फ़रवरी 16, 2014

अध्यापक की नई परिभाषा

{इसे यहाँ पोस्ट करने का मन नहीं था, फ़िर भी किए देता हूँ। इसके बाद यह कोई न पूछे, नीचे जो लिखा है; वह सच है या झूठ। कई चीज़ें सिर्फ़ यही नहीं होती। उससे आगे जाती हैं। बस कल सुबह एक क्लास में बैठा यही सब कागज़ पर उतरा। }

अगर हम थोड़ा जोख़िम या साहस लेकर, ख़ुद को 'अध्यापक' मानने की गलती करें, तब वर्तमान स्थिति कैसी बनती है? यह पद आज अपने अंदर किन मूल्यों को समाहित किए हुए है? यह किन अर्थों को हमारे द्वारा हमारे विद्यार्थियों की ओर ले जाता है? इस दुतरफ़ी प्रक्रिया में यह किस प्रकार आकार लेता है? समाज हमें इस पेशे के कारण कैसे पहचानता है? इस कमरे में बैठे-बैठे ऐसे तमाम सवाल दिमाग में चल रहे हैं जो अचानक किसी विस्फोट के बाद उत्पन्न नहीं हुए हैं। इन का होना इस समूची प्रक्रिया का क्रमिक विकास है। यह विद्यालय की चारदीवारी के भीतर अलग अलग समरूपी छात्रों के बीच हमारी बनती बिगड़ती छवि को लगातार बनाते बिगाड़ते हैं।

दस बजकर कुछ मिनट हुए हैं। पिछली घंटी में बारहवीं के एक लड़के ने एक वरिष्ठ अध्यापक को अपशब्द कहे। गालियाँ दी। सारे अध्यापक उस छात्र को स्वतः आरोपी मानकर उसे दंडित करने की माँग कर रहे हैं। कुछ मुखर होकर, कुछ दबे स्वर में। पर ध्यान से देखे बिना भी कोई इस स्थापना पर पहुँच सकता है कि उसके ऐसा कहने में कुछ भी 'असामाजिक' नहीं है। उसने इन सालों में, यहाँ तक पहुँचने में जो कुछ भी सीखा, जो कुछ उसे अपने परिवेश से मिला, वह उसी का प्रदर्शन हमारे सामने कर रहा है। अभी जिस कक्षा में बैठा हूँ, यहाँ छात्र इतनी स्वतन्त्रता महसूस करते आ रहे हैं कि बाहर जाने और अंदर आने से पहले कोई नहीं पूछता। वे बिना किसी समस्या क बे-रोकटोक आ रहे हैं, जा रहे हैं। गालियाँ उनकी बातों में किसी स्वाभाविक अभिव्यक्ति की तरह आती है। अगर उनकी बातों में यह न हों तब उनका वजन शायद कुछ कम हो जाये जैसे। यह लोकतान्त्रिक कक्षा का कौन सा 'मॉडल' है समझ नहीं आता। क्या वे इस मूल्य तक कभी पहुँच भी पाएंगे। यह स्वानुसाशन क्या होता है, जान पाएंगे? पता नहीं। 

फ़िर ऐसी स्थिति में हम यहाँ क्या कर रहे हैं? हमारे होने न होने का कोई मतलब नहीं है। यहाँ किस तरह से हस्तक्षेप किया जाए, इसका भी कोई बना बनाया ढर्रा नहीं है। जितना कह सकते हैं, उससे कोई फ़रक नहीं पड़ने वाला। थोड़ा बहुत लिहाज़ कर भी लिया तो सामने पड़ने पर कुछ नहीं कहेंगे, पर यह अपशब्द उनकी भाषा से गायब हो जाएँ, ऐसा नहीं हो सकता। यह किसी को छेड़ने का मौका है। तंज़ कसने का तरीका। इसकी पुरुष सत्तात्मक व्याख्याएँ फ़िलहाल स्थगित कर आगे बढ़ते हैं। उनके बारे में तो यहाँ वहाँ बहुत कहा जा चुका है। जो नहीं कहा है, वही कह रहा हूँ। वे मौके बे-मौके कुछ-कुछ कहते रहेंगे। उन्हे कभी फ़रक पड़ेगा? पता नहीं।

