मार्च 23, 2014

गुम होते इस शहर में गैरज़रूरी फुटनोट..

कभी-कभी लगता है दिल्ली पल-पल पीछे छूट रही है। ख़ुद कभी नहीं सोच पाता के कहाँ से चलकर किधर आगया हूँ। कहीं के लिए चला भी हूँ या हम वहीं पृथ्वी की तरह अपने अक्षों पर परिक्रमा कर रहे हैं। हो सकता है यह थोड़ी देर के लिए हुआ मतिभ्रम है, जो कहीं नहीं रहने देता। बस भगाता रहता है। आराम कहीं नहीं है। हाँफ नहीं रहा, फ़िर भी लगता है, साँस फूलने लगी है। फेफड़ों से हवा आ नहीं रही, अंदर ही अंदर धौकनी की हवा से सुलगते कोयले में बदल गया हूँ। कहते हैं एक-एक कर जितना चीज़ों को संग्रहीत करने का आनंद है, उसी तरह उन सब संकलित वस्तुओं को छोड़ने में भी है। यह स्थिति कभी-न-कभी हमारी ज़िंदगी में आएगी ज़रूर। यह एक तरह का नियतिवाद नहीं है। पर कुछ-कुछ वैसी ही है। यह बीतते साल हमें ऐसे ही इस तरफ़ ढकेल देते हैं।

पर, जब इस पंक्ति को इस शहर पर लगाता हूँ, तो लगता है, इधर हो कुछ ऐसा ही रहा है। इसे जितना समेटा था, वह धीरे-धीरे खिसक रहा है। यह मेरी इस शहर को लेकर बनी समझ के ढाँचे के दरकने जैसा है। मैं इसमें रह नहीं पा रहा। यह कुछ सालों से जैसी दिखी है, वैसी बस उन्ही पलों में बनी रही है। लगता है वहाँ से लौटते ही वह कुछ बदल गया है। और अगली बार जब वहाँ फ़िर जाऊँगा, तो पहचानने में दोनों को थोड़ा वक़्त लगेगा। यह इसमें गुम हो जाने का डर ही होगा, जो अब लगने लगा हो।

यह शहर मुझमें गुम होगा या यह मुझे अपने अंदर समा लेगा? या इस सवाल को पूछने में देर कर दी। यह सवाल बेमानी है। फ़िर लगता है, ऐसे सवालों का कोई मतलब भी नहीं है। शहर अपने आप में कितनी जटिल संरचनाओं में लगातार बनते-बिगड़ते रहते हैं। हमें तो बस कुछ सालों तक इसका हमसफ़र रहना है, उसके बाद न हम वैसे रहेंगे, न यह। पर कुछ देर रुककर देखता हूँ, तो लगता है, ये सारी दलीलें बहुत कमज़ोर हैं, बिलकुल मेरी तरह। नाज़ुक सी। इनमें संवेदनायेँ नहीं हैं फ़िर भी यह कुछ ऐसी ही हैं। क्या यह कभी मेरी तरह नहीं सोचेगा के इस व्यक्ति के लिए मैं उसके मन मुताबिक न रह सका। इसके लिए कभी बन भी नहीं पाया। फ़िर जो बात दिमाग में दिल के रास्ते से गुजरती है वह यह कि ख़ुद अपने आप में यह शहर ख़ुद के लिए कितना है। कभी कोई मर्ज़ी इसकी है भी या हम ऐसे ही इससे गिले-शिकवे लेकर बैठ जाते हैं? कभी उसकी सुनते हैं भी..

