जुलाई 31, 2014

मुर्दहिया: एक ज़िन्दगी की याद

गाँधी जयंती के ठीक एक दिन बाद। साल दो हज़ार बारह। राजकमल, दरियागंज जाकर कई किताबें साथ ले आया। उसी में एक किताब थी डॉ. तुलसी राम की ‘मुर्दहिया’। किताबें इत्मीनान माँगती हैं। थोड़ा रुककर साथ चलने का धैर्य। आहिस्ते से आमने सामने बैठने का खालीपन। मुड़कर वापस लौट आने की हिम्मत। किताब जब जिन्दगी की साँसों से बनी हो तब फ़िक्रमंद आँखें चाहती है। वैसे भी ख़ुद को मैं कभी  राकेश की तरह कहीं भी बीच से पढ़ डालने वाले कौशल से संपन्न नहीं पाता। इसलिए मन ऐसी किताबें ढूँढ़ रहा है, जिन्हे कहीं से भी शुरू करने पर वह शुरू हो जाएँ। किताब जो किसी बंधन की तरह न लगे। जो मुक्त करे। प्रमोद सिंह की ‘अजाने मेले में’ वह हो सकती है। जैसे राजेश जोशी की ‘किस्सा कोताह’।

बहरहाल। उस सुबह तय वक़्त से पहले न अरुण आता, और न मैं उसे ‘मुर्दहिया’ पढ़ने की बात कहकर नीचे नहाने जाता। शायद किताब छूटने का कोई डर उसे नहीं था। ज़रा सी देर में पच्चीस पन्ने पढ़ गया। यह उसके कई बार देखे आजमगढ़ की बात थी। जहाँ तुलसीराम अपनी पाँचवी तक की पढ़ाई पूरी करते हैं वह शेरपुर कुटी। टंडवा के परभु चौबे। चिरैयाकोट थाना।

सब उसे कितने पास लगने लगा। लगा धरमपुर कहीं सामने ही है। कुछ भी इधर से उधर नहीं हुआ। सब वहीं हैं। जिसे अपनी यादों में वह अभी भी वैसा बनाए हुए हैं। बिलकुल वैसा। सोच रहा है कभी जेएनयू जाकर उनसे मिल आएगा। कुछ बातें करेगा। मेरे मन में भी यह सवाल काफ़ी पहले का है कि शाकाहार को हम किस रूप में भूमि पर स्वामित्व से जोड़कर देख सकते हैं? कालांतर में जो भी शाकाहारी हुए उनके पास अनाज उगाने के लिए जमीन उपलब्ध थी। मुर्दहिया इस तरह भी इस विचार को और निकटता से देखने के लिए बाध्य करती है। जहाँ बड़े-बड़े जमींदार अकाल के दिनों में भी अनाज को छिपाये रहते थे और भूमिहीन दलितों के माँगने पर ‘डेढ़िया’ पर देते थे। वहीं उन्हे सन् सत्तावन-अट्ठावन के भीषण सूखे के दिन खेतों में जाकर चूहे के बिलों में पानी डालकर उन्हे बाहर निकलने पर मजबूर करते थे। ताकि उसे पीट-पीटकर मार देने के अलावे उन बिलों में से बाली (मक्का) भी निकालने का अवसर मिल जाये। यह जिजीविषा है या उसका विद्रुप प्रहसन। या शायद उनके जिंदा रहने की कमज़ोर सी कोशिश ?

ऐसा नहीं है कि इनमे संवेदनशीलता का किसी भी तरह से अभाव था। कुछ भी हो जाये वे लोग पोखर में एक टाँग पर खड़े बगुलों को कभी मारने की नहीं सोचते। वे उतने ही भावुक थे, जितना कोई और इंसान दावा कर सकता है। उनके घर में ‘बुढ़ऊ दादा’ जैसे बूढ़े बैल के प्रति अजीब तरह का लगाव था। मुन्नर चाचा ने चमड़ा छुड़ाकर कहा सियारों को पास नहीं आने देना। क्योंकि वे बुरी तरह नोच नोचकर माँस खाते हैं। शाम तक गाँव के चरवाहों के साथ तुलसीराम उन्हे खदेड़-खदेड़कर भगाते रहे। इन सबके बीच गिद्धों ने बुढ़ऊ दादा के माँस पिंड को कंकाल में बदल दिया। आखिर में वे अपनी चौधरानी चाची के कहे अनुसार उस कंकाल से दो बड़ी-बड़ी तलवारनुमा पसलियाँ लेकर घर लौट गए। यह स्मृतिचिह्न है। इन्हे देख-देखकर ही वह उनकी यादों में ज़िंदा रह लेंगे। 

यहीं उनके जीवन में सन् सत्तावन का भादो महिना आता है। जब अमिका पांडे ने पतरा देखकर ‘खरवांस’ के बचे पंद्रह दिन के कारण सुदेस्सर पांडे की माता का दाहसंस्कार टाल देने को कहा। यदि ऐसा न किया गया तो माता जी नरक भोगेंगी। इस कारण मुर्दहिया में ही एक जगह कब्र खोदकर लाश को गाढ़ दिया गया। लाश जल्दी न सड़े इसलिए टोटकावश कफ़न के एक कोने में सोने की मुनरी अँगूठी गठिया दी। लाश को सियारों से बचाने के लिए ऊपर से अकोल्ह की कंटीली झाड़ियाँ डाल दी गई। जैसे-तैसे खरवांस के पंद्रह दिन बीते और लाश को बाहर निकालने का दिन आया। सुदेस्सर पांडे दो चार फावड़ा मिट्टी हटाकर दूर खड़े हो गए और अब बारी आई मुर्दहिया के असली वारिसों की। लाश की दुर्गंध से वहाँ खड़े होना दूभर था। फ़िर भी जैसे तैसे उस लाश को अपने हाथों से पकड़कर पिता पुत्र चिता पर रख देते हैं। यह दुर्गंध उनके लिए भी उतनी ही दुर्गंध थी जितने कि एक एककर वहाँ से भाग लिए सभी लोगों के लिए। फ़िर भी वे दोनों वहाँ हैं। वे भाग नहीं सकते। उन्हे वहीं रहकर उस चिता को पूरा जलाना है।