यहाँ दिक्कत यह है कि वह घटना जो ऊपर अध्यापक के साथ घटित हुई उसमें हम सब मिलकर छात्र के व्यवहार में कोई गुणात्मक परिवर्तन क्यों नहीं ला पाये? यह असल में 'एजेंसी' के रूप में हमारी विफलता है। लेकिन इसे नैतिक शिक्षा जैसे दक्षिणपंथी पूर्वाग्रह की तरह समझने में यही दिक्कत है, जिससे हमें बचना होगा। हम मिलकर अगर उनके सलीकों को नहीं बदल पा रहे, तब क्या किया जा सकता है? समानुपात  में हम उन्हे बात बात में टोकें उनपर कड़ी नज़र रखने के लिए आगे पीछे घुमंतू दस्तों को निर्माण करें या कुल मिलाकर विद्यालय का वातावरण ही एशिया बनाएँ कि उन्हे बाहर और अंदर के परिवेश में अंतर ख़ुद ब ख़ुद जान पड़ें। यह स्वाभाविक प्रक्रिया की तरह होना चाहिए। न कि बाहर से थोपे गए दिशा निर्देशों की तरह।

पर तब यहाँ हमारी भूमिका निर्णायक होगी। हमें सबसे पहले अपने व्यवहार में, चिंतन में, भाषा में, वह सब घटाना होगा जिसके कारण हम इस माहौल में बने रहे हैं। इसे ऐसा बनाए हुए हैं। हमें कक्षाओं के छात्रों को अध्यापकीय क्रियाकलापों से तत्काल प्रभाव से अलगाना होगा। उन्हे किसी भी तरह से उन तमाम गिनती वाली जिल्दों को भरने के लिए न दिया जाये। न किसी भी प्रकार से उनकी सहायता ली जाये, जिनमें वे अध्यापक के बाद कक्षा में स्वतः द्वितीय पंक्ति के दंडाधिकारी बन बैठते हैं। उनकी भूमिका को न्यूनतम स्तर पर लाना होगा। सहायक की तरह संचालक की तरह नहीं। अध्यापकों को  उन कक्षाओं में जाने के बाद ख़ुद को बच्चों के मोबाइल लेकर उनमें 'ब्लू फ़िल्मों' को देखने से ख़ुद को रोकना होगा। उन स्टाफ़रूमों में होती स्तरहीन अश्लील बातों को अपदस्थ करना होगा। किसी के पिता की दुकान से डिस्काउंट की इच्छा को खत्म करना होगा। उन्हे आधी छुट्टी या ऐसे ही किसी मौके पर सदर बाज़ार भेजकर अपने घर का समान लाने के लिए भेजने से रोक्न होगा। उन बच्चों के साथ वजीफे के पैसे लेने आई माँओं के शारीरिक सौष्ठव पर ध्यान केन्द्रित न कर बछों के अध्ययन से संबन्धित समस्याओं पर बात करनी चाहिए। छुट्टी के बाद ऊपर वाले कमरों में कुछ लड़कों को रोकने की बन गयी आदत से ख़ुद को मुक्त करना होगा। 

भले आज उस लड़के के अध्यापक को गाली देने फ़िर पुलिस बुलाने की घटना से इसका कोई सीधा संबंध न हो पर अगर ऐसा न होता तो कल स्कूल टाइम में क्लासों से पंखें गायब न होते और न प्रधानाचार्य महोदय पहले पुलिस थाने रिपोर्ट दर्ज़ कराने के बाद पहाड़गंज की दुकानों पर उन चोरी हुए पंखों की निशानदेही कर रहे होते। 

फ़रवरी 04, 2014

संजय व्यास की किताब: टिम टिम रास्तों के अक्स

फ़ेसबुक पर चैट करते वक़्त संजय व्यास की किताब ‘टिम टिम रास्तों के अक्स’ ऑर्डर की थी। यह मेरी पहली ऑनलाइन खरीदी किताब है। फ़्री होम डिलिवरी थी। आज सुबह मिली। सुबह ही बैठ गया। तब से लेकर अभी दस बजे रात तक कुछ-कुछ हिस्से पढ़ पाया हूँ, उन्ही पर यह फौरी नोट्स। पता नहीं कुछ काम के हैं भी या नहीं..यहाँ इसे ‘आइडिया’ की तरह लिया है। और कुछ सूत्र हैं, कुछ धागे हैं जिन्हे पकड़ने की कोशिश की है। तो शुरू करते हैं;

• किताब का मुखपृष्ठ ‘कैची’, माने चाक्षुष है। आँखों में ठहर जाने वाला। दो पुराने जमाने वाले स्विच बोर्ड। ‘नॉस्टेलजिया’ की तरह पीछे खींचते। कहीं अतीत की तरफ़ ले जाते।