फ़िर ये जो मुझे लग रहा है कि कहीं पीछे छूट गया हूँ उसमें कहीं ऐसा तो नहीं कि मैंने इस शहर में निकलना ही कमकर दिया हो। या कि उन मौक़ों को जो पहले सहज लगते थे, उनकी अनुपस्थिति में दिल कोई और ही खेल खेल रहा हो? यह इस शहर की तरफ़ से नहीं है। मेरी तरफ़ से है। मुझे ऐसा लग रहा है। उसे कितना लग रहा होगा, इसे नापने के लिए कोई तरक़ीब मेरे पास नहीं है। क्या पता वह जगहें भी मेरी रह देखती हों। पर कभी कह न पायी हों। या उनका कहना मेरे कान में तेल डालने से काफ़ी पहले की बात हो। पता नहीं। पता नहीं यह सब क्या है? यह सब अंदर घटित हो भी रहा है या इन मच्छर काटती रातों का नतीजा है? पर बेचैनी अब कुछ कम रहती है। उसके बिन नींद अच्छी आ रही है। कभी-कभी मन अकेला हो जाता है, पर मना लेता हूँ। थोड़े दिन और..

अभी कच्चा हिसाब लगाया तो दिख पड़ा, छह महीने तो पक्का हो गए, कोई फ़िल्म देखने नहीं गए। आख़िरी देखी कौन सी थी, यह भी याद नहीं आ रही। हाइवे, क्वीन, गुलाब गैंग और कौन सी फ़िल्में आई हैं? पता नहीं। सच कहूँ तो याद करने का मन भी नहीं है। कुछ सोच रखा है। तुम्हारे लिए। एक वादे की तरह। इसलिए भी टाले देता हूँ। मार्च बस एक हफ़्ता और बचा है। इसके बाद अपना महिना। पता नहीं कितनी कितनी ठंडी, कितनी कितनी गरम रातें जोड़ जोड़कर यहाँ तक पहुँचें है। इतनी पास आकर उन शामों की उलझनों में कहीं नहीं ठहरना चाहता। इंतेज़ार अब नहीं होता। कुछ अधबुने सपने हैं, कुछ किश्तें हैं, चाँद है, हवा है, तुम्हारी आवाज़ है। आवाज़ में हम दोनों कुछ कुछ खोये खोये से रहते हैं। आगे नहीं रहेंगे। तुम आ जाओगी, तो यह शहर भी मेरे अंदर से बाहर आ जाएगा। यह भी तुम्हारे इंतज़ार में है। मेरी तरह। तुम्हारे साथ इसे फ़िर से बुनना है। सपने के शहर की तरह।

देखा यही होता है। तुम्हारा ज़िक्र आने के बाद सब ठीक होने लगता है जैसे। किसी की नज़र न लगे, इसीलिए काला टीका लगा लिया करो। कितनी बार तो कहा है। पर..चलो जाने दो। आज आवाज़ नहीं सुनी है न, इसीलिए शाम से अजीबो-गरीब बातें करने लगा। खाली-खाली से पलों में ऐसा ही होते जाता हूँ। सच कह रहा हूँ, डायरी में अब लिखने का सबर नहीं रहा, लगता है। वहाँ बैठने के मौके भी नहीं मिल रहे। घूम बहुत रहा हूँ। तभी कब सुबह होती है, कब रात नहीं पता चलता। अभी इन दिनों तो एक कार दिखाई दे रही है जो अब कभी गेट पर लौटते हुए खड़ी नहीं दिखेगी, उसपर लिखने का मन है। पर बच रहा हूँ। ऐसी बहुत सी बातें हैं, जो रह जाती हैं हरबार। और हर बार लौटते लौटते थोड़ा वक़्त तो लगता ही है। इस बारभी लग रहा है। 

मार्च 08, 2014

सपने में तुम हो, मैं हूँ, हम दोनों हैं..