ऐसी पता नहीं कितनी अमानवीय अनुभूतियों से ‘मुर्दहिया’ की ज़मीन भरी पड़ी है। पता नहीं कितने हृदय-विदारक क्षण यहाँ प्रत्यक्ष हैं। यहाँ का जीवन जीवन नहीं अभिशाप है। फ़िर भी मनुष्य को किसी ‘जाति विशेष’ में जन्म लेने के कारण उसे जीने के लिए अभिशप्त होना पड़ता है। यह कहानी उन स्थितियों का अस्वीकार है। उन क्षणों में जीने का नकार है। यह प्रतिरोध की गाथा है, जहाँ उन्हे पजामा पहने देख गाँव के ब्राह्मण ‘अणकुटवा’ कहते। ऐसे ही इस ‘राम’चरितमानस के ‘केवट प्रकरण’ के बाद वह बारह साल की लड़की कभी स्कूल दिखाई नहीं दी। इतनी छोटी होने के बावजूद अनहोनी का भय इतना भयानक था कि साल भर के भीतर ही उसकी ससुराल ढूँढ ली गयी। डोली में बैठते वक़्त पंडित की बेटी रो-रोकर कहती रही कि ‘हमार पढ़ाई छूटि गयल हो बाबा’।

बस यहाँ तक आते-आते याद आ रही है किसुनी भौजी की चिट्ठी। कोयलारी में उनका पति काम करता है:
“हे खेदन के बाबू! हम कवन-कवन बतिया लिखाई? बबुनी बहुत बिलखइले। ऊ रोइ-रोइ के मरि जाले। हमरे छतिया में दूध ना होला। दूहै जाईला त बकेनवां लात मारै ले। बन्सुवा मजूरी में खाली सड़ल-सड़ल सावां दे ला। उप्पर से वोकर आंखि बड़ी शैतान हौ। संझिया का रहरिया में गवुंवा क मेहरिया सब मैदान जा लीं, त ऊ चोरबत्ती बारै ला। रकतपेवना हमहूं के गिद्ध नाई तरेरैला। चोटवा से पेटवा हरदम खराब रहै ला। हम का खियाईं, का खाईं कुछ समझ में ना आवैला। बाबुनी के दुधवा कहंवा से लिआईं? जब ऊ रोवैले, त कब्बो-कब्बो हम वोके लेइ के बहरवां जाइके बोली ला कि देख तोर बाबू आवत हऊवै, त ऊ थोरी देर चुप हो जाले। तू कइसे हउवा? सुनी ला की कोइलारी में आगि लागि जालें। ई काम छोड़ि दा। गवुंवै में मजूरी कइ लेहल जाई। सतुवै से जिनगी चलि जाई। येहर बड़ी मुसकिल से बीतत हौ। अकेलवै जियरा ना लागैला, उपरा से खइले का बड़ा टोटा हौ। हो सकै त बीस रुपया भेजि दा। जब अइहा त तुलसी बाबू के एक जिस्ता कागद जरूर लेहले अइहा, ई है सब कर चिठिहा लिखै लं। ई बड़ा तेज हउवै। अउर का लिखाई हम? थोर लिखना, ढेर समझना”।
नेहरू की मृत्यु के साल तुलसीराम अपना गाँव छोड़ते हैं। फ़िर कभी वापस नहीं लौटते। पता नहीं उनकी दादी के जमीन में गाढ़े चाँदी के ‘बिस्टौरिया’ सिक्कों का क्या हुआ होगा? उनकी याद में वह कैसे आते रहे होंगे। उनकी कहानियों में उनका पोता भी एक किंवदंती बन गया होगा। अम्मा की ‘रतौन्ही’ वाली आँखें, कैसे पोखर एक पास बैठी वापस लौटने की राह देखती रही होगी। ख़ुद ‘मुर्दहिया’ कैसे उन्हे याद करती रही होगी। नटिनिया वहाँ कब तक खड़ी रही होगी? उस चुरा लाये अम्मा के बक्से का क्या हुआ होगा? उस बेकना भैंस ने फ़िर किसे अपनी सवारी करने दी होगी? वो छीन ली गयी फाउंटेन पेन की याद कैसा कर जाती होगी? पता नहीं ऐसी कितनी ही बातें जिनको वह याद नहीं करना चाह रहे होंगे, तब भी लिखते वक़्त वह सारे दृश्य आँख के सामने दिख जाते होंगे।

जुलाई 27, 2014

कुछ और बेतरतीब सी बातें..

जबसे वह चला है, तब से अब तक ट्रेन में सब सो चुके होंगे। वह भी गर्दन एक तरफ़ कर यहाँ के बारे में सोच-सोच उकता गया होगा। नींद अभी सिराहने से गुज़र वापस लौटने की तय्यारी में होगी। कि तभी एक हाथ उसके पास आकर, किनारे वाली बत्ती को जलाने वाला बटन ढूँढ रहा होगा। उन हाथों की मेंहदी अभी भी उतनी सुर्ख़ होगी, जितनी बीती रात जयमाल स्टेज पर थी। दूल्हा शेरवानी में नहीं था। वह लहंगे में थी। घुँघराले बालों वाला फ़ोटोग्राफ़र कैसे उसे देखता रहा था। शायद उसकी आदत ही रही होगी। हर लड़की में अपनी बीवी को ढूँढ़ने की। यह उनका सपना भी हो सकता है। उन मेहंदी वाले हाथों का, उस तस्वीर वाले का, मेरे दोस्त का। पर यहाँ मैं क्या कर रहा हूँ? शायद ऐसे ही घूमने की आदत वहाँ ले गयी होगी। पर मुझे लौटना होगा। उस खिड़की के बाहर बिजली के खंभों से गुज़र कर वापस आना होगा।

