नवंबर 22, 2014

राकेश: इसबार जाने के बाद

हम सब सपनों में रहने वाले लोग हैं। सपने देखते हैं। और चुप सो रहते हैं। उनमें कहीं कोई दीमक घुसने नहीं देते। बक्से के सबसे नीचे वाली तरी में छिपाये रहते हैं। कहीं कोई देख न ले। उसमें किसी की बेवजह आहट कोई खलल न डाल दे। सब वैसा का वैसा बना रहे जैसे सपनों में देखा है। अनछुआ। अनदेखा। रात बाग में दुधिया चाँदनी रौशनी में इन ठंडी हो गयी घास के तिनकों में अरझी हुई ओस की बूँद की तरह नंगे पैरों से छू जाती हों जैसे। इस सपने में कहीं कोई भी चीज़ इधर से उधर नहीं है, सब अपनी जगह हैं। उनका ऐसे होना दिल की धड़कनों में होती आवाज़ में सारंगी की बेकरार धुनों का मिल जाना है। किसी अधूरे ख़्वाब की टीस किसी तस्वीर में छिपी मुस्कान से बाहर निकलती जाती है।

उन पन्नों का पीला पड़ते जाना मेरी कनअँखियों से छिप नहीं पाता। तब मैं उठता हूँ। रज़ाई से निकलने का मन नहीं होता, तब भी निकलना ज़रूरी है। पिछली बार ऐसे ही रात खिड़की खुली रह गयी होगी। वहीं से कुछ ख़याल ऐसे ही कमरे में बिखरे रह गए थे। कटोरियाँ भर गईं थी। गिलास भरभर हम इन्हे ही पी रहे थे। थालियों में तुम्हारी रोटियाँ नहीं थी, यही अनछुए ख़याल रह गए थे।

राकेश  इसबार बिन कम्बल लिए ही छिंदवाड़ा से चल पड़ा। मुझे याद नहीं रहा उसके दिल्ली पहुँचने की तारीख़ पिछली साल की तरह नौ नवंबर है। वह यहाँ इस शहर से अधूरे ख़्वाब लिए वापस लौट गया। तब से कितनी बार यहाँ आया होगा। उसका हमेशा कुछ यहाँ छूटा रह जाता होगा। वह कभी कोशिश नहीं करता कि उस छूट गए पर दोबारा लौट जाए। लौटना इतना आसान नहीं। कितनी ही मासूम सी कल्पनायें उसके मन में दिल में उतरती रहती होंगी। वह कभी जताता नहीं है, कभी कुछ नहीं कहता बस वापस अपनी खोह में लौट जाता है। उसे वही सपनीली दुनिया बुलाती भी होगी पर पलभर भी नहीं ठहरता। आते-आते तबीयत दवाई लेने तक पहुँच गयी। गोल मार्किट, किसी कैमिस्ट की दुकान से कोई गोली ली थी। उसे शायद ऐसे ही सपने से मिलने की तय्यारी करनी थी। जितना बेपरवाह वह ख़ुद को दिखाने की कोशिश करता है, शायद वह उतना है नहीं। हमसब भी जो दिख रहे होते हैं वो होते कहाँ हैं? वह किसी भी तरह दीवार के पार दिखती दुनिया में पहुँच जाना चाहता है। अभी, तुरंत, झट से। जादू की तरह।

