सितंबर 29, 2014

एक बनती हुई पोस्ट का बिखर जाना..

मुझे नहीं पता इन आगे लिखी जाने वाली पंक्तियों को किस तरह लिखा जाना चाहिए। बस दिमाग कुछ इस तरह चल रहा है, जहाँ यह समझना बड़ा मुश्किल है, क्या चल रहा है? दो साल पहले की कोई बात है, जिसके आसपास यह सब घटित हो रहा है। यह ख़ुद को दोहराने जैसा है। किसी तरह अपने अतीत को फ़िर से सामने देखने की तरह। पर सच इतना होते हुए भी वह मेरी तरह बिलकुल नहीं है। कुछ-कुछ समानतायें सतही तौर पर हो सकती है, पर उसे देखकर लगता है, इस ‘पैटर्न’ को ट्रेस किया जा सकता है। जहाँ कुछ-कुछ बातें हम सबमें समान होती ही होंगी। ‘वॉट्स एप’ से उसके बचपन की तस्वीर को यहाँ इस पोस्ट के साथ इस्तेमाल करने की बात करते हुए कहा था, कुछ लिखुंगा तब उसके साथ लगा लूँगा। पर ऐसा सच में नहीं करने वाला।

इसे किसी दोस्त के साथ हुई पहली मुलाक़ात की तरह याद नहीं कहा जा सकता। ‘अध्यापक’ और ‘विद्यार्थी’ कभी मिलते नहीं हैं। वह अपनी भूमिकाओं में कभी दोस्त नहीं हो सकते। इस अर्थ में वह कक्षा में एक-दूसरे के विपरीत होते हैं। इसे विलोम अवस्था भी कहा जा सकता है, जिनकी शास्त्रीय व्याख्याएँ बहुत पीछे तक जाती हैं। मैं आज तक नहीं समझ पाया कि हमलोग उस सरकारी स्कूल में दो साल पहले क्या कर रहे थे? यह मात्र संयोग ही था कि उस वक़्त, रोज़, बारहवीं कक्षा की हिन्दी की घंटी में जाता रहा। मनोज खन्ना तब वहाँ नहीं थे। जब तक वे वापस आते, तब तक कक्षा के विद्यार्थी मुझमें उनकी छवि ढूंढ़ने में व्यस्त रहे। यह मेरे लिए त्रासद स्थिति थी कि मैं खन्ना जी की तरह पढ़ाने में बिलकुल असमर्थ था। उनके पास तुलना के लिए एक मास्टर थे, जिनको पढ़ाते वक़्त मैंने कभी नहीं देखा था। वह ‘मिथक’ की तरह मेरे व्यक्तित्व के इर्दगिर्द उपस्थित रहने लगे। उनकी सबकी इस अपेक्षाओं के बीच मेरा कक्षा में टिके रहना, बीती रात देखे बुरे सपने में तब्दील होता गया। और इस तरह हम उन दीवारों के भीतर किसी भी तरह ‘शैक्षिक’ कहे जाने लायक ‘अनुभवों’ से हम गुज़रने में असमर्थ थे।

वह विरोधाभासों से भरे दिन थे। बिलकुल आज की तरह। कहीं से भी कोई संगति नहीं बैठती दिख रही थी। इन सबके बीच वहाँ एक लड़का था, जो अपनी कवितायें मुझे दिखाता। इसे संवाद की पहली कोशिश भी कह सकते हैं। हम वहाँ कक्षा के भीतर किन रूपों में अपनी छवि छोड़ रहे हैं, पता लगना बहुत ही मुश्किल है। पर कोशिश रहती थी कि कुछ संभावनाओं को हमेशा अपने पास, अपने अंदर बचाए रखें। वह ऐसी ही एक संभावना था, जो अवसर मिलने पर आगे बढ़ सकता था। बस, हम यहीं तक सोचकर बैठ जाते। आगे कुछ भी करने में असमर्थ। निरीह। असहाय। आज वह दिल्ली विश्वविद्यालय के एक प्रतिष्ठित कॉलेज में ‘हिन्दी ऑनर्स’ द्वितीय वर्ष का छात्र है। यहाँ उन पीछे रह गयी किसी याद में ऐसा कुछ नहीं दिखता, जिसमें उसके इस दाख़िले में इस विद्यालय की किसी भी तरह की रचनात्मक भूमिका को रेखांकित किया जा सके। हम ‘अध्यापक’ भी कहीं नज़र नहीं आते। आज दो साल बाद, इन सारी बातों को याद करने का कोई मतलब रह गया है? शायद यादें ऐसे ही पीछे ले जाकर उनके नए अर्थों से हमें भर देती होंगी। इन्ही यादों के किसी छूट गए पन्ने पर देख रहा हूँ, तो समझ नहीं पाता उसने हिन्दी जैसे कोर्स में दाख़िला लेकर गलती कर दी।

इसमें ऐसा कुछ भी नहीं है, जिसे कहने लायक माना जा सकता हो। फ़िर भी कह दूँ कि हिन्दी इन बनते दिमागों के लिए नहीं है। कम-से-कम इसके ‘साहित्य’ के लिए तो कही सकता हूँ। यह दिमाग को किसी भी तरह से खोलता नहीं, एक बंद गली की तरफ़ लाकर पटक देता है। यह ‘विषय’ के रूप में ‘विचारधारात्मक’ रूप ले चुका है, जो अपने पाठक के रूप में, किसी भी तरह से संस्कारित करते हुए, एक ठीक-ठाक व्यक्ति बना लेने की काबिलियत से भी चुकता रहा है। इसपर सिलसिलेवार तरीके से सोचने की ज़रूरत है। हिन्दी वंचितों की भाषा है। इस पिछली पंक्ति को फटे जूते की तरह कितनी बार घिस चुका हूँ, याद नहीं आता। सच, जब उसने मुझे यह बात बताने लायक समझी कि वह हिन्दी पढ़ रहा है, तो किसी भी तरह से दिल बाग बाग नहीं हुआ था। वह एकदम सूखकर काँटा हो गया। एक सरकारी स्कूल से पढ़ा हुआ लड़का इस जैसी मारी हुई भाषा में कहाँ तक बढ़ सकता है, कोई नहीं बता सकता। अर्थशास्त्रीय दृष्टि से इसकी उत्पादकता शून्य पर जा पहुँची है। अनुवादक भी वही बन सकता है, जो दूसरी औपनिवेशिक भाषा पर कुछ अधिकार रखता हो। फ़िर स्क्रिप्ट लिखने का शास्त्र भी अंगरेजी में स्थित है। विज्ञापन को तो जाने ही दो।

मैं इसे इस तरह लाकर ख़त्म नहीं करना चाहता था। किस तरह से अंदर-ही-अंदर यह लगातार चलती रही है। इसमें वह लड़का तो कहीं नज़र ही नहीं आया। लगता है, मेरे दिमाग पर अभी भी, भाषा के इस रूप को लेकर बहुत से संदेह बने हुए हैं, जो लगातार इसी तरफ़ ढकेल देते हैं। वह मन को किसी भी तरह से मना नहीं पाती। उसकी सारी प्रत्याशाओं में कहीं व्यक्तित्व का विभाजन, लगातार इतना गहरा होता जाएगा कि कुछ समझ नहीं आएगा। इस पोस्ट को एक दिन फ़िर दोबारा से लिखुंगा। और तब कोशिश करूँगा कि इस छाया से बाहर निकल, उसके इन दिनों को कह पाऊँ। यह द्वेष कुछ कम हो जाये। अभी नहीं कह पाया, एक बार फ़िर मन वहीं घिर गया। काश ऐसा न होता। इसे पढ़ने के बाद लगता है, यह शुरू से ही बिखर कर टूट गयी थी, इसे संभाल नहीं पाया.. ख़ुद को इसके एक ‘टेक्स्ट’ के रूप में पढ़ने की ज़िद इसी तरह खुदबुदाती रहती है। शायद यह एक स्थायी ग्रंथि का आकार लेती जा रही है। इससे बचने की कोशिश भी नहीं दिखती। पता नहीं लगता है यह कितनी ख़तरनाक है। आगे कभी देखते हैं। क्या होता है।

सितंबर 25, 2014

मोबाइल सेवा विज्ञापनों की एक व्याख्या

विज्ञापन मूलतः एक विचार है, जिसे कंपनी अपनी ‘ऍड एजेंसी’ द्वारा हर संभावित उपभोक्ता की तरफ़ संप्रेषित करती है। ‘कर लो दुनिया मुट्ठी में’ कहने वाली मोबाइल कंपनी, कैसे इस विज्ञापन क्षितिज से गायब हो गयी, उसे जानना बहुत रोचक होगा। उनके पीछे हटने के कारण क्या हैं? क्या वह अब इस पूर्वधारणा से संचालित होती कि जो आज उनकी सेवाएँ नहीं ले रहे हैं, एक दिन उनके नेटवर्क से ज़रूर बात करेंगे? क्या उन्होने यह सोचना बिलकुल बंद कर दिया है कि इन विज्ञापनों से प्रभावित होकर मोबाइल प्रयोक्ता उनकी प्रतिस्पर्धी कंपनी को छोड़कर उनकी तरफ़ भी आकर्षित हो सकते हैं।

या यहाँ बात स्पेक्ट्रम की है? उन तरंगों की है, जिन्हे सुप्रीम कोर्ट ने इस देश के नागरिकों के लिए उतना ही महत्वपूर्ण अनिवार्य संसाधन बताया, जितना कि यहाँ की नदियों का पानी और इस देश की ज़मीन। फ़िलहाल, यह विमर्श, इस संसाधन के लिए उतना ही अमूर्त बना हुआ है, जितना अमूर्त वह अपनी व्याप्ति में स्वयं है। पर अभी बात ‘रिलाइन्स’ और इस ‘स्पेक्ट्रम’ की नहीं, उनकी जो अभी भी यहाँ धमक के साथ विज्ञापनों में अभी भी बने हुए हैं। अपनी उत्पादों के साथ यहाँ मौजूद हैं।

भारत में प्रसारित होते विज्ञापन, अपनी प्रतिस्पर्धी कंपनी को सीधे चुनौती देने से लगातार बचते रहते हैं। जबकि योरप, अमेरिका के साथ अन्य पश्चिमी देशों में यह टकराव प्रत्यक्ष होता है। यहाँ धीरे-धीरे कुछ बदलाव आ रहे हैं, पर उनकी गति अपेक्षाकृत धीमी है। ‘द हिन्दू’ और ‘टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ के बीच लगातार एक तनाव की स्थिति बनी रहती है, पर वह सबपर ज़ाहिर नहीं होती। ‘सर्फ़’ और ‘रिन’ साबुन इसे जादा दिन चला नहीं पाये। ‘बॉर्नवीटा’ और ‘हॉर्लिक्स’ भी एक विज्ञापन के बाद पीछे हट गए। यह अपने आप में शोध का विषय है कि भारतीय मानस किस तरह के विज्ञापनों को पसंद करता है और उसके पीछे कौन से कारण काम कर रहे होते हैं? क्या यह पसंद उन उत्पादों के लिए बाज़ार में माँग के रूप में सहायक योगदान कर पाती हैं या नहीं?

आज यह कितना आसान दिखता है कि अब हम ‘एयरटेल’ और ‘वोडाफोन’ के विज्ञापनों में निहित एकरूपता को बड़ी आसानी से पहचानने लगे हैं। विज्ञापन ख़त्म होते-होते हम उस कंपनी का नाम मन में दोहराने चुके होते हैं। दोनों कंपनियाँ बड़ी बारीकी से हमारे मनों के भीतर अपनी छवियों को लगातार भेजते हुए यह काम कर रही हैं। यह मात्र संयोग नहीं है कि अब इन मोबाइल कंपनियों के विज्ञापनों की प्रकृति निश्चित-सी होती गयी है। हर विज्ञापन अपने पिछले पूर्ववर्ती विज्ञापन की अगली कड़ी लगता है। वे उस लक्ष्य उपभोक्ता के अंदर उत्तरोत्तर अपने ‘नेटवर्क’ की ख़ास छवि को पोषित करते रहते हैं। वहाँ कुछ ख़ास बातें छोड़ देते हैं, जिसे पकड़ हम उनतक पहुँच जाएँ। यह उनके द्वारा प्रयोग किए गए ‘रंग’ हो सकते, कुछ ‘धुने’ हो सकती हैं। वहाँ दिखाये गए दृश्यों का ‘ट्रीटमेंट’ हो सकता है। वह अपनी सेवा को ‘भावुकता’ में तब्दील करने के लिए कुछ भी कर सकते हैं। 

इधर ‘आइडिया’ अपने विज्ञापन ‘टाटा टी’ की ऍड एजेंसी से न भी बनवा रहा हो, पर आइडिया, उपरोक्त दोनों मोबाइल सेवा प्रदाताओं के मुक़ाबले, बड़ी स्थूलता से, अपनी ‘टैग लाइन’-एन आइडिया कैन चेंज यॉर लाइफ के इर्दगिर्द सभी विज्ञापनों को गढ़ लिया है। यहाँ किसी भी तरह से रचनात्मक बिम्बों का प्रयोग करने की कोई कोशिश नहीं दिखती। इसने अपने उपभोक्ताओं को किन मनोभावों की तरफ़ धकेल दिया है, यह शोध का विषय न भी बन पाये, फ़िर भी हम यहाँ उनके द्वारा अपने विज्ञापनों में अपनी मोबाइल इंटरनेट सेवा द्वारा महिला सशक्तिकरण पर विहंगम दृष्टि तो डाल ही सकते हैं। कैसे उनके यहाँ स्त्री की छवियों को निर्मित किया जा रहा है? वे वहाँ किन भूमिकाओं में नज़र आती हैं? आइडिया अपने द्वारा दी जा रही इंटरनेट सेवा को इनसे जोड़कर किन तरहों से सामाजिक परिवर्तन की कल्पना या भविष्य स्वप्न की रूपरेखा प्रस्तुत कर रहा है?

