जनवरी 31, 2014

यहाँ कभी न लौटने से थोड़ा पहले..

बड़े दिन हुए इधर नहीं आया.. मन अचानक यहाँ से हट जाएगा, कह नहीं सकता था। पर यह ऐसा ही है। उन मौकों को एक दिन ऐसे ही कम होते जाना था। यह इसकी आख़िरी पोस्ट नहीं है। पर कुछ-कुछ उसकी शुरुवात को पहली बार इतने पास से महसूस किया, वही कहने को हो आया। अभी ‘तेरह’ को बीते एक महिना भी नहीं हुआ और अचानक इसके ऐसे होते जाने की ताकीद करने आ गया। इसबार डायरी बदस्तूर चल रही है। पर यहाँ रुक गया हूँ। लिखते हुए हाथ नहीं काँप रहे, दिल रो रहा है। इस सपने को ऐसे बीच में छोड़ जाने को हो जाऊँगा, कुछ वक़्त पहले इतनी साफ़ तौर पर नहीं दिख रहा था। पर उसकी आहट यहीं-कहीं पास ही थी। जिसे कान बड़ी आहिस्ते से सुन रहे थे। समझ आने तक इंतज़ार में था। कि कहीं अटक तो नहीं गया। यह किसी तरह से इस ‘स्पेस’ से भाग जाने की बात कहाँ से करने लगा। जिसे इतने करिने से बुनता रहा। अपने दिल की हर बात कह लेने का मन करते-करते यह मन को क्या हो गया? इतना ‘पेसिमिस्ट’ कैसे होता गया?

शायद यहाँ आना ख़ुद को टूटने बिखरने से बचाए रखने की आख़िरी कोशिश है। जिसे कह सकता हूँ, वैसे कह लेने का संतोष। अपने दिल को उघाड़ देने की हद तक कहते जाना। उन बारीक रेशों को निर्ममता से उधेड़ते जाना। अभी पीछे कह रहा था, पाँच साल लेकर आया हूँ। पर नहीं पता था यह ‘शिफ्टिंग’ इतनी जल्दी होगी। शायद उस शाम सागर सही कह रहा था। यह ‘ब्लॉग’ का वक़्त नहीं। हम यहाँ सबसे गलत वक़्त पर यहाँ पाये जाने लगे। ऐसा मान लेना सिर्फ़ और सिर्फ़ मेरी हार है। सच में हार रहा हूँ। ख़ुद से। इस दुनिया से। यह हमें हरा रही है। मैं बहुत दुखी होकर यह सब नहीं लिख रहा। पूरे होशोहवास में लिख रहा हूँ। यह भावातिरेक नहीं है। किसी भी तरह से भावुकता का बहाना नहीं बनाना चाहता। बस कह लेना चाहता हूँ। जो इन दिनों अपनी सघनता से मुझे घेरे हुए है। यह इतने दिनों बाद प्रथम पुरुष में ख़ुद से मुख़ातिब हूँ। यह सब किसी और के लिए नहीं, सबसे पहले ख़ुद के लिए है।

पता नहीं इन सब बातों से निकालने वाले अर्थों की ध्वनियाँ कहाँ तक कैसे जाएंगी? यह अपनी मृत्यु को इतने पास से गुज़रते देखने जैसा है। पता नहीं यहाँ लिखे हुए शब्दों को पढ़ने वाले के मन में दिल में कैसे ख़याल भर जाएँगे। पर अब यहाँ आने के दिन ऐसे ही कम होते जाएँगे। शायद अचानक एक दिन कभी न आने के लिए यहाँ से चला जाऊँ। फ़िर कभी न लौटने के लिए। कभी चाहकर भी न आने के लिए। इस टूटे दिल की मरम्मत कहाँ होती है, उसका पता भी मालुम नहीं। यह मृत्यु अचानक किसी मोड़ पर नहीं मिल गयी, साथ साथ चलती रही। बस अभी हुआ इतना भर है कि यह दिखने लगी है।

यह भौतिक मृत्यु नहीं है, इसके लेखक की हारती हुई पारी है। जिसके यहाँ से चले जाने पर शायद ही किसी को कोई फ़र्क पड़ेगा। इतने यहाँ से चले गए, एक और हमारे जाने से क्या कम हो जाने वाला है। हम क्या लिख रहे थे? कैसे लिख रहे थे? किसके लिए लिख रहे थे? यह सवाल शायद ही कभी कोई पूछे। या कभी पूछ भी लिए गए, तो कौन-सा हम बताने के लिए होंगे। जब हम अपने लिए ही ज़रूरी नहीं रह गए, तो किसी और के लिए कहाँ कुछ हो सकते हैं। उनकी ज़रूरतें हमारे यहाँ न रहने पर यकबयक बदल जाएंगी। कोई हमारे लिए रुका थोड़े रहेगा। कभी कोई नाम भी नहीं लेगा। कि कोई इस नाम से, कभी था भी। यह नाम गुम जाएगा।

बात मेरे अंदर लिखने वाले के मर जाने की नहीं है। बड़ी बात है, आज मैं कहाँ खड़ा हूँ? शायद कहीं नहीं। इस वक़्त तक मुझे कहाँ हो जाना चाहिए था?  जिन सालों में हमें कुछ हो जाना था, हम कुछ नहीं हुए। फ़िर हमें जानता कौन है? कोई नहीं। हमें यहाँ से क्या मिला? कुछ नहीं। जो कुछ भी मिला वह दिख नहीं रहा। देखने लायक नज़र रह नहीं गयी। बस दिख यही रहा है के इस भीड़ में हमारी उमर के लड़के इन जैसी जगहों पर फ़िजूल बातें नहीं किया करते, कहीं अमरीका में बैठे किसी कंपनी से कमा कमाकर इस देश में रह रहे माता-पिता को पैसे भेज रहे होते हैं। हम जैसे बे-काम लड़के ऐसे ही गायब होते रहे हैं। हम भी होने जा रहे हैं लगता। ढूँढने जा रहे हैं। ख़ुद के लिए अपने लायक जगह। जहाँ से देखें, तो सब दिखे। हम भी नज़र आयें।

इन सब बातों का मतलब यह नहीं के लिखना छोड़ रहा हूँ। नहीं। बस सोच रहा हूँ, हम यहाँ कर क्या रहे हैं? हमें यहाँ होना भी चाहिए? यह ना-उम्मीदी नहीं है। बस कह इतना रहा हूँ के यहाँ ठहरे रहने का मन नहीं है। जी उचट गया है। और यह जो मृत्यु की बात है वह हमारे साथ धीरे-धीरे चल रही है। इस ब्लॉग को अचानक बंद नहीं करने जा रहा। पर यहाँ कम आने की आहट सुनायी पड़ने पाए ज़रूरी लगा, सबको बताता चलूँ। भूख नहीं है। बस छत पर जा रहा हूँ। अँधेरे में बैठकर सोचुंगा क्या सब कह गया? किस बात को कैसे कहना था। किसे कह कर भी नहीं कहने को होता गया। और दोस्तों यह कोई एक दिन में लिया गया फैसला नहीं है। धीरे-धीरे यहाँ पहुँचा हूँ। मेरे जैसा लड़का, जिसके पास नौकरी नहीं है, उसके लिए यहाँ बने रहना, बेहया होते जाना है। यह बेशर्मी जबतक कर सका, तबतक करता रहा। अब लगता नहीं, यहाँ जादा देर बैठने के बहाने बना पाऊँगा। बस अब छोड़ दिया है, ख़ुद को..

