जून 22, 2014

तुम्हारा यहाँ से जाना

किसी का शहर छोड़कर जाना कैसा है? हमेशा के लिए। कभी लौटकर वापस न आने के लिए। कई दोस्त हैं जो अब यहाँ नहीं हैं। सब बारी-बारी अपने सपनों को समेटकर यहाँ से चल दिये। जिन बक्सों में वह इन्हे भरकर लाये थे, उनमें क्या ले गए होंगे, पता नहीं। उन्होने किसी को भी नहीं बताया। शायद उन खाली बक्सों का वजन और बढ़ गया होगा। कहते हैं शहर सपनों के सच होने की जगह है। पर जो चले गए इन सबके क्यों नहीं हुए? पता नहीं। ऐसा नहीं है सब ऐसे ही खाली हाथ गए। पर जिनके सपने हक़ीक़त में नहीं बदलते, वह कभी लौटकर नहीं आते। लौटकर आएंगे भी कैसे? जिन जगहों, लोगों, वादों, इरादों, शरारतों में वह ज़िंदा रहे होंगे, उनकी टीस कैसी कर जाती होगी? घुटन भरी। असहनीय। त्रासद। फ़िर वैसा कुछ भी नहीं रहता। कुछ भी नहीं। सब बदल जाता है।

तुम दस जुलाई को जा रहे हो। हमेशा के लिए। किताबें बैग में ही भर लोगे। नहीं तो कार्टन देख सब पार्सल करने को कहेंगे। क्या करोगे वहाँ पहुँचकर? अभी कोई प्लान नहीं है। देखते हैं क्या होता है। मम्मी-पापा अकेले रह गए हैं। सारे भाई अपनी-अपनी दुनिया में सेटल हैं। बस तुम ही हो जो उनके साथ रह सकते हो। अभी कल चाँदनी चौक से तुमने अपनी माँ के लिए फिलिप्स का तीन सैल वाला रेडियो खरीदा है। और अब क्या दे सकता हूँ उसे? तुमने शायद यही कहा था। पापा चारों धाम की यात्रा पर हैं। छन्नुमल की धर्मशाला से उनकी यात्रा शुरू हुई है। जब तक तुम पहुँचोगे, वह भी आ चुके होंगे।

पता नहीं यह कैसा भाव है? जितने भी दिल के पास हैं, वह सब एक-एक कर यहाँ की रिहाइश को छोड़ ख़ुद को समेट रहे हैं। यह शायद हमारी उमर का बढ़ता दबाव है। जो यहाँ से जाने को मज़बूर कर रहा है। हम वह नहीं हो पाये, जो होने यहाँ आए थे। और कितने दिन किस कीमत पर वह इन छोटे-छोटे कमरों में और रह सकते थे, कह नहीं सकते। जितने भी जैसे भी संबंध यहाँ बने होंगे, उन्हे ऐसे ही रहने देने की कोशिश होगी। पर तुम अब ज़िन्दगी को नए सिरे से बुनने को होगे। पहले जैसा कुछ भी नहीं रहेगा। दिल्ली में कमरा रखे रहने का कोई मतलब नहीं। उस शाम जब तुम ट्रेन में बैठोगे, तो वापस आने के लिए नहीं बैठोगे। न कभी चाहकर उन जगहों पर वैसे मौजूद रह सकोगे। मेरे लिए भी यह शहर कुछ-कुछ बदल रहा होगा। अब कोई बहाना नहीं रहेगा परमानंद कॉलोनी जाने का। कभी जीटीबी मेट्रो स्टेशन उतरना नहीं होगा। वहाँ से रिक्शा पकड़ कभी ढक्का गाँव नहीं जाऊँगा। एक दिन आएगा चौहान बुक डिपो वाली गली को भी भूल जाऊँगा। कैसे किधर मुड़कर तुम्हारे कमरे तक पहुँच जाता।

इतना आसान नहीं होता नए सिरे से ख़ुद को उधेड़ना। यह उधेड़ने की तरह ही तो है। आज जब तुम्हारे बारे में लिखने बैठा हूँ, तब बार-बार एक ही बात पर अटक जाता हूँ। तुम कहते रहे, कभी मेरे बारे में लिखना, तो नाम मत देना। पता नहीं इस बात को दिमाग ने किस तरह से लिया है? वह तुम्हारे बारे में ‘विज़वलाइज़’ ही नहीं कर पा रहा। किस छवि को सामने रखकर देखूँ? इतना आसान थोड़े है लिखना। सच, तुमने कितना मुश्किल कर दिया है। पता नहीं तुमसे कितनी ही बार, कितनी ही बार कहता रहा हूँ। पर तुम लगता है उस घनीभूत संवेदना को ओढ़कर बचते रहे। तुम्हें लगता तुम कहीं गहरे न उतरकर सतह पर चलने वाले उच्छवासों में उलझकर तो नहीं रह जाओगे। यह तुम्हारा निर्णय है। तुम स्वतंत्र हो। उन क्षणों को स्थायी मानकर ही हम कुछ कह सकते हैं। प्रेम से विरक्त कोई भी रचना या कृति नहीं हो सकती। भले वह किसी भी रूप आकार संरचना में हमारे सामने आए। तुम्हारे अंदर भी कितनी ही कृतियाँ आकार लेती रही होंगी। पर तुम उन्हे बाहर नहीं लाये। बाहर लाते तो शायद हम भी उसे देख पाते।

