अगस्त 24, 2014

'रानी' की कहानी 'क्वीन' बनकर

कई दिनों से फ़िल्मों पर लिखना टाल रहा था। बस करता क्या था? ‘टॉरेन्ट’ पर लगाकर भूल जाओ। देखता कौन है? किसके पास इतना वक़्त है? पर मन नहीं मानता। चुपके से किसी दोपहरी छत वाले इस कमरे में हैडफ़ोन लगाकर बैठ जाता। एक किश्त में एक। ‘क्वीन’ और ‘हाइवे’ आगे पीछे देखीं। दोनों को ‘स्त्री दृष्टिकोण’ से देखने के आग्रह बार-बार दिमाग में घूम रहे थे। पता नहीं कितनी बातें लगातार सुन रहा था। पर कहीं किसी ‘वैबसाइट’ पर जाकर कोई ‘रिव्यू’ नहीं पढ़ता। किसी साथी ने भी ठीक से कोई टिप्पणी नहीं की, इसलिए एकबारगी देखना ज़रूरी था। यही सोच बैठ गया। जब दोनों फ़िल्म देखे महिना भर हो रहा है, तब आज इतवार सब ब्लॉगों की तलाशी ले रहा था। आलोक ने ‘हाइवे’ पर लिखा है, पर इतने महीन होकर नहीं। उसने अपने संदर्भों में देखा है। रघुवेन्‍द्र सिंह के ब्‍लॉग ‘अक्स’ पर विकास बहल के बारे में पढ़ा, पर फ़िल्म के बारे में वहाँ भी नहीं है।

इस पूर्वपक्ष के बाद, अब सीधे आते हैं, दोनों फ़िल्मों पर। कोई क्रम नहीं है, दोनों आपस में आवाजाही भी कर सकती हैं। रात से दिमाग में तो कर भी रही हैं। अगल बगल नहीं ऊपर नीचे होकर। पर कह नहीं सकता कितना किसे साध पाऊँगा। आगे देखते हैं, क्या होता है..!!

कितने शानदार तरीके से ‘क्वीन’ शुरू होती है। ‘बिग फैट इंडियन वैडिंग’ है। तय्यारियाँ ज़ोरों पर हैं। उम्र से बेदख़ल बूढ़ी महिलाएं संगीत के लिए ‘कॉकटेल’ के गाने पर डान्स की प्रैक्टिस कर रही हैं। एक महिला कोरियोग्राफ़र इसी काम के लिए उनके साथ है। बाहर टेंट वाले लाइट की व्यवस्था देख रहे हैं। दिल की कटिंग वाले थर्माकोल पर दूल्हा-दुल्हन के नाम लिखे हैं। लड़की के हाथों में मेंहदी लग रही है। और जैसा की होता है, हम सबकी तरह वह लड़की भी, अपनी ज़िन्दगी के इतने बड़े अवसर पर, अपनी सारी यादों को तस्वीरों में तब्दील कर लेने के ख़यालों से अंदर तक भरी हुई है। उसे तस्वीरें ‘फ़ेसबुक’ पर अपलोड करनी हैं। पर उसका भाई कहीं गायब है। जैसे उसकी सहेली अभी तक नामुदार नहीं हुई है। उसकी शादी में वे सब सहेलियाँ घंटों तक नाचती-गाती रही थीं। वह कितनी परेशान है कि मम्मीजी ने कपड़े अभी तक नहीं बदले हैं। पापाजी ने मिठाई की दुकान दुल्हन की तरह सजाई है। यह सब बातें जो उसके मन के भीतर घटित हो रही हैं, हमें कँगना की आवाज़ (वॉइसओवर) बताती चलती है। उसमें जानबूझकर कितना कच्चापन रख छोड़ा है। फॉर्मेट कितना रफ़ है। आवाज़ में कसक नहीं है, फ़िर भी पहली रात को लेकर घबराहट होंठों से लेकर चेहरे पर दिख जाती है। वह ख़ुद भी इस सब के भीतर उतरकर सबके साथ नाचने लगती है। ख़ूब नाचती है। वह झिझकती नहीं है।

