हैं तो क्या? बातें तो बातें हैं, बातें होती रहनी चाहिए..

अगर हमारे देश में इतने तामझाम के साथ ‘स्वच्छ भारत अभियान’ चल रहा है, तो इसे समझने के लिए सबसे पहले हमें ‘स्वच्छता’ और ‘अस्वच्छता’ दोनों को पारिभाषित करना होगा। इसतरह यह भी देखना होगा कि यह कहाँ-कहाँ पायी जाती है? किन-किन अर्थों में इसका अनुवाद किया जा सकता है? वह कौन हैं, जो हमारे समाज में ‘गंदगी’ उत्सर्जित करते रहे हैं? फ़िर यदि समाज इसे अस्वच्छता के रूप में ला रहा है, तो कोई मशीनरी, कोई तंत्र ऐसा भी होगा जो इसके निपटारे के लिए प्रशासनिक स्तर पर सैद्धांतिक रूप से प्रतिबद्ध होगा। इस तरह यह एक रोज़गार भी है। लेकिन इसी क्षण हमें इसके जातिगत समीकरणों को भी समझने की कोशिश करनी चाहिए। महात्मा गांधी ‘अस्पृश्यता’ को ख़त्म करने के लिए क्या तर्क देते हैं और इसके कारण जिस वर्ग को मुख्यधारा में लाने की कोशिश कर रहे थे, वे किन किन पेशों से सम्बद्ध थे? वे पीढ़ी-दर-पीढ़ी वही पेशे क्यों कर रहे थे? क्यों कर रहे हैं? क्यों इस अभियान की शुरुवातवाल्मीकि बस्ती से होती है? क्या वस्तुस्थिति में किसी भी प्रकार का आमूलचूल परिवर्तन हुआ भी कि नहीं। वैसे आज भी हमारे देश में सिर पर मैला उठाने वाले आज भी ऐसा करने को अभिशप्त हैं।

यहाँ यह देखा रोचक होगा कि अभियान ‘अस्वच्छता’ के रूप में किन्हे चिन्हित करता है और एक नागरिक होने के नाते इस अभियान में हमारी क्या भूमिका हो सकती है? दीवारों पर पेशाब करना, खुले में शौच जाना, सड़कों गलियों में इधर-उधर कूड़ा फेंकना इन तीन प्रकारों के अलावा वह अपने इस समाज में गंदगी को देख नहीं पाते। सरकार स्वयं इन जन सुविधाओं के लिए कितनी सजग है, अलग चर्चा का विषय है। वैसे दिखाई तो हमें नीले और हरे डिब्बे भी नहीं देते, जिनमें जैविक और पुनरचक्रित होने लायक कूड़े को डाल पाएँ। नालियों, सीवरों का बोध हमें या तो बरसातों में होता है या वह बस या गाड़ी के किसी जेजे कॉलोनी के पास से गुजरते हुए महसूस होते हैं। यदि रेलगाड़ी से जा रहे हैं, तब उन पटरियों पर प्लास्टिक के डिब्बों और पुराने लोटों के साथ मल त्याग करती असंख्य अभिशप्त जनसंख्या को देख हम जुगुप्सा से भर जाते हैं। धीरे-धीरे जैसे जैसे बात आगे बढ़ती जा रही है, हम इस ‘गंदगी’ को ‘अस्वच्छता’ बोल पाने में ख़ुद को असमर्थ व असहज पाते हैं। हम ‘भद्र अस्वच्छता’ से होते हुई ‘गरीब गंदगी’ के बगल से गुज़र रहे हैं। यह सिर्फ़ भाषा का नहीं वर्ग का भी भेद है, जो हमारे मन से होकर नाक पर रुमाल बनकर हमारे चेहरे के भावों को नाटकीय रूप से बदल रहा होता है।‘मुन्नी मोबाइल ’ ऐसे ही किसी औदद्योगिक उपनगरी से रोज़ दिल्ली आती है।

हम यहाँ गंदगी को नगरीय विकास के एक पहलू से जोड़ते हैं, पर ऐसा करने के बाद भी हम उसकी अधूरी-धुँधली तस्वीर ही देख पाते हैं। सारे नेता लुटियन दिल्ली की किसी साफ़-सी सड़क पर कूड़ा फैलाकर झाड़ू लगाते दिख रहे थे। उनका ध्यान राजघाट के पीछे रेंगने को मजबूर यमुना की दयनीय स्थिति पर नहीं जाता। वे कौन से कारक हैं, जिनके परिणामस्वरूप उनकी गति बाधित हुई? यह हम देख नहीं पाते। हमें बड़े-बड़े कारखाने छोटी-छोटी औद्योगिक इकाइयाँ नज़र आती हैं। इनके लिए हम अपने पर्यावरण कानून बदलने को झट से तय्यार हो जाते हैं। ऐसा नहीं है, सरकारें उनके प्रति उदासीन रही हैं, गंगा एक्शन प्लान से लेकर टेम्स की तर्ज़ पर नदियों को साफ़ करने उनके सौंदर्यीकरण की कसमें खाकर अदालतों में हलफ़नामे दायर करती रही हैं। अबकी बार तो पूरा जल संसाधन मंत्रालय ही खड़ा कर दिया गया है। हम रोज़ उनमें मिलते लाखों टन अशोधित जल को शोधित करने के संयंत्र खरीदने में व्यस्त रहते हैं। इसतरह नदी का पारिस्थितिकी तंत्र क्या होता है, नदियाँ स्वयं भूल चुकी होती है। याद करने से भी याद नहीं आता।

और तब हम हड़बड़ी में ऐसे आधे-अधूरे स्वच्छता अभियान गढ़ते है। जिनमें उन नागरिकों को शपथ दिलवाई जा रही है, जिन्हे यह भी नहीं पता कि रोज़ उनके घर से निकला कूड़ा शहर के अंदर या शहर के बाहर किस ढलाव पर कूड़े के पहाड़ में बदल जाता है? फिर वह वहाँ से आगे की निपटान प्रक्रिया के लिए कहाँ जाएगा? ऐसी स्थिति में उन्हे कैसे पता होगा कि सुबह किया उनका मल किन नालियों, नालों, सीवरों से होता हुआ नदियों में मिल रहा है? उन्हे यह कभी पता ही नहीं चल सकेगा कि जो उत्पाद वे बाज़ार से खरीद कर लाये हैं, उसके उत्पादक ने कितना कार्बन उत्सर्जित किया और अपने अपशिष्ट पदार्थों को किन नदियों में खुले नालों से बहा दिया। हम तो बस दूरदर्शन पर विद्या बालन केजहाँ सोच वहाँ शौचालय  वाले विज्ञापन देखते रहेंगे और खुले में जाते रहेंगे।

{आज अट्ठारह दिसंबर, इस बात का संपादित अंश हिंदुस्तान में आया है, पता साइबर संसार, स्वच्छता के मायने.. }

दिसंबर 08, 2014

फटी ज़ेब वाले लड़के का प्यार

कहानी में जबर्दस्त ट्विस्ट आन पड़ा था। वह फ़ेसबुक पर उनकी जितनी भी तस्वीरें देखता जाता, उतना ही उसे विश्वास होता जाता कि वह किसी दूसरी दुनिया से आए हुए लोगों की दुनिया है। उसकी ज़ेब में जितने पैसे नहीं होते उससे भी महँगी उन लाल-लाल होंठों को लाल करने वाली एक लिपिस्टिक की कीमत होती। हाथ में दिख रहा पर्स, मोबाइल, एक से एक बढ़िया आइटम उसकी खाने के बाद पादने की औकात से बहुत बाहर की बात होती। एकबार वह अपने सारे कपड़े बेच देने की बात पर राज़ी भी हो जाता, तब भी उस नीलामी से जुटाये पैसों में सिर्फ़ इतना हो पाता कि शादी से ऐन पहले पहाड़गंज जाकर छह टूटी चौक से मेहँदी लगाने वाली किसी उबाऊ, मुँहफट्ट, उमर में घिसी हुई किसी लड़की को दीदी कहकर घर आने के लिए राज़ी कर पाता। असल में वह किसी ऍड की फ़िराक में था। पर उसकी किस्मत अभी भी उसे दगा दे रही थी। इतना इंतज़ार करने पर भी अभी तक किसी सलून या स्पा ने पसीने से भीगे बदबूदार कपड़ों के बदले ऐसे किसी भी ऑफर को देने की कोई योजना बाज़ार में नहीं उतारी थी। 

इंतज़ार करते करते यह उसकी आठवीं दोस्त थी, जिसने मर्चेन्ट नेवी के कारकुन से शादी करने के लिए सगाई कर ली थी। पिछली वाली सिंगापुर चली गयी। किसी सॉफ्टवेयर इंजीनियर के साथ। ख़ूबसूरत लड़कियाँ उसकी पासबुक में कहीं भी अट नहीं रहीं थी।