अब जबकि तुम यहाँ से जा रहे हो, तुम्हारी ही एकबात कहकर ख़त्म करता हूँ, के भले ऊपर से तुम कितने खुले लगो, पर अंदर से उन परतों के साथ तुम्हारा दिल, उसमें कहीं बैठा अवचेतन, तुम्हें सहज नहीं रहने देता। शायद हम सब ऐसे ही होते हैं। जटिल। असहज। अस्पष्ट। वह हमारा ‘कम्फ़र्ट ज़ोन’ है। जहाँ हम अकेले ही उन स्थितियों से लड़ रहे होते हैं। जीतने के लिए नहीं, लड़ने के लिए। ऐसी कितनी ही लड़ाइयाँ तुम्हारे अंदर घटित होते देखी हैं। तुम्हारे उस कमरे पर। चाँदनी चौक मेट्रो स्टेशन के उन बेंचों पर। उस पार्क की घास पर। अपने कॉलेज की सीढ़ियों के आसपास। हिन्दी डिपार्टमेन्ट, आर्ट्स फ़ैकल्टि की मेहराबों के दरमियान। इन सबमे शायद सबसे बड़ा सवाल जो तुम अपने साथ लिए जा रहे हो, वह तुम्हारे ख़ून के अंदर घुल-सा गया लगता है। तुम्हें आज फ़िर कहूँगा, यह डायरी तुम्हें ज़रूर पढ़नी चाहिए। शायद इसके बाद ख़ुद को दोबारा जानने की शुरुवात फ़िर हो सके। यह उन दिनों में ताक़त देती है जहाँ हम सबसे जादा अकेले होते हैं। पता है तुम ख़ुद से बाहर आओगे एक दिन। उस दिन तुम अकेले नहीं रहोगे।

{अचानक 26 की रात देवेश से पता चला। परसो। कि इसका एक टुकड़ा 'दैनिक हिंदुस्तान' में आया है। पेज नंबर दस, संपादकीय। स्तम्भ साइबर संसार। वहाँ पढ़ने के लिए 'लिंक '.. }

जून 21, 2014

तस्वीर में अब कोई नहीं बचा रह गया

बात तब की है जब फोटो खींचने वाले कैमरों से दोरंगी तस्वीरें ही निकला करती थी। हम तब पैदा भी नहीं हुए होंगे। पर अपने छुटपन से हम लकड़ी वाली अलमारी खोलते और बड़े आहिस्ते से एक एककर सारे एलबम निकाल लेते। धीरे-धीरे उन पुरानी यादों से अपनी पहचान बनाते। तब से लेकर आज तक कई सिर्फ़ उन तस्वीरों में ही रह गए हैं। इधर बाहर की दुनिया में कहीं नहीं हैं। पर इसतरह वह आज भी यहीं कहीं मौजूद हैं। हमारे पास ही। सिराहने। तकिये के नीचे। पास वाली मेज़ पर। किताब के अंदर पन्नों पर। दिल की किसी धड़कन में। जिनसे हम कहीं कभी नहीं मिले, उन्हे देख भर लेने से उन्हे जानने लगते हैं। थोड़ी कहानियाँ उनके साथ हरबार जुड़ती रहती। कब कहाँ यह तस्वीर उतारी गयी। कैसे यहाँ इसमें मौजूद लोग इकट्ठे हुए। कभी इन किस्सों को सुनाने वाले पापा होते, कभी मम्मी। पर हर बार इन किस्सों में कुछ और धागे उन्हे बुन रहे होते। कई और कड़ियाँ जुड़ रही होती हैं। एक से एक निकलती। एक से एक जुड़ती।

ऐसी ही एक फ़ोटो है। बीते इतवार, पंद्रह जून से बार-बार खींच रही है। पता नहीं, सच में भी वह कहीं बिलकुल वैसी ही है, जैसी अंदर दिख रही है या मन ने उसे ऐसे बना लिया है। हो सकता है उसने कहीं देखी होगी और उसने रख ली। वैसे ही। जेब के पास। वह जितनी भी जैसी भी याद है, उसमे ताजमहल है। ताजमहल वहीं पीछे खड़ा है। उसके आगे कई सारे लोग खड़े हैं। हमारी दादी भी हैं। बाबा के बगल। हम सबसे पहले दादी बाबा को पहचाते हैं। बाकी कौन हैं? यह बड़े होने के साथ पता चलता गया। सब ऐसे ही जहाँ हो पाये, खड़े हो गए। उन सबके कपड़ों में जादा रंग नहीं है। सादे हैं। पुरुषों ने कुर्ते के साथ पजामे पहन रखे हैं और स्त्रियों ने सूती धोतियाँ। सब इकट्ठे हैं। कैमरे के लेंस की तरफ़ देखते। पोज़ कोई नहीं। बस सीधे खड़े होने की तरह। उन सबका ऐसे ही कभी किसी जेठ के महीने में घूमने का मन किया होगा। अकेले नहीं सबके साथ। साथ से घूमना और मज़ेदार हो जाता है। आगरा गए रेलगाड़ी से ही होंगे। तख़्ती वाली सीटों पर बैठकर। कोयले वाले इंजन के साथ। उस धुएँ को उड़ते देखते हुए। आसमान में।

