मार्च 28, 2015

तब उसने ख़त लिखा..

वह कभी अकेले निकल जाता और किसी पेड़ के नीचे बैठ दिमाग में घूमती हरबात को सुनने की कोशिश करता। आज शाम अँधेरे के साथ बरसात में सड़कें गीली थीं। उसके मन के भीतर वह किसी पल फिसल गया। इतने सालों में उसने कभी ध्यान से नहीं सोचा लगातार उस चारदीवारी में उसकी बातों की जगह सिमट कर उसकी जेब के आसपास रह गयी। यह एहसास पता नहीं उसे कैसा कर गया? वह वहीं इन भावों को किसी चित्रकार की तरह उतार लेना चाहता, पर उसकी बगल में वह भी नहीं थी। उसे कुछ तो उसके न होने ने अकेला कर दिया, फ़िर इस ख़याल ने कि जब वह अभी कुछ देर बाद घर लौटेगा, उसकी आवाज़ भी वहाँ नहीं होगी। उसकी परछाईं मन से निकलकर कभी कहीं नहीं जाती।

उसे अकेले ही सब फ़िर से संभालना होगा। मन की परतों में छिप गयी बातों को शब्दों में ढालकर उसे कहने और सुने जाने के दरमियान एकबार फ़िर से बुनने की कोशिश शुरू कर देनी थी। वह हर पल अनगिन बार ऐसा करता और हरबार उसके मुँह से थूक के सिवाय कुछ नहीं निकलता। कभी वह अकेले कमरे में किसी के न होने पर उन्हे बड़बड़ाते हुए दोहराता, पर सामने पड़ते ही कुछ कह न पाता। वह शायद उन्हे कभी कहना भी नहीं चाहता होगा। कहना, उसे कुछ टूट जाना लगा। फ़िर वह कुछ भी तोड़ देने के हक़ में नहीं रहा होगा। इसलिए सबकुछ अंदर-ही-अंदर निगलता रहा। उसे लगता कितनी ही बातें-बेबातें उमड़ती-घुमड़ती रहीं, जिन्हे वह कह नहीं सका होगा।

वह धीरे-धीरे उनसे बात करने की आख़िरी कोशिश याद करता रहा। उसकी याद उस रात होती शाम पर ठहर गयी, जब वह महीने भर की उलझन के बाद अपने दिल को उनके सामने खोल देना चाहता रहा। उसबार वह उस लड़की की बात कर लेने का मन बनाता रह गया, जिसके लिए उसे दिल के किसी कोने में एक मुलायम कोना लगातार बनता रहा था। वह चाहकर भी अपने प्यार को नहीं कह पाया। अंदर ही धागे उलझकर रह गए। यह शाम उसने सिर्फ़ अपने अंदर लिखकर एक याद की तरह रख दी। फ़िर कई सालों बाद उसने यह बात अपनी परछाईं को बताई। फ़िर परछाईं ने किसी को नहीं कही। वह उसी की तरह उसके साथ चुप रहने लगी। बिलकुल चुप। इसतरह वह अब एक नहीं दो हो गए। उसने उसे एक और नाम दिया, डायरी। दोनों छिपकर कहीं अँधेरे कमरे में मिलते। उसमें रौशनी की एक किरण दोनों को एकबार फ़िर मिला देती। दोनों मिलते, चुप रहते। कहने को होते तब भी चुप हो एक दूसरे में डूब जाते।

इसतरह उसने उसे एक और नाम दिया, उदासी। खाली बेकार पन्नों की तरह उसका मन भी उदास अनमना होता रहता। तब वह ख़ुद को कमरे में बंद कर लिया करता। सबको लगता वह अकेला है। पर नहीं उसकी उदासी उस खाली कमरे में अकेले नहीं रह पाती।