• विषय अलग हैं, उनमे विविधता है। पर साथ ही एकसूत्रता भी है, जो उन्हे बाँधे हुए हैं। यह एकसूत्रता भावों, भाषा, और उसके शिल्प को लेकर है।एक सिरे से लेकर आखिरी सिरे तक।

• ‘विचार’ अनुपस्थित हैं। विचारधारात्मक आग्रह सतह पर नज़र नहीं आते। मतलब ‘ट्रेस’ करने लायक कोई सूत्र नहीं है; मतलब इसे किसी काल विशेष में ‘लोकेट’ करने लायक ‘मकैनिज़म’ नहीं है। फिर भी उनका काल है। विचार है।

• रेलगाड़ी में भरी गंध से अच्छा रात के ढाबे वाला संस्मरण/ शब्दचित्र है। रेलगाड़ी बेस्वाद लगती है। ढाबे का स्वाद इतनी तरह से अलग होकर हमारे अंदर घुलने लगता है। लगता है, हम भी वहीं-कहीं बैठे देख रहे हैं।

• यह जितने अनगढ़ है, अधूरे हैं, उसी अनुपात में ताज़गी भरे हैं। उनका कोई खाँचा नहीं है। उनकी कोई सीमा नहीं है। वह जितने खुले हैं, उतने ही पास लगते हैं। जेब में रखे बेतरह खुले सिक्कों की तरह उनकी आवाज़ अंदर उतरने लगती है।

• यादें इसकी ‘यूएसपी’ (USP) हैं। उनमें अतृप्त इच्छायेँ (प्रेम), जो बीतकर भी नहीं बिता है, उसका आग्रह (सात रुपये वाली कमीज) बनाए रखता है। कहीं दिल की कसक अंदर रिसने तक मीठे-मीठे दर्द की तरह बनी रही है।

• बचपन, सफ़र, रेल, बस, शहर, कस्बे, गृहस्थी, प्रेम, यौवन, बेतरह सबकी ज़िंदगियों में थोड़े-थोड़े घुलते मिलते रहे हैं।

• खो जाने का एहसास, कहीं न पहुँचने का डर, यहाँ काम करता चलता है। पाठक कहीं से भी शुरू करे, वह कहीं गुम नहीं होगा, इधर-उधर से लौट आएगा। वह कहीं ठहर भी जाएगा, तो वापस देख पाएगा अपना अक्स।

• फ़ेसबुक पर इस तरह के लिखी गयी ज़िन्दगी को सब कहानियाँ कहते पाये जा रहे हैं, पर अपने को यह ‘सूट’ नहीं किया। यह सब सपने हैं, जिनके घटित होते वक़्त हम नहीं थे, पर अब हैं। वहीं पास से सब देख रहे हैं। महसूस कर रहे हैं।

• सपने ही नहीं इन ‘ड्राफ्ट्स’ का आकार में छोटा होना भी इनकी पठनीयता को बचाए रखता है।

• पढ़ते वक़्त लगा यह इसकी एक और USP है; कि कहीं से भी शुरू करके इसे खत्म किया जा सकता है। शुरू से लेकर आखिरी तक चिपके नहीं रहना पड़ता। कहीं से उठ जाने पर, कहीं भी बंद कर सकते हैं।

अभी के लिए आखिरी में यही लिख रहा हूँ कि हम किताब में वही ढूंढते हैं, जो हममे गायब रहता है। या जिसकी हमें सबसे जादा ज़रूरत रहती है। जैसे मेरे ख़ुद के लिए पुराने दिन, शहर, सपने, कमरे, प्यार, अतीत में रुका रह गया कोई खटका।

यह सब बिन्दु किसी विशेष पदानुक्रम को प्रकट नहीं करते हैं। इसकी और भी व्याख्याएँ हो सकती हैं, पर अभी के लिए मेरा 'पाठ' यही है। पता नहीं इसे और किस तरह से पकड़ा जा सकता था। हमारे हाथ तो इसी तरह लगी।

तुम मेरे पास ही हो..

