मई 24, 2015

हमारी मौसी का मर जाना..

यह बात मुझे बहुत साल बीत जाने के बाद समझ आई। या इसे ऐसे कहें के उन बातों को समझने लायक समझ उमर के साथ ही आती। उससे पहले समझकर कुछ होने वाला भी नहीं था। मौसी हमारी मम्मी से छोटी थीं या बड़ी कोई फरक नहीं पड़ता। मैं बहुत छोटा रहा होऊंगा, जब एकदिन वह मर गईं। मेरे हिस्से उनके चेहरे की धुँधली याद भी नहीं बन सकी। मुझे यह समझ नहीं आया कि हमारे घर के इतने सारे एल्बमों में उनकी एकभी तस्वीर क्यों नहीं है। मम्मी कहती हैं, उन्होने मुझे गोद में खिलाया है। मतलब वह कम-से-कम तीस साल पहले तक जिंदा रही होंगी। सब बताते हैं, नाना ने उनकी शादी अपने सामर्थ्य में एक ठीकठाक पटहर के यहाँ की थी। यहीं से यह दुर्भाग्य कथा शुरू होती है। मौसी की शादी हमारे नाना-नानी की ज़िंदगी के लिए सबसे बड़ी त्रासदी बनकर आई।

यह त्रासदी शुरू हुई उनके बीमार होने से। उनकी तबीयत अपने ससुराल में ही बिगड़ने लगी। कोई नहीं पहचान पाया, क्या बात है? मौसा की तरफ़ लोगों ने हाथ खड़े कर दिये। नाना जैसे-तैसे मौसी को घर ले आए। अब शुरू हुई उनकी अंतहीन यात्रा। वह ठीक से खड़ी भी नहीं हो पातीं। चलना तो दूर की बात रही। पूरा पूरा दिन लेटे रहना। उन्हे ऐसा देख नानी का रो रोकर बुरा हाल। उनकी देवरानी पता नहीं इस पूरी तस्वीर में कहीं किसी भूमिका में दिखाई नहीं देतीं। न कभी मम्मी या किसी ने हमें बताना ठीक समझा। ख़ैर, जो भी घर आता, यही कहता ऊपरी चक्कर है। किसी ने कुछ कर दिया है। इसके बाद जो जहाँ कहता, नाना अपने कंधों पर लाद अपनी बिटिया को वहाँ तक ले जाते। झाड़-फूँक, ताबीज़, जड़ी बूटियाँ, भभूत और पता नहीं क्या-क्या। पर किसी के पकड़ में वह बीमारी नहीं आई, जिसके कारण मौसी की हालत दिन-पर-दिन बिगड़ती जाती। वह सूखकर काँटा होती रहीं। गुलाब का नहीं काँटा नहीं। नागफनी का। नुकीला।

नाना की तबीयत भी उसी वक़्त से बिगड़नी शुरू हुई। बीमार बेटी को ससुराल वालों ने छोड़ दिया। वह मायके में सपाट चेहरे के साथ वहीं एकटक पड़ी रहतीं। वहाँ से कभी कोई पूछने या झाँकने भी नहीं आया। शायद उन सबकी रीढ़ की हड्डी उन्ही दिनों गायब हुई होगी। इस तरह सारी ज़िम्मेदारी अकेले नाना-नानी के दम पर आ पड़ी। उतरौला से लेकर बाबागंज तक। गिलौला से लेकर बहराइच, भिंगा, रामपुर, नानपरा तक। जहाँ कोई सुनी सुनाई बात कह भर देता, नाना चलने के लिए ख़ुद को राजी कर लेते। वे कभी इतने पैसे वाले नहीं रहे। जो बचत थी, वह मेलों में झंडी लगाकर, गाँव-गाँव बिसातखाने का समान बेचकर थोड़ा बहुत इकट्ठा किया, वह सब धीरे-धीरे ख़त्म होता गया। गरीबी सबसे बड़ी बीमारी बनती गयी। बाद में वह इसका भी इलाज नहीं ढूँढ पाये, यह दूसरी बात है।