यह बातें न कह पाना उसे चिड़चिड़ा बनाता। उसमें गुस्से की तरह बातें भर जातीं। फ़िर भी वह कुछ कहता नहीं। सब सुन कर भी जज़्ब किए रहता। कोई उसे देखता तो उसे बातों को सोखने वाला सोख्ता कहता। पर वह किसी को दिखाई कहाँ देता (?) जब ख़ुद अपने घर में किसी को नज़र नहीं आता। उसने एक तरक़ीब सीख ली। वह अब उस घर में रहते हुए भी घर में नहीं रहता। कोई बहाना बनाकर उन्हे गुस्सा करने का बहाना दे देता और इसकी ओट में अपनी बातें लिए छिपा रहता। कहने को वह एकदम जिद्दी हो गया पर उसे याद नहीं कि पिछली बार अपने मन की एक बात कहने की ज़िद उसने कब की? उसे कही बातें अंदर तक चुभ जातीं। शायद कही जाती भी इसलिए थी कि उसे चुभ जाएँ। वह उन सब बातों को अपने उस खाली डायरी वाले कमरे में अपने मन की उदासी के साथ सब दर्ज़ कर छिपाता जाता। और सबको एकबार फ़िर लगता, सब फ़िर से ठीक हो गया। पर किसी को पता नहीं चल पाता, कुछ ऐसा है, जो लगातार टूट रहा है।

इसबार बात किए कई साल और बीत गए। उसने इसबार उन्हे अपने मन की बात कहने का मन बनाया। इसबार उसने डायरी में कुछ नहीं लिखा। उसने इसबार एक आठ पन्नों का ख़त लिखकर अपनी डायरी में रख लिया। उसे पता है, वह कभी उसे पोस्ट नहीं कर पाएगा।

{आज हमारी शादी की पहली सालगिरह है। एक ख़त आया है। जनसत्ता में। लिंक दे रहा हूँ। प्रिंट के लिए भी ले सकते हैं। } 

मार्च 22, 2015

ख़त, सपने और हम

मेरे बगल मेज़ पर दो कागज़ के टुकड़े रखे हुए हैं और मन में कई सारे ख़त। मन इस मौसम में कहीं खोया-खोया सा कहीं गुम हो गया। धूप इतनी नहीं है, पर आँखें जादा दूर तक नहीं देख पा रहीं। उनके नीचे काले घेरे किसी बात पर अरझे रहने के बाद की याद की तरह वहीं रुके रह गए। रातें हैं, पर नींदें नहीं हैं। कुछ गला भी ख़ुश्क होकर बैठ जाता, पर नहीं बैठा। उसमें कई सारी अनकहे अनछुए एहसास भरे रह गए। कुछ भी करने का मन नहीं होता। बस खोये-खोये से गुमसुम उन पेड़ों के झरते पत्तों में अपने सपनों को खोते रहने जैसे भाव से भर गया। अभी भी हरसाल इन दिनों गायब हो गयी डालियों में मन कहीं रह गया। बात कुछ भी न हो तब भी खाली कमरे में बैठे रहने, वहीं रचते जाने की ज़िद से ऊबकर भी कुर्सी से हिल नहीं पाता।

पुराने दिनों को याद करता हूँ, तो लगता है, कहीं वही फ़िर लौट आए हैं। खाली-खाली। अकेले। बेमन से। अजीब तरह की खामोशी गुस्से में बदलकर मुझे चारों तरफ़ से घेरे रहती है। कहीं भी कुछ भी कह जाने की वजह से कभी मन करता है, कभी एकसाथ न बोल पाऊँ न सुन पाऊँ। इसतरह से उखड़ा-उखड़ा रहने लगा हूँ के इस इच्छा में कुछ भी अजीब नहीं लगता। मन करता है, लिखते-लिखते सच में ऐसा हो जाये। बहुत सारे ख़याल एकसाथ ऊपर नीचे होकर रह जाते हैं। पर जब उन्हे कभी कह ही नहीं सकता, उन्हे हमेशा अंदर ही रहना है, तब यही सबसे ठीक रहेगा कि सब एकबार चला जाये। सब छूट जाये। भले उसके बाद कहीं भाग जाऊँ। पर..पता नहीं क्या?