रात बारह बजकर एक मिनट। घंटी बजी। उधर से फ़ोन नहीं आया। तुम सो गयी हो। समझ नहीं पा रहा, नींद आ रही है या आँखें ऐसे ही भारी हो रही हैं। पलकें घंटा भर पहले भी ऐसी थीं और अभी भी ऐसी ही हैं। नींद गायब है। सपने में भी नहीं हूँ के तुम तक पहुँच जाऊँ। करीब से हम दोनों, एक दूसरे के पास बैठे रहें। ठंड कुछ कम है। छत पर भी कुछ देर टहल सकते हैं। जैसे-जैसे दिन, शाम बन इन खत्म न होने वाली रातों में बदलते जा रहे हैं, ऐसे ही ख़यालों में खोया-सा रहता हूँ। तुम्हारे करीब आने के बहाने काम नहीं करते। काम करती है तुम्हारी आवाज़। पता नहीं फ़ोन पर तुम्हारी आवाज़ कैसी लगी। नींद से अचानक जगी हो जैसे। कुछ खोयी-खोयी सी। अनमनी नहीं। अकेली। खाली-खाली सी। हम जितने दूर हैं, उतनी ही तरह से पास हो जाना चाहते हैं। कभी ये न लगे, साथ नहीं हैं। यह सपने ही हैं, जो इस तरह आकर बचा ले जाते हैं। टूटने की हद तक जाकर वापस लौट आने की तरह। हर गुज़रती रात अपने आप ऐसे ही बुनती जा रही है। इनमे जितनी कम आवाज़ें हैं, यह उतनी ही तरहों से अंदर तक भरी हुई हैं। दिल की तह से आसमान की तह तक। तारों से लेकर सितारों तक। 

दिल में हर कोने में बैठी तुम चली आती हो, आँखों के सामने। हमदोनों एक दूसरे के पास थोड़ी देर वहीं बैठ जाते हैं। बात नहीं करते। बस ऐसे ही अबोले लेटे रहते हैं। एक दूसरे की तरफ़ देखते हुए बोलती हैं, दिल की धड़कनें। बड़े दिनों से सोच रहा हूँ, तुम्हें एक ख़त लिखूँ। अभी बैठ वही सोच रहा था। कभी पोस्ट नहीं करता। अपनी डायरी में छिपाये रखता। गुलाब के फ़ूल की तरह। उसकी ख़ुशबू में तैरती हम दोनों की तस्वीरें, जुगनुओं की तरह नाचती रहती। तालाब के पानी में उनकी परछाईं भी वैसे ही खेलती। खेलती रहती सुबह उजाला होने तक। वो ख़ुशबू टिमटिमाते तारों की छाव में, इन ठंडी रातों की हवा में सिमटती कहीं पेड़ के नीचे बैठ जाती। इसमें शब्द नहीं होते। होती झींगुरों की झंकार। तुम्हारे घुँगरू वाले पायल की आवाज़। जो दिल की धड़कन की जगह मेरे सीने में धड़कती है, हर रात। जैसे लहू नहीं, तुम बहती हो मेरी नसों में। साँसों में घुलती गंध हम दोनों की देह गंध होती। भीनी भीनी सी। हरसिंगार के फूलों की तरह। रजनीगंधा की पंखुड़ियों के जैसे। चम्पा की महक की तरह। हर रात ऐसी ही किसी सपनीली दुनिया में इंतज़ार करता सो नहीं जाता, उन बैलों की आँड़ में तुम्हारे बाहर आने की राह देखता, बैलगाड़ी से टेक लगा, वहीं खड़ा गुनगुनाता रहता। गुनगुनाता झींगुरों की तरह। तब भी कोई मेरी आवाज़ सुन नहीं पाता। सबको लगता रात ऐसे ही होती है। 

सारंग के पंखों की तरह छटपटाता वहीं ऊँघने को होता, तब चुपके से तुम बाहर निकलती। बड़े आहिस्ते से। पंजों के बल। एड़ियाँ उठाये। बिन आवाज़। बिन बोले। बिन कहे। तुम पायल घर निकाल आती। तुम्हारे लहँगे में तुरपाई किए सितारे चाँद की रोशनी में झिलमिलाते आँखों में पड़ते। आँखें मिलते ही दोनों चमकने लगते। लगता चंदा और चकोर मिल रहे हैं। कान की बाली धीरे से हवा में लहरती हुई दिखती। दिल देख धक्क सा होता। हर रात। तुम ऐसे ही पहर बीते निकलती। हमें देख कोई नहीं जागता। सब वैसे ही सोते रहते। उन्हे पता है, यह हमारा सपना है। उन्हे ऐसे ही सोते रहना है। हम बेखटके निमियक तरे बैठ जाएँगे। कोई कुछ नहीं कहेगा। कभी तुम्हारा मन इमली खाने को होता तो थोड़ी दूर बाहर निकाल आते। वहीं उन हवा के झोंकों के साथ हमारी आवाज़ें दूर तक जातीं और लौट कर वापस हम तक आतीं। वहाँ सुनने वाले हम दोनों ही थे इसलिए हवा भी हमारे इर्दगिर्द बहती। कहीं दूर जाती भी तो थक जाती। उसे थकना पसंद नहीं है। जैसे जादा चलने पर तुम्हारे पैर दुखने लगते हैं, वैसे वह भी सुकवार है। पर इतनी रात बाहर निकालने पर भी उसे ठंड नहीं लगती, न उसका गला ख़राब होता है। तुम आज फ़िर बिन शॉल चली आई।

