फ़रवरी 28, 2015

कमरा जो छूट रहा है..

आज शायद इस कमरे में आखिरी रात होगी। इसतरह अभी सुबह इस कमरे में लिखी जा रही यह आख़िरी पोस्ट। छूटना सिर्फ़ बिन हड्डी वाले नरम दो हाथों का नहीं होता। कमरे भी छूटा करते हैं। यह स्थापत्य कला का कोई बेजोड़ नमूना नहीं है, हमारी न जाने कितनी ‘यादों का घर’ है। इसे एक दिन ऐसे ही चले जाना था। पता है जब हम बहुत छोटे हुआ करते थे और कोई मेहमान इस कमरे में आकर रुकते तब हमसब वहीं दरवाज़े से झाँककर अंदर जी भर देख लिया करते। यह हमारे छोटे से दिल की एक छोटी सी तमन्ना थी। हम मनाते के लौटते वक़्त वह इधर वाली खिड़की की कुंडी लगाना भूल जाएँ। उनका भूलना, हमारे लिए चुपके से तपती दुपहरी में अंदर आने का बहाना होता। पर ऐसा कर जाने के लिए कितनी ही डांट सुनते। फ़िर अगलीबार के लिए तय्यार रहते।

यह कमरा दुनिया के किसी भी हिस्से में नहीं हो सकता था। इस छत को मेरे सिर के ऊपर ही होना था। यह मेज़ जिसपर किताबें धूल की तरह अटी पड़ी हैं, पता नहीं कितने पन्ने इस मेज़ पर लिखता रहा। जब नीचे वाली कुर्सी छूटी, तबसे यहीं इसी कमरे में आकर छिप जाता। किसी से कुछ नहीं बोलता। चुप बैठा रहता। मेरे उन खाली दिनों में सबसे कम सवाल इसने पूछे। इसने मुझे ऊब से बचने की तरकीबें सुझाई। कभी ख़ुद ऊब बनकर खड़ा हो गया। कहीं बाहर अकेले होने से डर नहीं लगता। डरता हूँ, ऐसे अकेले बैठे रह जाने से। यह मेरे सबसे भावुक क्षणों का साथी बना, जिसने कभी कुछ न बोलकर मेरा साथ दिया। यह मेरी डायरी की तरह मेरा ‘कमफ़र्ट ज़ोन’ है। यह नीचे से भाग लेने के बाद मेरे अंदर की तरह ही खाली-खालीसा लगता यहीं चला आता। थोड़ी देर सोचने पर लगता, मेरी प्रकृति में यह कमरा ‘स्थायी भाव’ की तरह है। कभी भी कहीं नहीं जाने वाला। वह इसके गायब होने के बाद भी कहीं नहीं जाएगा। 

यहीं मैंने इतनी पास के छिपकली को देखा। उसके पास होने को कितनी बार महसूस किया। पता नहीं जब दो दिन बाद यह ट्यूबलाइट नहीं रहेगी, तब वह कहाँ जाएगी? यह कमरा हमारी पूंछ था। यह अब छूटा जा रहा है। यह कभी दोबारा हमारे अंदर से उग भी पाएगा, कह नहीं सकता। इसी ने खिड़की के बाहर किसी लड़की के खड़े होने वाले लड़कों और गली से गुज़रती छतरियों को देखने का मतलब बताया। आम के पेड़ पर आती बौर सबसे पहले नवंबर में देखी। किसी को नहीं बताया। बस चुपके से मन में कहीं लिख लिया। पिछले साल आम नहीं आए थे। इससाल आ रहे हैं। अभी तक जो ठंडक इस चारदीवारी में सबसे जादा लगती थी, वह इस ठंड में नहीं लगेगी। एकतरह से इसकी दिवारे मेरे लिए कछुए की तरह खोल की तरह बनती रही। अपने अंदर अंग-अंग छिपा लेने की आदत में यहीं सीखी।

कल या ऐसे ही किसी सुबह जब हम छत पर वापस लौटेंगे, यह कमरा ईंटों में बिखर चुका होगा। दीवारें जो छत का बोझ उठाए इतने सालों से खड़ी हैं, वह बैठ कर सुस्ता रही होंगी। छत की भी कमर में होता दर्द अब कुछ कम हो जाएगा। सारी नसें एकबार में खुल जाएंगी। फ़िर दीवार में खिड़की नहीं रहेगी। उसके आरपार देखने के लिए अब किसी लकड़ी के साँचे की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। छतपंखा जो पता नहीं बीते कितने सालों से बंद पड़ा है, अब कबाड़ी के यहाँ पहुँचकर थोड़ा आराम कर लेगा। वह सारी मकड़ियाँ अपने जालों के गायब होने के साथ ही कोनों में छिप जाएँगी। तभी कितनी ही बार कहता रहा घरों से पहले, घरों में मकड़ियाँ रहती हैं। वह लाखों चींटीयाँ छत के अपने बिलों से बाहर खदेड़ी जाने वाली हैं, उन्हे इसका एहसास भी नहीं है। सब चुपचाप कहीं और चली जाएँगी।