यह वहाँ पहुँचने में लगने वाली देरी से पैदा हुई ऊब है, जो हम सबको चिड़चिड़ा कर रही है। कितना मन करता है उड़कर वहाँ पहुँच जाएँ। ऊपर से यह दुनिया कैसी लगती होगी? कितने छोटे-छोटे से दिखते होंगे? हम सब कितनी हड़बड़ी में हैं। पर कोई सुन नहीं रहा। जैसे मेरे सपनों के चाँदनी चौक में आग लग जाये और भाई मतिदास चौक पर कूड़ा उठाने वाली गाड़ी के खराब हो जाने से लालकिले की तरफ़ से आग बुझाने वाली ‘फ़ायर ब्रिगेड’ वहीं फँस जाये। बेतरह हॉर्न की आवाज़ में गालियाँ धीमी पड़ गयी हैं। पर कहीं से कोई रास्ता नहीं सूझ रहा। मेरे सपनों, ख़्वाबों, ख़यालों का गोदाम दिल की बैठती धड़कनों के साथ राख़ बनकर बैठता जा रहा हो। पता नहीं कितने ऐसे ख़याल इन डरों को अपने अंदर समाये घूमते रहते हैं। यह कुछ न कर पाने की छटपटाहट बेचैनी के रास्ते नींद में बदल जाती है। हम एकबार फ़िर वहीं नए सपनों को ढूँढ़ने लगते हैं। उन्हे अपनी नसों में बहते ख़ून से दोबारा बुनने की कोशिश में लगे रहते हैं। और इसतरह वह हमेशा बगल में काँख से नीचे वाले तिल की तरह दिखते रहते हैं।

हम हार नहीं मानते। बस चुप रहते हैं। उन अधूरे सपनों को पूरा कर लेने को कोशिश करते रहते हैं। इधर मेरे मन में दिल में न जाने कितने साल पहले शादी का सपना था। सपने से बाहर मैंने शादी कर ली है। कई सारे सपने उसके साथ चले आए हैं। राकेश बीहू में अपने नए सपने बुन रहा है। बातों-बातों में उसकी फ़ोन पर सुनाई देती आवाज़ कहीं न कहीं उन अधबुने सपनों की नयी फ़ेहरिस्त की तरह है। यह हमारे सपनों से आगे के सपने हैं। आशीष की बिटिया भी उसके सपनों के साथ-साथ बड़ी हो रही है। हमसब अपने सपने ‘रिन्यू’ करवा रहे हों जैसे। उनके नए बने रहने में ही हम भी बने रहेंगे। वह हमारे अंदर साँस लेकर बड़े होते रहेंगे। उनके साथ हम भी चलते रहेंगे। आहिस्ते से, धीरे से। और ऐसी कितनी छोटी-सी मुलाक़ातों में हमारी बातें वापस आती रहेंगी।

यह एक फ़िलर पोस्ट है। इस तरफ़ अचानक दोपहर ध्यान गया कि बीते इतवार भी नौ नवंबर थी। पूरे एक साल बाद वह दोबारा दिल्ली में था। इसबार सिर्फ़ एक दिन के लिए। जब दोस्त दिल्ली से चले जाते हैं, तब ऐसे ही लौटते हैं। कम दिनों की किश्तों के साथ। यादगारी के लिए पिछले साल की आवाज़ लगा रहा हूँ। इसकी तारीख़ दोबारा, नौ नवंबर। ध्यान से, आराम से, अकेले में सुनना। 


नवंबर 20, 2014

एक अकेला शहर में..

अकेले खाली कमरे में बैठे रहने का सुख  क्या होता है, इसे भरे हुए लोग कभी नहीं जान पाएंगे। उनकी उन दिवारों पर घूमती छिपकलियों से कभी बात नहीं होगी। वे कभी अकेले नहीं होना चाहेंगे। वे कभी छत से झड़ते पलस्तर को ‘स्लो मोशन’ में देख लेने वाली आँखों वाले नहीं हो सकते। उनका बुरादे की तरह झड़ना किसी याद के वापस आने की तरह है। मैं यहाँ इस छतवाले कमरे में बैठकर इसी तरह बनता रहा। यह अकेलापन मुझे डराता नहीं है। जब कभी दिन बीते यहाँ नहीं आपाता तब अंदर से किसी ततईया के डंक से परेशान भागता रहता हूँ। आलोक पता नहीं फ़िर क्यों उस रात फ़ोन पर मेरे इस ‘अकेलेपन ’ को दोहरा रहा था। उसे मेरे अंदर ढूँढ़ रहा था । यह शायद उसकी समझ और मेरी समझ में कुछ मूलभूत अंतर के कारण रहा होगा। यह हमारे ज़िंदगी जीने के तरीके अलग-अलग तरीकों से हमारे अंदर  निर्मित होता होगा।