इन सारे सवालों के पहले हम देखें कि वहाँ दो तरह की लड़कियाँ हैं। पहले शहर की आत्मचेतस स्वतन्त्रता-कामी लड़की। वह एक रेस्तेरा में अपने पुरुष मित्र के साथ बैठी, अपने उस दोस्त से उसी क्षण, ‘फ़ेसबुक रिलेशनशिप स्टेटस’ को बदलने के लिए कहती है। यह उसका दबाव भी है। वह चाहती है कि इसके साथ ही वहाँ माजूद सभी मित्रों, दोस्तों, साथियों को एक बार में ही पता चल जाये कि वह उस लड़के की ‘गर्लफ्रेंड’ है। वह लड़की इस रूप में सतर्क दिखाई जा रही है कि उसने उस लड़के की चिकनी-चुपड़ी पुरुषोचित बातों में न फँसने की ठान ली है। वह अपने इस संबंध को किसी भी तरह से निजी परिधियों में बाँध कर भी नहीं रखना चाहती। उसकी इस इच्छा को बल मिलता है, एक सोशल नेटवर्किंग साइट से, जिसे उस जगह चलाने के लिए लड़की के मोबाइल में इंटरनेट सेवा पहले से मौजूद है। इस तरह लड़का उसे उल्लू नहीं बना सकता। लेकिन इस स्थिति के लिए लड़का तय्यार होकर नहीं आया है। ना-नुकुर करने पर लड़की, उसकी बात बिन सुने, उसे वहीं कुर्सी मेज़ के बीच छोड़कर चली आती है।

यह विज्ञापन में लड़की की स्वतन्त्रता की नागर व्याख्या है। यहाँ बदलने लायक इच्छित वस्तु यह संबंध हैं। शायद यह पहली बार है कि लड़की किसी लड़के को ऐसे छोड़कर लौट आती है। यहाँ कभी यह सवाल ही नहीं बन पाएगा कि अगर यह सेवा नहीं होती तब लड़का-लड़की के संबंध किस तरह आकार लेते? और यदि ऐसी साइट जहाँ दर्जनों फ़ेक प्रोफ़ाइल बना लेने की सरल सहज सुविधा उपलब्ध हो, वहाँ मात्र स्टेटस बदल लेने से इन सम्बन्धों में कौन-सा गुणात्मक परिवर्तन आने वाला है? क्या अभी भी वह इन सम्बन्धों की वैधता एक पुरुष से ही नहीं चाह रही है? निर्धारक के रूप में अभी भी उसकी अघोषित अपेक्षा वैसी ही बनी हुई है।

दूसरे विज्ञापन में एक जमीन है। उसे खरीदने-बेचने की बात चल रही है। उसके मालिक हरियाणवी बोलने वाले किसान लगते हैं। हो सकता है, वह एक और गुड़गाँव बनने की पठकथा दिखा रहे हों या जेपी एक्सप्रेस वे बनने से पहले की किसी कहानी का कोई टुकड़ा। मोल भाव के बीच में एक लड़की हाथ में मोबाइल लिए अपने बूढ़े से बाबा या ताऊ जी के साथ वहाँ चली आई है। वह सारी बात बड़े ध्यान से सुन रही है। कितनी क़ीमत दी जा रही है? कितने फ़ायदे गिनाए जा रहे हैं। कहीं कोई विचारधारात्मक आग्रह किसानों के खेती से पीछे हटने और अपनी भूमि को बेचने के पीछे वाले सवालों पर न पहुँच जाएँ, इसलिए बाद के दिनों में प्रसारित होते विज्ञापन में इस ज़मीन को ‘बंजर’ बोला जाने लगा। शायद भूमि अधिग्रहण को जादा हिंसक दिखाने से बचने का कोई पूँजीवादी अजेंडा काम कर रहा होगा। सवाल यह भी हो सकता है कि नक्सल प्रभावित हिस्सों में यह भूमि किस रूप व भूमिका में है? संसाधनों की लूट वहाँ कैसी है? फ़िर इसमें बघेली या बुंदेलखंडी क्यों नहीं बोली जा रही या विदर्भ या कोंकण का कोई किसान क्यों नहीं दिखता?

देश के किन खास हिस्सों में यह ज़मीन इतने अहिंसक तरीकों से अधिग्रहित हो रही है, अपने आप में दूसरे-तीसरे भारत की खोज का हिस्सा हो सकते हैं। ख़ैर, वह लड़की उसी मोबाइल पर इंटरनेट से यह पता लगा लेती है कि कुछ ही दिनों में यहाँ से कोई एक्सप्रेस वे गुजरने वाला है और बड़े-बड़े मॉल बनने वाले हैं। और उस लड़की को चुप कराता बिचौलिया लगभग चुप होकर यकायक फ़्रेम से गायब हो जाता है। सब इस टेक्नीसेवी लड़की के तारीफ़ों के पुल बाँधने लगते हैं। यह कुछ-कुछ बीबीपुर के कुंवारों की तरफ़ से हरियाणा सरकार द्वारा प्रायोजित विज्ञापन भी लगने लगता है, जहाँ लिंग अनुपात इतनी दयनीय स्थिति में है। काश इन्हे देख कन्या भ्रूण हत्या करने वाले उन प्रफुल्लित गद्गद होते बुज़ुर्गों की तरह सोचने लगते। पर यह भी पूछने लायक है कि यह टच स्क्रीन मोबाइल उन समाजों में किन-किन लड़कियों के हाथों में  इतनी सुलभता से उपलब्ध है। और सबसे ज़रूरी बात यह कि संयोग से यहाँ लड़की की जगह कोई लड़का यही सब बात कर रहा होता, तब परिदृश्य किस तरह से बदल जाता? या कुछ नहीं बदलता?

सितंबर 24, 2014

मन की बात..

अँधेरा जल्दी होने लगा है। ठंड इतनी नहीं है। धीरे-धीरे बहुत सी तरहों से सोचने लगा हूँ। कई बातें लगातार चलती रहती हैं। पीछे लगतार अपने लिखने पर सोचता रहा। एक बार, दो बार, तीन बार । पर कहीं भी पहुँच न सका। ख़ुद की बुनावट में कई चीज़ें इस तरह गुंफित हैं कि वह इतना आसान लगती भी नहीं है। ख़ुद को थोड़ी दूर से देखने की कोशिश में लगता है, अपने आप से ही पूर्वाग्रस्त होता गया हूँ। मेरी अपने बारे में ऐसी कितनी ही बातें हैं, जिनसे इंच भर भी पीछे नहीं हटता। वह जैसी दिमाग में बैठ गयी हैं, उनमें लगता भी नहीं है कभी कुछ नया जुड़ता होगा। यह ख़ुद को बंद कर लेने जैसा है। अपने लिए उन मौक़ों को ख़ुद ही किसी बंद गली में लाकर अधपकी मिट्टी की तरह पटक देना है।

शायद हम सबके साथ ऐसा ही होता होगा। हम ख़ुद को किसी ख़ास जगह से देखने के इतने आदि हो जाते हैं कि वह मन में बन रही छवि ही सब कुछ लगने लगती है। यह किसी भी तरह से ‘सामाजिक निर्मिति’ न होकर हमारे अपने मन के भीतर निर्मित होते गए ‘संप्रत्यय’ होते हैं। हम ख़ुद को गढ़ रहे होते हैं। हम मान रहे होते हैं कि हम हो न हो कुछ-कुछ इसी तरह के हैं। यह शीशे में अपनी परछाईं देखने से बिलकुल अगल प्रक्रिया है। वह भी हमारे मन में निर्मित होते भावों, विचारों, आग्रहों को हम पर लाद रहा होता है। हमें दूसरे कैसे देखना चाहते हैं से अधिक महत्वपूर्ण हमारी यही छवि होती है। जिसके भीतर हम बन बिगड़ रहे होते हैं।

तो, अब सवाल यह है कि मैं दूसरों को कैसा दिखना चाहता हूँ? या वे मुझे कैसा देखना चाहते हैं। मेरे पास इसका कोई एक जवाब नहीं है। न किसी के पास हो सकता है। हम अलग-अलग जगहों, व्यक्तियों, घटनाओं के लिए उतनी ही विविध तरहों से तय्यार होते हैं, जितनी विविधता उनमें स्वयं होती हैं। तब इस प्रश्न के संभावित उत्तरों में यह ‘लिखना’ भी आता है। जहाँ प्रत्यक्षतः मेरी छवि इन शब्दों के माध्यम से दूसरी तरफ़ बैठे मनों पर पड़ रही होती है। यह कितनी आरोपित है और कितनी वास्तविक(?) के निकट इसके बीच बड़ी बारीक-सी रेखा है, जो सब कुछ कह देती है। या हो सकता है, ऐसा कोई विभाजन कहीं हो ही न। जैसा अंदर से महसूस करता हूँ, यहाँ उसे उसी रूप में कह जाता होऊँगा। या बड़ी चालाकी से ख़ुद को यहाँ ढक लेता हूँ।

हो सकता है और जिसकी पूरी-पूरी संभावना है कि इस सच और झूठ के बीच ही हम सब बन रहे होते हैं। अभी भी मैं कुछ भी सीधे तौर पर कहने से बच रहा हूँ। ऐसा क्यों हैं? कह नहीं सकता। यहाँ लिखने के लिए बैठने से पहले कुछ भी सोचा नहीं था। बस कमरे में बड़ी देर से लैपटॉप लेकर बैठा रहा कि कुछ लिखना है। हो सकता है, मन को खुलने में कुछ देर और लगे। पर तबतक इस तरह बैठे रहकर दीवार पर चिपकी छिपकली को बार-बार भागने का काम नहीं करते रहना चाहता। कुछ ऐसी बात हो, जिससे ख़ुद को समझ सकूँ। जैसा सोचता रहा हूँ, उससे कुछ अलग बात कहीं से टकरा जाये। पर अभी कहा न हम सब बहुत बंद दिमागों वाले हैं। इतनी आसानी से इसमें कुछ घुसता नहीं है। हो सकता है जिसे लिखने कि ज़िद में यहाँ बैठा हूँ, उस पर साल भर बाद कुछ-कुछ समझ बनती दिखे। सबकुछ दो मिनट में एक्ट टू ‘पॉपकॉर्न’ या मैगी बना लेने जितने ‘इंस्टेंट’ नहीं होते। देर लगती है। इंतज़ार करना पड़ता है। परतें इतनी गहराई तक घर कर जाती हैं कि उनकी तहों में पहुँचने में साल लग जाते हैं। 

इस लिखने के अंदर और बाहर जितना भी ख़ुद को समझा है, वह कुछ-कुछ यहाँ आता रहा है। जो नहीं है, वह मन के दिल के किसी हिस्से में छिपा रखे हैं। कभी उन्हे इकट्ठे पढ़ने की कोशिश नहीं कर पाया। पर, अब लगता है, इस तरह भी सोचने के मौके बनते रहने चाहिए। कुछ देर के लिए उन संरचनाओं की गतिकी को समझने की तय्यारी अब करनी चाहिए। इस लिखने ने मेरे सम्पूर्ण व्यक्तित्व को इस तरह ढक लिया है, जहाँ इसके बाहर कभी सोच नहीं पाता। मेरे यहाँ हर बात लिखने लायक है। भले वह कभी बोलकर कही न जाये, उसे लिखकर अपने पास रख लेता हूँ। उन्हे इस तरह कागज पर, मन में, दिल की धड़कनों में लिख लेना चाहिए। मेरे लिए यहाँ सबसे ज़रूरी सवाल, इसतरह ‘लिखना’ नहीं है। इससे आगे जाकर उनका ‘इसी तरह’ लिखा जाना है।

सितंबर 21, 2014

विश्व शांति दिवस पर 'अमेरिका' होने का अर्थ

हमारे एक अध्यापक हुए। असल में इसे इस तरह कहा जाना चाहिए कि हम उनके विद्यार्थी हुए। वे कहा करते हैं, जिस चीज़ का आभाव रहता है, उसे ही बार-बार याद करने की ज़रूरत पड़ती है। सब कह रहे हैं आज ‘अंतरराष्ट्रीय शांति दिवस ’ है। इन अर्थों में इसका मतलब यह हुआ कि शांति अभी भी इच्छित है, वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में अभी भी हमें इसे प्राप्त करना है। शांति का एक अर्थ शक्ति संतुलन की प्रक्रिया से गुज़र जाने के बाद ‘स्थितिप्रज्ञ’ की अवस्था को प्राप्त कर लेना भी है। यह वही समय है, जब हम अमेरिका जैसे राष्ट्र-राज्य के साथ अपने देश के सह-अस्तित्व को पारिभाषित किए बगैर नहीं रह सकते। कमोबेश जापान हिरोशिमा-नागासाकी पर परमाणु बम विस्फोट करने के बाद पूरी दुनिया में यही स्थिति बनी रही है। शीतयुद्ध के ऐतिहासिक संदर्भों में न भी लौटा जाये, तब भी हम आजतक पूरी दुनिया में एक ध्रुवीय सत्ता केंद्र के रुप में स्थापित होने की अमेरिकी आक्रामकता को पढ़ सकते हैं।