तुम्हें पता है, उस रात जब तुम नहीं आई थी, तब चुपके से तुम्हारे दिल के दरवाज़े को खोल अंदर झाँक आया था। तुम वहीं रसोई में फ़रा बना रही थी। टमाटर के साथ छौंक लगाकर खाने में मज़ा आता है। स्वाद बढ़ जाता है। सब बैठे थे, इसलिए कुछ नहीं बोला। वहीं गायब होकर, तुम्हारे कान के झुमकों को निहारने लगा। उनकी आवाज़ सुनने के लिए वहीं तुम्हारी बगल में खड़ा रहा। तुम जान नहीं पायी। वो लकड़ी वाले कंगन कहाँ गए तुम्हारे। उनकी झनक सुने भी तो दिन हो गए। आज भी तुम थोड़ी थक गयी हो। चावल से कचरी बना रही थी, दोपहर। तभी रात खाना भी कम खाया तुमने। नींद आ रही है। मैं तो बस पल्ला खोल ऐसे ही आ गया। तुम सोती रहो। कभी-कभी तो मौका मिलता है, तुम्हें ऐसे देखने का। मैं भी बस जा रहा हूँ। उठना मत। अभी वहीं मिलते हैं। आज तो छत पर मिलने का वादा है न। चाँद नहीं आया है। सितारों को भेज दिया है। उस दुधिया रोशनी में फ़ूल बीनते हुए कुछ दूर निकल जाएँगे। कितने दिन हुए हम टहलने नहीं निकले। थकने लगना तो बता देना, वहीं से लौट पड़ेंगे। थोड़ा जल्दी वापस आकर छत पर बैठेंगे। तुम्हें एक गाना सुनाने का मन है। सूरज को कह देंगे, कल थोड़ी देर से आए। ठीक है न। जल्दी बताओ। नींद आ रही है।

{यह कल की तारीख में जनसत्ता में आ चुका है। पता चला आज सुबह। आठ अप्रैल को। थोड़ी देर पहले। पापा ने बताया। जब दिल्ली से चलकर तुम्हारी तरफ़ आ रहा हूँ, ये छोटा सा रुक्का, हम दोनों के नाम..!! वहाँ पढ़ने के लिए यहाँ चटकाएँ }

मार्च 06, 2014

घर, जेब, जगह, किताबें, मेला और इसबार

कल बस इतना कहा था किताबें पढ़ना छोड़ दिया है। यह कहीं नहीं लिखा के उन्हे खरीदना भी बंद कर दिया है। शायद उन्हे अभी इकट्ठा कर, कभी इत्मीनान से कहीं बैठकर कहीं से भी पढ़ने लग जाऊँ। यह किन अर्थों में विरोधाभासी व्याघातक बात है, पता नहीं। शायद हम सब इन्ही के भीतर बनते-बिगड़ते रहे हैं। फ़िर अगर यही सोचता रहता तो इसबार भी प्रगति मैदान में लगे किताब मेले में नहीं जा पाता। हरबार इनके पास आने के बहाने ढूँढता रहा हूँ। एक नज़र देख लेने की ज़िद। उन छपे पन्नों की स्याही की गंध। उन्हे छू लेने की तमन्ना। उन्हे घर तक लाने की कोशिश। इन सबके बीच एक अदद जेब। जेब में मनमाफ़िक पैसे। पैसे न हों तो जाना बेकार। फटी और खाली जेबें कुछ नहीं खरीद सकती। कुछ भी नहीं।