आज मैं चाहकर भी इसपर बात करने के मूड में नहीं हूँ। मूड नहीं है, फ़िर भी हट नहीं रहा। बैठा हुआ हूँ। मेरा अकेलापन अस्तित्ववादियों की तरह पूंजीवादी समाज में उत्पादन प्रणालियों में परिवर्तनों के बाद उपजी इन नगरीय संरचनाओं के भीतर दिखता भले हो लेकिन यह कहीं-न-कहीं ‘एकान्त’ के निकट अधिक है। मेरे पास भाषाविज्ञान की किसी विशिष्ट शाखा का ज्ञान नहीं है, जिसके बाद इनदोनों ‘शब्दों के चिह्नशास्त्र’ को पढ़कर इस अंतर को रेखांकित कर सकूँ। यह बस सतही समझ का फेर है, जो मुझे, मेरे भीतर इस खाली जगह को इसतरह भरता है। यह सच है कि इस जगह को लगातार व्यक्तिगत या निजी बनाता गया, फिर भी यह उसमें मेरे भावबोध समाजिकता या किन्ही अन्य भूमिकाओं के प्रति किसी भी किस्म का नकार नहीं दिखता। न किसी रूप में प्रकट करता है। यह एक सीमा तक ‘उदासीनता’ के रूप में भले दिखे पर उन बाहरी परतों की छवियों के बाद उसमें ऐसे किसी तत्व की उपस्थिति को नहीं देखा जा सकता। और अगर कुछ दिखेगा भी तो उसे इसतरह नामित नहीं किया जा सकेगा।

सब एक साँचे में ढलते हुए भी एक जैसे नहीं हो सकते, और चूँकि हम भी सबकी तरह एक चेतन प्राणी है, तब उनमें न दिख रही अदृश्य विविधताएँ, उन्हे एक जैसा बनाए जाने की सारी प्रक्रियाओं को ध्वस्त करती चलेंगी। पर यहीं इसी बिन्दु पर सबसे जादा संभलकर चलने की ज़रूरत होती हैं। जहाँ समाज, संस्कृति, राष्ट्र, परिवार, परिवेश, वातावरण भिन्न-भिन्न होने के बाद, जो बड़ा दायरा होता है, वहाँ की वृहतर अस्मिताएं, उन्हे अपने द्वारा सम्पन्न कराये जाने वाली भूमिकाओं से परिचित ही नहीं करवाएँगी अपितु अपेक्षाएँ भी रखेंगी। तभी हमारी आदतें, इच्छाएँ, भावनाएँ, प्रेम, स्वाद, स्पर्श सबकुछ इकहरा होता जाता है। हम इस समाज में खुद को व्यवस्थित करने की कोशिशें करने लगते हैं। हम हम नहीं रह जाते, कुछ और हो जाते हैं। तब हमारा स्वतंत्र अस्तित्व कुछ नहीं रह पाता। वह इस समाज में विलीन हो जाता है। यह उसमें चीनी के बजाय नमक की तरह घुलना है।

ऐसा नहीं है कि ऐसी स्थिति में प्रतिरोधी स्वर नहीं उठते। न मैं यह कह रहा हूँ कि मेरी तरफ़ से ऐसी कोई सुचिन्तित कोशिश कभी की गयी थी। फ़िर भी अगर आज भी तुम्हें लगता है कि यह एकान्त रचनात्मक न होकर अकेलेपन की त्रासदी लिए हुए है; वहाँ चेखव की कहानियों का संत्रास है या मोहन राकेश के ‘अँधेरे बंद कमरे’ वाले ‘मेटाफ़र’ जैसी कोई बात है, तो दोस्त, तुम्हें उसे कहना चाहिए। मुझे भी पता चले वह क्या है, जो मेरे सामने होते हुए भी मुझे दिख नहीं रहा। मेरी वह कौनसी छवि है (?) जो इतनी स्पष्टता से मेरी इस व्याख्या को ख़ारिज कर रही है। इतने दिनों में एक छूटी बात यह समझ में आती लग रही है कि मेरे इसतरह ‘आत्मकेन्द्रित’ होते जाने की वजह से बाहर कुछ दिखाई भी नहीं देता। जो कुछ भी है वह मेरे भीतर से बाहर जा रहा है। जिन बातों को लिख नहीं पाता उनके संदर्भ में यह भी दिखता है वह प्रत्यक्षतः मुझसे जुड़ी हुई नहीं होती। यह किसी तरह के व्यक्तित्व के रूप में गढ़ रही हैं (?) उससे मेरी किस तरह की छवि प्रसारित हो रही है, उसपर बिन सोचे कहने की आदत में कुछ बदलाव की ज़रूरत है।