इस देश के राष्ट्रपति को कभी शांति का नोबल मिल सकता है, इस तथ्य की रौशनी में हमारा शांति विमर्श किस तरह आकार ले रहा है, हम समझ सकते हैं। हमारे पास शांति के प्रतीकों को गढ़ने का कौशल अभी भी कितनी अतार्किक अवस्था में हैं। यह एक ऐसे समय में जीना है, जहाँ शांति बंदूक की नली से ही निकलेगी, की स्वीकार्यता सत्य की तरह बढ़ती जा रही है। यह शांति को लेकर हमारे विपन्न विमर्श के खोखलेपन को ही प्रदर्शित करता है। यह बिलकुल वही स्थिति है, जहाँ हमारे देश के अति-राष्ट्रवादी अपने पड़ोसी देश के साथ एक भीषण युद्ध करने के पश्चात दीर्घकालिक शांतिमय युग का आविर्भाव देखते हैं। यहीं इसी बिन्दु पर हमारे उस्ताद कहते हैं कि जबतक हम यह नहीं मान लेते कि पाकिस्तान ने भी हिंदुस्तान की तरह आज़ादी की लड़ाई लड़ी थी, तब तक हम उसे एक देश की तरह अस्वीकार करते रहेंगे। और यह शांति संकट इसी तरह भारतीय उपमहाद्वीप छाया रहेगा।

इधर शांतिदूत बराक ओबामा इराक़ में नए उभरे इस्लामिक राज्य गठन की माँग करने वाले संगठन ‘आइसिस’ को चेतावनी तो दे दी पर इस्राइल-फिलिस्तीन संकट पर वह कुछ नहीं कहा। शायद उनका ध्यान परंपरा अनुशीलन पर अधिक होगा, इसका एक ही अर्थ है, शांति की उनकी परिभाषा उनके द्वारा निर्धारित होगी और वह इसी हिंसक तरीके से प्राप्त की जा सकती है। उनके पूर्ववर्तियों ने भी इसरूप में इराक़ को कभी नहीं सोचा होगा। यह उनके लोकतान्त्रिक राष्ट्र की स्थापना करने के स्वपन से कोसो दूर प्रतीत होता है। लेकिन हमें यह विचार करना होगा कि क्या यही ‘सभ्यताओं का संघर्ष’ है, जिसकी तरफ़ ‘सैमुअल हंटिंगटन ’ इशारा करते हैं? या इस सैद्धांतिकी के पीछे भी कुछ है? बारीकी से देखने पर यह इन बुद्धिजीवियों का युद्ध संबन्धित अर्थव्यवस्था के लिए ‘वैचारिकी निर्माण’ ही लगता है। वे सम्पूर्ण परिदृश्य को इस तरह व्याख्यायित करते हैं, जहाँ हम ‘सह-अस्तित्व के सिद्धान्त’ के बजाए संघर्ष को अवश्यंभावी परिणीती मान लेते हैं। उनका विमर्श छद्म युद्ध द्वारा ‘समरूपीकरण’ पर समाप्त होता है।

यह हज़ारों वर्षों में निर्मित हुई सामाजिक, सांस्कृतिक विविधताओं, संरचनाओं और संस्थाओं का अस्वीकार है। उन नृजातीय समूहों को सिरे से नकार देना है। हम अपनी तरह जीने के तरीक़े को ही श्रेष्ठ मानने लगते हैं, तब यह समस्या का रूप ले लेती हैं। तब हमारी जीवनशैली विचारधारा का रूप ले लेती है। इस तरह हम दूसरों पर अपने जीवनशैली ही नहीं इतिहास, विचार, संस्थाएं, भाषाएँ, स्मृतियाँ, भावुकता, हृदयहीनता, स्वाद, रूप, गंध, स्पर्श, दृश्य, सौंदर्य अपनी तरफ़ से दूसरी तरफ़ संप्रेषित करते हैं। क्योंकि हम उनकी ‘बुद्धि के व्यवस्थापक’ बन जाना चाहते हैं। उनके सोचने समझने की शक्ति पर अपना नियंत्रण चाहते हैं। उनमें एक विशिष्ट तरह के हीनता बोध को पोषित करना है। मार्टिन कॉरनॉय के शब्दों में यह काम ‘सांस्कृतिक औपनिवेश’ स्थापित करने जैसा है। ‘पूँजीवाद’ अपने आप में हिंसक उत्पादन प्रणाली है। युद्ध उसके स्वयंसिद्ध पोषक है। यह पूंजीवाद की इस सबसे चरम अवस्था से भी दो कदम आगे का पाठ है। यह हमें मानसिक रूप से गुलाम बनाने का छद्म युद्ध है। 

जिस तरह का वह देश है बिलकुल उसी तरह उसकी बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ हैं। एक राष्ट्र-राज्य के रूप में अमेरिका की यही व्याख्या है। वह धीरे-धीरे यह उन उत्तर-आधुनिक संरचनाओं की तरफ़ बढ़ता गया है, जहाँ यह निर्धारित करना बहुत मुश्किल हो जाता है कि सांस्कृतिक रुप से उनके ‘राष्ट्र’ की परिकल्पना में वह स्वयं क्या है? शांति के लिए किए गए युद्धों को इससे अलग भी देखा जा सकता है? दुर्भाग्य से अभी तक कहीं से भी इसका कोई और चश्मा उपलब्ध नहीं हो पाया है। इसलिए इसी से काम चलाना पड़ रहा है। यह मात्र संयोग नहीं है कि इस शांति दिवस से कुछ दिन पूर्व ही अपनी अमेरिका यात्रा से पहले भारतीय प्रधानमंत्री  मुसलमानों को लेकर इतने भावुक हुए जा रहे हैं। वह उस शक्तिशाली राष्ट्र से अपनी ‘वैधता’ प्राप्त करना चाहते हैं, जिसका इतिहास स्वयं में कितना हिंसक, अमानवीय, पाशविक रहा है। इस अर्थ में हम शांति के इस वैश्विक दूत की एक और भूमिका से परिचित होते हैं।

{यहाँ दो ज़रूरी बातें:
01. यह तस्वीर 2012 की है, इसके कैप्शन से सहमत नहीं हूँ, फ़िर भी लगा रहा हूँ।
02. हम दिल्ली विश्वविद्यालय के दिनों में प्रो. कृष्ण कुमार के छात्र थे। वे अपनी किताब ‘Prejudice and Pride’ में भारत और पाकिस्तान के स्कूलों में स्वाधीनता संघर्ष का इतिहास की पढ़ाई को देखकर कहते हैं कि इतिहास की किताबें दो परस्पर विरोधी राष्ट्रीय अस्मिताओं का निर्माण कर रही है। बाद में राजकमल प्रकाशन से यही किताब ‘मेरा देश तुम्हारा देश’ नाम से प्रकाशित हुई। }

सितंबर 20, 2014

क़बूलनामा: मृणाल मेरी प्रेमिका नहीं है

उस इमारत का रंग लाल है। अंग्रेजों के जमाने की। अभी भी है। ख़स्ताहाल नहीं हुई है। उसकी देखरेख करने वाले हैं। किसी लॉर्ड ने इसका शिलान्यास किया होगा। आज़ादी से पहले। कई बार उसे पत्थर को पढ़ा है, पर अभी याद नहीं है। यहाँ ख़ूब बड़े-बड़े कमरे हैं। जीने भी शानदार सीढ़ियों के साथ हैं। मुझे स्थापत्य कला का एक अक्षर भी नहीं पता, वरना इसपर बारीकी से ख़ूब लिखता। कविता भी करनी नहीं आती। वरना कितनी ही बार ‘आर्ट्स फ़ैकल्टी’ पर लयबद्ध पंक्तियाँ लिख चुका होता। इन बीते सात सालों में न जाने कितनी ही बार वह सपनों में आई होगी, पर कभी दिल में नहीं उतर सकी। कहीं रात को अचानक उठ जाने पर प्यास लगने की तरह।

इसकी पहली मंज़िल पर हिन्दी विभाग के दो कमरे थे। हम कमरा नंबर उनसठ में बैठा करते थे या अट्ठावन में? याद नहीं। रोज़ यह कमरा, नीचे लगे नोटिस बोर्ड की तरफ़ से सीढ़ियाँ चढ़ने पर दाएँ हाथ पर पड़ता। दिल बायें हाथ पर था। रोज़। इस तरह उस वक़्त हम दिल्ली विश्वविद्यालय, एमए हिन्दी के विद्यार्थी थे। ‘हंस’ का पहला अंक उसी जनवरी में ख़रीदा था। मीडिया विशेषांक था। ‘ज्ञानोदय’ ने शायद फरवरी-मार्च में उर्दू रचनाओं पर समग्र निकाला था। साहित्य में बड़े-बड़े नामों को सुनकर वहाँ आए थे। नौकरी का सवाल तब तक सतह पर नहीं था। कहीं नीचे दबा होगा। इस तरह दिखाई नहीं देता था। या हमें दिन वाली रतौंधी रही होगी।

विभाग ने इस यथा-स्थितिवादी हिन्दी भाषिक संरचना के भीतर परिवर्तन के लिए चुन-चुनकर ऐसी कृतियाँ पाठ्यक्रम में निर्धारित की थीं, जो इन सामाजिक-सांस्कृतिक मानकों पर प्रश्न-चिह्न लगाती थी। उनके बने बनाए ढाँचे हमारी आँखों के सामने भरभरा कर गिर जाते। अभी तक समझ नहीं पाया हूँ कि यह असल में अपनी वैधता को बनाए रखने की कोई युक्ति थी या कोई विरोधाभासी स्थिति। या शायद मेरा दृष्टिभ्रम? प्रेमचंद, भारतेन्दु, निराला, मुक्तिबोध के नामों से क्या होता है? यह बिलकुल ज़रूरी नहीं कि जिन विचारों, प्रति-विचारों, प्रतिबद्धताओं, भावों, बिंबों, प्रतीकों को हम वहाँ पढ़ रहे थे, वे उन कृतियों को पढ़ने में हमारी मदद करने वाले अध्यापकों के जीवन में भी परिलक्षित होते। पर इनसे, इन अध्यापकों से अपेक्षित अपेक्षाओं की बात करने तो आया नहीं हूँ। मुझे कहनी है, अपनी बात। जो बात कितने ही सालों से मेरे दिल में चुभती रही है। बात है, हमारे मनों की। वह सारी किताबें कैसी भी रही हों, उनका हमारे व्यक्तित्व पर क्या असर पड़ रहा था। हमारा दिल कैसे उन सब कही बातों को अपने अंदर समेटे जा रहा था। वहाँ लिखी एक-एक बात कैसे उन पंक्तियों से बाहर निकाल कर अपनी ज़ेबों में भर लिया था। असल में सबसे पहले यह पड़ताल ख़ुद की है। ख़ुद से शुरू करके अपने भीतर देखने की छोटी-सी कोशिश है। वरना मौका ही कहाँ मिलता है, इस तरह लिखने का।

हम उन दो सालों में जो किताबें पढ़ते हैं, पता नहीं उनका उसके बाहर कोई मतलब है भी या नहीं? उनको लेकर कभी इसतरह भी सोचा गया होगा? वह हमें क्या बना रही थी? हम किन दृष्टियों से सम्पन्न हो रहे थे? यह पंक्तियाँ उन पुस्तकों का किसी भी तरह अवमूल्यन नहीं करती, पर लगता है, इस तरह भी उन्हे देखना चाहिए। उन्होने स्वयं में किन मूल्यों विचारों को हम तक संप्रेषित किया इससे जादा ज़रूरी है उन्हे पढ़ने वाली घण्टियों में हमारा दिमाग किन तरहों से सोच रहा था। सुधीश पचौरी जिसे लड़कियों के लिए शादी से पहले का प्रतीक्षालय कहते थे, वहीं कई लड़के-लड़कियाँ जोड़बद्ध होकर रहने लगे थे। इस दरमियान ऐसा भी वक़्त आया जब बिना कसप  पढ़े, हम दिन में न मालुम कितनी दफ़े आगे लिखी बात को मन में दोहराते रहते। ‘वी फ़ील एंड फ़क इन द माइंड’। लड़के अपने दोस्तों से खाली कमरों की चाभियाँ माँगते रहे। उन्हे चाभियाँ मिलती रहीं। यह किसी परिघटना का साधारणीकरण नहीं है, उन बहुत सारी कहानियों में से कुछ कथाओं का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह दैहिक निकटता सिर्फ़ विद्यापति को पढ़ने का परिणाम नहीं थी। उससे आगे जाकर यह कहीं भावनात्मक रिक्तता और मनोवैज्ञानिक शब्दावलियों में न फँस जाए, उससे पहले ही बता दूँ, यह मेरे हिस्से की कहानी कभी नहीं बनी। इसे किसी भी अर्थ में ‘नैतिक’ होने की थोथी कोशिश नहीं कहना चाहिए। यह ‘सुचिता’ का भी सवाल नहीं है। इनमें सबसे पहले यह झिझक को तोड़ने का पहला कदम है। प्रचलित अर्थों में बने बनाए खाँचों को तोड़ने की पहली घटना एकांत में लड़का-लड़की के मध्य घटित होती है। अंतर यह रह गया कि उन्होने व्यवहार से शुरुवात की और हमने विचार से। शायद ऐसे कहना चाहिए कि हमारी कोशिशे यहाँ दर्ज़ है और उनकी उनके मनों में कहीं छपी रह गयी होंगी।