जब शाम इन्ही खिड़कियों से बाहर झाँकते वह अपने पुराने दिनों की तरफ़ लौट रहा था, तब वह बिलकुल अकेला था। जैसे वह आजकल कुछ जादा ही सोच रही है। अकेलापन जब अंदर से बाहर की ओर आता है, वह तब ऐसे ही निर्मम होता है। अतीत अंदर तक कचोटता रहता है। जैसे कोई नीम बेहोश किये बिन, कट गए हाथ को सिल रहा हो। ख़ून तब बहता नहीं, वहीं रुक जाता है। जैसे चलते-चलते घड़ी रुक जाती है। जैसे बारिश में भीगते कभी बूँदें वहीं आसमान में थम जाती हैं। वैसे ही आसपास सब रुक गया है। पता नहीं क्या है, जो इस खालीपन को और खाली कर रहा है। हम हमेशा सबसे घिरे नहीं रह सकते, तभी यह हूक दिल से होकर इन उँगलियों में चटकती रहती है। मेरी उँगलियों में पड़ गई गाँठें, कुछ-कुछ इसकी कहानी भी कहती हैं। पर मन नहीं करता। मन नहीं करता उनके पीछे जाकर किसी बात को करिने से लगा लूँ। बस वह भी वहीं खड़ी रहती है। जैसे अभी खड़ी है। 

सोचता हूँ, कुछ दिन उसे अपने शहर बुला लूँ। या ऐसा हो कि वह अपने इस पुराने शहर ख़ुद आ जाए। और एक दिन, एक पूरे दिन ऐसे ही साथ बेतरतीब घूमते रहें। बेमकसद। बेपरवाह। बेखयाल। बहुत सारी बातें उन अमलतास के पेड़ों के नीचे बैठ कर करते रहें, जहाँ अब अमलतास के फूल नहीं झरते। सेमर की रुई उड़ती है। उनका मौसम चला गया तो क्या, हम दोनों ऐसे ही बैठे रहेंगे। कुछ दोस्त ऐसे भी होते हैं। जिनके नाम नहीं होते। पर अगले पल ख़याल आता है..पता नहीं क्या..जो सोचो उसे लिख भी दो, तब भी क्या वह सब सच होने वाला है कभी.. पता है, ऐसा कुछ नहीं होने वाला। पता नहीं कैसी-कैसी बातें करने लगा हूँ। अजीब-अजीब सी। जिनका अपने में कुछ मतलब है भी या नहीं, कह नहीं सकता। पर सच, उससे मिलना कैसा होगा? जो कुछ-कुछ या बिलकुल वैसे ही अंदर से जैसे हम हैं। अंदर की छटपटाहट कुछ देर के लिए सही, हम सुन रहे होंगे। आहिस्ते से उन्हे बुन रहे होंगे। 

पता नहीं ऐसे कितने ही ख़यालों, बातों, ख्वाबों से उसके सपनें भर गए होंगे। उन्हें छूना नहीं है। दूर से देखते रहना है। ट्रेन से आते वक़्त वह बिलकुल अकेला नहीं है। सोच में भी वह ऐसा ही रहना चाहता है। कल सुबह नींद खुलने पर सपने कौन से हाथ लगने वाले हैं। हमारी हथेलियाँ उसका कोई सुराख़ भी नहीं छोड़ती। के उन चींटियों की गंध के सहारे, उन सपनों वाले देस हम भी पहुँच जाएँ। हम बस कुछ एहसासों से भरे रह जाते हैं। मुलायाम-सी छुअन की तरह। तब मक्खियाँ कटहल पर भिनभिनाती नहीं हैं। तब भँवरों के परों का संगीत गूँजता है। उन्हे कोई नहीं सुन पाता। हमारे कान भी नहीं। वह धुनें आहिस्ते से साँसों से होते हुए दिल में उतरती जाती हैं। वहीं, उन साथ के स्पर्शों में घुलते हुए हम स्मृतिकोशों में हमेशा के लिए दर्ज होते जाते हैं। हम कभी नहीं मिटते। कोई मिटाना भी चाहे तब भी नहीं। इनके कहीं न होने पर शायद हम भी कहीं नहीं रहेंगे। यह निशानियाँ आगे आने वालों के लिए नक़्शे हैं।

अभी देखा, गाड़ी चौदह मिनट लेट है। कानपुर वक़्त से नहीं पहुँच रही। उससे पहले कहीं पटरियों पर दौड़ रही है। दिल्ली चार सौ उनतालीस किलोमीटर दूर है। तुम अभी भी बहुत सारे सपने देख सकते हो। और तुम्हारे बहाने, इधर कई सारी अनकही बातें दोहराता, इस रात की उमस से बचने की कोशिश करता, आँखों में दर्द होते रहने के बाद भी सोने नहीं जा रहा। तुम आओगी तब बहुत सी बातें करेंगे। ‘गुड़िया’ पर नहीं पहुँच रहा, फ़िर भी तुम इंतज़ार करना। हम वहीं कहीं छत पर बैठे होंगे। अगल बगल। फ़ोन पर जो नहीं कह पाता, वहीं पास आकर तुम्हारे कानों में कह दूँगा। तुम भी जो नहीं कहती, ऐसे ही कहती जाना। हम सारी बातें सारी रात ऐसे ही चाँद की छाया में बैठे करते रहेंगे। तब इन सपनों की ज़रूरत नहीं होगी। इन्हे जेब में लिए रहूँगा बस। और कुछ नहीं।

