अप्रैल 27, 2015

कुछ क़तरे..

अब ठीक हूँ। वो जैसे ही मौसम बदलता है, सबसे पहले मुझमे दिखने लगता है। हम कभी कुतुब के बाहर बची रह गयी जगहों पर नहीं जा पाये। जमाली-कमाली भी उनमें से एक है और भी पता नहीं ऐसे कितनी जगहें होंगी कहाँ-कहाँ। फ़िर दिल्ली का यह मौसम तो माशाअल्लाह। इधर अप्रैल पिछली बार की तरह रंग बदल रहा है, वरना अब तक तो पारा और चढ़ जाता। कुछ बचा हुआ है, इस बार भी..पर सब हम अपने अंदर ही नहीं देखते जैसे यह मौसम। यह बाहर से अंदर आते हुए हमें लगातार बदलता रहता है, अनकहे, अनचाहे।

ख़ैर, एकबार हस्तीनपुर जाने की बात हो रही थी, वह बात ही होती रही। पाँच-छह साल पहले। तबसे हिम्मत नहीं हुई के रोडवेज़ बस में चढ़कर कभी मेरठ के आस-पास इस जगह को ढूँढते। न कभी हम दोस्त लोग इस जगह पर राजी ही हो सके।

नौकरी की तय्यारी मन में चल रही है साथ-साथ। जैसे किताब का सपना चल रहा है साथ साथ। अभी थोड़ा व्यस्त भी था, वहाँ क्लास में हम लोगों को एक प्रेजेंटेशन देना होता है, उसी सिलसिले में। बाकी सब तो यहाँ है ही। कल अख़बार में अपना एक टुकड़ा आया था, उसी को देख रहा हूँ तब से। यह हमारी शादी की सालगिरह के दिन आया। पहली सालगिरह। तब उसने ख़त लिखा

वैसे हस्तीनापुर जाकर फोटो न लेना वैसा ही जैसे हम इधर लखनऊ गए और बिना खींचे लौट आए। मन ही नहीं किया कि कुछ उतार कर कैमरे में रख लूँ। शायद मन कहीं और बातों में उलझा हुआ-सा रहा होगा। रात के दो बजे चारबाग़ स्टेशन का भरा भरा-सा प्लेटफ़ॉर्म। लोग बिखरे पड़े हैं। बिछे पड़े हैं। वैसे आपकी गाजीपुर फूलमंडी वाली तस्वीरे काफ़ी अच्छी हैं। हम तो उसमें जैसे गुम हो गए..

8.
दिल्ली में कहीं कहीं कुछ क़स्बा बचा रह गया है। वह अभी भी कच्चा है, अधूरा है। सच यह कहना मुश्किल है कि वक़्त के किन क्षणों को जोड़कर इस घूमने वाली मद में ख़र्च किया जाये। मेरा पासपोर्ट भी नहीं है, न मुझे पता है, वीजा मिलता कैसे है? पर मुझे पता है एक दिन सारी दुनिया घूमकर वापस इस देश लौटूँगा। यह कब होगा पता नहीं। पर होगा ज़रूर।

और बिलकुल हौज़ खास की वह झील बहुत प्यारी है, कुछ ही ऐसी जगहें दिल्ली में बची रह गयी हैं। एक नजफ़गढ़ में थी, वह इसी साल गायब हो गयी। हमसब भी ऐसे गायब हो रहे हैं। धीरे-धीरे। एक दिन हम भी गुम हो जाएँगे। 

इंसान सिर्फ़ अपने लिए करने की सोचता है, फिर भी कितना अधूरा-अधूरा सा करके बैठ गया है। सबकुछ जैसे ख़त्म होने की कगार पर हो.. ख़ैर, हम दिल्ली से ही हैं, पर बाकी सब गाँव में भी हैं। मम्मी-पापा, भाई-बहन, मैं और वे। एक कमरे के घर में किसी तरह इन दिनों से भागने की फ़िराक में हों जैसे। पर ज़िन्दगी के कितने साल हम लोगों ने यहाँ बिता दिये। हम वापस लौट जाना चाहते हैं। पर इस लौट जाने की सघनता को हम इतना महसूस नहीं करते इस तरह के तुरंत लौट जाएँ।

हम कभी इस कमरे से बाहर खुद को महसूस नहीं करते। बाहर जाना लौट जाने के लिए ही है।

{पीछे के कुछ क़तरे: एकदोतीन।  }

अप्रैल 26, 2015

कुछ क़तरे..

तबीयत कल के मुक़ाबले काफ़ी दुरुस्त है। बस अब मन ठीक करना रह गया है। अभी इतनी उम्र नहीं हुई पर बचपन की यादें अब गड्ड-मड्ड होने लगी हैं। मुझे बचपन की कहानियाँ पढ़ना पसंद हैं, जैसी उदय प्रकाश ने लिखी हैं। तिरीछ या डिबिया या मौसा जी या ऐसी बहुत। शायद ख़ुद की नहीं लिख पाया इसलिए भी। हम शायद कहानियाँ ही तो ढूँढ रहे होते हैं, अपने अंदर, अपने बाहर। आपने बिज्जी को पढ़ा है? विजयदान देथा या इधर एक किशोर चौधरी हैं, उनका ब्लॉग है हथकढ़। देखिएगा। अभी मालचंद तिवाड़ी की बोरुंदा डायरी भी आई है। नए तरह का गद्य है, भाषा प्रयोग पर भी कुछ नया है शायद। किताब देथा पर है।

