दिसंबर 29, 2014

आखिरी पोस्ट: अलविदा ब्लॉग..

साल ख़त्म होते-होते फ़िर लगने लगा इस नाम के साथ बस यहीं तक  यह मेरे हारे हुए दिनों का नाम है। जैसे बिन बताए एक दिन अचानक इसे शुरू किया था, आज अचानक बंद कर रहा हूँ। इस भाववाचक संज्ञा से निकली ध्वनियाँ मेरे व्यक्तित्व पर इस कदर छा गयी हैं, जिनसे अब निकलना चाहता हूँ। कैसे भी करके इससे दूर चले जाना है। इतनी दूर कि इसकी परछाईं भी धुँधली दिखने लगे। आँख दुखने पर भी दिखाई न दे। किसी भी तरह इसपर लौट न सकूँ..

चाहते न चाहते इसकी अपनी सीमाएँ हैं, जिनके बीच यह बनता-बिगड़ता रहा यह ख़ुद को बिना किसी खाँचे गढ़ते रहने की तरह था। कुछ-कुछ मेरे अवचेतन के खुले पन्नों की किताब की तरह। कितना छटपटाता रहा इससे छूट जाने के लिए.. यह मेरी व्यक्तिगत सीमाओं और मेरे मन से कितना बाहर जाता रहा, कभी महसूस नहीं कर पाया। बस अंदर ही अंदर लगता वही लिखुंगा जो मन करेगा। तभी लिखुंगा जब मन करेगा। कभी-कभी यह भी लगता, मुझसे बड़ा नाम इस ब्लॉग का नाम है। मेरा मन इसके नीचे कहीं दब गया है।

हमेशा इस जगह को निजी बना लेने को लेकर सचेत रहा। पर मेरे सोचने से भी क्या होने वाला था ? इन सालों में जैसा होता गया, यह उसी तरह के बेरंग रंगों में रंगता गया। मैं ढूँढ़ता रहा अपनी तरह के लोग। कुछ ऐसे जिनमें कुछ-कुछ छूटा रह जाता। फ़िर कभी मिलते, फ़िर कुछ छूट जाते कुछ छूटने, कुछ मिलने में ज़िन्दगी कुछ-कुछ चलती रहती।

असल में कोई मिलना नहीं था। पर कोई नहीं मिला, ऐसा नहीं है। यहाँ लिखने के दिन शुरू ही हुए थे, तब जनसत्ता में कभी-कभी उदय प्रकाश अपने ब्लॉग के साथ मिल जाते। चन्दन पाण्डे रिवॉल्वर लिख चुके थे, भूलना लिखने की तय्यारी में थे। हम भी कभी जनसत्ता के पन्नों होंगे, कभी सोचा न था। सत्रह फरवरी दो हज़ार ग्यारह, यही तारीख़ थी जब मेरी पहली पोस्ट आई। तब ब्लॉग था ही कितना पुराना? लिखते हुए तीन महीने हुए थे और कुल पंद्रह पोस्ट थीं। मैंने सिर्फ़ एक ईमेल भेजा था।

आज तक नहीं पता, उस मेल को वहाँ दफ़्तर में किसने देखा होगा? पता नहीं उन्होने क्या सोचकर वह पोस्ट वहाँ लगाई होगी? आज तक वे मेरे लिए अनाम हैं। उन्हे जान नहीं पाया। शायद उनकी ताकत ऐसे ही सामने न आने में है।

पता नहीं वह कैसे क्षण थे? उन क्षणों को लिखते याद करते मेरी आँखें धुँधलाती जा रही हैं। मैं चीख़ चीख़कर चिल्लाना चाहता था। कहीं छिपकर थोड़ी देर रोना चाहता था। चेहरे पर उन आँसुओं की बनी लकीरों को आईने में देखना चाहता था। उस दिन लगा बिन किसी को जाने, मैं भी वहाँ हो सकता था। यह जो एहसास था, उसे आज तक अपने अंदर महसूस करता रहा हूँ।

अगर जनसत्ता का यह कॉलम न होता, तो शायद उन हताश परेशान दिनों में कब का पीछे छूट जाता। कहीं गुम हो जाता। चुप हो जाता। वहाँ बने रहना पीछे आँगन में ठंडे दिनों में लहलहाते सरसो के बीच उकड़ू गर्दन छिपाये बैठे रहने की तरह है।

पर आज मन कर रहा है, यहाँ से कहीं भाग जाऊँ।  कहीं किसी नए नाम से, नयी जगह पहुँच जाऊँ। मन करता है, महाबीर भाटी की तरह ट्रक चलाते-चलाते, किसी सुनसान जगह पर अपना घर बनाऊँ। इस चारदीवारी में जब-जब मैंने कुछ और लिखना चाहा, वह इसके बने बनाए ढाँचे में अपने आप ढलता गया।  यह इसकी सबसे बड़ी सीमा बनती गयी, जिसे चाहते हुए भी तोड़ नहीं पाया। इन बीते सालों में सारी स्थापित संरचनाओं को लगातार तोड़ता रहा इसलिए आज इस संरचना को भी तोड़ रहा हूँ। जा रहा हूँ।

