जनवरी 31, 2015

कानपुर सेंट्रल

कानपुर कभी किसी याद का हिस्सा नहीं रहा। सिर्फ़ एक छोटी-सी धुँधली तस्वीर में दादी के चले जाने के बाद, रात दो बजे कानपुर से लखनऊ की तरफ़ भागती रोडवेज़ बस में बोनट पर गुजरी असहाय यात्रा के अलावे कुछ याद नहीं। उसमें कानपुर कहीं नहीं है। सिर्फ़ लंबी काली सड़कें, घूमते पहिये और चमकती लाइटें हैं। अंदर सुनाई दे रही अनगिनत अनसुलझी आवाज़ों में मन कहीं दिल की तरह डूब गया है। आँखें धड़कनों की तरह चुप हैं। मेरे हाथ कहीं गुम हो गए हैं। मैं भी कहीं सयास गुम हो गया हूँ। कुछ दिख नहीं रहा है। पता नहीं वह कौन सी रेलगाड़ी थी, जो हमें हमारे गाँव से इतने किलोमीटर पीछे छोड़कर कहीं चली गयी। इसतरह अँधेरा हमेशा अपने साथ डर नहीं लाता, अकेलेपन का एहसास भी लाता है। हम छह लोग रहे होंगे। पर सब अपने अपने दुखों में नितांत अकेले थे।

पता नहीं क्यों हम कहीं जाने से पहले उस जगह को जान लेना चाहते हैं? किसी नयी जगह को जल्दी से जान लेने की हड़बड़ाहट बहुत अजीब है। पर मेरी इस छोटी-सी याद में ऐसा कुछ भी नहीं था। कि कहीं गुम हो जाने के एहसास से भर जाता। जेब में इतने दिन भी नहीं थे कि इत्मीनान से शहर का मिजाज़ देख पाते। हमारी गिनती कुल मिलकर एक दिन पर रुक गयी थी। फ़िर आने वाली अगली सुबह से पहले जितनी भी कल्पनायेँ अंदर थीं, वह बाहर आने लगीं। पता नहीं कहाँ से गणेश शंकर विद्यार्थी और प्रताप प्रैस मन पर छा गए। दीप्ति कक्कड़ की फ़िल्म कँटियाबाज कानपुर में बिजली की कहानी याद आने लगी। पंद्रह-पंद्रह घंटे लाइट नहीं आती। लोग परेशान हैं। तब वहाँ चमनगंज में लोहा सिंह का उदय होता हैं। इधर पता नहीं कितने साल पहले गंगा किनारे किस बड़े कारखाने के बंद होने की ख़बर अख़बार में आई। बड़े-बड़े कारखाने बंद हो चुके हैं। उनके गेट पर ताले लग चुके हैं। गंगा किनारे पूर्व के मेंचेस्टर का मिथक टूट रहा था।

इतनी निर्ममता से अंदर ही अंदर एक शहर की बुनावट को दूर से देखते हुए उसके रेशे-रेशे उधेड़ रहा हूँ। शायद मेरे लिए यह इसलिए भी आसान है क्योंकि यह मेरा शहर नहीं है। और यह असल में यह सब बातें यादें नहीं, तथ्य हैं। हमारे अंदर नहीं, हमसे बाहर। अभी तक कानपुर नहीं पहुँचा। यहीं एक ठंडी शाम को दिल्ली में हूँ, जब जबलपुर से अनूप जी से फ़ोन पर बात हो रही है। वह कानपुर को यूपी का कलकत्ता बताते हैं। अब मेरा कानपुर कैसा होगा? मुझे बिलकुल नहीं पता। एकदम से मेरा दिमाग रुक गया, जैसे कोई शहर ठहर जाता हो। यह एक ऐतिहासिक नगर की औपनिवेशिक व्याख्या है। हमारे मनों में कलकत्ता का मतलब अतीत में कहीं ठहर गया शहर है। हमारे अंदर का यह कलकत्ता, वह कलकत्ता कभी नहीं होता अगर ब्योमकेश बक्शी से हम न मिले होते। हमें तलाश है किसी कानपुरीए जासूस की, जिससे हम प्यार कर सकें। उसकी नज़र से शहर देख सकें। तनु  भी कानपुर दिखाते-दिखाते लखनऊ चली गयी।

पर कानपुर कैसा होगा? एक कानपुर देहात है। एक कानपुर शहर है। अपनी भी दो दिल्ली हैं; एक नयी, एक पुरानी। भोपाल और लखनऊ भी एकसाथ नए और पुराने शहरों को अपने अंदर लिए ख़ुद को लगातार बदल रहे हैं। इनके बीच कोई कर्क रेखा नहीं होती। वह हमारे मन में होती है, जो इन शहरों को बाँटती है। वह बराबर एक-दूसरे में आवाजाही करते रहते हैं। घुलेमिले होते हैं। लेकिन जब हम इतनी बड़ी-बड़ी श्रेणियाँ बनाकर किसी जीवंत शहर या ऐसी ही किसी संज्ञा का वर्गीकरण करते हैं, तब समस्याग्रस्त हो जाते हैं। उसी क्षण हम बारीक परतों को अनदेखा कर देते हैं, जिनके बीच अतीत और वर्तमान अदृश्य रहकर भविष्य को निर्मित करने में लगे रहते हैं। वह तब शहर नहीं रहता टेक्स्ट बन जाता है। एक पाठ, जिसे कोई किताब की तरह पढ़ने की ज़िद लिए रहता है। वैसे कभी-कभी लगता है, इतने सवाल सिर्फ़ हम जैसे एक-दो दिन शहर से ऊपर से उड़ने वाले कबूतर ही पूछते हैं, वहाँ रहने वालों को कभी इनसे कोई फ़र्क नहीं पड़ता।

{जारी..} 

{आज दैनिक हिंदुस्तान में। तारीख़ छह फरवरी। साइबर संसार। कैसा होगा कानपुर। }

जनवरी 30, 2015

गाँधी का होना..

