मई 24, 2014

ख़ून से भी गाढ़ी स्याही से बने सपने

तो उस सड़क पर कोई नहीं है। सिर्फ़ हम दोनों है। क्योंकि यह सपना हम दोनों का है। वह सड़क है भी या नहीं, पता नहीं। पर दिख सड़क जैसी ही रही है। हो सकता है हम जैसे-जैसे आगे बढ़ते जा रहे हों, वह पीछे से गायब होती हमारी आँखों में समाती जा रही हो। रात के कितने बज रहे हैं, पता नहीं। घड़ी कलाई पर नहीं है। जेब भी बिलकुल खाली है। पता नहीं क्यों उस घुप्प अँधेरे में सूरज चमक रहा है। शायद कोई लेम्पोस्ट होगा। दूर आसमान की तरफ़। जो दिख नहीं रहा। हम उस चमकती रौशनी में अमलतास के फ़ूल बीन रहे हैं। आहिस्ते से। बिना हिले-डुले। कई-कई मिनट एक ही जगह बैठे-बैठे। ढलान से उतरते हुए साइकिल कहीं पंचर हो गयी थी। याद नहीं। या हवा कुछ कम लग रही होगी। या फ़िर ख़ुद ही उतर पैदल चलने लगे होंगे। मन किया होगा थोड़ा अगल बगल चलने का। या कि इस बहती सुरमई हवा के साथ कुछ पल, कुछ दूर हम भी बहते चलें। दूर। बहोत दूर। इतनी दूर की एक रात की नींद में वापस न लौट सकें। कल फ़िर सोएँ तो वहीं से शुरू हों। कहीं और आगे जाने के लिए। लौटना किसे है। बस इन सपनों में चलते रहना है। लौटेंगे तो नींद की तरफ़। सपनों की नींद में। लेटने से पहले। लेटने के बाद। 

डूबने के लिए हमेशा तैरना ज़रुरी नहीं। बस एक जोड़ी दिल ही काफ़ी है। एक तुम्हारे सीने में। एक मेरे सीने में। या इसकी अदलाबदली हम पीछे कई दिनों रातों शामों की मुलाक़ातों में करते रहे हैं। बिलकुल वैसे ही। बिन बताए। बिन कहे। बस एक दूसरे की आँखों में डूबते हुए। इस इश्क़ वाले नमक को चखते वहीं इंतज़ार करते। इंतज़ार करते कहीं से बजती टिड्डों के पंखों की आवाज़ के पास आने का। लगता कि इन्ही के पीछे जाकर हम वहाँ पहुँच जायेंगे, जहाँ से कोई लौटना नहीं चाहता। हम भी नहीं लौटेंगे। कभी नहीं लौटेंगे। 

इन घास के मैदानों में उनपर बिछी सीत की बूँदों में ओस की ठंडक हथेलियों से होते हुए पीठ पर जा बैठी हैं। हम भी वहीं बैठे-बैठे घास होते जा रहे हैं। उन्ही के जैसे हरे। मुलायम। शान्त। कोमल। मखमली। सुनहरी सी। तभी कहीं दूर से खत्म हो गए शहतूत के मौसम के बाद भी उसकी ख़ुशबू इठलाती बलखाती हमसे चिपक रहती है। उस सड़क की जगह मेढ़ बन गयी है। जिसपर कुछ देर पहले हम लुढ़कते-लुढ़कते यहाँ पहुँचे थे। अब वहाँ अमलतास नहीं गुलमोहर के फ़ूल हैं। लाल लाल। गुलाबीपन लिए। उस मेंहदी के धानी रंग के बाद उभरते रक्ताभ की तरह रक्तिम। उगते सूरज से बस कुछ देर पहले आसमान के पोरों की तरह। उन फ़ाहों में रुई की चादरें हैं। महीन। मुलायम। बारीक। हवा में बिखरती गुलाबों का एहसास है। अनछुआ। अनदेखा।

ये सपने जिस स्याही से बने हैं, वह हमारे दिलों में बहने वाले ख़ून से भी गाढ़ी है। पर है उसी की तरह लाल। लाल जैसे देसी टमाटर। होंठों पर लगी लाली की तरह। जिसे छूने की तमन्ना उसी दिल के बगल दूसरे दिल में धड़क रही होती है। स्पर्श की कोमलता गालों जैसी। पेड़ों की परछाईं और उसकी ठंडक सुकून दे रही है। वहीं कहीं धीरे से हम दोनों की परछाई भी हमसे अलग होकर वहाँ चिड़िया की तरह नाचने लगी। अब हम हैं भी और नहीं भी। वहाँ से गायब होकर कभी उसकी तरह बिन पर उड़ने लगते। थकते नहीं। हाँफते भी नहीं। बस सब जगहों से एक दूसरे को देखते। देखते-देखते उनमे खोते जाते। खोने में कुछ ढूँढते नहीं। बस फ़िर खो जाते।