इसबार तुम बड़े आश्वस्त हो कि अब लिख दोगे। मैं भी इंतेज़ार कर रहा हूँ। देखेँ तुम कब कहते हो।

नवंबर 19, 2014

बातें बे-वजह

वह अचानक एक पोस्ट में ख़ुद को पाकर  हैरान रह गया। उसकी हैरानी को डर में बदलते देखने का एहसास किसी भी तरह से रोमांचित नहीं कर रहा था। वहाँ उसका नाम नहीं था, बस कुछ इशारे थे। बहुत बारीक-सी सीवन उधेड़ते सब उसे देख लेते। यह कैसा होता होगा, जब कोई हमारे बारे में लिखने के लिए सोचता होगा? उसके सामने हमारी कौनसी छवि जा रही है, जिसे वह अपने यहाँ रख लेगी। प्यार करना भी कुछ-कुछ इसी तरह की बातों से भर जाना होगा। हम कहना चाहते हैं, पर कह नहीं पाते। हम इतनी पास हैं कि छूकर उस चेहरे को हमेशा के लिए अपने अंदर छिपाये रख सकते हैं। पर वह छुअन अजीब-सी सिहरन बनकर हमारी बाँछों से शुरू होकर काँखों के बालों में जाकर सिमट जाती है। इसे वहीं पसीने की दुर्गंध में उलझना भी कह सकते हैं, जो सस्ते डीओ के इस्तेमाल के बाद उपजी होगी। उसके चौबीस घंटे तक असरदार रहने के दावे हमारी तरह ही धराशाही हो चुके होंगे।

यह तकलीफ़ उस लड़की की भी है। वह दिल्ली से एमए हिन्दी  का रही है। एक शराब पीने वाले पिता की बेटी के इस कोर्स में दाख़िला लेने की सूचना को और किस तरह से लेना चाहिए? समझ नहीं पाता। वह सिलेबस में लगी कहानियों में ख़ुद को गुम कर लेगी। वह भी मन्नू भण्डारी की तरह ‘मिराण्डा हाउस’ में पढ़ाने के सपने बुनेगी। उसे भी राजेन्द्र यादव के साथ ‘एक इंच मुस्कान’ की तरह कोई अभिनव प्रयोग करना है। इसके लिए वह भरपूर कोशिश भी कर रही है। उन छूट गयी कक्षाओं में पढ़ाई गयी पाठ्यसामाग्री को उसकी एक अच्छी सहेली सहेजकर फ़ोटोकॉपी वाले भईया के पास हिदायत के साथ छोड़ जाती। वह इलाहाबाद से आए लड़के के साथ कभी रिज में उस विद्यापति को लिखने के लिए सामाग्री उपलब्ध करती, तो कभी घनानन्द किन्ही बरसात वाली सुबहों को विचलित मन के साथ अपने जिगरी दोस्त के कमरे पर उसके इंतेज़ार में दाल, चावल, रोटी बनाकर सो चुके होते।