इसके आगे की कहानी तथ्यों पर नहीं सुनी-सुनाई बातों को एक के साथ एक जोड़कर बुनते हुए कुछ इसतरह बन पायी। पता चला हमारी मौसी की सास को जादू-टोने में महारथ प्राप्त थी और उन्होने ही कोई दवाई खाने के लिए दी। तबसे उस बीमारी ने उन्हे घेर लिया। इधर वह घर छोड़कर गईं, उधर उन्होने अपने लड़के की दूसरी शादी की तय्यारी शुरू कर दी। सुनने में यह भी आया कि हमारे अदृश्य मौसा, कुछ ठीक भी नहीं थे। वे हमारी मौसी को ख़ूब मारते-पीटते, जिसका उनकी तबीयत ख़राब होने में बहुत बड़ा योगदान रहा। उनके कोमल मन पर पता नहीं क्या हुआ? इसलिए भी शायद वह कभी ठीक ही नहीं हो पायीं। मौसी की यह हालत देखकर नाना के दिमाग ने भी अचेत होना शुरू कर दिया। चलते-चलते कहीं भी रुक जाते। कभी रास्ता भूल जाते। जो चलने में कभी थकते नहीं थे, एकबार में बीस-बीस कोस नाप जाते, अब कोस भर में ही हाँफने लगे। यह उनके बिना किसी तय्यारी, हारने की तय्यारी थी। एक कमज़ोर-सी हार।

एकदिन ऐसी ही किसी अनाम-सी दुपहरी में हमारी मौसी हमेशा के लिए चली गईं। मम्मी कभी अपनी बहन का चेहरा दोबारा नहीं देख पाईं। दिल्ली, सेवढ़ा से बहुत दूर हमारे घर में पड़ती थी। और वह वक़्त पर पहुँच नहीं पायीं। आज भी कभी-कभी उन्हे यादकर उनकी आँखें भर आती हैं। तब से लेकर आजतक मम्मी ने उन अदृश्य मौसा की परछाईं भी हम पर पड़ने नहीं दी। सामने आए भी होंगे, तब भी बताया नहीं। कितने सपने बुने होंगे हमारी मौसी ने। नाना-नानी ने। सब एकएक कर मिट गए। यह नानीघर बिखरने की पहली किश्त थी। उनके हिस्से अभी और भी बहुत सारे दुख लिखे थे। ऐसे दुख जो कहीं किसी को दिखाई नहीं दिये। अभी, आज, उन्हे कहने नहीं जा रहा। ऐसे सब कह देना भी तो ज़रूरी नहीं। हिम्मत जो होनी चाहिए, वह सोच सोचकर कम होती जाती है। आज ऐसे ही कह गया। कुछ था मन में।

इसका हमारे छोटे-छोटे मनों पर तब क्या असर हुआ कह नहीं सकता। बस एकएक कर गर्मियों के दिन ख़त्म होते जाते और छुट्टी ख़त्म होने पर जब क्लास में सब बच्चे अपने दादा-दादी, नाना-नानी के यहाँ से ढेरों कहानियाँ लेकर लौटते, तब हम सिर्फ़ इतना ही सोच पाते, काश हमारे यहाँ भी ऐसा कुछ हो पाता। हमारे नाना-नानी के यहाँ ऐसा क्यों नहीं होता। और कुछ खास नहीं। हम चुप रहकर कहीं खो जाते। कहीं गुम होना चाहते। वह भी नहीं हो पाते। हमें बस उनके यहाँ की छत याद आती और उसपर बरसात के वक़्त पड़ रही बूँदें दिखती।

{तारीख़ चार जुलाई, साल यही। शायद नेहा उन दिनों यहीं रही होगी। पापा ने मम्मी को यह पन्ना दिखाया भी होगा या नहीं, पता नहीं। यहाँ इसमें जो लिखा है, सच भी है यह नहीं; मालुम नहीं। ख़ैर, जगह वही जनसत्ता में समांतर, शीर्षक: मौसी की याद। } 

मई 23, 2015

नानी घर

बचपन की यादों में सबसे अनछुई याद है नानी के घर की। हमलोग इसी मौसम में झुलसती गरमियाँ अपने गाँव में बिताने हरसाल लौट आते। वहाँ हमें छोड़कर सब रहा करते। वहाँ बस, हम ही नहीं हुआ करते। पता नहीं हम कितने छोटे रहे होंगे जब पापा हीरो मजेस्टिक  खरीदकर लाये। शायद मेरे मुंडन का साल रहा होगा। यह इसलिए याद रह गया क्योंकि उस तस्वीर में मेरे सिर पर बाल नहीं हैं और हम भाई और बुआ सब उसपर फ़ोटो खिंचवाने के लिए बेतरतीब चढ़ गए। तब रील वाला कैमरा होता था। कोनिका का। कोडेक बहुत बाद में आया। केबी टेन। पर जितना इनके नाम में कुछ नहीं रखा है, उससे जादा, उन एल्बमों में लगी तस्वीरें कह जातीं। सिर्फ़ दिखकर। अचानक। चुपके से। सहसा। 