सच में यह उसके बहुत तंगी के दिन थे। अब उसने तय किया कि गोल मार्केट, मल्होत्रा जी के बहकावे में आकर मोबाइल में कोई भी इंटरनेट पैक नहीं डलवाया करेगा। तब न उसकी रातें हराम होंगी, न दिनभर भन्नाया घूमना पड़ेगा। कितना सुकून रहेगा। 

दिसंबर 07, 2014

बिछी हुई चादर

वहाँ उस लोहे के दरवाज़े के पीछे उनकी दुनिया थी। इस बड़ी सी दुनिया में एक छोटा सा पता। बड़े लड़के की शादी अभी हुई थी इसलिए घर थोड़ा और छोटा हो गया थी। उनके इस एक कमरे वाले घर के बीचोबीच एक दरी बिछी हुई थी। जब कभी किसी मेहमान के आने की आहट होती, वे लोग कोई धुली सी साफ़ सी चादर डाल देते। इसके कई फ़ायदे होते। एकतो उस दरी के फटे होने की बात छिप जाती, दूसरे इससे मेहमानों और मेज़बानों दोनों के सौंदर्यबोध का भी पता चलता रहता। जिससे प्राप्त ज्ञान का उपयोग वे अगली खरीदी जाने वाली चादर के संदर्भ में किया करते। फ़िर बात बोझिल हो जाने की स्थिति में एक विषय हमेशा उपलब्ध रहता, बिछी हुई चादर।

दरी पर बैठे मेहमान अक्सर खिड़की की तरफ़ मुँह करके बैठा करते। उनकी रुचि सामने लगी गुलमोहर के पेड़ में बिलकुल भी नहीं रहती। न उन्होने कभी आम या अशोक के पेड़ों पर बात करना उचित समझा। वे धीर-गंभीर साहित्य अनुरागी न थे और न ही अतिसक्रिय पर्यावरणविद्। वे इस घर में रहने वाले साधारण से लोगों से मिलने साल-दोसाल पर आने वाले गाँव से आए हुए अतिसाधारण लोग हुआ करते थे। खिड़की की तरफ़ देखना उनकी मज़बूरी थी, जिसका दूसरा अनुवाद इक्कीस इंच के रंगीन टीवी के रूप में वहाँ हमेशा मौजूद रहता था।

वहीं, खिड़की के बगल बिन दरवाजे वाला एक इटिया दिवार से घिरा गुसलखाना था, जो नहाने के साथ-साथ बर्तन धोने के काम आता। नहाते भी घर वाले थे और बर्तन भी घर वाले धोते थे। यह अकथित था पर उसका इस्तेमाल मेहमानों को हाथ धोने के अलावा किसी और स्थिति में तबतक करने नहीं दिया जाता था जबतक कि उनमें भी कोई स्त्री शामिल न हो। रसोई को लेकर ऐसे अलिखित उपबंध नहीं थे। वे नहा लेने के बाद उसका यथोचित प्रयोग करने के लिए स्वतंत्र हैं। उन्हे इसके लिए कहीं बाहर नहीं जाना। जहाँ दरी का पश्चिमी छोर ख़त्म होता है, बिलकुल वहीं से रसोई की सीमाएँ प्रारम्भ होती हैं। इसे इस तरह भी कहा जा सकता है कि वह अपने एकएक पैर के साथ किचन और लिविंग रुम दोनों जगह मौजूद रह सकती हैं। उन्हे किसी भी बात को सुनने के लिए किसी भी दिवार से कान लगाने की ज़रूरत नहीं थी। यहाँ दीवारें नहीं है, उनके कान तो दूर की बात थी। इस तरह यह परिवार में स्त्रियों की लोकतान्त्रिक स्वतंत्र भागीदारी सुनिश्चित करता रहता। घर एक कमरे का है तो क्या हुआ इसकी सैद्धांतिकी कितनी मज़बूत है।

इस रसोई में ही कभी एक लकड़ी की छोटी सी अलमारी थी। घरवालों को भी नहीं पता था वह किस लकड़ी की बनी थी। पर सब उसका इस्तेमाल पता नहीं पिछले कितने सालों से उसी तरह मिलकर कर रहे थे, जैसे दिवार में चुनी हुई दो ताखों वाली अलमारी उन सबकी अलमारी थी। बस इनका खुलना किसी तहख़ाने के खुलने की तरह होता। साल दो साल में एकबार। जब अंदर रखी कोई चीज़ याद आ जाती तब। या ठंड के दिनों में स्वेटर निकालने को होते तब। दोनों भाई इसका इस्तेमाल अपनी डिग्रियों को चूहों से बचाने के लिए करते। जैसे कुतरी हुई क़मीज़ किसी काम की नहीं होती वैसे ही इस कागज को भी कोई नहीं पूछता था। दोनों भाइयों का इस परिवार की तरह लोकतन्त्र में पूरा विश्वास था और इस लोकतन्त्र के पास उन दोनों भाइयों को देने के लिए नौकरियाँ कुछ कम थीं। वह दोनों एकदूसरे की तरह पैरों में पैरागॉन की चप्पलें पहने बेरोज़गार घूमा करते। वह घिसती कम थी और चलती जादा थी।

शादी इन्ही में से बड़े लड़के की हुई थी। आस-पड़ोस की तरह घरवालों का भी मानना था शादियों के बाद अक्सर नौकरियाँ लग जाया करती हैं। इसलिए सब अधीर थे। और इंतज़ार करने के मूड में नहीं थे। सबकी तरह लड़का कुछ सोच नहीं पा रहा था, उसे क्या करना चाहिए? लड़की भी नहीं सोच पा रही थी उसे क्या करना है? इस कारण किसी ने भी शादी को और स्थगित करना उचित नहीं समझा। सब इसी उद्घोष के साथ बारात में शामिल हुए कि इस नहीं तो अगले साल नौकरी लग ही जाएगी। शादी जनवरी में हो गयी है, अब सब बारात से लौटकर नौकरी के इंतज़ार में हैं। इसतरह सब एकबार फ़िर अधीर हुए जा रहे थे। इसबार उनकी बेताबी लगातार अपने रूप बदलती जा रही है। वह किसी भी इच्छा के आकार लेकर कभी भी कहीं से भी उछलकर बीच दरी पर आ सकती थी।

आज घर में दरी पर नयी चादर बिछी है। घर की बड़ी बहू आ रही है। लड़का सोच रहा था, उसके पास सिर्फ़ एक रज़ाई है।

नवंबर 22, 2014

राकेश: इसबार जाने के बाद

हम सब सपनों में रहने वाले लोग हैं। सपने देखते हैं। और चुप सो रहते हैं। उनमें कहीं कोई दीमक घुसने नहीं देते। बक्से के सबसे नीचे वाली तरी में छिपाये रहते हैं। कहीं कोई देख न ले। उसमें किसी की बेवजह आहट कोई खलल न डाल दे। सब वैसा का वैसा बना रहे जैसे सपनों में देखा है। अनछुआ। अनदेखा। रात बाग में दुधिया चाँदनी रौशनी में इन ठंडी हो गयी घास के तिनकों में अरझी हुई ओस की बूँद की तरह नंगे पैरों से छू जाती हों जैसे। इस सपने में कहीं कोई भी चीज़ इधर से उधर नहीं है, सब अपनी जगह हैं। उनका ऐसे होना दिल की धड़कनों में होती आवाज़ में सारंगी की बेकरार धुनों का मिल जाना है। किसी अधूरे ख़्वाब की टीस किसी तस्वीर में छिपी मुस्कान से बाहर निकलती जाती है।

उन पन्नों का पीला पड़ते जाना मेरी कनअँखियों से छिप नहीं पाता। तब मैं उठता हूँ। रज़ाई से निकलने का मन नहीं होता, तब भी निकलना ज़रूरी है। पिछली बार ऐसे ही रात खिड़की खुली रह गयी होगी। वहीं से कुछ ख़याल ऐसे ही कमरे में बिखरे रह गए थे। कटोरियाँ भर गईं थी। गिलास भरभर हम इन्हे ही पी रहे थे। थालियों में तुम्हारी रोटियाँ नहीं थी, यही अनछुए ख़याल रह गए थे।