इन दृश्यों को देखने से तुरंत पता लग जाता है, यह पारंपरिक उत्तर भारतीय शादी है। जिसमें इत्तेफाक से लड़का-लड़की उनके परिवारों की तरह एक-दूसरे को पहले से जानते भी है। और अगला सीन इसी लड़के के हिस्से का है। वह कहीं दिल्ली के किसी कोने में बड़ी सी दुकान में बैठा कॉफ़ी पीते हुए लड़की का इंतज़ार कर रहा है। उसके मन में भी कई सारी बातें चल रही होंगी, जिसे वह मोबाइल पर क्यों नहीं कह सका यही सोच सोच लड़की परेशान है। अपने भाई के साथ आई है। भाई बाहर ही रुक गया है। लड़का शादी को सिरे से मना कर देता है। भाई छोटा है पर शीशे में उस लड़के को मुक्का दिखाता है। दर्शक के रूप में हम स्तब्ध हैं और पृष्ठभूमि में गाना बज रहा है। हम सोच रहे हैं के आगे के हिस्से में कौन सी कहानी है? जबकि यहाँ शादी की सारी तय्यारियाँ अपने अंतिम दौर में चल रही हों, तब हम, इस ‘पोस्टमॉडर्न ट्विस्ट’ के साथ क्या करें? विकास बहल अब क्या कहेंगे? लड़की क्या करेगी? उसके परिवार वालों का क्या ‘रिएक्शन’ होने वाला है? जैसा कि लड़की को डर था, पापजी इस बात को सुनते ही ‘हार्टअटैक’ से मर जाएँगे, वह गलत साबित होती है। सारा परिवार लड़की के साथ है। इधर लड़की ने ख़ुद को, अपने मोबाइल फ़ोन के साथ, अंदर से कुंडी लगाकर, कमरे में बंद कर लिया है। उसे उम्मीद है कि वह विजय, जो वहाँ, मेज़ पर गिर गयी सूखी मेंहदी को निर्ममता के साथ नीचे फेंक रहा था, फ़ोन ज़रूर करेगा। ख़ुद भी फ़ोन ट्राय करती है पर मोबाइल स्विच ऑफ़ है। पर फ़ोन आएगा नहीं।

मेरे लिए फ़िल्म यहीं ख़त्म हो जाती है। या इसके थोड़ी देर बाद। जब लड़की अकेले ही अपने ‘हनीमून’ पर जाने का निर्णय करती है। उसका जहाज हिंदुस्तान से उड़ा और मन में ‘दी एंड’। उसने अपने पैसों से टिकट बुक कारवाई थी। शादी के दूसरे दिन वे दोनों पैरिस जाने वाले थे। आगे की कहानी क्या है? रानी अंततः क्या निर्णय लेगी, इसका पूर्वानुमान लगभग सभी को है। पर ज़रूरी है, घंटे, डेढ़ घंटे बाद इस निर्णय पर पहुँचने की प्रक्रिया क्या होने वाली है? क्या इसे ही ‘स्त्री मुक्ति’ की कहानी कहते हैं? यह भारतीय ‘पितृसत्तात्मक समाज’ में उसके स्वतंत्र होने का घोषणापत्र है? यदि वह बंधनों से मुक्त होना चाहती है, तो क्या उसकी स्वतन्त्रता की परिभाषा पुरुषों द्वारा किए गए कृत्यों की पुनरावृति ही होगी? सरल शब्दों में क्या इन बंधनों को तोड़ने के लिए उसे पुरुष हो जाना पड़ेगा? क्या उसके पास कोई और नक्शा नहीं है? यदि नहीं है, तो यह उन ‘सिद्धांतकारों’ की विफलता है, जो ‘स्त्री विमर्श’ के ठीहे सजाकर बैठे हैं। जो भारतीय संदर्भों, इसकी विविधताओं को न देखते हुए कहीं और मुखापेक्षी हैं। उनके आदर्श कहीं, किन्ही और समाजों में निर्मित हुए हैं। या फ़िर हम अपनी ज़िन्दगी किसी किताब को पढ़कर नहीं जीते, बस जी लेते हैं?