हरबार बात यहीं से शुरू यही पर खत्म। इतनी किताबें पढ़कर क्या हो जाना है। यह हमारी ज़िन्दगी में कितनी जगह रखती हैं। यह जगह कभी भरे या नहीं पर हम जिन दीवारों वाले स्थापत्य के नमूनों में रहते हैं, उनकी भी कुछ सीमाएं हैं। हमारी उम्र के साथ वहाँ उपलब्ध जगह धीरे-धीरे सिमटकर इतनी भर रह गयी है के हम रात का खाना अगर एक साथ बैठकर खाने लगें तो जगह नहीं बचती। फ़िर होता यही है के जल्दी-जल्दी किसी सदस्य को पेट भर उठना पड़ता है। कि अगर थाली में दाल कम पड़ जाये तो वह आसानी से उस पतेली तक पहुँच जाए। थोड़ा रुककर मयूरजग तक जाकर सब तक पानी से भरे गिलास पहुँचा पाने में सक्षम हो सके। हम होते वहीं हैं। चाहे कुछ हो। थाली भी वहीं है, गिलास भी। हम भी। फ़िर भी कुछ है, जो इस बार भी चल पड़े किताबों की दुनिया में।

एक ऐसी जगह जहाँ किताबें ही किताबें हैं। बहुत सारे स्टॉल। लोग कुछ कम हैं। वह उनका इंतज़ार कर रही हैं। कुछ लेखकीय कोने इस बार भी गुलज़ार थे। शाम की बैठकों में वहाँ इन किताब लिखने वाले लोगों से मिला जा सकता था। पता नहीं कौन सी शाम थी, हॉल नम्बर अठारह में कोई कवि 'बकरी' पर रचित अपनी कविता का पाठ कर रहे थे। सुनने वाले भी कभी दायें-कभी बाएँ अपनी गर्दन घुमा घुमाकर कभी मेमने कभी बकरी में रूपांतरित हो जाने की पुष्टि करते रहे। हम थोड़ा वापस हुए। पीछे की तरफ़। वहीं 'जनचेतना' के स्टाल पर कुछ कविताओं की किताबें देख रहा था। उन्ही के पास खड़ी लड़की जो शायद वहाँ की व्यवस्था में संलग्न थी; किसी अनाम से कवि की अनुसंशा कर बताने लगी कि आपको अगर कविता पसंद है तो यह वाली किताब ज़रूर पढ़नी चाहिए। चलिये अनामिका जी को ही ले लीजिये। नहीं। तो कात्यायनी की कवितायें ज़रूर पसंद आएंगी। वहाँ अनुवाद की किताबें जादा थीं। क्या उसके कहने पर मुझे वह सुझायी गयी पुस्तकें खरीद लेनी चाहिए थी? इसके लिए उसकी आँखों में दोबारा झाँक नहीं पाया। पता नहीं उस क्रान्तिचेतस लड़की को कैसा लगा होगा। ख़ैर छोड़िए। मैंने भी जादा सोचा नहीं।