हम भी फ़िर कभी नहीं लौट पाएंगे अपने इस कमरे में वापस। हम भी इस कमरे के एक मेहमान थे। जो अपने साथ दीवार घड़ी के कुछ नहीं लाये। एक कील भी हमारे हाथों से यहाँ कभी कहीं किसी दीवार पर नहीं लगी। इतने साल गुज़रते गए और हम कभी कोई कैलेंडर कील की तरह नहीं लगा सके। आज इन बीसियों सालों से बेरंगी दीवारों की याद, ऐसे ही लेजाकर कहीं किसी कोने में रख दूंगा। खिड़की के बिलकुल बगल वाली दीवार पर स्याही के छींटें, मेरे मन पर कभी नज़र न आने वाली लकीरों में तब्दील हो गयी हैं। वह भी इतनी पुराने हो चुके हैं, जिनका रंग मेरे सफ़ेद पड़ते चेहरे की तरह उड़ गया है। बस छोटी-सी तमन्ना है, इन किताबों के साथ मेज़ की तस्वीर लगाने का। ढूँढ़ता हूँ, कोई पुरानी तस्वीर मिल जाये। कभी वापस न लौटने से पहले उसकी याद में एक कील यहाँ भी लगाता चलूँ।

तस्वीर में दीवार पर पड़े छींटे अब मन पर छप चुके थे, लैपटॉप के पीछे फिरोज़ी कप में रखे पैन और बाकी सामान छिपे रह गए हैं। बस उसपर खिड़की की परछाईं दिख रही है, मेरी डायरी भी कहीं छिप गयी है। मेज़ के नीचे रखी किताबों की तरह।

{आज हिंदुस्तान में इसका छोटा-सा हिस्सा। तारीख़ पाँच मार्च। पढ़कर दिल और बैठ गया। ख़ैर, जो वहाँ पढ़ना चाहें, उनके लिए साइबर संसार  वाले पेज का पीडीएफ़ का लिंक दे रहा हूँ। }

फ़रवरी 18, 2015

एक छोटी-सी झोपड़ी थी

वह एक छोटीसी झोपड़ी थी। उन सबने मिलकर उसका नाम झोपड़ी ही रखा था। शहर और सड़क कही जाने वाली संरचनाओं से बहुत दूर। हमारी परछाईं से भी बहुत दूर। कहीं दिखाई न देने वाली जगह के पास। वहाँ तक जाने वाले रास्ते को वह कितना भी याद करतीं, वह कभी याद नहीं रहता। यह भूल जाने के बाद याद आती याद की तरह था। अपने भीतर झाँकने के बाद दिखाई देती रौशनी की तरह। ख़ूब झाड़ी झंखाड़ थे। घास घास न रहकर नुकीले काँटों में तब्दील हो गयी। मिट्टी का मुलायमपना पानी के न रहने पर उसे और खुरदरा बनाता गया। गेंहुआ किराट साँप केंचुए बन गए, अजगर बिच्छू में बदल गए, मिट्टी इतनी भुरभुरी हो गयी के दलदल बनती गयी। उसमें तारकोल की गंध नहीं थी, पर एड़ी बिलकुल वैसे ही फट जाती। नसों में ख़ून वहाँ की हवाओं में सूख गए पानी की तरह सूख गया। इसलिए किसी के भी लिए फटी बिवाइयों के दर्द महसूस करने की किसी भी संभावना के लिए कोई जगह नहीं थी। फटी एड़ियों के लिए कोई दर्द वहाँ मौजूद नहीं था। सच में वहाँ ऐसी कोई भाषा भी नहीं थी, जिसमें वह अपनी बात कह सकें। यह अबोलपन चुप रहना नहीं, चुप रह अपनी साँसें सुनते जाना था। 