सच में कल रात की पोस्ट एक फ़िलर है। वहाँ जो कुछ भी लिखा है, वह पता नहीं क्या है? मन बस ऐसे ही बैठे रहने को था। तुम्हारा इंतेज़ार कर रहा था। तुम्हें बिन बताए। अचानक तुम्हारे पास पहुँच गया। वो दस बजकर पाँच मिनट वाली मिस कॉल के बाद तो जैसे नींद आई ही नहीं। उठकर नीचे आ गया। लगा अभी जब सब खाना खा लेंगे, तब इत्मीनान से फ़ोन आएगा। कहीं इस बीच सो न जाऊँ, इसलिए कुछ-कुछ सोचने लगा। इस पूरे दिन पर.. बड़े अजीब ढब से यह गुज़र रहा था। पास ही से होकर गुज़रा, पर पहचान में नहीं आया। यह कल सुबह की बात नहीं, पिछले दो-तीन दिनों का हासिल था। के खाली- खाली सा लगता रहा। पास न होने का एहसास, दिल में सूई की तरह चुभने लगा। लगा दिल धड़क नहीं रहा, साँस ले रहा है। बड़ी आहिस्ते से आवाज़ करता कि कहीं जग न जाऊँ। जगकर तुम्हें ढूँढता, तब क्या होता?

आज सुबह भी बड़े अनमने ढंग से उठा। मन नहीं था जाने का। सोचता रहा, यहीं रुक जाता हूँ। पर तब वक़्त और भारी पड़ता। बिलकुल अकेले उन भावों से जीत नहीं पाता। जेब में आईना होता, तो देखता, चेहरे पर यह भाव किस तरह दिख रहे हैं। अभी जब लिखने बैठा हूँ, कल ही दिमाग पर छाया हुआ है। शाम बड़े इत्मीनान से डायरी में लिख रहा था। हमें इन दूरियों में कैसे नहीं होते जाना। जो-जो नहीं करने की हिदायतें वहाँ ख़ुद को देता जा रहा था, रात उनसे ही दूर छिटक गया। ख़ुद को कमज़ोर न करने वाली बात हवा हो गयी। तुम्हारी आवाज़ सुन बे-तरह बनता गया। लिखा था, क्योंकि हम दूर हैं इसलिए इन भावों से नहीं भरेंगे। वरना दूसरा भी उन्ही तरहों से ख़ुद को सालता रहेगा। कहना ज़रूरी नहीं। कुछ क्षण की चुप्पी, दोनों तरफ़ से आर-पार हो जाने के लिए काफ़ी है। दिल नासाज़ है। तार टूटने लगता है। झंकार नहीं बजती। न गले से, न हलक से नीचे उतरकर पेट की तरफ़ जाती डकार, हिचकी में बदलती जाती है। यह हमेशा पास ही रही है। जीभ के पास। थूक से सनती नहीं, प्यार से वहीं लिपटी धरी रहती है।

पता है, असल में होता क्या है? जिन क्षणों में, इधर, मैं जैसे भी भावों से गुज़र रहा होता हूँ, उन्हे वैसे ही उन्ही क्षणों में तुम तक पहुँचा दूँ। और ऐसा करने के बाद, तुम भी उन्ही एहसासों से भरकर, मेरे करीब आ जाओ। ऐसा करते जाना इधर जादा होता जा रहा है। पता नहीं क्यों? यह यही करता है। दोनों को एक ही वक़्त एक सा महसूस कराते जाना। इसमे जितनी सघनता होगी, यह उसी अनुपात में दूसरे को प्रभावित करेगा। दूसरे को अपनी जद में लेती जाएगी। पर ज़रूरी नहीं कि वह दूसरा भी उसी क्षण बता दे। क्योंकि दोनों का एकसाथ ऐसे होते जान उन्हे बारी-बारी नहीं तोड़ेगा। एक साथ तोड़ेगा। हम थोड़ी देर चुप रहकर इसे छिपाना भी चाहें, तब भी नहीं छिपा पाते। यही चुप्पी बताती जाती है, अंदर क्या उमड़-घुमड़ रहा है। जिसे जानबूझकर छिपा रहे थे, वह अब वैसा नहीं है। इसके सामने आने पर दोनों आहिस्ते से समझाते हैं। थोड़ी देर मन में ही संभल जाते हैं। ताकि इस तरह न होते रहें। बचे रहें।