उसकी बहन लक्ष्मी नगर से अपनी कोचिंग खत्म करने के बाद वापस लौट रही है। दिल्ली मेट्रो ने इस तरह से भी शाहदरा को जोड़ा है, वह दिख जाता है। वह यमुना बैंक पर उतारने वाली है और घंटा-डेढ़ घंटा अपने बॉयफ्रेंड के साथ वहीं बातें करके घर लौटेगी। ऐसा उसने मन में सोचा और बगल में खड़ी अपनी सहेली को भी बताया। एक सस्ते से मोबाइल फ़ोन को हाथ में समेटे वह अपनी सहेले के साथ खड़ी है। बैठने की कोई सीट नहीं है। तभी मुड़ी गर्दन के साथ यह सब देखते-देखते उसका फ़ोन घरघराया। अगर घंटी बजती तो पता नहीं कौनसी रिंगटोन होती? शायद हनी सिंह के किसी गाने की यह परसो बीते छठ वाली शारदा सिन्हा की आवाज़ में कोई लोकगीत सुनाई देता। अब प्लान में थोड़ा चेंज है। तुम मुझे उस पार्क में ले जाओगे न, मुझे पता है। इतना कहकर वह फ़ोन रख देती है। अब वह इंद्रप्रस्थ स्टेशन पर उतरेगी। वहीं कोई पार्क भी है, पास में। ऐसा उसने कहा और चुप हो गयी।

ऐसी कितनी ही कहानियाँ उसके दिमाग में  घूमती रहती हैं। पर वह उन्हे कह नहीं पाता। उन्हे समेटते-समेटते मन कहीं और भागने लगता है। यहीं उसे अपने दोस्त की कही बात याद आ जाती है। वह अकेला है, वह उसे बार-बार याद दिलाता। पर उसे नहीं पता कि वह जितना कहता है, उससे कई गुना नहीं कहता। उन्हे कह देना वह ज़रूरी भी नहीं समझता। वह बस उसकी यह बात सुन लेता। ऐसे सुनकर वह चुप सा कहीं छत पर बनी किसी बरसाती में इस बड़े से महानगर की भीड़ में गुम रह जाता। कोई उसे जान नहीं पाता। कोई ढूँढ नहीं पाता। कि जिससे हम कल मिले थे, उसने हमारी थोड़ी-सी ज़िन्दगी चुराकर, हमें कहीं लिख दिया है। वह उसकी कही हरबात में छिपे हैं, दिख रहे हैं। लेकिन इसतरह वह अपने उस दोस्त को कैसे बताए, इतने सारे लोगों के साथ रहते हुए वह अकेला कैसे है? वह कभी नहीं बोला। वह कभी उसे समझा नहीं पाया कि किसी खाली कमरे में बैठे रहने का सुख क्या है ?

नवंबर 15, 2014

मेरे अंदर अधूरी अदेखी कहानी का सपना..

मैं एक कहानी लिखना चाहता हूँ। पता नहीं यह कितने साल पहले मेरे मन में आई बात है। यह कहानी सात आठ साल से मेरे अंदर ही अंदर खुद को बुन रही है। वह कभी बाहर नहीं आ सकी। उसे कभी लिख नहीं सका। मुझे लगने लगा कहानी लिखने का हुनर मुझमें नहीं है। मैं, जिसे कहानी कहते हैं, उसे बरत नहीं पा रहा। कभी इतने धैर्य के साथ मुझमें बैठने, एक ही प्लॉट पर रुके रहने का एकाकीपन मेरे अंदर है, पर उन्हे टुकड़ों-टुकड़ों में कह देने की जल्दबाज़ी उन्हे कहीं डायरी के पन्नों में कई सारी कहानियों को समेटे हुए होगी। यह हमारे समाज की संरचना का विखंडन भी है। जिस तरह उमर बढ़ने के साथ-साथ हम जिन नगरीय गतिकी के भीतर अपने बीतते सालों में एक-एक दिन की ऊब से बाहर निकालने की जद्दोजहद में, उन सब बातों को समेट पाने के लिए जिन ज़रूरी बातों की ज़रूरत होती होगी, वह मेरे दिमाग मेरे दिल से गायब हैं शायद। उस तरह मेरे अंदर कई सारी बातें एकसाथ गुजरती तो रहती हैं, पर उन्हे बुनने वाले रेशम के धागे नहीं हैं। उन्हे कह देने की जल्दबाज़ी में कई बातें ऐसी भी होंगी, जो वहीं कहीं पीछे दबी रह जाती होंगी, कभी दिख नहीं पाती। यह मेरे दिल की धड़कन की कोई परत रही होगी शायद। चमकीली-सी। आँखें चुंधिया देने वाली।