मृणाल से मिलने का वक़्त बिलकुल यही था। उससे पहली मुलाक़ात उसी दायीं तरफ़ वाले कमरे में हुई। वह तब से ख़यालों में रहने लगी। यह ठीक-ठीक नहीं कह सकता कि वह मेरे सपनों में नहीं आती। जैसे कहीं से कोई यह नहीं बता सकता कि कितने लड़कों के मन में यह ख़याल आया और सामने वाली बैंच पर बैठी वह लकड़ी भी उन्ही तरहों से डूबी जा रही थी। मृणाल बिलकुल मेरी तरह लगी। चुप-चुप सी। शांत। किसी से कुछ नहीं बोलती। बिलकुल मेरी तरह खोई-खोई सी रहती। छत पर जाती तो पतंगें देखती रहती। वहीं ज़मीन पर आड़ी-तिरछी रेखाएँ बनाती रहती। वह धीरे-धीरे ख़ुद को तोड़ रही थी। एकबार उसकी गैर-मौजूदगी में हमसब बात करने लगे। वह कहीं धीरे से दिल में उतरने लगी। अपूर्वानंद बहुत अलग ढ़ंग से ‘त्यागपत्र’ पढ़ा रहे थे। उनका प्रस्थान बिन्दु पता नहीं क्या था? वे उन कक्षाओं में हमें किन तरफ़ों की ओर ले जाना चाहते थे? हम किन विशेष तरीकों से उनकी अनकही स्थापनाओं को जान जाएँ। प्रमोद की बुआ मृणाल। मेरी मृणाल। वह पता नहीं उन दीवारों से कब निकाल मेरे दिल की धड़कनों में समा गयी। वह कितनी बार कहती है, ‘मुझे कुछ नहीं तोड़ना। अगर यह समाज टूटेगा, तो हम किसके बीच रहेंगे?’ इसके बाद भी वह कोई ऐसा काम नहीं करती, जिससे यह समाज बचा रहे। मास्टर जी ने हमारा ध्यान, प्रमोद के अपनी बुआ की तरफ़ आजीवन बने रहने वाले आकर्षण की ओर भी दिलाया। वह कुछ ऐसा देख पा रहे थे, जो उनके सम्बन्धों को पुनर्पारिभाषित करने की माँग करने लगता। यह मृणाल ही थी, जिसने मेरे अंदर पहले पहल यह बात भर दी कि इस समाज में कुछ भी बचाए जाने लायक नहीं है। जो टूट रहा है, उसे टूट जाने दो। इसके भी इसके बाद बचा रहेगा, वही हमारा समाज होगा। जहाँ हम रहेंगे। कोई कुछ नहीं कहेगा।

आज अंदाज़ भी नहीं लगा सकता कि मृणाल ने मेरे मन को कितनी तरह से तोड़ा? वह मेरे अंदर, मेरी रगों में दौड़ने लगी। जो कुछ भी था, वह इसी भाव, विचार के इर्दगिर्द सिमट कर रह गया। पता नहीं इस लड़की से इस बात को लेना भी था या नहीं? इसके मेरी ज़िन्दगी में आने के बाद कुछ भी पहले की तरह नहीं रहा। इसके चरित्र ने इतना अपनी तरफ़ खींच लिया, जिसे आजतक समझ नहीं पाया हूँ। कभी-कभी सोचता हूँ, इतनी ही सघनता से उस कमरे में बैठे हुए, हम सबमें से और कौन-कौन मृणाल को इस तरह से अपनी ज़िन्दगी में ले आया होगा? शायद यह हमारे लिए चयन का प्रश्न कभी नहीं रहा होगा। वह जहाँ तक अंदर आ पायी, वह बिना किसी रोकटोक चली गयी। अवचेतन ऐसे ही काम करता होगा। बिन पूछे। ऐसी कितनी ही बातें हैं, जिन्हे अपने अंदर देख कर सोचने लगता हूँ। यह मेरे ‘असामाजिक’ होने की शुरुवात भी थी। सब कहते इतने खोये खोये से क्यों हो? तब उन्हे कुछ नहीं कह पाता। यह किसी भी ढाँचे को बनाए रखने की कोई कोशिश नहीं दिखती थी। पर यह भी पता है सिर्फ़ मृणाल नहीं, और भी बहुत सारे घटक होंगे, जिन्होने मुझे इस तरह बुना होगा। आज सबसे पहली याद में मृणाल का ख़याल आया। पता नहीं दिमाग में, दिल में, मन में और कौन-कौन कहाँ-कहाँ घर करके बैठे हुए हैं? यह पड़ताल ऐसे ही जारी रहेगी। कभी तेज़, कभी धीरे। कभी भूलते हुए, कभी याद करते हुए। हमने इस लिखने को किस तरह अपने अंदर पाया, इस सवाल का जवाब, हम सबके पास होना चाहिए।

सितंबर 19, 2014

लिखना, तब से लेकर आज तक

सबसे मूलभूत सवाल है, हम लिखते क्यों हैं? यह लिखना इतना ज़रूरी क्यों बन जाता है? मोहन राकेश अंदर से इतने खाली-खाली क्यों महसूस करते हैं? उनके डायरी लिखने में अजीब-सी कशिश है। बेकरारी है। जिन सपनों को वह साथ-साथ देखते चलते हैं, उनके अधूरे रह जाने की टीस है। वह अंदर-ही-अंदर सब जज़्ब करते जाते हैं। टूटने से पहले, बिखर जाने तक। किसी से कुछ भी कहते नहीं। बस चुप रहते हैं। यह उनके निजीपन में ‘अंतर्मुखी’ होने का प्रमाण है। क्या दुनिया में जितने भी लिखने वाले हैं, सबको इस साँचे में डाला जा सकता है? इसी वक़्त यह सवाल ख़ुद से भी पूछ लेने का मन करता है। हम कहाँ से शुरू हुए थे? कल रात लिखते हुए सबसे जादा उन दिनों को याद कर रहा था, जब हम सवालों से, उन्हे पूछ पूछकर लिखना सीख रहे थे। अभी भी उसी प्रक्रिया में हैं, पर छूट गया है सवाल पूछना। छूट गया है, उनका मेरे मन में इतनी सघनता से अंदर घर कर जाना। इन सालों में आज ऐसी जगह से पीछे देखने पर चीज़ें थोड़ी और साफ़ दिख पड़ती हैं। उन्हे और बारीकी से जान पाने के मौके बनते देख कभी लगता है, पीछे जाकर फ़िर वहाँ से गुज़र पड़ते। पर अगले ही पल ख़ुद को सोच नहीं पाता। बस लगता है, तब इस तरह यहाँ कभी भी नहीं हो पाते।

यह अफ़सोस बनने से पहले ही वापस लौट जाने की तरह है। कठफ़ोडवे के लकड़ी के पास वापस लौट जाने से बिलकुल अलग। शायद उसके बिलकुल उलट। सबको उलटकर रख देने वाले ही तो साल थे। अजीब से। कमज़ोर। बेकार। उबते। ख़ुद को साबित कर लेने लायक औज़ार जुटा लेने जैसे। क्या हम सब उमर के इस पड़ाव पर एक हद तक इसी तरह ख़ुद को बुन रहे होते हैं? हमारे पास सैकड़ों सवाल थे, जिसके जवाब हम इस लिपि के सामाजिक, सांस्कृतिक संरचनाओं में ढूँढ रहे थे। अब लगता है, हम हिन्दी नहीं, कुछ और ही पढ़ रहे थे। सच में हिन्दी वंचितों की भाषा है। इसने हमें ताक़त दी। हमें लगता हम एमए में किताबों को पढ़ते-पढ़ते, किसी और ही दुनिया में आ गए हैं। हम सवाल उठाने लायक हो रहे थे। हम ‘विखंडन’ की प्रक्रिया से गुज़र रहे थे। हमें बिन दिखे, हमारा व्यक्तित्व टूट रहा था। जहाँ दो फाँकें अभी भी लिखने में साफ़-साफ़ दिख जाती हैं। विचार सामूहिकता के आग्रह के साथ आता है। दूसरी तरफ़ भावुकता अत्यंत निजी क्षणों का गुंजलक होती है। यह उसके अनुपात में उतनी ही 'वैयक्तिक' होती है। विचारधारा कोई भी हो, वहाँ किसी भी निजी अभिव्यक्ति का कोई अवसर, कोई स्थान नहीं होता। यह बात एकदम से समझ नहीं आई। आते-आते हम काफ़ी आगे निकल आए। यहाँ से लौटने की बात तब न दिमाग में थी, न ही ऐसा कोई ख़याल मन में आया था।

विचारधाराएँ इसी रूप में हमें ‘अमानुषिक’ करती जाती हैं। वहाँ कोई खाली जगह नहीं होती, एक पंक्ति का भी अवकाश नहीं होता, जहाँ अपने मन की भी कुछ कह पाएँ। उन दिनों जितना ख़ुद को समझता, तब भी गलत जगह होने के एहसास से भरा रहता। कहता नहीं, पर दिल में कहीं किसी कोने में यही सोचता। अगर किसी लड़की से प्यार भी करता होता, तो उसे अपनी ताक़त बनाने से पहले, ख़ुद को मज़बूत करने वाली बात पर अटक जाता। यह द्वंद्व था। मेरे अंदर की छटपटाहट थी। चाहकर भी न कह पाने की कसक थी। उस लड़की से प्यार करता हूँ, इसके लिए कारण ढूँढ रहा था। आख़िर ऐसा क्या है, कि उसकी तरफ़ खिंचा चला जा रहा हूँ। ऐसा तो नहीं कि यह पूंजीवादी सौंदर्य का आकर्षण हो? वह इतनी गोरी नहीं है, रंग साँवला है। फ़िर भी कहने से पहले, इतने सारे सवालों से ख़ुद को पार ले जाना था। वह सब मुझे ठीक से उस दरिया में उतरने भी नहीं दे रहे थे। यह इतने पर कहाँ रुकने वाले थे, एक रात यहाँ तक पहुँच गया कि कहीं हो न हो मैं उसकी देह की तरफ़ आकर्षित हूँ। और इस रूप में मैं ‘विशुद्ध पुरुष’ था। मेरी सम्पूर्ण चेतना, स्त्रीवादी विचारों में केवल इस कारण को पाकर थोड़ा और निराश हो गयी। सोचने लगा, स्त्री को भोगने का विचार मेरे मन में कैसे आया होगा? इस तरह न जाने कितनी तरह से ‘बौद्धिक प्रेम’ कर रहा था, उससे। पर कभी उसे एहसास नहीं होने दिया। इसे इस तरह ही घटित होना था शायद। एक दिन आया, वह मेरी आँखों के सामने से हमेशा के लिए जा रही थी और मैं कहीं ‘आउटलुक’ में कश्मीर को लेकर अरुंधति राय के विचारों को मथ रहा था। वह कविता से गुज़रती रही और एक दिन सचमुच बाहर हो गयी।

इस तरह ‘इंट्रोवर्ट’ ऑबलिक अंतर्मुखी दिखने वाला ‘मैं’, प्यार में हार रहा था। यह वह क्षण थे, जब धीरे-धीरे वहाँ तक पहुँच गया, जहाँ इस एक कमरे वाले घर को, उससे फ़िर कुछ न कहने वाली बात के लिए बहाना बना लिया। असल में सबसे पहले समझने वाली बात ही कभी समझ नहीं पाये। हम सब सबसे पहले एकअदद धड़कने वाले दिल के हक़दार होते हैं, पर उसे कभी महसूस ही नहीं कर पाते। दिल धड़कने के लिए कभी पूछता नहीं है। यहाँ आने, इस ब्लॉग को बना लेने के बाद, अपनी सब पढ़ी हुई बातों, किताबों को भूलने की शुरुवात हुई। यह मेरे अंदर से बाहर आने जैसा है। यहाँ अभी जितना सुचिन्तित, क्रमबद्ध लिख रहा हूँ, मन के अंदर न जाने कैसे सब दोहराते हुए, कहने लायक भाषा में तब्दील कर रहा हूँ। मेरी कागज़ वाली डायरी भी इतनी तरह, इतनी बेतरतीब है। बिखरी हुई है। कभी भी किसी भी याद को लिख उदास हो जाने की आदत से मज़बूर। इधर उन परतों को अंदर उघाड़ रहा हूँ। यहाँ उतना कहने की हिम्मत नहीं है या अभी वक़्त नहीं आया है, कह नहीं सकता। हो सकता है, इस लेकर आए आखिरी साल में वह उन कागज़ों से निकल कर यहाँ आ जाये? पर अभी नहीं। ख़ुद को इंतज़ार करने दे रहा हूँ। पता है एक दिन आएगा।