अभी दवाई खानी है, और बहुत सारी तय्यारी करनी है। और वो पाँच साल पहले कहीं अक्टूबर दो हज़ार नौ में हम रोहतांग, केलॉन्ग तक गए थे। वैसी शांति फ़िर कहीं नहीं मिली मुझे। उसकी यादों में चार दिन ही थे पर अभी भी लगता है जैसे सब सामने से गुज़र रहा हो। उसके हाथ पर पट्टी और मेरा इस बात को डायरी में लिख लेना और उसका पढ़ जाना।

बाकी सब तो बाकी रह ही गया मुझमें।

6.
दोस्ती तो दोस्ती रहती है। बस हो सकता है, वह सघनता न हो। मुझे दोस्तों के छूट जाने ख़ुद के छूट जाने का एहसास भरा मिलता है। कभी उन्हे पढ़िएगा, आमोल पालेकर की फ़िल्म है एक 'दुविधा' जिसे बाद में 'पहेली' के नाम से किसी ने बनाया और शाहरुख की खराब एकटिंग के बावजूद कहानी फ़िर घर कर जाती है।

कभी मेरे एक साथी मित्र ने कहा था, तुम कभी कहीं घर मत बनाना, तुम ऐसे ही घूमते रहना। तब मेरे पैरों में बिलार बंधे थे। खूब घूमना होता था। अब उसकी हद में रहकर कहीं कहीं हो आते हैं। आप क्रिकेट देखती हैं, मैच शुरू होने वाला है। मन नहीं करता पर मन ठीक करने के लिए यह आदत भी ठीक खतरनाक से कुछ कम है। अभी सात सालों से कहानी लिखने की सोच रहा हूँ, कभी वो भी लिखी जाएगी।

आपको ऐसा नहीं लगता कि मैं अपनी ही कहता रहता हूँ.. आप पुराने दोस्तों को नए सिरे से देखिये, कुछ नया मिलेगा।

{कुछ क़तरों की बकाया किश्ते: एकदोचार।  }

अप्रैल 25, 2015

कुछ क़तरे..

मुझे कहीं-न-कहीं ऐसा ही लगा था, जैसा आपने बताया। आप बाद में यहाँ से बंबई गए होंगे। मैं तसवीरों में अपनी ज़िंदगी में छूट गए रंगों को ढूंढता रहा हूँ। मेरे यहाँ भी रंग हैं पर सब मिलकर काले में तब्दील हो गए हैं। मुझे लगता रहा है अभी मेरी ज़िंदगी मेरे मन की नहीं है, इसलिए सपने देखता हूँ। सोचता हूँ, कभी किसी मोड़ पर पीछे पलट कर देखूंगा, शायद कोई तो पूरा होकर मेरे इंतेज़ार में खड़ा होगा, तब लौट चलूँगा, वापस। धीरे-से। आहिस्ते-आहिस्ते। बिना किसी हड़बड़ी। आराम से।

शायद जो आज नहीं है, उसी की कोई तस्वीर वहाँ छूट गयी होगी। मेरा सुकून मुझे वहीं ले जाता है। जो आज में नहीं है। या तो वह बीत गया या फ़िर इतनी आगे कहीं है, जो दिख नहीं रहा। मैं भी चाहता हूँ आपकी दुआ जल्द पूरी हो जाए। कुछ हो जो सच हो। इस झूठ की तरह सच।

बस इससे जादा नहीं.. है तो बहुत.. पर सब बेकार है..

4.
हम कोशिश करते हैं बचने की। पर बच नहीं पाते। वो तमाम ख़याल जो ज़िंदगी से गायब हैं, सपने बनकर घेर लेते हैं। हम कभी मुन्नार नहीं गए। दो साल हुए ऊटी तक जाकर लौट आए थे। प्रकृति किन्ही उन रूपों में अच्छी लगती है, जब वह अनछूए का एहसास दे। ऊटी में तो आवाजाही बहुत है, फिर वहाँ से रेस्ट हाउस भी किसी तरह नहीं खींचते। लाहौल स्पीति, रोहतांग भी अब सबकी पकड़ में आने लगा है। पाँच साल पहले जब गए, तब के हर पल को अंदर ही रखे हुए हूँ। जिसे भी बताऊँ, उसे सब बताना पड़ेगा।

आप इस तरह ही अलग अलग रंग की तस्वीरें खींचती रहिए और हमेशा ऐसे मौके आपकी ज़िंदगी में लौट-लौट कर आयें।

किसी जमाने में फिल्मों को छोड़ता नहीं था, पर अभी बार डेढ़ साल बाद पिछले बुधवार ‘ब्योमकेश बक्शी’ देखी। वैसे भी दिल्ली में गैर-हिन्दी या अँग्रेजी फिल्मों की बातें कभी सुनाई नहीं दे पाती। वरना अधिकतर टोरेंट से डाउनलोड करके देखता रहा हूँ। आप कुछ के नाम सुझाईए, जिन्हे देखे बिना काम न चले..