पता नहीं यह कैसा भाव है। पर यह ऐसा ही है। गाँधी होना कितना मुश्किल है। कितनी कठिन हैं वह परिस्थितियाँ जिनके बीच सौ साल पहले दक्षिण अफ्रीका से वह लौटे होंगे। ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन अपने शासित उपनिवेशों की कीमत पर अभी प्रथम विश्व युद्ध लड़ रहा है। अगले तीन सालों में वह विजयी दल का महत्वपूर्ण सहयोगी बनकर उभरने वाला है। कोई अनुमान नहीं लगा सकता कि परतंत्र भारतीय राजनैतिक परिदृश्य में गाँधी कहाँ खड़े होंगे? सब कितने सैद्धांतिक से सवाल हैं न! अनुशासनबद्ध, तथ्यात्मक से। इनमें से कई जवाब विपिन चंद्र या रामचन्द्र गुहा की लिखी किताबों में आसानी से मिल जाएँगे। नहीं मिलेगी तो हमारे अंदर छिपी गाँधी की छवि। कभी हम मौका ही नहीं देते, थोड़ा ठहरकर ख़ुद से बात करें। थोड़ा देखें, हमारे किस हिस्से में कितने और कैसे गाँधी छिपे हुए हैं? हमने उनके प्रति किन अवधारणाओं, किन मान्यताओं को सबसे ऊपर वाले ताखे में रखा हुआ है। वह कहीं अंदर ही खो तो नहीं गए हैं। इतने सालों में कहीं ढक गए होंगे शायद।

तब इस छब्बीस जनवरी की तरह लोकसभा टीवी नहीं होता था। तब सिर्फ़ दूरदर्शन था। दो अक्टूबर ठंड थोड़ी-थोड़ी आहट के साथ धीरे से दरवाजे के पीछे कहीं छिपी होती। पूरी तरह आने में अभी वक़्त होता। जैसे दिवाली अभी आई नहीं होती। हम तीसरी चौथी क्लास में रहे होंगे, जबसे कई साल लगातार हम इस दिन टेलीविज़न पर ‘गाँधी’ को देखते। फिल्म में अभिनय कर रहे उस विदेशी कलाकार का असली नाम कुछ भी रहा हो, वही हमारे सबसे पहले गाँधी थे। बैन किंगस्ले वह कई सालों बाद बने। फ़िर पता नहीं हम स्कूलों में कौन-सी किताबें पढ़ रहे थे कि दसवीं तक आते-आते हम यह भी नहीं जान पाये, गाँधी किस तरह भारत को देखते थे? उनके सपनों का भारत कैसा था? 

इसके बाद गाँधी पता नहीं कहाँ गायब हो जाते हैं? वह कभी किसी किताब में नहीं मिलते। कहने को हम बीए में इतिहास पढ़ रहे थे पर हमारे लिए ज़रूरी था, योरप का इतिहास। वैश्विक परिदृश्य को जानना-समझना, उनसे परिचित होना। शायद ‘ग्लोबल विलेज’ का नागरिक होने के लिए यह पहली शर्त रही होगी। अपने परिवेश से परिचित होना, राष्ट्र के अतीत या उसकी निर्माण प्रक्रिया की व्याख्याओं से हमें कभी अवसर देना उस पाठ्यक्रम का उद्देश्य नहीं रहा होगा। पता नहीं यह कैसे हुआ होगा के स्वतन्त्रता आंदोलन से निकली सत्तासीन उत्तराधिकारी पार्टी के रहते, हम उनकी भूमिका बिलकुल भी नहीं समझ पाते। उल्टे उन विचारों से घिर जाते हैं, जहाँ बिना प्रतिरोध विभाजन के इर्द-गिर्द उनकी एक अलग ही छवि सयास गढ़ी जा रही थी। उनकी यह रूपाकृति एक खलनायक की थी।

इन सब परिघटनाओं के मध्य वह राष्ट्रपिता बने रहे और हर राष्ट्रीय पर्व या विशेष अवसरों पर गणमान्य नेता अतिथि सब राजघाट आते रहे। हम सब भी टीवी सेटों पर उन लोगों के वहाँ एकबूढ़ी महिला विशेष के साथ देखने के अभ्यस्त होते गए। वह सन् छियानवे में पहली बार किताबों में छपे अपने जंतर और राजघाट की परिधि से बाहर आते हैं, जब सरकारी नोटों पर उनकी तसवीरें छपने लगी। इसने गाँधीवादी विचारों और उनके अवदान को किन रूपों में प्रभावित किया, यह अभी अन्यत्र शोध का विषय है। फ़िर एक साल आया जब गाँधी से एक बार फ़िर मुलाक़ात होती है। यह ‘इतिहास’ के रास्ते नहीं बल्कि ‘शिक्षा’ के जरिये संभव होती है।