राकेश  इसबार बिन कम्बल लिए ही छिंदवाड़ा से चल पड़ा। मुझे याद नहीं रहा उसके दिल्ली पहुँचने की तारीख़ पिछली साल की तरह नौ नवंबर है। वह यहाँ इस शहर से अधूरे ख़्वाब लिए वापस लौट गया। तब से कितनी बार यहाँ आया होगा। उसका हमेशा कुछ यहाँ छूटा रह जाता होगा। वह कभी कोशिश नहीं करता कि उस छूट गए पर दोबारा लौट जाए। लौटना इतना आसान नहीं। कितनी ही मासूम सी कल्पनायें उसके मन में दिल में उतरती रहती होंगी। वह कभी जताता नहीं है, कभी कुछ नहीं कहता बस वापस अपनी खोह में लौट जाता है। उसे वही सपनीली दुनिया बुलाती भी होगी पर पलभर भी नहीं ठहरता। आते-आते तबीयत दवाई लेने तक पहुँच गयी। गोल मार्किट, किसी कैमिस्ट की दुकान से कोई गोली ली थी। उसे शायद ऐसे ही सपने से मिलने की तय्यारी करनी थी। जितना बेपरवाह वह ख़ुद को दिखाने की कोशिश करता है, शायद वह उतना है नहीं। हमसब भी जो दिख रहे होते हैं वो होते कहाँ हैं? वह किसी भी तरह दीवार के पार दिखती दुनिया में पहुँच जाना चाहता है। अभी, तुरंत, झट से। जादू की तरह।

यह वहाँ पहुँचने में लगने वाली देरी से पैदा हुई ऊब है, जो हम सबको चिड़चिड़ा कर रही है। कितना मन करता है उड़कर वहाँ पहुँच जाएँ। ऊपर से यह दुनिया कैसी लगती होगी? कितने छोटे-छोटे से दिखते होंगे? हम सब कितनी हड़बड़ी में हैं। पर कोई सुन नहीं रहा। जैसे मेरे सपनों के चाँदनी चौक में आग लग जाये और भाई मतिदास चौक पर कूड़ा उठाने वाली गाड़ी के खराब हो जाने से लालकिले की तरफ़ से आग बुझाने वाली ‘फ़ायर ब्रिगेड’ वहीं फँस जाये। बेतरह हॉर्न की आवाज़ में गालियाँ धीमी पड़ गयी हैं। पर कहीं से कोई रास्ता नहीं सूझ रहा। मेरे सपनों, ख़्वाबों, ख़यालों का गोदाम दिल की बैठती धड़कनों के साथ राख़ बनकर बैठता जा रहा हो। पता नहीं कितने ऐसे ख़याल इन डरों को अपने अंदर समाये घूमते रहते हैं। यह कुछ न कर पाने की छटपटाहट बेचैनी के रास्ते नींद में बदल जाती है। हम एकबार फ़िर वहीं नए सपनों को ढूँढ़ने लगते हैं। उन्हे अपनी नसों में बहते ख़ून से दोबारा बुनने की कोशिश में लगे रहते हैं। और इसतरह वह हमेशा बगल में काँख से नीचे वाले तिल की तरह दिखते रहते हैं।

हम हार नहीं मानते। बस चुप रहते हैं। उन अधूरे सपनों को पूरा कर लेने को कोशिश करते रहते हैं। इधर मेरे मन में दिल में न जाने कितने साल पहले शादी का सपना था। सपने से बाहर मैंने शादी कर ली है। कई सारे सपने उसके साथ चले आए हैं। राकेश बीहू में अपने नए सपने बुन रहा है। बातों-बातों में उसकी फ़ोन पर सुनाई देती आवाज़ कहीं न कहीं उन अधबुने सपनों की नयी फ़ेहरिस्त की तरह है। यह हमारे सपनों से आगे के सपने हैं। आशीष की बिटिया भी उसके सपनों के साथ-साथ बड़ी हो रही है। हमसब अपने सपने ‘रिन्यू’ करवा रहे हों जैसे। उनके नए बने रहने में ही हम भी बने रहेंगे। वह हमारे अंदर साँस लेकर बड़े होते रहेंगे। उनके साथ हम भी चलते रहेंगे। आहिस्ते से, धीरे से। और ऐसी कितनी छोटी-सी मुलाक़ातों में हमारी बातें वापस आती रहेंगी।

यह एक फ़िलर पोस्ट है। इस तरफ़ अचानक दोपहर ध्यान गया कि बीते इतवार भी नौ नवंबर थी। पूरे एक साल बाद वह दोबारा दिल्ली में था। इसबार सिर्फ़ एक दिन के लिए। जब दोस्त दिल्ली से चले जाते हैं, तब ऐसे ही लौटते हैं। कम दिनों की किश्तों के साथ। यादगारी के लिए पिछले साल की आवाज़ लगा रहा हूँ। इसकी तारीख़ दोबारा, नौ नवंबर। ध्यान से, आराम से, अकेले में सुनना। 


नवंबर 20, 2014

एक अकेला शहर में..

अकेले खाली कमरे में बैठे रहने का सुख  क्या होता है, इसे भरे हुए लोग कभी नहीं जान पाएंगे। उनकी उन दिवारों पर घूमती छिपकलियों से कभी बात नहीं होगी। वे कभी अकेले नहीं होना चाहेंगे। वे कभी छत से झड़ते पलस्तर को ‘स्लो मोशन’ में देख लेने वाली आँखों वाले नहीं हो सकते। उनका बुरादे की तरह झड़ना किसी याद के वापस आने की तरह है। मैं यहाँ इस छतवाले कमरे में बैठकर इसी तरह बनता रहा। यह अकेलापन मुझे डराता नहीं है। जब कभी दिन बीते यहाँ नहीं आपाता तब अंदर से किसी ततईया के डंक से परेशान भागता रहता हूँ। आलोक पता नहीं फ़िर क्यों उस रात फ़ोन पर मेरे इस ‘अकेलेपन ’ को दोहरा रहा था। उसे मेरे अंदर ढूँढ़ रहा था । यह शायद उसकी समझ और मेरी समझ में कुछ मूलभूत अंतर के कारण रहा होगा। यह हमारे ज़िंदगी जीने के तरीके अलग-अलग तरीकों से हमारे अंदर  निर्मित होता होगा।

आज मैं चाहकर भी इसपर बात करने के मूड में नहीं हूँ। मूड नहीं है, फ़िर भी हट नहीं रहा। बैठा हुआ हूँ। मेरा अकेलापन अस्तित्ववादियों की तरह पूंजीवादी समाज में उत्पादन प्रणालियों में परिवर्तनों के बाद उपजी इन नगरीय संरचनाओं के भीतर दिखता भले हो लेकिन यह कहीं-न-कहीं ‘एकान्त’ के निकट अधिक है। मेरे पास भाषाविज्ञान की किसी विशिष्ट शाखा का ज्ञान नहीं है, जिसके बाद इनदोनों ‘शब्दों के चिह्नशास्त्र’ को पढ़कर इस अंतर को रेखांकित कर सकूँ। यह बस सतही समझ का फेर है, जो मुझे, मेरे भीतर इस खाली जगह को इसतरह भरता है। यह सच है कि इस जगह को लगातार व्यक्तिगत या निजी बनाता गया, फिर भी यह उसमें मेरे भावबोध समाजिकता या किन्ही अन्य भूमिकाओं के प्रति किसी भी किस्म का नकार नहीं दिखता। न किसी रूप में प्रकट करता है। यह एक सीमा तक ‘उदासीनता’ के रूप में भले दिखे पर उन बाहरी परतों की छवियों के बाद उसमें ऐसे किसी तत्व की उपस्थिति को नहीं देखा जा सकता। और अगर कुछ दिखेगा भी तो उसे इसतरह नामित नहीं किया जा सकेगा।

सब एक साँचे में ढलते हुए भी एक जैसे नहीं हो सकते, और चूँकि हम भी सबकी तरह एक चेतन प्राणी है, तब उनमें न दिख रही अदृश्य विविधताएँ, उन्हे एक जैसा बनाए जाने की सारी प्रक्रियाओं को ध्वस्त करती चलेंगी। पर यहीं इसी बिन्दु पर सबसे जादा संभलकर चलने की ज़रूरत होती हैं। जहाँ समाज, संस्कृति, राष्ट्र, परिवार, परिवेश, वातावरण भिन्न-भिन्न होने के बाद, जो बड़ा दायरा होता है, वहाँ की वृहतर अस्मिताएं, उन्हे अपने द्वारा सम्पन्न कराये जाने वाली भूमिकाओं से परिचित ही नहीं करवाएँगी अपितु अपेक्षाएँ भी रखेंगी। तभी हमारी आदतें, इच्छाएँ, भावनाएँ, प्रेम, स्वाद, स्पर्श सबकुछ इकहरा होता जाता है। हम इस समाज में खुद को व्यवस्थित करने की कोशिशें करने लगते हैं। हम हम नहीं रह जाते, कुछ और हो जाते हैं। तब हमारा स्वतंत्र अस्तित्व कुछ नहीं रह पाता। वह इस समाज में विलीन हो जाता है। यह उसमें चीनी के बजाय नमक की तरह घुलना है।