बाकी बस वही इंतज़ार। किसी सपने से लौट ज़िंदगी तक वापस आने तक। फिर एक सपना किताब लाने का भी रहा, पर इतना सोच नहीं पाता। कौन छापेगा, इसी सवाल का जवाब नहीं मिल पाता। फिर यह भी लगता है, लिखने का सहूर और सीखने की जरुरत है।

{कुछ बाक़ी सफ़े: कुछ क़तरे :एकतीनचार।  }  

अप्रैल 24, 2015

कुछ क़तरे..

मेल से आई चिट्ठी जादा सबर और वक़्त मांगती है, लोग कहीं अरझे नहीं रहना चाहते होंगे। शायद इसलिए हमारी दुनिया इससे बचती रही होगी। पर मुझे आश्चर्य है कि आप कैसे वहाँ तक पहुँच गईं (?) के मैं इतना लिखते हुए भी चुप्पा किस्म का हूँ? बहुत मानीखेज लगा मुझे। पता नहीं यह क्या है, मैंने इसे कभी कोई शब्द नहीं दिया। बस बेचैनी अजीब किस्म से मुझे, मेरी ज़िंदगी को घेरे हुए है, उसी में साँस लेने की कोशिश में वह लिखने वाली खिड़की खुलती रही है। मैं शायद लिखते हुए भी बहुत ‘रिज़र्व किस्म’ का बनता गया हूँ, शायद। शायद हम सब अपनी सीमाओं में ऐसे होते होंगे। पता नहीं..

फिर भी मुझे लगता है, हम चाहते तो हैं, पर सुकून से रह नहीं पाते। अंदर इतनी आपाधापी मची रहती है कि कोई ठिकाना नहीं। मैं भी चाहता हूँ घूमूँ, पर.. पता नहीं क्या?

वहाँ कभी आना नहीं हुआ। मुझे लगता है, वो सपनों को ‘कमॉडिफ़ाय’ करता शहर है। असल में न भी हो, पर मुझे ऐसा ही लगता है, दूर से। और वो अब शायद गुम भी हो चुकी है जो घरौंदा या बासु चेटर्जी या ऋषिकेश मुखर्जी कि फिल्मों में कभी रहा होगा। पारसियों वाला शहर। दिल्ली भी मुझे ऐसी लगती है कभी, चश्मेबद्दूर वाली कभी नहीं मिल सकती कभी। उसका ‘नॉस्टेलजिया’ मेरे अंदर पता नहीं कब दाखिल हो गया, पता ही नहीं चला। शायद मेरा सुकून वहीं कहीं छुप गया होगा। इधर मेरा शहर  एक खाली कमरा  है, जहाँ घंटों अकेले बैठे रहता हूँ, बेवजह। चाहता हूँ, कहीं गुम हो जाऊँ.. काश हो पाता..!!

मैं सपनों में खुश रह लेता हूँ, असल में जैसे ही वह मेरे सामने गुजरते हैं तो जैसे लगता है, पतझड़ आ गया। मेरा कभी कोई सपना पूरा नहीं हुआ। जो हुए उनमें पैबंद लगा लगाकर हार गया। फ़िर जितना वक़्त मैं उन तसवीरों को ढूँढने में लगता हूँ, काश मुझे मेरी ज़िंदगी चुनने के लिए भी मौके मिलते..पर उनको होना ही नहीं था। शायद। 

लगता है, कुछ जादा कह गया..

2.
पता नहीं इन बीतते सालों में लगातार कैसा होता गया हूँ? शायद असफलताएँ और उनका लगातार मेरी ज़िंदगी में सघन होते जाना, इसका कारण रह गया होगा। रह गए होंगे कुछ कतरे। कुछ अनकहे सफ़े। कुछ ऐसी और बातें। उनको कहने न कहने से कुछ नहीं होने वाला। 

तब उस अकेलेपन की बात न होती तो शायद कभी सोचता भी नहीं, इस बिन्दु पर। या शायद हो सकता है, हम उन पन्नों को जल्दी से कहीं बिस्तर के नीचे रख छोड़ भूल जाना चाहते हैं, जहाँ हम कहीं नहीं हैं। ऐसे ही मैं कहीं नहीं हूँ। कहीं किसी कोने में भी नहीं। अकेले।

कुर्सी में धँसकर अपने दोस्त ठीक-ठाक संख्या में तो नहीं कह सकता। दोस्त वह, जो हमें, सुन सके। हमारे अंदर झाँक सके। एक था, वह दिल्ली सन् दो हज़ार ग्यारह में छोड़ गया। शादी के बाद उसके पास यहाँ रहने के बहाने कम रह गए इसलिए। एक दूसरा, जो अभी बीते साल मुकम्मल रूप से वापस हो गया। इनसे कभी फोन पर बात हो जाते हैं। पर दोनों मेरी तरह अपनी ज़िंदगियों की उलझनों में ऐसे होते रहते हैं के जादा परेशान करे का मन नहीं करता। ख़ैर। वह भी कैसे करके बचने की कोशिश करते हैं। चीज़ें सतह पर न तैरने लगें।