तो जो बात बार-बार खींचे जा रही है, उसका संबंध पापा की बड़की मामी से है। वह भी वहीं उन बड़के मामा के साथ वहीं खड़ी हैं, जो यहीं इसी दिल्ली में हमारे बचपन में गुम हो गए थे। फ़िर कभी नहीं मिले। कभी न मिलने के लिए ही तो लोग गुम होते हैं। कोई लौटकर थोड़े आता है। वह भी कभी नहीं आए। गुमशुदा तलाश केंद्र, नई कोतवाली वालों को भी नहीं मिले। मिली किसी थाने में उनके कुचले जाने की ख़बर। वो तस्वीर पचान में नहीं आ रही थी। पता नहीं मन बेतरह भाग रहा है। कहीं ठहर नहीं रहा। कितनी ही यादें हैं, जो खींच रही हैं। अपनी तरफ़। पर आज नहीं। हर बार मेरे साथ यही होता है। कहीं रुककर इत्मीनान से देख भी नहीं पाता। सब गड्डमड्ड होता रहा है। पर अभी नहीं। अभी बात को वापस लौटाकर बड़की मामी की तरफ़ ले जाता हूँ।

यह भी हमारी दादी लगीं। जब दिसम्बर में असोक चाचा के साथ दिल्ली आयीं, तो यह पहले की तरह आने जैसे नहीं लगा। जब भी हम इन्हे देखते पैर ज़रूर छूते। यह उस उमर के लिए उन जिये सालों में झेले उन अनुभवों के लिए होता, जो हमारे हिस्से नहीं कभी नहीं आए। न आ पाएंगे। हम इस क्षण के अलावा इनके इतने पास कभी नहीं हो पाते। पता नहीं, यह हमारे बारे में क्या सोचती होंगी। इन्होने कभी बताया नहीं। हम भी यह कभी पूछें, इसकी संभावना कभी नहीं लगती। इसबार जो सबसे अजीब बात लगी वह यह कि पहली बार हमने इनकी आँखों में हमसे बात करते चमक देखी। शायद उमर दराज़ आँखें हमेशा से ही ऐसे देखती होंगी। छोटी सी। काली-काली सी। पता नहीं क्यों मैं जाकर इनके बगल में बैठ गया था। न जाने क्या सोचकर? अचानक धीरे से कान के पास आकर बोलीं: अब कब अइयहो गिलउला? उतने ही धीरे से बोला, अप्रैल में। इसके बाद हमने कोई बात नहीं की। 

अभी पिछले साल मई में जब शादी में गया था, तब तो ऐसी कोई बात नहीं लग रही थी। इधर कुछ महीनों से इनके गले से कोई भी ठोस आहार नीचे नहीं जा रहा था। पान डली सुपारी अब बिलकुल बंद। खाना बंद। सिर्फ़ तरल पदार्थ। राम मनोहर लोहिया के डॉक्टरों ने गले का कैंसर बताया। कहा, ऑपरेशन करने में रिस्क है। इतनी बूढ़ी देह में अब जान कहाँ? एनेस्थीसिया तो दे देंगे, पर क्या पता वे कभी उठ ही न पायीं तब। पता नहीं उन्हे पता भी होगा कि नहीं। पर बुला रही थी। कहने लगी साथ चलो। यह चलना उनके हमेशा के लिए चले जाने के पहले साथ उनके घर चलना है। पता नहीं वो कौन सी याद रही होगी, जिसे वह हममें फ़िर से देख लेना चाहती होंगी? हमें कुछ बोलती नहीं थीं, पर हर साल हम मई-जून में जाते ज़रूर थे। जबतक कि छोटे थे। एक रात इनके यहाँ रुककर नानी के यहाँ। अब कई सालों से वहाँ कोई नहीं रह गया। इसलिए यहाँ जाना भी बंद सा था। कोई बहाना नहीं रह गया था, उसके घर का। वो अंगूर की बेल भी तो न मालुम कबकी वहाँ से गायब हो गयी। जिसे हमारी छोटी आँखें बड़े अचरज के साथ देखती। कभी उस पर अंगूर लगेंगे। तब आएंगे। पर हम कभी लौटकर देखने नहीं आए। सोचता हूँ क्या उन्होने कभी इंतज़ार किया होगा?

शुक्रवार जब फोन पर चाचा ने बताया, बस एक दो दिन की बात है। कब प्राण निकाल जाएँ, कह नहीं सकते। तो पता नहीं कैसा कैसा होता गया। मरने से पहले हम क्या सोचते होंगे। कितनी ही यादों में से किसके सिराहने लेते उसका इंतज़ार कर रहे होते हैं। क्या उन्हे अपनी अंतिम क्षणों के आने की आहट सुनाई दे गयी थी? या यह सब फ़िजूल की बातें हैं। सबको पता है, सब एक दिन मर जाएँगे। वे क्या सोच रही होंगी? अपने हाथ से बनाकर सबको खाना तो नहीं खिलाना चाहती होंगी? या हमारा इंतज़ार तो नहीं कर रही थी? अप्रैल में वहाँ जाना हुआ भी तो इनसे नहीं मिला। अब मिलना कभी नहीं होगा। कभी नहीं। और अब आज इस वक़्त उस तस्वीर में सिर्फ़ ताजमहल बचा है। बाकी सब गायब हो गए हैं। धीरे-धीरे सब चले गए। कुछ-कुछ चीज़ें छोड़ छोड़कर। और यहाँ लिखते-लिखते सिर्फ़ यही सोच रहा हूँ, अब उनका सरौता कहाँ होगा? उन बची रह गयी डलियों को कौन संभाले रखेगा? वो ऊपर वाला कमरा अब कैसा बन जाएगा। उनके होने के चिन्ह धीरे-धीरे वहाँ से मिटते जाएँगे। कुछ बचा भी रहेगा। शायद जो अपने आप बच जाये वो। इधर उनकी सबसे नयी याद में अस्पताल में कराये एक्स-रे यहाँ अलमारी पर रखे हैं। चूहों ने लिफ़ाफ़ा थोड़ा कुतर दिया है। बाकी सब साबुत है। साबुत है मेरे हिस्से की वो तस्वीर। कभी न मिटने वाली याद की तरह।