विषय के रूप में ‘शिक्षा’ गाँधी को उनकी राजनीतिक व्याख्याओं और पाठों से अलग वृहद व्यक्तित्व में उपस्थित करती है। अगर हम उम्मीद करते हैं कि शिक्षा के द्वारा हम समाज को बदलने, उसमें आमूलचूल परिवर्तन की निर्णायक भूमिका देखना चाहते हैं, तब वैचारिक रूप से शिक्षा को समाज की स्थापनाओ के विपरीत कार्य करना होगा। गाँधी उस समाज में नयी तालिम का प्रस्ताव करते हैं, जो अपनी संरचना में इतना जातिवादी है, जहाँ जीविकोपार्जन के लिए अपनाया गया पेशा आपको आसानी से ‘अस्पृश्य’ बना देता है, वहाँ दिमाग और हाथ की शिक्षा समाज का विपर्यय ही थी। शायद उन्हे पता था, उनकी नीति विफल होगी पर इस तरह वह औपनिवेशिक शिक्षा का प्रतिविचार उपास्थित करते हैं। वे किसी अनभिज्ञ, अपरिचित संसार को नही रचते, न उसमें प्रविष्ट होते हैं। वे समाज की समस्याएँ इसी समाज के भीतर से निकालते हैं। ‘ग्राम स्वराज’ इसी अवधारणा से निकला ‘यूटोपिया’ था, जो ‘आधुनिक’ बनने की इच्छा से भर गए गाँवों द्वारा शहरों की भौंडी नकल करने में कहीं पीछे छूट गया। आज यह अभेद हमारी विविधता के लिए सबसे गंभीर जातीय संकट है।

यह पहला अवसर था, जब सच में गाँधी के विचारों उनकी मान्यताओं को इतनी पास से देखना शुरू किया। वे हमेशा जटिल, विवादास्पद, गंभीर, वैविध्य विचारों-दृष्टिकोणों में महत्वपूर्ण हस्तक्षेप की तरह मौजूद रहते हैं। आज जब किसी को गाँधी की नकारात्मक, तथ्यहीन, दुराग्रहपूर्ण आलोचना करते देखता हूँ, तब उनसे सिर्फ़ एक सवाल करता हूँ; क्या उन्होने कभी गाँधी को पढ़ा है? इस प्रश्न के बाद उनके हिस्से सिर्फ़ चुप्पी आती है। वे कुछ नहीं बोलते। बस आगे बढ़ जाते हैं। अगर उन्होने कभी पढ़ा होता, तो वह कभी ऐसी क्रियाओं में संलग्न नहीं होते। गाँधी के विचारों की परिधि इतनी विस्तृत है कि कोई भी उन्हे सिरे से नकार नहीं सकता।

इधर हम इस उत्तर आधुनिक परिघटना को घटित होते देख रहे हैं। कैसे उनके चश्मे से ‘स्वच्छ भारत’ देखने की कोशिश हो रही है। बार-बार ख़ुद को उनसे जोड़कर अपनी वैधता प्रमाणित करने की कोशिशें आक्रामक हो गयी हैं। पर काश, अपने नाम वाले सूट को पहनने से पहले वह चश्मे वाले गाँधी का जंतर पढ़ लेते तो कथनी और करनी में फाँक ज़रूर कुछ कम होती। पर यह भी तो है, सिर्फ़ नाम लेने से क्या होता है? परत उघड ही जाती है। जब आप सिर्फ़ किसी विचार को चादर की तरह ओढ़ते हैं, तब ऐसा ही होता है।

जो गाँधी का जंतर देखना चाहें:
मैं तुम्हें एक ताबीज देता हूँ। जब भी दुविधा में हो या जब अपना स्वाार्थ तुम पर हावी हो जाए, तो इसका प्रयोग करो। उस सबसे गरीब और दुर्बल व्यक्ति का चेहरा याद करो जिसे तुमने कभी देखा हो, और अपने आप से पूछो- जो कदम मैं उठाने जा रहा हूँ, वह क्या उस गरीब के कोई काम आएगा? क्या उसे इस कदम से कोई लाभ होगा? क्या इससे उसे अपने जीवन और अपनी नियति पर कोई काबू फिर मिलेगा? दूसरे शब्दों में, क्या‍ यह कदम लाखों भूखों और आध्या त्मिक दरिद्रों को स्वराज देगा? तब तुम पाओगे कि तुम्हारी सारी शंकाएं और स्वार्थ पिघल कर खत्म हो गए हैं।
जंतर, श्रीश के ब्लॉग से। तारीख़ इक्कीस मई, दो हज़ार दस। 

जनवरी 18, 2015

फ़िर दो तस्वीरें..