फ़िर यह लिखना बचा, जो मुझे लगातार सुनता रहता है। पर दिक्कत है बोल नहीं पाता। दीवार के सामने बोलने की तरह। मेरी तंगनज़री में दुनिया जैसी लगती है, उसे वैसे ही कहता चलता हूँ। इधर मेरे साथ वे भी हैं, जिनके सपने किसी भी तरह से ज़मीन पर नहीं उतर पाया, इसलिए टूटना- बिखरना इसतरह दिख जाता है। उसके लिए मैं चाह कर भी कुछ नहीं कर पाता। नौकरी न होना शायद इस दुनिया की सबसे खराब चीज़ हैं। वह कितने सपने लेकर आई थी मेरी ज़िंदगी में.. और मैं कुछ नहीं कर पा रहा.. यही सोच घुट रहा हूँ.. पीएचडी तो बहाना है, एक पैबंद। अभी बहुत बाकी है। पर उम्र न तो रुक रही है, न कहीं से भी धीरे चल रही है.. देखते हैं नाव कहाँ जाकर लगती है।

ख़ैर, छोड़ते हैं इन बातों को।

{अगले सफ़े: कुछ क़तरे: दोतीनचार। } 

अप्रैल 14, 2015

कुछ ब्लॉग किरदारों की बात

सब कुछ वैसा ही है, जैसा कभी नहीं सोचा था। इस पंक्ति के बाद एकदम से सुन्न हो गया हूँ। आगे क्या कहूँ? कुछ कहने के लिए हैं भी या ऐसे ही दोहराव में हम अपने बिगड़ने को देखते रहते हैं। कई सारी बातें हैं, जिन्हे कहना है पर समेटने का सलीका थोड़ा भूलता गया हूँ। अभी खिड़की के बाहर अँधेरा इतना नहीं हुआ पर दिल कुछ बुझा बुझा-सा है। यह ऐसा न भी हो पर थोड़ा तो उदास मान ही सकते हैं। फ़िर एक तो हमारे सपने भी बड़े अजीब से होते हैं। अधूरे से। कभी वहाँ तक पहुँचने के पूरे नक्शे नहीं दिखाते। यह वैसा ही है जैसे रात हो पर अँधेरा न हो। दूसरे यह कि आँख खुलते ही उनका भूला हुआ संस्करण बाद में ख़ूब बेतरतीब किए जाता है। चीज़ें ऊपर नीचे आगे पीछे सब तरफ़ से हम पर उड़ेली जा रही होती हैं। पर हम कुछ नहीं कर पाते। सिर्फ़ एक दो बातें बुदबुदाते हुए उकड़ू बैठ जाते हैं।

यह एक कहानी का बढ़िया प्लॉट हो सकता है, पर इतनी काबिलियत मुझमें अभी नहीं लगती। लिखने को माँज रहा हूँ। रोज़ तय करता हूँ कि कुछ ऐसा लिखने की कोशिश करूँगा, जो न पहले कभी लिखा हो न ही कहीं पढ़ा हो। शायद इसलिए भी किताबों को लाने के बावजूद पढ़ने का मन नहीं हुआ करता। बस उन्हे इकट्ठा करने का शौक-सा बनकर रह गया। इसे एक अजीब क़िस्म की विलासिता भी कह सकते हैं के हमें पता है, कभी ज़िंदगी में हमारे पास इतनी जगह और वक़्त दोनों इतने होंगे, जहाँ हम किसी झूलती आराम कुर्सी में धँसे उन किताबों के अस्तरों पर लिखी कुछ-कुछ बातों को यादकर हल्के से पीछे मुड़कर किसी याद में अरझ जाएँगे।

इसके साथ ही लगता है ऐसा आसपास बहुत-सा है, जो छूटता जा रहा है। जो एकमुश्त पास नहीं भी है, पर उसका ख़याल ऐसे ही अंदर बना हुआ है। जैसे एक वो सागर है, जो अब यहाँ से गुम होकर कहीं छिप गया है। पता नहीं वह कुछ लिखता भी होगा या नहीं। लिखना मजबूरी नहीं, एक पागलपन है। और जैसा वह लिखता है, उसमें इसके सबसे जादा होने की संभावना है। वह कहीं मेरी तरह दिल्ली के किसी खाली अकेले से कमरे में बैठा, दीवार के उखड़ते पलस्तर को देख कविता लिखने को होता होगा, पर बल्ब की रौशनी में कुछ देर और खोने का मन बनाकर उस ख़याल को भी जाने देता होगा। फ़िर इधर एक और से मुलाक़ात हुई। एक दौर छद्म नामों से लिखने का भी रहा। पता नहीं यह उसका असली नाम है भी या नहीं। महेन मेहता। उसकी डेढ़ साल पहले की आख़िरी पोस्ट में फटी डायरी के कुछ सफ़े दिखे तो थोड़ी देर रुक गया। कैसे एक-एक वाक्य में इस छूटते जाने के बाद खाली हो जाने का भाव दिलो-दिमाग दोनों को उनकी जगह रहने नहीं देता। यह भी पता नहीं कहाँ किस उजाले में ख़ुद को पहचानने की कोशिश कर रहा होगा। शायद जैसे सागर जयशंकर की डायरी पड़ते हुए उसे शेयर करके अंदर झाँककर वापस लौट रहा है। बिलकुल वैसे। या पता नहीं किसी और तरक़ीब से।अंदर बाहर होते हुए। 