इन सारे एकसाथ घटित होते दृश्यों में, उन उभरती हुई आकृतियों में हम कहीं बे-आवाज़ छिपे ख़ुद को ढूँढ रहे हों जैसे। ये खोना, अपने अंदर से बाहर आते उन भावों एहसासों स्पंदनों धड़कनों के एकसाथ बाहर आने की तरह है। हम झींगुर हो गए हैं। हमारे गले में रात का संगीत गूँज रहा है। हम मधुमक्खी बन सूरजमुखी की तिरछी डाड़ों के इर्दगिर्द घूमते-घूमते बेहोश हो जाने के एक क्षण पहले यही सोच रहे हैं कि सच में अपनी ज़िंदगी में बेहोश होती मधुमक्खी पहली बार देख रहे हैं। हम दोबारा झींगुर नहीं हुए, फुनगे में बदल गए। हमें नहीं पता कि फुनगे होकर हमें क्या करना है? हम एक-दूसरे को देख शरमा नहीं रहे, बस इस जेठ की रात में बसंत के मौसम को अपने अंदर महसूस होते देख रहे हैं। अब हमें क्या हो जाना है, कुछ नहीं पता। हम बस पहचान रहे हैं इस सपनीली जगह को। दोबारा। बार-बार लौट लौट आने के लिए। कहीं भूल न जाएँ, इसलिए भी अपनी निशानियों को उन पेड़ों के तनों पर छू छूकर छोड़े जा रहे हैं। कि कल वापस लौटें तो छूते ही सब ऐसे ही दोबारा बदल जाये।

मई 12, 2014

सपने जिसमें हम सच में अभी गुज़र रहे हैं..

इन बातों को आज इतने महीने पहले ही ‘ड्राफ़्ट’ करके ‘शेड्यूल’ कर रहा हूँ। तीन चार सपने तरतीब से लगा दिये हैं। के आगे वाले दिनों में कहीं इसे लगाना रह न जाये। भूलने वाला प्राणी नहीं हूँ, फ़िर भी.. मन कर रहा है। तारीख़ वही है जब हम सच में चारबाग़ स्टेशन के लिए चल दिये होंगे। इस वक़्त शायद बस बहराइच से निकल चुकी होगी। लखनऊ रोड। जरवल क़स्बा के आसपास। या घाघरा नदी पार कर चुके होंगे। बस में इंटरनेट से पोस्ट करना थोड़ा मुश्किल है। इसलिए भी महीनों पहले अरबरा रहा हूँ। ढेर-ढेर सपने हैं, जो लगातार हम देखते रहे हैं। उनकी पहली साझा किश्त इधर पूरी होने जा रही है। हम बिलकुल अगल बगल बैठे हैं। सबसे आगे वाली सीट पर..

अभी से मन भाग रहा है। ठहरता नहीं कहीं। बारात आँसू अबोली मुलाक़ात के दरमियान अभी पता नहीं कैसे सामने से विदाई वाला दिन गुज़रा। अचानक। आपकी चलते वक़्त आँखें लाल हैं। वह रो रही हैं। हम देखकर थोड़ा असहज हो रहे हैं। किन यादों को यहीं रहने दें। किन्हे साथ ले चलें। समझ नहीं पा रहे। एक नयी जगह जा रहे हैं। सबको छोड़कर। इस दुनिया से नयी दुनिया में। हम गाड़ी में बैठे हैं। अगल-बगल। चेहरा शांत है। चुप है। बात काफ़ी कम हो रही है। हाँ-हूँ के अलावा कुछ नहीं। कभी बाहर देखते हैं कभी अंदर ही कुछ ढूँढ रहे हैं। शायद वह जो पीछे छोड़ आए हैं। अपने बचपन वाला घर। पता नहीं अभी कहाँ से हम दोनों वेदी पर दिखायी दिये। मेन स्टेज से उतरकर वहाँ बैठे हैं। एक एककर सब आते जाते दिख रहे हैं। गीत हो रहे हैं या सब ऊँघ रहे हैं दिखे नहीं। अफ़रातफ़री नहीं है। सब धीर शांत हैं। आवाज़ें कम हैं। रात के दो बज रहे होंगे। इतनी जल्दी करने के बाद भी। नाचने-गाने खाने-पीने के बाद।

अचानक हम गाँव पहुँच गए हैं। गाँव भी कुछ अलग है। अब वह वह जगह नहीं है। थोड़ा बदली है। हमारे लिए भी। आपके लिए भी। चाचा वाला घर। खपरैल। हम तब कहाँ होंगे? कह नहीं सकते। शायद छत पर या दुआरे। आप वहीं लड़कियों से घिरी-घिरी घर में। हम कब मिलेंगे। पता नहीं। चार छह दोस्त हैं। बैठे हैं। उन्हे भी जाने की तय्यारी करनी है। या नहर किनारे घूम आने को कह रहे हैं। पता नहीं। ऐसा सब देख लेना पता नहीं कैसे कर जाता है। थोड़ा रूमानी सा। थोड़ा हरारत भरा। के वक़्त पास आ रहा है। जब साथ होंगे।