सड़क किनारे कहीं दिवाल नहीं थी, इसलिए पेड़ ही दीवार है। बसों का घंटाघर।

यह ढाबली, पैट्रोल पंप है। जब वह आ जाएगा, यह गुम हो जाएगी। 

जनवरी 17, 2015

एक अधूरा डरा घोषणापत्र

बड़े दिनों से यह सारे सवाल अंदर-ही-अंदर उमड़ते रहे हैं। कहीं कोई जवाब दिखाई नहीं देता। उन सबका होना हमारे होने के लिए पता नहीं कितना ज़रूरी है? पर यह समझना मुश्किल है कि इधर नींद न आने का असली कारण क्या है? शायद हमें अपनी पहचान छिपाये रखनी है। कोई हमें देख न ले, हम कौन हैं। उनका देख लेना हमारे अस्तित्व के लिए ख़तरा है। ख़तरा पहचान के मिटाये जाने का है। सबसे पहले वह हमें पहचानते हैं, हमें पास से देखते हैं। तब उनका हमला होता है। फ़िर हम कहीं नहीं होते। हमारी आवाज़, हमारे रंग, हमारी सहमति, हमारी असहमति, हमारा विरोध सब वहीं अलगनी के बगल वाले पटरे पर धरा रह जाता है। कोई वापस आकर देख नहीं जाता के हम लौटे हैं कि नहीं। क्योंकि शर्तिया वहाँ से कोई लौट ही नहीं पाता होगा।

यहाँ ऊपर जितनी भी बाते हैं, सब जितनी अमूर्त दिख रही हैं, उनकी वाक्य संरचना बड़े करीने से ऐसे रहने दी है। वहाँ कोई यह नहीं कह रहा कि अब हम सबको कहीं छिप जाना है। हम यहीं हैं। यह कोई डर भी नहीं है। यह बस है। यह बहुत ही सैद्धांतिक बात है के इधर एक ऐसे अधिनायकवाद को हम देख रहे हैं, जो कई स्तरों पर इतिहास की पुनरावृति है। वर्तमान की पुनररचना है। यह नए अर्थों में उसका विस्तार है, जहाँ उन विविध स्वरों के लिए कोई जगह बची नहीं दिखती। तंत्र का ऐसा रूप जहाँ इस राष्ट्र-राज्य के प्राकृतिक संसाधनों पर लोक का अधिकार लगभग शून्य की अवस्था में पहुँच चुका है। यह हमारा दुर्भाग्य है कि शून्य से निम्न किसी संख्या का आविष्कार हमसे कभी नहीं हो पाया। ऐसी स्थिति में हमने अपने समाज, अपनी संस्कृति को ही उस निम्नतर स्तर में स्थित कर दिया है।

बिलकुल अभी मैंने एक पोस्ट पूरी की पूरी लिखकर ड्राफ़्ट में रख दी हैं। पता नहीं क्यों? शायद उसका कोई मतलब नहीं रह गया। या यह उन मूल्यों से पीछे खिसकने से जादा उन मूल्यों की पहचान को छिपाये रखने की विवशता हो। पता नहीं यह क्या है। हम जिसे प्रतिरोध कहते हैं, उसका संगठित होना क्यों ज़रूरी है? फ़िर इधर इस भाव, विचार, स्थिति, अवस्था के लोप को भारतीय संदर्भों में किन अर्थों के साथ लिया जाना चाहिए? इसके अवसर इधर जितनी तेज़ी से हमारे समय सामने आ रहे हैं, उतना ही बड़ा संकट हमारे समाज के सामने विकराल रूप ले रहा है। यह बात उतनी ही समझ में नहीं आने वाली, जितना हम उन आग्रहों-दुराग्रहों को अपनी आँखों के सामने देखते हुए भी नज़रअंदाज़ करने के अभ्यासी हो चुके हैं। हमने एक समानान्तर एवज़ी व्यवस्था को इन परिदृश्यों में इस तरह पैठ जमाने का अवसर दे दिया है; जो हमारी रुचियों, मतों, मतांतरों को पदस्खलित कर खुद उसकी ठेकेदारी में संलग्न कर लिया है।

यह बिलकुल विरोधाभासी बात है कि वह एकतरफ़ अपने समाज की बहुलता, विविधता को पूरी दुनिया में डुगडुगी की तरह पीटते हैं, वहीं दूसरी तरफ़ ऐसे किसी भी प्रति विचार को सहने, उससे परिचित होने, अपने अंदर घुलने देने के किसी भी मौके को बनने नहीं देना चाहते। यह उनके अंदर निर्मित हुआ द्वंद्व है, जिसे वह मुखौटे की तरह इस्तेमाल करते हैं। ख़तरा इन्ही से है। यह व्यक्ति, विचार, संस्था, समूह, संगठन किसी भी रूप में परिवर्तित होकर उन दूसरे, तीसरे, चौथे तरह की निर्मितियों को या तो नष्ट कर देना चाहते हैं। या अपने जैसा बना देना चाहते हैं। इसके अलावे कोई और विकल्प या अवसर वह उन्हे नहीं देना चाहते। यह वही हैं जिनकी याददाश्त पता नहीं कितने पुराने ऐतिहासिक तथ्यों तक जाती हैं, जो किताबों को लुगदियों में बदल देते हैं, किसी चित्रकार को देश से निकल जाने के लिए विवश कर देते हैं, मुफ़्त में देश से निकल जाने के लिए टिकट बाँटते हैं, फ़िल्मों के पोस्टर फाड़ते, पुतले जलाते हैं।