जुलाई 24, 2014

लखनऊ में वो जो एक रूमी दरवाज़ा है

हर शहर में कुछ-कुछ हम होते हैं। हमारी साँसें हमेशा बहाने बनाकर उधर ही खिंचती रहती हैं। हवाओं में उड़ती पतंगों की डोर की तरह, आसमान में अपनी मर्ज़ी से नाचती रहती हैं। ढील देते उँगलियों के बीच फँसे मँजे की तरह। धड़कनें हर धड़कन के साथ वहीं ले जाती हैं। हम कहीं खोई-खोई सी दिशाओं में गुम हो जाते हैं। कभी वापस न आने के लिए। ऐसे हर शहर अपनी तरह से हमें बुनते हैं। वहाँ की सड़कें, आवाज़ें, लोग, कपड़े, गलियाँ, गंध, चौक, बाज़ार, इमारतें सबमें हम ख़ुद को थोड़ा-थोड़ा रख आते हैं। के अगली बार आएंगे, तो फ़िर मिलेंगे। कुछ इस तरह अजनबीपन कम होते-होते एक दिन ख़त्म हो जाएगा। इस तरह हम भी वहाँ की हवा में अपनी देह की गंध को महसूस कर सकेंगे। कह सकेंगे कि यह शहर भी हमारा है। इसकी याद हमारी है। हम भी इसे थोड़ा जानते हैं। यह भी हमें थोड़ा पहचानता है।

ऐसे ही दो साल पहले वहाँ रूमी दरवाज़े को छोड़ आया। बुलंद दरवाज़े की तरह इसमें कोई दर्प नहीं है। चुपचाप खड़ा है। कितने करिने से इसे बुनने वाले ने बुना है। आहिस्ते-आहिस्ते। जैसे कोई मोहब्बत में आगे बढ़ने में झिझक रहा हो। जैसे दोनों के अंदर एक-दूसरे को छूने की ख़्वाहिश तो है, पर थोड़ा डर भी है। अनवर की याद बीच-बीच में मुझे ऐसे ही कर जाती है। दोनों कैसे एक-दूसरे से छिप रहे हैं। भागते-भागते उन मेहराबों के बीच से गुज़रता स्पर्श मुझे भी छू जाता है जैसे। मैं वहीं गुम-गुम सा उन्हे ऐसे ही देखता रहता। पायलों की झंकार गीत की तरह कानों में बजने लगती। उन सीढ़ियों को उन्ही की परछाईं में ढूँढने की कोशिश करता, पर वे कहीं नहीं मिलते। शायद कहीं किसी कोने में छिपकर मुझे देखते रहते होंगे। पता नहीं कितने साल पहले यही मेरी इन तीनों से पहली मुलाक़ात थी। मेहरु, अनवर और रूमी दरवाज़े से। हर बार इन तीनों से ऐसे ही मिलता रहा। मिलने से पहले कभी सोचता नहीं। बस ऐसे ही कमरे में अकेले बैठे, उधर खिड़की वाले आसमान में उगते चाँद की तरह, पहले प्यार की कशिश से घिरता रहा हूँ।

शायद इमारतें ऐसे ही हमारे अंदर हमेशा ज़िंदा रहने के बहाने ढूँढ लेती हैं। वह ढूँढ लेती हैं कि कोई उन्हे उन्ही की तरह प्यार करने वाला है। वह उन यादों को दिल के कोनों में संभाल कर रखेगा। वह कभी गुम नहीं होंगी। वहीं रहेंगी। नसों में ख़ून की तरह। पता नहीं इसमें क्या है कि इसे देखते ही न जाने कितने ख़यालों में खो जाता हूँ। कितनी बातें हरारत से भर देती हैं। यह रूमानी कर देने वाले पल हैं, जब ख़ुद पर काबू नहीं रहता। बस किसी बे-ख़याली में बहता सा रहता। रेत में तैरने की तरह। वहाँ, उन सीढ़ियों के पास, दोनों आपस में बात नहीं करते, फ़िर भी एक-दूसरे अनसुनी बात सुन लेते हैं। दिल की आवाज़ धड़कनों में कानों से ऐसे ही घुलती जाती हैं। उनमे मिशरी की मिठास दसहरी आमों से गुज़रकर देह में घुलती रही हैं। दोनों का लखनऊ यहीं से शुरू होता है। मेरा लखनऊ भी यहीं से शुरू हुआ। यह इस शहर से मोहब्बत की शुरुवात थी। नए-नए खिले सूरजमुखी के फूल की तरह। कोमल से सरसो के फूलों वाले रंग सा। जब दोनों साथ होते, तब ऐसे ही दमकते। दोनों की आँखें ऐसे ही चमकती। चमकती रहती।

पर प्यार को नज़र जल्दी लगती है। कई नज़रें एकसाथ उन्हे देखती रहती हैं। हरबार वह बाहर निकलने से पहले अपने कान के पीछे काला टीका लगाना भूल जाती। भूल जाती के बाहर निकल रही है। दोनों के लिए यह एक दूसरे से गुज़रते रहने का एहसास था। दोनों यहीं इतने इतमिनान से एक-दूसरे के अगल बगल बैठते। एक दूसरे को देखते रहते। उन्हे क्या पता, अगले ही पल, यहीं उनकी मोहब्बत दफ़न होने वाली है। दोनों वहीं सीढ़ियों के पास केसर के फूल बन जाते हैं। दोनों ढलते हुए सूरज के रंग में ढल जाते हैं। छिप जाते हैं। दोनों फ़िर कभी नहीं मिल पाएंगे। कभी नहीं। इश्क़ के कई बेस्वाद अनमने ज़ायक़े गले में फँसते रहने के बावज़ूद अंदर तक उतरते जाते हैं। यह रूमी दरवाज़ा उनकी क़ब्रगाह है। इसने इन यादों को बुरादा बनती ईंटों में संभाले रखा है। लोगों को उन क़दमों की आहट कभी सुनाई नहीं देती। कोई वहाँ जाता नहीं है। सब दूर से देखते हैं। परछाईं में इन्हे ढूँढते हों जैसे।