जैसे एक दिन तुम आई। तुम न आती, तो न जाने, कितना और बिखरता। यह अंदर से टूटना दिख रहा था। इसका सतह पर आ जाना सबसे ख़तरनाक है। शायद उसी दौर की सबसे जटिल संरचना में तुमसे मिला। यह उन सबको भूल जाने की कोशिशों वाले दिन थे। तुम मेरे लिए फ़िर से सपनों में जीने का बहाना बनकर आई। तुम्हारे लिए ख़ुद को बदल रहा हूँ। कभी-कभीतुम्हारे लिए ’ थोड़ा मुश्किल हो जाता हूँ, पर उन ख़तों में लिखी हर बात, हर रंग, हर ख़ुशबू इस ज़िन्दगी भर देना चाहता हूँ। उन ख़्वाहिशों को हम साथ वहीं उस लोहे के बैंच पर बैठे देख रहे हैं। हम वहीं उन बहती हवाओं में साँसों से अपनी दुनिया बना रहे हैं। कभी तुम्हारे कानों में पहनी बालियों को देख कहीं तुम्हें लेकर खो जाने का मन करता है। कभी उन अबोली चाँदनी रातों में हाथों में हाथ लिए उन गुलाबी जुगनुओं के पीछे भागने को होते हैं। तुम्हारे पायलों की झंकार दिल की धड़कनों की जगह धड़कती हैं। कुछ भी न बोलो तब भी सुन लेता हूँ, तुम्हारी आवाज़। आहिस्ते से कानों में खिलखिलाना। तुम्हारे लिए हर जगह को सपनों से भर दिया है। उन ओस की बूँदों पर चलते हुए तुम्हारी कही हर बात यहाँ लिख देना चाहता हूँ। उन सबको अंदर ही अंदर रात में कितनी ही बार दोहराता रहता हूँ। उस साड़ी के लाल लाल फ़ाल की तरह। तुम्हारे आने के बाद सच में उन दिनों जैसा बिलकुल भी नहीं रहना चाहता था। तुम्हारी मुलायम सी उँगलियों को थामें, वहाँ से निकल इन सपनों की दुनियाओं में हम दोनों हैं। और उनमें से एक सपनों की दुनिया यह भी है।

{यादगारी के लिए उस कुर्सी-मेज़ की तस्वीर लगाए दे रहा हूँ, जिसपर बैठ अब तक इन सपनों को बुनता रहा। }

सितंबर 18, 2014

करनी चापरकरन: यह चौथी सालगिरह: मेरे मन की दुनिया

तारीख़ अट्ठारह सितंबर। साल दो हज़ार चौदह। एक साल और बीत गया। इसे ‘जुड़ गया’, कहने का मन था। फ़िर भी क्यों नहीं कह पाया, पता नहीं। इस दुनिया में हमारी भी गलियाँ, कई खिड़कियों से गुजरते दृश्यों को ‘स्थिर’ कर सामने रख देती होंगी। किसी विचार के भीतर घूमते, किसी याद को याद करने के दरमियान, कहीं किसी मोड़ पर दो पल रुकते, कोई पेड़ याद आ जाया करता होगा। कहीं से झींगुर की अनसुलझी झंकारों को सुन, हम आराम से कोहनी के बल गर्दन टिकाकर, वहीं से, चुपचाप, अबोले, सबकुछ देखते रहे होंगे।

लगता है, पूरे साल इसी तरह की भाषा के साथ खेलता रहा। इसे शायद ‘खेलना’ ही कह रहा हूँ। इसे ठीक से न समझने के कारण भी ऐसा हो सकता है। लगता है, यही सच है। इसमें हद दर्ज़े का बनावटीपन है। एक अपनी दुनिया रच लेने की ज़िद है। जहाँ कोई नहीं है। कोई नहीं। बस इन्ही शब्दों से बने मड़हे के नीचे, उस टूट गए गिलास में चाय पीते, कोई ख़याल आकर ठहर गया है। असल में यह ठहरना ही है। यह किसी आने वाले कल के आने से पहले, अपने फटे पजामे से बने झोले को उठाकर चल देना है। इंतज़ार करने से मना कर देना है। पहले जब जेब में शब्द थोड़े कम पड़ जाते थे, तब राह चलते किसी बड़े कवि के गले पर हसिया रख, उन्हे लूट लिया करते थे। यह हमारी रचना प्रक्रिया को उघाड़ देने जैसा है। मेरे हिस्से यह कवि ‘मुक्तिबोध’ पड़े। ‘उदरभरि बन अनात्म बन गए, भूतों की शादी में कनात से तन गए’। चेतन अवचेतन में बराबर उपस्थित। इस तरह इन बीते सालों में, मैंने इन्हे अपने अंदर से बेदख़ल करने की कितनी कमजोर-सी कोशिश की है। कोशिश की कि यह फ़िर कभी याद न आयें।

अब मेरे दिल में राजेश जोशी हैं। विनोद कुमार शुक्ल हैं। थोड़ी उनकी कविता है। थोड़े उनके गद्य हैं। मन भी कभी-कभी इन्हे दोहरा लेता है। गुनगुना लेता है। फ़िर भी लिखना, ‘जो मेरे घर कभी नहीं आयेंगे, मैं उनसे मिलने, उनके पास चला जाऊँगा’ जैसी इन पंक्तियों को मन में दोहराने जितना असान नहीं रहा। वह ख़ुद को बराबर तोड़ने जैसा है। अपनी पड़ताल करने जैसा। उसमें हर जगह हम ही हैं। और हम कहीं नहीं हैं। हमने कभी बुधई की तरह जामिन मियाँ से पेड़ लगाने के लिए ज़मीन नहीं माँगी। इस जगह को, इसकी डालियों के अँखुआये मुलायाम नाज़ुक से पत्तों को अपने दिल के अंदर हमेशा वैसे ही रहने दिया। किसी को उन्हे छूने नहीं दिया। फ़िर कितने ही सवाल अंदर-ही-अंदर उमड़ते घुमड़ते रहे हैं, उनका कोई हिसाब नहीं। कहीं किसी जगह दर्ज़ होने लायक बनने से पहले ही वह सूरज की गर्मी में पिघल गए। उमस में न सूखने वाले पसीने की तरह छा गए। छा गए किसी बादल की तरह।

मैं इतनी अजीब तरह से क्यों लिख रहा हूँ? इसका कोई जवाब मेरे अंदर से बाहर की तरफ़ नहीं निकल रहा। क्यों नहीं मैं भी थोड़ी देर ‘नॉस्टेलजिक’ होकर उन पीछे बीत गए दिनों की यादों में डूब जाता? जहाँ से हम शुरू हुए थे। अभी कितनी संभावनाओं को टटोलना बाकी रह गया है। कितनी हदबंदियों को तोड़ना है। कितनी ही तरहों से अपनी बातें कहनी है। क्या इस दिन कहने लायक कोई बात मेरे अंदर बची नहीं रह गयी है? शायद अवचेतन कहीं और खो गया है लगता। वह ‘रिसपॉन्स’ नहीं कर रहा। यह एक तरह का ‘ब्रेकडाउन’ है। मुझे भी सड़क किनारे खड़ी डीटीसी बस की तरह ‘रिकवरी वैन’ की प्रतीक्षा करनी चाहिए। या सबसे जादा यह उस आख़िरी साल की बात सोच-सोच बैठा जा रहा है। वह भी तो अपने आप को कितना मानता होगा। यहाँ आने के लिए। यहाँ से जाने के बाद।

यह सब बातें इसे, इस जगह को, इस तरह से गढ़ती रही हैं, शायद इससे बाहर कहीं नहीं हो सकती थीं। यह मेरे भीतर की दुनिया है। मेरे सपनों की दुनिया। उसे रचने वाला सिर्फ़ और सिर्फ़ मैं हूँ। वह जैसी भी हैं, मेरी सीमाओं के दायरों में बनती बिगड़ती रहीं हैं। यह बड़े आहिस्ते से, अनछुए, नाज़ुक से मकड़ी के धागों से बने घर की मंज़िलें हैं, जिनपर इससे पहले कोई चहलकदमी नहीं थी। विचारों का आग्रह इन बीतते सालों में धीरे-धीरे कम होता दिख रहा है। उनका रूमान उन शुरुवाती दिनों की तरह नहीं रह गया। यह फेफड़ों के बीच धड़कते दिल की दिमाग पर बड़ी ही भावुक-सी जीत है। इसे एक दिन ऐसे ही हो जाना था। जैसे-जैसे हम उमर के सालों में बड़े होते जाते हैं, वैसे-वैसे हम अपने मन की दुनिया ढूँढने लगते हैं। धीरे-धीरे यह ‘ब्लॉग’ मेरे मन की दुनिया में तब्दील होता जा रहा है। जो जहाँ है, जैसा है, मेरे मन का है। इस तरह यह मेरे दिल की बाहर से दिखने सबसे कोमलतम अभिव्यक्ति है।

{तारीख़ इन पिछले बीते सालों में कभी सत्रह कभी अट्ठारह होती रही हैं। इस साल से पहले की कड़ियाँ यहाँ दिये दे रहा हूँ। पहली सालगिरहदूसरी सालगिरहतीसरी सालगिरह। इस पाँचवे साल के बाद क्या कोई और साल नहीं जुड़ेगा ..पता नहीं .. }  

सितंबर 15, 2014

इन पुरस्कारों का होना..

इसे किस तरह लेना चाहिए, पता नहीं। सब यही कहेंगे, इस पर कुछ नहीं कहना चाहिए। पर कहीं अंदर से लगता है, बात होनी चाहिए। गंभीरता से होनी चाहिए। हम नहीं करना चाहेंगे, फ़िर भी। थोड़ी झिझक के साथ। थोड़े छिपकर। कुछ नाम के साथ करेंगे। कुछ नाम नहीं लेंगे, सिर्फ़ संकेत या सूत्र वाक्यों में निपट जाएँगे। क्या सच में इसपर कोई बात नहीं होनी चाहिए? लगता है बात न करना, चुप रहकर किसी भी तरह से ‘चुप्पी की संस्कृति’ का हिस्सा बन जाना है। इसलिए बात ज़रूरी है। यह किसी भी तरह से शहीदाना पोस्ट नहीं है। न इसे किसी पहाड़ के पीछे पड़ने वाले अरुण कमल की तलाश में निकले सहयात्री खोज पूरी हो जाने के उत्सव की तरह देखा जाना चाहिए। शुरू में ही कह दूँ, यह कुछ भी हो जाने से पहले इस माध्यम के बारे में संवाद शुरू करने की एक छोटी-सी कोशिश भर है।

कल हिन्दी दिवस पर एक चैनल ने हिन्दी उत्सव का आयोजन किया। यह एकसाथ हिन्दी भाषा की संभावनाओं को तलाशता, टटोलता, उसके आने वाले भविष्य की साझी पड़ताल तो था ही, साथ में इस भाषा में लिखने वाले दस ब्लॉगरों को चुनकर उन्हे सम्मानित भी किया गया। एक गैर-परंपरागत माध्यम के लिए ऐसी परंपरा का अनुशीलन स्वयं में अंतर्विरोधी बात है। जहाँ ऐसे पुरस्कारों और सम्मानों की विश्वसनीयता कितनी रह गयी है, वाला सवाल कोई मायने नहीं रखता। उनके द्वारा नियुक्त निर्णायक मण्डल में सुधीश पचौरी, कुमार विश्वास, गीतकार प्रसून जोशी और नीलेश मिश्र थे, जिन्होने इन ब्लॉगरों को चुना। इस चतुर्दिक मण्डल का इस गैर-परंपरागत माध्यम की ‘सैद्धांतिकी’ से परिचित होना और उसे ‘व्यवहार’ में लाना दो अलग-अलग बातें हैं। और शायद यह मात्र संयोग ही है कि इनमें से किसी भी व्यक्ति के नाम कोई ‘ब्लॉग’ कहीं पंजीकृत नहीं है।

सुधीश पचौरी हिंदुस्तान, राष्ट्रीय सहारा, जनसत्ता आदि दैनिक अख़बारों में लिखने को इस विधा के अंतर्गत मानते हों, इसका भी कोई प्रत्यक्ष संकेत वे अपने गरिष्ठ ललित निबंधों, लेखों में कभी नहीं करते हैं। हाँ, उनके दिल्ली विश्वविद्यालय में पदासीन रहने के बाद भी आर्ट्स फ़ैकल्टि, स्पिक मैके कैंटीन के बगल वाली किताबों की दुकान ज़रूर अभी तक गायब है। कहीं नज़र नहीं आ रही। प्रसून जोशी फ़िल्मी गीतों और विज्ञापनों के लिए शब्दों को लयबद्ध करने के साथ-साथ, कभी-कभी इतवार के नवभारत टाइम्स में हिन्दी के चेतन भगत बनने की असफल कोशिश करते दिख जाते हैं। पता नहीं इनकी 'वॉट यंग इंडिया वॉन्ट्स' कब तक प्रकाशित होकर आती है? नीलेश मिश्र एफ़एम रेडियो पर एक ही टोन में स्वरबद्ध कहानियों के साथ अपना यादों का इडियट बॉक्स लेकर आते रहे हैं। वे कहानियाँ किसी ने भी लिखी हों, जो दो किताबें फ्लिपकार्ट पर इसी नाम से हैं, उसपर इनका ही नाम है। जैसे दिलीप मण्डल अभी अपने फ़ेसबुक स्टेटस पर भीम राव अंबेडकर की किताब के नाम के साथ समानता बता रहे हैं, बिलकुल वैसे ही। और आख़िर में बचे कुमार विश्वास। इतने बड़ी कवि हैं कि हवाई जहाज से लेकर सारा ख़र्चा इनके प्रायोजक उठाते हैं। अभी के लेटेस्ट खुलासे में उन्होने बिग बॉस को उघाड़ा है। कह रहे हैं, सब फ़िक्स होता है। मेरे डायरी लेजाने की शर्त मान ली गयी थी। पर नहीं गये। नहीं जायेंगे। पिछले दिसंबर तक 'आप' के साथ थे, अब नरेंद्र मोदी की तरफ़ अपना रुझान प्रकट कर चुके हैं। इस तरह यह सब हिन्दी के प्रबुद्धजन सिद्ध होते हैं, इनके हाथों, कंधों, पैरों, ज़ेबों, कुर्तों में इस भाषा का भविष्य सुरक्षित ही नहीं दीर्घजीवी भी है।