सोचता हूँ, जब हम कहीं के लिए  चले नहीं थे, हमें कहीं पहुँचना नहीं था; तब इसे बंद करने में किसी भी तरह सोचना बेकार है। शायद इसी किसी अनाम मुकाम पर पहुँचकर इसे रुक जाना था। जो किसी परिभाषा में अटता न हो। जिसे कोई किसी भी तरह से बंद करने लायक स्थिति न कहता हो, वहीं आकर रुक जाना, किसी को असहज स्थिति नहीं लगनी चाहिए। यहाँ रुके रहने ख़ुद को दोहराए जाते रहने पर यह कोई कल्ट ब्लॉग नहीं बनने वाला। अंदर से कहीं लगता है, जाने का यह सबसे सही वक़्त है।

फ़िर हम कौन-सा बहुत बड़ा मकसद लेकर चले थे कि कहीं पीछे छूट जाएँगे? यहाँ अब ठहरने का मन  नहीं है, तो नहीं है..यहाँ और नहीं ठहरे रहना चाहता सागर, इसतरह मैं जा रहा हूँ। अपनी पाँच साल वाली मोहोलत भी पूरी नहीं कर पाया। बस इसका आख़िरी सपना एक किताब का था, वह अभी भी यहीं कहीं किसी पन्ने के नीचे दबा रह गया होगा। उसे ढूँढ़कर बचाए रखना है। 

पर सवाल है, क्या इसे बंद कर नए पते पर जा रहा हूँ? अभी नहीं पता। अभी कोई नाम नहीं ढूँढ़ा है। कोई टैगलाइन नहीं है। नए पते पर जा भी रहा हूँ या नहीं, यह भी नहीं पता। आगे क्या करूँगा? नहीं जानता। अभी भी पता नहीं कितनी पोस्टें ड्राफ़्ट में रखी हुई हैं। उन्हे कभी पूरा ही नहीं कर पाया। पता नहीं कितने दिन, महीने, साल इस नाम से छूटने में लग जाएँ? लेकिन मुझे पता है, इस न्यू मीडिया के पावर स्ट्रक्चर में मैं कहीं नहीं ठहरता। मेरी कोई पहचान नहीं है। मुझे जानते ही कितने लोग हैं? लोग यहाँ उन्हे ही जान रहे हैं, जिन्हे वह पहले से जानते हैं। यही इस माध्यम की सबसे बड़ी कमज़ोरी है। जिससे पार पाना इतना आसान नहीं।

इतना होने पर भी हो सकता है, कहीं और लिखने लगूँ, तब उसमें और इसमें कोई अंतर ही न दिख पाये। पर अब इस जगह की घुटन से और घुटना नहीं चाहता। थकने लगा हूँ साँसें भारी हो जाती हैं। चला नहीं जाता अब ख़ुद से और हारना नहीं चाहता

हो सकता है, जितनी बातें सोचकर चला था, उतनी कह नहीं पाया।  जिस तरह उन्हे कहा जाना चाहिए था, वह वैसी नहीं उतर पायीं होंउन सबको कहते हुए कुछ छूटी रह गयी होंगीपर अभी के लिए बस अलविदा। मिलेंगे कहीं किसी मोड़ पर..!!

इस ऑडिओ में आवाज़ मेरी नहीं है, पर इसे कहने वाला मैं ही हूँ। वैसे बहरूपिये तो हम शुरू से हैं। कभी नहीं बताया हम कौन हैं?


हो सकता है, महीनों किसी नए पते के साथ वापस न लौटूँ। या इसकी भी संभावना है कि कल ही यहाँ उस नए घर का पता इसी जगह लिंक लगाकर छोड़ जाऊँ। पता नहीं मन में क्या-क्या एकसाथ चल रहा है। फ़िलहाल इतना ही कि तीन पोस्टों को बैकडेट में यहाँ ज़रूर लगाऊँगा। उनका होना मेरे न होने जितना ज़रूरी है। फ़िर उनके बिना मन भी तो नहीं मानेगा न। 

(अट्ठाईस दिसंबर, रात दो बजे के बाद नींद और ठंड के बीच उबासी लेते, पैरों में मोज़े पहनते हुए..)

दिसंबर 19, 2014

चुप घर..

वह इतनी छोटी जगह थी, जिसे कमरा कहना, किसी कमरे की चार दिवारी को तोड़कर फ़िर से कमरा बनाने की तरह होता। ऊपर पक्की छत नहीं थी। ऐबस्टस की टीन थी। बरसात में वह बूंदों के साथ कई धुनें एकसाथ गुनगुना रही होतीं। गर्मियों में इतनी गर्म कि उसके नीचे बैठे रहना मुफ़्त में स्टीमबाथ का अनुभव देता। सिर के ऊपर लगा छोटा पंखा पिछले कितने मौसमों से बंद पड़ा था, किसी को याद नहीं था। सीएफ़एल का बल्ब फ्यूज़ होकर उस ख़राब होल्डर में अभी भी लगा हुआ था। उसे कौन बदलने की सरदर्दी ले (?) यही सोच उसे वैसे ही रहने दिया। कमरे में रौशनी की ज़िम्मेदारी एक चालीस वॉट की ट्यूबलाइट थी, जो कई महीनों से लगातार हर रात जल उठती।