{यह तस्वीर, वह वाली तस्वीर नहीं है। असली तो अभी भी, उस लकड़ी वाली अलमारी में, सबसे ऊपर वाले ताखे पर रखे, किसी अल्बम में लगी होगी। बिलकुल वैसी ही। पीछे ताजमहल, और आगे सब। ये जो ऊपर है, वो तो 'नेशनल ज्योग्राफीक़ चैनल' की वैबसाइट से उड़ाई है। लिंक पीछे कभी मिला तो लगा दूंगा। }

जून 20, 2014

दिल्ली मेरा शहर

दिल्ली, मेरा शहर। बीते शनिवार से इस भाववाचक संज्ञा को कितनी ही बार अंदर-ही-अंदर दोहरा रहा हूँ, पता नहीं। कितनी ही यादें बेतरतीब हुई जा रही हैं। आगे पीछे। ऊपर नीचे। इसमें ऐसा कुछ है जो बैठने नहीं दे रहा। हर वक़्त लग रहा है कुछ छूट रहा है। कुछ पीछे रह गया है। शायद डीटीसी बस की पीछे वाली सीट। या वो नेहरू प्लेस जाती एम तेरह। पुराने कंक्रीट से बने बस स्टेंड। आईटीओ की रेड लाइट। पहाड़गंज का सोमवार बाज़ार। संगतराशन गली। चूना मंडी। रामलीला मैदान। पटेल चेस्ट। मुनीरका। खान मार्केट। लोधी कॉलोनी। कोटला। गीता कॉलोनी। लक्ष्मी नगर। शास्त्री पार्क मेट्रो स्टेशन। भोगल। आज़ादपुर। 

पता नहीं कितने ही और नाम इन दिनों दिमाग में लगातार घूमने लगे हैं। पूरी एक लिस्ट है। कभी न ख़त्म होने वाली। लेकिन अगले ही पल लगता है, शहरों से भी पहचान समय-समय पर रिन्यू करवानी पड़ती है। नहीं तो चेहरे पहचान में नहीं आते। यहाँ हमें लगता है, हम नहीं रुकते। पर असल में यह शहर है, जो कभी नहीं रुकता। वह न रुकने के लिए ही बनाए गए हैं। जबकि हम रोज़ थक जाते हैं। हमारे घुटने, पीठ की तरह दर्द करने लगते हैं। कोई मूव, कोई बाम उस दर्द को ठीक नहीं कर पाएगा। फ़िर एक दिन ऐसा आएगा, जब लगने लगेगा, हम कहीं ठहरे रह गए हैं। और शहर हमसे हमारे अंदर से निकलकर, कहीं दूर खड़ा है। इसबार भी वह किसी का इंतज़ार नहीं कर रहा। वह तो बस उसे देखने वाले को ऐसा लगता रहेगा। के शहर उसके इंतेज़ार में है।

यही सबसे बड़ा धोखा है, जो वह हम सबके साथ बड़ी सफ़ाई के साथ करता है। जिसे हम समझ भी नहीं पाते। यह शहर का जादू है जो सर चढ़ कर बोलता है। इसमे यह भी याद नहीं कब गोविंदपुरी, गली नंबर तेरह, मुकेश के यहाँ जाना हुआ था। उसने वह कमरा कब छोड़ा? शायद नीरज के मुनीरका छोड़ने के पहले? या बाद में? ठीक से कहना मुश्किल है। मुकेश पहले साहिबाबाद गाँव गया, उसके बाद भोपाल। वहाँ से दोबारा दिल्ली कब आया और अब भी लखनऊ में है, पता नहीं? दोस्त ऐसे ही शहर भर में छिटके रहते। जिन बहानों से हम उन सड़कों-गलियाँ को छान मारते, उनके वहाँ से गायब हो जाने के बाद, वह जगहें भी हमारे लिए वैसे ही गायब होती रहीं। जैसे एक दिन अचानक छह सौ चार नंबर बस संगम सिनेमा के आगे से गुज़रती है, तो हैरानी से भर जाता हूँ कि उस जगह अपनी पुरानी वाली इमारत नहीं है। वहाँ पीवीआर का बैनर लगा है। कमिंग सून। दिस नवंबर। 

एक झटके से मेरी याद के वह सारे पन्ने बिखर जाते हैं, जिसमें उसकी छवि बनी हुई थी। अब वहाँ वह कभी नहीं होगी। होगी सिर्फ़ उसकी याद। धीरे-धीरे वह भी मेरी आँखों की तरह धुँधलाती जाएगी। हो सकता है अपना यह अनुभव शायद ही कभी किसी से कह पाऊँ। कि अचानक किसी परिचित की जगह उन सबको देख कैसे भावों से भरता गया। वह भावुक क्षण नहीं थे। किसी परिचित के चले जाने के बाद की खाली जगह जैसे थे। उसे कभी भरा नहीं जा सकता। वह हमेशा ऐसी ही बनी रहेंगी। बस अलविदा न कह पाने की टीस अंदर ख़ून की तरह रिसती रहेगी। कुछ बातें हमेशा के लिए रह गईं। जो कभी शुरू भी हुई होंगी, वह अब पता नहीं कहाँ हैं?