ऐसे ही अनुराग  मेरठ में डर्मेटालॉजिस्ट’गिरी करते हैं। लिखना पता नहीं किस तरह इनकी रगों में घुसा होगा। पता नहीं कभी किसी कमेन्ट में पूजा  इनकी कोई गंभीर-सी बात बता रही थी। कोई वनलाइनर रहा होगा शायद। किसी गाने या फ़िल्म को लेकर कुछ कह रही थी। एकबार रेल के कम्पार्टमेंट से सीधे आँखों देखा हाल सुना रहे थे। दोस्तों के साथ। ऐसे ही एक मोहतर्मा हैं, तीसरे या चौथे माले पर रहती हैं। एकबार ऐसे ही उन्नाव से मगरवारा तक पैसेंजर ट्रेन की कोई बात बताते हुए जंगलीजलेबी की बात में गुम हो गईं। जो अकेला है, वह खाली है। अकेले होना, खोखले होते जाने की तरह है। यह सब ऐसे किरदार हैं, जो इस लिखने वालों की दुनिया में अपने जैसे लगने लगे। इनके पास कहने को बहुत है, पर इनके पास न इतने मौके हैं न इतने वक़्त की फ़ुरसत। कहने को होते भी होंगे, पर ज़ुबान साथ न देती होगी। 

पता नहीं यह जो आज लिखा है किस रौ में लिख गया। जब-जब मेरे अंदर की हरारत बुखार बन जाती है, तब-तब मेरा दिमाग दिल की जगह शिफ़्ट हो जाता है और सोचने का काम दिल के जिम्मे आते ही बहकी-बहकी बातें करने लगता है। मैं अपने अंदर घर कर गए इस कमरे से बाहर निकलने की कितनी भी कोशिश करूँ निकल नहीं पाता। बस एक आदत ख़त लिखने की शुरू हुई है, देखो उस दुनिया में कौन-कौन से किरदार शामिल होते आते हैं। अभी के लिए इतना ही। लिखने बैठा था, तो सोच रहा था, लिखुंगा कुछ रह गयी बातों पर। शायद यही रह गईं होंगी। या नहीं भी कह पाया तो भी कुछ था जो अब कहीं नहीं है। इसे भूलना कहते हैं। शायद।

अप्रैल 11, 2015

दुःख की कथा

वह खाली कमरे का एहसास अपने अंदर भरकर पीछे कई मिनट से अपनी डायरी में छिपाये उस ख़त के बारे में सोचता रहा। वह कुछ नहीं कर पाया। ऐसा सोचकर फ़िर कुर्सी में धँस गया। छतपंखे की फाँकें उसके अंदर निकल आयीं। वह रोने को हुआ, पर रो न सका। इधर कुछ नींद में जाने से पहले के ख़यालों में डूबते हुए उसे उसकी याद आई। वह साथ होती तो अब टीवी पर कुछ देखते हुए एकदूसरे में खो जाते। पर वह कहीं से भी पास नहीं मिली। शायद कहीं छिप गयी होगी। वह भी दूसरी करवट लेटना भूल चुकी होगी। मन किया बात कर ले। पर सुबह के तीन बजे सब परेशान हो जाते, इसलिए रुक गया। मन में उसे फ़िर कुछ कहने को हुआ, पर चुप रह गया। यह एक रात की बात नहीं रही। उसकी हर पिछली याद दिल के धड़कने के साथ शुरू होती। सोते-सोते वह सोचने लगता कल सुबह न हो। वह सपने में ही उससे मिल आए। उसका दिल इस खयाल से भी भर जाता के ज़िंदगी भर उसका सपना चलता रहे। कभी कोई उसे अलग न कर सके। उसने कितनी मेहनत से उसमें अपने खून से बनाए रंग डाले, के उसकी सारी जेबें खाली हो गईं। उसके हाथ भी बिलकुल अकेले रह गए।

उन्हे उस गली के आखिरी मकान में किरायेदार बने वक़्त भी कितना हुआ। कुल दस महीने। घर जमाने में वक़्त लगता है। उस चार-दिवारी में सब होने पर भी कुछ कम लगता। इसी कुछ  की तलाश वह दोनों साथ-साथ करते। कभी वह उसे सुख  कहते, कभी किसी शाम साथ घूमना । दोनों में कितनी ही कमियाँ बची रह गयी हों, पर दोनों एकदूसरे को मुकम्मल बनाते। कोई कसर नहीं छोड़ते। एक शाम इण्डिया गेट जाने के बहाने से वह इन दीवारों से निकल आए। दूरतक साथ चलते हुए उन्होने महसूस किया, हर स्पर्श को कोई भाषा नहीं कह सकती। उन्होने इस स्पर्श को अनुवाद करने की ठानी। दोनों ने सोचा हम इस एहसास से अपनी ज़िंदगी भर लेंगे। उन्हे यह इच्छा सबसे ज़रूरी चीज़ लगी। दोनों तब से ख़ुश रहने लगे। ख़ुश मतलब एक नयी दुनिया में बस जाने से पहले की तय्यारी में डूब जाने तक मुसकुराते से। अजन्मे एहसास को छूने के बाद पैदा हुए स्पंदन की तरह। इसतरह दोनों एकदूसरे की छाया बने।