कभी सोचता हूँ, किसी रात सपने में उन दोनों से मिल आऊँ। अनवर, तुम इतने निर्दयी कैसे हो गए? ये कैसा इश्क़ है, जिसमें तुम इस हद तक चले गए। मास्टर पाशा ने तुम्हें कुछ नहीं बताया? वह कैसे अपनी मोहब्बत में ख़ुद को मिटा देता है? एक गाड़ी आती है और काम ख़त्म। तुम बेरहम हो अनवर। तुम्हें मालुम नहीं, इश्क़ हमेशा साथ के लिए नहीं होता। उसे चले जाने भी देना होता है। मेहरु जा रही थी। तुम्हें उसे जाने देना था। वह तुम्हारी किरायेदार थी। उसने तुम्हें अपना दोस्त चुना था। उसने अमीनाबाद से लाये तुम्हारे झुमके भी तो पहन लिए थे। तुम्हारे साथ कैसे बक्शी के तालाब तक हो आई थी। साइकिल पर तुम दोनों कितने अच्छे लग रहे थे। एक दूसरे की तरफ़ झुके-झुके से। उस ढलते सूरज में तुम दोनों की परछाईं इसी रूमी दरवाज़े में समा जाती है। कम-से-कम इसका ख़याल तो रखना था। पर तुम नहीं माने। तुम्हें पहले उससे पूछ लेते। पर मुझे पता है तुम गोली लग जाने के बाद सबसे जादा इसे ही याद कर होगे। रिसते ख़ून से तुमने असफ़-उद-दौला नहीं लिखा होगा। तुमने मेहरु लिखने की कोशिश की होगी।

बस, वहाँ से दोनों की एकबार की बात ले आया हूँ। सुनने का मन हो तो..

जुलाई 22, 2014

हमारा समय, विवाह, प्रेम, समाज और उसका पुनुरुत्पादन

पिछली पोस्ट पर श्वेता को ‘जेंडर डिस्कोर्स’ की संभावना दिख रही होंगी, लवकेश पीछे पन्नों पर उकड़ू बैठ उन्हे पढ़ रहा होगा। करिहाँव दर्द करने लगे होंगे। राकेश फ़ोन करने की सोच रहा होगा, पर सिर्फ़ सोचता रहेगा। कर नहीं पाएगा। वह भी कुछ सोच रही होगी। पर कुछ कह नहीं पाएगी। इन सबके भीतर यह मानवीय सम्बन्धों में जीवंतता का विषय है। फ़िर सतह पर यह जितना भावुक दिखता है, अंदर भीतरखाने यह उतना ही जटिल है। इसकी संरचना उनती ही क्लिष्ट है जितना कि यह समाज। जिन संसाधनों पर उनका एकाधिकार है, वह शायद ही कभी रिसकर हमारी हथेलियों का पसीना बन पाये। यह कब्ज़े ही ‘सांस्कृतिक पूँजी’ हैं, जो हमारे हिस्से के परिवारों में कभी जुट नहीं पायी।

देखा कितनी आसानी से अपनी तमाम विफलताओं, नाकामयाबियों, कमजोरियों को सैद्धांतिक जामा पहनाकर उससे ख़ुद को अलग कर लिया। यह कितना निर्लिप्त भाव है। लेकिन असल में जितने भी और जैसे भी हम हैं, उसकी ज़िम्मेदारी हमारी नहीं, उन इराज़ेदार औजारों पर नियंत्रण करने वालों की है। हमने कभी उस नियंत्रण को चुनौती नहीं दी। ख़ुद को हारा हुआ मान अपने आप किनारे खिसक गए। इस शोषणकारी व्यवस्था के दमनचक्र में इसलिए पिछड़ते गए। यह हमारे जन्म से भी पहले उन सबके पूर्वजों की चालाकियाँ हैं, जो जाति, धर्म से लेकर हर उस यथा-स्थितिवादी व्यवस्था को बचाए रखने की साज़िश है, जिससे इस पूरे तंत्र पर उनकी पकड़ ढीली न पड़ जाये। 

सोचिए एक ब्राह्मण पिता सिर्फ़ इसलिए अपने बेटी को जाति के बाहर प्रेमविवाह नहीं करने देना चाहते क्योंकि शादी में जो दहेज़ वे देंगे, उसके जाति से बाहर जाते ही उस दूसरी तरफ़ ‘सामाजिक गतिशीलता’ के कुछ चिह्न दिखने लग जाएँगे। यह पीढ़ी-दर-पीढ़ी होते ‘सांस्कृतिक पुनुरुत्पादन’ में बाधक की तरह दिखाई देता है। इससे उनके पुरोहिताई के एकाधिकार की बाड़ेबंदी, कलई की तरह धीरे-धीरे खुलने लगेगी। प्रेमविवाह उनके समाज को विघटित कर देगा। उन सारी संस्थाओं को सिरे से ख़ारिज कर एक नयी व्यवस्था के लिए वह ख़ुद को कभी तय्यार नहीं कर पाते। तभी तीन साल से अपने बेटे को जाति बाहर शादी करने से रोके हुए हैं। ‘रक्त शुद्धता’ बनी रहनी चाहिए। खाप पंचायतें इस अर्थ में समाज को किसी भी संभावित विघटन की त्रासदी से बचाए रखने के लिए प्रयासरत हैं। इस रूप में स्त्री पुरुष केवल किसी तरह ख़ून को बचाए रखने और अपनी स्थिति को पदानुक्रम में ऊपर रखने के औज़ार भर हैं।