उसकी रौशनी जितनी चार दिवारी के अंदर रहती, उससे कहीं जादा रौशनदान से निकलकर बाहर आँगन में फैल जाती। इसके हर रात ढबरी की तरह जलने के बाद कमरा और साफ़-साफ़ दिखाई देने लगता। दिवार से चिपकी एक लोहे की अलमारी थी, जिसके ताखे किसी लाइब्रेरी की शीशे वाली अलमारी की याद दिलाते रहते। उसके बगल एक बक्सा था। बक्सा साल खाड़ में एकबार खुलने वाली अटैची की तरह था। असल अटैची कहाँ थी (?) किसी को कुछ पता न था। बक्से के अंदर क्या था (?) यह भी किसी को न पता था। लकड़ी में अभी एक दीमक भी नहीं लगी थी। घर में दीमक कहीं लगती नहीं थी। घर में दीमक लगने के लिए कुछ नहीं था।

दिवारों पर छिपकलियों का राज था। वह पुरखों की तरह उखड़ रहे पलस्तर के साथ पिछले कई सालों से लगातार वहीं बनी हुई थी। एक-दूसरे से चिपकी हुई थी। दोनों को एकदूसरे के कोई शिकायत नहीं थी।

घर दूर से काफ़ी शांत दिखाई देता। पास जाने पर भी उतना ही शांत मिलता। कोई आवाज़ बाहर नहीं जाती। उसी तरह बाहर से भी कोई आवाज़ अंदर नहीं आती। न शाम कोई हाथ सब्जियों से भरा थैला लिए लौटता। घर बिलकुल ऐसा लगता जैसे इस दुनिया में होते हुए भी इस दुनिया में नहीं था। न दिन में कोई बाहर निकलता। आसपास भी इस घर के बारे में कोई नहीं जानता। यह उसका असहयोग आंदोलन नहीं था। वह अपने आप में एक स्वतंत्र गणतन्त्र था।

इस तरह वह घर, एक चुप घर था। एक दिन यह चुप घर मेरे सपनों की दुनिया में कहीं खो गया।

{ दूसरा चुप घर ..}

दिसंबर 18, 2014

मोहल्ले की लड़कियाँ

आज दरी पर नई चादर बिछी हुई है। सुबह से ही घर से गेंदे के फूलों की ख़ुशबू आ रही थी। यह किसी बाहर से आने वाले मेहमान के लिए नहीं है। आज शादी के बाद गाँव से पहली बार बड़े लड़के की बहू आ रही है। लड़का अभी पिछले हफ़्ते लौटा है। नौकरी अभी नहीं है। सालभर में हो जाएगी। ऐसा घर में सब सोचते हैं। पढ़ने में मन भी लगाता है। ऐसे ही पढ़ता रहा तब पक्का हो जाएगी। ऐसा आस-पड़ोस वालों को लगता। जबसे वह गाँव से लौटा है तब से उसके दोस्त छेड़ रहे हैं। भाभी को अभी तक कुछ दिया कि नहीं? क्या दे रहा है? उसका दिमाग इन सब चीज़ों में शुरू से नहीं रहा। अगर रहा होता तो शादी से पहले पड़ोस में क्या कम लड़कियाँ थीं, जो अकेली रात में छतों पर इसे बुलाती। वह अपने मन का मालिक था। कभी जाता। कभी नहीं जाता।

वह जब-जब मोबाइल में थ्री जी डेटा कार्ड री-चार्ज करवाता, तब-तब उसे लड़कियों के पास जाने की ज़रूरत महसूस होती। वह उन्हे छूना चाहता। वह साँसें रोके रहता। बहुत पास से, उन्हे बिन पलक झपके देख लेने की इच्छा उसके पेट के निचले हिस्से में महसूस होने लगती। वह जादा देर इस कशिश को अपने अंदर की रगों में दौड़ने नहीं देता। वह कोशिश करता खाना खाने से पहले ही जल्दी से विनोद मेडिकल का एक चक्कर लगाकर लौट आए। फ़िर इतमीनान से बल्ब की रौशनी में एक-एक का चेहरा याद करता जाता।

पर वह अकेला ऐसा महसूस नहीं करता। उसके साथ वह लड़कीयाँ भी करतीं, जिनके मोबाइल में वह टॉकटाइम डलवाता। कभी वह हफ़्ते की लॉटरी एकसाथ निकालता। कब किस लड़की का नंबर आएगा(?) यह सब पर्ची का खेल होता। जिसकी पर्ची निकलती पूरी रात सिर्फ़ और सिर्फ़ उसी लड़की के सपनों में साथ रहता। कभी जो पहले बोल देती, उसके वादों को कभी नहीं तोड़ता।