सब उस रास्ते पर चुप धीर शांत होकर अपना रास्ता पूरा करते चलती जातीं। कतार में। कतार से बाहर। साथ में। साथ से बाहर। किसी को एकबार छूकर देखने, पास आकर महसूसने का भी वक़्त नहीं था। वहाँ पहुँचने वाली सभी औरतों के पेट अगले कुछ घंटों में अपना-अपना बच्चा लिए आहिस्ते सेपच लहरय निकल पड़ती। सब सदियों से सुनती आ रही थीं, उस सूरज की पहली किरण के साथ पैदा हुआ बच्चा अपनी ज़िन्दगी में कभी बीमारी नहीं होगा। उनके ससुर, उनके पिता, उनके पति, उनके भाई सब यहीं पैदा हुए। आजतक कोई नहीं समझ पाया, वहाँ होने वाले बच्चे हमेशा लड़के ही क्यों होते? यह जानने की कोशिश सब करते, पर जान कोई नहीं पाता। जो जानने के लिए जाते, वह कभी लौट नहीं पाते। जानना उनके लिए ज़रूरी भी नहीं था। ज़रूरी था जच्चा-बच्चा का वापस लौट आना।

उस महादेश में थकी हुई औरतें ही एकदूसरे का सहारा होतीं। उनके साथ आए सब लोग इस जगह से कोसों दूर एक झोपड़ी के इर्दगिर्द डेरा डाले, सिवाए इंतेज़ार के कुछ नहीं करते। वहाँ सूरज कभी नहीं ढलता। जहाँ उनकी यह सब औरतें जा रहीं थी, वहाँ सूरज कभी नहीं उगता। सब बदहवास से, पसीने से तरबतर होते रहते। दर्द सीने के नीचे उतर पेट से होते हुए गुज़र जाता। सब एकसाथ उस पीड़ा से गुजरते। कोई किसी से कुछ नहीं कहता। बस आँखों में लौट आने का संतोष दिखता। वह कहने को होतीं। पर दर्द के मारे खड़ी नहीं हो पातीं। सब अचानक दीमक लगे पेड़ की तरह भरभरा कर ढह जातीं। उनके निढाल पीले मुरझाए चेहरों पर गुलाबी पसीने की बूँदें फूलों की ख़ुशबू लिए होते। अब सब यहाँ से ज़िंदा लौटने के लिए वापस तय्यार होने लगते। सब एकबार फ़िर उस सूख गए तालाब की मिट्टी से अपना सिर भिगोते हुए ख़ूब रोते। रो रोकर बेहाल हो जाते। यहाँ से कोई जिंदा पैदा लड़की वापस नहीं ले जा पाता। वह माँस के लोथड़ों को वहीं गाढ़ देते।

सब अपनी दुनिया के ख़त्म होने की कहानी जानकर रोते। उन्हे पता चल गया, उनकी दुनिया अब नहीं बचेगी। इसलिए बारबार रोते। रोना ही उनकी भाषा का पहला और आख़िरी शब्द था। वहाँ से जिंदा लौटकर वह अपनी कहानी बता रहा है। लौटकर रेत में मिले खून की गंध हम तक ला सके। कह सके थोड़ी देर में हाँफने के बाद उनकी आँखों में छा गए सच की बात। वह ज़िंदा भी शायद इसलिए रहा। के लौट सके।

फ़रवरी 17, 2015

चुप घर..

उसने अपने एक कमरे वाले शहर के बाहर कई कमरों वाले शहर की संभावनाओं से कभी इंकार नहीं किया। पर उसे पता था, कोई जितना भी कहे, बाहर का शहर उसके अंदर कभी दाखिल नहीं हो सका। उसने अपने शहर को नाम दिया, घर। घर ही उसकी छोटी-सी दुनिया थी। वह बाहर कहीं भी रहता, वापस इस दुनिया में लौट आने के लिए बेचैन होने लगता। उसकी पत्नी चूल्हे पर पतीली रखकर रोज़ भूल नहीं जाती। बस यह उसकी इधर की सबसे नयी आदत बन गयी। पिता अख़बार में बगुले की तरह सिर घोंटे रहते। माँ घुटनों के दर्द में अपने पुराने दिन याद किए रहती। भाई उसकी तरह ही मास्टरी करता था, पर छुट्टी नहीं करता। उधर छुटकी जाती हुई ठण्ड में बाहर कुर्सी लगाकर, गणित के सवालों से भिड़ रही होती।