एक-एक रील को कितने धीरेसे तस्वीरों में बदलते रहना है, यह हमने पापा से सीखा। आज हर मोबाइलफ़ोन कैमरा है। कितने सस्ते में सब डिजिटल कैमरे बेच रहे हैं। पर उस डार्करूम का नॉस्लेटजिया जाने भी दो यारों से निकलकर हमारे अंदर कब दाखिल हो गया, पता नहीं चला। वह ऐसे ही अंदर के अँधेरे कमरे में बंद है। बंद हैं उनमें, ऐसी बहुत सी तस्वीरें। अनदेखी। अनछुई। 

तो ऐसे ही एक गर्मियों की छुट्टियाँ रही होंगी, हम वहीं थे। पता चला, नानी के गाँव में आग लग गयी। सब सोच रहे थे घर वर सब जल गया होगा और वह बचे-खुचे समान के साथ कहीं किसी बगिया में खुले आसमान के नीचे पड़े होंगे। दादी ने नानी के लिए एक साड़ी और पेटीकोट मम्मी के हाथों में रख दिया। हम उसी हीरो पुक पर बैठे नहर किनारे ढलान से नीचे उतर रहे हैं। हम कहीं रुके नहीं। सीधे घर पहुँचे। घर जलने से बच गया था। तब मम्मी ने नानी को दादी का दिया झोला दिया। तब नानी ने उसे बिन खोले वापस कर देने को कहा। हम केवल मूकदर्शक थे, कुछ समझ नहीं रहे थे, ऐसा नहीं कह सकते। हम बस अपनी नानी को सोख रहे थे।

ऐसा हरबार होता के हम हमेशा वहाँ जाकर खो जाते। वापस लौटने के लिए मचलने लगते। लगता अभी रात खत्म हो जाये और हम वापस दादी के पास चले जाएँ। तबसे लेकर नाना-नानी के चले जाने तक पता नहीं किस भाव से भरा रहा। कभी कह नहीं पाया। सालों बाद आज भी जब जीने से उतरते हुए नानी का खाने के लिए बुलाना याद करता हूँ तो मन थोड़ा उदास हो आता है। वह फ़ूले की बटुली में अरहर की दाल पता नहीं किस स्वाद से भर देतीं कि आजतक उसे ढूँढता-ढूँढता जैसे थक गया। उनकी अंदर धँस गईं आँखों में कुछ ऐसा था के कभी वापस उस खपरैल वाले घर लौट आता। जैसे वह अभी-अभी छोटके मामा के साथ खुटेहना बाज़ार करके लौटी हों और इतनी दूर चलकर आने से उनके पैर और फेफड़े दोनों थककर चूर हो गए हों कि सामने हमारी अम्मा को देख थकान जाती रही हो। यह हमारी मम्मी का भी वापस लौटना रहता। साल भर में एक रात। सिर्फ़ एक रात। शाम के ढलते ही वह छोटी-सी खामोश रात। 

जैसे ही हम पहुँचते मामा बाल्टी लेकर ठंडा पानी भरने कुएँ पर चले जाते। घर में नल था नहीं। जितनी बार पानी की ज़रूरत पड़ती, उतनी बार वे वहीं से भरकर ले लाते। फ़िर नानी उस तांबे या फूले के लोटे में नींबू पानी का शरबत घोलने लग जातीं और मामा लौटकर चीनी लेने के लिए वापस ढाबली की तरफ़ लौट जाते। हम तबतक वहीं बाहर दुआरे पर बने मिट्टी के चबूतरे पर बिछी खटिया पर बैठे रहते। मन बार बार छत पर जाने को होता पर हम दोनों भाई उसे रोके रहते। उस छत की भी एक कहानी थी। वह फ़िर कभी। रात होती। हम खाना खाते। मैं पापा के बगल उन कुरमियों या अहिरों के अहाते में बिछी खाट पर इमली के पेड़ के नीचे, ट्रॉली के बिलकुल बगल लेटा रहता। मेरे सपनों में तब मैं बहुत ही छोटा रह जाता और वह पीछे खड़ा ट्रैक्टर बहुत बड़ा होकर मुझे रात भर डराता रहता। पर मुझे भी इससे बचने की तरकीब आती। मैं पापा के बगल लेटे लेटे डरता तो क्या बस आसमान के तारे गिनता रहता। जितनी बार नींद टूटती, उतनी बार पिछली बार याद रह गयी गिनती से शुरू हो जाता। कभी मुझे दिख जाते अपने आसपास के चेहरे। और मैं डर के सो जाता।