ऐसा नहीं है कि ऐसी स्थिति में प्रतिरोधी स्वर नहीं उठते। न मैं यह कह रहा हूँ कि मेरी तरफ़ से ऐसी कोई सुचिन्तित कोशिश कभी की गयी थी। फ़िर भी अगर आज भी तुम्हें लगता है कि यह एकान्त रचनात्मक न होकर अकेलेपन की त्रासदी लिए हुए है; वहाँ चेखव की कहानियों का संत्रास है या मोहन राकेश के ‘अँधेरे बंद कमरे’ वाले ‘मेटाफ़र’ जैसी कोई बात है, तो दोस्त, तुम्हें उसे कहना चाहिए। मुझे भी पता चले वह क्या है, जो मेरे सामने होते हुए भी मुझे दिख नहीं रहा। मेरी वह कौनसी छवि है (?) जो इतनी स्पष्टता से मेरी इस व्याख्या को ख़ारिज कर रही है। इतने दिनों में एक छूटी बात यह समझ में आती लग रही है कि मेरे इसतरह ‘आत्मकेन्द्रित’ होते जाने की वजह से बाहर कुछ दिखाई भी नहीं देता। जो कुछ भी है वह मेरे भीतर से बाहर जा रहा है। जिन बातों को लिख नहीं पाता उनके संदर्भ में यह भी दिखता है वह प्रत्यक्षतः मुझसे जुड़ी हुई नहीं होती। यह किसी तरह के व्यक्तित्व के रूप में गढ़ रही हैं (?) उससे मेरी किस तरह की छवि प्रसारित हो रही है, उसपर बिन सोचे कहने की आदत में कुछ बदलाव की ज़रूरत है।

इसबार तुम बड़े आश्वस्त हो कि अब लिख दोगे। मैं भी इंतेज़ार कर रहा हूँ। देखेँ तुम कब कहते हो।

नवंबर 19, 2014

बातें बे-वजह

वह अचानक एक पोस्ट में ख़ुद को पाकर  हैरान रह गया। उसकी हैरानी को डर में बदलते देखने का एहसास किसी भी तरह से रोमांचित नहीं कर रहा था। वहाँ उसका नाम नहीं था, बस कुछ इशारे थे। बहुत बारीक-सी सीवन उधेड़ते सब उसे देख लेते। यह कैसा होता होगा, जब कोई हमारे बारे में लिखने के लिए सोचता होगा? उसके सामने हमारी कौनसी छवि जा रही है, जिसे वह अपने यहाँ रख लेगी। प्यार करना भी कुछ-कुछ इसी तरह की बातों से भर जाना होगा। हम कहना चाहते हैं, पर कह नहीं पाते। हम इतनी पास हैं कि छूकर उस चेहरे को हमेशा के लिए अपने अंदर छिपाये रख सकते हैं। पर वह छुअन अजीब-सी सिहरन बनकर हमारी बाँछों से शुरू होकर काँखों के बालों में जाकर सिमट जाती है। इसे वहीं पसीने की दुर्गंध में उलझना भी कह सकते हैं, जो सस्ते डीओ के इस्तेमाल के बाद उपजी होगी। उसके चौबीस घंटे तक असरदार रहने के दावे हमारी तरह ही धराशाही हो चुके होंगे।

यह तकलीफ़ उस लड़की की भी है। वह दिल्ली से एमए हिन्दी  का रही है। एक शराब पीने वाले पिता की बेटी के इस कोर्स में दाख़िला लेने की सूचना को और किस तरह से लेना चाहिए? समझ नहीं पाता। वह सिलेबस में लगी कहानियों में ख़ुद को गुम कर लेगी। वह भी मन्नू भण्डारी की तरह ‘मिराण्डा हाउस’ में पढ़ाने के सपने बुनेगी। उसे भी राजेन्द्र यादव के साथ ‘एक इंच मुस्कान’ की तरह कोई अभिनव प्रयोग करना है। इसके लिए वह भरपूर कोशिश भी कर रही है। उन छूट गयी कक्षाओं में पढ़ाई गयी पाठ्यसामाग्री को उसकी एक अच्छी सहेली सहेजकर फ़ोटोकॉपी वाले भईया के पास हिदायत के साथ छोड़ जाती। वह इलाहाबाद से आए लड़के के साथ कभी रिज में उस विद्यापति को लिखने के लिए सामाग्री उपलब्ध करती, तो कभी घनानन्द किन्ही बरसात वाली सुबहों को विचलित मन के साथ अपने जिगरी दोस्त के कमरे पर उसके इंतेज़ार में दाल, चावल, रोटी बनाकर सो चुके होते।

उसकी बहन लक्ष्मी नगर से अपनी कोचिंग खत्म करने के बाद वापस लौट रही है। दिल्ली मेट्रो ने इस तरह से भी शाहदरा को जोड़ा है, वह दिख जाता है। वह यमुना बैंक पर उतारने वाली है और घंटा-डेढ़ घंटा अपने बॉयफ्रेंड के साथ वहीं बातें करके घर लौटेगी। ऐसा उसने मन में सोचा और बगल में खड़ी अपनी सहेली को भी बताया। एक सस्ते से मोबाइल फ़ोन को हाथ में समेटे वह अपनी सहेले के साथ खड़ी है। बैठने की कोई सीट नहीं है। तभी मुड़ी गर्दन के साथ यह सब देखते-देखते उसका फ़ोन घरघराया। अगर घंटी बजती तो पता नहीं कौनसी रिंगटोन होती? शायद हनी सिंह के किसी गाने की यह परसो बीते छठ वाली शारदा सिन्हा की आवाज़ में कोई लोकगीत सुनाई देता। अब प्लान में थोड़ा चेंज है। तुम मुझे उस पार्क में ले जाओगे न, मुझे पता है। इतना कहकर वह फ़ोन रख देती है। अब वह इंद्रप्रस्थ स्टेशन पर उतरेगी। वहीं कोई पार्क भी है, पास में। ऐसा उसने कहा और चुप हो गयी।

ऐसी कितनी ही कहानियाँ उसके दिमाग में  घूमती रहती हैं। पर वह उन्हे कह नहीं पाता। उन्हे समेटते-समेटते मन कहीं और भागने लगता है। यहीं उसे अपने दोस्त की कही बात याद आ जाती है। वह अकेला है, वह उसे बार-बार याद दिलाता। पर उसे नहीं पता कि वह जितना कहता है, उससे कई गुना नहीं कहता। उन्हे कह देना वह ज़रूरी भी नहीं समझता। वह बस उसकी यह बात सुन लेता। ऐसे सुनकर वह चुप सा कहीं छत पर बनी किसी बरसाती में इस बड़े से महानगर की भीड़ में गुम रह जाता। कोई उसे जान नहीं पाता। कोई ढूँढ नहीं पाता। कि जिससे हम कल मिले थे, उसने हमारी थोड़ी-सी ज़िन्दगी चुराकर, हमें कहीं लिख दिया है। वह उसकी कही हरबात में छिपे हैं, दिख रहे हैं। लेकिन इसतरह वह अपने उस दोस्त को कैसे बताए, इतने सारे लोगों के साथ रहते हुए वह अकेला कैसे है? वह कभी नहीं बोला। वह कभी उसे समझा नहीं पाया कि किसी खाली कमरे में बैठे रहने का सुख क्या है ?

नवंबर 15, 2014

मेरे अंदर अधूरी अदेखी कहानी का सपना..

मैं एक कहानी लिखना चाहता हूँ। पता नहीं यह कितने साल पहले मेरे मन में आई बात है। यह कहानी सात आठ साल से मेरे अंदर ही अंदर खुद को बुन रही है। वह कभी बाहर नहीं आ सकी। उसे कभी लिख नहीं सका। मुझे लगने लगा कहानी लिखने का हुनर मुझमें नहीं है। मैं, जिसे कहानी कहते हैं, उसे बरत नहीं पा रहा। कभी इतने धैर्य के साथ मुझमें बैठने, एक ही प्लॉट पर रुके रहने का एकाकीपन मेरे अंदर है, पर उन्हे टुकड़ों-टुकड़ों में कह देने की जल्दबाज़ी उन्हे कहीं डायरी के पन्नों में कई सारी कहानियों को समेटे हुए होगी। यह हमारे समाज की संरचना का विखंडन भी है। जिस तरह उमर बढ़ने के साथ-साथ हम जिन नगरीय गतिकी के भीतर अपने बीतते सालों में एक-एक दिन की ऊब से बाहर निकालने की जद्दोजहद में, उन सब बातों को समेट पाने के लिए जिन ज़रूरी बातों की ज़रूरत होती होगी, वह मेरे दिमाग मेरे दिल से गायब हैं शायद। उस तरह मेरे अंदर कई सारी बातें एकसाथ गुजरती तो रहती हैं, पर उन्हे बुनने वाले रेशम के धागे नहीं हैं। उन्हे कह देने की जल्दबाज़ी में कई बातें ऐसी भी होंगी, जो वहीं कहीं पीछे दबी रह जाती होंगी, कभी दिख नहीं पाती। यह मेरे दिल की धड़कन की कोई परत रही होगी शायद। चमकीली-सी। आँखें चुंधिया देने वाली।