कितनी बार अनुराग कश्यप की यह बात मानकर बैठ जाया करें कि ‘यह कई सारी कहानियों में से एक कहानी है’। रानी वापस लौटकर विजय से शादी करने से इंकार कर देती है। क्या इस अंत की तरफ़ पहुँचने के लिए ज़रूरी था, हम विदेश प्रवास को ढाल बनाएँ? उसमें ऐसे कौन से गुणात्मक परिवर्तन होते हैं, जिससे उसके व्यक्तित्व में आत्मविश्वास का संचार होता है? हम एक समाज के भीतर उत्पन्न प्रश्नों के संभावित उत्तरों के लिए, उसी समाज की पैमाइश करने से डरते क्यों हैं? कभी हमने अपने अंदर यह कोशिश की हो, नज़र नहीं आता। क्योंकि हमारे सामाजिक-सांस्कृतिक ‘विमर्शों’ में स्वतन्त्रता के मानक आयातित हैं, इसलिए इसके जवाब भी हम वहीं से लेते आएंगे। दिक्कत यह नहीं है कि लड़कियों का शराब पीना बुरी बात माना जाता है। लड़की अगर शराब पीकर ही स्वतन्त्रता महसूस करती है, तब हमारे यहाँ हर छोटी-बड़ी सड़क के किनारे, सरकारी ठेके क्या कम उग आए हैं? वह यहाँ के पुरुषों के साथ उस भीड़ का हिस्सा क्यों नहीं हो सकती, जो कल ‘ड्राइ डे’ होने की वजह से वहीं झगड़ रहे हैं? शायद निर्माता-निर्देशक वह हिम्मत नहीं दिखा पाते। या वे अपनी कहानी को ‘वास्तविकता’(?) के निकट ले जाने के लिए यहाँ से चले गये हैं? अगर वह ऐसे किसी तनाव से बचना चाहता है, तब भी हम अपने इसी देश में, नवउदारवाद के बाद ऐसे विदेशी ‘पबों’ की नक़लों को अपने यहाँ के बड़े-बड़े होटलों में बड़ी सहजता से देख सकते हैं। लेकिन यह बाद की कहानी भारत में क्यों ‘स्थित’(‘सिचुएट’) नहीं है? यह गंभीरता से पूछे जाने लायक सवाल है। क्या इन परिस्थितियों में कहानी का अंत यह नहीं हो सकता था? 

आप पैरिस से कुछ दूर किसी गाँव में पड़ने वाले ‘रेड लाइट एरिया’ को बड़े ‘ग्लैमरस’ तरीके से महँगे-महँगे कैमरों में उतार सकते हैं। अब तो आपके पास फ्रेंक हूजर की किताब ‘सोहो’ का संदर्भ भी है। वहाँ भारतीय समाज अनुपस्थित है। कोई रोड़ा नहीं है। वरना क्या यहाँ दिल्ली में ‘जीबी रोड़’ नहीं है? बंबई का ‘कमाठीपुरा’ क्या कम पड़ गया था? ‘सोनागाछी’ जादा दूर है, तो मेरठ के ‘कबाड़ी बाज़ार’ तक ही चले जाते। पर शायद यहाँ के चेहरों से लेकर लटकते स्तनों में हमारे अवचेतन में निर्मित, पाश्चात्य देह का जादू नहीं दिखाई देता। पहाड़गंज, शीला सिनेमा की तरफ़ से रेलवे पुल से नीचे उतरने वाला सीन इतना ‘फ़ोटोजेनिक’ नहीं बन पाता। यह पुरुषवादी ‘देव डी’ की कहानी नहीं है। फ़िर इसमें दिक़्क़तें भी कई होती। वहाँ स्त्रियाँ देह व्यापार को स्वेच्छा से अपनाती हैं या नहीं यह शोध का विषय हो सकता है, पर यहाँ, इनकी आँखों का नमक कुछ और ही कहानी कहता। उन्हे छिपाने लायक तर्क गढ़ने पड़ते। फ़िर इन देशज शहरों में सार्वजनिक रूप से ‘सेक्स टॉयस्’ की दुकाने नहीं हैं, जहाँ जाकर हम उन खिलौनों को खरीद सकें। कहीं किराये पर ऐसी सराय भी नहीं हैं, जिसमें लड़के-लड़कियाँ एक साथ, एक छत के नीचे, सरलता से कई-कई दिन रह सकें। सिर्फ़ अँग्रेजी से उठाए गए हिन्दी शब्दों ‘कौमार्य’ और ‘यौन सम्बन्धों’ को अँग्रेजी पारिभाषिक शब्दावलियों में ‘वर्जिनिटी’, ‘प्री-मैरिटियल सेक्स’ कह देने भर से या किसी अपरिचित विदेशी को चूम लेने मात्र से आप ख़ुद को ‘अपनी परिधियों’ में ‘स्वतंत्र’ महसूस कर रहे हैं, तब आपने ‘चोर दरवाज़े’ ढूँढ़े हैं। यह मात्र भ्रम है। यदि किसी अन्य परिवेश, समाज और संस्कृति की जीवनशैली की नकल ही आधुनिक अर्थों में ‘मुक्ति’ है, तब यह आपकी और मेरी समझ का मूलभूत अंतर है। इसे किसी भी अर्थ में स्वीकार नहीं किया जा सकता। शायद तभी नायिका का नाम ‘रानी’ होने के बावजूद, फिल्म का नाम ‘क्वीन’ है।