पर कहते हैं, इस दुनिया में नज़र भी लगती है। उनके सपने को नज़र लग गयी। वह अल्लहड़ लड़की कहीं चौराहे पर किसी गंदे कपड़े को नाँघ आई। उस रात दोनों सो नहीं पाये। दर्द इतना के सहन नहीं होता। यह उनके दुख की रात ठहरी। उसने मन में सोचा, बुला लेना था उन्हे। पर लगता देर हो गयी। रात जैसे-तैसे दोनों अकेले बिन किसी को बताए एक अजनबी से दरवाज़े के सामने खड़े अंदर दाखिल होने से डरते रहे। डर अंदर जाकर कहीं खो जाने का रहा होगा। सच। जब वह चार दिन बाद वहाँ से लौटे तो पुराने वाले दोनों वहीं किसी लाल नीले डिब्बे में कुछ ढूँढ़ते रहे। पर उन्हे कुछ नहीं मिला। उन्हे पहली बार पता चला उनके ख़ून का रंग भी वही है। दोनों घंटों वहीं पेड़ की परछाईं में खिड़की के बाहर देखते सोचते रहे,‘काश, उनके ख़ून का रंग आज लाल न होता, तो वह अकेले वापस न लौटते..!!’ पर उनके साथ जो आया था, वह वहीं छूट गया। वह दोबारा खाली हाथ हो गए। उनके हाथ से वह गुम हो गया। वह खो गया कहीं। दोनों भी वहीं खो गए।

इस शहर ने जो खुशी उन्हे दी थी, वह उसने वापस छीन ली। यह उनसे जादा इस शहर की त्रासदी थी। पर वह कभी इस कमरे में नहीं आया, शायद इसलिए उसे कभी पता भी नहीं चल पाया। जिस शाम उसकी ट्रेन थी, वह उसे छोड़ने स्टेशन तक भी नहीं जा पाया। वह उसे ऐसे अलविदा नहीं कह पाता। भाई रिक्शे पर बिठाकर चुपचाप ले गया। वह नीचे से अकेला कमरे में लौटा, तबसे उसका इंतेज़ार कर रहा है। खाली कुर्सी उस कमरे की तरह उसे अपने अंदर छिपाये रहती। वह मगर छिपना नहीं चाहता। आज तीन हफ़्ते हो गए, उसने वही कमीज़ पहन रखी है। वह उस सपने की याद है। इसे पहने वह हर जगह चला जाता। लोग कहते इसमें सिर्फ़ पसीने की गंध नहीं आती। बल्कि सूख गए ख़ून से लेकर आँसू, नाक-थूक सबकी अजीब-सी बदबू निकलती रहती। वह लोगों को कभी नहीं समझा पाया, ऐसा क्यों हुआ। वह कहेगा भी तो क्या? कोई समझ भी पाएगा। उसके पास दुख की कहानी कहने के लिए शब्द नही बचे हैं।

पता है, इधर उसके साथ क्या हो रहा है? वह नींद में चलने लगा है। नींद में चलकर वह हर रात उसी काले भयानक से दरवाज़े के पास जाकर उसे चिपककर उससे ख़ूब रोता है। अपनी हर बात बताता है। इसके अलावे उसके पास कोई नहीं बचा जो उसकी बात समझ सके। वह दरवाज़ा उसके दुख के दिनों का साथी है। असल में उसके पास कोई नहीं जो अनगिन बार उसकी एक ही कहानी सुन सके। बिना कुछ बोले। बिना कुछ कहे। वह उसे पूरी रात कुछ-कुछ कहता रहता है और सुबह से पहले ही लौट आता है। चुपचाप। अकेला। सिर झुकाये। 

अप्रैल 10, 2015

प्यार पर कुछ बातें और थोड़ी बकवास..

पता नहीं क्या लिखने बैठा हूँ। पर बैठ गया हूँ। शायद कुछ और बातें होंगी, जो कभी इस दुमाले से नीचे नहीं उतर पायीं। फ़िर बकवास करने में भी हम खुद को इतना तो मान ही लेते हैं कि किसी को कुछ नहीं समझते। खुद को भी नहीं। वह शादी करने के बाद उस मेहनतकश जानवर के सींग की तरह गायब हो गया। फोन पर बात तो ख़ैर हम सोच भी नहीं रहे। हम दोस्त लोग थोड़े पागल किस्म के थे, जो दो साल पहले उससे लड़की भगाने की बात करते और कोर्ट में गवाही देकर उसमें कुछ हवा भरते। पर वह हमसे जादा समझदार निकला। लड़की ने कहा, शादी होगी तो परिवार की मर्ज़ी से। उसके परिवार की मर्ज़ी से। इसतरह हमसब एकबार फ़िर ‘साइड-लाइन’ हो गए। उसने हमें उतना ही बताया, जितना उसके मन में रहा होगा।

वह मार्च के दूसरे इतवार  हम सबके बीच से निकल एक लंबी छलाँग मारकर हमारी आँखों के सामने ओझल हो गया। जो कई साल पहले ऐसी कूद में पहले नंबर पर था, उसे बताने की जहमत भी इसने नहीं उठाई। ‘कंपीटीशन’ में एकतरफ़ा मुक़ाबला रहे, शायद इसलिए। वह  इतने ‘शॉर्ट-नोटिस’ पर कौन-सा छिंदवाड़ा से आ पाता(?) पर बताना तो बनता था। वह इस अर्थ में भी हमसे आगे निकल गया कि हम प्यार थोड़ा बचकर करने में विश्वास करते रहे। उसे एक असफ़ल कोशिश की तरह लेते रहे। पर कभी उससे आगे नहीं बढ़ पाये। जहाँ हमारी ‘थियरी’ से कोई जवाब देते नहीं बना और वह फ़ेल हो गयी, वहाँ से उसके डैने खुलने शुरू हुए। अपने दिन आँखों के सामने आज भी झिलमिलाते रहे  हैं। मैं धीरे-धीरे ऐसी जगह पहुँच रहा था, जहाँ मुझे आकर रुक जाना था। पर यहाँ यह बात ध्यान रहे, यह सिद्धान्त मेरे सामने उस समय भी इसी रूप में साफ़-साफ़ नज़र आ रहे थे, ऐसा कोई भी दावा करना शेख़ी बघारने जैसा होगा। इसलिए चुप हूँ। आज जब उसके कई महीन रेशे मेरे अंदर धँसे दिख जाते हैं, तब लगता है, हम प्यार नहीं, उस पर किताब लिखने की तय्यारी कर रहे थे जैसे।