कभी-कभी लगता है ख़ुद तो परेशान होता ही हूँ, तुम्हें भी परेशान कर देता हूँ। कल पूरा दिन ऐसे बितता रहा के तुम तक पहुँच जाऊँ। पर नहीं। सोच रहा हूँ, कल रात वह मैसेज क्यों किया? फ़िर बारह बजे वाली दो मिस कॉल। परेशान हूँ। पर, इस वक़्त तुम्हें इस तरह नहीं होने देना था। पता नहीं, बिन बताए तुम कैसी होती गयी होगी। तुम शायद मुझसे जादा समझदार हो। बताती नहीं हो। बताती नहीं हो, इन दिनों इन रातों कैसे-कैसे बिन सोये रात ख़यालों में खोयी-खोयी सी रहती हो। बस चुपके से कहीं छिप जाती होगी। कि कहीं पलकों में रह गयी बूंदों को कोई न देख ले। तुम बार-बार ऐसी छोटी-छोटी बातों में फँस जाने की आदत पर कहती हो। पता है बार-बार ऐसे करने से हम कमज़ोर होते जाएँगे। एक दूसरे को संभालने के लिए भौतिक रूप से हम उपस्थित नहीं हैं। इसलिए भी यह कितनी देर किस रूप में रहेगा, कहा नहीं जा सकता। यह अवसाद नहीं है। परेशानी है। आकुलता है। बेकरारी है। बेसबरी है।

पर हरबार ऐसा ही होता जाता हूँ। तब आहिस्ते से दिल में कहता हूँ, अभी तुम पास नहीं हो न इसलिए। जब साथ तुम रहोगी, तब कहीं ऐसे नहीं अरझूँगा। तब तुम कहीं अटकने ही नहीं दोगी। तब हम सपनों की तरह सच में साथ होंगे।

फ़रवरी 03, 2014

अभी भी सपनों के पीछे..

इन सालों में इतना ख़राब कभी नहीं लिखा। लिखना ताकत देता है। यह बिखरने से बचाता है। टूटने से लगातार ख़राब दिनों रातों से निकालता रहा है। ऐसे तोड़ता नहीं है। पर न मालुम उस रात क्या हो गया। जिसे जैसे कहना था, उसके पीछे चिपका श्लेष, अपने अर्थों में उन ध्वनियों को ले गया, जो कभी सोचने को नहीं होता। मन ऐसा ही है शायद। शायद बिलकुल बिखरा हुआ। टूटा सा। बे-सबर। कहीं इंतज़ार करते-करते थक सा गया। इन बीतते क्षणों में कहीं न स्थित होता, बेतरतीब भागता रहा है। यह बिखरी हुई भूमिका उस कुबूलनामे का हलफ़नामा नहीं है। बस ऐसे ही लगा कि उसके बाद बहुत सारे सवाल सामने दिख पड़े हैं, जिनके जवाब मुझे देने हैं। उन्हे दिये बिना काम नहीं चलेगा।

तो कोशिश करता हूँ एक-एक कर तरतीब से सब कहता चलूँ..

हमारे सर इसे ज़िंदगी का 'लिट्मस टेस्ट' कहते हैं। यह संक्रामण काल है, जहाँ हमारी जाँच चल रही है। हम कैसे इन सारी विपरीत परिस्थितियों में ख़ुद को साबित करते हैं, यही सवाल सबसे जादा महत्वपूर्ण है। ज़रुरी है इन सबमें से ख़ुद को बचाकर रख लेना। चाहे जैसे भी हो, हमें यह करना होगा। पर शायद लिखते वक़्त हम इतने वैचारिक आग्रहों को कुछ देर के लिए स्थगित कर देते हैं। दिल थोड़ा साँस लेने लगता है। मन थोड़ा उदास-सा कहीं किसी टूटी कुर्सी के पास खड़ा, इंतज़ार में पैर दुखाता, वहीं बने रहना चाहता है। बने रहना इतना आसान नहीं। पर कोशिश है सूरत बदलेगी। कभी-न-कभी कुत्ते की तरह उसका दिन भी आएगा।

कामयाबी इस समाज में सापेक्ष है। हम ख़ुद के लिए नहीं, दूसरों के लिए सफ़ल होना चाहते हैं। इसकी परिभाषा हमने नहीं उन्होने गढ़ी है, जो हमसे बाहर हैं। ऐसा भी नहीं है के नौकरी का सपना हमने देर से देखना शुरू किया। पर यह ज़रूर है कि हमारी बढ़ती उम्र ने इसे हमारे झुके कंधों का बोझ कुछ और बढ़ा दिया। यह कुल मिलकर ऐसा दबाव है जिससे हम बच नहीं सकते। बचने वाले किस और मिट्टी के बने होंगे। हम इसके इर्दगिर्द बनते बिगड़ते दबावों, उलझनों, हताशा के जोड़ से अपने आप को बचा नहीं पाये।