दूसरी तरफ़ शार्ली एब्दो से लेकर हर उस मौके पर मुखौटा ओढ़कर सामने आते हैं और अपने द्वारा आयोजित साहित्य उत्सवों में प्रति विचारों के प्रयोक्ताओं के दाँतों, नाखूनों, औजारों के पैनेपन को कम करने में संलग्न रहते हैं। अब यही मुखौटा उन सब लोगों को पहन लेने का वक़्त आ गया है, जो बचे रहना चाहते हैं। जिसके पीछे की पहचान आवाज़, रंग सबकुछ छिप जाये। यह डर नहीं है, कहीं पिछले दरवाज़े से भाग जाना नहीं है। ख़ुद को बचाए रखने की जद्दोजहद है। इस संक्रमण काल में बचे रहने की लड़ाई है। इसे शायद हम इसी तरह से शुरू कर सकते हैं। इसलिए इस शहर में जो अराजक है, और जो जंगल की तरफ़ नहीं जाना चाहते, यहीं इस संक्रामक शहर को जंगल की तरफ़ बढ़ने से रोके रहना चाहते हैं, उन्हे यहीं इस तरह यहाँ रुके रहना होगा। यह मुखौटा ही उनकी ढाल और उनका बहाना है।

जनवरी 16, 2015

दो तस्वीरें..

इसे ढाबली कहते हैं, पर अभी बंद है। एक अरुण की भी है, पान की।

वह बंद है, वह खुली है। जो ट्रॉली के बिलकुल पीछे खुली है,  वही बिसातखाना है। इसकी कहानी फ़िर कभी।


जनवरी 12, 2015

हमारे सपनों का शहर दिल्ली

दिल्ली  हमारे सपनों का शहर। हम कभी सपनों में भी दिल्ली नहीं आपाते। अगर हमारी दादी ने हमारे पापा को बाहर पढ़ने के लिए भेजा न होता। तब यहाँ रहना तो दूर, इसे कभी छू भी नहीं पाते। हम दिल्ली रोज़ सुनते, पर कभी इसे देख नहीं पाते। हम भी वहीं चार-पाँच साल पहले तुमसे शादी और दो बच्चों के बाद या तो चाचा की तरह बंटवारे में अपना हिस्सा लिए, ख़ुद को कोसते ‘चिचड़ी चौराहे’ पर पान की ढाबली खोले बैठे होते या मनरेगा हमें भी लील गया होता। कभी ऐसा भी होता के माता-पिता से लड़ झगड़ लेने के बाद गुस्से में दिल्ली होते हुए लुधियाना पंजाब में कहीं कपड़े की दुकान पर तह लगा रहे होते। या फ़िर संदीप की तरह पूना भाग जाते। वहाँ से पैसा भेजा करते। फ़िर कभी लौटकर गाँव के लड़कों की तरह कैसे भी करके(?) सऊदी जाने के ख़याल में डूब जाते।

ऐसे में अगर कभी गलती से दिल्ली  आ भी गये होते, तो पहाड़गंज रेलवे स्टेशन की तरफ़ रिक्शा खींच रहे होते और जीबी रोड़ के किसी कोठे पर किसी असहाय मज़बूर लड़की में तुम्हारी तस्वीर ढूँढ़ रहे होते। थोड़ा नशा भी करने लगते तो कोई पहाड़ नहीं टूट जाता और न राई का पहाड़ हो जाता। एक मोबाइल तुम्हारे पास भी रख छोड़ते, जिसपर कभी किसी हवलदार की झन्नाटेदार लाठी खाने के बाद हो रहे दर्द और सूज गए पैर पर हल्दी लगा रंग तुम्हें बता रहे होते। उस पल हम दोनों को एक साथ जिंदगी जिंदगी न लगकर नर्क का एहसास करा जाती। तुम अगली गाड़ी से ही यहाँ आ जाना चाहती पर न हमारे पास इतने रुपये होते न उस कमरे में इतनी जगह कि हिम्मत करके तुम्हें तुरंत दिल्ली बुला लेते। एक-एक दिन पत्थर की तरह भारी लगते। जिन्हे उठाते-उठाते कमरदर्द ‘आयोडेक्स’ या ‘मूव’ से ठीक हो जाने की जद से काफ़ी दूर निकल आया होता। फ़िर रिक्शे वालों के सपनों में कभी पीएचडी करने के ख़याल नहीं होते। वहाँ किसी दुकान पर बीवी के लिए पेटीकोट सिलवाने में बच गए दस रुपये और किसी के हाथ माता-पिता के लिए कुछ पैसे भिजवा देने के सपने होते।