बड़ा थका-थका सा लग रहा हूँ न? हारा हुआ। हताश। निराश। पता नहीं यह जो सब कह दिया उसे कहना था भी या नहीं। या ऐसे करता एक दिन अचानक किसी को याद आता। कि कितने दिन हुए, मैं कहीं नहीं दिखा। गायब हो गया। ऐसा ही अच्छा रहता..

जनवरी 14, 2014

गोरख पांडे की डायरी

ये आँखें हैं तुम्हारी
तकलीफ का उमड़ता हुआ समंदर,
इस दुनिया को /जितनी जल्दी हो /बदल देना चाहिए

राकेश न मालुम कितनी दफ़े इन पंक्तियों को दोहराता रहा है। उसके दिमाग में लगे संगमरमर के पत्थर पर खुदी हुई हो जैसे। एक वक्तव्य की तरह। पर कभी उनकी कविताएँ नहीं पढ़ीं। कभी मन नहीं किया। फ़िर उसी ज़माने में हमारे एक सर भी हुआ करते थे। अभी भी हैं। पर बात अब नहीं होती। रुक रुककर कभी-कभी हो जाती है। वह भी इनका नाम लेते, पर जादा कहने से बचते। वह हमेशा ऐसा करते। कभी नहीं बताते कि वह इनके प्रति ऐसे क्यों हैं?

पर अभी उस शाम अचानक सागर  ने कहा,‘कमोबेश हर आदमी में हम हैं। और हममें वे हैं। गोरख पाण्डेय की डायरी में भी’। तब लगा इसे ढूँढना चाहिए। ढूँढा। अब इसे गोपाल प्रधान केब्लॉग’ पर धीरे-धीरे पढ़ रहा हूँ। इतनी बिखरी शुरुवात के बाद लगने लगा है, इतनी ही बिखरी यह डायरी है। यह डायरी गोरख को बिखरने से नहीं बचा पायी। ख़ुद बची रहकर उन क्षणों की तरफ़ जाते व्यक्ति की पीड़ा के दस्तावेज़ की तरह माजूद है। उसमे दर्ज़ है तारीख़-दर-तारीख़ वह दर्द, उलझने, विचार, भाव, भावुकता, कविता।

वह डायरी में एक जगह लिखते हैं, ‘हम विचारों के स्तर पर जिससे घृणा करते हैं, भावनाओं के स्तर पर उसी से प्यार करते हैं’। उन्हे बार-बार लगता रहता है कि कहीं उनकी देखने, सुनने, सोचने, समझने की शक्ति गायब तो नहीं होती जा रही। बड़ी देर से यही सोच रहा हूँ कि इस पंक्ति को लिख लेने के बाद, वह क्या सोच रहे होंगे? उन्होने यह बात क्यों कही होगी? अपनी किस बात के लिए वह आधार ढूँढते-ढूँढते यहाँ पहुँचे? क्या सच में वह उन्ही भावनाओं, जो उनके अस्तित्व की ‘निकटतम अभिव्यक्ति’ थी, के लिए कोई ‘वैचारिक प्रस्थान’ बिन्दु तलाश रहे थे? यह तलाश क्या हम सब भी अपने भीतर करते हैं? इसमें हम कहाँ स्थित होते हैं?

यह क्या एक सर्वहारा वर्ग से आए युवक के ‘पूँजीवादी सौंदर्य’ में फँस जाने की छटपटाहट है? क्यों वह इस तरह ‘वैचारिक प्रेम’ कर रहे हैं? ख़ुद इसे इतना ‘रेशनलाइज़’ करने की क्या ज़रूरत है? यह प्यार करने से पहले नहीं, उसके हो जाने के बाद की वर्गीय व्याख्या है। यह एक ‘बौद्धिक’ का प्रेम है। वह विचार से विचलित नहीं होना चाहते। पर हो जाते हैं। कभी ख़ुद को भी इसी तरह ‘विखंडन’ करते देखता, तो ऊब होती। ऊब गोरख को भी हो रही है। वह इससे बचना नहीं चाहते। इससे जूझकर कहीं पहुँचना चाहते हैं। कहते हैं, उदय प्रकाश की कहानी ‘राम सजीवन की प्रेमकथा’ इन्ही की ज़िंदगी पर आधारित है। इसे आधार बनाकर कई नाटक भी हुए हैं। पता नहीं वहाँ जो राम सजीवन है, वह ऐसे द्वंद्व से गुज़रता है या नहीं? वह भी क्या उसी नतीजे पर पहुँचता है?

आगे वह कहते हैं, हमारे पास सौंदर्य की कोई बनी बनाई परिभाषा नहीं होती। हम उसे ही ‘सौंदर्य’ मान लेते हैं, जो तत्कालीन समय में प्रचलित होती है। प्रचलित कौन है? वही जो संचार माध्यमों में बार-बार दोहरायी जा रही है। जो लड़की उन नक़लों के जितना करीब होती है, हम भी उसके उतना पास हो जाना चाहते हैं। हमारे पास इस सौंदर्य का ‘एंटी-थीसिस’ नहीं होता। हम अपनी तरफ़ से उसे गढ़ने की कोशिश कभी नहीं करते। उसी को मानते चलते हैं। फ़िर क्या होता है? हम ऐसे ही मानदंडों पर खरी उतरती लड़कियों की तरफ़ आकर्षित होने से ख़ुद को नहीं रोक पाते। शायद यह न रोक पाना और ‘बुर्जुआ सौंदर्य’ की तरफ़ खिंचे चले जाना गोरख को सबसे जादा साल रहा था। जिन विचारों के सहारे हम दुनिया बदलने निकले, वही समानुपात में हमें नहीं बदल पाये।

कहते हैं वे ‘स्किजोफ़्रेनिया’ से पीड़ित थे। पता नहीं लेखकीय दृष्टि से यह बहुत मानीखेज लग रहा है कि इस व्याधि में व्यक्ति अपने लिए ख़ुद ही ‘काल्पनिक संसार’ रच लेता है। जिसका वास्तविकता से कोई संबंध नहीं होता। वह उसी में जीने लगता है। और दिन पर दिन उसके लिए कल्पना और वास्तविकता में अंतर कर पाना कठिन होता जाता है। पर इस कल्पना का उपयोग करने के लिए जो मानसिक संतुलन चाहिए वह लगातार कम होता जाता है। वह कौन से क्षण होंगे, जब उन्होने वास्तविकता को नकारना शुरू कर दिया होगा। कब उन्होने इस ‘पलायन’ को अंगीकार कर लिया। यह एकतरफ़ा प्यार नहीं। उसमे डूब जाना है। जिसके साथ अपनी सारी ज़िन्दगी गुज़ारने के सपने देखना चाहते हैं, उसका शाम उस सूरज के ढलते हुए उस लोहे के बेंच पर न आना अंदर से तोड़ देता है। वह कितने निश्छल भाव रहे होंगे जब उन्होने अपने को मिटाकर, उसका नाम लिखा होगा। उन सारे वैचारिक प्रस्थान बिन्दुओं को सिरे से नकार अपनी संगिनी चुनी होगी। पर अंत तक आते आते वह अकेले हैं। जहाँ से पीछे जाने का कोई रास्ता नहीं है।