फ़िर जब मनोहरश्याम जोशी  को पढ़ना शुरू किया, तब दिल को दिलासा दिया करता। सोचता, मेरे पास अभी भी कुछ वक़्त है। हमारे लिखने का वक़्त भी आएगा। उनकी पहली कहानी तीस पार कर जाने के बाद लिखी गयी। कभी हम भी उस कतार में खड़े होंगे। हम भी कभी कसप  लिखेंगे। मुंगेरी लाल के हसीन सपने देखते रहे। इधर दिख रहा है, तीन महीने बाद हमारी उमर तीन दशक की हो जाएगी। और इन सारी बातों का हासिल एक अधबुनी अधूरी कहानी भी नहीं है। इतना होने पर भी मुक्तिबोध  ने बहुत सहारा दिया। वह जैसे मेरे लिए ही एक साहित्यिक की डायरी  में रचना प्रक्रिया के तीन क्षण बताते हैं। अभी किस क्षण तक पहुँच पाया हूँ, हमेशा यही सोचता रहता। अभी दिवाली पर अपने एमए के नोट्स में एक पुर्ज़े पर कुछ लिखा मिल गया। तीव्र अनुभूति के बाद दूसरा चरण है, उसे अंदर-ही-अंदर उमड़ने घुमड़ने का अवसर। वह किस हद तक अपना मूल स्वरूप खो देता है? प्रकट होने पर कैसा दिखता है? पता नहीं शायद उन्होनेकॉलरीज़ का कल्पना सिद्धान्त इस तरह समझा होगा। मैंने शायद इस बिन्दु पर दोनों को मिला दिया हैं।

सालों बातें छिपाये रखने में माहिर हूँ। कभी कहता नहीं। पर जबसे यह ब्लॉग मिला है, तब से मन के एक कोने में इसका दख़ल बढ़ गया है। जब कभी थोड़ा भी भारी महसूस होता लूस शटिंग करने यहाँ बैठने लगा। इसने न जाने मेरे हिस्से की कितनी बातें अपने अंदर छिपाये रखी हैं। यह छिपाना छिपाने की तरह नहीं है। ख़ुद मुझे नहीं लगता कि वह सब कहने के लिए किसी हिम्मत की ज़रूरत है। यह डर अपने आप सृजित किया गया भय है। जिसका मूल्य शून्य है। वह बस भावातिरेक है, जो किसी भी बात को उन गहराईयों से बाहर निकाल लाता है। वहीं कहीं भीतर एक बात यह भी लगती रही कि दरअसल यह मेरे दिल के पन्ने हैं, जिन्हें कुछ क़तर-ब्योंत के बाद यहाँ बेतरतीब रखने लगा। इनका बेतरतीब होना मेरा मन का बिखर जाना है। इन्हे साथ-साथ रखने पर दिखने वाली तस्वीर, किसी खो गए शहर में किसी गुम हो गयी आवाज़ की तरह होगी। इन बिखरे हुए टुकड़ों को एक साथ रखने के बाद यह कृति कुछ-कुछ ऐसी बनती दिख रही है, जैसे नेकचंद जी ने किसी टूट गए क्रॉकरी सेट से कोई कामचलाऊ टी-सेट बना लिया हो। जिसमें मेहमानों के लिए चाय डालने पर चाय चाय नहीं रह जाती कुछ और हो जाती है। फ़िर भी वह उसे चाय समझकर पी जाते हैं।

पर लगता है मेरा मन ऐसा पात्र नहीं है। इसका मिक्सर-ग्राइंडर काम नहीं कर करता। पता नहीं कितनी भारी शामों में संजीव सर को फोन पर कितनी तरहों से अपने अंदर गुजरने वाले इन क्षणों की बेचैनी को बताता रहा हूँ। कभी ऐसा नहीं हुआ के उन सारे खाली एकांतिक अवकाशों में उन अधूरी बातों को कातकर कोई मुकम्मल शक्ल दे सकूँ। वह किसी बिछौनी की तरह भी काम में नहीं आती। गुदड़ी बनाए जाने लायक सिलाई भी नहीं कर पाता। बस उन सारी उलझनों में उलझकर रह जाता हूँ। कुछ कर नहीं पाता। थोड़े दिन इन्ही बातों में ख़र्च हो जाते हैं। कुछ जो मन में होता है वह इस रास्ते से बाहर निकल आता है और जिसे यहाँ नहीं कह पाता, वह चिलपर्क या पार्कर कुइंक की नीली स्याही में डूबकर कागज़ पर उतरते रहते हैं। इसतरह एकबार फ़िर अपने मन को मना लेता हूँ कि अभी थोड़ा और वक़्त बचा है। थोड़ा और लिखना अभी बाकी रह गया है। अभी तो सही से लिखने की तहज़ीब सिखनी है। फ़िर सोचता हूँ, यह सब बहाने हैं। अंदर से मुझे पता है, वह कहानी कभी बाहर नहीं आ सकेगी। मैं उसे ऐसे ही याद करता रहूँगा। वह मेरे अंदर ऐसे ही बनती बिगड़ती रहेगी। कोई धागा ऐसी ही चटककर यहाँ छिटक आएगा। मैं एकबार फ़िर फ़ोन उठाऊंगा और उन्हे फ़ोन करूंगा। और इसतरह यह सारी बातें एकएक कर मेरे अंदर अपने आप फ़िर से घूमने लगेंगी।

फ़िर ऐसे ही एक ठंडी-सी दोपहर होते-होते यह सारी बातें मेरे अंदर एक चक्कर लगाकर ठहर जाएँगी। मैं फ़िर कुछ नहीं कर पाऊँगा।

नवंबर 12, 2014

ठहरे हुए दिन..

नवंबर आ गया है और कल से ठंड भी कुछ बढ़ गयी है। कश्मीर में बर्फ़ गिरी है। बर्फ़ इंडिया गेट पर उतनी ही अजीब होगी जैसे कि कल एककाँग्रेसी नेता के अपनी लड़कियों को बोझ बताने वाले हलफ़नामे पर रोष प्रकट करते राम माधव थे। इधर कई दिनों से गायब था। बीच में कईबार लौटने की कोशिश भी की। पर तीन-चार जगह हाथ-पैर बझाए रहने के बाद धीरे-धीरे यह समझ आता रहा कि ऐसे काम नहीं चलेगा। कई अधूरे ड्राफ़्ट अधूरी बातों की तरह डैशबोर्ड में पड़े हैं। कभी-कभी लिखने का इतना मन करता है कि गति से आते ख़यालों को उसी अनुपात में उतनी ही तीव्रता से कह पाता। यह ऐसी स्थिति है जिसमें दिमाग भले खाली लगता हो पर असल में वह इतना भारी होता है कि कुछ करने लायक नहीं रह पाता।

कुछ-कुछ वैसा ही जैसा कि हम बिलकुल नए तरीके से सोचना चाहें, उस सोचे हुए अजाने ख़याल को ऐसी भाषा में लिखना चाहें जो हमने भी कभी इस्तेमाल न की हो। उसे कहने के लिए घण्टों एक-एक शब्द पर ठहरते हुए आगे बढ़ने की कोशिश करना। पर हरबार ‘दिवाल’ पर टंगी घड़ी की तरह हम भी हर बारह घंटे बाद ‘खुद बखुद’ वही वक़्त दोहरा रहे होते हैं। उस दोहराने में दिन बदलता है, तारीख़ बदलती है, साल बदलता है, पर हम कहीं उन्ही बासी उबासी लेते, सोये हुए मुँह की तरह बदबू से भरे रहते हैं। इस गंध के हम इतने अभ्यस्त हो जाते हैं कि यह हमारे बचपन से चलकर हमारी जवानी से लेकर बुढ़ापे तक हमारे साथ रहती है और हम कस्तुरी मृग की तरह अपनी नाभि में समाई गंध को ढूँढ़ने की कोशिश नहीं करते। बस भटकते रहते हैं। 

यह भाषा में निर्मल वर्मा हो जाना नहीं है। न विनोद कुमार शुक्ल की तरह होते रहना है। यह ख़ुद में ख़ुद की तलाश है। कहीं कोई गुमशुदा तलाश केंद्र, नयी कोतवाली नहीं है, जहाँ कभी पाल गोमरा का स्कूटर दिख जाएगा। हम बस हैं। यहीं हैं। कहीं जा नहीं रहे हैं। इन बीतते दिनों में यह मेरी ऊब से बचने की कोशिश है, जो मेरे भीतर से निकाल कर मेरे व्यक्तित्व पर छा गयी है। असल में ऐसा कुछ भी न हो, पर लिखते समय इस पंक्ति में मुझे ढक लिया हैं। मैं किसी ‘इंटरव्यू’ में अयोग्य घोषित नहीं होना चाहता। उन सारी अनकही प्रेमिकाओं को फ़िर अपने अंदर से बाहर निकालते हुए सब बताना चाहता हूँ। उनसे प्रेम करते रहने में मुझे अयोग्य नहीं होना। नहीं चाहता कि एक कमरे वाले घर से एकएक कर सब चली जाएँ। पर किसी भी बहाने से रोके भी नहीं रहना चाहता।