फ़िर जब मनोहरश्याम जोशी  को पढ़ना शुरू किया, तब दिल को दिलासा दिया करता। सोचता, मेरे पास अभी भी कुछ वक़्त है। हमारे लिखने का वक़्त भी आएगा। उनकी पहली कहानी तीस पार कर जाने के बाद लिखी गयी। कभी हम भी उस कतार में खड़े होंगे। हम भी कभी कसप  लिखेंगे। मुंगेरी लाल के हसीन सपने देखते रहे। इधर दिख रहा है, तीन महीने बाद हमारी उमर तीन दशक की हो जाएगी। और इन सारी बातों का हासिल एक अधबुनी अधूरी कहानी भी नहीं है। इतना होने पर भी मुक्तिबोध  ने बहुत सहारा दिया। वह जैसे मेरे लिए ही एक साहित्यिक की डायरी  में रचना प्रक्रिया के तीन क्षण बताते हैं। अभी किस क्षण तक पहुँच पाया हूँ, हमेशा यही सोचता रहता। अभी दिवाली पर अपने एमए के नोट्स में एक पुर्ज़े पर कुछ लिखा मिल गया। तीव्र अनुभूति के बाद दूसरा चरण है, उसे अंदर-ही-अंदर उमड़ने घुमड़ने का अवसर। वह किस हद तक अपना मूल स्वरूप खो देता है? प्रकट होने पर कैसा दिखता है? पता नहीं शायद उन्होनेकॉलरीज़ का कल्पना सिद्धान्त इस तरह समझा होगा। मैंने शायद इस बिन्दु पर दोनों को मिला दिया हैं।

सालों बातें छिपाये रखने में माहिर हूँ। कभी कहता नहीं। पर जबसे यह ब्लॉग मिला है, तब से मन के एक कोने में इसका दख़ल बढ़ गया है। जब कभी थोड़ा भी भारी महसूस होता लूस शटिंग करने यहाँ बैठने लगा। इसने न जाने मेरे हिस्से की कितनी बातें अपने अंदर छिपाये रखी हैं। यह छिपाना छिपाने की तरह नहीं है। ख़ुद मुझे नहीं लगता कि वह सब कहने के लिए किसी हिम्मत की ज़रूरत है। यह डर अपने आप सृजित किया गया भय है। जिसका मूल्य शून्य है। वह बस भावातिरेक है, जो किसी भी बात को उन गहराईयों से बाहर निकाल लाता है। वहीं कहीं भीतर एक बात यह भी लगती रही कि दरअसल यह मेरे दिल के पन्ने हैं, जिन्हें कुछ क़तर-ब्योंत के बाद यहाँ बेतरतीब रखने लगा। इनका बेतरतीब होना मेरा मन का बिखर जाना है। इन्हे साथ-साथ रखने पर दिखने वाली तस्वीर, किसी खो गए शहर में किसी गुम हो गयी आवाज़ की तरह होगी। इन बिखरे हुए टुकड़ों को एक साथ रखने के बाद यह कृति कुछ-कुछ ऐसी बनती दिख रही है, जैसे नेकचंद जी ने किसी टूट गए क्रॉकरी सेट से कोई कामचलाऊ टी-सेट बना लिया हो। जिसमें मेहमानों के लिए चाय डालने पर चाय चाय नहीं रह जाती कुछ और हो जाती है। फ़िर भी वह उसे चाय समझकर पी जाते हैं।