क्या 'ब्लॉग' सिर्फ़ भाषा का मामला है? चैनल की वेबसाइट इस हिन्दी उत्सव पर कहती है: 'इन सब के बीच एक नई हिन्दी का जन्म हुआ है। यह नई हिन्दी है, इंटरनेट पर ब्लॉग लिखने वाले तामाम ब्लॉगर्स की। इस नई हिन्दी की अपनी एक नई दुनिया है। यह नई दुनिया हिन्दी के लिए बेड़ी बनेगी या पंख यह अभी तय होना बाकी है'। उन्होने ब्लॉग को सिर्फ़ भाषा माना है। हम उसे क्या माने, अभी तक तय नहीं किया है। जितने लिखने वाले हैं, यह उतने ही तरहों का है। इसकी कोई चौहद्दी नहीं है। कोई नहीं कह सकता कि यही ब्लॉग है। हमने लगातार इसकी सीमाओं को तोड़ा है। इसका अपना मिज़ाज है, जिसे समझने के लिए सिर्फ़ भाषा एक कमज़ोर औज़ार है। इसे पढ़ने वाला कितना समझ रहा है, उस बारे में लिखने वाला क्या सोच रहा है? कभी इसपर हमने बात शुरू नहीं की। पर कभी-कभी लगता है, इसे इस तरह भी जानने की कोशिशें शुरू होनी चाहिए। जितनी जल्दी हो सकें, उतनी जल्दी।

और शर्तिया यह उक्त प्रबुद्ध हिन्दी टाइप लोगों से तो होने से रहा। यह हम लोगों को ही शुरू करना होगा, जो इस गैर-परंपरागत माध्यम में ही पहली बार ख़ुद को व्यक्त कर रहे थे। कर रहे हैं। यह ख़ुद को कहने का पहला और आख़िरी माध्यम था। अभी भी है। इन पुरस्कार वितरण संस्थाओं की समझ का आलम यह है कि जो पत्रकार अख़बारों में प्रकाशित टिप्पणियों को संग्रह की दृष्टि से ब्लॉग पर पोस्ट कर रहा है, उनके लिए यह गंभीर ब्लॉग लेखन की श्रेणी में आता है। वे ख़ुद एक पोस्ट बनाकर वहाँ गर्व से कहते हैं: 'This blog is awarded by ABP news on the occasion of Hindi Diwas. असल में यह सम्मान उन सभी दोस्तों का है जो उन्हे पढ़ते है, सहयोग करते हैं, उत्साह बढ़ाते हैं। उनके ब्लॉग पाठकों का है। यह सम्‍मान उस छतरपुर का है, जहाँ उन्होने जमीनी पत्रकारिता सीखी और आज भी इनके लिखने में वह बरकरार रहती है।' जाइए देख आइए, कितना उन्होने इस माध्यम के लिए लिखा, और तब वह किसी अख़बार में प्रकाशित हुआ। पूरा ब्लॉग कतरनों से भरा हुआ है। कोई ऐसी पोस्ट नहीं जिसे स्वतंत्र रूप से ब्लॉग के लिए लिखा गया हो। और वहाँ कितनी अश्लीलता से उनकी तस्वीर वहाँ लगी हुई है। वह इतना भी नहीं कह पाये कि इस इनाम के वे हक़दार नहीं है। शायद उनकी समझ में हिन्दी भाषा में और ब्लॉग पर लिखना दोनों एकमेक हो गए होंगे।

यह समझ का ही फ़ेर है। शायद मैं ही नहीं समझ पा रहा हूँ। पर सुनने में आया विजेंद्र जी (मसिजीवी हिन्दी), आप वहीं पार्क होटल में उपस्थित थे। हम कम-से-कम आप से यह उम्मीद तो करते ही थे कि इसपर आप ज़रूर कहेंगे। विनीत भले अपनी फ़ेसबुक वाल टीवी पर रंगते रहें, कभी इतनी उम्मीद नहीं रहती, वही हुआ भी। यह हिन्दी दिवस उनसे छूट गया। पर आप तो..शायद आप दोनों ही थोड़े व्यस्त होंगे। वक़्त निकाल के कहेंगे। कुछ पोस्ट वोस्ट तय्यार कर रहे होंगे। ख़ैर तो यह है कि प्रभात रंजन वहाँ से लौटकर अपने गुरु से पुरस्कार लेने के बाद इतने आत्ममुग्ध नहीं हुए। पर उन्होने भी कायदे से इसे लेना नहीं चाहिए था। वे ख़ुद को जानकी पुल का मॉडरेटर कहते रहे हैं। पर कहने के बाद भी पुरस्कार लपक लिया। हद है। सिर्फ़ इतना कहने से तो बात बनेगी नहीं कि मैं मॉडरेटर होने के नाते सभी की तरफ से सम्मान ले आया। 'जानकी पुल' के सभी पाठकों और लेखकों को बधाई! आपका लिखा जो आख़िरी बार पढ़ा था उसकी तारीख़ दो हज़ार ग्यारह तक जा रही है। मार्च ग्यारह। लिखना आत्मघाती पेशा है। शायद आप सही कह रहे थे।

{प्रमोद सिंह, सागर, 'असुविधा' वाले अशोक कुमार पाण्डेय, और 'सफ़ेद घर' के रहनवार सतीश पंचम से ज़रूरी हस्तक्षेप की अपेक्षा के साथ। और पूजा तुम भी कुछ कह ही दो अब तो.. और रवीश आप भी तो हमारे पुरखे हैं, कुछ तो बोलना बनता ही है। }

सितंबर 13, 2014

कश्मीर की बाढ़ का एक पाठ

यह ‘जम्मू’ से ज़्यादा ‘कश्मीर’ में आई बाढ़ है। ऐसा मैं नहीं कह रहा, ऐसा टीवी चैनल दिखा रहे हैं। कई प्रबुद्धजन बीते सालों में आई बाढ़ों के ब्योरों के साथ तय्यार हैं। कोई उन्हे किसी बहस में बुला ले बस। ऐसे भी लोग हैं, जो इस आपदा काल में सेना की रचनात्मक और सकर्मक भूमिका की सराहना कर रहे हैं। कल जनरल वीके सिंह के फ़ेसबुक पेज पर किसी पुल पर लेटे चीनी सैनिकों की तस्वीर को भारतीय सेना के जवानों के रूप में दिखाया जा रहा था। विवाद के बाद उस तस्वीर को वहाँ से हटा लिया गया। एक दूसरा ख़ेमा मणिपुर, कश्मीर से लेकर नक्सल प्रभावित क्षेत्रों के उदाहरणों को उद्धृत कर रहा है। दोनों तरह की बातों के बीच वहाँ नावों पर स्थित कैमरे इस बाढ़ को अभूतपूर्व घोषित कर रहे हैं। साठ सालों में पहली बार इस तरह की स्थिति देखी गयी है।

पिछले साल केदारनाथ, उत्तराखंड की त्रासदी को अभी तक अपवाद माना जा रहा था। हमारे मौसम विभाग के विशेषज्ञ अभी भी उसे, इस बाढ़ की तरह ‘असाधारण’, ‘अप्रत्याशित’ कह रहे हैं। दूसरी तरफ़ आज सुनीता नारायण ने बिना किस शोर शराबे ‘नगरीकरण’ के ‘नवउदारवादी प्रारूप’ को राजनीतिक प्रश्रय देने की आत्मघातक प्रवृत्ति को रेखांकित करते हुए अपनी बात कहती हैं। कैसे नियमों को ताक पर रखकर कश्मीर के उन निचले इलाकों में पॉश कालोनियाँ बसायी गईं, जिसके कारण पानी निकासी का स्वभाविक मार्ग अविरुद्ध हुआ। हमें ज़मीन सिर्फ़ इमारतों के लिए नज़र आती है। वहाँ बाढ़ के इलाकों में घर बनने दिये गए। बरसात का पानी डल झील और नागीन झील तक कभी पहुँच ही नहीं पाया और जल भराव की समस्या ने इतना विकराल रूप ले लिया। अभी हमने इस तरह से सोचना शुरू नहीं किया है। हम अभी भी इन विषम परिस्थितियों को पश्चिमी विक्षोभों व मौनसून के परस्पर मिलने की घटना बता रहे हैं। हमें इससे आगे बढ़ना होगा।

इसी बिन्दु पर ध्यान से देखें तो, एक बारीक-सी रेखा भी खींच दी गयी है, जिसमें बार-बार टीवी पर प्रसारित छवियाँ, किन्ही छिपे अर्थों की तरफ़ भी ले जा रही हैं। वह इतने छिपे न भी हों, तो भी धुंधले ज़रूर हैं। जो साफ़ है, उनमें स्पष्ट रूप से इसका उपयोग, दो सरकारों की कार्यशैलियों के बीच अंतर रेखांकित करने के लिए किया जा रहा है। कौन आपदा के समय कितनी तत्परता से राहत कार्य कर रहा है? यह ‘अच्छे दिन’ के मुहावरे की तरह अख़बारों से लेकर सोशल मीडिया में छाया हुआ है। सबके बीच, दोनों त्रासदियों के चित्र तुलनात्मक अध्ययन के लिए सहजता से उपलब्ध कराये जा रहे हैं। यह ‘साख’ बनाने का खेल है। यह साफ़ तौर पर दिख भी रहा है। यह अपने उत्पाद को बेहतर बताने की कवायद ज़्यादा लगती है। सरकारें इसी रूप में होड़ लगाती हैं।

इससे अधिक जटिल वह संरचना है जिसके भीतर हम यह पाते हैं कि यह वही केंद्रीय सरकार है, जिसके कई और राज्य इससे भी अधिक त्रासद जल आपदाओं के बीच, अपनी जिजीविषा के बल पर अपने को ज़िंदा रखे हुए हैं। वहाँ कई-कई दिनों तक बाकी देश से किसी भी तरह का संपर्क नहीं बन पाता। दोनों जगह बहुत सी खाली जगहें हैं, जिन्हे भरा जाना है। जैसे जिस तत्परता से टीवी चैनलों के रिपोर्टर और उनके कैमरे घाटी से लगातार फ़ीड भेज रहे हैं, उन्ही में से एक चैनल एनडीटीवी भी है, जिनके कमाल ख़ान अपने इसी चैनल के बलबूते एक घाघरा नदी पार नहीं कर पाये थे, उन्ही के मित्र कितनी सहजता से सेना की बचाव नौका पर बैठे-बैठे उस बाढ़ग्रस्त घाटी से रिपोर्ट कर रहे हैं। सेना के हेलिकॉप्टर से भी कई ‘पीटीसी’ उतार रहे हैं। पर इस चैनल पर पिछले साल असम में आई बाढ़ के समय कोई टिकर नहीं चलता। बिहार-उड़ीसा के जलमग्न हिस्सों से ऐसी ‘मानवीय’ रेपोर्टिंग नहीं होती। कोई ‘उदय फाउंडेशन’ जैसी संस्था आगे नहीं आती। एक नाम पट्टी लगातार, इलाक़ावार बताती रही कि कौन व्यक्ति कहाँ कितने दिनों से फँसा हुआ है? चैनल पर अपील के साथ यह भी लिखा जाता है कि ‘पुराने कपड़े देने के बजाय आप चेक़ और अनाज हमारे ग्रेटर कैलाश वाले दफ़्तर में जमा करा सकते हैं’। यहाँ ‘सरकार’ और ‘चैनल’ दोनों एकमेक हो गए हैं। भले गुणात्मक रूप से दोनों की प्रकृति में थोड़ा अंतर हो, पर ऐसे मौक़ों पर वे स्पष्ट रूप से इस तरह आते हैं। इसे और किस तरह विखंडित किया जाना चाहिए?