दुर्खाइम ‘आत्महत्या’ पर क्या कहते हैं, पता नहीं। पर गोरख पाण्डेय की आत्महत्या इस सामाजिक ढाँचे की एक और व्याख्या की तरह हमारे सामने है। यह उनके साथ न रहने पर ‘वैचारिक स्खलन’ नहीं है, पर उस समाज के और मज़बूत होने का प्रमाण है। उसने अपनी किसी भी चीज़ को हिलने नहीं दिया। उसका ढाँचा आजतक वैसा का वैसा बना हुआ है। वह सौंदर्य ऐसे ही हमें अपनी ओर खींचता रहा है। हम उसे जताना नहीं चाहते। फ़िर भी वह ऐसा ही है। यह ‘समरूपीकरण’ हम लड़कों को उन्ही लड़कियों की तरफ़ ढकेल रहा है जो असल में किन्ही इज़ारेदार उपक्रमों द्वारा पोषित सौंदर्यशास्त्र की नकल करती हैं। हमारे पास कोई ‘जातीय व्याख्या’ मौजूद नहीं है। इसलिए यह भी नहीं कहा जा सकता के आगे कोई और गोरख पांडे की नियति को प्राप्त नहीं होगा। या क्रमिक रूप से वह इस आत्महंता न बनकर वह कुछ और हो जाना चाहता है। ऐसा कोई नक्शा कभी बना है या किसी ने कोशिश की है? पता नहीं।

अभी इसे ख़त्म नहीं कर पाया हूँ। पर रह रह कर उन बिन्दुओं पर रुककर सोचने लगता हूँ। उस अनुभव को कह नहीं पा रहा। उसे शायद कभी कहने लायक बना भी न पाऊँ। बस उस तनहाई में यह पंक्तियाँ बार बार घूम रही हैं। जो इन ऊपर की पंक्तियों की तरह अपनी सहूलियत के हिसाब से चुन ली हैं। वह कहते हैं, ‘हमें कैसी औरत चाहिए? निश्चय ही उसे मित्र होना चाहिए। हमें गुलाम औरत नहीं चाहिए। वह देखने में व्यक्ति होनी चाहिए, स्टाइल नहीं। वह दृढ़ होनी चाहिए। चतुर और कुशाग्र होना जरूरी है। वह सहयोगिनी हो हर काम में। देखने लायक भी होनी चाहिए। ऐसी औरत इस व्यवस्था में बनी बनायी नहीं मिलेगी। उसे विकसित करना होगा। उसे व्यवस्था को खतम करने में साथ लेना होगा। हमें औरतों की जरूरत है। हमें उनसे अलग नहीं रहना चाहिए’।

पता नहीं इसका विकास करने वाली व्यवस्था हम कब बना पाएंगे। इसमें ख़ुद उनकी क्या भूमिका होगी? क्या इतनी सहजता से वह उसे स्वीकार कर लेंगी? इन सवालों की तह में यह जैविक न लगकर, कहीं से थोपी हुई लगने लगे, इससे पहले उनकी कविता दोहराने का मन कर रहा है। मुझे मेरे प्यार ने खुद-ब-खुद सौंप दिया/ हत्यारों के हाथ में /एक लम्बे अर्से तक उसका इन्तजार किया/ चुपचाप समूचे अस्तित्व से मैंने/ इन्तजार किया/ वह झटके में दिखाई पड़ी/ आवाज दी, उसने मेरी आवाज दोहरायी/ ठहरो आ रही हूं/ फिर अंधेरे में गायब हो गयी/ मैंने खुद को एक नदी की तरह/ उसकी ओर बहते हुए पाया/ उसने मुझे मुस्करा कर देखा।

{यहाँ लगाने के लिए उनकी कोई तस्वीर तो मिली नहीं मिली, उनके नाम की एक प्रस्तुति की एक फ़ोटो दिखी, वही लगा दी है। }

जनवरी 13, 2014

छूने भर की दूरी..

उधर तुम होती हो। इधर मैं होता हूँ। और दोनों तरफ़ होती हैं हमारी आवाज़ें। आवाज़ें दोनों ओर आरपार होती जाती हैं। इन गुज़रती आवाज़ों में होती है, हमारी साँसों की धड़कनें। धड़कता मन। उनमें बहता ख़ून। वह खून जो दिल में धड़कता है। धड़कता है सपनों में। यह दिन। यह शाम। यह रात। ऐसे ही कितने ख़्यालों में खोया-खोया सा रहता। जैसे अभी लिख नहीं रहा, खो रहा हूँ। खो रहा हूँ, इस दुनिया से। उस दुनिया में। खोकर देखेंगे एक नयी दुनिया। जहाँ अगल-बगल बैठे हम दोनों आने वाले दिनों में सपने बुन रहे हैं। या कि यह सपने एकबार फ़िर हमारे अंदर से बाहर की तरफ़ जाते आसमान की ऊंचाइयों पर हमारा इंतज़ार कर रहे हैं। इंतज़ार कर रहें हैं, हमारे पहुँचने का। उन मुलायम से घास के मैदानों में। जहाँ कोई नहीं है। न कोई होगा। हमारे सिवा।

उस दिन तुमने कुछ नहीं कहा। फ़िर भी सब कह गयी, तुम्हारी आवाज़। बड़े चुपके से तुम उदास होती जा रही थी। बिन बताए। जबकि हमने वादा किया था, ऐसे नहीं होंगे। तब तो कम से कम नहीं, जब हम साथ हों। फ़िर भी नहीं रोक पायी ख़ुद को। यह साथ की बात मुझे भी उदास करती जाती है। उदास कर घेर लेती है परछाईं। जिसमें कुछ नहीं दिखता। मैं भी नहीं।

पर तब तब सुन लेता हूँ, तुम्हारी आवाज़। दिल के किसी हिस्से से तुम्हें ढूँढ लाता। और पास बिठा बात करने लगता। तब पता नहीं कैसे तुम कितने अंदर तक खींचे ले गयी। परत-दर-परत। बहुत अंदर तक। इतने अंदर जहाँ सिर्फ़ हम थे। कोई और नहीं। उस चुप्पी में आहिस्ते से उन आती जाती धड़कनों में एक दूसरे को छू भर लेते। फ़िर बड़ी पास से बिन बोले बैठे रहते। आँखें नाक के पास से होकर गले पर जा ठहरती। गले से फ़िर कहीं और। और तब देखा परछाईं कहीं नहीं थी। वहाँ हम दोनों हैं। 

असल में हम दोनों अभी सपने में हैं। साथ हैं। इतनी पास कि जितनी उँगलियों के पास उसके नाखून। हम बैठे नहीं हैं। लेटे गए हैं। हमारी सारी अनकही बातें सितारों में बदल गयी हैं। उनकी चमक में थोड़ी देर रहना चाहते हैं। सवेरा होने से पहले उन्हे बुन लेना चाहते हैं। और चाहते हैं हर रात ऐसे ही ख़त्म न होने वाली रात की तरह आए। हम भी रोज़ रात ऐसे ही अपनी उन सारी यादों को उनमे भरते रहें। भरते रहें इन अहसासों से। उन स्पर्शों छुअनों से जो अभी नहीं छू पाये हैं हमें। उस आसमान में एक तरफ़ हो हमारा सपनों का घर। के देर न हो, रात होते ही आने में। मेट्रो भी कहाँ चलती हैं इतनी देर रात तक। न कोई स्टेशन ही उसने यहाँ बनाया है। अच्छा ही किया। हम यहाँ अकेले हैं। एक दूसरे में आरपार होते जाने के लिए। कहीं से कोई शोर इन क्षणों को नहीं तोड़ सकता।

अगर ऐसा हो तो हम चाहेंगे के हमें अपनी आवाज़ों के सिवा दुनिया की कोई और आवाज़ न सुनाई दे। ऐसा चाहकर हम बनाए रखेंगे अपने सपनों का घर। वहाँ आवाज़ें हमारी मर्ज़ी से आएँगी हमारी मर्ज़ी से जाएँगी। वहाँ नहीं होगा पतझड़ का मौसम। पेड़ भी उदास इंतज़ार करता होगा लौट आने तक। बिलकुल वैसे ही जैसे तुम। जैसे मैं। अकेले होने की पीड़ा। उसकी चुभन। अंदर तक भेद जाती हैं। इसलिए यहाँ बना रहे हैं अपना सपनीला घर। उसे भर रहें हैं। मनमर्ज़ी। बिन दरवाजों बिन छत वाला घर।