कितनी कोशिशें की सबने मिलकर। क्या-क्या नहीं किया सबने(?) सब दहेज़ इकट्ठा होजाने तक लड़कियों को रोके रहना चाहते। पर हासिल कुछ नहीं हुआ। मेडिकल स्टोर एक रात बंद हो जाने से उसका कुछ बिगड़ने नहीं वाला। कितनी बार तो कह कर देख लिया। कितना झगड़ते सब उससे। वह अब बिना पूछे किसी नंबर पर रीचार्ज करने लगा था। दोबार चौराहे वाले अखाड़े से पहलवान भेजे। वह भी सब ऐसे ही निकले। उसे कुछ नहीं कहते। उल्टे उनसे जादा रुपये कमाकर पहलवान दंगल करने लौट जाते। 

लेकिन आज रात सब बदलने वाला था। ऐसा उन सारे मोहल्ले वालों को लगता। जिन्होने अपनी लड़कियों को बचाने के लिए उसकी इस जनवरी शादी करवा दी थी। सबके मन में अजीब-सी धुकधुकी थी। सब सोचते रहे थे, देखो अब क्या होता है?

दिसंबर 17, 2014

कमरे में सिर्फ़ कमरा था

कमरे में सिर्फ़ कमरा था। वह न खाली था। न भरा था। वह कुछ-कुछ खाली था, कुछ-कुछ भरा था।

इस कुछ खाली, कुछ भरे कमरे में वह बालदार लड़का, कुछ कम ख़ूबसूरत लड़की के पास बैठा रहा। वह कुछ कमसूरत लड़की बालदार लड़के के पास बैठी रही। लड़के ने चुपके से अपने मन से कहा। तुम इतनी भी ख़ूबसूरत नहीं हो। लड़की ने चुपके से अपने मन से कहा। तुम इतने भी बालदार नहीं हो। दोनों के मनों ने सुनकर अनसुना कर दिया। वह वैसे ही सामने देखती रही। वह वैसे ही सामने देखता रहा।

दोनों एक-दूसरे के अगल-बगल बैठे रहे। वह उसे देख नहीं रहा था। वह उसे देख नहीं रही थी। इसतरह दोनों को लगता दोनों एक-दूसरे को न देख पाने का नाटक बहुत अच्छे से कर रहे थे। दोनों बेवकूफ़ थे। गलती उनकी नहीं उन दोनों के लड़का-लड़की होने में थी।

लड़का बार-बार उसके पैरों की तरफ़ देखता। देखता किसी घिस चुकी चप्पल में मोज़ों को पहने हुए उसके पैर। बार-बार उसकी नज़र सलवार पर चाँदी की पायलों के घुंघरुओं में कहीं अरझ जाती। लड़की बार-बार उसके पैरों की तरफ़ देखती। देखती किसी घिस चुकी चप्पल में मोज़ों को पहने हुए उसके पैर। बार-बार उसकी नज़र पजामे पर चाँदी की पायलों के घुंघरुओं में कहीं अरझ जाती।

लड़के ने कुछ देर लड़की के बारे में कुछ सोचा। लड़की ने कुछ देर लड़के के बारे में कुछ सोचा। कुछ देर बाद दोनों ने कुछ तय कर किया। लड़का कमरे के साथ वहीं रुक गया। लड़की भी कमरे के साथ वहीं रुक गयी।

अब उन्हे असली नाटक शुरू करना था। दोनों को एक-दूसरे को देखते हुए भी नहीं देखना था।

{नोट: तस्वीर बड़ी करने पर कमरे के अंदर कई कमरे और दिखाई देंगे। कदरदान ऐसा करके लड़का-लड़की दोनों को पास से देखें.}

दिसंबर 10, 2014

वह बिज़ी थी..

दोनों ने चार महीने पहले इस दफ़्तर में ‘एमटीएस’ की हैसियत से आना शुरू किया था। लड़का दसवीं पास था, लड़की बारहवीं फ़ेल। यह दो अक्टूबर के दो-तीन हफ़्ते बीत जाने बाद की पहली शाम नहीं थी, जब इन दोनों को पाँच बजे के बाद भी रुकना पड़ रहा था। रुकने के लिए सिर्फ़ लड़की को कहा जाता। पर लड़का भी रुक जाता। दोनों साथ-साथ जाते। साथ इसलिए भी जाते क्योंकि दोनों सीताराम बाज़ार से थे। दोनों सोचते आईटीओ से घर है ही कितनी दूर। लड़का तुर्कमान गेट से मुड़ जाता, लड़की सीधी मोहल्ले में गुम हो जाती।

दोनों दफ़्तर के इस प्रायोजित एकांत का आधुनिक उपयोग सिर्फ़ घर पर करते, उसे यहाँ छेड़ते भी न थे। छेड़ने का मन होता, तो भी उन नेगी अंकल के पाँच-पाँच मिनट पर लौट आने की आदत को कैसे बदलते। बदलना मुश्किल था और लड़के की शक्ल इतनी चालू नहीं थी। लड़की भी दिखने में उतनी ही शरीफ़ लगती। दोनों लड़का-लड़की होते हुए भी लड़का-लड़की जैसे नहीं दिखते। ऊपर से लड़का थोड़ा कम पढ़ा लिखा था। उसने किताबों को पढ़ना सात साल पहले छोड़ दिया था। और लड़की को किताबी बातें बचपन से ही नापसंद थी।