पैट्रिक फ्रेंच एक जगह लिखते हैं कि मुरलीमनोहर जोशी जब अपनी पिछली सरकार में गऊ संरक्षण की बात कहते हैं तो इसका एक तात्पर्य यह भी है निकलता है कि वह एक ऐसे जीव के संरक्षण की बात कर रहे हैं, जिसके मूत्र को दूषित व्यक्तियों पर छिड़ककर शुद्धता प्रदान की जाती है। और इस अर्थ में वे उन जातिगत ढाँचों और मजबूत बनाए रखना चाहते हैं, जिसके वर्चस्व में बाकी सबके अस्तित्व को आज तक नकारा जाता रहा है। बच्चन सिंह तुलसी के ‘रामचरितमानस’ पर बात करते हुए इस ओर ध्यान दिलाते हैं के उनका अभीष्ट सामाजिक रूप से एक ऐसी कठोर व्यवस्था को आदर्श रूप में स्थापित करना था, जिसमें किसी भी तरह का विचलन स्वीकार्य नहीं था। वहीं कृष्ण को अपना आराध्य मानने वाले सभी भक्तिकालीन कवि राम की स्तुति करने वालों की तरह सवर्ण नहीं थे। उनकी रचनाओं में कृष्ण का समाज अधिक उदारता से दूसरे के अस्तित्व को स्वीकारता है। उन्हे अपनाता है। दीपांकर गुप्ता क्रिकेट से उदाहरण लेकर बताते हैं कि कैसे इन स्वमान्य आदर्शों को हमने अपने अंदर इतने गहरे ‘आत्मसात’ कर लिया है। वे कहते हैं कि भारतीय टीम का क्षेत्ररक्षण आज तक इसलिए भी सुधर नहीं पाया है क्योंकि मिट्टी के साथ त्वचा का संपर्क हमारे समाज में एक वर्ण या जाति के साथ इसतरह सम्बद्ध है कि इस खराब क्षेत्ररक्षण का जातिगत विश्लेषण किया जा सकता है और हम पाएंगे कि हमारी भारतीय टीम किस तरह से सवर्णों का जमावड़ा है। हम चाहकर भी इससे खुद को बाहर नहीं निकाल पाये।

इन सबके बाद भी कई संरचनाएं हैं जिनकी जटिलताओं से लगातार जूझते रहे हैं। जैसे कोई हिन्दी भाषी लड़का दिल्ली आकर यहाँ पली-बढ़ी साथ पढ़ने वाली किसी अँग्रेजी भाषी लड़की के साथ प्रेम में हो, तब उस लड़के की सामाजिक स्थिति में किस तरह के परिवर्तन आकार लेंगे?  हाल ही में आई फ़िल्म ‘टू स्टेट्स’ की रौशनी में यह सवाल लाज़मी हैं कि इस तरह सम्बन्धों में आने के बाद उन दोनों के पारिवारिक गतिकी किस तरह बदलेगी? यह सांस्कृतिक रूप से दो भिन्न परिवारों के निकट आने के बाद उस परिवार में जन्में बच्चों को किन सहूलियतों से भर देगी? भाषिक रूप से उनके पास कौन से पैने औज़ार होंगे, जिससे आर्थिक रूप से बदलते परिदृश्य में वह ख़ुद को कहीं स्थापित कर पाने में कितने सक्षम होंगे? ख़ुद उन दोनों में से कौन सामाजिक रूप से ‘ऊर्ध्व गतिशीलता’ को प्राप्त होगा? क्या यह किसी भी तरह से समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से परखा जा सकता है, जहाँ लड़का उस अंचल से आता हो जहाँ सरकारी नौकरी के बाद उसकी कीमत में गुणात्मक परिवर्तन आ गया हो। पर लड़के की ज़िद हो कि वह शादी करेगा तो दिल्ली वाली लड़की से ही। दिल्ली नामक शहर की गतिकी में विवाह जैसी संस्था में प्रवेश को कैसे देखा जा सकता है?

{पीछे का पन्ना: रात, जब चाँद भी ढल गया..}

जुलाई 21, 2014

रात, जब चाँद भी ढल गया..

रात के एक बज रहे हैं। यहाँ क्या कर रहा हूँ? पता नहीं। ऐसे ही बैठ गया। कई सारी बातें किसी उदास ख़याल की तरह दिमाग से दिल की तरफ़ उतरती, धड़कनों से ख़ून में घुलने से कुछ देर पहले वापस दिमाग की तरफ़ लौट गईं। कुछ वहीं रुकी रहीं। उनके होने-न-होने से कोई फ़रक नहीं पड़ने वाला। दिमाग के बाहर उमस कुछ जादा है। पसीना सूख नहीं रहा। जेब भी सिली नहीं के नोट रुक सकें। इधर इन दिनों को अपनी ज़िंदगी के सबसे कमज़ोर दिनों की तरह महसूस करते रहना तोड़ रहा है। खुश रहने की कोशिश करता हूँ, पर पल भर बाद ही कहीं से कोई गुलाब के काँटे-सी चुभती बात एड़ी में गड़ जाती हैं। ख़ून नहीं निकलता, बस दर्द होता है। बहोत मन होता है, बात करने का। पर किसी भी पुराने बीत गए दोस्त पर उँगली नहीं रख पाता। 