लिखना इस रूप में अकर्मक क्रिया है जो किसी भी तरह से जीविकोपार्जन का कोई भी मौका बनाती नहीं दिख रही। इस सिलसिले में अपनी तरफ़ से कोशिश कितनी हुई, यह अलग से पूछे जाने लायक सवाल है। या हम इसे इस मद से अलग क्रिया मानते रहे और पूरे विश्वास के साथ खड़े रहे कि इस लिखने को हम पैसों में तब्दील नहीं कर सकते। कम से कम उन पैसों में जिनसे हम इन चारदिवारियों को लाँघ सकें। ऐसा नहीं है कि सपने देखना बंदकर, आँख मूँदे नयी दिल्ली रेलवे स्टेशन के कमला मार्केट की तरफ़ खुलते पुल पर कोई सस्ता सा नशा कर पेशाब में लथपथ पड़े हुए थे। नहीं। हमारे हिस्से इस तरह की अकर्मण्यता नहीं थी। हम दिमागी रुप से अक्षम बना दिये गए दिमाग थे। किसी लायक नहीं। बस जोड़-गाँठ कर कुछ-कुछ लिखने लायक हो गए थे। जिन्हे पूछना तो दूर, कोई जानता भी नहीं है। यह जानना अपनों की भीड़ में पहचाने जाने लायक बनने का है। जो हम किसी भी हाल में नहीं हैं।

पिछली पोस्ट इन्ही सबको मिलाकर ख़ुद को उस तरफ़ ले गयी, जहाँ इन सारी उलझनों के लिए एक ही तरीका बचता है। यह इस तरह हारे हुए लोगों का फैसला है। हम कभी हारेंगे नहीं। यह पिछले वाक्य वाला भाव  उन पंक्तियों से सिरे से गायब था। हम अभी हार भी रहे हैं तो क्या? हमने ख़ुद को इस तरह तो गढ़ा ही है कि कभी यहाँ से पलायन नहीं करेंगे। बस थोड़ा सा उखड़ सा गया था के यहाँ होना किसी अश्लील प्रहसन की तरह है। जहाँ हम जैसी उम्र वाले कितने साल पहले आर्थिक स्थायित्व की तरफ़ हो लिए और दूसरी तरफ़ हम अभी भी त्रिशंकु बने बीच में झूल रहे हैं। हम किसी ऐसे समाज में क्यों नहीं रह रहे जहाँ इस तरह सब नौकरी वाले हो जाने की बाध्यता से मुक्त होकर भी जिंदा रह रहे हैं। यहाँ की सारी व्यवस्थाएं मूलतः इस अर्थ में प्रतिगामी ही हैं जो व्यक्तिगत निर्णयों के लिए अब तक जगह नहीं बना सकी हैं। हम नौकरी नहीं कर रहे हैं, तो किसी तरह के दबाव से क्यों दबे जा रहे हैं..

अब इस तरह अगर मैं कहता हूँ के ब्लॉग पर लिखने की आवृति थोड़ी कम होती जाएगी तबइस दबाव को ही स्वीकृति देता चलता हूँ। पर यह कहीं से भी यह नहीं कहती कि अब लिखना छोड़ रहा हूँ। अभी भी इसके बजाए कागज़ पर ख़ुद को जादा आज़ाद महसूस करता हूँ। इसकी सीमाओं में लगातार इस 'स्पेस' को तोड़ा है। इसने ख़ुद को बुना है। पर उस हद तक ले जाने की हिम्मत कभी-कभी कम पड़ जाती है। सच कहूँ तो इस चल रहे साल में काम कुछ अलग तरह से करने का मन है। थोड़ा व्यवस्थित होकर। फ़िर बहुत से सपने हैं जिनके सच होने का साल है। उसमें कुछ ऐसे भी हैं जहाँ थोड़ा वक़्त कम पड़ जाएगा, तो कभी मन नहीं होगा। पर उसके लिए अभी यह जगह ठीक नहीं। डायरी में तो वह जमाने से है। यहाँ वक़्त आने पर..जब इंतज़ार खत्म हो जाएगा तब..

फ़िर कह तो रहा ही हूँ न..कि न सपने देखना छोड़ा है, न लिखना। मेरे यहाँ दोनों एक दूसरे के पर्याय की तरह आते हैं, बार-बार। बस पिछली पोस्ट की गड़बड़ यह है कि कई मर्तबा ऐसी बातें सिर्फ़ कागज़ में ही दबी रह जाती हैं, उन्हे चाहकह कर भी कह नहीं कहते। पर, वहाँ तब भी कहा था, यह दूसरों से पहले, मेरे लिए है। अभी भी ऐसा है। और जो रह गया है, उसे फ़िर कभी..

आवाज़ें..

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