यहाँ आने से पहले ही मुँहफट्ट होना लड़कों की निशानी बन चुकी थी। इसलिए अंदर से चाहे कितना भी रोमेंटिक हो रहा होता, दिल में कसक कितनी भी उठती बैठती रहती वह एक ख़राब हो चुकी ट्यूबलाइट के चुंधियाते उजाले में ऐसे ही थोड़ा तेज़ बोलता।

“अरे तुझे तो ठीक से दिखाई भी नहीं देता, मेज़ के नीचे देख कितनी धूल पड़ी है..
कब साफ़ करेगी इसे, कब चलेंगे हम..??”

“दिख नहीं रहा, कर तो रही हूँ, जैसे-तैसे.. तूने मेरी कमर कामलायक कहाँ छोड़ी है..
आज मूव लेते चलना..”

“हाँ हाँ चल-चल.. बड़ी आई बताने वाली। काम कर अपना..काम..
चल अब जल्दी हाथ चला, वरना आज फ़िर नौ बज जाएंगे..फ़िर तू मुझे बोलेगी..”

“क्या बोलुंगी बता.. बता..बता तो ??
लेट तो तू करता है.. रोज़.. घर वाले रोज़ पूछते हैं, तुझे क्या पता कैसे-कैसे बहाने बनती हूँ..”

इतना कहकर वह उसी मंथर गति से ज़मीन पर पोंचा लगती रही, जैसे उसने उन सुनी हुई बातों को अपने पोंचे, धूल, फ़िनाईल, फ़र्श सबमें मिलकर भुला दिया हो। वह कुछ नहीं बोली। इसपर लड़का थोड़ा झल्ला रहा था। पर चुप था। उसका चेहरा तमतमाने से पहले की स्थितियों को प्रकट कर रहा था, पर अँधेरा कुछ जादा था। उजाला शाम सूरज ढलने से कुछ और कम हो गया था, इसलिए कुछ साफ़ साफ़ नहीं दिख रहा था। वह फ़िर थोड़ी देर बोलने की सोचता लेकिन चुप रह जाता। इधर-उधर देखने लगता।

वैसे वह हरबार दरवाज़े की तरफ़ देखता। और रुक जाता। हरबार वहाँ कोई परछाई होती और जल रहे पीले बल्ब की रौशनी। फ़िर बड़ी देर बाद, उसने मेज़ के नीचे खाली जगह में ख़ुद को समेटकर, लड़की के चेहरे के पास उसकी आँखों में आँखें डालकर कहा।

“अगर तू रोज़ इतना लेट करेगी तो रहने दे फ़िर,
..मैं कोई और देख लूँगा..!!”

लड़की कुछ नहीं बोली। वह अभी भी फूलझाड़ू लिए गीले कपड़े से फ़र्श चमका रही थी। वह बिज़ी थी।

दिसंबर 09, 2014

स्वच्छ भारत अभियान की बात

अब जबकि झाड़ू उठाए नेता, मंत्री, संतरी अख़बारों में छपने के लिए इतने लालायित नहीं दिख रहे, ख़ुद कूड़ा फैलाकर मजमा जुटाने की जद्दोजहद अब ठंडी पड़ गयी है, जनता यू-ट्यूब पर प्रधान सेवक के सफ़ाई वीडियो का इंतज़ार करते-करते थक चुकी है, मन की बात  सुनने के लिए रेडियो खरीद कर अघा चुकी है, डीएवीपी के हर विज्ञापन के साथ गाँधी चश्मा छप रहा है, स्वच्छता सप्ताह हिन्दी पखवाड़े की औपचारिकता के साथ सम्पन्न हो चुका है,सबटीवी पर तारक मेहता का उल्टा चश्मा के सभी सदस्य जब हमें सफ़ाई का महत्व बता चुके हैं,एनडीटीवी पर अमिताभ बच्चन गंदगी से हर बीस सेकंड में एक बच्चे की मौत की भयावयता रोज़ बता रहे हैं, बालदिवस बाल स्वच्छता अभियान में तब्दील हो चुका है, मंत्रालयों में छब्बीस जनवरी की परेड में अमेरिकी राष्ट्राध्यक्ष बराक ओबामा के सामने अपनी झाँकी में इस अभियान को हथियाने की होड़ मची हुई हो, पूरा देश इस अभियान के धुआँधार विज्ञापनों, विज्ञप्तियों से अटा पड़ा हो, तब हमारा भी कुछ कर्तव्य बनता है कि कान पर जूं को रेंगने दिया जाये। हम थोड़ा पिछड़ भी गए हैं तो क्या? बातें तो बातें हैं, बातें होती रहनी चाहिए..