पता नहीं, कैसे वहाँ पहुँच गए थे हम। कितने रुके रहे हैं। कितने छटपटाये हैं। इन क्षणों के लिए। इन मुलाकातों के लिए। इन मुसकुराते होंठों के लिए। जब तुम आहिस्ते से उस पन्नी को खोल रही थी। वहीं छिपा था। देख रहा था। कनअँखियों से। तुम्हें बिन बताए। बिन कहे। कैसे गुलाब के फ़ूल बने थे, उनपर। ख़ुशबू से भरे हुए। फ़िर उस पन्ने पर कुछ लिखा था। तुम्हारे लिए। ख़ुद को तुम्हारे लायक बनाते हुए। दिल अचानक थम सा गया। कुछ भी नहीं कह पाया लगता। उन शब्दों में अपनी आवाज़ भरते ख़ुद को तुम तक भेज रहा था जैसे। जैसे अपने दिल का टुकड़ा। जो बचा था, वह भी अपने पास नहीं रखा। उसी में भेज दिया तुम्हें। तुमसे ख़ुद को भरते कई बार ऐसे कर चुका हूँ। पर हर बार तुम जान जाती हो। बिन बोले। बिन बताए। 

बस अब हरबार अपने को समझता हूँ। कुछ दिन और। हम दोनों छू लेने की दूरी पर होंगे। इतनी दूर से इतनी पास तक। तब हाथों में हाथ डाल चलेंगे अपने सपनों के घर। वहीं बुनेंगे अपनी अनकही बातें। कुछ-कुछ जो अधबुने हैं, वहीं पूरे करेंगे। संभाले रखना। 

जनवरी 09, 2014

दादी की याद

पता नहीं क्यों हुआ। होना नहीं चाहिए था। फिर भी। चन्दन पाण्डेय की कहानी ‘शुभकामना का शव’ पढ़कर दादी याद आ गयी। कहानी में कामना की कोई दादी क्यों नहीं है? शायद इसलिए। फ़िर तो बड़ी देर तक नीचे गलियारे में घूमते हुए उनकी बहुत याद आई। अगर उस लड़की की दादी होती तब भी क्या उसके साथ भी यही होता। हमारी दादी इतनी जल्दी क्यों चली गईं। रोने को नहीं हुआ फ़िर भी मन उदास था। कुछ खाली-खाली सा। उन बीते सालों में उनका न होना। दिमाग दिल की तरह धड़कने लगा। कहीं गुमसुम सा बैठा बच्चा अपनी दादी को जलते हुए देख रहा है। इसके बाद वह कभी नहीं दिखेंगी। वह ऐसे ही कभी पापा के सपनों में कभी किसी भाई की शादी में हवा बन के आती रहेंगी। इधर फ़िर ऐसे ही आने का वक़्त पास है..

कितनी ही यादों में सिर्फ़ उन्हे सुनते रहे हैं, अब उनमे बड़े होकर लौट जाने का मन करता है। मन करता है, उन्हे वापस बुला लाऊं। कहीं से भी। कैसे भी करके। वह मना करती रहें फ़िर भी। उनकी साँस फूल जाएगी, तो रुक जाएंगे। कहीं फ़रेन्द के पेड़ के नीचे बैठ जाएंगे। सुस्ता लेंगे। खाना खिलाते एक कौर और खा लेंगे। कऊवे को बिन भगाये नहा लेंगे। पर नहीं। वह कहीं नहीं मिलतीं। हर बार खाली हाथ लौटता हूँ..उनमें सिर्फ़ उन हाथों की छुअन होती है और धुँधला सा चेहरा। आवाज़ से वह भाई को थारु भी नहीं बुला पाती..

कल अपनी ज़िन्दगी में एक और साल जुड़ने वाला है और ख़ुद अंदर तक सिमटता, मैं, वहाँ ठंड में भी रात साढ़े ग्यारह के बाद भी बदस्तूर घूम रहा था। पता नहीं कैसी-कैसी यादें उनकी बाद की बातों के साथ चली आयीं। वहीं ठहर सा गया। सोचता रहा आज होतीं तो कैसी लगतीं। उनसे हम भी घंटों बात किया करते। उनकी अपनी कहानियाँ सुनते। पर नहीं वह वहाँ थीं ही नहीं..

हम लोग शायद दस-ग्यारह साल के रहे होंगे। यहीं दिल्ली में। उस रात देर से घर लौटे थे। शनिवार था। कमला चाचा के यहाँ से। दयानन्द विहार से। उन्होने नया टीवी खरीदा था, अकाई का। वही देखने गए थे। लौटते-लौटते हम सब काफी थक गए। खिचड़ी बनी, वही खा कर सो गए। रात के ढाई बजे के लगभग फ़ोन की घंटी बजी। उधर चाचा थे। पीसीओ तब बहराइच में ही थे। गाँव में नहीं। रात साइकिल चलाकर वहाँ आए। बड़ी मुश्किल से एक दुकान वाले को जगाकर फ़ोन मिला। आज सोचता हूँ कैसे नम्बर मिलाये होंगे। हाथ कैसे काँपते से रह गए होंगे। फ़िर कह दिया होगा उस पीसीओ वाले को ही.. कि भईया नम्बरवा मिलाय देओ..

दादी अब नहीं थीं। दिल का दौरा पड़ा था। दादी की तबीयत खराब है, यह हम सबको पता था। इसलिए फरवरी में ही सब उन्हे देख लौट थे। निश्चिंत नहीं थे, फ़िर भी इसकी कल्पना नहीं की थी। हम तो ख़ैर बहुत छोटे थे। इन सब बातों में तब के मतलब अब भर कर देखते हैं तो रोने को हो आते हैं। पर फ़िर भी बताते नहीं। ऐसे लिख लेते हैं। जैसे उन सब बारियों का अब लिख रहा हूँ। कैसे उन सब बातों को याद रखता गया यह भी नहीं पता। उन्हे कभी-कभी कुरेदने पर बहोत दर्द होता है.. जैसे..कुछ नहीं..वह कैसा इतवार था। उदास। रूआँसा। आँखों के पास काले घेरों की तरह। पापा सबसे जादा दुखी थे, मम्मी की तरह। पर दोनों बता नहीं रहे थे। हमे अपनी कोई खबर न थी। बस जो देख रहे थे उसमें हम भी कहीं खोये खोये से उन दिनों को बस सहेज रहे होंगे। अंदर ही अंदर झट से पहुँच जाने की सोचते होंगे, फ़िर रह जाते होंगे। पर क्या करें अभी दूर हैं। थोड़ा रोके रखते हैं..न चाहते हुए भी..