फ़िर एक-एक कर वह सारे दृश्य आँखों के सामने से गुज़र जाते हैं, जहाँ से अभी बस होती हुई आई है। संसद भवन आज भी वहीं हैं। उसके पास वाला फव्वारा आजतक एक कदम भी नहीं खिसका। इंडिया गेट भी दूर खड़ा सब देख रहा है। वह एम्बेसी वाला पूरा इलाका वैसा का वैसा है। अमलतास के पेड़ों की पूरी लड़ी वहीं खिलखिला रही है। इन सारी बातों को अगर एक साथ जोड़ दूँ तो क्या हासिल होता है? कुछ काम की बात निकलती है भी या नहीं? जो अव्यव इन सभी गिनाई गयी जगहों में समान रूप से व्याप्त है, वह यह कि इनके रूप को यथासंभव वैसे का वैसा रहने दिया गया है। बल्कि यह कहना जादा मुफ़ीद होगा कि इनमे आमूलचुल रूप से कोई भी बदलाव होने नहीं दिया गया है। पर क्यों? कई जवाब इतने आसान नहीं होते। या शायद हो सकता है हमारी यादों और उनकी यादों के वजन में कुछ फ़र्क है। हमारे पास जो लालकिला है, वह इनकी याद का हिस्सा जादा है। हमारे हिस्से की यादें कुछ हल्की हैं।

{यह पोस्ट आज 'जनसत्ता' में आई है। वहीं समांतर में। 'हमारे हिस्से की यादें '। वहाँ का लिंक पीछे भी है, आगे भी ..}

जून 19, 2014

लिखने की बात

पीछे से बाक़ी ..

लिखने का मन कल रात था। पर लिख नहीं पाया। सो गया। थका था। अभी भी इतना ख़राब लिखकर नीचे से आया, तब से सोच रहा हूँ, ऐसा क्या है, जो उसमें कम है? वहाँ क्या कह दिया, जिसके लिए वहाँ जगह नहीं थी। पता है हम लोग हार रहे हैं। हारे हुए लोग हैं। कभी-कभी ख़ुद को बचाने के चक्कर में उन स्थितियों से बचते रहते हैं। उनका सामना नहीं करते। टाल जाते हैं। टालना, उस घुटन से बचने का सबसे बढ़िया तरीका है, जो हमने अब तक ढूँढा है। आगे कोई और युक्ति मिलते ही उसका परीक्षण शुरू कर देंगे। पर यह सवाल पूछने लायक है कि इन बीतते सालों में हम कब से इस तरह बनते रहे हैं। यह सारे दबाव हमने अंदर से महसूस किए हैं या उन्हे किन्ही बाहरी दबावों कि तरह लेते लेते अब असहनीय पीड़ा की तरफ़ ढ़केले जा चुके हैं। वहाँ जो भी बातें हैं वह बड़ी स्थूल हैं। इनमें सूक्ष्मता न के बराबर है। बारीक होने से बच रहा हूँ जैसे। कि कोई देख नहीं पाएगा। पर ऐसा होना अच्छा नहीं लगता।

इधर यह भी महसूस हो रहा है कि अर्द्धविराम का इस्तेमाल कुछ जादा कर रहा हूँ। करने लगा हूँ। पहले मेरे यहाँ यह काम पूर्णविराम करते थे। यह अपने आप है या सायास? पर पता है इसका एक मतलब क्या है? शायद यह कि मेरे वाक्य किसी भी तरह की जटिलता से बचे रहे। नहीं शायद यह नहीं। शायद ये के वहाँ कही हर बात को समझने की जिस दक्षता की माँग वह पंक्तियाँ करती हैं, वह उन्हे पढ़ने वालों में कुछ कम है। या एक अर्थ यह भी हो सकता है कि इस तरह मैं अपनी हर बात को उनके दिमाग से होता हुआ दिल के करीब ले जाना चाहता होऊंगा, जहाँ पहुँचकर वह उनके ख़ून में घुल जाएँ। यह कोई जादा बड़ी इच्छा नहीं है। वहाँ जैसा भी लिखा है, उसकी कई परतें, वहीं जाकर अपनी व्याप्ति में अर्थ को प्राप्त होंगी। उसके बिन यहाँ कुछ भी पढ़ना, सिर्फ़ पढ़ना है।

फ़िर यह भी लगने लगा है कि मोहन राकेश की डायरी से जो ‘के’ लेता आया था, उसकी जगह इन दिनों छोटी ‘कि’ का प्रयोग करने लगा हूँ। पता नहीं अवचेतन में इसके क्या मानी होंगे? ख़ैर। जादा बोझिल तो नहीं हो रहा? क्या करूँ, दिन ही कुछ ऐसे हैं। हरामज़ादे क़िस्म के। कुत्ते साले। अपने मन की कर रहे हैं। हमारी सुनते ही नहीं हैं। दिमाग गरम नहीं है। ये ऊपर वाला कमरा तप रहा है। यहाँ का छत पंखा भी ख़राब है। न मालुम कब से। एकबार ठीक करवा रहे थे, तो पता चला, फुंक गया है। तब से ऐसे ही लटका है, सर के ऊपर। बिन घूमे। डेढ़ खिड़की खुली हैं, एक दरवाज़ा खोल रखा है। पर सब बेकार। किसी काम का नहीं। मेरी तरह। 