हम सबको पता होता, हम किसी भी हाल में कल सुबह वापस चले जाएँगे। हमसब सारी रात एकबार फ़िर साल भर की विदाई के लिए ख़ुद को तय्यार कर रहे होते। और हरबार की तरह इस तय्यारी में नानी और मम्मी दोनों कुछ कम तय्यार हो पाते। दोनों गले मिलकर ख़ूब रोते। इतना रोते कि एकबार हमारा रुक जाने को मन हो आता। पर रुक न पाते। उस ढलान पर पहुँचते-पहुँचते जो अब लौटते वक़्त चढ़ाई बन जाती, यहाँ आकर सबर की सीमा एकबार फ़िर टूट जाती। दोनों रहरह एकबार फ़िर घूँघट में छिपकर रोतीं और एकदूसरे के आँसू पोंछतीं। नाना और बड़े मामा वहीं दुआरे सबसे पहले छूटने वालों में होते। नानी साल भर के लिए वहीं फ़िर छूट जाती। मामा कुछ कदम और चलकर छूट जाते। हमारे साथ बस हमारी मम्मी होतीं। कितनी ही सारी यादें रास्ते भर उन्हे अंदर-ही-अंदर सालती रही होतीं। उनकी आँखों में बस चाचा के घर लगा अमरूद का पेड़ और उन इमलियों की उदासियाँ रह जाती, जो कभी वह ख़ुद इतनी ऊँचे चढ़ कर तोड़ लातीं। 

मई 22, 2015

पुल

वह पुल एक शांत पुल था। किसी नदी के ऊपर नहीं। दो इमारतों के बीच हवा में टंगा हुआ-सा। वह हमारे बचपन से पता नहीं कितने सारे तंतुओं को जोड़ता एक दिन गायब होता गया। उसका अस्तित्व हमारे लिए उतना ही ज़रूरी बनता गया जितना कि हमारे फेफड़ों में भरती जाती हवा। उसका चले जाना उन धागों का टूट जाना रहा। वह दिनों के बीतते जाने के साथ हमें बुनता जाता। उसने पढ़ने के लिए कहीं दाखिला नहीं लिया। हमें यह भी नहीं पता कि कभी उसने हमसे रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो, चटकाय सुना होगा। पर वह चला गया। उसका जाना उन नदियों के ऊपर बने पुलों से  पानी का रुक जाना रहा। वहाँ उमड़ते-घुमड़ते मौसम का ठहर जाना रहा। वह सब कुछ देर ठहरकर तस्वीर से बाहर आकर ठहर गए।

कई मौसमों के सही मतलब हम उसके ऊपर चहलकदमी करते हुए जानते रहे। कोयल से लेकर मोर तक वहीं हमारा इंतेज़ार करतीं। आम की बौरें सबसे पहले इससे ही पेड़ पर झूलती दिख जाती। उसकी छुपी हुई पखुड़ियों के बीच से झाँकते छोटे-छोटे अधपके आम, वहीं से हमें देखते रहते। हम उसे तबसे देखते रहे, जब उसकी डेढ़ फुट की दीवार, हमारी आँखें अपने पंजो के सहारे खड़े होकर भी नहीं लाँघ पातीं।  