यह किसी शैली में लगातार लिखते रहने की छटपटाहट भी हो सकती है, जिसे इस रूप में कभी प्रकट नहीं कर सका। हो सकता है यह किसी और विधा में जाने से पहले का अवकाश हो। या कि एक तरह से उन सारे इकहरे अनुभवों को दोहराते रहने से कोई फेंच अंदर तक गड़ी रह गयी हो। सोचता हूँ, इसी तरह से लिखते रहने के बाद भी मेरे पास बहुतकुछ बचा रह गया है। उस बचे हुए सामान को टाँगने वाली अलगनी, उन्हे ऊँचे कहीं रख देने वाले ताखे, कहीं पंखे की जगह उन छत से बंधे सिकहर पर पतीली में दूध के बगल कितनी बातें रख देने की सहूलियतें होंगी। दिल के दिल बने रहने के लिए ज़रूरी है, उनका बाहर आते रहना। उन्हे आने के लिए, उस पर चलने के लिए शायद मढ़हा तान रहा हूँ। हो सकता है कुछ भी निकल कर सामने न आ पाये। या हो सकता है इस संक्रमण काल में कुछ संधियों, समासों, कारक चिह्नों के बाद कोई मेरे इंतज़ार में वहीं खपरैल वाले आँगन में मिल जाये।

और आख़िरी में एक नोट यह कि ग्यारहवीं या बारहवीं पंक्ति में आए हुए ‘दिवाल’ और ‘खुद बखुद’ मुक्तिबोध की किसी याद नहीं आ रही कविता से हूबहू उड़ा लिए गए हैं। इसे यहाँ लिखने से पहले हम भी दिवार नहीं बोलते हैं, पर शायद अमिताभ बच्चन का कोई प्रभाव बचपन में अवचेतन पर पड़ गया होगा। शायद इसलिए बोलते हुए भी कभी लिखा नहीं। बाकी सब वैसा ही है। वैसे सच कहूँ तो यह इतने दिनों पर पर्देदारी है। बहुत सारी बातें हैं, जिन्हे फ़िर कहूँगा। कभी। या ऐसे ही बहानों में उन्हे छिपा ले जाऊँगा।

'पाल गोमरा 'वाले उदय प्रकाश  पर तीन ज़रूरी पन्ने: संजीव कुमार, प्रियदर्शन, अरुण माहेश्वरी

यह त्वररित समय है, जैसे कि यह पोस्ट ख़ुद। 
जिस दिन लिखी गयी, उसके चौबीस घंटे से भी कम वक़्त में अगली सुबह हिंदुस्तान में थी। इसतरह यह तारीख़ हुई तेरह नवंबर, 2014। नाम वही, ठहरे हुए दिन। आज देखा, परसो पंद्रह नवंबर, शनिवार, ट्रिब्यून में भी यह पोस्ट आई है, ठहरे हुए दिनों की बात.

अक्तूबर 18, 2014

ऐसे ही बीच में, अनमने

कभी-कभी हम वहाँ होना चाहते हैं, जहाँ हम नहीं होते। जैसे इधर। इन दिनों। कहीं फँस गया हूँ। निकल नहीं सकता, ऐसा नहीं है। पर ऐसा ही है। निकल नहीं सकता। यह ऐसी स्थिति है, जिसे जितना समझता हूँ, उतनी ही उलझती जाती है। उलझना किसी पतंग के साथ नहीं। उन उँगलियों में स्वेटर बुनने की तरह भी नहीं। यह कुछ अजीब-सा है। अटपटा लगता है, पर समझ नहीं आता, क्या अटपटा है? शाम धीरे-धीरे ढल रही है। अचानक दिवाली से पहले हवा में ठंड तैरने लगी है। इन शामों में घूमने नहीं निकल सका। पर कहीं-न-कहीं हरसिंगार के फूलों की महक  हर शाम बिखर रही होगी। उसके रूमान में डूब जाने से पहले बाहर निकलना ज़रूरी है। ज़रूरी है उन बने बनाए ढाँचों से अलग हो जाना।

ऐसा कर लेना, किसी ‘फोल्डर’ में अपने इतने सालों में कमाई डिग्रियों की ‘फ़ोटोकॉपी’ देख लेने जितना आसान नहीं है। उसे जुटाने में, उनमें गायब परिवार की छवियों का न होना, सबसे बड़ा छद्मावरण है। जिसकी ओट में हमसब केवल ख़ुद को उसका दावेदार बताने लग जाते हैं। वहाँ सिर्फ़ हमारा नाम है। और हमारे नाम में कितने बिम्ब, उन चारदीवारों के बीच सिमटकर रह जाती हैं। यह सब वैसे ही नहीं दिखती, जैसे नहीं दिखती हैं हमारी आती-जाती साँसें । उन फेफड़ों के सिकुड़ने की प्रक्रिया। उनमें सोखती-एकाकार हो जाती हवा। यह कहीं किसी दफ़्तर में घड़ी के पाँच बजने जैसी यांत्रिक क्रियाओं का दैनिक समापन नहीं है। हम सब जैविक रूप से इन आसपास की गुंफित हो गयी परिस्थितियों में घिरकर रह जाने वाले अदने से जीव बने रहते हैं। ऐसे ही किसी एक दिन उन सारी दोहरायी जाने वाली बातों को स्थगित कर कहीं भाग नहीं पाते। खाना, भूख न लगने से आगे जाकर कभी मन न होने वाली हालत में नहीं पहुँच पाती। घड़ी में साढ़े आठ बजते ही थाली दिखने लगती है। दिखते-दिखते गायब हो जाती है।

सब कितना उबाता है। ऊब बन कर हम पर छा जाता है। जीभ का स्वाद मौसम के साथ बदलने से पहले ख़ुद को कहीं छिपा ले जाता है। जैसे किसी तीमारपुर रहने वाली लड़की के न बोलने पर हमारा माधव गुमसुम सा अगले दिन होने वाली ‘प्रेजेंटेशन’ में मसरूफ़ होने की कोशिश करता हुआ भी कितना हारा हुआ, असहाय लगता है। यह उसका दूसरा साल है। हो सकता है, अगले साल पता संतनगर बुराड़ी का हो। और इस तरह उसकी ज़िन्दगी से ऊब गायब होकर, कमला नगर ‘उडुपी’ के कुर्सी-मेज़ में धँसे, दोनों की बातें रस से भर जाये। कितनी कशिश है उन दोनों में। एक ख़ुद को प्यार करती हुई महसूस कर रही थी, और जिससे यह भाव, मनः स्थिति जोड़कर इस परिघटना को घटित होते हुए देख़ने की कोशिश की जा रही थी, वह पटेल चेस्ट क्रिश्चन कॉलोनी के सामने, मॉरिस नगर थाने में छेड़छाड़ की एक ‘एफ़आईआर’ में तब्दील होकर सड़कपार कब्रिस्तान में दफन हो गयीं। मर गयी।

लड़के, तुम्हें आगे बढ़ना होगा। जिसे कहते हैं, ‘मूव ऑन यार’! उस ‘आर्ट्स फ़ैकल्टी ’ में कुछ नहीं रखा। दो साल बाद एमए करने आओगे तब  लड़कियों को लाइन लगी हुई मिलेगी। ये दिल्ली है मेरे बच्चे। जहाँ एक तो छूट गयी बस के पीछे कभी मत भागना और न कभी हाथ से निकल गयी लड़की के पीछे हाथ धोकर पड़ना। देखना एक दिन आएगा जब, ये दोनों तुम्हारे आगे-पीछे घूमती फिरेंगी। बस वहाँ दो एक दोस्त ऐसे रखना, जो मौका पड़े, खाली कमरे की चाभी  देने में देर न करें। बात किसी से ज़बर्दस्ती की नहीं है। सब तय्यार हो जाते हैं। बस अपना मन बनाकर रखना। जैसे मेरा मन तो कर रहा है कि इस ‘लड़के’ से लेकर ‘पिछले पूर्णविराम’ तक सारी लाइन काट दूँ। पर काटुंगा टूँगा नहीं। क्योंकि पता है, वह कभी-न-कभी इस ‘छूने और न छूने के द्वंद्व ’ से ज़रूर गुजरेगा। तब अगर वह वापस अपने को खोजते हुए लौटे, तब ख़ुद को इतने साल पहले यहाँ देखकर हैरान होने के बजाए उसके जवाब को टटोल रहा होगा। हो सकता है जवाब न मिले। पर ज़रूरी है, वापस आना। लौट लौट उन अनसुलझे सवालों पर डट जाना।