{पोस्ट जादा बड़ी भी हो गयी और ‘गझिन’ भी, फ़िर अचानक आकर ख़त्म भी हो जाती है, पर कुछ सीमाएँ मेरी भी हैं। वैसे समझ में कहीं कुछ मतभेद हो, तो उसका स्वागत है। और वो जो ‘हाइवे’ पर अपनी बात कहनी है, उसपर इधर जल्द ही लौटूँगा..}

अगस्त 22, 2014

पीछे छूट गए दिनों की कुछ बातें..

अगस्त बाईस तारीख। दिल्ली में बारिश, बारिश कहने लायक भी नहीं हुई है। उमस कम है पर आसमान से बूँदें भी नहीं गिर रहीं। सब इंतज़ार में हैं। पेड़, बिरवे, मोर, चिरिया, पंछी, मिट्टी, घास, भूत परेत सब। महिना ख़त्म होने को है और करने के लिए कुछ नहीं है। ऐसा मन सोचता है, पर कई सारे काम बोझ की तरह वहीं लदे-फंदे हैं। सुबह जल्दी नहा लिया हूँ। और आकर यहाँ बैठ गया हूँ। नई सड़क से जो दो ‘फाउंटेन पैन’ लाकर फूलकर बड़ा कुप्पा हुआ जा रहा था, अब लिखने बैठता हूँ, तब पता चलता है कि स्याही जादा निकलने लगती है। कागज़ पर बूँदें छपने लगती हैं। सोख्ता अगली बार के लिए बचा रह गया है। तबीयत तेरह-चौदह अगस्त से ही नासाज़ मालुम पड़ रही थी, पर खींचे जा रहा था। नाक तो दिन भी पूरा नहीं हुआ, बहने लगी। एक शाम मंडी हाउस मेट्रो स्टेशन हो आया, पर सरवन भवन का डोसा अभी भी बचा रह गया है। दिमाग एकसाथ कई-कई सारी चीज़ें करने को हो रहा है। पर हाथ सही ‘सेलेबल’ नहीं चुन पा रहे। दिमाग ‘दिमान’ हो गया था, लगती ‘लगटी’ बन रहा था। ऐसे ही न जाने क्या-क्या? सब एक दूसरे में हैं। और कहीं नहीं हैं। फ़िर भी बहुत कुछ यहीं हैं। यहीं आस-पास।

यह इसबार नई सड़क जाने से पहले की बात है। तब अकेले नहीं, अजय के साथ गया था। खड़ी दोपहर तबभी थी। जिसे कहते हैं, ‘बदरिया घाम’। सीधे खोपड़ी से अंदर। मारवाड़ी कटरे से आगे ‘मालीवाड़ा’ है। वहीं उसी गली में आगे ख़ूब अंदर जाकर कचौड़ी-ब्रैडपकौड़े की दुकान बायीं हाथ पर पड़ती हैं। और इसी के सामने जो गली दक्खिन दिसा की तरफ़ जाती दिखती, हम उसी में दाख़िल हो जाते। दस कदम भी नहीं चलते कि सीधे हाथ पर बिलकुल खड़े जीने के साथ जो सीढ़ियाँ दिखती, वही हमें ‘गंगा भोजनालय’ तक पहुँचा देतीं। पर इसबार वहाँ एक बोर्ड दिखा। गंगा भोजनालय आगे है। और तीर के निशान के पीछे-पीछे हम अब भी पहली मंजिल पर थे। जगह बहुत छोटी हो गयी है। खिड़की के ही बगल में कूलर लगा है। कमरा जितना बड़ा है, उसके आधे से भी जादा हिस्से को रसोई ने छिका लिया है। कुर्सी-मेज़ भी पिछली जगह से काफ़ी कम दिख रहे थे। उदासी इस तरह सबतरफ़ तारी थी। चेहरों से लेकर कमीज़ के बटनों तक में। चलने के ढ़ंग में भी किसी अपनी जगह के छूट जाने का दुख उतर आया था। सबसे जादा उदास तो वो व्यक्ति लग जो हमारा ‘ऑर्डर’ लेने आया था। उसका रोम-रोम अपनी ज़मीन से बिछुड़ जाने की कहानी कहता रहा। उसकी कमीज़ का रंग ऐसा पहले से ही था या रात रोने से ऐसा हुआ होगा? पता नहीं। उसने बताया नहीं। हम कभी सोच भी नहीं पाये थे कि वह जगह इन लोगों ने किराये पर ली होगी। और एक दिन उसका मालिक उसे ऊँची कीमत पर बेच भी सकता है।