यह दोनों इमारतों के बीच एक संवाद की असंभव संभावना बना रहा। जैसे दीवार में खिड़की रहती है। यह मानवता के इतिहास की सबसे बड़ी उपलब्धि रही होगी। इसने सैकड़ों पहाड़ियों के उतार-चढ़ाव नदी-नालों की दूरियों को समेटकर दूर दिखने वाली जगहों को कितने पास लाकर खड़ा कर दिया। पहाड़ इतने निकट आकर कितने खुश हुए होंगे। सदियों से चुपचाप खड़े थककर ऊबते रहे। अब वह उस एकांत को भर सकते थे। सुख-दुख के साथी बनकर जीने का मतलब उन्होने पहलीबार पुल के आने के बाद महसूस किया। महसूस किया के उनके अंदर कितनी बातें अनकाही रह गयी हैं। वह उनके अंदर दिल तक उतरने वाली सीढ़ी बनकर आया। यह कोमल क्षण उन दोनों के अनछुए एहसास की तरह उगता रहा। उगता रहा हमेशा कुछ कहने की संभावना का एहसास।

हम सबने मिलकर इसे रेलवे स्टेशनों की परिधि में बने उन ख़स्ताहाल ढहते कैबिनों की तरह प्रयोग के लिए कभी अयोग्य घोषित नहीं किया। हम उसपर रोज़ लगभग अनगिन बार गुजरते। पता नहीं कितनी बिखरी यादें उसके मलबे में पड़ी वहीं रह गईं। हम दसवीं के पेपर देकर फ़ुरसत से खाली थे। गर्मी में बेजान से कुछ जादा। पर बिलकुल उदास। उसने कभी हमें वहाँ आने से मना नहीं किया। यह उस पुल का वही दौर रहा, जब वह एक प्रेम कहानी अपने इर्दगिर्द बुनता रहा। पाँच साल हुए उन दोनों की शादी हुए। एक लड़का भी है उनका। नाम पता नहीं क्या रखा है। हम रात दो-दो बजे तक वहीं उसके साथ खड़े रहते। न वह थकता। न हम। न जाने कितनी रातें वह हमें हमारी बोझिल बातों को सुनता रहा। न हँसने वाली बातों को भी अपने अंदर समेटता रहा। समेटता रहा उन दिनों अकेले रह जाने का एहसास। 

एक हिसाब से वह हमसे उम्र में बड़ा रहा होगा। हम जब नहीं थे, तब वह था। उसदिन जब ठेकेदार के कहने पर वह मज़दूर भारी-सा हथौड़ा लेकर उसे तोड़ता रहा, तब भाई और मैं कमरे में सोते रहे। वह हमारी नींद में ही जाता रहा और हमें पता नहीं चल पाया। शायद यह उसके चुपचाप चले जाने की कोई चाल रही होगी। कि जबतक हम जागते, वह पूरा चला जाता। पर अचानक आँख खुली। बाहर आया। देखा। वह आधा जा चुका था। अब उसे कुछ मिनटों बाद पूरा चले जाना था। वह रोके से भी नहीं रुकता। उसने किसी को बताया नहीं कि वह जा रहा है। हम उसके जाने के दिन भी उससे नहीं मिल सके। उसने अपने जाने के ठीक पहले की शाम, अलविदा भी कहने नहीं दिया। वह उस ढलती शाम के अँधेरे में एक अधेड़ बूढ़े मेहमान की हैसियत ओढ़कर चुपचाप चलता गया और हमारी आँखों के सामने हमेशा के लिए ओझल हो गया। वह हमसे मिलने के लिए कभी लौट नहीं पाएगा। लौटना चाहे, तब भी नहीं। कभी नहीं।

सब उसके चले जाने के बाद अपनी साँसों की उलझनों को लेकर अपने अंदर छिप गए। पापा भी एकबार पूछ चुके हैं, कोई पहले की तस्वीर है उसकी। कल से पहले की। जब वह पूरा खड़ा है। रामसरन कहते, वह तो राख़ और चूने के जोड़ से बन था। यहाँ सबकुछ ढह जाता, पर इसे कुछ नहीं होता। यहसब बातें यहाँ इसलिए भी लिखे दे रहा हूँ क्योंकि यह कोई ऐतिहासिक पुल नहीं रहा। इसे यह इस किताब के अलावे किसी किताब में जगह नहीं मिलने वाली। फ़िर सारे इतिहास का समाजशास्त्र तो इसी जगह के छिकाए जाने, थोड़ा सरक जाने के बीच है।

{तस्वीर तबकी है, जब वह आधा जा चुका था। आधा जाने वाला था। पर अब कहीं नहीं जाएगा। वह यहीं रुक गया है। चुपचाप।}