पर लगता है मेरा मन ऐसा पात्र नहीं है। इसका मिक्सर-ग्राइंडर काम नहीं कर करता। पता नहीं कितनी भारी शामों में संजीव सर को फोन पर कितनी तरहों से अपने अंदर गुजरने वाले इन क्षणों की बेचैनी को बताता रहा हूँ। कभी ऐसा नहीं हुआ के उन सारे खाली एकांतिक अवकाशों में उन अधूरी बातों को कातकर कोई मुकम्मल शक्ल दे सकूँ। वह किसी बिछौनी की तरह भी काम में नहीं आती। गुदड़ी बनाए जाने लायक सिलाई भी नहीं कर पाता। बस उन सारी उलझनों में उलझकर रह जाता हूँ। कुछ कर नहीं पाता। थोड़े दिन इन्ही बातों में ख़र्च हो जाते हैं। कुछ जो मन में होता है वह इस रास्ते से बाहर निकल आता है और जिसे यहाँ नहीं कह पाता, वह चिलपर्क या पार्कर कुइंक की नीली स्याही में डूबकर कागज़ पर उतरते रहते हैं। इसतरह एकबार फ़िर अपने मन को मना लेता हूँ कि अभी थोड़ा और वक़्त बचा है। थोड़ा और लिखना अभी बाकी रह गया है। अभी तो सही से लिखने की तहज़ीब सिखनी है। फ़िर सोचता हूँ, यह सब बहाने हैं। अंदर से मुझे पता है, वह कहानी कभी बाहर नहीं आ सकेगी। मैं उसे ऐसे ही याद करता रहूँगा। वह मेरे अंदर ऐसे ही बनती बिगड़ती रहेगी। कोई धागा ऐसी ही चटककर यहाँ छिटक आएगा। मैं एकबार फ़िर फ़ोन उठाऊंगा और उन्हे फ़ोन करूंगा। और इसतरह यह सारी बातें एकएक कर मेरे अंदर अपने आप फ़िर से घूमने लगेंगी।

फ़िर ऐसे ही एक ठंडी-सी दोपहर होते-होते यह सारी बातें मेरे अंदर एक चक्कर लगाकर ठहर जाएँगी। मैं फ़िर कुछ नहीं कर पाऊँगा।

नवंबर 12, 2014

ठहरे हुए दिन..

नवंबर आ गया है और कल से ठंड भी कुछ बढ़ गयी है। कश्मीर में बर्फ़ गिरी है। बर्फ़ इंडिया गेट पर उतनी ही अजीब होगी जैसे कि कल एककाँग्रेसी नेता के अपनी लड़कियों को बोझ बताने वाले हलफ़नामे पर रोष प्रकट करते राम माधव थे। इधर कई दिनों से गायब था। बीच में कईबार लौटने की कोशिश भी की। पर तीन-चार जगह हाथ-पैर बझाए रहने के बाद धीरे-धीरे यह समझ आता रहा कि ऐसे काम नहीं चलेगा। कई अधूरे ड्राफ़्ट अधूरी बातों की तरह डैशबोर्ड में पड़े हैं। कभी-कभी लिखने का इतना मन करता है कि गति से आते ख़यालों को उसी अनुपात में उतनी ही तीव्रता से कह पाता। यह ऐसी स्थिति है जिसमें दिमाग भले खाली लगता हो पर असल में वह इतना भारी होता है कि कुछ करने लायक नहीं रह पाता।

कुछ-कुछ वैसा ही जैसा कि हम बिलकुल नए तरीके से सोचना चाहें, उस सोचे हुए अजाने ख़याल को ऐसी भाषा में लिखना चाहें जो हमने भी कभी इस्तेमाल न की हो। उसे कहने के लिए घण्टों एक-एक शब्द पर ठहरते हुए आगे बढ़ने की कोशिश करना। पर हरबार ‘दिवाल’ पर टंगी घड़ी की तरह हम भी हर बारह घंटे बाद ‘खुद बखुद’ वही वक़्त दोहरा रहे होते हैं। उस दोहराने में दिन बदलता है, तारीख़ बदलती है, साल बदलता है, पर हम कहीं उन्ही बासी उबासी लेते, सोये हुए मुँह की तरह बदबू से भरे रहते हैं। इस गंध के हम इतने अभ्यस्त हो जाते हैं कि यह हमारे बचपन से चलकर हमारी जवानी से लेकर बुढ़ापे तक हमारे साथ रहती है और हम कस्तुरी मृग की तरह अपनी नाभि में समाई गंध को ढूँढ़ने की कोशिश नहीं करते। बस भटकते रहते हैं। 