सोच यही रहा था के 'सीएसडीएस' की जो नयी पत्रिका 'प्रतिमान' आई है, उन्हे खरीदने के लिए जेब में साढ़े चार सौ रुपए होने चाहिए। नहीं तो उन वैचारिक बहसों, विमर्शों, संवादों, स्थापनाओं, सहमतियों असहमतियों से परिचित होने के अवसर को नहीं प्राप्त कर सकता। वह तभी बाहर आएंगे, जब हम उन पन्नों से गुज़रते हुए वहाँ उपस्थित होंगे। वह हमें किस तरफ़ ले जा रहे हैं? क्या नहीं सोचने देना चाहते? खयाल यह भी आया कि कहीं ऐसा तो नहीं है कि इस हिन्दी के दोनों बड़े प्रकाशक हमारी वैचारिक प्रक्रियाओं को नियंत्रित करने की स्थिति में हैं? कैसे हमें अन्य वैकल्पिक स्रोतों की तरफ़ भी जाना होगा? या यह विचार स्वयं में समस्याग्रस्त है कि हमें सोचने के लिए किन्ही किताबों की तरफ़ जाना होगा। किताबें किस हद तक पढ़ी जानी चाहिए? हम यह निर्धारित करने की स्थिति में हैं? बहस बहुत लंबी थी, इसलिए दिमाग थोड़ा थक गया। थोड़ा रुक गया। हमारी आँखें सिर्फ़ हिन्दी के भाषिक संकेतों को जान समझ पाती हैं इसलिए ख़ुद को इन्ही के इर्दगिर्द किए रहते हैं। फ़िर अँग्रेजी कामचलाऊ तो है, पर इनकी किताबें हैसियत से बाहर की चीज़ हैं, इसलिए विषयगत विविधता का आग्रह भी उस तरफ़ नहीं लेजा पाता। रुके खड़े रहते हैं।

राजकमल प्रकाशन से प्रो. तुलसीराम की आत्मकथा का दूसरा खण्ड प्रकाशित हुआ है। दोबार गया और दोनों बार 'मणिकार्णिका' नहीं मिली। सुनने में आया कि कुँवर नारायण की गद्य में कोई किताब आई है, वह भी नहीं दिखी। कवि कैसे लिखता है, नहीं देख पाया। 'एक कवि की नोटबुक' भी नहीं मिली। आधार प्रकाशन से असद ज़ैदी के तीनों कविता संग्रह पुस्तकाकार मिल रहा था। मेरे पास दो पहले से हैं, इस तीसरे वाले के साथ पिछले दोनों के लिए तीन सौ रुपये देने का मन नहीं किया। बस विनोद कुमार शुक्ल की 'खिलेगा तो देखेंगे' पिछली बार रहने दी थी, इसबार ले आया। और भी कोई किताब थी शायद। पता नहीं कौन सी। वाणी प्रकाशन के कैश काउंटर पर उदय प्रकाश की किताब देखकर वह बोला, 'इनकी एक और किताब आई है साँड-साँड करके..'। किताब नयी नहीं है, पुरानी है। हिन्द युग्म के स्टाल पर तब 'कुल्फ़ी एंड कैपिचिनो' का आदमक़द लेआउट नहीं लगा था। अगली बार गए तब वहीं इसके पास किशोर चौधरी दिखे। फ़ेसबुक वाली तस्वीर से मिलान कर लिया था, फ़िर भी मुलाक़ात का वक़्त नहीं था। जल्दी निकलना था। सच कहूँ तो बस दूर से देख कभी फुर्सत से मिलने की ठान चला आया। शैलेश तो दोनों बार वहाँ नहीं थे। दख़ल प्रकाशन पर अशोक कुमार पांडे थे..पर वही मिल लेंगे। मिलने में क्या रखा है। वहीं से विमल चंद्र पांडे की इलाहाबाद वाली किताब खरीदी। 

अभी जाना है। फ़ोन आ रहा है। वहाँ से किताबें सिर्फ़ ही नहीं लाया सोन चिरइया में मालिनी अवस्थी की आवाज़ भी साथ है। बस थोड़ी देर में। मेरे पास कोई सॉफ्टवेयर नहीं है न इसलिए ऑनलाइन उसका फॉर्मेट बदलना होगा। वापस लौटकर वह नीचे ही होगी।