मई 21, 2015

शादियाँ उर्फ़ जब ज़िन्दगी ‘सारा आकाश’ हो जाये

1. खाली पन्ने
डायरी। आखिरी पन्ना। तारीख़ चौबीस अप्रैल। इसके बाद के सारे पन्ने खाली। बिलकुल सफ़ेद। आज कितने दिन हो गए? अभी गिने नहीं। पर तीन दिन बाद पूरा महिना हो जाएगा। कहीं कुछ नहीं लिखा। ऐसा कैसे हो गया। पता नहीं। बस लगता है, जैसे दिनों को रात के पहिये लग गए हों। सब सोने लगे। भरी दोपहरी। पता नहीं मन में क्या चलता रहा। वहाँ उसबार ऊपर वाली मंज़िल पर बैठे रवीन्द्र कालिया की कहानी पढ़ता रहा। नौ साल छोटी पत्नी । पता नहीं कहानी  कैसी है। उसमें न तुम थी, न मैं था। एक अकेला कमरा लेकर माता-पिता से दूर कहीं किसी जालंधर शहर में हम दोनों रह रहे होते। कितना अजीब है न। मेरे लिए यह सोचना भी मुश्किल है। मैं विनोद कुमार शुक्ल के ‘दीवार में खिड़की रहती थी’ का रघुवर प्रसाद ठहरा। सड़क पर किनारे खड़ा। इंतज़ार करता।

कहते हैं, जब उन्होने कहानी लिखी तब वे अविवाहित थे। यह भी के उनके उस्ताद मोहन राकेश बहुत नाराज़ हुए थे, इसके बाद। अगर आज मैं ऐसी कोई कहानी लिखूँ और उसमें राजेन्द्र यादव के ‘सारा आकाश’ की छवियाँ दिख जाएँ तो हमारी ज़िंदगियों मेंसे छटाँक भर झूठ ही ऊपर-नीचे होगा। बाकी सब थोड़े बहुत रद्दो-बदल के साथ रफ़ू कर चुका होऊँगा। कुशल बनकर ‘प्रेत बोलते हैं’ लिखना मुश्किल है। मुश्किल है, ऐसी ज़िंदगी को जीते रहना। जीते हुए ऐसे लिखते रहना। लिखना बहाना है, जीने का जैसे। 

2. सपने सब देखते हैं
सपने सब देखते हैं। उन्होने यह सपना मिलकर कतई नहीं देखा। दो महीने पहले आई लड़की, जो अब उसकी पत्नी है, हमेशा अपनी जेठानियों के नीचे, दिनभर रसोई में मिसराइन की तरह रहने लगी। जेठानियाँ उन्हे दबा ले गयी हैं। 

उनकी आँखें भी खाली नहीं रही होंगी। वह जब छह साल पहले आई होगी। तब सोचा नहीं होगा, हरसुबह नौबजे मामाजी के नाश्ते का टिफ़िन तय्यार करने में उनके सारे सपने, अधखुली आँखों से ऐसे ही उड़ते जाएँगे। कहने को यह नौ बजे है पर जब इसके लिए उठना तड़के पाँच बजे पड़ता, तब पता चलता, उन दर्दकरती कड़वी आँखों का दर्द। बिटिया भले उठ जाये। रोने लगे। पर रसोई छोड़कर वापस ऊपर कमरे में नहीं जा सकती। और एक वह है, दो महीनों में ही पीछे हटने की नौबत आगयी। उन्हे क्या जेल से कम लगती है यह जगह। शायद कम है भी नहीं शायद। सबको लगता मर्जी है। पर है इस घर में किसी की पत्नी बने रहने की मजबूरी।

3. कानपुर: उत्सव गेस्ट हाउस
ऐसा नहीं है, शादियों के सपने नहीं होते। वह दोनों अपने मन से दोनों एकदूसरे के सपनों में दाख़िल हुए। कानपुर दिल्ली जैसा नहीं पर फ़िर भी ‘उत्सव गेस्ट हाउस’ कोई छोटी जगह नहीं थी। क्या बारात आई थी। हम लोग भी गए। बड़े डाकघर से मुड़कर कैंट तक। पनकी से लड़का पढ़ने आया और दोनों पहलीबार गोमती एक्सप्रेस में आमने-सामने की सीट पर मिले। कोई पेपर था, लखनऊ में। कल। इतवार को। बक्शी का तालाब के पास। वापस उसे भी चार बाग लौटना था। साथ में। उसके बाद पता नहीं कितनी बार ऐसे मिलते रहे। बेमकसद। रेल में।