सोलह मार्च। यही तारीख़ थी। पापा उस दिन किसी पुराने कागज़ को पढ़ते हुए यही बोले थे। उन्होने बोल दिया था जब तक हम न पहुँचे तबतक अंतेष्टि नहीं करेंगे। माँ को ऐसे कैसे जाने देंगे। पापा मम्मी सबका बुरा हाल था। आईटीओ पर तब पापा की मौसी रहती थीं। उन्हे भी बताया। कहने लगीं, वह भी चलेंगी। अपनी बहिन को आखिरी बार देख लें। भले इनकी शक्ल आवाज़ सब हु-ब-हु हमारी दादी की तरह है, पर इन्हे कभी दादी की तरह नहीं मान पाये। बस अब कैसे भी करके जल्दी से जल्दी वहाँ पहुँच जाएँ।

पता नहीं पुरानी दिल्ली से कौन सी ट्रेन थी। टिकट किसी भी तरह कंफ़र्म नहीं हो सकता था। नहीं हुआ। जैसे ही भूसे की तरह भरी लदी ट्रेन दिखाई दी मन किया छोड़ दें। पर नहीं। उसी में अपने सारे दुखों के साथ हमें समा जाना था। कहीं किसी कोने को ढूँढ रोते रहना था। कोई पूछता फ़िर भी नहीं बता पाते। कानपुर पता नहीं जैसे-तैसे करते गिरते-पड़ते पहुँचे। वहाँ से लखनऊ की बस। रोडवेज़। इतना छोटा था, फ़िर भी उन छवियों को अभी तक अपने अंदर कैसे आजतक वैसे का वैसा ही छिपाये रखा है, समझ नहीं पाता। पापा की मौसी के साथ वहीं बोनट के पास सिमटा बैठा हुआ हूँ। बस की हैडलाइट सड़क को बड़ी तेज़ी से लाँघती भागे जा रही है। कहीं रुक नहीं रही है। सब ऊँघ रहे हैं। पर मेरी आँखें जाग रही हैं। उस शोर करते इंजन में भी अजीब तरह की खामोशी है। वह भी नहीं कह रहा है। कोई चाहकर भी बोल नहीं पा रहा। बोलने जाते तो रुलाई छूटती। पता नहीं पापा-मम्मी के तब के चहरे क्यों याद नहीं रह गए। क्यों हर बार यही बस याद आती रहती। यह भी याद नहीं कि लखनऊ से बहराइच अख़बार पहुँचाने वाले टाटा चार सौ सात से कब बात की। कब सब हम उसमें बैठ गए। जरवल रोड़ के बाद हम सब अचानक बहराइच में दिखते हैं। सुबह हो चुकी है। और पापा उस टैम्पो वाले से तक़रीर कर रहे हैं कि वहाँ तय करने के बावजूद, वह अब हमें गाँव तक छोड़ने की बात पर आनाकानी क्यों कर रहा है।

वह नहीं माना। हम दरगाह बस अड्डे से पहली बस में बैठे उसके चलने का इंतज़ार कर रहे हैं। सबके चहरे किन्ही अदृश्य दिशाओं में अपनी-अपनी यादों को बुन रहे हैं। उन्हे अब कभी न निपटाई जा सकने वाली यादों की तरह सहेजकर अपनी-अपनी जेबों रुमालों में भर ले रहे हैं। हम लगभग भागने की गति से गाँव में चले जा रहे हैं। ठंड का सूरज आ चुका है। हवा में आँखों की तरह नमी, अब कुछ कम हो गयी। वह सब दादी को ले जाने की तय्यारी लगभग कर ही चुके थे। वहीं किनारे बर्फ़ की सिल्लियाँ बोरे से ढकी धीरे-धीरे पिघलती रहीं। सब चुप नहीं हैं। रो रहे हैं। देखते जा रहे हैं। और चुप होते जा रहे हैं। बाबा पता नहीं वहीं पास बैठे क्या सोच रहे होंगे। हम छत से खड़े उस भीड़ में सबको देख रहे हैं। एक एक कर जैसे सब बुत में बदलते जा रहे हैं। हम भी बस होने वाले हैं। अभी हुए नहीं हैं..इसके बाद का लिखा नहीं जाता..नहीं लिख रहा..कभी रोने का मन होगा, तो फ़िर आऊँगा..सोचा था, अब जो दादी नहीं हैं, उनकी यादें लिखता। जो-जो सुनता आया था, वह कहता..पर नहीं..पता नहीं इस नौ जनवरी को क्या हो गया..

इन सारी बातों को आजतक कागज़ पर नहीं लिखा है। यहाँ भी नहीं लिखता अगर इस साल सीलू की शादी न होती। वह इसी दिन जन्मी थी। वह अट्ठारह पूरे होते-होते फूफा के घर से विदा होने जा रही है। पता नहीं क्यों अच्छा नहीं लग रहा। शायद जितना भी पता चला है, उसमे लड़का लड़का नहीं, अधेड़ है। पाँच बहनों में पहली शादी इस तरह होगी, हम कल्पना भी नहीं सकते। वह कह रहे हैं, ‘हम निपटाइत हय..!!’ छोटी-सी मासूम-सी लड़की तीन चार सालों में दो-तीन बच्चों को संभालते जब दिख जाएगी तब वह कैसी लगेगी? वह उनको संभालेगी या खुद ही चलना सीख रही होगी। एक गोद में दूसरा हाथ की कानी उंगली पकड़े.. पता नहीं..

{ आज सत्रह जनवरी, दैनिक हिंदुस्तान मेंकॉलम वही 'साइबर संसार ' }  

जनवरी 07, 2014

हिन्दी ब्लॉगिंग: दस साल बाद यह पड़ाव

गतांक से आगे..

बड़ी देर से स्क्रीन के सामने बैठे सोच रहा हूँ, कहाँ से शुरू करूँ? कितनी सारी बातें एकसाथ आ रही हैं। उन्हे किस क्रम से कह पाऊँगा? जबसे यह तय किया है के ब्लॉग के इन बीते दिनों पर कुछ लिखना है तब से ‘नोट्स’ बन रहे हैं। कितने तो ड्राफ़्ट लिखे और मिटा दिये। पर आज उनमे से कुछ ज़रूरी बातें कह ही दूंगा। इसलिए शुरू में ही कह रहा हूँ यह कोई ‘संस्थानिक शोधपत्र’ नहीं है। न उन वैज्ञानिक प्रविधियों पर इसकी जाँच संभव है। यह मेरी व्यक्तिगत सीमाओं के भीतर बनी दृष्टि है। इस कथन के बाद यह लेख प्रारम्भ माना जाये। इससे अलग कुछ नहीं।

ब्लॉग। बहुत छोटा सा शब्द है। उसमें छोटी सी हिन्दी की दुनिया है। पिछली बार यही कह रहा था के ब्लॉग लिख कौन रहा है? इसके पाठक कौन हैं? इन्हे लिखा क्यों जा रहा है? यह शास्त्रीय काव्य ‘हेतु’, ‘लक्षण’, ‘प्रयोजन’ के चश्मे से अलग प्रस्थान बिन्दुओं की तरफ़ हमें ले जाते हैं। यह किसी अस्मितावादी पाठ के निर्माण की प्रक्रिया जैसा है। जहाँ सभी अपने हिस्सों के साथ माजूद हैं। हम सब कह लेना चाहते हैं। जो आज तक किन्ही कागज़ के पन्नों में बंद जिल्दों में रखा था, उसे सबके लिए सहज उपलब्ध कराने जैसा। यहाँ इंतज़ार है। बेकरारी है। शब्दों को ढूँढना है। उन्हे कहीं से पकड़ लाना है। उन्हे कंपनी बाग के भारी से लोहे के बेंच की तरह जमाते हुए। जहाँ हम सब पाए जाएँगे। जब जो मन करेगा कहेंगे। किसी से पूछेंगे नहीं। बस लिख देंगे।

यह सीमित अर्थों में उन वर्चस्ववादी प्रकाशन संस्थानों से अलग लेखन का लोकतांत्रिकीकरण है, जहाँ कौन, कैसे, किस रूप में प्रकाशित होता है; इसका पारदर्शी ढाँचा कम-से-कम हिन्दी में तो नज़र नहीं आता। उन्हे कोई खोलना नहीं चाहता। उन बंद दरवाजों से अलग एक यह दुनिया है। तथा सीमित इस अर्थ में भी कि जिस प्रौद्योगिकी का हम इस्तेमाल कर रहे हैं उसकी पहुँच का दायरा इतना विस्तृत नहीं है। वह अभी भी बहुत छोटा घेरा है। बिलकुल वैसे ही जैसे यह कहना असंगत है कि दिल्ली विश्वविद्यालय और उत्तरप्रदेश में वितरित ‘लैपटॉप’ के बाद, उन प्राप्तकर्ताओं के ‘ब्लॉगर’ बनने की संभावना बढ़ गयी है। बहरहाल। वापस।