कोई भी ऐसा एहसास मेरे अंदर नहीं रह गया, जिसे बाँट सकूँ। क्योंकि मुझे पता है, जब तक यह मेरे अंदर हैं, उनकी कशिश, उनके भाव मुझे ऐसे ही परेशान करते रहेंगे। पर, एकबार, जब यह सब बाहर निकल जाएँगे, तब किन बातों से उन खाली जगहों को भरूँगा? वह सब मेरी डायरी में क़ैद हैं। जिसमें लिखने का मन स्याही ढूँढ़ने के दरमियान कितनी ही बार मरता रहता। हरबार मेरे अंदर की खिड़कियाँ ऐसे ही बंद होकर परेशान करती रहतीं। उन्हे हरबार याद करने में हफ़्तों बीत जाते कि उन्हे खोलने वाली सिटकनी कहाँ गुम हो गई? जब याद आती हैं, तब उन कुंडियों को खोलने के तरीके भूल जाती। ऐसे ही न जाने कितने ख़याल मेरे परछाईं के साथ इन दिनों साथ चल रहे हैं। अँधेरे में भी वह ताकत ख़त्म हो गयी है कि वह ऐसा होने से उन्हे रोक सके। बिलकुल मेरी तरह। वह भी चुप है। गुम है।

सच इधर मेरा मन बहुत सारे ख़त एकसाथ लिखने को कर रहा है। पर पता नहीं वह किन्हे लिखे जाने हैं? मेरे पास शायद इतने पते भी न हों, जिनतक अपनी बातें पहुँचाने का मन होता रहता है। पर यह एकदम ऐसा ही है। मैं शायद दुनिया के हर उस शक्स को चिट्ठी लिखना चाहता हूँ, जिसके ख़्वाब उसके साथ ही धीरे धीरे मरते रहते हैं। उसे पता है उसकी पलक के नीचे पिछली रात कोई सपना अधूरा ही रह गया, पर वह भी मेरी तरह कुछ नहीं कर पाया होगा। उन सबका चले जाना अंदर तक खाली होते जाने जैसा है। यह आत्महंता हो जाने से पहले का विचार भी हो सकता है पर ऐसा सपना उसने कभी नहीं देखा होगा। वह किसी दूर देस का रहने वाला कभी उन तक साबुत पहुँच भी नहीं पाया होगा। तब मेरी क्या बिसात? मैं कौन-सा बहुत चाक-चौबन्द तहखाने में अपने ख़्वाबों को इकट्ठा किए जा रहा था। उन्हे ऐसे ही धीरे-धीरे चकनाचूर होते रहना था। मेरे साथ ही उन्हे ख़त्म होना था। दीमक ने उन्हे ऐसे ही कुतर दिया। मेरे अंदर।

मुझे यह भी पता है, इन पंक्तियों को पढ़कर किसी को भी किसी तरह की ताकत नहीं मिलने वाली। कोई कमज़ोर दिलका मेरी तरह होगा, वह अवसाद में भी जा सकता है। जो न कुछ कहने की हालात में होगा और न समझने की। वह बाद मज़बूर-सा, अपनी सपनीली आँखों के सामने उनका पंचनामा होता देखकर रो पड़ेगा। आज उस ऊपर वाले कमरे को बहुत याद कर रहा हूँ, जहाँ इन सपनों को बचाए रखने के लिए छिप जाता। कुछ देर अँधेरे में बैठकर रो लेता। थोड़ा सुकून मिलता के चलो कुछ नहीं कर सकने के बावज़ूद एक काम तो कर लिया। अब वह बच जाएँगे। पर नहीं। यह सब अपने आप को धोखा देने वाली तरकीबें थीं, जिनके चुक जाने पर अब ख़त लिखने वाली तरक़ीब पर आकर ठहर गया हूँ। मुझे यह भी पता है, वह सब ख़त मैं ख़ुद को अपने पते पर ही लिखूँगा।

मार्च 21, 2015

खिड़की वाले पेड़..

धूप-छाव सामने खिड़की से लगे शीशे के पार लगातार आँख-मिचौली खेलते दिखते रहे। उनका दिखना आँखों से नहीं रौशनी से है, जो बादलों को चीरकर अंदर तक दाखिल होती जाती। दुनिया उन लकड़ी के कब्जों  से बहुत दूर भी रही होगी, जो इस वक़्त दीवार से कहीं भागे जाने को नहीं दिख रहे। वह धुँधली खिड़की से बाहर कुछ जादा देख नहीं पाता होगा, ऐसा भी नहीं रहा होगा।