एक कमरे का घर, सपने, उसका दिल्ली में बीता बचपन, माता-पिता की मर्ज़ी, हम दोनों का किसी भी नौकरी में न होना। आज यह सब बातें एक ‘असफ़ल प्रेम का समाजशास्त्र’ बुनने में मेरी मदद करते ‘टेक्स्ट’ लगते हैं। ऐसा पाठ जिसमें मैं सन् अस्सी के बंद अर्थव्यवस्था वाले भारत का एक बेरोज़गार युवक अपनी ज़िंदगी के कई फ़ैसले इसलिए भी नहीं ले पाता कि मुझे मध्यवर्ग की जटिलताओं की इतनी समझ है कि एक झटके से पीछे की तरफ़ मुड़ जाता हूँ। वह मध्यम वर्गीय परिवार जो पूर्वोतर यूपी के छोटे  से गाँव से यहाँ दिल्ली में तीस सालों से रचा बसा है, उसके अंतर्विरोध मुझे साफ़ नज़र आने लगे। क्या वह अपनी जाति इतनी सहजता से तोड़ेगा? वह लड़की कैसे इस एक कमरे वाले हमारे घर में व्यवस्थित हो पाएगी? मेरी माँ से उसकी कैसी पटरी बैठेगी? उसके सपने इन चारदीवारों के बीच साँस ले पाएंगे? उसे खाना तो बनाना आता होगा न..? चाय बना लेती हूँ से काम नहीं चलने वाला। अगर घर वाले नहीं माने तब? उसकी तरफ़ से कुछ अड़चन आई तब क्या हम भी कहीं भाग जाएँगे। पर जाएँगे कहाँ? इस एक कमरे वाले घर में अचानक सब कैसे आश्चर्यचकित रह जाएँगे। पर मैं इन सबका सामना किए बगैर किसी कहानी के प्लॉट का समान जुटाने में लगा रहा। बेवकूफ़ कहीं का..!!

जिन सवालों के अनसुलझे जवाबों से मैं आज तक नहीं निकल पाया वह अभी भी मुझे घेरे हुए हैं। उनकी भाषा और प्रकृति भले बदल गयी हो, पर लगता है, वह इन बीते सालों में और पैने होकर जादा चुभने लगे हैं। आज भी मेरी हालत गली के कुत्ते से कम नहीं है। जिन-जिन लड़कों की शादियाँ बिन नौकरी लगे हो गयी है, वह अपने अर्थों में इस बिम्ब की अर्थव्याप्तियाँ खोजने में स्वतंत्र हैं। और हो सकता है, उनके पास इससे भी रचनात्मक बिम्ब और छवियाँ हों। अगर मैं इधर अपनी पीएचडी को निकाल दूँ, तब मेरी हालत और गयी गुज़री है। यह भी एक ख़ास किसम की विलासिता है। बिना जेआरएफ़ यह मुझ पर बोझ है। अभी भी सपने देखता हूँ, इसबार निकाल लूँगा। पर उसके लिए पढ़ना और मेहनत करना भी ज़रूरी है, यह मुझे सपने में कहीं दिखाई नहीं दिये। आज भी किसी तरह सवाल नहीं बदले हैं। वही एक कमरा है। नौकरी अभी भी वेटिंग लिस्ट में है। उसका चार्ट बना नहीं है। गाड़ी प्लेटफ़ॉर्म से छूट चुकी है। कहाँ जाकर लगेगी। पता नहीं। बस जो किरदार कहीं तब नहीं जुड़ पाया था, वह पिछले साल इसी अप्रैल, हमारे परिवार में आ गया है। इसे ही ऊपर किसी और तरह से पहले ही कह आया हूँ। दोबारा का मतलब दोहराव ही है। और इसका एक ही मतलब है, दिमाग ठीक तरह से नहीं चलता। उसमें कुछ ‘डिफ़ेक्ट’ है। अर्थात् शादी के बाद लड़कों का ‘फ़्यूज़’ उड़ चुका होता है। वह किसी लायक नहीं रहते।