मन ऐसे ही छलनी हो जाता होगा। दिमाग घूमने लगता है। कुछ जगहें दिल में जगह बना लेती हैं, पर उनको एक वक़्त के बाद उखड़ जाना होता है। हमारी यादें भी कुछ इसी तरह हैं। इस देश काल में यदि हम ‘अतीतजीवी’ हुए हैं तब इसकी गंभीर पड़ताल की ज़रूरत है। हमारा समय क्या इतना क्षणभंगुर है कि हम उन बीते दिनों में लौट जाना चाहते हैं? जहाँ हमारा वर्तमान बीत रहा है, क्या वह सारी ‘संरचनाएं’, ‘निर्मितियाँ’ लगातार अपनी ‘गतिकी’ में इतनी जल्दी परिवर्तित होती रही हैं के हमारे देखते ही देखते वह अपने रूप (‘फ़ॉर्म’) को बदल लेती हैं। लेकिन हम कहीं वहीं किसी डाल पर कुछ कतरन छोड़ आते हैं। हम बदलने से मना कर देते हैं। मना कर देते हैं आगे बढ़ने से। हम वहीं अरझे रहते हैं। उलझे रहते हैं। यह हमारा सामानांतर ‘प्रति-संसार’ हैं। इसे हम अपने अंदर ही बसा रहे हैं। इसमें जी रहे हैं। यह हमारा इस वर्तमान से प्रतिरोध है। पता नहीं दिमाग के अंदर यह सब क्या है? पर इस सवाल पर थोड़ी देर ठहरना चाहिए। हम सबको। हो सकता है हम सबके जवाब अलग-अलग हों। पर ज़रूरी है, इन जवाबों का होना।

कल रात फ़ोन पर बात हुई। दादी ‘ट्रॉमा सेंटर’, डॉलीगंज, लखनऊ में भर्ती हैं। इलाज चल रहा है। डॉक्टर दवाई दे रहे हैं। पूरा-पूरा दिन सोती रहती हैं। सब वहीं हैं। वह गाड़ी गोण्डा से भी लखनऊ नहीं जा पायी। उसे फैज़ाबाद से घूमकर जाना पड़ा। इतना घुमना के रास्ता ही दुगना पड़ गया। रास्ता काटे नहीं कट रहा होगा। सब इंतज़ार कर रहे होंगे। पर आखिरकार अब वह अस्पताल में हैं। बात लखनऊ नहीं, बहराइच हुई। बड़े जन फूफा के साथ कल ही वहाँ के लिए निकले हैं। उनका फ़ोन बंद आ रहा था। छोटे जन ने तफ़सील से सारी बातें बतायीं। पता नही, जब लखनऊ पहुँच गए, तो फ़ोन क्यों नहीं किया? हम यहाँ पता नहीं क्या-क्या सोचने लगते हैं। बेसिर पैर। फ़िजूल। बकवास। फ़ालतू। कल जब लिख रहा था, तब उसपर एक उदास-सी छाया है। उदासी का कोई नाम नहीं है, पर वह है। उदास। शान्त। वीभत्स होने से पहले रौद्र। बस वो ठीक हो जाएँ, बस। इससे जादा कुछ नहीं। यह बस छोटी-सी उम्मीद है।