अगर ऐसा नहीं होता, तब वहीं बहराइच में पान वाली ढाबली बिठाने और शादी होने से पहले पटहरों की तरह बेरिया, जंगलिया बाबा, देवी पाटन से लेकर दरगाह मेले में फूफ़ा की तरह या तो झंडी लेकर घूम रहे होते या बाबा की तरह मोहर्रम में तहाजियों के जुलूस में जलेबी की दुकान पर चालीसवें तक उधार मिठाई तौल रहे होते। कभी नहीं जान पाते जैसलमेर, राजस्थान में कहीं ‘पटवा की हवेली’ भी है। कोई सुंदरलाल पटवा नाम से किसी सरकार में मंत्री भी रहे हैं। इसी दिल्ली के पहाड़गंज में रामनाथ पटवा गली  है। जनसत्ता में कभी-कभी शुभू पटवा  नाम से लेख आते हैं। जमना पार की दिल्ली में कितनी धर्मशालाएँ, सामुदायिक भवन छितरे पड़े हैं। सदर बाज़ार में इनकी इतनी बड़ी-बड़ी दुकाने हैं कि चले जाओ तो सीधे मुँह बात भी नहीं करते। इधर कई पटवा अपने नाम के आगे ‘देवल’ लगाने लगे हैं। एमएन श्रीनिवास इसे ही ‘संस्कृतिकरण’ की प्रक्रिया कहते हैं। यह देवल ‘देओल’ का अपभ्रंश है। पता नहीं इन्हे कब सनी और बॉबी देओल की तरह माना जाने लगेगा? या शायद कभी किसी फ़िल्म में स्पॉटबॉय के नाम से रोल होता रहे और हमें पता भी नहीं चल पाये।

पटहरों का इतिहास  कभी नहीं लिखा गया। प्रो. तुलसीराम की मुर्दहिया में टिकुली-बिंदिया वाले पटवा सिर्फ़ एक पंक्ति में सिमट कर रह गए। सतीश पंचम  पता नहीं कैसे इस बिसाती  तक पहुँच गए। कुछ तस्वीरें उनके पास भी हैं। उनके गाँव की हैं। नाम पता नहीं। वह मैसूर के किसी अनाम से मंदिर के बाहर सोने के बूंदियों के साथ माला गूथने में लगे हुए हैं। हम लोग पता कभी दो तीन-पीढ़ी पहले बनारस से चलकर बहराइच क्यों पहुँचे थे? अब उसी बनारस से साल में दोबार फूफा सामान खरीदने जाते हैं। कितना अजीब है न। दादी  होती तो ज़रूर कुछ बतातीं। जैसे पता नहीं कितने साल पहले एकबार फैज़ाबाद के भण्डारे की बात बता रही थीं और हम सुन नहीं रहे थे।

{जारी..}

{चौदह जनवरी, आज खिचड़ी है। इसका संशोधित संपादित अंश, आज दैनिक हिंदुस्तान में आया है। पढ़ने के लिए इधर क्लिक करें..फ़िर आई तारीख़ बाईस जनवरी, आज जनसत्ता में, अपने पुराने अड्डे, समांतर पर। }

{बस वहाँ एक गलती रह गयी। प्रो. तुलसीराम की मणिकर्णिका की जगह उनकी आत्मकथा के पहले खंड, मुर्दहिया में वह एक पंक्ति थी। }

जनवरी 11, 2015

इस तरह मैं भी एक विस्थापित हूँ..

दिल्ली। एक जनवरी, दो हज़ार पंद्रह। रज़ाई में बैठे। पैर में मोज़े पहने। वक़्त सुबह के दस बजकर बीस मिनट। कभी-कभी हम बहुत सारी बातें खुद से करते रहते हैं जिनका हमसे बाहर कोई मतलब नहीं होता। हम ऐसे ही कहीं किसी खाली कमरे में बैठे होते हैं। आहिस्ते से अपनी डायरी में बेतरतीब लिख रहे होते हैं:

इसतरह मैं भी एक ‘विस्थापित’ हूँ। अपनी ज़मीन छोड़कर चला आया हूँ। जैसे सब शहरों के गाँव होते हैं, मैं भी अपना गाँव छोड़कर आया हूँ। उन जगहों को अपनी रगों में ले आया हूँ। असल में वह मेरा गाँव ही है। मेरे लिए गाँव का मतलब, जड़ें हैं। जहाँ से मैंने लिखना शुरू किया। आड़ा-तिरछा उल्टा-सीधा जैसा भी था, वह मन के अंदर कहीं गहरे अपनी छाप के साथ बैठा है।

हो सकता है, किसी दिन किसी पुरानी याद की तरह उस जगह पर लौट जाऊँ। लौट ही जाऊंगा कभी, कह नहीं सकता। कभी नहीं लौटूँगा, यह भी नहीं कहूँगा। जहाँ मैं था, वहाँ मेरे पास एक-एककर रुके रहने के बहाने कम होते जा रहे थे। बहाने ख़त्म हो जाने के बाद एक दिन मुझे वहाँ से चल पड़ना था। ठहरे रहना, उन्ही बातों में फँसे रहने जैसा था। इतना लिजलिजा होकर मैं कह नहीं पाता। इसलिए एकदिन, अचानक बिन बताए, गायब हो हाने से अच्छा था, सबको कहकर आना। हरतरह के इंतज़ार को ख़त्म कर देना। वहाँ एक चिट्ठी छोड़ आया हूँ। उसमें लिख दिया है। लिख दिया है, इंतज़ार मत करना। बहुत हल्के से, कान में कह दिया है। 

इस नयी जगह का भी कोई नक्शा मेरे पास नहीं है। कौन-सी चीज़ किस जगह रखनी है, सब नए सिरे से देखना होगा। नीचे के ताखे में कोई कतरन छूट जाने पर चूहों का डर नहीं रहेगा। किन्हे बिल्ली के कारण ‘सिकहर’ पर ऊँचे टाँगना होगा। ‘डेहरी’ में क्या-क्या आगे आने वाले दिनों के लिए बचाकर रख लेना है? ‘मसेहरी’ पर किस वक़्त कौन आजाता है, यह भी नहीं पता? ‘दुआरे’ किसे खड़ा करने से काम चल जाएगा? सब एकदम खाली घर के अकेले कमरे की तरह है। लगता है, अभी-अभी किसी भरी गाड़ी से उतरकर खड़ा हुआ हूँ।