मिलते रहे सपनों में भी। बिन बताए। बिन कहे। अनगिन बार। के कोई देख ले उन्हे। साथ-साथ।

4. नौकरी
आज जब एयरटेल का रिटेल काउंटर संभालते वक़्त कोई बड़ी गाड़ी से उतरकर वह सामने आ जाती, तो उसे लगता, गलत जगह चला आया। उसे इसके बगल होना चाहिए था। थोड़ा और इंतज़ार कर लेता।

एक बड़ी नौकरी के लिए शायद वह इतने पैसे कमाने कहीं चला जाता। शायद दिल्ली। या फ़िर लखनऊ। बंगलोर। सिर्फ़ वह दोनों होते। पर आज अब कोई नहीं कहता, उन दोनों ने लव मैरेज की है। सब यही कहते, लड़की क्या ख़ूब खाना बनती है। उसे लगता, उसकी ज़िंदगी खाना बनाने में ही निकल जाएगी। पर वह क्या करे। उसने भी तो शादी का सबसे बड़ा तोहफ़ा घर की बड़ी रसोई दी। आज भी हररात उसे सपने आते। पता नहीं क्यों उसे सपने में जो भी घर नज़र आता, उसमें यह रसोई घर ही गायब रहती। बिलकुल गायब। नदारद।

5. यह अजीब बात है
पर यह अजीब बात है, इनमें से किसी की कहानी किसी ने किसी कहानी में नहीं कही। कोई इन तक कभी पहुँच भी नहीं पाया। शायद वह जो लिखते हैं या तो ऐसी ज़िंदगी नहीं जीते या उनके शिल्प में यह किस्से कहीं नहीं अटते। जो भी हो, हमसब गायब हैं। हमारी जिंदगियाँ गायब हैं। हमारी शादियाँ कहीं नहीं हैं। उनका गायब होना हमारी घुटन का गायब होते जाना है। हमारे सपनों की रुकी हुई किश्तों का रुक जाना है।

इसलिए ज़रा बचके। यहीं रुके रहो, घास के मैदान के पास। पानी के झरने के किनारे। घात लगाकर बैठे रहो।

मई 01, 2015

जो यहाँ छिप-छिपकर आते हैं, उनके लिए. .

कई दिनों से सोच रहा हूँ मेरे लिखने में ऐसा क्या है(?) जो चाहकर भी गायब होता रहा है। इस खाली कमरे का एकांत पता नहीं किस तरह अपने अंदर भरकर यहाँ बैठा रहा हूँ। दीवारें बदल जाती हैं पर मन वहीं कहीं अकेले में रह रहकर अंदर लौटता रहता है। यह बहुत अजीब है कि जब कहीं चेहरे और नाम दोनों को पहचानने वाले मिल जाते हैं, तब एकबात हरबार सुनाई देती हैं। वह सब आहिस्ते से पूछते हैं, आप अकेले रहते हैं? मैं धीरे से कहता हूँ, नहीं। इस पूछने और कहने के बीच न जाने सवालों की जिरह दोनों तरफ़ उठती रहती होगी। यह कैसे(?) हुआ होगा के लिखने में मेरा घर कहीं पीछे रह गया। उन सबको कैसे लगता होगा कि इस शहर में मैं भी उनकी तरह अकेला, किसी दूर के सपनों के लिए लड़ रहा हूँ। फ़िर मेरे अंदर से ही यह बात आती कि इस लिखने में ही ऐसे धागे रह जाते होंगे, जिनमें मैं सिर्फ़ मैं  बनकर उन सबके सामने आता।

शायद यह हमारी सहूलियत-सलाहियत का भी सवाल है। हम कैसे अपने आसपास की दुनिया रचते हैं। यह जो मेरा अकेले रह जाना है और जो भावों का मिल जाना है, सब आपस में गड्ड-मड्ड होता रहता है। पता नहीं मेरे अवचेतन में कहीं कुछ रहा होगा जो लिखने के दरमियान उन सबको बाहर आने से रोकता होगा। रोकना इस जगह की अपनी सीमाओं में आकार लेता रहा और मेरी कागज़ की डायरी कभी सामने नहीं आ सकी। जब कोई वहाँ पहुँच ही नहीं पाया तब कैसे जान पायेंगे के जो भी मैंने यहाँ उतार कर रख दिया है, वह कितना अधूरा है। पर नहीं, शायद एक हद तक हम सभी अपने इर्दगिर्द एक ऐसा घेरा बना लेते हैं या वह हमको देखकर स्वतः हमारा ‘कमफ़र्ट ज़ोन’ बन जाता है, जिसको तोड़ने की हिम्मत या कोशिश हमारे मन में कभी नहीं होती। ऐसी हिम्मत या कोशिश उसे नहीं, खुद को तोड़ने जैसा है। 