और भी पता नहीं कौन-कौन सी बातें दिमाग में घूमती रही हैं। चेतन भगत का नया उपन्यास अक्टूबर में आ रहा है। ‘हाफ़ गर्लफ्रेंड’। 'यू-ट्यूब' पर इसके 'टीज़र ' की धूम मची है। माधव बिहार से है। अँग्रेजी कम जानता है। उसे यहाँ दिल्ली में किसी लड़की से प्यार हो जाता है। वह इस माधव की गर्लफ्रेंड बनने के बजाए, आधी गर्लफ्रेंड बनने को राजी हो जाती है। बस वहाँ इतना ही है। 'फ्लिपकार्ट' पर जा कर 'प्री-बुक' करवा आया हूँ। पता नहीं कैसा ट्रीटमेंट होगा। वहीं से आए, अनु सिंह चौधरी के कहानी संग्रह 'नीला स्कार्फ़' को भी पढ़ रहा हूँ। टीचर वाली कहानी में थोड़ा खो जाता हूँ। इस संग्रह में इसी नाम से जो कहानी है, उसी थीम परअजय नावरिया  की जबर्दस्त कहानी है, 'अनचाहा'। जिसके आगे कोई नहीं ठहरता। 'टर्म्स एंड कंडीशन अप्लाय' की भी पहली कहानी इसी के इर्दगिर्द है, पर कमज़ोर लगती है। इस इतवार दरियागंज से रविंदर सिंह की किताब, 'आइ टू हैड अ लव स्टोरी' उठा लाया। फ़िर लौटते ही हिन्दी अनुवाद वाले ऑर्डर को कैंसिल किया। चौबीस पन्ने पढ़ चुका हूँ। सोचा था अँग्रेजी में टेस्ट अलग होगा, पर मज़ा नहीं आ रहा। सब वैसा ही तो है, जैसा इस उम्र में आते-आते हम सोचने लगते हैं। 'खुशी' से फ़ोन पर बातचीत शुरू हो गयी है। और यह अपनी याददाश्त को कोस रहे हैं। रिशतेदारों के नाम भी याद नहीं हैं, इन्हे। उधर डॉ. तुलसीराम की 'मणिकर्णिका' अपनी पिछली किताब, 'मुर्दहिया ' के पेस की तरह नहीं है। जो उम्मीद लगाए हुए थे, उसमें शहर के इकहरे अनुभव कुछ और नहीं दे पाएंगे। फ़िर यह किताब उसके मुक़ाबले अधिक बौद्धिक भी है। दिमागी-वैचारिक अनुभवों से भरी। आख़िरी में प्रेम भी है, पर वह प्रेम की तरह नहीं है। 

और हाँ, 'वॉट्स एप' पर वापस आ गया हूँ। कई दोस्त वहाँ इंतज़ार करते-करते थक गए तो फ़ोन पर धमका कर वहाँ ले आए हैं। फ़ेसबुक की ऊब से बचने का चोर रास्ता। उससे कहीं जादा सरल-सहज लगता है। बस नंबर जोड़ते जाओ। लेकिन दोनों का मालिक एक ही है, मार्क ज़ुकरबर्ग। उसे कोई फ़र्क नहीं पड़ता। फ़िर अपना एक 'ई-मेल अकाउंट' बंद करना कैसा होता है, उस मानसिक पीड़ा से भी गुज़र रहा हूँ। मेरा पहले के दिनों का साथी। सात-आठ साल तो साथ रहा ही होगा। बस कभी-कभी वापस उन गलियों में घूम आता हूँ। देख आता हूँ, कोई इंतज़ार तो नहीं कर रहा। कई पुराने ज़रूरी मेलों को सहेज कर रख लूँगा। वहाँ की बसावट को धीरे-धीरे दूसरे ठीहे पर खींचे ले जाना है। पर धीरे-धीरे यह बंद हो जाएगा। किसी दुकान के शटर की तरह। कभी वापस न खुलने के लिए।

{आज सत्ताइस अक्टूबर, 2014, बड़े दिनों बाद, आज यह पोस्ट जनसत्ता में आई है। शायद अप्रैल के बाद से अब, आज। पता वही है, अपना समांतर। बस एक बात कहनी है, मौसम बदल गया है। तब दादी थींअब कहीं नहीं हैं। }