क्या वहाँ सेना की उपस्थिति ने इन चैनलों के लिए इस तरह ख़बरों के लिए जमीन तय्यार की? लेकिन यह इस स्थिति का बहुत ही सरलीकरण है। भारतीय सेना पहले भी इसी तरह की भूमिकाएँ निभाती रही है। फ़िर बारीक नज़र से देखने पर पता चलता है, इस तरह वर्तमान भारत सरकार, कश्मीर को ‘री-क्लेम’ कर रही है। राजनीति विज्ञान में जिसे इस तरह कहा जा सकता है कि एक राष्ट्र-राज्य इस क्षेत्र पर बहुत ही मज़बूती से पुनः ‘दावा’ का रहा है। अख़बारों में पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर के लिए मदद देनी की इस सरकार की पहल पर देश-विदेश में भूरी-भूरी प्रशंसा और सराहना की ख़बरें लगातार आ रही हैं। यह वही कश्मीर है, जहाँ से लगातार अलगाववादी स्वर उठते रहे हैं। अभी पिछले दिनों, दोनों पड़ोसी देशों के बीच सचिव स्तर की बातचीत इसी कारण रद्द भी हो चुकी है। यह वही सरकार है जिसके बुद्धिजीवियों के चिंतन का एक प्रस्थान बिन्दु, धारा ‘तीन सौ सत्तर’ भी है। वह इस बाढ़ के बहाने पूरे देश में यह संदेश देना चाहते हैं, कि कश्मीर की ‘अभिन्नता’ के लिए वे इसी तरह आगे भी जो क़दम उठायेंगे, वह इतनी सघनता के साथ ‘मानवीय’ एवं ‘सराहनीय’ होंगे। आप किसी अरुंधति रॉय की बात पर विश्वास मत कीजिएगा। वह विभाजनकारी तत्व हैं। और दुर्भाग्य से तब हमारे इन चैनलों के लिए वहाँ इतनी सहजता से प्रवेश संभव नहीं हो पाएगा। जो चैनल आज इस ‘ब्राण्ड मेकिंग’ में लगे हुए हैं, सब चुप हो जाएँगे। सबकी ‘लाइव फ़ीड’, ‘फ्रीज़’ हो जाएँगी। कोई ख़बर बाहर नहीं आएगी।

{इस पोस्ट का छोटा सा टुकड़ा कल, सत्रह सितंबर को दैनिक हिंदुस्तान में आया है। पेज नंबर दस। जगह ‘साइबर संसार’। पेज दस। लिंक यही है, इसी पर चटकाएँ। तस्वीर फ़िर कभी। }

सितंबर 12, 2014

मनमर्जियाँ..

थोड़ी देर झूठ बोलना चाहता हूँ। कहीं से भी कोई आवाज़ सुनाई न दे। सब चुपचाप सुनते रहें। कहीं से छिपकर मेरी आवाज़, उनके कान तक आती रहे। उन्हे दिखूँ नहीं। बस ऐसे ही छिपा रहूँ। पता नहीं यह कितनी रात पुरानी रुकी हुई पंक्ति है। इसे लिखना चाहता था, ‘रोक दी है’। जैसे, इतने दिनों बाद, आज शाम एकबार फ़िर उसी जगह ख़ुद को खड़ा पाता हूँ कि अब नहीं लिखना चाहता। कुछ भी नहीं लिखना चाहता। किसके लिए लिख रहा हूँ? ख़ुद के लिए? तब तो यह ख़ुदसे सबसे बड़ा धोखा है। तब तो इन्हे यहाँ होना ही नहीं चाहिए। यह सारी बातें तो कितनी ही तरहों से मेरे अंदर उमड़ती-घुमड़ती रहती हैं। उन्हे अंदर ऐसे होते रहने देने का मौका लिखने से भी काफ़ी मुश्किल है। असहनीय है। मेरी कागज़ वाली ‘डायरी’ इससे कहीं जादा बेतरतीब है। वहाँ कोई ‘टैग’ नहीं है। कोई ‘लेबल’ नहीं है। कोई ‘ड्राफ़्ट’ नहीं है। जो जैसा है, उसे वैसा ही रहने दिया है। लिखकर फ़िर कभी पढ़ता नहीं। वहाँ लिखने के लिए हिम्मत नहीं चाहिए, मन चाहिए। फ़िर यहाँ मेरा है ही कौन? यह कितना अच्छा है के ख़ुद ही पलट-पलट अपने उन पन्नों पर लौट-लौट पहुँच नज़रभर देख लेता हूँ। 

सब वैसा ही है। कुछ भी नहीं बदला। कुछ भी नहीं। जैसे मन में है, वैसे ही वहाँ भी है। कई सारी फ़ालतू की बातें मन में घूमे जा रही हैं। उन्हे लिख-लिख कर काटे जा रहा हूँ। पर यही डायरी में होते, तो काटने की हिम्मत नहीं करता। वहाँ जो है, वह सबसे शुद्धतम रूप में न भी हो, पर उन ‘भावातिरेकों’ का संकुल है, जिनके बहाने वहाँ लिखने बैठ जाता हूँ। उस वक़्त यह नहीं देखता, क्या लिख रहा हूँ। बस जो मन में है, उसकी परछाईं कागज पर उतर जाती है। थोड़ा-सा भी इधर-उधर नहीं होता। उसके पढ़े जाने के ख़तरे को भी जानता हूँ, पर अब शुरवाती दिनों वाला डर नहीं लगता। जो कहना है, कह देता हूँ। पर यहाँ, इधर, एक बारीक-सा परदा है। बहुत ही सीमित अर्थों में उन सीमाओं का अतिक्रमण कर, यहाँ वह सब लिखने की हिम्मत कर पाता हूँ। पर फ़िर दूसरे ही पल यह भी सोचने लगता हूँ, कि किसके पास वक़्त है, मेरे इस मन को पढ़ने की। थोड़ा-थोड़ा उस सीमा को इतने सालों में बढ़ाता ही रहा हूँ। पर उतना ही, जितने के भीतर सिर्फ़ ‘मैं’ टूटूँ। ‘वह’ नहीं। जिसकी बात हो रही है। जो वहाँ कहीं है ही नहीं। 

मृणाल ने मुझमें इतनी सारी बातें भर दीं, जिन्हे धीरे-धीरे इतने सालों बाद अब सोचता हूँ, तो सिहर उठता हूँ। वह मुझपर, मेरे अवचेतन पर इस कदर हावी रही कि कभी भी कुछ भी टूटने-बिखरने की परवाह नहीं की। सब कुछ तोड़ते हुए भी उसने नहीं माना कि वह ऐसा कुछ कर रही है। मैं भी यही समझता रहा जो इस टूट-फूट में बचा रहेगा, उसमें ही बचे रहने की ताकत होगी। कितना ख़तरनाक है, किसी का इस तरह सोचना। यह किसी भी तरह रचनात्मक विचार नहीं हो सकता। यह उसका प्रेम नहीं था, मुझमें, मेरे अंदर उसका मेरे अंदर आना था। पता है, वह ऐसी ही है। पर मैं तो कभी ऐसा नहीं होना चाहा। मेरा दिल ऐसा क्यों हो गया? तुमने मुझे ऐसा क्यों किया, बताओ? आज पूछ रहा हूँ। पता है, तुम फ़िर कुछ नहीं कहोगी। इधर देख रहा हूँ, यहाँ सब झूठ बोलते हैं। तो मैंने सच बोलने की कौन-सी कसम खाई है? सब झूठ है। इन लिखी पंक्तियों की तरह। इन अँग्रेजी से लिखे हिन्दी शब्दों के जैसे।

किसी में भी इतनी हिम्मत नहीं कि जैसा लग रहा है, उसे वैसा ही कह पाये। उनके कहने का ढ़ंग बेमानी है। जबकि इधर झूठ बोलना थोड़ा कम आता है। जो है सब ‘बिसलेरी’ की बोतल के पानी की तरह साफ़ है। छुपाना कभी नहीं सीखा। सीखा होता, तो कभी लिख नहीं पाता। वो लोग और होंगे, जो छिपा भी ले जाते हैं और उसे लिख भी लेते हैं। सच कहूँ तो इन सारी बातों का मेरे बाहर किसी और के लिए कोई मतलब नहीं है। अगर कहीं किसी बिन्दु पर हो जाता है, तो वह मात्र संयोग ही होगा। इस तरह मेरा लिखा हुआ हर वाक्य मुझसे शुरू होता है और मुझ तक ही वापस लौटता है। इसलिए एकबार फ़िर कह रहा हूँ, यह आख़िरी साल है। इसके बाद यहाँ से अलविदा। इस ‘मीडियम’, इस ‘फ़ॉर्म’ के लिए इतना ही वक़्त लेकर आया था। जो यहाँ कह पाया, जो छिपाये रखा, उन सबकी ज़िम्मेदारी सिर्फ़ और सिर्फ़ मेरी है। दोस्त कुछ कम बने, पर कोई गम नहीं। उनकी जगह दिल में हमेशा बनी रहेगी। बस यही टीस उठती रहेगी कि ‘प्रवीण पाण्डेय’ कैसे बना जाता है? यह नहीं सीख पाया। और बाक़ी कभी, ऐसे ही।

बस इन सारी बातों के बीच लिखने बैठता, तो ध्यान बार-बार इस तरफ़ चला जाता। एक गाना है। रात जब ढल रही होती, झींगुर जब थक जाते, तब कहीं चाँद की छाव में, उसकी ठंडी-सी परछाईं में बैठ इसे सुनता रहता..

सितंबर 05, 2014

आज शिक्षक दिवस है

पाँच सितंबर, हर साल, शासकीय परंपरा में इसेशिक्षक दिवस  के रूप में मनाने की कवायद राष्ट्रीय स्तर पर देखी जा सकती है। इस साल तो यह अति राष्ट्रव्यापी  है। बहरहाल। यह दिन क्यों निश्चित किया गया, अपने आप में पूछे जाने लायक सवाल है। कई प्रबुद्धजन अपनी भूमिकाओं में इसे पूछ भी रहे हैं। प्रतिरोध कर अपनी असहमति व विरोध दर्ज़ करा रहे हैं। गंभीरता से इन सबको अपने दिमाग के अंदर बिठा रहा हूँ। फ़िर भी कहीं लगता है, हम केवल किसी दिन विशेष को चुन लिए जाने पर ही अपनी सारी ऊर्जा केन्द्रित कर रहे हैं। उसके पार जाने की नज़र शायद हममें नहीं है। सबकी शिक्षक की अपनी परिभाषाएँ हैं, अपने संदर्भ हैं, दायरें हैं। हमारा पहला ही सवाल यह होना चाहिए कि हम ‘शिक्षक’ के रूप में किसकी बात कर रहे हैं? उसका देशकाल, परिस्थिति क्या है? ख़ुद वह कहाँ स्थित (‘सिचुएट’) है?

हमें यह समझना होगा कि शिक्षक की कोई एक ‘प्रजाति’, इतने विविध स्तरों पर विभाजित शिक्षाप्रणाली में नहीं हो सकती। सबके अपने प्रस्थान बिन्दु हैं। और बचपन का प्रस्थान बिन्दु यदि प्राथमिक विद्यालय है, तब यहीं से यह विमर्श शुरू हो सकता है कि उस अध्यापक की ‘अस्मिता’ कैसी बन रही है। प्रोफ़ेसर कृष्ण कुमार  अँग्रेजी में जिसे मीक डिक्टेटर और हिन्दी में ‘दब्बू तानशाह’ कहते हैं, वह अपने इस विश्लेषण को और अधिक स्पष्ट और पुख्ता करते, आज, सबसे जल्दी विद्यालय पहुँचकर, एक अदद टीवी और दोपहर एक बजे से स्कूल आने वाले बच्चों के बैठने की व्यवस्था करने में, ख़ुद को व्यस्त कर लेंगे।

एक सरकारी विद्यालय में अध्यापक के रूप में नियुक्त होकर वह आया है। उसकी ‘शिक्षक’ के रूप में ‘भूमिका’ सबसे स्पष्ट रूप से उसके सामने है। उसे निश्चित पाठ्यक्रम एक निश्चित समयावधि में ख़त्म कर देना है। उसकी सहायता के लिए किताबें भी छापी जा चुकी हैं। इम्तिहान में पूछे जाने लायक सवाल भी उसे नहीं बनाने। बोर्ड की परीक्षा में तो उत्तर पुस्तिकाएँ भी बाहर ही कहीं अज्ञात स्थान पर जाँची जानी हैं। फ़िर उसे करना क्या है? कुछ भी तो नहीं। उसे सिर्फ़ पढ़ाना है और बस ‘दोपहर का भोजन’ बंटवाना है। बच्चों को आधार कार्ड बनवाने के लिए कहना हैं। बाकियों को बैंक खाते खुलवाने के लिए फ़ॉर्म भरने हैं। ईद और दिवाली पर इस ‘धर्मनिरपेक्ष राज्य’ द्वारा दी जाने वाली वजीफ़े की रकम बाँटनी हैं। कक्षा के भीतर ही अल्पसंख्यक, पिछड़े, अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के बच्चों से हलफ़नामे मँगवाने हैं, ताकि यह ‘विविधता’, उन्हे बाहरी समाज के ‘वास्तविक परिदृश्य’ से परिचित होने में उनकी मदद कर सके। और बाकी बचे बच्चों में सामाजिक रूप से अपनी सुदृढ़ आर्थिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक स्थिति का एहसास हो सके। हम सिर्फ़ सैद्धांतिक रूप से नए विषय के रूप में ‘सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन’ की किताबें पढ़ाते ही नहीं, उसे व्यवहार में भी ले आते हैं। कथनी और करनी में कोई फाँक नहीं है।