वैसे यह सब लिखा पढ़ी उन ख़यालों को कहने में बिलकुल भी सही शब्द विन्यास नहीं हैं। पर कैसे कह दूँ, कितने प्यार से कल उनकी बनाई आलू-टमाटर की सब्जी में शिमला मिर्च के स्वाद के बाद, आज दोपहर, वापस लौटकर खाना खाने का मन नहीं हुआ। या हो सकता है, उसी स्वाद में कहीं गुम सुम सा उसे दोहराने की कोशिश में आज दोपहर टाल गया। यह बहुत स्थूल किस्म की बातें हैं। रुई के पानी में भीग जाने की तरह। उसे सुखाने वाली धूप कहीं नहीं है। इन नुक्तों में कहीं भी कोई बारीक बात नहीं है। आगे भी एक दो भोथरी-सी बातें कहकर रुक जाऊँगा। जैसे ठंड आ जाने के बाद  यह मेरे हिस्से की पहली पोस्ट है। और शक्ल-ओ-सूरत से बिलकुल भी मेरे किसी टाइप में फ़िट नहीं होती। एक टैग बनाया था, मिसफिट रेफरेंस। उसमें न जाने  क्या-क्या भरा पड़ा है? उन्हे कभी मिटाया नहीं। वहाँ कई काम की चीज़ें भी होंगी। क्या करूँ, आदत से मजबूर हूँ। अपने लिखे को काटता नहीं न, इसलिए।

अक्तूबर 12, 2014

सपनों में मेरी किताब की शक्ल..

न लिखना पाना किसी याद में रुक जाना है। इसे टाल देना, उसमें ही कहीं छिप जाना है। लगता है, इधर ऐसे ही छिप गया हूँ। यहाँ न आने के पीछे कई गैर-ज़रूरी बातें रही होंगी। पर उनका होना कतई इसलिए गैर-ज़रूरी नहीं रहा होगा। उनकी कलई खुलते-खुलते देर लगती है, पर पता लग जाता है। इसे स्थगित कर हम आगे बढ़ तो जाते हैं, पर मन उन तक बराबर जाता रहता है। बिन बताए। चुपके से। कितनी अधूरी पोस्ट ‘ड्राफ़्ट में करीने से बिखरी पड़ी हैं। उन्हे देखने का वक़्त न मिलना बहाने बनाना है। असल में यह उस तरह मन के फ़िर न जुट पाने की तरह है। उन भावातिरेकों को अपने अंदर न समेट पाने की कशिश है। इतना होने पर भी हम लिख नहीं पाते। उन बातों तक दोबारा नहीं पहुँच पाते। जैसे किसी याद में सड़क पार सैक्टर-डी की गुलाबी ठंड वाली रामलीला उसके बाद फ़िर कभी नहीं दोहरायी गयी।

मन ऐसे ही गायब रहने लगा है। किसी उदास सीन की तरह ‘फ्रीज़ होकर ठहर गया है। कट टू। हरबार इसी बिन्दु पर पहुँचकर रुक जाना अजीब-सा है। इसे किसी और तरह से लिया जाना चाहिए, समझ नहीं आता। इस ‘मीडियम के ‘फ़ॉर्म बदलने का वक़्त शायद आ गया है। इसे किसी महत्वकांक्षा के रूप में भी विखंडित किया जा सकता है। किसी जगह न पहुँच पाने की टीस की तरह भी देख सकते हैं। और उन सब वजहों, कारणों, बातों की तरह भी जो यहाँ नहीं लिखी जा रही हैं। उनका यहाँ न होना किसी चालक कोशिश का परिणाम भी हो सकता है। कहीं किसी पर्दे की पहरेदारी की तरह। हरबार उनके यहाँ न दिखने की वजह से ऐसा हो जाता हूँ। यह उस अदृश्य पाठक के नज़र न आपाने के बाद भर गया भाव है। मन सोचता है, अगर कोई है भी तो वह किसी भी सकर्मक क्रिया से सम्पन्न संपन्न क्यों नहीं दिखता? वह किसी भी तरह से मुझे पता क्यों नहीं लगने देना चाहते कि वह यहाँ आते जाते हैं। वह अपनी पहचान छिपाये रखने के लिए बाध्य क्यों है? यह हाज़री लगाते, वाह-वाह करते कमेंटों की अपेक्षा नहीं है। वे सब, अपनी उपस्थिति में गुणात्मक रूप से उपस्थित हो। पर लगता है, इस माध्यम से यह जादा की कामना करना है।

कट थ्री। यह इस याद शहर में किसी और रहनवार की तलाश की तरह है। उनके पास से गुज़रने पर बात करने के मन होजाने की तरह है। कहीं कलाई पकड़ कर साथ बैठे रहने की ज़िद। उठने का मन हो, तब भी कुछ देर उस लोहे के बैंच पर दो पल और रुक जाने के एहसास से भर जाने की तरह। यह सारे भाव मेरे मन में पता नहीं किन किन और कल्पनाओं, सपनों, बिंबों, प्रतीकों में आस-पास घूमते रहते हैं। उनका घूमना इतना निपट अकेला होता है कि कभी-कभी उन एकांतिक क्षणों की निः शब्दता में कहीं से कोई धुन सुनने का मन कर जाता है। पर ऐसा होता नहीं है। मैं वहीं अकेले ऊपर वाली बरसाती में बैठा, डायरी लिखता, वहीं स्याही के सूखने में बदलते रंगों को देखता रहता हूँ। यह इस शहर की बुनावट का अकेलापन नहीं है। इसके पीछे किसी नगरीय समाज की व्यक्तिगत व्याख्या को अपदस्थ कर उन्हे दूसरी तरफ़ मोड़ देता हूँ। कहने लगता हूँ, यह अकेलापन कहीं बाहर नहीं था, यह मेरे अंदर से ही बाहर आया है। यह मेरे व्यक्तित्व का एक और पाठ है। अकेलापन मेरे चारो तरफ़ शब्दों की एक समानांतर दुनिया रच रहा होता है। इसे बुनने में मेरी भूमिका तानेबाने को खड़ा करने की भी नहीं होती। मैं वहाँ मूक दर्शक की तरह बैठा सब देखता रहता हूँ।

ऊपर वाले कमरे को शाहरुख खान की फ़िल्म दिल से  वाली आलीशान बरसाती नहीं कह सकते, फ़िर भी उस बक्से पर बैठना सुकून से भर देता है। सारा दिन कहीं भी रहूँ, इस मेज़ से सटे लोहे वाले बक्से पर वापस लौटने के लिए छटपटाता रहता हूँ। यहीं कितनी ही न कहने वाली बातों को पन्नों पर उतारता रहता हूँ। उन्हे कहने का कोई भी मौका जाने नहीं देता। कट फ़ोर। इधर इसे मेज़ पर कोहनी टिकाकर हथेली में अपने गालों को लिए एक सपने में डूब जाता हूँ। यह मेरी किताब का सपना है। यह कहीं से भी छपी नहीं है। बस मेरे मन में छप रही है। कैसी होगी यह कागज़ वाली किताब कह नहीं सकता। शायद राजेश जोशी की किस्सा कोताह  की तरह। या फ़िर प्रमोद सिंह की अजाने मेलों में  की तरह। या हो सकता है, संजय व्यास की टिम टिम रास्तों के अक्स  की कुछ छवियाँ भी उसमें दिख जाएँ। एक किताब है, उदय प्रकाश की और अंत में प्रार्थना और दूसरी ज़िल्द है, जलसा । इधर पूजा  की किताब आने की आहट भी सुनायी दी है। सागर  की आते ही खरीद लूँगा। ऐसे ही न जाने कितने ख़याल मन में चलते रहे हैं। पर इसमें से कभी भी कुछ भी किसी से कहा नहीं है। बस जब कोई कहीं पूछता है, तो चुप-सा आहिस्ते से मुस्करा देता हूँ। कहता हूँ, कभी आ ही जाएगी।

फ़ाइनल कट। असल में यह मेरे बाहर किसी और की किताब नहीं होगी। कहीं सोते से जागकर कभी अपना पढ़ने का मन होता है, तो बस ठिठक जाता हूँ। कहीं से भी उन अपने लिखे कागज़ों को नहीं देख पाता। वैसे भी वह इस जगह के अलावे कहीं और हैं भी नहीं। पर इस कुर्सी मेज़ पर लौटकर आने का मन नहीं होता। किताब हाथ में हो, कभी भी, कहीं भी उसे पढ़ लेने की कोमलतम इच्छा बनते हुए बिखर जाती है। सिराहने पलट कर देखता हूँ, वहाँ किताब नहीं होती है। फ़िर यह भी सोचता हूँ, मुझ जैसे बातों, यादों, उलझनों को दोहराने वाले को कभी कौन छापेगा? मेरे पास किसी की पैरवी भी नहीं है, कोई बड़ा नाम नहीं है कि संभावनाशील मान कोई इधर भी तुर्रा तीर में बदल जाये? फ़िर कौन सा कोई मुझे पढ़ना चाहेगा? इसलिए भी पीछे बात करने के बाद भी रुक गया। आगे नहीं बढ़ पाया। सोचने लगा, मुझे मेरी किताब सिर्फ़ मेरे लिए चाहिए। किसी और के लिए नहीं। उसे मैं ही पढ़ूँगा। इसलिए कभी कोई इसकी एक प्रति छापकर भिजवा देगा, उसका अग्रिम आभार अभी से किए देता हूँ। तब तक हमेशा उसे सिराहने रखने का सपना देखता रहूँगा। बात फ़िर से लौट लौटकर वापस आ रही है, इसलिए आगे नहीं। बस। वापस लौटते हैं।

सितंबर 29, 2014

एक बनती हुई पोस्ट का बिखर जाना..