यहाँ सबसे बड़ा सवाल ब्लॉग बना लेना नहीं है। उसे चलाना है। चलाना नियमितता है। यहाँ बार-बार आना है। हमने यह स्पेस किस लिए बनाया? हम यहाँ क्या करने आते हैं? हमारे पास कहने के लिए क्या है? हम लगातार इसे कैसे बना बिगाड़ रहे हैं? हमारे पास उन शुरुवाती दिनों में कह लेने के रोमांच के बाद इधर आने का कितना समय है? हम कितना समय इसके लिए अपनी व्यस्त दिनचर्या में से निकाल पाते हैं? हम कब तक अपनी आंतरिक प्रेरणा के सहारे यहाँ टिके रहते हैं। यह जगह हमें कितना रोक पाती है। फ़िर ऐसे उदाहरण कम ही होंगे जिनमे ‘मानसिक हलचल’ के लेखक ज्ञान दत्त पाण्डेय की प्रेरणा से प्रवीण पाण्डेय ‘न दैन्यं न पलायनम्’ नियमित लिखने लगे। कभी-कभी यहाँ ऐसे ब्लॉग भी टकरा जाते हैं जो अब उतने नियमित नहीं हैं या बिलकुल सो गए हैं। जैसे एक अनाम सी लड़की अर्चना का ब्लॉग है ‘तुम्हारे लिए’। वह वहाँ पिछले साल सितंबर के बाद नहीं है। इन्हे किन अर्थों में लें?

फ़िर इधर एक बदला हुआ ट्रेंड दिखता है। कई ऐसे हैं जिनके पास कहने के लिए बहुत कुछ है। वे अभी भी उतनी संवेदनशीलता से अपनी बात कह रहे हैं। उनके अनुभवों में, विचारों में, कहने में वैविध्य बना हुआ है। वे समानान्तर उस जगह का इस्तेमाल करते रह सकते हैं। पर वे अब ब्लॉग की जगह ‘फ़ेसबुक’ पर अपनी बात कहते हैं। उदय प्रकाश अब वहाँ कोई पोस्ट नहीं लगाते। प्रियदर्शन बड़े विनयपूर्वक पढ़ने का आग्रह यहीं अपनी दिवार पर कर देते हैं। ‘बात पते की’ कभी पब्लिक डोमेन में खुला मिला ही नहीं। मनीषा पाण्डेय कभी ‘बेदखल की डायरी’ लिखती थीं। अब यहीं रहती हैं। एक तरफ़ यह उन्हे लक्षित पाठक वर्ग से सीधे जोड़ता है, साथ ही यहाँ सरलता से उन सबकी त्वरित टिप्पणियों से परिचित हो जाते हैं। पर अगर यह सिर्फ़ संवाद की बात है तब समझ नहीं आता कि फ़िर किशोर चौधरी ने अपने ब्लॉग ‘हथकढ़’ पर कमेंट्स को डिसेबल क्यों कर रखा है।

अभी जब इसी पोस्ट के लिए गूगल की तलाशी ले रहा था तब कहीं पढ़ा के रवीश एक जगह कहते हैं जब भी वह ‘हिंदुस्तान’ के अपने साप्ताहिक कॉलम ‘कमेंटरी’ के लिए ब्लॉग ढूँढते थे, तब उनका सारा ध्यान इस बात पर होता था कि इस हिन्दी में साहित्यिक विषयों से इतर कहीं लिखा उन्हे मिले। वह उन पुरानी यादों बातों संस्मरणों के विशुद्ध हिन्दी पाठ न हों। उनमे विषयों को लेकर विविधता हो। यह सच है के हममे से अधिकतर का लेखन इसी हिन्दी की साहित्यिक परिभाषा में समा जाने की इच्छा से लिखा जा रहा है। क्योंकि हम वहाँ नहीं हैं, हमारे अनुभव वहाँ नहीं हैं इसलिए सबसे पहले हम वहाँ हो जाना चाहते हैं। और ऐसा लगता है अभी यही चलने वाला है। हम पहले ख़ुद को तो कह लें। पर ऐसा भी नहीं है के यहाँ साहित्येतर कुछ नहीं लिखा जा रहा।

लेकिन अभी जो बात ऊपर से सीधे जुड़ रही है। वह यह कि वहीं किसी लिंक पर रवीश के कॉलम के दोहज़ार दस में बंद हो जाने पर एक पाठक यह लिखता है के वे इसका मौखिक इतिहास लिख रहे थे। उस परंपरा में अभी कोई नज़र नहीं आता। हम इससे लिखना भी सीख रहे थे। पर यहाँ जो महत्वपूर्ण बात रही जा रही है वह यह कि इस तरह रवीश ने प्रिंट मीडिया में ब्लॉग के लिए जगह बनाई। यह इसे अगंभीर माध्यम के बजाय एक संभावनाशील माध्यम के रूप में स्थापित करते हैं। तभी आज बड़े से बड़े अख़बार में इन आवाज़ों के लिए नियमित स्थान सुनिश्चित है। ‘ब्लॉग् इन मीडिया’ वैबसाइट की परिकल्पना इसी के बाद का विचार है। जो इन अखबारों में प्रकाशित होते ब्लॉगों का संकलन करती है। उन्हे बाकायदा वहाँ ब्लॉगवार रखती है। 

प्रवीण ने संस्थानिक प्रयासों की बात की है। पता नहीं इसे संस्थानिक प्रयास माना जाएगा के नहीं। फ़िर भी लिखे दे रहा हूँ। बड़े दिनों से बात घूम रही है। जिस विश्वविद्यालय से मैंने पढ़ाई की है वहीं से विनीत और मिहिर अपनी पीएचडी कर रहे हैं। अमितेश मेरा बैचमेट है। तीनों को जेआरएफ़ मिली। वे क्रमश मीडिया, सिनेमा और रंगमंच पर शोधरत हैं। इस तरह तीनों को विश्वविद्यालय में रुकने के पर्याप्त मौके मिले। जो कईयों को नहीं मिल पाते हैं। अब जो बात इस पूर्वपक्ष के बाद ब्लॉग के संदर्भ में कहने लायक है वह यह कि विनीत की ‘हुंकार’, मिहिर का ‘आवारा हूँ..’ और अमितेश के ‘रंगविमर्श’ को इस रूप में क्या माना जाये? यहाँ आना इनका स्वतंत्र निर्णय हो सकता है, पर क्या उस स्थिति में भी वे इसी तरह इन्ही विषयों पर लिख रहे होते? इसका कोई तयशुदा उत्तर नहीं हो सकता। हो सकता है वे लिखते पर इन विषयों पर इन संरचनाओं में नहीं।

हो सकता है वह आलोक की तरह अपना ब्लॉग बनाते। ‘लोकरंजन’। वह भी इसी विश्वविद्यालय से हिन्दी में पोस्टग्रेजुएट है। पर इतने व्यवस्थित ढंग से इन विषयों को नहीं चुनते। वह राकेश की तरह दो हज़ार छह के बाद पिछले साल ‘अ-कल्पना’ बनाते। जिसपर चाहकर भी वह वक़्त नहीं दे पाते। वह आशीष हो जाते। जो पैरा-टीचर होने पर अपनी छटपटाहटें बाँटता।‘इश्क़ मेरा..’ लिखता है। पर कहीं पक्की नौकरी न होने की टीस उसे कुछ भी लिखने से रोकती रहती। वह भी बस यही सोचते रहता है, वह क्यों नहीं राजनीति विज्ञान में किसी कॉलेज में ऍड-हॉक पढ़ा रहा। इस तरह यह तीनों अ-संस्थागत हैं। यह उन्हे मौके नहीं देना है।