इसे अभी किसी खाँचे में नहीं डाल रहा। हो सकता है, शायद यह भी पिछली डायरी की तरह बनती जाए। कई सारी चीज़ें हूबहू वहीं हों। मैं चाहकर भी उनसे कभी बाहर न निकल पाऊँ। इसमें कुछ भी नया न कर पाऊँ। और एकबार फ़िर लगने लगे कि ख़ुद को दोहराता रहूँ, तब यहाँ भी वैसा ही एक दिन यहाँ भी आएगा, जब यहाँ से लौट जाऊँगा। यह दोहराव उन्ही मनः स्थितियों के इर्दगिर्द घूमते रहने के बाद निकली खीज है। ख़ुद को कहीं भी ‘फ़िट’ न करपाने के बाद उपजी ‘टीस’ है। अंदर-ही-अंदर रिसती बातों का बाहर आकर ‘बेतरतीब’ हो जाना है। उन्हे कहाँ, कौन, कैसे, किस तरह उठाकर अपनी जेब में रख लेगा, पता नहीं। क्या पता मेरी तरह उनकी जेब भी फटी हो?

यहाँ आकर एकबार फ़िर अपने जैसे लोगों को ढूँढ़ने की तकलीफ़ देह पड़ताल शुरू कर रहा हूँ। फ़िर बनाऊँगा सपनों की दुनिया। एक यादों की किताब। मेरे अनछुए दिनों की याद। छुटपन की दुपहरियों की याद। छोटे भाई के साथ छत पर खेलते रहने वाली शामों की याद। तब घड़ी देखने से कहीं आज़ाद ख़याल था, खेलते हुए ढलती शाम देखना। उन शामों के बाद उतरती रातों में तारों को दिल में उतरते देखना। इसतरह यह एकबार फ़िर लिखने की ज़िद का अंदर से बाहर की तरफ़ आ जाना है। अंदर से बाहर देखने के लिए खिड़की की ज़रूरत है। बाहर से अंदर झाँकने के लिए भी यह उतनी ही ज़रूरी होगी। आज से इसका नाम ‘दीवार में खिड़की रहती है’ रख देते हैं।

जनवरी 10, 2015

वापसी..

एकबार एक कहानी में एक स्टेशन मास्टर होते हैं। उनकी उमर इतनी लगती कि लगता अभी कल ही नौकरी से जा रहे हैं। पर सालों से कहीं गए नहीं थे। तब हमारे पास बुलेट ट्रेन का सपना दिखाने वाले जादूगर नहीं थे। यह तबकी बात है जब हमारे पास ठीक-ठाक रेलगाड़ी के डिब्बे बनाने वाले कारखाने नहीं थे। मालगाड़ियाँ भी गिनती की थीं और सवारी-गाड़ियाँ उनसे भी कम थीं। जितनी पटरियाँ थीं, सब खाली थीं। उन खाली पटरियों से दिनभर ख़ूब खाली वक़्त निकलता रहता। यही खाली वक़्त इत्मीनान और सुकून बनकर स्टेशन को चारों तरफ़ से घेरे रहता। स्टेशन मास्टर का स्टेशन से अलग कोई अस्तित्व नहीं था। अगर कोई अस्तित्व था भी, तो उनका अस्तित्वबोध अभी जागा नहीं था। फ़िर इसे समझने के लिए उनके पास इतनी पढ़ाई नहीं थी। उनके घर की अलमारी में कभी नीत्से, सार्त्र के नाम वाली कोई किताब नहीं थी।

उनके पास सिर्फ़ एक घर था। ऐसा वह अक्सर सोचा करते। सोचा करते, वह एक दिन अपने घर लौट जाएँगे। वैसे अधिकतर उनका दिमाग कभी खाली नहीं रहता। हमेशा दूध जलेबी के गरमा-गरम स्वाद से भरा रहता। उनका नौकर, नौकर न होकर उन खाली क्षणों को सुखद अनुभूतियों में बदलने वाला सहायक बन जाता। ख़ूब आनंद के दिन थे। इसलिए एक दिन वह रिटायर हो गए। सब खाली पटरियाँ वहीं रह गईं। सब रेलगाड़ियाँ वहीं छूट गईं। छूट गए सब जलेबी वाले दोने, दूध और मलाई से लबालब भरे गिलास। कुल मिलकर सुख छूट गया। वह घर वापस आ गए। उस घर वापस आ गए, जहाँ इतने सालों में वह पत्नी, बच्चों, बहुओं के साथ कभी नहीं रह पाये थे।