सब एकसाथ कभी बाहर नहीं निकलते। बारी-बारी निकलते थे। बाहर निकलना वापस आने के लिए ही होता। कहीं कोई एकरात रुक जाने की मज़बूरी में भी आख़िरी गाड़ी से लौट आना चाहता। किसी को भी अगर रहना पड़ता तो सब एकही बात कहते। इसबार नहीं अगली बार सब आएंगे, तबरात क्या पूरे हफ़्ते रुक जाएँगे। इस तरह वह छहों हमेशा एकसाथ एकदुनिया में रहना चाहते। भले घर में सिर्फ़ एक कमरा था, पर लौटना किसी ठंडी दोपहर बैंगन के भरते में पड़े अदरक की तरह, उनकी जीभ और दाँत के बीच पड़ गयी किसी सुखद अनुभूति से कम न था। उस फूले की हँडिया में चुरती खिचड़ी के साथ उबलते टमाटरों की तरह होते। उनका हरदिन उरद भात बरिया खाने की खुशी से भरा होता। आम के गलके की मिठास लिए होता। गुड़ से भी जादा। बताशों से भी मीठे।

सब बारीबारी घर से बाहर निकलते और बलब की रौशनी में अपने चुप घर को देखते। जो बाहर नहीं निकलते वह घर के अंदर से ही देखते रहते। उनके घर में इस रौशनी के अलावे और कोई उजाला नहीं होता। बाहर छज्जे पर लगे बल्ब में बिजली नहीं थी। बिजली सिर्फ़ उनके घर में नहीं पूरे मोहल्ले में नहीं था। इसलिए हरशाम ढबरी के धुएँ से घर ढक जाता। वह दूर से इस धुएँ के ढकने को देख समझ जाता शाम हो गयी और वह वापस घर लौट पड़ता। एक शाम उसकी साइकिल पंचर हो गयी। थोड़ी देर वहीं दूर पेड़ के नीचे इंतज़ार करतेकरते वह थक गया। अचानक उसने देखा इसबार धुएँ के बादलों ने घर को ढक लिया। वह समझ गया। घर में ढबरी नहीं जली है। 

कहते हैं, उस शाम के बाद वहाँ कभी कोई वापस नहीं लौटा। तब से वह घर, चुप घर है।

{चुप घर की पिछली किश्त }

फ़रवरी 11, 2015

उस रात की सुबह नहीं

ऐसी रात फ़िर कभी न आए। पूरी रात मम्मी के बाएँ पैर में दर्द इतना असहनीय बना रहा कि एक पल के लिए भी कहीं सुकून नहीं मिला। पैर फैला लेना तो दूर की बात है। रह रहकर उस अँधेरे कमरे में रोने को हो आता। कि मम्मी का पैर सवा नौ बजे के बाद ऐसा होता रहा। ग्यारह बजे बिजली की तरह कमरे में आया और घर की चाभी लेकर निकल गया। कुछ उन्होने कहा भी होगा तो पंखे की आवाज़ उसे खा गयी होगी। होते-होते रात के बारह बज रहे थे। इंतज़ार की भी हद है। मैं बगल में नहीं था। मम्मी बार-बार देखती होंगी दरवाज़े की तरफ़। पर घंटे भर बाद भी नहीं लौटा। दरवाज़ा बंद करने से पहले भी एकबार नाम सुनाई दिया तो लगा, कान बज रहे हैं। थोड़ी देर बाद फ़िर मम्मी ने तेज़ से कहा। छुटकी बोली- क्या हुआ मम्मी? इतने में नीचे से घबराता में ऊपर भागा आया।

पहली बार उनके बगल में लेटने का मतलब समझ आया। जबकि मुझे वहीं होना था, पर नही हो पाया। नीचे लैपटॉप पर चिपका मकड़ी के जाले बुन रहा था। हम लोग एक पल के लिए भी चैन से नहीं बैठे हैं। ऐसा क्या कर दें कि दर्द कम हो जाये। कितनी बार नीचे गया। कभी केसरी मलहम लाया, कभी उस लाल झोले से अजूबी टैबलेट। वापस पापा के कहने पर पटरे पर रखी अँग्रेजी दवाई लाया। दोबार ऑफिस के फ्रिज़ से दूध लाया। एक बार फ़िर उस गरम सिकाई वाले पाउच को लाया। पर किसी से भी राहत नहीं मिली।