अप्रैल 06, 2015

पहली अप्रैल का प्यार उर्फ़ मारे गए गुल्फ़ाम

अचानक वापस लौटता हूँ उस सीन पर जहाँ सबकुछ ठहर चुका था। वहाँ थोड़ी देर में आसमान से कोई बर्फ नहीं गिरने वाली थी। न हम दोनों अचानक बाहों में आकर एक दूसरे को भूलने वाले थे। कितना भी चाहता, मेरे कमज़ोर से हाथ तुम्हारी कलाई पकड़े उस बड़े से गेट से बाहर निकल जाने की कोशिश कर लेते पर इसका भी कोई ख़ाका दिमाग में नहीं बन पाता। इस क्षण से कई गुना तेज़ रफ़्तार से मेरे दिल में तुम्हारा चेहरा मेरे साथ डूबता गया। कभी वापस लौटने की बात दिल में सूख गयी मिट्टी की तरह उखड़ने पाती तो एकबार कुछ भी करके वापस लौट आता। पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। मैं बस थोड़ी देर वहीं ठिठका खड़ा रहा। तुम भी शायद बड़ी देर से मुझे देख लेने की राह देखते हुए पलकों में उन क्षणों को अपने अंदर महसूस कर रही होगी। मेरी तरह कहीं चुपके से। बिन बताए। 

भले तुम्हारे अंदर ऐसे कोई भी भाव पैदा न हुए हों, पर वह तुमसे मुझतक इसतरफ लगभग हर रोज़ आते रहे। फिर इन बीतते सालों में हम कितने बदल गए कह नहीं सकते? वक़्त ही कितना हुआ है। लगता है, जैसे अभी दूर ही कितने हैं। एक फ़र्लांग होता ही कितना है। पर सब झूठ है। उस दिन की तरह सब झूठ है। हो सकता है वह दिन जिस तरह मेरे अंदर भरा रह गया है, तुम्हारे अंदर उसकी तस्वीर बिलकुल भी वैसी कभी न रही हो। हम दोनों एक ही साथ अलग-अलग तरह के सपनों को बुनते हुए बड़ी दूर चले आए हैं। और इस मर्तबा मैं तुम्हें इसमें शामिल नहीं कर रहा हूँ। क्योंकि मुझे पता है, तुम मेरे घर से कई सौ मील दूर कहीं अजानी जगह पर मेरे ख़यालों से कभी भी भर नहीं पाती होगी। यह बातें भी बिलकुल उसी तरह कहीं से भी सच नहीं हैं जैसे मैं और यहाँ लिखे मेरे बेमतलब से ख़याल।

हम कितनी तरहों से बदल रहे होते हैं, हमें पता भी नहीं चलता। मुझे सबसे पहले तुम्हारी उस बात ने बदला, जहाँ तुम ‘लिव लाइफ क्वीन साइज़ ’ टाँक आई। यह जैसे मेरे दिल को बेधने लगा। मेरे जैसे ‘सबऑल्टर्न’ को ऐसी ही किसी बंद गली में आकर ठहर जाना था(?) पर क्या करता, यह तुम्हारे हिस्से का ‘विमन डिस्कोर्स’ रहा होगा, यही मानकर तुम्हारे साये में कुछ देर बैठने की ज़ुर्रत करने का मन किया होगा। पर तुमसे कभी कहा नहीं। मैं कभी तुमसे कुछ कहता भी कहाँ करता था। मेरे हिस्से कोई भी अख़्तियार नहीं रहा, सिवाय तुम्हें पल भर देखने और तुम्हारी आँखों में डूब जाने के। तुम्हें बिन बताए इन्होने ही उन दिनों को रात होने से बचाए रखा। वैसे यह मेरे हिस्से का सपना ही रहा होगा, जिसमें तुम कुछ देर आकर थोड़ा सा मुस्कुरा जाती। वरना मेरे हिस्से तुम्हारे कोई याद बची भी कैसे रह जाती।

यह बहुत अजीब नहीं है कि मैं आज भी तुम्हें इसतरह याद करता हूँ। शायद तुम मेरे प्यार का राजघाट हो, जहाँ इस तारीख को तो एकबार आना बनता है। यह भी हो सकता उसमें बचे रह गए तत्वों की तलाश में इन गलियों में वापस लौट पड़ता होऊं। कुछ भी हो सकता है। या हो सकता है कोई भी कारण न होकर तुम ही सबसे बड़ा कारण बन जाती होगी। तुम्हारे अंदर भी उन दिनों की किसी भी तरह के एहसास बचे रह गए होंगे। फिर जिसकी सबसे जादा संभावना है, मैं इन सीमाओं को उस हद तक लाकर तोड़ देना चाहता होऊंगा, जहाँ मेरी छवि तुम्हारे अंदर इतनी धूमिल हो जाये जहां मेरी कोई भी याद बची न रह जाये। बिलकुल इसी तरह मैं हम-दोनों के बीच इस दिन के किसी भी एहसास को अपने दिल के हर कोने से निकाल बाहर फेंक देना चाहता होऊंगा। या यह सारी बातें हर बात की तरह पूरी तरह सिर्फ़ झूठी हो और कुछ नहीं। हम बस बहाने बनाकर एक पल उन यादों की छाव में बैठे रहने की आदत से मज़बूर होकर यहाँ बार-बार लौटते रहें।  

तुम इसमें ख़ुद को पाकर नाराज़ मत होना। मैं आदत से मज़बूर हूँ। वैसे इसे आना तो पहली अप्रैल को ही था, पर मन थोड़ा दुखी है, इन दिनों। कुछ खास कर पाने की हालत में नहीं दिख रहा। अगर आज दोपहर पूजा की किताब तीन रोज़ इश्क़  न आती तो शायद यह लिख भी न पाता। शायद यह उसे भूल जाने के पहले यहाँ लिख लेने से बाद के दिनों तक की याद की तरह है।

आवाज़ें..

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