सब अपनी ज़िंदगियों में मसरूफ़ हैं। जो काबिल हैं वो भी, जो काबिल नहीं हैं वो भी। कोई किसी कंपनी में इतने सालों से बैठा है, जब हम अपनी नौकरी के लिए सोचना शुरू करने वाले थे। कोई अपने पिता की दुकान संभाल रहा है। किसी के शादी के बाद दो अजीब से नाम वाले बच्चे हैं। कोई रोज़ अपने स्टेटस में चिंतित सी दिखती है, पर असल में वह है नहीं। उसने समाज को अपने सरोकार के दृष्टिबाधित दोष से देखना शुरू कर दिया है। इधर ख़बर लगी कुछ कम पढ़े, कम समझदार लोग 'डॉक्ट्रेट' पाने वाले हैं। उनका रंग गोरा है। उनकी देह गोरी चमड़ी वाली है। फ़िर जो गोरे नहीं हैं, उनके पास हमसे अलग भाषिक औज़ार हैं। उनकी भाषा में हमारी तरह भावुक नहीं हुआ जाता। अपनी अति भावुकता के बदले रविंदर सिंह, चेतन भगत, रॉबिन शर्मा हुआ जाता है।

हम हारे हुए लोग हैं। हमारी मुट्ठी से पल पल सपने रेत की तरह फिसलते रहे हैं। यह किसी कहानी या आत्मकथ्य से उठाई गयी पंक्ति नहीं है। यह हमारी ज़िंदगियों का सच है। हम इसे बेचने लायक कौशलों से विपन्न हैं। सबकी साठ पैंसठ साल की ज़िंदगी है, पर कितने अलग-अलग रंग हैं सबके। हमारे हिस्से तो उजले रंग कम ही पड़ गये हों जैसे। शायद यह हमारा भ्रम है कि हम ख़ुद को इंसान माने बैठे हैं। हम तो कुछ और ही हैं। किसी को दिखाई न देने वाले। अभी हममें से कई तो ऐसे हैं जिन्होंने शादी के बाद अपनी बीवी के साथ ठीक से हगनी गढईया भी नहीं देखा, दूसरी तरफ़ लोग बिदेस टहर के लौट रहे हैं। जितना साफ़ पानी हमारे गिलासों में नहीं, उतना चमकदार पानी वहाँ के समंदरों का है। एक नाव है, दूर, उसपर भी बैठ आयें हैं। अब यहाँ किनारे से देख रहे हैं। लड़का-लड़की बाहों में बाहें डाल ऐसे फ़ोटो खिंचवा रहे हैं, जैसे उनके बगलों-काँखों से गायब बालों की तरह रिज़ॉर्ट में रखे झोलों-सूटकेसों में कोई दुख नहीं है। वहाँ सब इत्ता तरल-चिकना है, जैसे अमूल मक्खन की तरह उनकी पत्नियों की बाहें। हम उन चेहरों पर किसी भी परेशानी को माथे पर शिकन की तरह नहीं देख पाते। सब कुछ कितना सुंदर है। दृश्य से लेकर जीवन तक। 

फ़िर भी लगता है, इन सब बातों के भीतर कुछ संभावनाएं बची रह गयी हैं। हम अभी भी कुछ-कुछ ज़िंदा हैं। थोड़ा बहुत साँस लेते हैं। हम रोज़ किसी-न-किसी बात पर झगड़ते हैं। कभी सच, कभी झूठ। कभी नमक कम है, तो कभी रोटी नहीं बनी। ख़ुद रसोई में साथ खड़े होकर उनके कुछ और पास रहते हैं। कभी पतीली में पानी गरम कर रहे होते हैं, कभी कनस्तर से आटा निकाल कर आजवाइन के डिब्बे को ढूंढ रहे होते हैं। पूड़ी जल न जाये इसलिए वहीं बेलते हुए, बराबर कढ़ाई पर नज़र बनाए रखते हैं। कभी गिलास में शर्बत लिए आटा गूँदने तक इंतज़ार करते हैं। हम रोज़ाना में जिस तरह इन अलग-अलग जगहों पर साथ होते हैं, क्या उन घरों में भी अमीर पतियों के साथ वे सब ऐसे ही मिल पाती होंगी। वे खाना बनाने वाली नौकरानी से झगड़ते नहीं, डाँटते हैं। उसके माथे पर पसीना देख अपनी बाँह से उसे पोंछते नहीं हैं। कभी खाने पर कोई नोकझोंक होती भी होगी? उन्हे क्या कभी गुस्सा भी आता होगा? क्या वे सब कभी झगड़ते भी होंगे। उनके संबंध इन खाली जगहों को कैसे भरते होंगे। शायद कर्लऑन के गद्दों पर सोकर उठने के बाद बिस्तर की चाय पर साथ होते होंगे। या उन महँगे-महँगे बाथरूमों में टब के अंदर या शावर के नीचे एकसाथ नहाते होंगे। यह सच है हम आज तक ख़ुद ऐसे घरों में नहीं गए, यह आज भी हमारे लिए सिनेमा के पर्दे से दिमाग में आए हैं। पर उन तस्वीरों से लगता यही है, उनकी ज़िंदगियाँ इससे अलग कुछ क्या होंगी। बेजान-सी, बिन धड़कनों-साँसों वाली।

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जुलाई 11, 2014

इन दिनों..

वहीं हैं, जहाँ हम थे। यहीं अपनी दिल्ली में। कहीं गए नहीं हैं। जिसका अपना कोई मौसम नहीं। जिसकी जमा पूँजी अब सालभर गरमी ही रह गयी है। किसी काम लायक नहीं छोड़ती। अलसाए से दिन। उतनी ही बोझिल-सी रातें। बीच में शामें तपते सूरज से बचाती कम, उमस में लिपटे तौलिये जैसे निचोड़ती जादा हैं। बाल्टियों के पेचें खोलती गरम हवा। अभी छत से भाग आया हूँ। कागज़ पर मन नहीं किया। वहाँ रहता तो पंखा चलने नहीं लगता। फ़िर हाथ से रिसता पसीना डायरी भी गीला कर देता। उसके भीग जाने पर लिख भी नहीं पाता। वैसे, दिन जैसे बीत रहे हैं लिखने के क़ाबिल भी नहीं रहूँगा। सिर्फ़ इसके क़ाबिल था। अब शायद वो भी नहीं। धीरे-धीरे अंत की तरफ़।