इससे मिलती-जुलती कहानी सालों पहले कभी उषा प्रियंवदा ने भी लिखी थी। कहानी पुरानी है और कहीं इंटरनेट पर मौजूद भी होगी। इसलिए आगे क्या हुआ (?) यह नहीं बताने वाला। शायद इतना कहना काफ़ी होगा कि वह चीफ़ की दावत  वाली बूढ़ी माँ नहीं, स्टेशन मास्टरी से रिटायर हुए पिता हैं। पता नहीं इस बात का कोई मतलब है भी या नहीं। पर कहीं-न-कहीं लगता है, कहानी में एक घोड़े की कमी है। वापसी सिर्फ़ स्टेशन मास्टर की नहीं, एक घोड़े की भी होनी चाहिए थी। कैसे भी करके वहाँ एक घोड़ा होना चाहिए। भले वह काला होता, सफ़ेद होता, फ़र वाला होता या कैसा भी होता (?) पर होता ज़रूर। उसका होना ज़रूरी था। मेरी कहानी में मेरा ब्लॉग, मेरा घोड़ा है।

यह घोड़ा उस दिन मुझे फ्योदोर दोस्तोएवस्की  की कहानी में मिला। कहानी में एक आदमी है। वह अंदर से जितना दुखी है, बाहर से भी उतना ही दुखी है। कभी वह चिल्लाता, कभी किसी से झगड़ने लगता। उसने कभी अपने दुख को किसी से नहीं छिपाया। इस कारण लोग उससे कटने लगे। कोई सीधे मुँह बात नहीं करता। जैसे-जैसे दिन बीतने लगे, उसका व्यवहार असामान्य होने लगा। सब उसे पागल कहने लगे। उसने भी इस छवि को ओढ़ लिया और पागलों की तरह रहने लगा। एक शाम, किसी बात पर वह शहर छोड़ देता है। उसके साथ सिर्फ़ एक घोड़ा है। दोनों शहर से बहुत दूर जंगल में कहीं भटक जाते हैं। चलते-चलते दोनों थक जाते हैं और थककर रुक जाते हैं। तब वह व्यक्ति अपनी सारी बातें उस घोड़े के सामने बुदबुदाने लगता है। घोड़ा भी आदत के मुताबिक अपनी गर्दन हिलाने लगता है।

हिलती गर्दन देखकर उसे लगता, घोड़ा बहुत ध्यान से उसकी बातें सुन रहा है। इसतरह वह बोलता रहा और घोड़ा गर्दन ऊपर-नीचे करता रहा। वह पहला जीव था, जो चुपचाप उसकी सारी बातें सुन रहा था। यह देखकर वह लगातार बहुत दिनों तक बोलता रहा कि बर्फ़बारी के कारण घोड़े के सिर पर बर्फ़ जमा हो गयी। बर्फ़ घोड़े की आँख के आसपास इसतरह इकट्ठी हो गयी कि जैसे वह उन बातें सुनकर रो रहा हो। यह देखकर वह आदमी भी द्रवित हो जाता है। अपने आँसू रोक नहीं पाता। और ख़ूब रोता है। ख़ूब रोता है।

उसे अपनी ज़िन्दगी में सिर्फ़ एक घोड़े की ज़रूरत थी। हम सबके पास भी अपने-अपने घोड़े होते हैं। हम इसे कभी घर, सपने, दोस्त, मन, डायरी या ऐसे ही किसी भाववाचक संज्ञा में तब्दील कर लेते हैं। लेकिन सबसे ज़रूरी है, इनकी पहचान। अट्ठाइस दिसंबर के बाद दिन में कितनी बार मुझे कुछ खाली-खाली सा लगता। लगता कुछ छूट गया है। मेरा मन कहीं रह गया है। कहने का मन करता, पर कह नहीं पाता। अंदर-ही-अंदर रिसता रहता। ऐसा नहीं था, कहने के लिए बहुत सारी बातें होतीं। चुप रहता तो भी मन करता, उसे कह पाता। बार-बार लगता, कहीं बहुत दूर चला आया हूँ। वहाँ से लौट आने का मन करता। मन करता, झट से सब कह दूँ। मन के अंदर कोई सिलवट बनने से पहले, बोलने जैसा। जैसे, कभी कहीं बहुत दूर जाकर लौट आने का मन हो, उसे घर कहते हैं। उसी तरह मैं भी धीरे-धीरे लौट रहा हूँ।

फ़िर इधर तीन दिन पहले अशोक वाजपेयी की कविता पढ़ रहा था। दरवाज़ादरवाज़ा खुल सकता था। कोई खोले तभी नहीं। अपने आप भी, क्योंकि पूरी तरह बंद नहीं था। किसी ने किया ही नहीं। सबको जाने की जल्दी होती है, ठीक से बंद करने की नहीं। जाने के बाद दरवाज़ा भुला दिया जाता है। अगर न जाते और वहीं बंद या घिरे रहते तो दरवाज़ा बना रहता। दरवाज़ा घेरे हुए को रोकता है और अनघिरे को अंदर आने से थामता है। दरवाज़ा न हो तो घिरा-अनघिरा गड्डमड्ड हो जाये। आवाजाही दरवाज़े से होती है: पर फ़िर भी थोड़ा सा बाहर अंदर और थोड़ा सा अंदर बाहर फिसल ही जाता है क्योंकि दरवाज़ा कभी पूरी तरह से बंद नहीं होता। हम ऐसा करना जानबूझकर भूल जाते हैं

यह हमें तय करना है, हम दरवाज़े के किस तरफ़ हैं? और इसतरह मैं दोबारा लौट आया, इसी दरवाज़े से अंदर।

आवाज़ें..

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