उसे कमरे के बाहर नहीं अंदर की पड़ी बेतरतीब मेज़ की करीने से रखी चीज़ों का ख़याल आता। वह किसी को भी छेड़ नहीं रहा। बस उठाता, देखता, वापस रख देता। यह चौकोर-सी लकड़ी कभी किसी पेड़ का हिस्सा रही होगी। जो दुनिया उस खिड़की के बाहर रही रही होगी। वह भी कभी वहीं का रहा होगा। यह किसी भी तरह लकड़ी, उसकी छुअन से उपजा संताप नहीं था। बस उसका मन ही कुछ ऐसा हुआ होगा। इधर वह ऐसे ही होता रहा। लगातार कई रातों, कई सुबहों तक। 

वह हरबार इसी तरह डूब जाता। जैसे सामने कोई सपना निकलकर चलने लगा हो। हूबहू उसके दिल से फेफड़ों की ओर जाती खून की बूँद रहकर पूछने लगती हो जैसे। जैसे खून कटे होंठ से निकलकर जीभ पर लग जाने तक। उसके रोएँ सो गए हों। अब उसके गालों पर अब कोई बात नहीं बची रहती। उसका हाथ मन की तरह बिलकुल खाली होते रहते। वह ऐसे ही बेसबर होता जाता। कुछ कहने से पहले। कुछ कहने के बाद। कुछ कहने से पहले और कुछ कहने के बाद की स्थिति में रुककर, थम जाने वाली दुनिया को वैसे ही देखता रहता। अपलक।

{अट्ठारह मार्च, सुबह दस पचास। कमरे में खिड़की के पास कोई लड़की बैठी है। पर उससे मेरी कोई बात नहीं होती }

मार्च 20, 2015

कभी-कभी दिल में

उधर कोने वाली बरसाती में वह अचानक आकर छिप जाता। वहाँ अँधेरा इस कदर काला रहता के उसमें सिवाए साँसों के किसी भी चीज़ का कोई एहसास नहीं रह जाता। रह जाना कुछ छूट जाना था, उसकी यादें छूट रही थीं। ख़ुद वह कहीं पीछे किसी लाल छतरी वाली सपनीली दोस्त की परछाईं में गुमसुम-सा रह गया। आँखें लाल सुनहरी, दाँत थोड़े बाहर निकले बेतरतीब से। उसे उसकी कही बात बार-बार याद आती। कुछ टूटने से ही कुछ नया बनता है। उनके बीच यही कुछ था, जो टूट नहीं रहा था। यह कुछ टूटा नहीं फ़िर टूटकर कुछ नया बना नहीं।

बात यहाँ आकर टूट गयी। और उसका बिखरना शुरू हो गया। या कहें उसने चुप रहने के बाद इस तरह उस चुप्पी को अपने अंदर घर करने दिया। उसने चाहा के एकसाथ उसके सुनने और बोलने की ताकत एकदम से गायब हो जाये। अपने गले के पास हलक में रच रहे थूक को निगलने की हरकत भी किसी से न कह पाये। इस तरह यह क्रिया उसके भीतर ही घटित होकर उसके अंदर रह जाने की हद तक वह समेटना चाहता रहा। पर उसके चाहने से क्या होता?

वह एक दिन सपने में ऐसे ही अकेला रह गया।उसे तबसे नींद नहीं आई। करवट-करवट उसे तस्वीर नज़र आती। तबसे वह कुछ भी कहीं नहीं लिखता। बस मेरे कान के बस आकर कुछ-कुछ कहता रहा। जो मैं सुनता रहा उनमें से भी बहुत कम समझ में आता। बाकी उसके लिए फ़िर बचाकर रख लिया। कि कभी फ़िर नहीं कहूँगा। वह पागल नहीं है, वह हमारे जैसा ही है। बस हम उससे थोड़े अलग से हैं।

{सोलह मार्च, लगभग सवा चार बजे। इसतरह कभी-कभी उसके दिल में भी ख़याल आता, और चुपके से वह कह जाता }