अगस्त 21, 2014

एक वो जो सड़क थी, एक वो जो पेड़ था

बाढ़ कैसी होती है? इसके रेणु के 'ऋणजल धनजल' जैसे कई जवाब हो सकते हैं। फ़िर इसके बाहर यह कैसी भी होती हो, पर गौरव सोलंकी के फ़ेसबुक कवर पर लगी तस्वीर और वहाँ लिखी कविता की तरह बिलकुल नहीं होती। तस्वीर धुंधली है, पर लड़की दिखाई दे रही है। बगल में झोला दबाये, एक हाथ से छाता थामें। दूर, इतनी दूर नहीं, वहीं एक लड़का उस तरफ़ ही ताक रहा है। और वह पंक्तियाँ हैं, 'वहाँ जो एक पेड़ था और वो जो सड़क थी, नदी हो जाना चाहती थी'। विनोद कुमार शुक्ल की कविता के जैसे। शायद कहीं कुछ हिस्से हों भी। पर जो बात परसो से अंदर-ही-अंदर उमड़-घुमड़ रही है, वह यह कि पाँच हज़ार में बुक करायी गाड़ी, गोण्डा घूमकर बहराइच से लखनऊ कब पहुँची होगी, पहुँच भी पायी है या बीच रास्ते में कहीं वापस मुड़ गयी? कोई खोज-ख़बर दिल्ली में हम तक नहीं है।

गाड़ी में दादी हैं। बीमार हैं। बहुत बीमार। पापा की सबसे छोटी काकी। पापा 'काकी' नहीं कहते, चाची कहते हैं। पर अपने चाचा को 'काका' कहते हैं। शायद यह 'अवधी' में आत्मीयता प्रकट करने का तरीका हो? पता नहीं। परसो सुबह से ही बुआ-फूफा सारी तय्यारियों में जुट गए होंगे। क्या ले चलें, किसकी ज़रूरत पड़ सकती है। किसे नहीं ले चलते हैं। किसे न ले जाने से काम चल जाएगा। किसे नहीं। सबसे बड़ी तय्यारी है पैसे की। पैसा न होने पर ज़िन्दगी, त्रासदी की जोंक बनकर पीठ पर चिपकी रहती है। यह हमारी ज़िन्दगी को चूसती है। धीरे-धीरे। आहिस्ते से। बिन बताए। कितने असहाय हो जाते हैं हम। कुछ भी नहीं कर पाते। कुछ भी नहीं सोच पाते। सारी सोच यहीं से शुरू, यहीं पर ख़त्म। रुपया यहीं ज़िन्दगी से बड़ा लगने लगता है। शायद इस दुनिया में होता भी है।

घरवाले दादी को बहराइच जिला अस्पताल नहीं ले गए, जहाँ इकौना के विधायक भगौती प्रसाद अपनी अंतिम साँसों तक ठीक होने के लिए जूझते रहे। वहीं के किसी प्राइवेट अस्पताल में हफ़्ताभर चुपचाप पड़ी रहीं। अपने चेहरे पर चारों तरफ़ से गढ़ी आँखें देख रही हैं, पर कुछ भी याद नहीं। पीछे कुछ नाम लेती रहती थीं पर अब बड़बड़ाना बंद है। यह यादों के साँसों में घुल जाने जैसा है। उनके गुम हो जाने की तरह। यहाँ फ़ायदा न होते देख दूसरे में गए और वहाँ डॉक्टर ने लखनऊ ले जाने को कह दिया। तीस-चालीस हज़ार रुपयों का हासिल लखनऊ का अस्पताल। इतना पैसा कहाँ से जुटाया होगा? किन-किन से ठीक हो जाने पर उतार देने की मेहरबानियों से ख़ुद को समेट लिया होगा। पता नहीं। पता नहीं जिन-जिन से पैसा लिया होगा, उन्होने क्या-क्या कहकर पैसा दिया होगा।