कई दिन से तुम्हें चारबाग स्टेशन वाला सपना बार बार याद दिलाने का मन होता रहा। पर यहाँ लिख नहीं पाया। पता नहीं कैसे टलता गया। वो जो सपना है उसमे शादी के बाद तुम और मैं गाँव से दिल्ली आ रहे हैं। पता नहीं सब पहले ही लौट चुके हैं इसलिए भी यह एकांत है। अचानक बस दिखती है। बस बहराइच से चल पड़ी है। धूप है। सर्दियाँ हैं। रास्ता उसी तरह लम्बा है। तुम्हें नींद आ रही है या आ गयी है। तुमने अपना सिर आहिस्ते से मेरे कंधे पर रख लिया है। मैं भी हिल नहीं रहा हूँ। बस भागे जा रही है। हाथ धीरे से पकड़े हुए हूँ। लगा तुम जाग रही हो। बस इस अफ़रातफ़री में थोड़ी सी थक गयी हो। इसलिए नींद आ रही है। और कुछ नहीं।

हम एक दूसरे की तरफ़ देखते हैं। दोनों धीरे से मुस्काते हैं। अचानक दोनों साथ बोलते हैं- ‘क्या’? दोनों फ़िर साथ कहते हैं- ‘कुछ नहीं’! दोनों साथ हैं। सपने में भी। असली में भी। कुछ बोल नहीं रहे हैं, बस चुप हैं। थोड़ा बोलते हैं। थोड़ा रहने देते हैं। रह-रह बोलते हैं। रह-रह चुप हो जाते हैं। यह अंदर बाहर होते रहने में रह-रह देखना है। उन साथ वाले दिनों को आहिस्ते से बुनने की तय्यारी जैसे। जैसे यह ख़ुद को आहिस्ते से एक दूसरे में मिलते जाना है। एक दूसरे की साँस में घुलते जाना है। लगातार। बिनरुके। उन सब बातों यादों रातों को दोहराते जाना है, जहाँ से चलकर हम साथ चल रहे हैं। कितने मुश्किल के दिन थे। पर अब नहीं। अब साथ हैं।

फ़िर चारबाग़ रेलवे स्टेशन। वैसा ही। जैसा है। पर कुछ है जो वही नहीं रह पाया है। तुम समान के पास बैठी हो। कहीं दूर से तुम्हें देख रहा हूँ। पास आकार साथ बैठ जाता हूँ। तुम फ़ोन उठाती हो। नंबर मिलाती हो। घर। मम्मी उठाती हैं। रोने का मन हो रहा है। पर नहीं। आँखों के कोनों में पलकों में आँसू आकर रह गए हैं। बात कम हो रही है। तुम बोलते बोलते चुप हो जाती हो। कभी उधर से आवाज़ रुक जाती है। रुमाल निकाल उन आँसुओं को वहाँ से हटाता हूँ। चुपके से। कोई देख भी रहा हो, तब भी। सब जैसे रुक गए हों। हम दिल्ली उतर चुके हैं। ऑटो पकड़ घर आते हैं। तुम सूट में हो। उसी ललिया वाले सूट में। रंग अभी भी वही है। हाथ में नाखुनी भी वही। सैंडल की आवाज़ कानों के साथ नयी सी है। उसे सुनना किसी नयी आवाज़ को सुनने जैसा है। हम धीरे धीरे जीना चढ़ रहे हैं। आराम से दरवाज़ा खोलते हैं। अंदर दाखिल होते हैं। बाहर सब देख रहे हैं या नहीं। कह नहीं सकता। आदत तो देखने की ही है।

पोस्ट स्क्रिप्ट: 

{यहाँ से कब चले पता नहीं। सपना दिल्ली आ जाने तक है। उसके आगे नींद खुल गयी। पता नहीं वैसा ही लिख पाया हूँ या नहीं। ऐसे कई सपने हैं, जो दिमाग में घूमते रहे हैं। भूलता नहीं। उन्हे सिर्फ़ तुमसे कहता हूँ। कई लिखे हैं। कई ऐसे ही अनलिखे घूमते रहे हैं।

पता है यह डायरी में कब लिखा है? वहाँ नीचे तारीख़ पड़ी है, सोलह अक्टूबर। रात आठ बजकर छप्पन मिनट। पता नहीं कैसा-कैसा होता गया था। जो मन में आता गया, रोका नहीं। और आज जब यहाँ ब्लॉग पर इसकी ड्राफ़्टिंग कर रहा हूँ तो दिन है सोमवार। तारीख़ पच्चीस नवम्बर। बारह बजने में दस मिनट। कुछ देर बाद दिन बदल जाएगा। और शाम तुम्हें फ़ोन कर बताऊँगा। के रात क्या लिखा।

बस के अंदर की हमारी तस्वीर जो है भी वह इतनी साफ़ नहीं है। इसलिए यह लगायी है। सागर किनारे। सपने के सच में साथ गुज़रते हुए। मन तो अभी पोस्ट करने का हो रहा है। उस दिन की तारीख़ भी नहीं पता। पर वादा उसी दिन का है। उस दिन तक इंतज़ार..}

आवाज़ें..

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