अगर हमारे देश में इतने तामझाम के साथ ‘स्वच्छ भारत अभियान’ चल रहा है, तो इसे समझने के लिए सबसे पहले हमें ‘स्वच्छता’ और ‘अस्वच्छता’ दोनों को पारिभाषित करना होगा। इसतरह यह भी देखना होगा कि यह कहाँ-कहाँ पायी जाती है? किन-किन अर्थों में इसका अनुवाद किया जा सकता है? वह कौन हैं, जो हमारे समाज में ‘गंदगी’ उत्सर्जित करते रहे हैं? फ़िर यदि समाज इसे अस्वच्छता के रूप में ला रहा है, तो कोई मशीनरी, कोई तंत्र ऐसा भी होगा जो इसके निपटारे के लिए प्रशासनिक स्तर पर सैद्धांतिक रूप से प्रतिबद्ध होगा। इस तरह यह एक रोज़गार भी है। लेकिन इसी क्षण हमें इसके जातिगत समीकरणों को भी समझने की कोशिश करनी चाहिए। महात्मा गांधी ‘अस्पृश्यता’ को ख़त्म करने के लिए क्या तर्क देते हैं और इसके कारण जिस वर्ग को मुख्यधारा में लाने की कोशिश कर रहे थे, वे किन किन पेशों से सम्बद्ध थे? वे पीढ़ी-दर-पीढ़ी वही पेशे क्यों कर रहे थे? क्यों कर रहे हैं? क्यों इस अभियान की शुरुवातवाल्मीकि बस्ती से होती है? क्या वस्तुस्थिति में किसी भी प्रकार का आमूलचूल परिवर्तन हुआ भी कि नहीं। वैसे आज भी हमारे देश में सिर पर मैला उठाने वाले आज भी ऐसा करने को अभिशप्त हैं।

यहाँ यह देखा रोचक होगा कि अभियान ‘अस्वच्छता’ के रूप में किन्हे चिन्हित करता है और एक नागरिक होने के नाते इस अभियान में हमारी क्या भूमिका हो सकती है? दीवारों पर पेशाब करना, खुले में शौच जाना, सड़कों गलियों में इधर-उधर कूड़ा फेंकना इन तीन प्रकारों के अलावा वह अपने इस समाज में गंदगी को देख नहीं पाते। सरकार स्वयं इन जन सुविधाओं के लिए कितनी सजग है, अलग चर्चा का विषय है। वैसे दिखाई तो हमें नीले और हरे डिब्बे भी नहीं देते, जिनमें जैविक और पुनरचक्रित होने लायक कूड़े को डाल पाएँ। नालियों, सीवरों का बोध हमें या तो बरसातों में होता है या वह बस या गाड़ी के किसी जेजे कॉलोनी के पास से गुजरते हुए महसूस होते हैं। यदि रेलगाड़ी से जा रहे हैं, तब उन पटरियों पर प्लास्टिक के डिब्बों और पुराने लोटों के साथ मल त्याग करती असंख्य अभिशप्त जनसंख्या को देख हम जुगुप्सा से भर जाते हैं। धीरे-धीरे जैसे जैसे बात आगे बढ़ती जा रही है, हम इस ‘गंदगी’ को ‘अस्वच्छता’ बोल पाने में ख़ुद को असमर्थ व असहज पाते हैं। हम ‘भद्र अस्वच्छता’ से होते हुई ‘गरीब गंदगी’ के बगल से गुज़र रहे हैं। यह सिर्फ़ भाषा का नहीं वर्ग का भी भेद है, जो हमारे मन से होकर नाक पर रुमाल बनकर हमारे चेहरे के भावों को नाटकीय रूप से बदल रहा होता है।‘मुन्नी मोबाइल ’ ऐसे ही किसी औदद्योगिक उपनगरी से रोज़ दिल्ली आती है।

हम यहाँ गंदगी को नगरीय विकास के एक पहलू से जोड़ते हैं, पर ऐसा करने के बाद भी हम उसकी अधूरी-धुँधली तस्वीर ही देख पाते हैं। सारे नेता लुटियन दिल्ली की किसी साफ़-सी सड़क पर कूड़ा फैलाकर झाड़ू लगाते दिख रहे थे। उनका ध्यान राजघाट के पीछे रेंगने को मजबूर यमुना की दयनीय स्थिति पर नहीं जाता। वे कौन से कारक हैं, जिनके परिणामस्वरूप उनकी गति बाधित हुई? यह हम देख नहीं पाते। हमें बड़े-बड़े कारखाने छोटी-छोटी औद्योगिक इकाइयाँ नज़र आती हैं। इनके लिए हम अपने पर्यावरण कानून बदलने को झट से तय्यार हो जाते हैं। ऐसा नहीं है, सरकारें उनके प्रति उदासीन रही हैं, गंगा एक्शन प्लान से लेकर टेम्स की तर्ज़ पर नदियों को साफ़ करने उनके सौंदर्यीकरण की कसमें खाकर अदालतों में हलफ़नामे दायर करती रही हैं। अबकी बार तो पूरा जल संसाधन मंत्रालय ही खड़ा कर दिया गया है। हम रोज़ उनमें मिलते लाखों टन अशोधित जल को शोधित करने के संयंत्र खरीदने में व्यस्त रहते हैं। इसतरह नदी का पारिस्थितिकी तंत्र क्या होता है, नदियाँ स्वयं भूल चुकी होती है। याद करने से भी याद नहीं आता।