यह भावुकता का मामला नहीं है। यह अवसर बनाम प्रतिभा बनाम लेखन का मामला है। बहस बहुत लंबी है इसलिए इसे यहीं छोड़ते हैं। फ़िर कभी इस पर लौटेंगे। पर पहले विनीत तुमसे कुछ कहना है। उस दिन जब अभय कुमार दुबे तुम्हें कह रह थे सरोकार और प्रतिबद्धता की बाइनरी से निकल मीडिया को देखना शुरू करो, तब लगा था, तुम कुछ करोगे। पर तुमने निराश किया। यह माध्यम जितनी तेज़ी से बदल रहा है उसी अनुपात में तुम अभी भी ‘फ्रैंकफ़र्ट स्कूल’ में पड़े हुए हो। नयी शब्दावली की तरफ़ तो जाओ दोस्त। ऐसा हम कब तक पढ़ते रहेंगे। उसे साहित्य से भी हटाओ। ‘गेस्टाल्ट’ में देखना शुरू करो। आशा है तुम कोशिश करोगे।

ख़ैर। वह जो अभी विषयों के वैविध्य की बात चल रही थी, वहाँ यही कह सकते हैं के अभी हम बहुत पीछे हैं। यह सिर्फ़ भाषा का मामला नहीं, यह इस माध्यम की भी दिक्कत है। विद्यालयी स्तर पर हिन्दी किन विषयों को ढो रही है। यह चयन का अवसर ही नहीं देती कि ‘स्थापत्य’ की पढ़ाई हिन्दी में कोई कर सके। ‘आयुर्विज्ञान’ एम्स के बाहर लगे बोर्ड में इतना अपरिचित लगता है तब जबकि वह मेडिकल की हिन्दी की किताबों में आने के बाद उसका क्या होगा? ऑटोमोबिल्स, ऍरोनॉटिक्स में तो कभी सोच भी नहीं सकते। हम हिन्दी मीडिया की पढ़ाई में ही अपनी स्वतंत्र पारिभाषिक शब्दावली नहीं गढ़ पाये हैं। इनपर हिन्दी में लिखने वाले कहाँ से मिलेंगे। थोड़ा बहुत इतिहास ‘सिंहावलोकन’ पर जान लेते थे वह भी महीनों से पता नहीं क्यों रुका हुआ है। ‘मल्हार’ अपने किस्म का ठिकाना है। फ़िर घुमक्कड़ी पर ठीक ठाक लिखने वाले दो ही लोग हैं देशज जगहों पर ‘नीरज’ और विदेशी हवाई यात्राओं के लिए ‘मनीष कुमार’। अभी पिछले साल इंडीब्लॉगर ने पचास श्रेणियों में सर्वश्रेष्ठ ब्लॉगों को चुना है। उनसे गुजरते हुए लगता है अभी कितनी जगहें खाली पड़ी हैं। उन्हे भरना है।

हमें बस एक ही नयी चीज़ ने आकर्षित किया। पॉडकास्ट। उसके बाद हमारी सूई रुक गयी। आज जब वापस ‘आवाज़’ पर लौटता हूँ तब वह ‘फ्लैश प्लेयर’ सिर्फ़ ‘बफ़रिंग’ करते हैं, उनसे लौटकर कोई आवाज़ नहीं आती। सजीव सारथी के ‘रेडियो प्लेबैक इंडिया’, इरफ़ान की ‘टूटी हुई बिखरी हुई’, अनुराग शर्मा के ‘पॉडकास्ट’, प्रमोद सिंह के ‘अजदक’ के अलावे मनीष कुमार के यहाँ कभी कभी कुछ सुन लेते हैं। फ़ोटो ब्लॉग के लिए तस्वीर खींचने वाला कैमरा चाहिए। जो लगता है सिर्फ़ एफ़बी पर एल्बम बनाने के अतिरिक्त कोई और काम नहीं कर सकता। कुछ कार्टूनिस्ट के अपने अड्डे हैं। इसके बाहर जो कुछ भी है वह कविता है। और कुछ नहीं।

भाषा पर एक महत्वपूर्ण बात इनसबके बीच रहती गयी। वह यह कि कई ऐसे ब्लॉगर हैं जो एक से अधिक ब्लॉग लिखते हैं और उनके यहाँ दो तरह की भाषाएँ नज़र आती हैं। यहाँ दो उदाहरण हैं। एक सागर हैं। उनके दो ब्लॉग ‘सोचालय’ और ‘बैरंग’।  दूसरे अभि। इनके भी दो ब्लॉग। ‘एहसास प्यार का’ और ‘मेरी बातें’। दोनों जगह वह दोनों नियमित लिखते हैं। पर इस तरह उनकी भाषा एक से दूसरे ब्लॉग में आवाजाही नहीं करती। यह सचेत है या अवचेतन में कोई भाषिक मकेनेज़िम अपना काम कर रहा होता है कि विषय, भाव, समय के साथ कैसी भाषा बरतनी है वह स्वतः अपना काम करते रहते हैं। वे दोनों जगह दो अलग तरहों से लिख रहे होते हैं।

फ़िर आख़िरी में एक बात कहकर अपनी बात ख़त्म कर दूँगा कि हिन्दी अभी भी भाव और विचार पक्ष में विभाजित लगती है। यह बहुत विस्तृत खाँचें हैं। पर दिखता ऐसा ही है। पर यह भी यथास्थितिवादी नहीं है। वह ठीक है के उन ब्लॉगों के दीर्घजीवी रहने कि संभावना अपने प्रारम्भ से ही अधिक रहती है जो किसी के व्यक्तिगत प्रयासों से अधिक सामूहिक वैचारिक आग्रह लिए होते हैं। जैसे एक गलत उदाहरण यहाँ फ़िट करने की कोशिश में प्रभात रंजन का ‘जानकीपुल’, अशोक कुमार पाण्डेय का ‘कबाड़खाना’। या ‘अनुनाद’ या ‘सबद’ या ‘पढ़ते-पढ़ते’ या ऐसा ही कोई और। इनमे स्वयं व्यक्तिगत रूप से इनकी भागीदारी कम है। वे नियमित रूप से अपनी अभिव्यक्ति के साथ वहाँ उपस्थित नहीं होते। फ़िर इन्हे ‘वेब पोर्टल’ जैसी शब्दावली में भी गिना जा सकता है। पर दूसरी तरफ़ स्त्रियों की आवाज़ें हैं। कई इसे ‘वैचारिक भावुकता’ भी कह सकते हैं, जहाँ आराधना का ‘ब्लॉग’ है।‘लहरों’ वाली पूजा है। ‘मैं घुमन्तू’ की अनु चौधरी के अनुभव हैं। इनके बिना हम कुछ भी नहीं हैं। यह हमारे समाज का जीवित इतिहास हैं। जिस आईने में रोज़ ख़ुद को देखने से हम एक नए समाज का निर्माण कर सकते हैं। यह उसकी पहली भूमिकायेँ हैं।

पोस्ट चार पन्ने की हो गयी है। पर एक साथ ही लगाए दे रहा हूँ। इसे बीच में कहाँ तोड़ता समझ नहीं आया इसलिए। जो इसके पीछे जाना चाहते हैं, वह राकेश कुमार सिंह द्वारा दो हज़ार नौ की बैठक वाला शोध पत्र देख सकते हैं। फ़िलहाल ‘मसिजीवी’ की तरह इनका ‘हफ़्तावार’ भी बंद है। ऐसा ही कुछ हाल चन्दन पाण्डेय की ‘नयी बात’ का है। यह मूल्यपरक टिप्पणी नहीं वस्तुपरक टीका है। और जो सब रह गया है, वह नीचे बताते जाएँ तो अच्छा होगा..!!