मम्मी कहतीं घुटना नहीं मुड़ रहा है। अंदर टिप-टिप हो रहा है। हम बस बोलते ठीक हो जाएगा। पर नहीं। पहले भाई को जगाया। उसने पैर दबाना शुरू किया। फ़िर करीब पौने एक बजे पापा को भी मम्मी ने बुला लाने को कहा। पापा भी वहीं छुटकी वाले दीवान पर पलाथी मारकर बैठ गए। हम सब मूकदर्शक बने उस पीड़ा को अपने अंदर महसूस कर लेने की कोशिश करते रहे। कितने सालों से मम्मी अकेले ही इस दर्द को सहते जा रही हैं। यह पहली रात है, जब हमसब उसे छू पाये। कितनी विकट कातर-सी आँखों से बारी-बारी मम्मी हम सबकी देखतीं। शायद ऐसा करने से भी दर्द कुछ कम हो जाता होगा। भाई लगातार मालिश करता रहा। पर पैर दर्द कर रहा था। सारी तरकीबें, इलाजों का हासिल कुछ नहीं। इससे जादा क्या कर सकते थे हम सब? पैर भी भाई इधर-उधर कर रहा था। इतना दर्द था।

हम सबका कमरे से भाग लेने का मन रहा होगा। भाई सबसे पास था। कभी उसकी आँखों से पढ़ने की कोशिश करता। हम सब कितने असहाय हो जाते हैं, इन क्षणों में। जो कर रहे हैं, उससे कुछ फ़ायदा क्यों नहीं हो रहा? यह टूटना बिखरना सतह पर नहीं, कहीं दिल की गहराई में काफ़ी नीचे घटता रहता है। पापा मम्मी के लिए क्या कर सकते हैं? कुछ नहीं। यही सोच रहे होंगे। एक दस पर खाई दवाई अपना असर नहीं दिखा पायी थी। अभी बुधवार डॉ. सुजाता से मिल आना। दवाई बदल देंगी। तब और जल्दी असर होगा। मैं बच्चों की तरह कहता रहा, सब ठीक हो जाएगा। मम्मी भी बस देखती रहीं। बीच-बीच में पापा कभी दही तो कभी काले रंग वाले कैम्पा को दोबार पीने को इस दर्द का कारण बताते। भाई कुछ भी नहीं कह पाता। बस वहीं चुपचाप बैठा रहा। देखता रहा। 

हम सब मिलकर उस कारण पर पहुँचना चाहते थे, जहां से यह दर्द चलने नहीं दे रहा था। मम्मी के सामने तब छोटी हो गयी तार को पार करना कितना अश्लील लगने लगा। यह कितना अमानवीय है। हम जो अपने हाथ पैर इतनी सहजता से हिला डुला पा रहे हैं, वह दिखता भले कितना आसान हो, पर हमारे सामने बैठी माँ उतनी गतिविधि करने में भी असमर्थ थीं। पूरी रात पता नहीं किन किन यादों में डूब गई होंगी। हमने किसी का कुछ नहीं बिगाड़ा। हमारे साथ यह क्यों हो रहा है? एकबार बोलीं, जब पूरे शरीर में दर्द फैल गया, तबतो हम डॉक्टर के पास गए। इतनी जल्दी फ़ायदा कहाँ से होगा। नानी भी कितनी याद आई होंगी मम्मी को। और भी पता नहीं कितनी सारी बातें घटाटोप की तरह अंदर ही उमड़ती-घुमड़ती रही होंगी। कहने का मन होगा पर कहने से और जादा दर्द होगा। 

बस रात से इस शाम की तरफ़ आते हुए हुआ इतना है कि बगल वाले कमरे में बीच-बीच में मम्मी की आँख लग जाती है। पूरा दिन लेटी रही हैं। अभी भी घुटना मुड़ नहीं रहा है। करवट हो जाती थीं पहले, अब रात से वह भी नहीं हो पा रहीं। बस लगता है दवाई का थोड़ा असर है। दर्द रात से कम है। छुटकी को जब अभी तीन बजे नीचे से भेजा तो अख़बार लेकर आई। मुँह पर अख़बार चढ़ाये सारा वक़्त पढ़ती रही। मम्मी का दर्द नहीं देख पाती। उसे भी दर्द होता है। रात में थोड़ी थोड़ी देर के लिए जागती, फ़िर जलती लाइट में सोने की कोशिश करने लगती। पापा नीचे वहीं लेटे हैं। छुटकी के बगल। सारी जगह उसने ले रखी है। पापा फ़र्श पर हैं। वह दरी पर। भाई यहीं रात की नींद पूरी कर रहा है। चार बजे लगभग लेटा है। फ़िर वहीं कुर्सी पर भी ऊँघ रहा था। बस यह कमरा रात के इस कमरे की तरह अस्पताल का जनरल वार्ड लग रहा है। हम सब बीमार हो गए हैं। अंदर से खाली-खाली। उदास। अनमने। कोहनी में सिर छिपाये। 

(डायरी में बीते साल; चार अगस्त, शाम साढ़े पाँच बजे।)

आवाज़ें..

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