अभी जब ऊपर आया तो यही सोचा था, कागज़ पर लिखुंगा। पर नहीं। डायरी उठाई भी तो हाथ के पसीने से कागज़ भीगने लगा। एक लाइन के बाद ही बंद। यहाँ लिखने का मन बाद में बना। बनते बनते बना। 

सोच रहा हूँ, बहुत कुछ लिखना है। अभी लखनऊ गया था। कुछ नोटिंग की हैं। वहाँ भी मेट्रो की आहट है। इधर साल भर बाद बस में घूमने निकला तो लगा दिल्ली ज़रूरत से जादा तेज़ चल रही है। हम अभी भी उसी दिल्ली को दिल में बिठाये रखे हैं। पढ़ना फ़िर से शुरू करना है। पर जेब की हैसियत कुछ बढ़ानी होगी। या यही एक बहाना बने कि हम भी नेट पर मैगज़ीने पढ़ने की आदत बना लें। ‘कथादेश’ अपना सफ़र जारी रखने के लिए पाठकों से अपील कर रही है। सच अगर मेरी जब में भी रुपये होते तो कबका संरक्षक सदस्य बन चुका होता। पर जैसे नौकरी वैसे पैसा। दोनों गधे के सिर पर सींग जैसे गायब। अमरकान्त की दो कहानियों पर भी उधेड़ बुन चल रही है। पुरानी हैं। नयी नहीं। इसपर बाद में। स्वाद पर भी कुछ कहना है। ज़मीन से जोड़कर। एक कैंटीन से शुरू करेंगे। अभी नहीं। रुक कर। ये बारिश बीच में हुई पर लगता है अभी केरला में आलोक के पास ही है।

और भी बहुत सी बातें हैं। पर ‘पब्लिक डोमेन’ में कहना नहीं चाहता। यह वो जगह नहीं है। कुछ पर्दे दारियाँ यहाँ भी ज़रूरी लगने लगती हैं। और हैं। सच में लिखने का बिलकुल भी मन नहीं हो रहा। लिखे भी तो किसके लिए? कौन पढ़ रहा है? पढ़ भी रहा है तो पता तो चलता नहीं। फ़िर वो दो भी तो गायब हैं। वो तो देवघर चली गयी होगी। और वो बीच में दोबार आया भी है। एकबार तो आज ही सुबह। साथी नहीं होते तो मन भी नहीं करता। इसलिए तो मैं थोड़ा बहुत लिख रहा हूँ के अगर उनका भी मन मेरी तरह कर रहा हो तो क्या पता मुझे यहाँ देख लिखने का उनका भी मन कर जाये। तुम्हें नाम की क्या ज़रूरत? तुम्हें तो पता है, तुम कौन हो? 

लगता है, बात भटक गयी। कुछ फ़िर कहीं रह गईं। बाद में। कभी और।

जून 18, 2014

हम ऐसे ही हैं बेकाम

ये दिल्ली की गर्मी है या एबस्टस की छत पर लगे पंखे के न चलने की वजह से है। जहाँ बैठा हूँ, वहाँ हथेली की तरफ़ से पसीना मेज़ पर लगातार बह रहा है। दिमाग एक दम सुन्न-सा वहीं पड़ा बस सोच रहा है। लग रहा है, सब भागते-भागते इतनी तेज़ी से चलकर वहाँ जा पहुँचा है, जहाँ से वह सब हमें देख नहीं पा रहे। हम भी चींटी की तरह हो गए हैं, किसी भी पैर के नीचे आकर कुचल जाने वाले। वहीं कहीं जेब में कुछ मुड़े कागज़ भी हैं, उनमे कुछ लिखा है। शायद अख़बार का टुकड़ा है। रोज़गार समाचार का। तारीख़ पता नहीं। पर उसमे से कोई भी नौकरी हमारे लायक नहीं है। शायद इसे इस तरह से लिखा जाना चाहिए के हम वहाँ छपी किसी भी नौकरी के लायक नहीं हैं। हम तो चींटी हैं न! हमें नौकरी की क्या ज़रूरत? हम तो बस ऐसे ही ज़िंदा रह लेंगे।

यह किसी भी तरह का रोना नहीं है। हम किसी की शोक सभा में नहीं बैठे हैं। आँसू कहीं पलकों में फँसे नहीं रह गए हैं। तुम कह रहे थे, सब बह गए हैं। जो हैं भी, वह उन्ही की याद में कभी-कभी लौट आते हैं। बिन मर्ज़ी। कभी भी।

जो भी यहाँ लिखा है, उससे जादा उसके पीछे छिपा है। कहने को नहीं होता। होने का मन हो, तो भी नहीं कह सकता। कह देने से क्या होगा? कहीं से कोई अपॉइंटमेंट लेटर नहीं आने वाला। फ़िर कभी-कभी यह भी लगता है ये नौकरी होना इतना ज़रूरी क्यों है? मेरे लगने से क्या होगा? जो है वो है। सब चाहते हैं, तुम्हें एक दिन ऐसा हो जाना चाहिए। और हमारे मामलों में यह ‘एक दिन’ पीछे कितने दिनों से स्थगित है, कोई हिसाब नहीं। अब तो बस खीज होती है। यह अब छिपाये नहीं छिपती। इस तरह से हम ने एक काम किया है कि उन सब जगहों से ख़ुद को छिपा लेने का निर्णय ले लिया है। यह सुचिंतित है या अवचेतन की उपस्थिति कह नहीं सकता। मतलब कि ख़ुद को समेट किसी ऐसी जगह पड़े रहने की दीर्घ कार्ययोजना का हिस्सा जो हमें उन सब जगहों से एकमुश्त गायब रखेगा जहाँ इस तरह की कोई भी संभावित आशंका से हम ख़ुद को घिरा पाते हैं।