मार्च 05, 2014

क्या मैंने सच में लिखना छोड़ दिया है

इस शीर्षक को सवाल की तरह ही देख रहा हूँ। इसमें कोई जवाब नहीं छिपा है। फ़िर भी, इसे घूरे जा रहा हूँ। मार्च का पाँचवा दिन सुबह के यही कोई साढ़े नौ बज रहे हैं। कितने दिन हो गए यहाँ आए? अभी गिने नहीं हैं। उन्हे गिनने के लिए उँगलियाँ कम नहीं पड़ेंगी। पर क्या करूँ, नहीं देखना चाहता कितनी देर बाद लौटा हूँ। बस थोड़ी तबीयत नहीं होती, कभी मन नहीं करता, कभी वक़्त नहीं मिलता। इधर इन बीते दिनों में कुछ खास कर भी नहीं रहा था के यहाँ नहीं घूम सकता था। पर अभी तो कहा न.. मन थोड़ा भाग रहा है।

अभी लखनऊ से लौटा तो डायरी पलट कर देखी। आखिरी एंट्री बीस फरवरी। दस बारह दिन से कुछ नहीं लिखा। क्या इतनी भी फुर्सत नहीं रहती अब के दो चार लाइन भी लिख लिया करूँ। सिर्फ़ पेन उठाकर कागज़ पर लिखना ही तो है। कितनी घिसी पिटी लाइन है। कितनी बार दोहराता रहूँगा। ख़ैर छोड़ो.. पर लगता है, बात सिर्फ़ इतनी नहीं है। कुछ और है। क्या है? पता नहीं। अब तो ऐसी हालत हो गयी है के कई कई दिनों तक अंदर से भरा हुआ भी नहीं लगता। शायद खाली हो रहा हूँ। कुछ नयी चीज़ों के आने से पहले ख़ुद को तय्यार कर रहा हूँ जैसे।

यह अचानक नहीं है के अब लिखने वाली बाते अंदर ही अंदर उन तरहों से बेचैन नहीं करती। इस बेचैनी के कम होने और आने वाले दिनों में इसके गायब होते जाने का मतलब क्या यह भी है कि भीतर कहीं रचनात्मक ऊर्जा का विघटन किन्ही और दिशाओं में हो रहा है? या अब उन मानसिक उद्वेलनों से बाहर निकल कर आने से यह अभिव्यक्ति को और सशक्त करेगी? पता नहीं मुझे क्या हो गया है? इतनी क्लिष्ट भाषिक संरचना में पालीवाल सर होता जा रहा हूँ। कि अभी घंटे भर बाद भारतीय काव्यशास्त्र की एमए की क्लास लेनी है और उसी के बोझिल से नोट्स बना रहा हूँ। मुक्तिबोध भी तो नहीं हुआ जा रहा मुझसे। कि रचना के तीसरे क्षण के बाद कोई चौथा बिन्दु ढूँढ लाऊँ, और मेरी भी डायरी कहीं से छप जाये। नहीं भी छपे पर कहीं वह हो तो।

ऐसा नहीं है कि ख़ुद में अप्रासांगिक होता जा रहा हूँ। ऐसी बात नहीं है। सब अपने लिए कोई न कोई ऐसी बात ढूँढ ही लेते हैं, जिससे उनका मन मान जाए के उनके होने से इस लिखने पढ़ने वाली दुनिया में कुछ उनके हिस्से का भी है। मेरे पास अभी तो ख़ैर ऐसा कुछ भी नहीं है पर तलाश जारी है। जल्द ही वहाँ तक पहुँच कर एक धांसू-सी पोस्ट लिखकर सबको बता दूंगा।