इसके अलावा हर बुधवार को ‘आइरन फॉसिल’ की नीली गोलियां भी कक्षा में बंटवानी हैं। उसने विद्यालय में नौकरी लगने से पहले, अल्पकालिक रूप से, अपने जिला अस्पताल में कंपाउंडर की नौकरी भी की थी। उस विशेष ज्ञान का उपयोग वह यहाँ कर सकता है। मास्टर कितना कितना काम करे? वह परेशान है। पर चुप है। अभी तक विधानसभा चुनावों की थकान उतरी नहीं थी कि लोकसभा चुनावों में ड्यूटी लगने का ‘सर्कुलर’ आफ़त बनकर आगया। पिछली गर्मी में ही तो जनसंख्या रजिस्टर का काम किसी तरह ख़त्म हुआ था। ख़ैर, इतनी गतिविधियों के सालभर चलने के बाद, इनके साथ, ग्यारहवीं कक्षा कुछ जादा ही थक जाती है। उसे अगले साल बोर्ड का इम्तिहान भी देना है। इसलिए चलिये एकबार उन्हे दिल्ली से बाहर कहीं पहाड़ों पर घुमा लाया जाये। जो दिल्ली रह गए हैं, उनके लिए ‘लोकल टूर’ हैं। वे यहीं घुमा लिए जाएँगे। इन बाहर जाने वाले बच्चों की चयन प्रक्रिया बड़ी भावुक हैं। कक्षा अध्यापक उन्ही को चुनते हैं, जिन्होने अपनी पढ़ाई छोड़, उसकी परवाह किए बिना अपना कीमती वक़्त, अध्यापक के ‘सीसीई’ रजिस्टरों में बारीकी से, सालभर अविलंब निष्पक्षभाव से नम्बर चढ़ाये हैं। उसे अपने इन अध्यापकों पर पूरा भरोसा है कि इसका फल निकट भविष्य में उसके ही पक्ष में जाएगा। जब वे मास्टर बोर्ड की परीक्षा में अपने प्रधानाचार्य के अलिखित, मौखिक आदेशानुसार, परीक्षा केंद्र पर नकल करवाने जाएँगे, तब उनकी नज़र सबसे पहले उस कर्मठ, आज्ञाकारी शिष्य पर पड़ेगी।

‘पाइथागोरस थियरम’ की तरह अंततः यह सिद्ध होता है कि हमारे शिक्षक-शिक्षिकाएँ, अध्यापक-अध्यापिकाएँ कोल्हू के बैल और गाय हैं। कितने सीधे प्राणी हैं। जो कह दो, कर देते हैं। इन सारे क्रियाकलापों को उनकी दृष्टि में किसी भी तरह ‘उत्पीड़न’ नहीं कहा जाता। यह उसकी ‘शैक्षिक भूमिकाओं’ का अवमूल्यन भी नहीं है। इस तरह यह उन परिधियों को विस्तार ही है।  इस साल रो-धोकर अध्यापक यूनियन के चुनाव भी हुए हैं, पर दोनों दलों के माँगपत्र में ऐसी कोई बात नहीं दिखती, जिससे किसी मूलभूत आमूलचूल परिवर्तन की उम्मीद लगाई जा सके। यह कितना विरोधाभासी है कि जो दल विजयी हुआ है, उसने ख़ुद को ‘आज़ाद ग्रुप’ के रूप में प्रचारित किया था। यहाँ अंटोनियो ग्रामसी, नॉम चॉम्सकी, हैनरी ज़ेरो, सबकी इन अध्यापकों से पब्लिक इंटलेक्चुअल के रूप में आगे आने की अपेक्षाएँ धरी की धरी रह जाती हैं। पाओलो फ़्रेरे, सांस्कृतिक हस्तक्षेप का प्रस्ताव इनके सामने रखते हैं, सब बेकार। मुक्तिकामी शिक्षा का ‘यूटोपिया’, ‘दिवास्वपन’ बनकर रह गया है। ख़ुद यह अध्यापक अभी तक स्वतंत्र नहीं हुए है।

{यह ऊपर वाला चित्र, अध्यापक पद का प्रतिनिधि रूप है, वहाँ उतनी ही सहजता से कोई स्त्री भी हो सकती है। यह किसी भी दुराव, पूर्वाग्रह से ग्रस्त नहीं है। दूसरी बात, ‘सेमिनार’ ने दिसंबर, सन दो हज़ार आठ, में अध्यापकों की स्थिति को लेकर अपना 592वां अंक THE NEGLECTED TEACHER शीर्षक के साथ निकाला था। जो पढ़ना चाहें, वह अँग्रेजी शब्द क्लिक करें। } 

सितंबर 02, 2014

दादी नहीं रहीं..

शनिवार तीस अगस्त, शाम साढ़े छह बजने के आधे घंटे बाद, लगभग सात बजे। उधर से छोटे जन का फ़ोन आया। दादी नहीं रहीं। दिमाग ठीक रहे, तब वाक्य भी ठीक आयें। पर ख़ैर। उनके ठीक होने का कोई मतलब नहीं रह गया, जिनको ठीक होना था, वो अब चली गईं। मंगलवार उन्हे लखनऊ से वापस ले आए। डॉक्टरों ने घर वापस भेज दिया। कहा होगा, अब कुछ नहीं हो सकता। इस ‘अब कुछ नहीं हो सकता’ सुनने से पहले, उसी सुबह किसी ‘सुलभ शौचालय’ के बाहर नहाने-धोने की बारी का इंतज़ार करते, पैंट की जेब में दस हज़ार रुपये रखते, किसी ‘ज़रूरतमंद’ ने देख लिए होंगे और मौका देखते ही मोबाइल के साथ पैंट लेकर चंपत हो गया। उसकी जरूरतें भी हमारी तरह कभी खत्म नहीं होंगी। वह फ़िर किसी कोने से छिपकर दाँव लगाएगा।

हर तरह के समाजों में इन्ही सबसे ‘ज़रूरतमंदों’ को ‘चोर’ कहकर पुकारा जाता है। उसने अपनी आवश्यकताओं के लिए यह क़दम उठाया होगा। पैसा किसी की ज़िंदगी से बड़ा थोड़े है। वह अपनी ज़िन्दगी बचा रहा है। यह उसकी जिजीविषा है। उसके जीने की ललक है। उसे तो किसी ‘डॉक्टर’ ने ऐसा कोई जवाब नहीं दिया। वह ज़िंदा रह सकता है। ऐसे ही ज़िंदा रहेगा। लेकिन इस तरह बड़ी निर्ममता से बुआ-फूफ़ा के वहाँ रुके रहने का आर्थिक आधार भी चला गया। चाय पीने के रुपये भी नहीं बचे। और इसतरह अब लखनऊ से भी उन अधूरी उम्मीदों के साथ खाली हाथ वापस लौट आए। दादी अब कभी ठीक नहीं होंगी। कह रहे हैं, दादी ‘पीजीआई’ में डॉक्टरों के एक सूई लगाने के बाद से कुछ भी नहीं बोली। बस पूरा-पूरा दिन सोती रहतीं। शरीर में कोई हरकत नहीं। सब ‘कोमा’ की तरह बताते रहते। पता नहीं कैसी दवाई थी। यहाँ गोण्डा, फैज़ाबाद होकर लखनऊ पहुँचने के दरमियान कुछ-कुछ बोलती रही थी। कुछ कह भी देती होंगी। पर वहाँ से मृत्यु की छाया में लौटना कितना असहनीय होगा। हम चाहकर भी सिर्फ़ दादी को मरता देख सकते हैं। कुछ कर नहीं सकते। कैसे चुप सब चहरे उन दादी की तरफ़ देखते होंगे। 

हारी-बीमारी में जो कुछ कर सकते थे, उन्हे हम सब ‘डॉक्टर’ कहते हैं। बहराइच में उन सबने क्या किया? अपनी जेबें भरी। क्या कभी वह सोचते भी होंगे, क्या कर रहे हैं। जो मरीज़ उनके सामने है, सिर्फ़ वही मरीज़ नहीं है, उसके इर्दगिर्द जितने भी उसे घेरे खड़े बैठे हैं, जितने भी छोटे-बड़े हैं, सब बीमार हैं। उस एक ‘स्त्री’ के ठीक हो जाने पर सब यकबयक ख़ुद ठीक हो जाएँगे। वो जो पैसा कर्जा काढ़कर लिया है, उसे दुगनी ताकत के साथ चुकाने के लिए ‘जंगलिया बाबा’ से लेकर ‘बेरिया’, ‘पाटन’ तक कोई मेला नहीं छोड़ेंगे। ‘अंडगवा’ से ‘रत्नापुर’, ‘गुधड़िया बाबा’ में झंडी लगा लगाकर कमाई करेंगे। इसबार तो ‘दरगाह मेला’ बीत गया, पर अगली बार रात-दिन एक करके, उस एक डंडे पर टिकी दुकान से पैसा बनाएँगे। और ऐसा करते करते चार पाँच साल बीत जाएँगे, फ़िर भी पैसा नहीं उतरेगा। तब एक तरक़ीब काम आएगी। एक से मांगेंगे दूसरे को चुका देंगे। और कर्ज बदस्तूर सिर पर वैसा-का-वैसा बना रहेगा। फ़िर एक साल आएगा, जब लड़की की शादी करनी होगी। तब उसी ‘पहले’ से उसी पैसे को उधार माँगकर कन्धों पर रख लेंगे। कि कभी ऐसे ही चुका देंगे। उधार से उधार चुका देने वाला गणित, ज़िन्दगी की किताब का सबसे मुश्किल अध्याय है।

बहराइच में जितने भी डॉक्टरों के महलनुमा घर हैं, उनमे, इन्ही जैसे न जाने कितनों के ख़ून-पसीने से माँगे, कर्ज़ों का पैसा लगा है। इसका कोई हिसाब नहीं कि उनके यहाँ कितनी ज़िंदगियाँ सही सलामत घर पहुँची। और कितनों की लखनऊ? लखनऊ यहाँ के लोगों के लिए अभी सपनों का शहर नहीं है। जो जितना कम पढ़ा लिखा है, वह उसे उतना डराता है। शायद हर शहर का ढाँचा कमोबेश उनके लिए एक-सा रहता हो। यहाँ ‘प्राइवेट क्लीनिक’ में पता ही नहीं चल पाया कि क्या परेशानी है? वह सही ‘डायग्नोज़’ नहीं कर पाये। बस अंदाज़े से दवाई देते रहे। ऐसा नहीं है कि वे सब कुछ कम डॉक्टर हैं। अपनी इसी क़ाबिलियत के दम पर हर शनिवार रात लखनऊ के लिए चल पड़ते हैं। इतवार हमारे बहराइच में किसी डॉक्टर ढूँढ़ना हो, तब पता चले, यहाँ कोई नहीं है। सब बड़े शहर चले गए हैं। जिसे मरना हो, एक दिन छोड़कर मरे। इन डॉक्टरों की जेब भरकर मरे। वह सब हर जुमेरात बाराबंकी में पाये जाने वाले ‘हकीम एम शाकिब’ हो जाते हैं। पता नहीं, अगर यहाँ ‘जिला अस्पताल’ न होता, तब कितने डॉक्टर, इस पिछड़े से जिले में स्वेच्छा से ‘प्रैक्टिस’ करने के लिए रुकते। उन्हे रोकने का कोई भी कारण यहाँ तो दिखता भी तो नहीं है।

लखनऊ के अस्पताल ने भी यहाँ की तरह हाथ खड़े कर दिये। पर उनके सामने दोषी थी, बहराइच के ‘क्लीनिक’ में दी गयी दवाइयाँ। कहने लगे सिर में जो मवाद, दिमागी बुखार के बाद बनना शुरू हुआ था, वह बनना रुका नहीं। अब हालत यह है कि वह पूरे शरीर में फैल गया है। इसके असर को इतने दिनों बाद पलटा नहीं जा सकता। हम अब कुछ नहीं कर सकते। आप इन्हे वापस घर ले जाइए। इतना सुनकर सब चुपचाप घर वापस लौट गए। कोई और चारा नहीं था। हम लोग यहाँ ‘गोमती एक्सप्रेस’ से वहाँ दादी को देखने की बात कर रहे थे। पर शायद हमने देर कर दी। उनके पास इतना वक़्त नहीं था। उस मड़हे के नीचे पड़ी चारपाई पर दादी भी दूसरी चारपाई की छाया बनकर लेट गईं। कोई हरकत नहीं। जिस करवट लिटा दो, उसी करवट लेटे रहतीं। कुछ भी नहीं बोलती। बिलकुल चुप। आँख खोल एकबार भी नहीं देखा, नेपालगंज से गुड़िया बुआ के साथ सीलू भी बगल में बैठी हैं। मंजू और संतोस बुआ भी साड़ी के पल्लू मुँह में दबाये कुछ-कुछ याद कर रही हैं। सारे फूफ़ा भी कभी अंदर कभी बाहर हो रहे हैं। कुछ समझ नहीं आ रहा क्या करें? गाँव के लोग बारी-बारी दादी को देखकर जा रहे हैं। पापा ने चार तारीख़ का टिकट बनवा लिया था। सीट नहीं मिली थी। किसी तरह जाते, देख आते। सब एकबार फ़िर आख़िरी उम्मीद में वापस बहराइच ले गए। डॉक्टरों ने भर्ती करने से मना कर दिया। पर पता नहीं कैसी उम्मीद के सामने, एक रात रखने के लिए तय्यार हो गए। ‘जिला अस्पताल’ में आँख खोल शायद आख़िरी बार अपने आस-पास देख लेना चाहती थीं। उस देख लेने के बाद, उन्होने कभी आँख नहीं खोली। शाम साढ़े छह बजे वह चली गईं।

दादी तब थीं, वो पन्ना..एक वो जो सड़क थी, एक वो जो पेड़ था ।

आवाज़ें..

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