हम सब कितने झूठे हो गए हैं। पर सच हमने चाहा नहीं था, ऐसे हो जाएँ। के किसी दोस्त की फ़ेसबुक पर नौकरी लगने वाली पोस्ट पर अनमने ढंग से बधाई देते रहें। कोई थायलैंड से घूम कर लौटे और अपनी तस्वीरें दिखाये तो हम काटो तो ख़ून न निकले वाले स्थिति में पहुँच जाएँ। हममें क्या वह क़ाबिलियत नहीं है? या हम उनकी तरह मौक़ों को भुना नहीं पा रहे? कमी कहाँ रह गयी है? या इन सबको छोड़कर इस तरफ़ यह सवाल ख़ुद से पूछने का वक़्त है कि कभी कोशिश भी की है? यह ऐसी चादर है जिसमें छेद पता नहीं कब होगा। किसी दरीचे से वो सूरज हमारे आँगन में कील पर कब टंग जाएगा? उसकी रौशनी में अपने चेहरे देख पाएंगे?

यह बहुत आत्मकेंद्रित सी इच्छा है। थोड़े से स्वार्थी हो जाने की तरह। सब पहले अपने लिए सोचते हैं। फ़िर जब कुछ खाली वक़्त मिलता है तो अपने से बाहर भी देख लेते होंगे। चूँकि हम अभी बाहर हैं इसलिए उस तरफ़ से देख रहे हैं। हमारे सवालों का छद्म उन्हे इसी तरह भेदता है। फ़िर कुछ हफ़्तों बाद एक दिन ऐसा आएगा जब हम उस तरफ़ होंगे और कोई ऐसे ही परेशान टूट रहा कोई हमारी तरफ़ उँगली उठा कर कुछ पूछ रहा होगा। तब हम आज की तरह इन लोगों के जैसे कुछ संवेदनाओं सहानुभूति का स्राव कर अपने हिस्से की सहभागिता दिखाकर अपने खोलों में चले जाएँगे। पर सच यह है कि आज के हिस्से शाम पाँच बज रहे हैं और इस वक़्त हमारे पास महीने के ख़त्म होते-होते एकमुशत रकम आने का कोई स्रोत नहीं हैं। हम डरते हैं कि एक दिन ऐसा न हो जब हमारे कपड़ों से जेब कहीं गायब हो जाये। दर्ज़ी बनाना ही भूल जाये। हमारी ज़ेबें और यह नौकरी होने और न होने वाली विभाजक रेखा किसी भी तरह सौम्य, शालीन और हार्दिक नहीं रहने देती। भले सतह पर यही तैर रहे हों पर कोई अंदर उतर कर नहीं देखता..!!

{ आगे की बात ..}

जून 12, 2014

सपनों के साथ, सपनों के लिए, हमेशा

असल में हम सब सपनों में जीने वाले लोग हैं। हमारी ज़िन्दगी ऐसा नहीं है, ख़ूबसूरत नहीं है। ये भी नहीं के उसमे रंग कुछ कम हैं। चटकीले फिरोज़ी से लेकर दुधिया नीले तक। कोमलतम स्पर्शों की छुअन दिल में मौके बे-मौके धड़कन की तरह झिलमिलाती रहती हैं। आवाज़ें भी जेब भर-भर हैं। दूर से कहीं वापस जाकर आती रेलगाड़ी के डिब्बों के कदमताल जैसे। उनमे बैठे सैकड़ों लोगों की साँसों का नाद असाध्य वीणा का अनसुना राग बन जाती है। उनके मुँह से उतने ही तरह की सैकड़ों बार निकलती गंध। कान से लेकर कनअँखियों तक सब बिलकुल वैसा ही है, जैसे उसे होना था। करीने से। एकदम जगह पर। घास का वो तिनका उतना ही हरा है, जितना वह अपने जन्म के वक़्त से है। मुस्कुराता। खिलखिलाता सा।

इन सपनीली जगहों में कहीं वह भी जगह है, जो ओस की बूँद की तरह है। हमारे सपने ओस की बूँदों में तब्दील हो गए हैं। और हम ख़ुद किसी पेड़ पर उल्टे लटके चमगादड़ों की तरह उसे देखते रहने के लिए जैसे अभिशप्त हैं। उसकी दुनिया में उस बूँद का क्या काम? ख़ुद हम उल्टे लटके लोगों का क्या काम? फ़िर भी हम वहीं हैं। किसी दूसरे की बेमियादी सजा काटते। वहीं सीलन की कोठरियों में घुटते। हवा को तरसते, कभी सदियों पहले खुली खिड़की की तरफ़ ताकते। काला पानी से कभी न लौटते देख हम थोड़े आहिस्ते से सब कुछ देख रहे हैं। घुट रहे हैं। तिल-तिल कम साँस ले रहे हैं। अक्सर हम अपनी आँखों से ख़ुद को सबसे कम देखते हैं। पर इधर सबसे जादा हमारी आँखें हमारी तरफ़ ही हैं। अंदर से किसी ज़िंदा सपने को ढूँढती। टटोलती। तलाशी लेती।