और तब हम हड़बड़ी में ऐसे आधे-अधूरे स्वच्छता अभियान गढ़ते है। जिनमें उन नागरिकों को शपथ दिलवाई जा रही है, जिन्हे यह भी नहीं पता कि रोज़ उनके घर से निकला कूड़ा शहर के अंदर या शहर के बाहर किस ढलाव पर कूड़े के पहाड़ में बदल जाता है? फिर वह वहाँ से आगे की निपटान प्रक्रिया के लिए कहाँ जाएगा? ऐसी स्थिति में उन्हे कैसे पता होगा कि सुबह किया उनका मल किन नालियों, नालों, सीवरों से होता हुआ नदियों में मिल रहा है? उन्हे यह कभी पता ही नहीं चल सकेगा कि जो उत्पाद वे बाज़ार से खरीद कर लाये हैं, उसके उत्पादक ने कितना कार्बन उत्सर्जित किया और अपने अपशिष्ट पदार्थों को किन नदियों में खुले नालों से बहा दिया। हम तो बस दूरदर्शन पर विद्या बालन केजहाँ सोच वहाँ शौचालय  वाले विज्ञापन देखते रहेंगे और खुले में जाते रहेंगे।

{आज अट्ठारह दिसंबर, इस बात का संपादित अंश हिंदुस्तान में आया है, पता साइबर संसार, स्वच्छता के मायने.. }

दिसंबर 08, 2014

फटी ज़ेब वाले लड़के का प्यार

कहानी में जबर्दस्त ट्विस्ट आन पड़ा था। वह फ़ेसबुक पर उनकी जितनी भी तस्वीरें देखता जाता, उतना ही उसे विश्वास होता जाता कि वह किसी दूसरी दुनिया से आए हुए लोगों की दुनिया है। उसकी ज़ेब में जितने पैसे नहीं होते उससे भी महँगी उन लाल-लाल होंठों को लाल करने वाली एक लिपिस्टिक की कीमत होती। हाथ में दिख रहा पर्स, मोबाइल, एक से एक बढ़िया आइटम उसकी खाने के बाद पादने की औकात से बहुत बाहर की बात होती। एकबार वह अपने सारे कपड़े बेच देने की बात पर राज़ी भी हो जाता, तब भी उस नीलामी से जुटाये पैसों में सिर्फ़ इतना हो पाता कि शादी से ऐन पहले पहाड़गंज जाकर छह टूटी चौक से मेहँदी लगाने वाली किसी उबाऊ, मुँहफट्ट, उमर में घिसी हुई किसी लड़की को दीदी कहकर घर आने के लिए राज़ी कर पाता। असल में वह किसी ऍड की फ़िराक में था। पर उसकी किस्मत अभी भी उसे दगा दे रही थी। इतना इंतज़ार करने पर भी अभी तक किसी सलून या स्पा ने पसीने से भीगे बदबूदार कपड़ों के बदले ऐसे किसी भी ऑफर को देने की कोई योजना बाज़ार में नहीं उतारी थी। 

इंतज़ार करते करते यह उसकी आठवीं दोस्त थी, जिसने मर्चेन्ट नेवी के कारकुन से शादी करने के लिए सगाई कर ली थी। पिछली वाली सिंगापुर चली गयी। किसी सॉफ्टवेयर इंजीनियर के साथ। ख़ूबसूरत लड़कियाँ उसकी पासबुक में कहीं भी अट नहीं रहीं थी।

सच में यह उसके बहुत तंगी के दिन थे। अब उसने तय किया कि गोल मार्केट, मल्होत्रा जी के बहकावे में आकर मोबाइल में कोई भी इंटरनेट पैक नहीं डलवाया करेगा। तब न उसकी रातें हराम होंगी, न दिनभर भन्नाया घूमना पड़ेगा। कितना सुकून रहेगा। 

दिसंबर 07, 2014

बिछी हुई चादर

वहाँ उस लोहे के दरवाज़े के पीछे उनकी दुनिया थी। इस बड़ी सी दुनिया में एक छोटा सा पता। बड़े लड़के की शादी अभी हुई थी इसलिए घर थोड़ा और छोटा हो गया थी। उनके इस एक कमरे वाले घर के बीचोबीच एक दरी बिछी हुई थी। जब कभी किसी मेहमान के आने की आहट होती, वे लोग कोई धुली सी साफ़ सी चादर डाल देते। इसके कई फ़ायदे होते। एकतो उस दरी के फटे होने की बात छिप जाती, दूसरे इससे मेहमानों और मेज़बानों दोनों के सौंदर्यबोध का भी पता चलता रहता। जिससे प्राप्त ज्ञान का उपयोग वे अगली खरीदी जाने वाली चादर के संदर्भ में किया करते। फ़िर बात बोझिल हो जाने की स्थिति में एक विषय हमेशा उपलब्ध रहता, बिछी हुई चादर।