मार्च 10, 2015

दोनों की दुनिया में हमारे क़दम

दोनों अगल-बगल बैठे अपनी दुनिया में पहुँच गए। ऐसी दुनिया, जहाँ सब वहीं होते हुए कहीं छुप गए। हम भी छुपने की तरह दिखते रहे। दोनों का प्यार भी छुपने की तरह दिखता रहा। चाहते हुए भी कह न पाने की कसक के बाद, अकेले होने की टीस से उपजी गाँठ की तरह। उस सेमर के पेड़ पर लगे लाल फ़ूल की तरह। दोनों एकदूसरे में न दिखते हुए डूबते रहे। यह डूबना इश्क़ के दरिया में डूबने के बाद डूबने की तरह था।

उधर हम अपनी पुरानी ज़िरह में खोते रहे। छूने न छूने के द्वंद्व के बाद बनी बातों से लेकर उन प्रेमकथाओं से निकली परियों की दुनिया तक। हमसब उन्हे पता नहीं कितनी सदियों से सुनते आते रहे। प्रेमिका का पत्नी बन जाना उस प्रेम की सबसे बड़ी हार है। वह प्यार जो ताकत बनता, बोझ बनने लगता। हमारे अंदर इसकी जितनी भी पुरुषसत्तात्मक व्याख्या निकलती रहीं, पर वह इसी बिन्दु पर टिका रहा। 'वह' मतलब कोई नहीं।

लड़का किसी बहुत बड़ी लड़ाई के बाद जीत गए ग्लैडीयेटर  की तरह उभरकर आया। उसे लगने लगा उसकी ज़िन्दगी के सबसे निर्णायक मोड़ पर अगर 'वह' नहीं होती, तो 'वह' आज कितना अकेला होता। यह सोचते हुए उसकी कोहनी बिलकुल नहीं मुड़ी, न उँगली कलाई मुड़ने के बाद सोचने की मुद्रा में आई। बस उसका चेहरा सूरज की तरह दीप्तिमान होता रहा। उसकी परछाईं में हम हमारी छाया में ख़ुद को ढूँढ़ते रहे। इसतरह सब एकबार फ़िर गायब हो गए। गायब होना, लौट आने से पहले छिप जाने की तरह होता गया।

गायब होकर लौटने के बाद कोई उससे कोई सवाल नहीं करता। वह भी किसी को कोई जवाब नहीं देता। हम सब भी बैहरे होकर उसकी तरह गूँगे हो गए। पर इसबार वहीं सामने थे। सब इसबार लौटकर एकदूसरे के सामने गायब नहीं हुए। यह सपनीली दुनिया का एकदम सामने आ जाना रहा। उस दरवाज़े के पार की दुनिया में हमसब बदल जाने वाले थे। ऐसा हम सब सोच रहे थे। पर कह नहीं रहे थे। क्योंकि हम सब गूँगे थे। हम बोलते नहीं, बस गुनते रहे। अपने अंदर से बाहर जाने से पहले, रचने तक उसमें ख़ुद को सोखते रहे।

वह सोचता रहा काश वह इतने आगे पहुँच कर भी हार जाये। उसे लगता कहीं पहुँच जाने के बाद हम उन दिनों की याद में कभी नहीं लौटते। लौटना, पीछे मुड़ थोड़ी देर वहीं ठहर जाने की तरह इंतज़ार में बेक़रार होते रहने जैसे होता। हम कभी कल बीत गए क्षणों में नहीं जाते। हम झाँककर देखते भी नहीं। उसे पता है, वह भी नहीं देखेंगे। कभी नहीं देखेंगे। इसलिए वह चाहता रहा वह दोनों हार जाएँ।

{इस लगाई तस्वीर में चमकती आँखें मेरी भी हैं। कहीं से भी यह नहीं लग रहा लौटकर ऐसी कोई चिट्ठी लिखने वाला हूँ। पर इसके आगे भी बहुत है और उससे भी जादा पीछा बचा रह गया है। उसने हमेशा रोके रखा। पीछे देखा तो पिछली मर्तबा चार साल पहले की पोस्ट दिखी। उसने कहा है, इसलिए भी कोई हवाला नहीं दे रहा। बस लिख दिया है। आगे के दिनों के लिए। कि कभी किसी दिन हम यह सोच रहे थे। इसलिए इसकी सत्यता जाँचने के लिए कोई आयोग बिठाना बेकार है। बस मेरा मन है, याद है, उसे पढ़ने की एक तरकीब है। }

आवाज़ें..

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