मुझे नहीं पता इन आगे लिखी जाने वाली पंक्तियों को किस तरह लिखा जाना चाहिए। बस दिमाग कुछ इस तरह चल रहा है, जहाँ यह समझना बड़ा मुश्किल है, क्या चल रहा है? दो साल पहले की कोई बात है, जिसके आसपास यह सब घटित हो रहा है। यह ख़ुद को दोहराने जैसा है। किसी तरह अपने अतीत को फ़िर से सामने देखने की तरह। पर सच इतना होते हुए भी वह मेरी तरह बिलकुल नहीं है। कुछ-कुछ समानतायें सतही तौर पर हो सकती है, पर उसे देखकर लगता है, इस ‘पैटर्न’ को ट्रेस किया जा सकता है। जहाँ कुछ-कुछ बातें हम सबमें समान होती ही होंगी। ‘वॉट्स एप’ से उसके बचपन की तस्वीर को यहाँ इस पोस्ट के साथ इस्तेमाल करने की बात करते हुए कहा था, कुछ लिखुंगा तब उसके साथ लगा लूँगा। पर ऐसा सच में नहीं करने वाला।

इसे किसी दोस्त के साथ हुई पहली मुलाक़ात की तरह याद नहीं कहा जा सकता। ‘अध्यापक’ और ‘विद्यार्थी’ कभी मिलते नहीं हैं। वह अपनी भूमिकाओं में कभी दोस्त नहीं हो सकते। इस अर्थ में वह कक्षा में एक-दूसरे के विपरीत होते हैं। इसे विलोम अवस्था भी कहा जा सकता है, जिनकी शास्त्रीय व्याख्याएँ बहुत पीछे तक जाती हैं। मैं आज तक नहीं समझ पाया कि हमलोग उस सरकारी स्कूल में दो साल पहले क्या कर रहे थे? यह मात्र संयोग ही था कि उस वक़्त, रोज़, बारहवीं कक्षा की हिन्दी की घंटी में जाता रहा। मनोज खन्ना तब वहाँ नहीं थे। जब तक वे वापस आते, तब तक कक्षा के विद्यार्थी मुझमें उनकी छवि ढूंढ़ने में व्यस्त रहे। यह मेरे लिए त्रासद स्थिति थी कि मैं खन्ना जी की तरह पढ़ाने में बिलकुल असमर्थ था। उनके पास तुलना के लिए एक मास्टर थे, जिनको पढ़ाते वक़्त मैंने कभी नहीं देखा था। वह ‘मिथक’ की तरह मेरे व्यक्तित्व के इर्दगिर्द उपस्थित रहने लगे। उनकी सबकी इस अपेक्षाओं के बीच मेरा कक्षा में टिके रहना, बीती रात देखे बुरे सपने में तब्दील होता गया। और इस तरह हम उन दीवारों के भीतर किसी भी तरह ‘शैक्षिक’ कहे जाने लायक ‘अनुभवों’ से हम गुज़रने में असमर्थ थे।

वह विरोधाभासों से भरे दिन थे। बिलकुल आज की तरह। कहीं से भी कोई संगति नहीं बैठती दिख रही थी। इन सबके बीच वहाँ एक लड़का था, जो अपनी कवितायें मुझे दिखाता। इसे संवाद की पहली कोशिश भी कह सकते हैं। हम वहाँ कक्षा के भीतर किन रूपों में अपनी छवि छोड़ रहे हैं, पता लगना बहुत ही मुश्किल है। पर कोशिश रहती थी कि कुछ संभावनाओं को हमेशा अपने पास, अपने अंदर बचाए रखें। वह ऐसी ही एक संभावना था, जो अवसर मिलने पर आगे बढ़ सकता था। बस, हम यहीं तक सोचकर बैठ जाते। आगे कुछ भी करने में असमर्थ। निरीह। असहाय। आज वह दिल्ली विश्वविद्यालय के एक प्रतिष्ठित कॉलेज में ‘हिन्दी ऑनर्स’ द्वितीय वर्ष का छात्र है। यहाँ उन पीछे रह गयी किसी याद में ऐसा कुछ नहीं दिखता, जिसमें उसके इस दाख़िले में इस विद्यालय की किसी भी तरह की रचनात्मक भूमिका को रेखांकित किया जा सके। हम ‘अध्यापक’ भी कहीं नज़र नहीं आते। आज दो साल बाद, इन सारी बातों को याद करने का कोई मतलब रह गया है? शायद यादें ऐसे ही पीछे ले जाकर उनके नए अर्थों से हमें भर देती होंगी। इन्ही यादों के किसी छूट गए पन्ने पर देख रहा हूँ, तो समझ नहीं पाता उसने हिन्दी जैसे कोर्स में दाख़िला लेकर गलती कर दी।

इसमें ऐसा कुछ भी नहीं है, जिसे कहने लायक माना जा सकता हो। फ़िर भी कह दूँ कि हिन्दी इन बनते दिमागों के लिए नहीं है। कम-से-कम इसके ‘साहित्य’ के लिए तो कही सकता हूँ। यह दिमाग को किसी भी तरह से खोलता नहीं, एक बंद गली की तरफ़ लाकर पटक देता है। यह ‘विषय’ के रूप में ‘विचारधारात्मक’ रूप ले चुका है, जो अपने पाठक के रूप में, किसी भी तरह से संस्कारित करते हुए, एक ठीक-ठाक व्यक्ति बना लेने की काबिलियत से भी चुकता रहा है। इसपर सिलसिलेवार तरीके से सोचने की ज़रूरत है। हिन्दी वंचितों की भाषा है। इस पिछली पंक्ति को फटे जूते की तरह कितनी बार घिस चुका हूँ, याद नहीं आता। सच, जब उसने मुझे यह बात बताने लायक समझी कि वह हिन्दी पढ़ रहा है, तो किसी भी तरह से दिल बाग बाग नहीं हुआ था। वह एकदम सूखकर काँटा हो गया। एक सरकारी स्कूल से पढ़ा हुआ लड़का इस जैसी मारी हुई भाषा में कहाँ तक बढ़ सकता है, कोई नहीं बता सकता। अर्थशास्त्रीय दृष्टि से इसकी उत्पादकता शून्य पर जा पहुँची है। अनुवादक भी वही बन सकता है, जो दूसरी औपनिवेशिक भाषा पर कुछ अधिकार रखता हो। फ़िर स्क्रिप्ट लिखने का शास्त्र भी अंगरेजी में स्थित है। विज्ञापन को तो जाने ही दो।

मैं इसे इस तरह लाकर ख़त्म नहीं करना चाहता था। किस तरह से अंदर-ही-अंदर यह लगातार चलती रही है। इसमें वह लड़का तो कहीं नज़र ही नहीं आया। लगता है, मेरे दिमाग पर अभी भी, भाषा के इस रूप को लेकर बहुत से संदेह बने हुए हैं, जो लगातार इसी तरफ़ ढकेल देते हैं। वह मन को किसी भी तरह से मना नहीं पाती। उसकी सारी प्रत्याशाओं में कहीं व्यक्तित्व का विभाजन, लगातार इतना गहरा होता जाएगा कि कुछ समझ नहीं आएगा। इस पोस्ट को एक दिन फ़िर दोबारा से लिखुंगा। और तब कोशिश करूँगा कि इस छाया से बाहर निकल, उसके इन दिनों को कह पाऊँ। यह द्वेष कुछ कम हो जाये। अभी नहीं कह पाया, एक बार फ़िर मन वहीं घिर गया। काश ऐसा न होता। इसे पढ़ने के बाद लगता है, यह शुरू से ही बिखर कर टूट गयी थी, इसे संभाल नहीं पाया.. ख़ुद को इसके एक ‘टेक्स्ट’ के रूप में पढ़ने की ज़िद इसी तरह खुदबुदाती रहती है। शायद यह एक स्थायी ग्रंथि का आकार लेती जा रही है। इससे बचने की कोशिश भी नहीं दिखती। पता नहीं लगता है यह कितनी ख़तरनाक है। आगे कभी देखते हैं। क्या होता है।

आवाज़ें..

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