दरी पर बैठे मेहमान अक्सर खिड़की की तरफ़ मुँह करके बैठा करते। उनकी रुचि सामने लगी गुलमोहर के पेड़ में बिलकुल भी नहीं रहती। न उन्होने कभी आम या अशोक के पेड़ों पर बात करना उचित समझा। वे धीर-गंभीर साहित्य अनुरागी न थे और न ही अतिसक्रिय पर्यावरणविद्। वे इस घर में रहने वाले साधारण से लोगों से मिलने साल-दोसाल पर आने वाले गाँव से आए हुए अतिसाधारण लोग हुआ करते थे। खिड़की की तरफ़ देखना उनकी मज़बूरी थी, जिसका दूसरा अनुवाद इक्कीस इंच के रंगीन टीवी के रूप में वहाँ हमेशा मौजूद रहता था।

वहीं, खिड़की के बगल बिन दरवाजे वाला एक इटिया दिवार से घिरा गुसलखाना था, जो नहाने के साथ-साथ बर्तन धोने के काम आता। नहाते भी घर वाले थे और बर्तन भी घर वाले धोते थे। यह अकथित था पर उसका इस्तेमाल मेहमानों को हाथ धोने के अलावा किसी और स्थिति में तबतक करने नहीं दिया जाता था जबतक कि उनमें भी कोई स्त्री शामिल न हो। रसोई को लेकर ऐसे अलिखित उपबंध नहीं थे। वे नहा लेने के बाद उसका यथोचित प्रयोग करने के लिए स्वतंत्र हैं। उन्हे इसके लिए कहीं बाहर नहीं जाना। जहाँ दरी का पश्चिमी छोर ख़त्म होता है, बिलकुल वहीं से रसोई की सीमाएँ प्रारम्भ होती हैं। इसे इस तरह भी कहा जा सकता है कि वह अपने एकएक पैर के साथ किचन और लिविंग रुम दोनों जगह मौजूद रह सकती हैं। उन्हे किसी भी बात को सुनने के लिए किसी भी दिवार से कान लगाने की ज़रूरत नहीं थी। यहाँ दीवारें नहीं है, उनके कान तो दूर की बात थी। इस तरह यह परिवार में स्त्रियों की लोकतान्त्रिक स्वतंत्र भागीदारी सुनिश्चित करता रहता। घर एक कमरे का है तो क्या हुआ इसकी सैद्धांतिकी कितनी मज़बूत है।

इस रसोई में ही कभी एक लकड़ी की छोटी सी अलमारी थी। घरवालों को भी नहीं पता था वह किस लकड़ी की बनी थी। पर सब उसका इस्तेमाल पता नहीं पिछले कितने सालों से उसी तरह मिलकर कर रहे थे, जैसे दिवार में चुनी हुई दो ताखों वाली अलमारी उन सबकी अलमारी थी। बस इनका खुलना किसी तहख़ाने के खुलने की तरह होता। साल दो साल में एकबार। जब अंदर रखी कोई चीज़ याद आ जाती तब। या ठंड के दिनों में स्वेटर निकालने को होते तब। दोनों भाई इसका इस्तेमाल अपनी डिग्रियों को चूहों से बचाने के लिए करते। जैसे कुतरी हुई क़मीज़ किसी काम की नहीं होती वैसे ही इस कागज को भी कोई नहीं पूछता था। दोनों भाइयों का इस परिवार की तरह लोकतन्त्र में पूरा विश्वास था और इस लोकतन्त्र के पास उन दोनों भाइयों को देने के लिए नौकरियाँ कुछ कम थीं। वह दोनों एकदूसरे की तरह पैरों में पैरागॉन की चप्पलें पहने बेरोज़गार घूमा करते। वह घिसती कम थी और चलती जादा थी।

शादी इन्ही में से बड़े लड़के की हुई थी। आस-पड़ोस की तरह घरवालों का भी मानना था शादियों के बाद अक्सर नौकरियाँ लग जाया करती हैं। इसलिए सब अधीर थे। और इंतज़ार करने के मूड में नहीं थे। सबकी तरह लड़का कुछ सोच नहीं पा रहा था, उसे क्या करना चाहिए? लड़की भी नहीं सोच पा रही थी उसे क्या करना है? इस कारण किसी ने भी शादी को और स्थगित करना उचित नहीं समझा। सब इसी उद्घोष के साथ बारात में शामिल हुए कि इस नहीं तो अगले साल नौकरी लग ही जाएगी। शादी जनवरी में हो गयी है, अब सब बारात से लौटकर नौकरी के इंतज़ार में हैं। इसतरह सब एकबार फ़िर अधीर हुए जा रहे थे। इसबार उनकी बेताबी लगातार अपने रूप बदलती जा रही है। वह किसी भी इच्छा के आकार लेकर कभी भी कहीं से भी उछलकर बीच दरी पर आ सकती थी।

आज घर में दरी पर नयी चादर बिछी है। घर की बड़ी बहू आ रही है। लड़का सोच रहा था, उसके पास सिर्फ़ एक रज़ाई है।

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