तीन दिन पहले ड्राफ़्ट में इतना लिख छोड़ दिया था। आगे कह ही नहीं पाया।

तो मैं अभी भी यहीं हूँ। खिड़की के किनारे। काँच के शीशे लगे हैं। बाहर तपती छत उतनी ही गरम है, जितना अंदर बैठा मेरा दिमाग। इसके अलावे और कुछ नहीं होता पूरा दिन। पहले सूरज चढ़ता है। खोपड़ी के ऊपर तक। फ़िर धीरे-धीरे उतरना शुरू होता है। सिवाए इंतज़ार के यहाँ कुछ नहीं है। आसमान बिलकुल कोरा है। सफ़ेद सा। ज़रा सा नीलापन भी नहीं। न उसमें कहीं भूरा सा कोई टुकड़ा। बादलों की रूई अभी तक आई नहीं है। मन मार इस चलती गरम लू को मॉनसून की हवा मानने को होता भी हूँ, तो भी नहीं मान सकता। सारा वक़्त लगता रहता है, करने को जैसे कुछ नहीं है। पर मेज़ किताबों से अटी पड़ी है। कभी गिनी नहीं। पर ढेर में यही कुछ सत्तर-अस्सी किताबें तो निकल आएंगी। पर नहीं। पढ़ना बिलकुल नहीं है।

ऐसे ही एक शाम मन किया स्कैच बुक ले आया। फ़ोर बी से लेकर ऐट बी की पाँच-पाँच पेंसिलें। एक ‘नॉनडस्ट’ इरेज़र। एक शार्पनर। और तब से लेकर उसके पहले पन्ने पर उतरकर क्या आया? एक अधूरा खड़ा अजनबी-सा बिन टहनियों का पेड़। बगल में दो पहियों वाली टूटी-फूटी साइकिल। और बहुत बड़ा खाली-सा सपाट मैदान। जिसपर तब से टहलने भी नहीं निकला। सुबह यहीं सैर कर लिया करूँ? पर नहीं। यहीं उबासियाँ लेता, पसीने से तरबतर होता रहा हूँ। घड़े से पानी पीने नीचे भी नहीं जाता।

पीछे इतवार पसीने में भीगता दरियागंज हो आया। कमीज़ के अंदर चींटियों-सी रेंगती पसीने की बूंदें। रमेशचंद्र शाह की डायरी पर नज़र पड़ी। ‘अकेला मेला’ के बाद वाले खंड पर। ‘इस खिड़की से’। नाम शायद पहले का कभी याद रह गया होगा। पर जैसा सोचा था, सुना था, वैसी बिलकुल नहीं है। वहाँ मन नहीं है, बुद्धि है। खयाल नहीं, विचार हैं। दिल की परतें, मन की उलझनें सिरे से गायब हैं। छटपटाहटें नहीं हैं। किसी के छूट जाने की टीस नहीं है। कोई याद घूम घूमकर वापस नहीं आती। कोई गली, कोई चौराहा फ़िर-फ़िर नहीं टकराता। यह अंदर नहीं घूमती। बाहर घुमाती है। लगता अजीब-सी दिमागदारी उसके हर पन्ने को आरपार चीरती जा रही हो जैसे। ख़ून से रिसते भाव भी नहीं हैं। सब अजनबी सी बाते हैं। यह वह बेतरतीब टिप्पणियाँ हैं, जो अशोक वाजपेयी के ‘कभी-कभार’ की तरह, किसी अख़बार का हिस्सा कभी नहीं बन पायीं। कोई इन रंगे बेजान से पन्नों को कोई डायरी कैसे कह सकता है?

वहीं से एक शायर की किताब लेता आया। वारिस किरमानी की ‘घूमती नदी’। देवा शरीफ़ से शुरू होती। अभी पढ़ना शुरू नहीं किया है। ऐसे ही सिराहने रखे हुए हूँ। वहाँ घाघरा नदी में मिल जाती गोमती है। अवध की ख़ुशबू है। दसेहरी आम के जैसे महकते किस्से हैं। आज़ाद होते हिंदुस्तान की कहानी है। उसके बनने बिगड़ने का दर्द है। शायद असल किताब उर्दू में रही होगी। यह उसका तर्जुमा है।

कई दिनों से मन है सर को फ़ोन करूँ। पर हरबार सोचकर रह जाता हूँ। वक़्त भी थोड़ी देर रुककर सोचने नहीं देता। मन था केंद्रीय सचिवालय से मंडी हाउस तक बढ़ गयी मेट्रो देख आऊँ। एनएसडी की तरफ़ नया गेट खुल गया है। फ़िर सोचता हूँ एक शाम क्नॉट प्लेस, सरवन भवन जाकर डोसा खाकर आया जाये। तब शायद कुछ ‘मूड’ बने। इसके अलावा अपने हिस्से कुछ नहीं है। इस गर्मी में बहुत-सी पोस्टों को या तो लू लग गयी या उनके ‘नोट्स’ ‘ड्राफ़्ट’ में रह गए। कुछ दो तीन हिस्से किसी ‘रजिस्टर’ में दर्ज़ कहीं बंद पड़े हैं। कभी मन उनको लिखते वक़्त जैसा होगा, तो लौट पड़ेंगे। पर अभी तो कोई उम्मीद नहीं दिखती। कोई चांस नहीं है। जैसे बरसाती हवाएँ पीछे खिसकती रही हैं, वैसे हम भी खिसकते रहेंगे। और अभी जैसे हालात हैं, उनमें हमारा चुप रहना ही ठीक हैं। पर पता है, एक दिन चुप्पी टूटेगी ज़रूर। चुप रहना, छिपे रहना मेरे बस की बात नहीं। कभी तो कुछ कहूँगा।

आवाज़ें..

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