यह बिलकुल वैसी ही बात है कि लिखने वाले ने कभी यह नहीं सोचा के उसे पढ़ने वाले उन पंक्तियों से गुज़रकर अपनी दुनिया में लौट जाते हैं। वहाँ जाकर कोई भी क़तरब्योंत कर पाना किसी रचनाकार के लिए संभव नही है। अगर ऐसा होता तब वह लेखक नहीं कोई जादूगर है; जो अपने मन से उनके घेरों में अपने तरह से रंग भरता हुआ सबकुछ नियंत्रित करता रहता है। मुझमें यह कला कुछ कम रह गयी जान पड़ती है। या हो सकता है ज़िन्दगी के जिस दौर में हम यह सब लिख रहे हैं, वहाँ के दबाव इस तरह से हम पर बनते रहे के शहर में रहने के बाद इसकी गलियाँ हमारे दिलों में उतरती हुई हमारे क़ाबू से बाहर होती गयी। हम कभी सोच भी नहीं सके के जब यह लिखा हुआ पुर्जा किसी के हाथ लग गया, तब क्या होगा? मुश्किल तब और बढ़ जाती है, जब उसमें उन्हे अपना चेहरा दिख जाता है। और एक हद तक यहाँ ‘मुश्किल’ एक गलत शब्द है, पर क्या करूँ मेरी भी एक सीमा है। उसे बाहर जाने का साहस मुझमें अभी नहीं है।

फ़िर यह भी पूछे जाने लायक सवाल है कि जब हम अपने पढ़ने वालों से बात कर रहे होते हैं, तब बिलकुल अलग तरह से ख़ुद को और अपने लिखे हुए को जान पाते हैं। वह बात जो हवा में कहीं पहुँचने के लिए टंगी हुई थी उसे अब एक मुकम्मल जगह मिल गयी है, वह धीरे-धीरे किसी के दिल में उतरते हुए उन कतरों में मिलते हुए, अनछुए एहसासों में तब्दील होती जा रही होती है। कोई बात थी, जो छू गयी। असल में यह न कह पाने की जद्दोजहद से निकली हुई अनकही बातों का वजन है जो किसी कोने में दिल के पास, बगल में, बाँछों के दरमियान छुपी हुई रह गयी थी। पर अब जो हमारे मन में एक ख़याल था, वही सामने है, तब हम ख़ुद को रोक नहीं पाते। रोकना चाहें, तब भी नहीं रोक पाते। क्योंकि कहीं भीतर की गहराइओं में डूबा हमारा मन अब इतनी देर बाद अपने को संभाल नहीं पा रहा होता।

इधर यहाँ लिखने के पाँचवे साल में चलते हुए बहुत से साथी मिले, जो कभी यहाँ किसी पोस्ट पर अपनी कोई पहचान नहीं छोड़ जाते, पर जब मिलते हैं, तब उनके चेहरों पर तैर जाती मुस्कान बहुत कुछ कह जाती है। वे सब कहीं न कहीं अपने अंदर इन एहसासों को महसूस करते हुए थोड़े और नज़दीक आ जाते हैं। फ़िर भी उनसे जादा बात नहीं कर पाता। शायद यह पहली बार है, इधर। उन सबको अपने आस पास देखकर लगता है, लिखना सिर्फ़ एक असामान्य घटना नहीं है। इसके घटित हो जाने के बाद बन रहे संबंध उस लिखने के कारणों की तरफ़ जाने का एक बहुत बड़ा कारण है। और ख़ासकर मैं तुम्हारा नाम नहीं दे रहा। पता नहीं तुम यहाँ उसे देखकर कैसे हो जाते। पर हम कम मिल पाते हैं। और अक्सर जब तुम होते भी हो तो सिर्फ़ बहुत कम देर के लिए बात हो पाती है।

आवाज़ें..

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