जनवरी 06, 2014

हम बस लिख रहे हैं

लिखने का मन नहीं है। फ़िर भी अगर आ गया हूँ तो कोई न कोई बात तो होगी। बात है ही कुछ ऐसी। वरना सच में टाल जाता। तो शुरू कर रहा हूँ। 

शायद तुम इस तक बहुत दिन बाद पहुँचो। पर आज सुबह जनसत्ता में तुम्हारा लिखा पढ़कर थोड़ा उदास हो गया। सोचने लगा, इसमे मैं कहाँ हूँ? फ़िर सोचा अगर मैं भी अपनी डायरियाँ व्यक्तिवादी ‘आत्मस्वीकृतियों’ से भरे दे रहा हूँ, तो यह मेरे लिए भी लिखा गया है। कहीं पढ़ा था..शायद ‘मोहन राकेश की डायरी’ में.. कि‘लेखक कभी भी किसी विचार के प्रति नहीं, उस समय के समाज के प्रति प्रतिबद्ध होता है, जिसमें वह रहता है’। तब से यह बात दिमाग में कहीं टाँक ली है। कभी-कभी उधर भी चला जाता हूँ। जैसे आज अभी। सोचे जाने की दरमियानी में। देखें कहाँ पहुँच रहे हैं। 

पता है उससे गुजरते हुए सबसे पहला ख़्याल क्या आया मन में? यही कि कभी-कभी तुम्हारे ब्लॉग को भी पढ़ लेता हूँ। पर अधिकतर वहदेर रात के रागनहीं होते। वह किन्ही दूसरों की लिखा-पढ़ी होती है। तुम भी लिखती हो। फ़िर भी ऐसा कैसे कह गयी, समझ नहीं पाया। शायद विचारों का आग्रह ऐसे ही अपना काम करता है। तब उस रचना प्रक्रिया को महसूस करना तो दूर की बात है। यहाँ मैं दूसरों की नहीं कहता। न यह समझना कि उन बाकी सबकी तरफ़ से कह रहा हूँ। वह मुझसे जादा स्थापित हैं। अपना पक्ष मुझसे बेहतर रख लेंगे। इसलिए इसे मेरे एकांत के आदिवास का वक्तव्य ही मानना। फ़िर बातें हैं, बातें तो होती रहेंगी..

हमें यह कभी समझ नहीं आता के कोई यह कैसे बता सकता है कि किस तरह लिखना चाहिए। ध्यान देने लायक है कि यह बता कौन रहा है? फ़िर अगर जैसा वह चाहते हैं, वैसा नहीं लिखा गया, तब आप ‘आत्मकेंद्रित प्रतिस्पर्धा’ के खिलाड़ी मान लिए जाएँगे। चूँकि जो कुछ भी हम लिख रहे हैं वह हमारे रचनात्मक लेखन में अपने समय समाज के जीवन वहाँ उपस्थित अंतरसंबंधों, व्यक्तित्वों की बनावट-बुनावट और उनके आत्मिक संसार का खंडित आभासी और विरूपित चित्र है। और जब हम लिख रहे होते हैं तब अपने देशकाल का चित्र इसलिए उपस्थित नहीं कर पाते क्योंकि उसकी गतिकी को समझना ज़रूरी नहीं है। उनकी यह अपेक्षा किस तरह का ख़ाका बना रही है? वह किस श्रेणी-विचार-भाव को अपनी कसौटी मानते हैं। जिनपर खरा न उतरने पर आपको ख़ारिज कर दिया जाएगा। उस लिखे गए का कोई सामाजिक मूल्य नहीं लगाया जाएगा। यह ठीक है के सब अपने आग्रहों-पूर्वाग्रहों-झुकावों को स्वतंत्र रूप से निर्मित हुआ मानते हैं। ख़ुद वह कितने हैं, यह अलग विषय है। फ़िर वे उसपर कितनी बात करते हैं, यह देखने लायक है।

हम लेखन में कितने निजी हों और कितने सामाजिक यह हमारा व्यक्तिगत चयन है। हम कहीं से भी नहीं चाहते के हमें कोई आकर प्रामाणित करे। यह संस्थागत होते जाने की सहूलियत का प्रति-विचार है। काउंटर थॉट। ‘विचारधारा’ ऐसी ही संस्था है। जिसके अपने बने बनाए खाँचे हैं। हम उनमे ढलने को तय्यार नहीं हैं। अब तो कतई नहीं। यह हमारा अस्वीकार है। यह ठीक है के अपने पहले के दिनों में अपने ‘सामाजिक मूल्य’ को ध्यान में रखकर लिखना शुरू किया। पर आज, बिलकुल अभी, अगर उसकी कसौटी पर मुझे नकार दिया जाये तो कोई क्षोभ नहीं होगा। जिस विचारधारा से संचालित होकर वे लेखन को पूँजीवाद से लड़ने का हथियार बता रही हैं। और एक एककर दूर अतीत से रूसो, फ्रांस मेहरिंग की कृतियाँ ढूँढकर ला रही हैं। वहाँ एक हम भी हैं। यह अकेले होना कमज़ोरी नहीं है। हम भी उस पूँजीवाद के साथ नहीं हैं। हमारा एकांत उससे लड़ रहा है। जहाँ इस विश्व की सारी व्यवस्थाएं समरूप होती जा रही हैं और इस एकरूपता में अपनी आर्थिक उपलब्धि देख रही हैं; वहीं हम भी कहीं छिपे दबे स्वर में अपनी बात कह रहे हैं। भले हमारा ढंग अलग हो। पर हम भी उसके लिए अपने तरीके से ‘एंटि-थीसिस’ रच रहे हैं।

यह ‘व्यक्तिवाद’ का प्रस्तावित वक्तव्य नहीं है। यह विचाधारा के स्तर पर समरूप होते जाने का नकार है। हम भी इन नयी बनती संरचनाओं संस्थाओं की गतिकी को समझने की कोशिश कर रहे हैं। पर हमारे विखंडन का तरीका वैसा नहीं है, जैसा आपका है। यह किसी भी तरह से संशोधनवाद की तरफ झुका प्रस्ताव नहीं है। यह उत्तर आधुनिकता भी नहीं है। यह किसी स्वतंत्र पाठ को पढ़ने का आग्रह भी नहीं है। बल्कि यह वैचारिक स्तर पर बहुत कमज़ोर सा वक्तव्य है। जिसे कोई सुनना नहीं चाहता। समझने को कोशिश तो बाद की बात है। शुरुवात होगी सुनने से। इतमीनान से सोचने से। यह नए तरीके से संवाद स्थापित करने की कोशिश है। हम नहीं कह रहे के इन लिखे पन्नों को ‘सबाल्टर्न’ मान लिया जाये। यह हमारे हिस्से की हिस्सेदारी है। जिसे कोई हमसे पूछ नहीं रहा। पर यह हमारी ही ज़िद है कि बोले जा रहे हैं। कभी कोई ठहरकर पूछेगा। कैसे हो? क्या करते रहे अब तक? तब उसे यही पोथी पकड़ा देंगे। फ़िर चुप हो जाएँगे। फ़िर कभी नहीं बोलेंगे। कहने पर भी नहीं। तुम कहते रहो, फ़िर भी नहीं। मैं चुप हो जाऊँगा। हमेशा के लिए।

आवाज़ें..

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