ख़बरें लगातार आ रही हैं, उत्तर प्रदेश में बहराइच सर्वाधिक बाढ़ प्रभावित जिला है। श्रावस्ती, गोण्डा, बलरामपुर कितनी बार इन जगहों को टीवी पर इस तरह देखते रहें। जनजीवन अस्त-व्यस्त है। नहरों के किनारे वाले गाँव रतजगे कर रहे हैं। फ़सलें चौपट हो गयी हैं। कुछ भी करीने से नहीं है। कोई कुछ नहीं कर पा रहा। एनडीटीवी पर आज सुबहकमाल ख़ान की रिपोर्ट देख रहा था। कहीं बहराइच-बाराबंकी की सीमा पर बने सरकारी स्कूल से बोल रहे थे। वह भी घाघरा नदी पार नहीं कर पाये। चार दिन से वह महिला अपने परिवार के साथ यहाँ आई है। किसी ने सब्जी भिजवाई है वही कढ़ाई पर पका रही है। कल जनसत्ता में था भी। कि लखनऊ से बहराइच को जाने वाली बसें नहीं चल रही हैं। परिवहन सेवाएँ स्थगित हैं। कई जगह सड़कों और नदी में फ़रक ही नहीं रह गया। कोई कहीं न आ सकता है, न जा सकता है। बस ऐसा करने की सोच सकता है। इसबार बरसात इतनी नहीं हुई, जितना नेपाल से छोड़े गए पानी ने तबाही मचाई है। महसी से लेकर शारदा नदी के पाट सब जगह एक ही सूरत। हर तरफ़ पानी पानी। और कुछ नहीं।

पता नहीं बाढ़ के पानी से तरबतर सड़क पर दौड़ती गाड़ी दूर से कैसी लग रही होगी। उन भीगे पेड़ों की छाया में भागती। उसे कहीं रुकना नहीं है। कहीं किसी ढाबे पर भी नहीं। बस वे बच जाएँ। हमारी तरफ़ 'लखनऊ' ले जाने का मतलब है, आख़िरी उम्मीद। जो शायद इसबार थोड़ी कमज़ोर है। कमज़ोर हैं उनकी साँसों की डोर। सब फ़ोन पर बारबार यही कहते रहे हैं। बस अपने मन को, दिल को दिलासा देने के लिए वहाँ ले जा रहे हैं। दादी धीरे-धीरे हमसे दूर जा रही हैं, हम कुछ भी नहीं कर पा रहे। फूफा बोलते हैं दिमाग का एक्स-रे करवाया, तब डॉक्टरों ने हाथ खड़े कर दिये। अब ले जाना पड़ेगा बड़े शहर। अगर ले जाना चाहते हों, तब। वैसे लखनऊ से शायद ही कोई ठीक होकर वापस आया हो। चीज़ें पहले ही इतनी बिगड़ जाती हैं कि उन्हे संभालना मुश्किल होता है।

इसबार साध्वी सावित्रीबाई फुले वहाँ से भाजपा सांसद हैं। पता नहीं 'सांसद निधि' अब बढ़कर कितनी हो गयी है। कुछ जादा नहीं, पर हम क्या यह उम्मीद नहीं कर सकते कि उस जिला अस्पताल में भी कुछ जीवन रक्षक प्रणालियाँ स्थापित हो सकती हैं? इन सरकारी अस्पतालों की विश्वनीयता को फ़िर से विश्वसनीय बनाने का प्रयास किया जाये, ताकि उन निजी अस्पतालों के चंगुल से लोग बच सकें। जहाँ जिन्दगी का मतलब पैसा है। फ़िर दिल्ली से सात सौ किलोमीटर दूर रह रहे उन लोगों को क्या कुछ कम जीने का अधिकार है? क्या वहाँ हमारी तरह इंसान नहीं रहते हैं? या उनकी ज़िंदगियों की कीमत कुछ कम है? पता नहीं, दादी की ख़बर कब लगती है। मोबाइल भी नहीं लग रहा। सब बंद। बस मेरे सपनों में सड़क, पेड़ और वो अदेखी गाड़ी सब दौड़ते नज़र आ रहे हैं। 

अगस्त 14, 2014

नाम की पहचान

उसने नहीं पूछा था तुमसे तुम्हारा नाम
तुमने ख़ुद ही बताया-
प्रतिमा गोखले !

फ़िर अपने से ही कहा
चित्तपावन ब्राह्मण,
महाराष्ट्रीयन,
हिन्दू,
भारतीय।

और यह भी कि इसमें छिपे हैं
इतिहास, भुगोल, समाज, भाषा, राष्ट्र

पता है तुम्हें, किससे बात कर रही थी?
एक राशन कार्ड की अर्ज़ी देने आए युवक से।
जिसका नाम सिर्फ़ नाम नहीं था,
बस उसमें से गायब थी ऊपर वाली सारी मदें।

आवाज़ें..

Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...