यह भाषा में निर्मल वर्मा हो जाना नहीं है। न विनोद कुमार शुक्ल की तरह होते रहना है। यह ख़ुद में ख़ुद की तलाश है। कहीं कोई गुमशुदा तलाश केंद्र, नयी कोतवाली नहीं है, जहाँ कभी पाल गोमरा का स्कूटर दिख जाएगा। हम बस हैं। यहीं हैं। कहीं जा नहीं रहे हैं। इन बीतते दिनों में यह मेरी ऊब से बचने की कोशिश है, जो मेरे भीतर से निकाल कर मेरे व्यक्तित्व पर छा गयी है। असल में ऐसा कुछ भी न हो, पर लिखते समय इस पंक्ति में मुझे ढक लिया हैं। मैं किसी ‘इंटरव्यू’ में अयोग्य घोषित नहीं होना चाहता। उन सारी अनकही प्रेमिकाओं को फ़िर अपने अंदर से बाहर निकालते हुए सब बताना चाहता हूँ। उनसे प्रेम करते रहने में मुझे अयोग्य नहीं होना। नहीं चाहता कि एक कमरे वाले घर से एकएक कर सब चली जाएँ। पर किसी भी बहाने से रोके भी नहीं रहना चाहता।

यह किसी शैली में लगातार लिखते रहने की छटपटाहट भी हो सकती है, जिसे इस रूप में कभी प्रकट नहीं कर सका। हो सकता है यह किसी और विधा में जाने से पहले का अवकाश हो। या कि एक तरह से उन सारे इकहरे अनुभवों को दोहराते रहने से कोई फेंच अंदर तक गड़ी रह गयी हो। सोचता हूँ, इसी तरह से लिखते रहने के बाद भी मेरे पास बहुतकुछ बचा रह गया है। उस बचे हुए सामान को टाँगने वाली अलगनी, उन्हे ऊँचे कहीं रख देने वाले ताखे, कहीं पंखे की जगह उन छत से बंधे सिकहर पर पतीली में दूध के बगल कितनी बातें रख देने की सहूलियतें होंगी। दिल के दिल बने रहने के लिए ज़रूरी है, उनका बाहर आते रहना। उन्हे आने के लिए, उस पर चलने के लिए शायद मढ़हा तान रहा हूँ। हो सकता है कुछ भी निकल कर सामने न आ पाये। या हो सकता है इस संक्रमण काल में कुछ संधियों, समासों, कारक चिह्नों के बाद कोई मेरे इंतज़ार में वहीं खपरैल वाले आँगन में मिल जाये।

और आख़िरी में एक नोट यह कि ग्यारहवीं या बारहवीं पंक्ति में आए हुए ‘दिवाल’ और ‘खुद बखुद’ मुक्तिबोध की किसी याद नहीं आ रही कविता से हूबहू उड़ा लिए गए हैं। इसे यहाँ लिखने से पहले हम भी दिवार नहीं बोलते हैं, पर शायद अमिताभ बच्चन का कोई प्रभाव बचपन में अवचेतन पर पड़ गया होगा। शायद इसलिए बोलते हुए भी कभी लिखा नहीं। बाकी सब वैसा ही है। वैसे सच कहूँ तो यह इतने दिनों पर पर्देदारी है। बहुत सारी बातें हैं, जिन्हे फ़िर कहूँगा। कभी। या ऐसे ही बहानों में उन्हे छिपा ले जाऊँगा।

'पाल गोमरा 'वाले उदय प्रकाश  पर तीन ज़रूरी पन्ने: संजीव कुमार, प्रियदर्शन, अरुण माहेश्वरी

यह त्वररित समय है, जैसे कि यह पोस्ट ख़ुद। 
जिस दिन लिखी गयी, उसके चौबीस घंटे से भी कम वक़्त में अगली सुबह हिंदुस्तान में थी। इसतरह यह तारीख़ हुई तेरह नवंबर, 2014। नाम वही, ठहरे हुए दिन। आज देखा, परसो पंद्रह नवंबर, शनिवार, ट्रिब्यून में भी यह पोस्ट आई है, ठहरे हुए दिनों की बात.

आवाज़ें..

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