हम इस वक़्त सबसे बेतरतीब जगह पर हैं। कहते हैं, सपनों के बीच इंटरवल नहीं होते। यह कभी बीच में रुकते नहीं हैं। तब क्यों हमारे सपने इतने रुक-रुक कर आ रहे हैं। इनके ऐसे होने की टीस एड़ी की हड्डी में जीना उतरते वक़्त लग गयी चोट की तरह है। एक कदम बढ़ा नहीं के दर्द रहने नहीं देता। यह रिस-रिस कर दिल के कोनों में नहीं पहुँचता। अगर कहीं कोई उन धड़कनों को सुन भी रहा होता है, तब भी लौट कर आवाज़ नहीं देता। शायद उसके सपने भी कहीं सफ़ेदे के पेड़ में पतंग की डोर की तरह अरझ गए होंगे। या उन भारी-भरकम पहियों के नीचे आकार पाँच रुपये के चपटे सिक्के की तरह पहचाने जाने लायक कोई भी निशानी नहीं छोड़ गए होंगे। वह बस उन्हे देख कहीं पीछे रुक-सी गयी होगी। कोई याद। कहीं किसी अलगनी पर टंगी रह गयी पोटली के जैसे। 

कभी एक जन कह भी गए हैं, सबसे ख़तरनाक होता है, हमारे सपनों का मर जाना। और मुझे पता है तुम इन पंक्तियों को दिन में कितनी बार अंदर-ही-अंदर दोहराते रहे हो। रोज़। हर बीतते पल। हर क्षण। उन आती जाती साँसों से भी जादा। उस सुबह अचानक तुम्हारे फ़ोन पर टूटने की आवाज़, कहीं से भी सोने के सिक्कों के खनकने की तरह नहीं लगी। लगा कितने सारे सपने, एक के अंदर एक बनते-बनते बैठे रहे हैं। सपने, उस बाहरी खोल की तरह दिखने वाले कछुए के अंदर, लीची की मिठास की तरह कोमलतम अनुभूतियाँ स्पंदित हो रही हैं। आम की कल्ली से रस शहद की बूँदों की तरह टपक रहा है। उनका स्वाद न मालुम गाय के घी में बदल गया है। थोड़ी देर में वह चूल्हे से उतरे छाछ के भगोने में समा जाएगा। मधुमखियाँ उसके चारो तरफ़ नाचने लगेंगी। भँवरे वहीं मँडराने लगेंगे। सूरजमुखी का फ़ूल भी अमलतास की या गुलमोहर की तरह ऊपर की डाड़ में हिलोरे खाने को हो आएगा। वहीं कहीं उस टेढ़ी पुलिहा पर टोलियों में घूमते बच्चे, उस बहती साफ़ पानी की नदी में बारी-बारी अनगिन बार छपाक-छपाक कूदते हुए, तुम्हारे सपनों में खो जाएँगे। वहीं तैरते-तैरते वे सब भी अपनी सपनीली दुनिया बनाने लगेंगे। तुम्हारी तरह। हमारी तरह। हम सबकी तरह। जैसे हम किसी दूसरों के सपनों में आ जा रहे होते हैं। बताए। बिन बताए। कहे अनकहे। बे-नागा।

सच कहूँ मेरे पास, मेरी जेब में, या मेरी बगल में कहीं दबे हुए, कोई जादुई शब्द नहीं हैं। जो हैं, वह यहीं हैं। सबके सामने। कुछ भी छिपा नहीं है। हो सकता है, इन्हे पढ़ने के बाद से तुम फ़िर किसी नयी सपनीली दुनिया की तरफ़ जा सको। हम फ़िर कुछ और नए सपने देखती आँखों में डूब जाएँ। उन्हे पार करने की चाह से एक बार फ़िर भर जाएँ। तुम्हें पता है, वह आँखें हमारी ही हैं। जो बिलकुल हमारे सपनों की ही तरह किसी जादू से नहीं बनी होती। हम उन्हे अपने एहसासों की चिकनी मिट्टी से चाक पर रख देते हैं। हिम्मत से आहिस्ते-आहिस्ते दिल की धड़कनों के सहारे उन्हे हाथों से बुनते हैं। यह सच है, हमने आज तक कभी कोई रेशम की साड़ी नहीं बुनी, पर करीने से एक-एक धागा लिए अपने सपने बुनते हैं। इस धागे के लिए हम किसी शहतूत के पेड़ से वो रेशम के कीड़े नहीं पकड़ते। हम उन्हे अपनी नसों में बह रहे ख़ून से बने धागों से बुन रहे होते हैं।

और हम सब फ़िर चाहते हैं, तुम सपने फ़िर से बुनो। आहिस्ते से उस सपनीली नींद में जाकर फ़िर लौटो। सुकून से कभी सोचना, क्या तुम वही हो, जो दिल्ली आए थे। या वो जो दिल्ली छोड़ रहे थे। जाना किसी शाम उस ठंडे नीम के नीचे। वहीं नीरसता की कुर्सी को छोड़ आना। गर्दन उठा चुपके से ऊपर देखना, तुम्हारे सपने भी जंगली जलेबी की तरह वहीं किसी टहनी पर झूल रहे होंगे। अपने मनपसंद सपने साथ लेते आना। मेरे लिए भी आम की ख़ुशबू वाले। पानी के रंग जैसे। और इन ख़त्म होती पंक्तियों से पहले यही कहूँगा दोस्त, शादी की इस सालगिरह पर एकबार तुम दोनों फ़िर से कहो, सपनों के साथ, सपनों के लिए। हमेशा।

और अगली बार जब भी फ़ोन करना, तो बताना ज़रूर, दिल्ली कब पहुँच रहे हो..?? इंतज़ार रहेगा। 

आवाज़ें..

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...