यह सवाल बार-बार अपने रूप मुद्राएं बदल कर सामने आ ही जाता है। कि इस लिखने को किस तरह लिया जाये। इस साल की शुरुवात हुई भी इसी तरह। लिखने के मामले में इसे कुछ अच्छी बात नहीं कह सकते। फ़िर सवाल यह भी तो है के लिखने वाले इतना सोचने लगें तब तो हो गया। यही मेरे साथ भी हो रहा है। जबसे लिखना शुरू किया था तब इसपर किसी भी तरह से सवाल उठाने की सोच भी नहीं सकता था। अगर तब इतना सोचा होता, तब लिखना कभी शुरू ही नहीं कर पाता। शायद सबके साथ ऐसा होता होगा। कभी-न-कभी। वह सब भी इस स्थिति से जूझते होंगे। उन्हे उनके कौन से तरीकों युक्तियों ने बचाया होगा कहीं कोई हवाला पढ़ने को नहीं मिला। अभी पीछे कहीं असगर वज़ाहत अपनी किसी कहानी की रचना प्रक्रिया को समझा रहे थे, पर वह थोड़ा अलग संदर्भ है। कहते हैं ऑस्कर वाइल्ड में इस पर कुछ लिखा है। लेकिन अभी तक वहाँ पहुँच नहीं सका हूँ। फ़िर यह भी तो नहीं पता कि क्या इन सबसे एक साथ गुज़रते हुए जो अनुभव हो रहे हैं, वह मिलकर 'राइटर ब्लॉक' जैसा कुछ बनाते हैं भी या नहीं। या यह कुछ और ही है। और इसकी छवियाँ कहीं किसी अलग रेटिना पर अपना बिम्ब बना रही हैं, जो मुझे दिख नहीं रहा हो।

अभी एक बारगी दोबारा से ऊपर लिखी हर पंक्ति को पढ़कर लगा यह कि यहाँ खुद से अपनी ही शब्दावली में एक महत्वपूर्ण सवाल करने की ज़रूरत है कि क्या यह एक भाव है, स्थिति है या किन्ही बृहतर परिपेक्ष में घटित होती कोई और प्रक्रिया? इन तरहों से देखने की कोशिश इतनी आसान नहीं लगती। पर समझने की ज़रूरत है। सबसे पहले वहाँ पहुँचने की आवश्यकता है जहाँ इस सवाल की जड़ें हैं। किन परिस्थितियों में इसका जन्म हुआ? फ़िर थोड़ी देर रुक जाऊँ तो लगता है यह कान को दूसरे-तीसरे तरीके से पकड़ने की एक भोथरी सी कवायद भर है, जिसका हासिल मुट्ठी में भरी रेत का धीरे-धीरे फिसलते जाना है।

इन सारी बकवास बातों का मेरे लिखने से किसी भी तरह, कोई भी प्रत्यक्ष संबंध अभी तक नहीं ढूँढ पाया हूँ। कहीं कोई ऐसी किताब नहीं मिली, जो मन मुताबिक हो। विनोद कुमार शुक्ल की 'दीवार में खिड़की रहती थी' के बाद कोई किताब उन ऊबों, परेशानियों वाले दिनों, उदास खामोश शामों से बाहर नहीं निकाल पाईं। कभी राजेश जोशी की 'किस्सा कोताह' कभी कहीं से भी पढ़ना शुरू कर देता। 'जलसा', साल दो हज़ार दस, के पन्नों पर भी लौटता रहा। पर नहीं। निर्मल वर्मा भी नहीं। उदय प्रकाश की '..और अंत में प्रार्थना' भी नहीं। अज्ञेय का 'शेखर' भी नहीं बचा पाया। न धर्मवीर भारती का 'गुनाहों का देवता' ही। मेरे मन की बातें वहाँ भी नहीं हैं। उन पन्नों पर ख़ुद को ढूँढते-ढूँढते अब थक गया हूँ। सच मैंने अब पढ़ना ही छोड़ दिया है। पर पता नहीं क्यों अभी भी दिल से लिखी एक किताब की तलाश में हूँ। जो मेरे लिए, किसी और ने नहीं लिखी होगी। इसे किसी और के लिए नहीं, ख़ुद अपने लिए लिखुंगा। पर थोड़ा इंतज़ार। थोड़ा रुककर। इसका हर पन्ना मुझे इस दुनिया से उस दुनिया में ले जाने के काबिल होगा, जहां आज तक मैं पहुँचना चाहता हूँ। उनके बीच मेरे हिस्से के सारे जिंदा सपने साँस लेते हुए मिलेंगे। इंतज़ार कर रहे होंगे, मेरी साँसों में घुल जाने का। उसके पोरों से मेरे देह की गंध निकलेगी। उसे कहीं दूर से भी पहचान जाऊंगा। यह किसी आइने में दिखती दिखती तस्वीर की तरह है।

आवाज़ें..

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